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  • ‘फ्री में सभ्यता का क्रैश कोर्स मिलेगा’ -भारत यात्रा पर ईरान ने साधा अमेरिका पर निशाना

    ‘फ्री में सभ्यता का क्रैश कोर्स मिलेगा’ -भारत यात्रा पर ईरान ने साधा अमेरिका पर निशाना

    नई दिल्ली ।  अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो शनिवार को चार दिवसीय भारत दौरे पर कोलकाता पहुंचे। यह दौरा वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इस समय मध्य पूर्व में तनाव और बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच कई बड़े मुद्दों पर चर्चा होनी है।

    रूबियो ने भारत पहुंचने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने लिखा कि वह भारत में एक “शानदार दौरे” की उम्मीद कर रहे हैं। इस पोस्ट के साथ उन्होंने अपनी एक तस्वीर भी साझा की, जिसमें वे विमान से उतरते नजर आए।

    इसी पोस्ट को लेकर ईरान के मुंबई स्थित दूतावास कार्यालय ने सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित टिप्पणी कर दी, जिसने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी। ईरान की तरफ से पोस्ट पर तंज कसते हुए लिखा गया कि “थोड़ा सीख लो यार, सभ्यता का क्रैश कोर्स फ्री में मिल जाएगा।”

    इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई और इसे भारत-अमेरिका कूटनीतिक संबंधों के बीच एक असामान्य डिजिटल टकराव के रूप में देखा जा रहा है।

    इधर, अमेरिकी विदेश मंत्री की यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्वाड देशों की बैठक से भी जुड़ी है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं।

    इस दौरे में ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, व्यापार और तकनीकी साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत होने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूबियो की यह यात्रा भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा दे सकती है, जबकि ईरान की टिप्पणी ने इस पूरे घटनाक्रम को सोशल मीडिया और कूटनीतिक दोनों स्तर पर और दिलचस्प बना दिया है।

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    Marco Rubio India, Iran Embassy, India US relations, Quad meeting, international news, diplomatic tension, world news

  • पाकिस्तान में खूनी आतंकी हमला: बन्नू पुलिस चौकी पर आत्मघाती विस्फोट, 15 सुरक्षाकर्मियों की मौत

    पाकिस्तान में खूनी आतंकी हमला: बन्नू पुलिस चौकी पर आत्मघाती विस्फोट, 15 सुरक्षाकर्मियों की मौत



    नई दिल्ली। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बन्नू जिले में आतंकियों ने पुलिस चौकी पर बड़ा आत्मघाती हमला कर दिया। विस्फोटकों से भरी गाड़ी से किए गए धमाके और उसके बाद हुई भारी फायरिंग में कम से कम 15 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल बताए जा रहे हैं।

    पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, आतंकियों ने पहले विस्फोटकों से लदी गाड़ी को पुलिस पोस्ट की ओर बढ़ाया। सुरक्षा बलों ने जब वाहन को रोकने की कोशिश करते हुए फायरिंग की, तभी जोरदार धमाका हो गया। धमाका इतना भीषण था कि पुलिस चौकी की इमारत पूरी तरह तबाह हो गई और आसपास के कई घरों की छतें भी गिर गईं। कई सुरक्षाकर्मी मलबे में दब गए, जिन्हें बाद में रेस्क्यू टीमों ने बाहर निकाला।

    हमले के तुरंत बाद बड़ी संख्या में आतंकियों ने पुलिस पोस्ट पर धावा बोल दिया, जिसके बाद दोनों ओर से लंबे समय तक गोलीबारी चलती रही। इलाके को घेरकर सुरक्षा बलों ने सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि कितने आतंकी मारे गए या गिरफ्तार किए गए हैं।

    खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री मोहम्मद सोहेल अफरीदी ने हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे कायराना हरकत बताया है। उन्होंने घायलों के बेहतर इलाज और पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं।

    गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में आतंकी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। हाल ही में दक्षिण वजीरिस्तान में भी सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों से भरी गाड़ी लेकर चेकपोस्ट की तरफ बढ़ रहे एक संदिग्ध आतंकी को मार गिराया था।

    हालिया हमले की जिम्मेदारी अभी किसी संगठन ने नहीं ली है, लेकिन पाकिस्तान सरकार पहले भी प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पर ऐसे हमलों के आरोप लगाती रही है। लगातार बढ़ते आतंकी हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था और सरकार की आतंकवाद विरोधी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • उत्तर कोरिया का बड़ा दावा: किम जोंग उन पर हमला हुआ तो स्वतः परमाणु हमला, संविधान में जोड़ा गया नया प्रावधान

    उत्तर कोरिया का बड़ा दावा: किम जोंग उन पर हमला हुआ तो स्वतः परमाणु हमला, संविधान में जोड़ा गया नया प्रावधान


