Tag: wildlife

  • मध्यप्रदेश में बाघों पर मंडरा रहा खतरा सबसे ज्यादा टाइगर होने के बावजूद बढ़ रही मौतें संरक्षण व्यवस्था पर उठे सवाल

    मध्यप्रदेश में बाघों पर मंडरा रहा खतरा सबसे ज्यादा टाइगर होने के बावजूद बढ़ रही मौतें संरक्षण व्यवस्था पर उठे सवाल


    मध्यप्रदेश । विश्व बाघ दिवस के अवसर पर जहां पूरे देश में बाघ संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है वहीं देश के सबसे बड़े टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश के सामने एक गंभीर चुनौती भी खड़ी नजर आ रही है। प्रदेश में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन उनके संरक्षण की राह पहले से अधिक कठिन होती जा रही है। जंगलों का घटता दायरा बढ़ती मानवीय गतिविधियां और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव अब बाघों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। यही कारण है कि वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही प्रदेश में 29 बाघों की मौत दर्ज की गई है जिसने वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार एक जनवरी से 29 अप्रैल 2026 के बीच हुई 29 बाघों की मौतों में पांच मामलों में बिजली के करंट को कारण माना गया है। एक मामले में शिकार की पुष्टि हुई जबकि अन्य मौतें आपसी संघर्ष बीमारी कुएं में गिरने और अन्य प्राकृतिक कारणों से हुईं। करंट से मौत के अधिकांश मामले मंडला शहडोल उमरिया और सिवनी जैसे वन क्षेत्रों में सामने आए जहां खेतों के आसपास लगाए गए बिजली के तार वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

    राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आंकड़े भी मध्यप्रदेश के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। वर्ष 2012 से 2025 के बीच पूरे देश में 1581 बाघों की मौत दर्ज की गई जिनमें अकेले 423 मौतें मध्यप्रदेश में हुईं। यह आंकड़ा बताता है कि देश में सबसे अधिक बाघों वाला राज्य होने के साथ साथ सबसे अधिक टाइगर मॉर्टेलिटी भी यहीं दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाघों की बढ़ती संख्या के साथ उनके लिए सुरक्षित आवास और प्राकृतिक कॉरिडोर का विस्तार भी उतना ही जरूरी है।

    वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार बाघों की सबसे अधिक मौतें आपसी क्षेत्रीय संघर्ष के कारण होती हैं। जब किसी जंगल में बाघों की संख्या बढ़ती है तो वे नए क्षेत्र की तलाश में जंगल से बाहर निकलने लगते हैं। ऐसे में उनका सामना खेतों गांवों और मानव बस्तियों से होता है जहां करंट वाले तार सड़क दुर्घटनाएं और अन्य खतरे उनका इंतजार कर रहे होते हैं। इसके अलावा अवैध शिकार और जहरीले पदार्थों का इस्तेमाल भी बाघों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।

    आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 मध्यप्रदेश के लिए सबसे घातक साबित हुआ जब पूरे वर्ष में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। इससे पहले वर्ष 2024 में 47 और वर्ष 2023 में 45 बाघों की मौत हुई थी। वहीं 2026 के केवल पहले चार महीनों में 29 मौतें दर्ज होना इस बात का संकेत है कि यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह संख्या और बढ़ सकती है। औसतन हर चार दिन में एक बाघ की मौत होना संरक्षण व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।

    राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े यह भी बताते हैं कि अब बाघ केवल जंगलों के भीतर ही नहीं बल्कि उनके बाहर भी असुरक्षित हो गए हैं। लगभग आधी मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर दर्ज हुई हैं। इतना ही नहीं बाघों की खाल और अन्य अंगों की अधिकांश बरामदगी भी संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हुई है जिससे स्पष्ट होता है कि वन्यजीव अपराधियों की गतिविधियां अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

    नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी बाघ संरक्षण को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि केवल बाघों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और टाइगर कॉरिडोर को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए ताकि जंगलों और वन्यजीवों पर अनावश्यक दबाव न बढ़े।

    वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे का मानना है कि बाघों की मौत रोकने के लिए वन विभाग को जमीनी स्तर पर निगरानी मजबूत करनी होगी। प्रशिक्षित वन अधिकारियों की संख्या बढ़ाने मुखबिर तंत्र को सक्रिय करने स्थानीय ग्रामीणों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने और वन्यजीव अपराधों में दोष सिद्धि की दर बढ़ाने की जरूरत है। उनका कहना है कि कानून का सख्ती से पालन और त्वरित कार्रवाई ही शिकारियों और अवैध गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगा सकती है।

    विश्व बाघ दिवस पर मध्यप्रदेश के सामने सबसे बड़ा संदेश यही है कि केवल बाघों की संख्या बढ़ाना सफलता नहीं बल्कि उन्हें सुरक्षित जीवन देना ही वास्तविक संरक्षण है। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे प्राकृतिक कॉरिडोर संरक्षित होंगे और मानव तथा वन्यजीवों के बीच संतुलन कायम रहेगा तभी टाइगर स्टेट की पहचान भविष्य में भी मजबूती के साथ कायम रह सकेगी।

  • बाघों की दहाड़ से गूंजेगा मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री का बड़ा ऐलान वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता को मिलेगी नई मजबूती

    बाघों की दहाड़ से गूंजेगा मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री का बड़ा ऐलान वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता को मिलेगी नई मजबूती


    भोपाल । अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश ने एक बार फिर देश के टाइगर स्टेट के रूप में अपनी मजबूत पहचान दोहराई। भोपाल में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने विश्वास जताया कि प्रदेश में बाघों की संख्या जल्द ही एक हजार के करीब पहुंच जाएगी। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 की बाघ गणना के अनुसार मध्यप्रदेश में 785 बाघ दर्ज किए गए थे और जिस गति से संरक्षण कार्य चल रहे हैं उसे देखते हुए अगली गणना में यह आंकड़ा लगभग एक हजार तक पहुंच सकता है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वन्यजीव संरक्षण केवल पर्यावरण बचाने का अभियान नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला भी है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश आज देश में बाघ संरक्षण का सबसे मजबूत केंद्र बन चुका है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पृथ्वी पर यदि कहीं बाघ इंसानों के सबसे निकट प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं तो वह भोपाल और उसके आसपास का क्षेत्र है। यह प्रदेश के समृद्ध जंगलों और सफल वन प्रबंधन की पहचान है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार ऐसे प्रयास कर रही है जिससे जंगलों का प्राकृतिक संतुलन बना रहे और वन्यजीव सुरक्षित वातावरण में अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

    डॉ मोहन यादव ने बताया कि प्रदेश सरकार केवल बाघों तक सीमित नहीं है बल्कि अन्य वन्यजीवों के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की नदियों में घड़ियालों का संरक्षण और पुनर्वास अभियान तेजी से चलाया जा रहा है। पहले प्रदेश में छोड़े गए घड़ियालों का अधिक लाभ दूसरे राज्यों को मिलता था लेकिन अब ऐसी रणनीति बनाई जा रही है जिससे घड़ियाल मध्यप्रदेश की नदियों में ही सुरक्षित रह सकें और उनकी संख्या लगातार बढ़े।

    गुरु पूर्णिमा के अवसर का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति सदियों से प्रकृति के सम्मान और संरक्षण की शिक्षा देती आई है। महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पेड़ों में जीवन होने की अवधारणा भारत की प्राचीन संस्कृति का हिस्सा रही है और आज आधुनिक विज्ञान भी इस सत्य को स्वीकार कर चुका है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ओरछा स्थित माता महालक्ष्मी मंदिर की भव्यता की सराहना करते हुए कहा कि शासन के सभी विभाग महत्वपूर्ण हैं लेकिन वन विभाग के साथ काम करना उन्हें विशेष संतोष देता है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार अन्य राज्यों के साथ वन्यजीवों के आदान प्रदान और संरक्षण को लेकर भी सकारात्मक पहल कर रही है। हाथियों की आवाजाही और उससे होने वाली जनहानि को कम करने के लिए किए गए प्रयासों के भी अच्छे परिणाम सामने आए हैं।

