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  • मनिहारी दुकानें हटने से संकट में महिलाएं, कर्ज लेकर लाया दीपावली का सामान, अब बिक्री की चिंता

    मनिहारी दुकानें हटने से संकट में महिलाएं, कर्ज लेकर लाया दीपावली का सामान, अब बिक्री की चिंता


    शिवपुरी । शिवपुरी शहर में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद मनिहारी का सामान बेचकर परिवार चलाने वाली महिलाओं के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। गांधी चौक की सड़क पर लंबे समय से दुकानें लगाने वाली महिलाओं ने दुकान हटाए जाने के विरोध में बुधवार रात धरना शुरू कर दिया। महिलाओं का कहना है कि वे कई वर्षों से इसी जगह पर छोटी दुकानें लगाकर अपना और परिवार का खर्च चलाती आ रही हैं। त्योहार का सीजन शुरू होने से पहले अचानक दुकान हट जाने के कारण उनकी परेशानी और बढ़ गई है।

    बुधवार को नगरीय प्रशासन की टीम ने अस्पताल चौराहा से माधव चौक तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की। इसी अभियान के दौरान गांधी चौक पर सड़क किनारे लगने वाली मनिहारी की दुकानों को भी हटा दिया गया। कार्रवाई के बाद प्रभावित महिलाओं ने गांधी चौक पर ही बैठकर विरोध जताया। उनका कहना है कि प्रशासन को दुकान हटाने से पहले उन्हें पर्याप्त समय देना चाहिए था ताकि वे अपना सामान व्यवस्थित कर सकें और वैकल्पिक जगह पर कारोबार शुरू करने की तैयारी कर सकें।

    महिलाओं के मुताबिक दीपावली का त्योहार नजदीक है और इसी उम्मीद में उन्होंने बड़ी मात्रा में सामान खरीदकर रखा था। कई दुकानदारों ने इसके लिए उधार लिया है। अब दुकान नहीं लग पा रही है तो सामान बिक नहीं रहा है और कर्ज चुकाने की चिंता बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि त्योहार के दौरान मनिहारी के सामान की मांग बढ़ती है और इसी समय होने वाली बिक्री से उन्हें पूरे परिवार के खर्च में मदद मिलती है।

    धरने पर बैठी बसंती ने बताया कि वह वर्ष 1980 से गांधी चौक पर दुकान लगाती आ रही हैं। इतने लंबे समय से इसी छोटे कारोबार के जरिए उनका परिवार चलता रहा है। उनका कहना है कि अब उम्र अधिक हो चुकी है और उनके लिए दूसरा काम करना आसान नहीं है। दुकान हटने के बाद उनके सामने आय का कोई स्पष्ट साधन नहीं बचा है। इसलिए वह चाहती हैं कि प्रशासन उनकी स्थिति को देखते हुए दुकान लगाने के लिए कोई स्थायी और सुविधाजनक व्यवस्था करे।

    एक अन्य बुजुर्ग महिला मुन्नी ने बताया कि दीपावली के लिए उन्होंने कर्ज लेकर दुकान का सामान खरीदा है। इस कर्ज पर उन्हें ब्याज भी देना पड़ रहा है। पिछले कुछ दिनों से दुकान नहीं लगा पाने के कारण बिक्री पूरी तरह प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि यदि त्योहार तक उन्हें दुकान लगाने की अनुमति मिल जाए तो वे अपना खरीदा हुआ सामान बेचकर कर्ज चुका सकेंगी और परिवार का खर्च भी चला सकेंगी।

    वहीं प्रशासन का कहना है कि अतिक्रमण हटाने के साथ दुकानदारों के रोजगार को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक स्थान भी चिन्हित किए गए हैं। यातायात प्रभारी रणवीर सिंह यादव के मुताबिक हाथ ठेला संचालकों के लिए मंडी के पीछे ठंडी सड़क पर जगह तय की गई है। गांधी चौक की मनिहारी दुकानों के लिए मंडी के सामने टेकरी बाजार के मुख्य रास्ते पर स्थान चिन्हित किया गया है।

    प्रशासन का कहना है कि सड़क से अतिक्रमण हटाने का उद्देश्य यातायात व्यवस्था को बेहतर करना है और साथ ही दुकानदारों के रोजगार को पूरी तरह खत्म करना नहीं है। दूसरी ओर महिलाओं की मांग है कि वैकल्पिक जगह ऐसी हो जहां ग्राहकों की आवाजाही बनी रहे और उनका कारोबार प्रभावित न हो। फिलहाल गांधी चौक पर महिलाओं का विरोध दुकान हटाने की कार्रवाई के बाद प्रशासन और छोटे दुकानदारों के बीच खड़े हुए रोजगार से जुड़े सवाल को सामने ला रहा है।

