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  • चंबल नदी में दिखा प्रकृति का चमत्कार, अंडों से निकलते कछुओं का जीवन चक्र

    चंबल नदी में दिखा प्रकृति का चमत्कार, अंडों से निकलते कछुओं का जीवन चक्र


    मध्यप्रदेश । चंबल नदी के रेतीले घाटों पर इन दिनों प्रकृति का बेहद अनोखा और भावुक कर देने वाला नजारा देखने को मिल रहा है, जहां कछुओं का जीवन चक्र इंसानों जैसे मातृत्व संबंधों की झलक पेश कर रहा है। यहां अंडों के भीतर विकसित हो चुके नन्हे कछुए बाहर आने से पहले एक विशेष हलचल और कंपन करते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘मदर कॉल’ कहा जाता है। यह संकेत जैसे ही रेत के ऊपर मौजूद मादा कछुए तक पहुंचता है, वह तुरंत सक्रिय हो जाती है और अपने बच्चों को दुनिया में आने का रास्ता देने लगती है।

    राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी के देवरी घड़ियाल केंद्र सहित पूरे क्षेत्र में इस अनोखी जैव विविधता को संरक्षित करने के लिए वन विभाग लगातार काम कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार चंबल के रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल और थ्री स्ट्रिप रूफ्ड टर्टल जैसी प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं, जिन्हें बचाने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है।

    हर साल फरवरी से अप्रैल के बीच मादा कछुए चंबल के शांत और रेतीले घाटों पर पहुंचती हैं। वे रात के समय अपने पिछले पंजों से लगभग एक फीट गहरा गड्ढा खोदती हैं और उसमें 8 से 40 तक अंडे देकर वापस नदी में लौट जाती हैं। इन अंडों को सियार, कुत्तों और अन्य शिकारी जीवों से बचाने के लिए वन विभाग ने श्योपुर, मुरैना और भिंड जिलों के घाटों पर अस्थायी हैचरियां (सुरक्षित मैटरनिटी होम) तैयार की हैं।

    वनकर्मी नियमित रूप से सुबह-शाम रेत पर कछुओं के पैरों के निशान खोजते हैं। जैसे ही किसी घोंसले का पता चलता है, वहां से अंडों को बेहद सावधानीपूर्वक निकालकर सुरक्षित हैचरी में स्थानांतरित कर दिया जाता है। अब तक करीब 395 घोंसलों को सुरक्षित किया जा चुका है, जिनसे 7344 से अधिक नन्हे कछुए सफलतापूर्वक बाहर निकलकर चंबल नदी की धारा में अपनी यात्रा शुरू कर चुके हैं।

    इन नन्हे कछुओं की देखभाल भी किसी नवजात शिशु की तरह की जाती है। भिंड के बरही कछुआ केंद्र में लगभग 200 कछुओं को दो साल तक सुरक्षित वातावरण में पाला जाता है, जहां उन्हें गाजर, पत्तागोभी और हरी सब्जियां खिलाई जाती हैं। पूरी तरह विकसित होने के बाद इन्हें वापस प्राकृतिक नदियों में छोड़ा जाता है, ताकि पारिस्थितिकी संतुलन बना रहे।

    हालांकि, इस पूरी प्राकृतिक प्रक्रिया पर रेत खनन और मानव गतिविधियों का खतरा लगातार बना हुआ है। जहां मशीनों का शोर या खनन गतिविधियां होती हैं, वहां कछुए अक्सर घोंसला बनाए बिना ही लौट जाते हैं, जिससे उनके प्रजनन पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में चंबल सेंचुरी का यह संरक्षण अभियान न केवल कछुओं के अस्तित्व के लिए जरूरी है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन के लिए भी बेहद अहम माना जा रहा है।

  • हाईटेक निगरानी में सुरक्षित चीते: वन्यजीव संरक्षण में Madhya Pradesh ने हासिल की अहम उपलब्धि

    हाईटेक निगरानी में सुरक्षित चीते: वन्यजीव संरक्षण में Madhya Pradesh ने हासिल की अहम उपलब्धि

    मंदसौर/नीमच। मध्यप्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य से वन्यजीव संरक्षण की एक महत्वपूर्ण और उत्साहजनक उपलब्धि सामने आई है। यहां छोड़े गए दो चीते ‘प्रभास’ और ‘पावक’ ने अपने प्रवास का एक वर्ष सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। यह उपलब्धि प्रदेश में चल रहे चीता प्रोजेक्ट और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों के लिए एक बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है।

    20 अप्रैल 2025 को हुआ था पुनर्वास, मुख्यमंत्री ने छोड़ा था अभयारण्य में

    इन दोनों चीतों को चीता प्रोजेक्ट के तहत 20 अप्रैल 2025 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा गांधी सागर अभयारण्य में छोड़ा गया था। यह पहल प्रदेश में वन्यजीवों के पुनर्वास और प्राकृतिक संतुलन को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया था।

    नए वातावरण में सफलतापूर्वक ढले दोनों चीते

    एक वर्ष के दौरान ‘प्रभास’ और ‘पावक’ ने नए पर्यावरण के साथ खुद को पूरी तरह अनुकूलित कर लिया है। विशेषज्ञों के अनुसार दोनों चीते स्वस्थ हैं और उनकी गतिविधियों में प्राकृतिक व्यवहार स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। यह संकेत इस परियोजना की सफलता को मजबूत करता है।

    हाईटेक सिस्टम से लगातार निगरानी

    वन विभाग द्वारा दोनों चीतों की 24 घंटे सख्त निगरानी की जा रही है। उनके मूवमेंट, स्वास्थ्य और शिकार गतिविधियों पर GPS कॉलर और आधुनिक ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए नजर रखी जा रही है। विशेषज्ञों की टीम लगातार उनकी स्थिति का विश्लेषण कर रही है ताकि उन्हें किसी प्रकार का खतरा न हो।

    वन्यजीव संरक्षण में बड़ी सफलता

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीतों का एक वर्ष सफलतापूर्वक पूरा करना मध्यप्रदेश के वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह न केवल जैव विविधता को बढ़ावा देता है, बल्कि भविष्य की वन्यजीव पुनर्वास परियोजनाओं के लिए भी एक मजबूत मॉडल प्रस्तुत करता है

    गांधी सागर बनेगा चीतों का स्थायी आवास

    वन विभाग को उम्मीद है कि आने वाले समय में ‘प्रभास’ और ‘पावक’ गांधी सागर अभयारण्य में स्थायी रूप से बस जाएंगे। इसके साथ ही यह क्षेत्र चीतों के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल प्राकृतिक आवास के रूप में विकसित होगा।

    प्रदेश के लिए गर्व का विषय

    इन दोनों चीतों का एक वर्ष पूरा करना न केवल वन विभाग, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश के लिए गर्व का विषय है। यह उपलब्धि राज्य को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिला सकती है।