    इस अवसर पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक शुभरंजन सेन ने कहा कि स्वस्थ जंगल की सबसे बड़ी पहचान वहां सुरक्षित बाघ और उनके शावक होते हैं। उनका कहना था कि बाघों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव की रक्षा नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। वन विभाग के अधिकारी कर्मचारी और स्थानीय समुदाय मिलकर इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं।

    कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने वन्यजीव संरक्षण के लिए उपलब्ध कराए गए नए वाहनों का लोकार्पण किया और वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया। साथ ही विभागीय प्रकाशनों का विमोचन किया गया और वन्यजीव प्रबंधन पर आधारित वृत्तचित्रों के टीजर जारी किए गए। वन सुरक्षा समितियों ईको विकास समितियों ग्राम वन समितियों और उत्कृष्ट कार्य करने वाले वन कर्मियों को सम्मानित भी किया गया। स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से वन्यजीव संरक्षण का संदेश दिया। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि मध्यप्रदेश आने वाले वर्षों में भी देश में वन्यजीव संरक्षण का अग्रणी राज्य बने रहने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ रहा है।

  • इंदौर में हाथी के हमले से गई ऑटो चालक की जान एक्सपर्ट ने बताया कब और क्यों सबसे ज्यादा आक्रामक हो जाता है गजराज

    इंदौर में हाथी के हमले से गई ऑटो चालक की जान एक्सपर्ट ने बताया कब और क्यों सबसे ज्यादा आक्रामक हो जाता है गजराज


    इंदौर । इंदौर में हाथी के हमले में एक ऑटो चालक की दर्दनाक मौत के बाद लोगों के बीच दहशत का माहौल है। इस घटना ने न केवल सार्वजनिक स्थानों पर हाथियों की मौजूदगी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके व्यवहार को समझने की जरूरत भी सामने ला दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथी सामान्य परिस्थितियों में शांत स्वभाव का होता है लेकिन कुछ विशेष अवस्थाओं में वह बेहद आक्रामक और खतरनाक हो सकता है।

    घटना रविवार को राजनगर क्षेत्र में हुई जहां एक हाथी ने अचानक ऑटो चालक विजय होलकर पर हमला कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हाथी ने पहले अपनी सूंड से उन्हें उठाकर जमीन पर पटक दिया और इसके बाद कई बार पैरों से कुचल दिया। गंभीर रूप से घायल विजय को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। घटना के बाद पुलिस ने महावत के खिलाफ मामला दर्ज किया हालांकि बाद में उसे छोड़ दिया गया। पूरे मामले की जांच जारी है।

    इंदौर चिड़ियाघर के प्रभारी और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. उत्तम यादव के अनुसार हाथी के अचानक आक्रामक होने के पीछे सबसे बड़ा कारण उसका मस्त काल हो सकता है। यह एक प्राकृतिक अवस्था होती है जिसमें विशेष रूप से नर हाथियों के शरीर में हार्मोनल परिवर्तन तेजी से होते हैं। इस दौरान उनका व्यवहार सामान्य से बिल्कुल अलग हो जाता है और वे बिना किसी स्पष्ट उकसावे के भी हमला कर सकते हैं।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि मस्त काल के दौरान हाथी की कनपटी के पास स्थित ग्रंथियों से लगातार स्राव निकलता है और बार बार पेशाब आना भी इस अवस्था का प्रमुख संकेत होता है। यदि ऐसे लक्षण दिखाई दें तो महावत को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए और हाथी को भीड़भाड़ वाले इलाके से हटाकर सुरक्षित और एकांत स्थान पर रखना चाहिए। इस दौरान हाथी अपने महावत तक पर हमला कर सकता है इसलिए अतिरिक्त सावधानी जरूरी होती है।

    वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि हाथी अत्यंत संवेदनशील और बुद्धिमान जीव है। तेज आवाज भीड़ पटाखों का शोर अपरिचित वातावरण या लगातार तनाव भी उसे असहज बना सकता है। यदि ऐसे हालात में वह पहले से मस्त काल में हो तो उसके हिंसक होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। इसलिए धार्मिक आयोजनों जुलूसों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हाथियों को शामिल करते समय सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन करना आवश्यक है।

