Tag: Women and Child Development

  • आंगनवाड़ी केंद्रों में लापरवाही पर गिरी गाज, पांच कर्मचारियों की सेवा समाप्त, औचक निरीक्षण में सामने आईं खामियां

    आंगनवाड़ी केंद्रों में लापरवाही पर गिरी गाज, पांच कर्मचारियों की सेवा समाप्त, औचक निरीक्षण में सामने आईं खामियां


    मऊगंज । मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में आंगनवाड़ी केंद्रों के संचालन में कथित अनियमितताओं को लेकर महिला एवं बाल विकास विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। नईगढ़ी परियोजना क्षेत्र में तीन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और दो सहायिकाओं सहित कुल पांच कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक इन कर्मचारियों के खिलाफ लंबे समय से अनधिकृत अनुपस्थिति और केंद्रों का नियमित संचालन नहीं करने जैसी शिकायतें मिल रही थीं। मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन ने औचक निरीक्षण कराया और संबंधित कर्मचारियों से स्पष्टीकरण भी मांगा। अधिकारियों का कहना है कि जवाब संतोषजनक नहीं मिलने और कार्यप्रणाली में अपेक्षित सुधार नहीं होने के बाद नियमानुसार सेवा समाप्ति की कार्रवाई की गई है।

    जानकारी के अनुसार आंगनवाड़ी केंद्रों में कर्मचारियों की अनुपस्थिति और निर्धारित समय पर केंद्र नहीं खुलने की शिकायतें सामने आ रही थीं। इसके अलावा कुछ कर्मचारियों के मुख्यालय पर निवास नहीं करने और अपने पद से जुड़े दायित्वों का ठीक से निर्वहन नहीं करने के आरोप भी थे। इन शिकायतों को लेकर जनहित में मुद्दा उठाए जाने के बाद प्रशासन ने निगरानी और निरीक्षण की प्रक्रिया तेज की। कलेक्टर के निर्देश और जिला कार्यक्रम अधिकारी के मार्गदर्शन में नईगढ़ी परियोजना के अधिकारियों ने मैदानी स्तर पर केंद्रों की स्थिति का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान कुछ केंद्रों के निर्धारित समय पर नहीं खुलने की बात सामने आई। इससे बच्चों और महिलाओं को मिलने वाली सेवाओं के प्रभावित होने की आशंका जताई गई।

    नईगढ़ी परियोजना अधिकारी रविशंकर पांडेय ने विभागीय कार्रवाई के तहत पांच कर्मचारियों की सेवा समाप्ति के आदेश जारी किए। इनमें जुड़मनिया रघुनाथ केंद्र की कार्यकर्ता भारती पटेल और सुअरहा केंद्र की कार्यकर्ता सुशीला उपाध्याय शामिल हैं। इसके अलावा मैर मुहल्ला भटिगवां केंद्र की कार्यकर्ता आरती कारपेंटर की सेवा समाप्त की गई है। छुहिया केंद्र की सहायिका आशा मिश्रा और पहरखा-2 केंद्र की सहायिका गीता मिश्रा शुक्ला पर भी कार्रवाई की गई है। विभाग की ओर से यह कदम संबंधित शिकायतों और कार्रवाई की प्रक्रिया के बाद उठाया गया है।

    महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी आशीष द्विवेदी ने बताया कि इन कर्मचारियों के विरुद्ध बिना विधिवत सूचना के अनुपस्थित रहने और आंगनवाड़ी केंद्रों का नियमित संचालन नहीं करने की शिकायतें लंबे समय से मिल रही थीं। उनके मुताबिक परियोजना कार्यालय की ओर से समय-समय पर मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे। पर्यवेक्षकों ने आकस्मिक निरीक्षण भी किए और नियमों के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर संबंधित कर्मचारियों से जवाब मांगा गया था। विभाग के अनुसार प्राप्त स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं पाए गए और कार्यप्रणाली में अपेक्षित सुधार भी नहीं हुआ। इसके बाद नियुक्ति आदेश की शर्तों और शासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार सेवा समाप्ति का निर्णय लिया गया।

    आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों को पूरक पोषण और प्रारंभिक शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ गर्भवती तथा धात्री महिलाओं तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में केंद्रों का समय पर खुलना और कर्मचारियों की नियमित उपस्थिति जरूरी है। कर्मचारियों की अनुपस्थिति या केंद्रों के बंद रहने से उन परिवारों को परेशानी हो सकती है जो इन सेवाओं पर निर्भर हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि निरीक्षण की कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी। वहीं स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों ने मऊगंज तथा हनुमना परियोजना क्षेत्रों में भी इसी तरह जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केंद्रों के संचालन और पोषण आहार वितरण से जुड़ी शिकायतों की भी नियमित जांच होनी चाहिए। विभाग की इस कार्रवाई के बाद अब अन्य केंद्रों की निगरानी और व्यवस्था में सुधार पर भी नजर रहेगी।


  • मध्य प्रदेश में बाल विवाह रोकने के लिए बड़ा कदम: गांव स्तर तक तैनात होंगे अधिकारी

    मध्य प्रदेश में बाल विवाह रोकने के लिए बड़ा कदम: गांव स्तर तक तैनात होंगे अधिकारी



    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश सरकार ने बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा को खत्म करने के लिए एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। अब राज्य में गांव स्तर तक बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी तैनात किए जाएंगे, जो मौके पर पहुंचकर तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे।

    क्या है नई व्यवस्था?
    महिला एवं बाल विकास विभाग ने नई व्यवस्था के तहत पूरे राज्य में निगरानी प्रणाली को मजबूत किया है। इसके अनुसार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग अधिकारी नियुक्त होंगे। बाल विवाह की सूचना मिलते ही अधिकारी मौके पर पहुंचेंगे। जरूरत पड़ने पर विवाह को तुरंत रोकने की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह व्यवस्था बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत लागू की जा रही है।

    कौन होंगे जिम्मेदार अधिकारी?
    नई व्यवस्था के तहत अलग-अलग स्तर पर अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है:

    ग्रामीण क्षेत्रों में 
    राजस्व निरीक्षक

    पटवारी

    महिला एवं बाल विकास पर्यवेक्षक

    शहरी क्षेत्रों में:
    नगर निगम के जोनल अधिकारी

    राजस्व और स्वास्थ्य अधिकारी

    नगरपालिका और नगर परिषद के अधिकारी

    इसके अलावा जिला कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार और परियोजना अधिकारी पहले से ही इस कानून के तहत कार्रवाई के लिए अधिकृत हैं।

    अधिकारियों की शक्तियाँ
    नए प्रावधानों के तहत अधिकारी:

    बाल विवाह रोकने के लिए तत्काल मौके पर पहुंच सकेंगे

    विवाह को अवैध घोषित करने के लिए निषेधाज्ञा (injunction) जारी कर सकेंगे

    शामिल लोगों पर कानूनी कार्रवाई कर सकेंगे

    पुलिस की सहायता से विवाह रुकवा सकेंगे

    क्यों लिया गया यह फैसला?
    सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में बाल विवाह के मामले लगातार सामने आ रहे हैं:

    2020 से 2025 के बीच कुल 2,916 मामले दर्ज हुए

    वर्ष 2025 में अकेले 538 मामले सामने आए

    पिछले कुछ वर्षों में मामलों में लगभग 47% वृद्धि दर्ज की गई

    इन आंकड़ों ने सरकार को गांव स्तर तक निगरानी बढ़ाने के लिए मजबूर किया।

    उद्देश्य क्या है?
    सरकार का मुख्य उद्देश्य है:

    बाल विवाह जैसी कुप्रथा को खत्म करना

    ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाना

    समय पर हस्तक्षेप करके बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना

    मध्य प्रदेश में बाल विवाह रोकने के लिए लिया गया यह कदम एक मजबूत प्रशासनिक पहल है। गांव स्तर तक अधिकारियों की तैनाती से उम्मीद है कि अब इस सामाजिक बुराई पर तेजी से रोक लगेगी। यह व्यवस्था न केवल कानून को मजबूत बनाएगी, बल्कि समाज में जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना भी बढ़ाएगी।

  • अक्षय तृतीया से पहले सख्ती: बाल विवाह रोकने सभी जिलों में कंट्रोल रूम और उड़न दस्ते तैनात

    अक्षय तृतीया से पहले सख्ती: बाल विवाह रोकने सभी जिलों में कंट्रोल रूम और उड़न दस्ते तैनात