  • भिंड के दबोह क्षेत्र में संगठित अवैध शराब नेटवर्क: ‘कंजर व्हिस्की’ 30 रुपए में, महिलाओं के भरोसे चलता कारोबार

    भिंड के दबोह क्षेत्र में संगठित अवैध शराब नेटवर्क: ‘कंजर व्हिस्की’ 30 रुपए में, महिलाओं के भरोसे चलता कारोबार


    भिंड । मध्य प्रदेश शहर से लगभग 85 किमी दूर दबोह क्षेत्र में स्थित कंजर डेरा आज एक संगठित और बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध शराब नेटवर्क के रूप में चर्चा में है, जहां कच्ची शराब खुलेआम बिना किसी रोक टोक के बिक रही है। स्थानीय लोगों और जांचकर्ताओं के अनुसार यहाँ का यह नेटवर्क इतना व्यवस्थित है कि खरीदारों को कहीं भटकना नहीं पड़ता, बल्कि एक तय शुदा प्रक्रिया के मुताबिक शराब आसानी से उपलब्ध कराई जाती है।

    कंजर डेरे में शराब को स्थानीय लोग कंजर व्हिस्की के नाम से जानते हैं, जिसका एक एक पॉलिथीन पाउच महज 30 रुपए में बिकता है। इस कच्ची शराब की बिक्री एक अनूठे तरीके से होती है प्रत्येक घर के बाहर एक चारपाई रखी होती है जिस पर एक थैला होता है जिसमें आठ से दस पाउच शराब रखे रहते हैं। ग्राहक उस थैले को पहचानकर थैलों में से पाउच लेते हैं और पैसे वहीं रख देते हैं। इस तरीके से शराब विक्रेताओं और ग्राहकों के बीच न्यूनतम संपर्क होता है और बिक्री आसान एवं तेजी से होती है।

    डेरे के गिरोह में शामिल महिलाओं की भूमिका प्रमुख रूप से सामने आती है। कई महिलाओं ने रिपोर्टरों से बातचीत में स्वीकार किया कि यही उनकी आमदनी का साधन है और इसी से परिवार का भरण पोषण होता है। पुरुष इस दौरान डेरे से बाहर रहते हैं और शराब के निर्माण तथा आपूर्ति से जुड़े कामों में लगे रहते हैं। गलियों के बीच सात पक्के मकानों के नेटवर्क में सप्ताह के हर दिन के लिए अलग अलग घर शराब की बिक्री का काम संभालता है, जिससे किसी प्रकार की आपसी प्रतिस्पर्धा और टकराव नहीं होता।

    स्थानीय ग्राहकों के अलावा, यह अवैध शराब नेटवर्क कुछ शराब ठेकेदारों तक भी कच्ची शराब की आपूर्ति करता है, जो इसे पाउचों और बोतलों में पैक कर आसपास के गांवों और इलाकों में बेचते हैं। इससे व्यापारियों को दो से चार गुना तक मुनाफा होता है, और यह नेटवर्क और भी अधिक फैलता जा रहा है।

    रेहकोला माता मंदिर के निकट स्थित इस डेरे में रहने वाले कुछ परिवारों का कहना है कि वे शराब को या तो स्वयं बनाते हैं या बाहर से लाते हैं, हालांकि उसके स्रोत स्पष्ट रूप से बताने से इनकार कर देते हैं। पुरुष शराब बनाने के लिए आसपास के बीहड़ों में जाते हैं, जहाँ गड्ढों में स्टॉक छिपाया जाता है और ज़रूरत के समय उसे लाकर बेचा जाता है।

    यह अवैध शराब कारोबार स्थानीय आबकारी कानूनों और प्रतिबंधों के खिलाफ चल रहा है, जिससे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि कई लोग इस कच्ची शराब को सरकारी या कानूनी समझकर भी पी लेते हैं, जबकि गांवों के कुछ लोगों को डर होता है कि यदि वे प्रशासन को सूचना देंगे तो उन्हें प्रतिकूल परिणामों का सामना करना पड़ेगा।

    विशेष रूप से यह नेटवर्क स्थानीय आबकारी अधिकारियों या पुलिस की निगरानी को चुनौती देता प्रतीत होता है, क्योंकि यह व्यापार बिना किसी तत्काल कार्रवाई के चलता दिखाई दे रहा है। वहीं, आबकारी विभाग और पुलिस को ऐसी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है ताकि अवैध शराब के कारण होने वाले स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभावों से लोगों को बचाया जा सके।