    इंदौर में पहले भी हाथियों से जुड़े हादसे सामने आ चुके हैं। ऐसे मामलों के बाद यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या हाथियों की नियमित स्वास्थ्य जांच उनके व्यवहार की निगरानी और सुरक्षा प्रबंधन पर्याप्त रूप से किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि महावतों को हाथियों के व्यवहार और मस्त काल की पहचान का विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि समय रहते संभावित खतरे को टाला जा सके।

    इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वन्यजीवों के साथ किसी भी तरह की लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है। हाथी भले ही शांत और समझदार जीव माना जाता हो लेकिन उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों को नजरअंदाज करना इंसानों और स्वयं पशु दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए सुरक्षा नियमों का पालन और वैज्ञानिक समझ के साथ वन्यजीवों का प्रबंधन ही ऐसे हादसों को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है।

  • 'दरवाजा खोला तो सामने तेंदुआ बैठा था', इंदौर में दहशत की रात, रिहायशी इलाके में घुसा वन्यजीव

    'दरवाजा खोला तो सामने तेंदुआ बैठा था', इंदौर में दहशत की रात, रिहायशी इलाके में घुसा वन्यजीव


    इंदौर । इंदौर के कनाड़िया क्षेत्र में मंगलवार रात उस समय दहशत फैल गई, जब देवगुराड़िया की पहाड़ियों से भटककर एक तेंदुआ रिहायशी इलाके में पहुंच गया। तेंदुए ने पहले सड़क से गुजर रहे दो बाइक सवारों पर झपट्टा मारा और इसके बाद एक मकान के बाथरूम में जा घुसा। इस दौरान घर में मौजूद बुजुर्ग महिला मुन्नीबाई और उनका मानसिक रूप से बीमार पोता करीब एक घंटे तक घर के भीतर कैद रहने को मजबूर हो गए। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया और लोग देर रात तक दहशत में रहे।

    मुन्नीबाई ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि वह घर में खाना बना रही थीं। तभी बाहर अचानक शोर सुनाई दिया। जब उन्होंने दरवाजे से झांककर देखा तो सामने तेंदुआ बैठा था। यह नजारा देखते ही उन्होंने तुरंत घर के दोनों दरवाजे बंद कर दिए। उस समय उनका मानसिक रूप से बीमार पोता भी घर में मौजूद था। दोनों करीब एक घंटे तक घर से बाहर नहीं निकल सके। बाहर लोगों की आवाजें और चीख-पुकार सुनाई देती रही, लेकिन डर के कारण बाहर जाने की हिम्मत नहीं हुई।

    जानकारी के अनुसार यह घटना बिचौली मर्दाना इलाके में रात करीब साढ़े आठ बजे हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक तेंदुए ने पहले सड़क से गुजर रहे एक बाइक सवार पर हमला किया। युवक किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकला। इसके बाद तेंदुआ भागते हुए पास के एक मकान में घुस गया और बाथरूम के पास जाकर बैठ गया। इससे पूरे परिवार में दहशत फैल गई।

    घटना की सूचना मिलते ही आसपास बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए, लेकिन तेंदुए के डर से कोई भी घर के करीब जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। लोगों ने तुरंत पुलिस और वन विभाग को सूचना दी। हालांकि वन विभाग की टीम के पहुंचने से पहले ही तेंदुआ बाथरूम के पास बनी दीवार फांदकर बाहर निकल गया और श्रीजी वैली की दिशा में चला गया।

    वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और पूरे घर की तलाशी ली। जब अधिकारियों को पूरी तरह भरोसा हो गया कि तेंदुआ वहां से जा चुका है, तब परिवार को सुरक्षित बाहर निकाला गया। इसके बाद क्षेत्रवासियों ने राहत की सांस ली।