    नई दिल्ली। उत्तर कोरिया ने अपने संविधान में एक बड़ा और विवादास्पद बदलाव करते हुए परमाणु नीति को और सख्त कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक नए प्रावधान में कहा गया है कि अगर देश के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन या परमाणु कमांड सिस्टम पर हमला होता है, तो उत्तर कोरिया तुरंत और स्वचालित रूप से परमाणु हमला करेगा। इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ा दी है।

    सरकारी मीडिया के हवाले से सामने आई जानकारी में बताया गया है कि यह संशोधन 22 मार्च को किया गया था, लेकिन इसे हाल ही में सार्वजनिक किया गया है। संविधान के परमाणु नीति वाले आर्टिकल में स्पष्ट किया गया है कि अगर देश की परमाणु कमांड और नियंत्रण व्यवस्था को खतरा पहुंचता है, तो जवाबी कार्रवाई बिना किसी देरी के की जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम उत्तर कोरिया की “डिटरेंस स्ट्रैटेजी” का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य संभावित हमलों को रोकना है। हालांकि, इस बयान ने वैश्विक स्तर पर तनाव को और बढ़ा दिया है, क्योंकि यह परमाणु हमले की स्वचालित प्रतिक्रिया की बात करता है।

    रिपोर्टों में यह भी दावा किया जा रहा है कि हाल ही में ईरान पर हुए हमलों और वैश्विक घटनाओं को देखते हुए उत्तर कोरिया ने अपनी सुरक्षा नीति को और कठोर बनाया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    इसी बीच उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया सीमा के पास नई 155 मिमी स्वचालित तोपों की तैनाती की है। बताया जा रहा है कि इन हथियारों की रेंज लगभग 60 किलोमीटर तक है, जिससे दक्षिण कोरिया की राजधानी के आसपास का क्षेत्र भी खतरे की जद में आ सकता है। किम जोंग उन ने खुद इन हथियारों के परीक्षण का निरीक्षण किया और इसे सेना की क्षमता में बड़ा बदलाव बताया।

    उत्तर कोरिया लंबे समय से दक्षिण कोरिया और अमेरिका को अपना मुख्य सुरक्षा खतरा मानता रहा है। इसी वजह से वह लगातार अपनी मिसाइल और परमाणु क्षमताओं को मजबूत करने में जुटा है।

    आंकड़ों के अनुसार, उत्तर कोरिया के पास वर्तमान में दर्जनों परमाणु हथियार मौजूद हैं, जबकि उसके पास इतना रेडियोधर्मी पदार्थ है जिससे वह भविष्य में और भी हथियार बना सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि कुछ हथियार पहले से तैनात स्थिति में हैं।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय बार-बार उत्तर कोरिया से तनाव कम करने और बातचीत के रास्ते अपनाने की अपील करता रहा है, लेकिन किम जोंग उन की नीतियां लगातार सैन्य ताकत बढ़ाने पर केंद्रित रही हैं।

  • बंगाल चुनाव में BJP की जीत पर नॉर्वे के पूर्व मंत्री का बड़ा बयान बोले- क्या शानदार बदला लिया है, मोदी की जमकर तारीफ

    बंगाल चुनाव में BJP की जीत पर नॉर्वे के पूर्व मंत्री का बड़ा बयान बोले- क्या शानदार बदला लिया है, मोदी की जमकर तारीफ



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत पर नॉर्वे के पूर्व मंत्री और राजनयिक एरिक सोल्हेम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि बीजेपी की यह जीत “शानदार बदला” है।

    2024 लोकसभा चुनाव से की तुलना
    सोल्हेम ने अपने बयान में कहा कि 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिमी मीडिया ने बीजेपी के बहुमत से नीचे रहने को “मोदी युग के अंत की शुरुआत” बताया था। लेकिन इसके बाद पार्टी ने कई राज्यों ओडिशा, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, असम और अब पश्चिम बंगाल में मजबूत वापसी की है।

    बंगाल की जीत को बताया लोकतंत्र की ताकत
    उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में 90% से ज्यादा मतदान होना भारत के लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाता है। सोल्हेम के अनुसार, भारत में चुनावी भागीदारी यूरोप और अमेरिका के कई देशों से कहीं अधिक है, जो इसे एक मजबूत लोकतांत्रिक उदाहरण बनाता है।

    भारत के लोकतंत्र की अंतरराष्ट्रीय सराहना
    एरिक सोल्हेम ने कहा कि भारत का लोकतंत्र दुनिया के लिए एक मिसाल है और पश्चिमी देशों को इसे और बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है।

    तमिलनाडु राजनीति पर भी टिप्पणी
    उन्होंने तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी TVK के प्रदर्शन को भी राज्य की राजनीति में संभावित बड़ा बदलाव बताया।

  • सीजफायर के बाद कूटनीति तेज, ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव पर अमेरिका से होगी अहम वार्ता

    सीजफायर के बाद कूटनीति तेज, ईरान के 10 सूत्रीय प्रस्ताव पर अमेरिका से होगी अहम वार्ता


