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  • चीन के डॉक्टरों ने पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट किए सुअर के लिवर और दोनों किडनी

    चीन के डॉक्टरों ने पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट किए सुअर के लिवर और दोनों किडनी

    नई दिल्ली। दुनिया भर में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही मानव अंगों की भारी कमी को दूर करने की दिशा में वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में पहली बार शोधकर्ताओं की एक विशेष टीम ने एक इंसान के शरीर में जेनेटिक रूप से संशोधित यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर का पूरा लिवर और उसकी दोनों किडनियां एक साथ सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित करने का कारनामा कर दिखाया है।
    इस बेहद जटिल और अत्याधुनिक सर्जरी को अंग प्रत्यारोपण की दुनिया में एक बड़ी संभावित क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। अब तक सुअर के अंगों को इंसानों में लगाने के जितने भी प्रयास किए गए थे, वे केवल किसी एक अंग तक ही सीमित थे। यह पहला मौका है जब डॉक्टरों ने तकनीकी बाधाओं को पार करते हुए एक साथ कई अंगों का बहु-अंग प्रत्यारोपण करने में सफलता पाई है।

    इस अभूतपूर्व चिकित्सा परीक्षण को अंजाम देने के लिए डॉक्टरों ने एक ऐसे ५३ वर्षीय व्यक्ति को चुना जो पहले से ही पूरी तरह ब्रेन-डेड घोषित हो चुका था। मरीज के परिजनों ने चिकित्सा अनुसंधान के महत्व को समझते हुए इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए अपनी स्वैच्छिक सहमति प्रदान की थी। जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से विशेष रूप से तैयार किए गए सुअर के इन अंगों को जब मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया, तो उन्होंने लगभग पांच दिनों तक बिना किसी बड़ी रुकावट के बेहद प्रभावी तरीके से काम किया।

    इस पूरी प्रक्रिया के दौरान डॉक्टरों को रियल टाइम में यह देखने और समझने का दुर्लभ अवसर मिला कि जानवरों के अंग किसी मानव शरीर के भीतर किस तरह की जैविक प्रतिक्रियाएं देते हैं। विज्ञान की भाषा में इस तरह के प्रत्यारोपण को जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में पूरे अंग, कोशिकाएं या टिशू ट्रांसप्लांट करना होता है।

    इस बेहद जटिल सर्जरी के बाद जो परिणाम सामने आए, उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। वर्षों से वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे थे कि क्या सुअर के अंग इंसानों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं, और अब सुअर के डीएनए को एडिट करने की तकनीक ने इसे एक ठोस हकीकत में बदल दिया है।

    ट्रांसप्लांटेशन के शुरुआती चौबीस घंटों के भीतर मरीज के शरीर में इन बाहरी अंगों को अस्वीकार करने या रिजेक्ट करने के कोई भी लक्षण या संकेत नहीं देखे गए। विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही समय में कई अंगों का प्रत्यारोपण करना तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है और इसमें मरीज की जान जाने का जोखिम भी कई गुना बढ़ जाता है, लेकिन इसके बावजूद अंगों का सुचारू रूप से काम करना बहु-अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी कामयाबी है।

    डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रत्यारोपण संपन्न होने के महज उन्नीस घंटों के भीतर ही सुअर के लिवर ने मानव शरीर के अनुकूल काम करते हुए पित्त का निर्माण और रिसाव शुरू कर दिया था, जो इसके सामान्य रूप से सक्रिय होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसके अलावा, गंभीर बीमारी के कारण मरीज के शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया का जो स्तर खतरनाक रूप से बढ़ा हुआ था, वह सुअर की दोनों किडनियां लगते ही तेजी से गिरकर बिल्कुल सामान्य स्तर पर लौट आया। इस सकारात्मक बदलाव ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रत्यारोपित की गई दोनों किडनियां मानव शरीर के भीतर अपने महत्वपूर्ण जैविक कार्यों को पूरी तरह से निभाने में सक्षम थीं।

    इस चमत्कारिक सफलता के बाद भी वैज्ञानिक अभी पूरी तरह से सतर्क हैं और उनका कहना है कि इस तकनीक को जीवित मरीजों पर आजमाने से पहले अभी कई और कड़े परीक्षणों की आवश्यकता होगी। भविष्य में इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अभी ब्रेन-डेड व्यक्तियों और जीवित बंदरों पर और अधिक गहन अध्ययन किए जाएंगे। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सुअर के अंगों के माध्यम से किसी भी प्रकार के अज्ञात या खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया इंसानों के भीतर प्रवेश न कर पाएं। बहरहाल, दुनिया भर में लाखों लोग हर साल किडनी, लिवर और हार्ट जैसे अंगों की प्रतीक्षा में दम तोड़ देते हैं, ऐसे में इस नई तकनीक ने चिकित्सा जगत में चिकित्सा अनुसंधान के एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत कर दी है।