    स्थानीय निवासी अभिषेक जाधव ने बताया कि शुरुआत में उन्हें लगा कि कोई बड़ी बिल्ली होगी, लेकिन ध्यान से देखने पर पता चला कि वह तेंदुआ है। इसके बाद लोगों ने शोर मचाकर आसपास के लोगों को सतर्क किया और पुलिस तथा वन विभाग को सूचना दी।

    घटना के बाद स्थानीय लोगों ने जंगल से सटे रिहायशी इलाकों में वन विभाग की नियमित गश्त बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते निगरानी नहीं बढ़ाई गई तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है।

    वन विभाग के रेंजर योगेश के अनुसार तेंदुआ संभवतः देवगुराड़िया की पहाड़ियों से भटककर आबादी वाले इलाके में आ गया था। घटनास्थल जंगल से करीब आधा किलोमीटर दूर है और इस क्षेत्र में पहले भी तेंदुओं की आवाजाही होती रही है। विभाग का मानना है कि तेंदुआ रात में ही वापस जंगल की ओर लौट गया और बुधवार सुबह तक उसके दोबारा दिखाई देने की कोई सूचना नहीं मिली।

  • स्टोर रूम की सफाई से लेकर वन विभाग की मदद तक, बारिश के मौसम में इन जरूरी घरेलू सुरक्षा नियमों का करें पालन

    स्टोर रूम की सफाई से लेकर वन विभाग की मदद तक, बारिश के मौसम में इन जरूरी घरेलू सुरक्षा नियमों का करें पालन


    नई दिल्ली । देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून की सक्रियता बढ़ने के साथ ही आम नागरिकों के लिए मौसमी बीमारियों के अलावा एक और बड़ा और गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। भारी बारिश, जलभराव और जमीन के भीतर नमी बढ़ने के कारण सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले रेंगने वाले जीव अपने प्राकृतिक आवासों यानी बिलों से बाहर निकलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सुरक्षित और सूखी जगहों की तलाश में ये जीव अक्सर इंसानी बस्तियों, घरों के बगीचों, स्टोर रूम और बेसमेंट जैसी जगहों पर शरण ले लेते हैं। इस स्थिति से निपटने और अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए गृह स्वामियों को कुछ विशेष और महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को अमल में लाने की तत्काल आवश्यकता है।

    घरेलू सुरक्षा के दृष्टिकोण से सबसे पहला और बुनियादी कदम घर के आसपास के बाहरी वातावरण को पूरी तरह से साफ-सुथरा रखना है। घर के परिसर या बगीचे में जमा होने वाले कचरे, सूखी लकड़ियों के गट्ठर, पुरानी ईंटों के ढेर और बेतरतीब उगी झाड़ियों को तुरंत साफ किया जाना चाहिए, क्योंकि ये स्थान सांप और बिच्छुओं के छिपने के लिए सबसे अनुकूल माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि घर के लॉन या आसपास के मैदान में घास अधिक बढ़ गई है, तो उसकी नियमित रूप से छंटाई कराना अनिवार्य है, ताकि खुले और साफ स्थान पर ये जीव ठहर न सकें।

    सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के अगले चरण में घर के भौतिक ढांचे का बारीकी से निरीक्षण करना आवश्यक है। भवन की दीवारों, खिड़कियों के कोनों, मुख्य दरवाजों के निचले हिस्सों और फर्श में मौजूद किसी भी प्रकार की छोटी-बड़ी दरारों या गैप की सघन जांच की जानी चाहिए। बिच्छू और छोटे सांप बेहद महीन दरारों के रास्ते भी घर के भीतर सुगमता से प्रवेश कर जाते हैं। अतः ऐसी किसी भी संभावित एंट्री पॉइंट या झिरी के दिखाई देने पर उसे अविलंब सीमेंट, सिलिकॉन सीलेंट या अन्य मजबूत निर्माण सामग्री की सहायता से पूरी तरह एयरटाइट बंद कर देना चाहिए।