    भोपाल । भोपाल में महिला एवं बाल विकास विभाग ने अक्षय तृतीया के अवसर पर होने वाले संभावित बाल विवाहों को रोकने के लिए व्यापक तैयारी शुरू कर दी है सचिव श्रीमती जी वी रश्मि ने सभी कलेक्टरों को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि प्रदेश के हर जिले में कंट्रोल रूम और उड़न दस्तों का गठन किया जाए ताकि किसी भी बाल विवाह की सूचना पर तुरंत कार्रवाई की जा सके

    राज्य में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के तहत लगातार प्रयास किए जा रहे हैं जिससे बाल विवाह की घटनाओं को पूरी तरह समाप्त किया जा सके राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में इस दिशा में सुधार हुआ है लेकिन कुछ जिलों में अभी भी यह समस्या बनी हुई है

    इस वर्ष अक्षय तृतीया 20 अप्रैल 2026 को है और इस दिन बड़ी संख्या में सामूहिक विवाह कार्यक्रम आयोजित होते हैं ऐसे आयोजनों में बाल विवाह होने की आशंका को देखते हुए प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं

    निर्देशों के अनुसार स्कूल और कॉलेजों में विद्यार्थियों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक किया जाएगा वहीं पंचायत और वार्ड स्तर पर जनप्रतिनिधियों द्वारा शपथ ली जाएगी कि उनके क्षेत्र में बाल विवाह नहीं होने दिया जाएगा

    गांवों में स्व सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा बैठकें आयोजित कर परिवारों को जागरूक किया जाएगा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आशा कार्यकर्ता और पंचायत सचिव मिलकर 18 वर्ष से कम उम्र की किशोरियों की सूची तैयार करेंगे और ऐसे परिवारों पर विशेष नजर रखी जाएगी जहां बाल विवाह की आशंका है

    बाल विवाह रोकने के लिए हेल्पलाइन नंबर 181, 1098 और 112 का व्यापक प्रचार किया जाएगा ताकि लोग किसी भी संदिग्ध विवाह की जानकारी तुरंत प्रशासन को दे सकें इसके अलावा बाल विवाह मुक्त भारत पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराने की सुविधा उपलब्ध रहेगी

    प्रत्येक गांव और वार्ड में सूचना दल बनाए जाएंगे जिनमें शिक्षक एएनएम आशा कार्यकर्ता आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और पंचायत प्रतिनिधि शामिल होंगे ये दल स्थानीय स्तर पर निगरानी रखेंगे और जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे

    सचिव ने मीडिया सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से भी जागरूकता फैलाने के निर्देश दिए हैं ताकि समाज में सही उम्र में विवाह के महत्व को समझाया जा सके और कम उम्र में विवाह के दुष्परिणामों के प्रति लोगों को सचेत किया जा सके

    यह अभियान न केवल कानून के पालन को सुनिश्चित करेगा बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा जिससे बालिकाओं के स्वास्थ्य शिक्षा और भविष्य को सुरक्षित किया जा सकेगा

  • दिव्यांग बच्चों के दत्तक ग्रहण को बढ़ावा देने पर जोर, भोपाल में हुई क्षेत्रीय बैठक में जागरूकता अभियान की जरूरत बताई गई

    दिव्यांग बच्चों के दत्तक ग्रहण को बढ़ावा देने पर जोर, भोपाल में हुई क्षेत्रीय बैठक में जागरूकता अभियान की जरूरत बताई गई


    भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के रवीन्द्र भवन में आयोजित क्षेत्रीय परामर्श बैठक में दिव्यांग बच्चों के दत्तक ग्रहण और पुनर्वास को लेकर गंभीर मंथन हुआ। महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने कहा कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को संस्थाओं से निकालकर परिवार का स्नेह दिलाने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाना बेहद जरूरी है।

    मंत्री भूरिया ने कहा कि समाज की सकारात्मक सोच और संवेदनशीलता से ही इन बच्चों को सुरक्षित और बेहतर भविष्य मिल सकता है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिव्यांग शब्द के उपयोग से समाज में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास किया गया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में गैर संस्थागत पुनर्वास को प्राथमिकता दी जा रही है। मुख्यमंत्री बाल आशीर्वाद योजना के माध्यम से स्पॉन्सरशिप और आफ्टर केयर जैसी सुविधाएं देकर बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।