    बरसात के दिनों में घर के आंतरिक वातावरण को सूखा रखना और वहां पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करना भी सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। स्टोर रूम, बेसमेंट और घर के उन कोनों में जहां हवा और रोशनी कम पहुंचती है, वहां नियमित रूप से सफाई और कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाना चाहिए। अक्सर लोग जूते, चप्पल, पुराने कपड़े या कार्डबोर्ड के बक्से लंबे समय तक एक ही स्थान पर रख देते हैं, जो इन जीवों के लिए छिपने का आदर्श स्थान बन जाते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि इस मौसम में किसी भी रखे हुए सामान, कपड़ों या जूतों का उपयोग करने से पहले उन्हें एक बार अच्छी तरह से झाड़कर और जांचकर ही इस्तेमाल में लाएं।

    इन तमाम सावधानियों के बावजूद यदि कभी घर के भीतर या आसपास कोई जहरीला सांप अथवा अन्य जीव दिखाई दे, तो नागरिकों को अत्यधिक संयम बरतने की आवश्यकता है। ऐसी आपातकालीन स्थिति में जीव को खुद पकड़ने, सहलाने या लाठी-डंडों से मारने का प्रयास बिल्कुल नहीं करना चाहिए, क्योंकि भयभीत होने पर ये जीव और अधिक आक्रामक होकर हमला कर सकते हैं। इसके स्थान पर स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों, पशु बचाव दल (एनिमल रेस्क्यू टीम) या किसी प्रमाणित और प्रशिक्षित सर्प विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करना चाहिए, जो आधुनिक उपकरणों की मदद से सुरक्षित रूप से जीव को वहां से रेस्क्यू कर सकें।

  • भिंड में चंबल नदी किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत सस्ती कीमतों में ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थल होंगे दिखाए

    भिंड में चंबल नदी किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत सस्ती कीमतों में ऐतिहासिक व प्राकृतिक स्थल होंगे दिखाए


    भिंड । भिंड जिले के अटेर में वन विभाग ने चंबल नदी के किनारे ऊंट सफारी की शुरुआत की है। इस सफारी के जरिए पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक स्थलों की सैर कर सकेंगे। सफारी का ट्रैक करीब 10 किमी लंबा है और इसमें अटेर किला चामुंडा देवी मंदिर और वन्य जीवों को दिखाया जा रहा है। इस सफारी के लिए पर्यटकों को 200 रुपये और 500 रुपये के टिकट मिल रहे हैं और यह सफारी सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक चलेगी।

    वन विभाग ने सफारी के संचालन के लिए एक विस्तृत योजना बनाई है। पर्यटक अटेर स्थित वन विभाग कार्यालय से आफलाइन टिकट प्राप्त कर सकते हैं। चंबल क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है और यह इको-टूरिज्म गतिविधियां क्षेत्र की जैव विविधता और पर्यावरणीय संरक्षण में योगदान करेंगी। इस पहल के तहत वन विभाग स्थानीय लोगों के लिए रोजगार सृजन के अवसर भी पैदा कर रहा है जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी।

    वन विभाग की रेंजर कृतिका शुक्ला ने बताया कि सफारी में स्थानीय व्यंजन पेश करने की योजना भी बनाई जा रही है। इसके जरिए स्थानीय समुदाय को आर्थिक लाभ मिलेगा। वर्तमान में 11 ऊंटों का उपयोग सफारी में किया जा रहा है और जैसे-जैसे सफारी की लोकप्रियता बढ़ेगी इस में और भी ऊंटों को शामिल किया जाएगा।

    सुरक्षा और पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए वन विभाग ने सफारी के मार्ग को विशेष रूप से तैयार किया है। सफारी में आने वाले पर्यटकों को चंबल क्षेत्र के इतिहास और वन्य जीवन के बारे में भी जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा विभाग उत्तराखंड के ऋषिकेश की तर्ज पर यहां कैंपिंग की सुविधा भी शुरू करने की योजना बना रहा है। इससे पर्यटकों को एक अलग अनुभव मिलेगा जो स्थानीय पर्यटन को और आकर्षक बना देगा।

    यह सफारी क्षेत्र में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति और कारीगरी को भी प्रदर्शित करने का एक अवसर है। इसे वन्य जीवों की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है जो आने वाले समय में स्थानीय वन्य जीवन और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद करेगा।

  • जबलपुर के गांवों में मगरमच्छों की धूप सेंकने की घटना से मची दहशतवन विभाग की टीम की ढिलाई पर सवाल

    जबलपुर के गांवों में मगरमच्छों की धूप सेंकने की घटना से मची दहशतवन विभाग की टीम की ढिलाई पर सवाल


    जबलपुर । इन दिनों जबलपुर में पड़ रही कड़ाके की ठंड ने न केवल मानव जीवन को प्रभावित किया हैबल्कि वन्य प्राणियों के लिए भी समस्याएं पैदा कर दी हैं। जलचर प्राणीविशेष रूप से मगरमच्छठंड से राहत पाने के लिए धूप सेंकने की आदत बना रहे हैं। यह अद्भुत दृश्य जबलपुर जिले के परियट जलाशय से लगे गांवों में देखा जा रहा मटामरघानारिठौरीपिपरिया और आसपास की कालोनियों में मगरमच्छों का आना बढ़ गया हैजिससे ग्रामीणों में डर का माहौल बन गया है।

    परियट जलाशय मगरमच्छों के लिए एक प्राकृतिक निवास स्थान बन चुका है। इस क्षेत्र में लगभग 1000 मगरमच्छ रहते हैंऔर इनकी संख्या समय के साथ बढ़ी है। ये जलचरजो आमतौर पर जल में रहते हैंअब ठंड से बचने के लिए धूप में आराम करने निकल आते हैं। परियट नदी में मगरमच्छों की अधिकता के कारण वे शिकार की तलाश में और अपने निवास स्थान से बाहर भी भटकने लगे हैं। अब ये मगरमच्छ गांवों के नजदीक आकर मानव बस्तियों तक पहुंच रहे हैंजो लोगों के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।

    इन मगरमच्छों ने पहले कुछ पालतू जानवरों पर हमले किए हैंजिनमें श्वान और मवेशी शामिल हैं। हालांकिअभी तक किसी मनुष्य पर हमला नहीं हुआ हैलेकिन स्थानीय लोग इस खतरे को लेकर बेहद चिंतित हैं। कई बार गांवों के सरपंचों ने वन विभाग से इस समस्या का समाधान निकालने के लिए अपील की हैलेकिन वन विभाग की टीम की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। वे केवल रेस्क्यू का आश्वासन देकर अपना काम निपटा लेते हैंजबकि समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।

    वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे जल्द ही इस स्थिति से निपटने के लिए कदम उठाएंगेलेकिन अब तक इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। इस खतरनाक स्थिति में वन विभाग की ढिलाई पर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते इस समस्या का हल नहीं निकाला गयातो यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।

    मगरमच्छों के बढ़ते खतरे को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानी दखल की वजह से इनका प्राकृतिक निवास क्षेत्र घटता जा रहा हैजिसके कारण वे रहवासी इलाकों में घुसने लगे हैं। इस समस्या का समाधान वन विभाग के समुचित और तत्काल प्रयासों में हैलेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वन विभाग जल्द इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाएगा

  • उज्जैन बनेगी देश की पहली सर्पमित्र नगरी सांपों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास जारी

    उज्जैन बनेगी देश की पहली सर्पमित्र नगरी सांपों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास जारी


    उज्जैन । मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले को अब देश की पहली सर्पमित्र नगरी के रूप में विकसित किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस पहल का ऐलान किया है जिसका मुख्य उद्देश्य सांपों के संरक्षण के साथ-साथ समाज में इनके प्रति जागरूकता बढ़ाना है। महाकाल की नगरी उज्जैन को सांपों का संरक्षण करने वाली पहली नगरी के रूप में स्थापित किया जा रहा है जहां सांपों के जीवन को बचाने और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करने के लिए व्यापक प्रयास किए जाएंगे ।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कहना है कि सांप भगवान शिव के गले का हार हैं और इन्हें सुरक्षित करना महाकाल की नगरी का कर्तव्य बनता है। उनका मानना है कि सांपों को लेकर समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना बेहद जरूरी है ताकि न तो सांप किसी इंसान को नुकसान पहुंचाएं और न ही इंसान सांपों को नुकसान पहुंचाए। उनके इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने कई कदम उठाने की योजना बनाई है।