    बैठक में महिला एवं बाल विकास विभाग की सचिव जी. वी. रश्मि ने कहा कि भारतीय समाज में संस्कारों का महत्व होने के बावजूद दिव्यांग बच्चों को गोद लेने में सामाजिक रूढ़ियां बाधा बनती हैं। उन्होंने जोर दिया कि समाज की संवेदनशीलता ही इन बच्चों का भविष्य बदल सकती है।

    वहीं केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण की उप निदेशक ऋचा ओझा ने बताया कि देशभर में ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से दत्तक ग्रहण को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में दत्तक ग्रहण का प्रतिशत अभी भी काफी कम है और इसे बढ़ाने के लिए नीति सुधार और जागरूकता जरूरी है।

    मंत्री भूरिया ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2024 25 में देश में 4 155 बच्चों को गोद लिया गया जिनमें केवल 7 प्रतिशत दिव्यांग बच्चे थे। इनमें से अधिकांश को विदेशी दंपत्तियों ने अपनाया जो देश में जागरूकता की कमी को दर्शाता है।

    उन्होंने सुझाव दिया कि सफल दिव्यांग व्यक्तियों को ब्रांड एम्बेसडर बनाकर समाज में सकारात्मक संदेश फैलाया जा सकता है। साथ ही ऐसे बच्चों को गोद लेने वाले परिवारों के लिए चिकित्सा फिजियोथेरेपी शिक्षा सहायता और बीमा जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    बैठक में उत्तर प्रदेश उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधियों सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल हुए। इस दौरान दत्तक ग्रहण की वर्तमान स्थिति कानूनी प्रक्रियाओं की चुनौतियों और बेहतर समन्वय के उपायों पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में बालिका गृह भोपाल और जवाहर बाल भवन के बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से दत्तक ग्रहण के महत्व का संदेश भी दिया।

  • वर्तमान हालात में वल्लभ भवन का झूलाघर: 45 लाख का प्रस्ताव अटकाबच्चों के खेलने की जगह भी नहीं

    वर्तमान हालात में वल्लभ भवन का झूलाघर: 45 लाख का प्रस्ताव अटकाबच्चों के खेलने की जगह भी नहीं


    भोपाल । भोपाल के प्रशासनिक केंद्र वल्लभ भवन में स्थित झूलाघरजो पहले मातृत्व की जिम्मेदारी निभाने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए एक सुरक्षित और खुशहाल स्थल हुआ करता थाअब अपनी बदहाली पर रो रहा है। पहले यह खुली जगह में संचालित होता थाजहां बच्चों के खेलने- कूदने और मानसिक- शारीरिक विकास के लिए पर्याप्त जगह थी। लेकिन अब यह झूलाघर एक छोटे सेबंद कमरे में सिमट कर रह गया हैजहां न बच्चों के खेलने की जगह है और न ही ताजगी देने वाली हवा का कोई इंतजाम।

    इस झूलाघर को एक नया रूप देने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग ने 45 लाख रुपये का बजट प्रस्तावित किया था। लेकिन यह प्रस्ताव मंत्रालय की फाइलों में दबा हुआ है और प्रशासनिक सुस्ती के कारण अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। इस मामले को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या बच्चों के सुरक्षा और विकास से जुड़ी इस गंभीर समस्या को नज़रअंदाज किया जा सकता है और वित्त विभाग की मंजूरी का इंतजार करना एक लंबा 6 साल क्यों होना चाहिए?

    बच्चों की सुरक्षा और विकास पर असर

    बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को लंबे समय तक बंद और सीमित वातावरण में रखना उनके मानसिक और शारीरिक विकास में रुकावट डाल सकता है। खुले वातावरण और खेलने की जगह बच्चों के विकास के लिए आवश्यक हैलेकिन वर्तमान स्थिति में झूलाघर अपनी प्राथमिकता खो चुका है।

    अधिकारी भी मौन
    इस मामले में जिला कार्यक्रम अधिकारी सुनील सोलंकी से संपर्क किया गयालेकिन उन्होंने बात करने से मना कर दिया। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि प्रस्ताव कई सालों से मंत्रालय की फाइलों में पड़ा हुआ हैलेकिन अब तक इस पर कोई निर्णायक कदम नहीं उठाए गए।

    संवेदनशील मुद्दे की उपेक्षा
    यह मामला सरकारी दफ्तरों में कामकाजी महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की उपेक्षा को दर्शाता है। बच्चों के लिए एक सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिएलेकिन वल्लभ भवन का झूलाघर अब अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहा है।