    प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से जागरूकता फैलाना

    उज्जैन में इस पहल के तहत अब तक 100 से ज्यादा विद्यार्थियों को हायर सेकंडरी स्कूलों में सांपों से सुरक्षित और मित्रवत तरीके से व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षण दिया गया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों और युवाओं में सांपों के प्रति डर को कम करना और उनके संरक्षण के महत्व को समझाना है। आगामी चरणों में इस अभियान का विस्तार किया जाएगा जिसमें डॉक्टरों हेल्थ वर्कर्स किसानों और पंचायत सचिवों को भी सांपों के सुरक्षित संरक्षण के तरीके सिखाए जाएंगे।

    यह पहल उज्जैन में सांपों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ उनके संरक्षण के लिए जरूरी कदमों को लागू करेगी। सांपों के अलावा इस पहल में अन्य वन्य जीवों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाएगा। इसके परिणामस्वरूप न सिर्फ सांपों को बचाया जाएगा बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन भी बना रहेगा।

    सांपों के संरक्षण के लिए तैयार की गई योजनाएं

    उज्जैन को सर्प संरक्षण के लिए नोडल जिला बनाने का निर्णय लिया गया है जिसका मतलब है कि इस जिले में सांपों के संरक्षण के लिए अलग-अलग योजनाओं का निर्माण किया जाएगा। इन योजनाओं में सांपों के प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करना उनकी प्रजनन दर बढ़ाना और उन्हें उपयुक्त वातावरण प्रदान करना शामिल होगा। इसके अलावा किसानों को जागरूक किया जाएगा ताकि वे कृषि कार्यों के दौरान सांपों को नुकसान न पहुंचाएं और उनके प्राकृतिक आवासों में हस्तक्षेप न करें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सांपों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदम केवल उनके अस्तित्व को बचाने के लिए नहीं हैं बल्कि इस पहल से पर्यावरण संतुलन बनाए रखने और जैव विविधता को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। उनका मानना है कि सांपों और मनुष्यों के बीच मित्रवत संबंध स्थापित करके हम पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ कर सकते हैं जिससे समग्र पर्यावरण की रक्षा हो सकेगी।

    सांपों के संरक्षण से पर्यावरण संतुलन

    सांपों का पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। वे छोटे कीटों और अन्य जीवों का शिकार करते हैं जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बना रहता है। सांपों की उपस्थिति से कीटों की संख्या नियंत्रित रहती है जिससे कृषि क्षेत्र में कीटों के हमले की संभावना कम होती है और कृषि उत्पादकता भी बढ़ती है। यदि सांपों का संरक्षण सही तरीके से किया जाए तो यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए लाभकारी साबित होगा।

    इसके साथ ही सांपों के संरक्षण से स्थानीय समुदायों में पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ेगी। लोग अब सांपों को एक खतरनाक प्राणी के रूप में नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से के रूप में देखेंगे। इस तरह की जागरूकता से समाज में पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित होगा।

    सीएम डॉ. मोहन यादव की पहल का प्रभाव

    सीएम डॉ. मोहन यादव की यह पहल न केवल सांपों के संरक्षण के लिए है बल्कि यह पूरे राज्य और देश के पर्यावरण के लिए एक बड़ी क्रांतिकारी बदलाव का संकेत देती है। उनके इस कदम से उज्जैन की पहचान एक पर्यावरण मित्र नगरी के रूप में होगी जो सांपों और अन्य वन्य जीवों के संरक्षण में अपनी भूमिका निभाएगी। यह कदम उन लोगों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बनेगा जो पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में काम कर रहे हैं।

    यह पहल उज्जैन को एक मिसाल बना सकती है जहां समाज और वन्य जीवों के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित किया जा सकता है जिससे न केवल सांपों का संरक्षण होगा बल्कि पूरे पर्यावरण का संतुलन भी बनाए रखा जा सकेगा।