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के सीज़फायर के बाद अब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने पुष्टि की है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुक्रवार, 10 अप्रैल से इस्लामाबाद में शुरू होगी। ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को एक विस्तृत 10 बिंदुओं वाला प्रस्ताव भेजा है, जिस पर अब बातचीत की जाएगी। ईरानी मीडिया के अनुसार, इस प्रस्ताव में कई अहम शर्तें शामिल हैं।

    ईरान के 10 प्रमुख प्रस्ताव इस प्रकार हैं:

    1. अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता
    2. होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण बरकरार रखना
    3. यूरेनियम संवर्धन की अनुमति
    4. सभी प्राथमिक प्रतिबंधों को समाप्त करना
    5. द्वितीयक प्रतिबंधों को भी हटाना
    6. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रस्तावों को खत्म करना
    7. बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के प्रस्तावों को समाप्त करना
    8. ईरान को मुआवजा देना
    9. क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी
    10. लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई सहित सभी मोर्चों पर युद्धविराम

    ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, प्रस्ताव में विशेष रूप से होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण, प्रतिबंधों में ढील और क्षेत्र से अमेरिकी सेनाओं की वापसी जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया है। हालांकि, ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने साफ किया है कि इस पहल का मतलब जमीनी स्तर पर तनाव पूरी तरह खत्म होना नहीं है। उनका कहना है कि यह युद्ध का अंत नहीं है और किसी भी गलती का कड़ा जवाब दिया जाएगा।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब ईरान ने दो हफ्ते के सीज़फायर को स्वीकार किया है, जिसे उसने अपनी “जीत” बताया है। यह सीज़फायर पाकिस्तान की मध्यस्थता से संभव हुआ है। इस्लामाबाद में होने वाली यह वार्ता करीब 15 दिनों तक चल सकती है और जरूरत पड़ने पर इसे आगे बढ़ाया भी जा सकता है। इसका उद्देश्य एक व्यापक समझौते की दिशा में रूपरेखा तैयार करना है।

    ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इस दौरान समुद्री मार्गों पर सीमित सहयोग किया जाएगा और होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही ईरानी सशस्त्र बलों के समन्वय से सुनिश्चित की जा सकती है।वहीं, व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा है कि सीज़फायर औपचारिक रूप से तभी लागू माना जाएगा, जब ईरान वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोल देगा।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि तेहरान ने अमेरिका-इजराइल तनाव के बीच पाकिस्तान के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने भी अंतिम समय में हस्तक्षेप कर तनाव कम करने की अपील की थी।

    इसी बीच, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने सीज़फायर को मंजूरी दे दी है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कहा कि यदि ईरान पर हमले रुकते हैं तो वे भी जवाबी कार्रवाई रोक देंगे और दो हफ्तों तक होर्मुज स्ट्रेट में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने सीज़फायर को लागू कराने में भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के प्रति आभार भी जताया।

  • महाजंग के अंत की उम्मीद: 100% तैयार हुआ अमेरिकी सुरक्षा गारंटी दस्तावेज, जेलेंस्की बोले- अब बस हस्ताक्षर का इंतजार

    महाजंग के अंत की उम्मीद: 100% तैयार हुआ अमेरिकी सुरक्षा गारंटी दस्तावेज, जेलेंस्की बोले- अब बस हस्ताक्षर का इंतजार


    नई दिल्ली । चार साल से जारी भीषण रक्तपात के बीच रूस और यूक्रेन के बीच समझौते की सुगबुगाहट तेज हो गई है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रविवार को लिथुआनिया की राजधानी विलनियस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में दो दिनों तक चली सघन त्रिपक्षीय वार्ता के बाद अमेरिकी सुरक्षा गारंटी से जुड़ा ऐतिहासिक दस्तावेज अब 100 प्रतिशत तैयार’ है।

    जेलेंस्की ने इस वार्ता को ऐतिहासिक बताया क्योंकि इसमें पहली बार यूक्रेन, रूस और अमेरिका के न केवल राजनयिक, बल्कि सैन्य अधिकारी भी आमने-सामने बैठे थे। उन्होंने कहा यह दस्तावेज हमारे देश के सुरक्षित भविष्य की नींव है। अब हमें बस अपने साझेदारों अमेरिका द्वारा हस्ताक्षर की तारीख और स्थान तय किए जाने का इंतजार है। हस्ताक्षर के बाद इस प्रस्ताव को कानूनी अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस और यूक्रेनी संसद वेरखोव्ना राडा की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

    20-सूत्रीय शांति योजना और चुनौतियां रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने इस शांति प्रक्रिया के लिए 20-सूत्रीय एक विस्तृत योजना पेश की है। जेलेंस्की ने माना कि पहले कई विवादित मुद्दे थे, लेकिन हालिया बातचीत के बाद उनकी संख्या कम हुई है। हालांकि, सबसे बड़ा पेंच अब भी क्षेत्रीय अखंडता को लेकर फंसा हुआ है। जहाँ रूस पूर्वी डोनबास क्षेत्र से यूक्रेनी सेना की पूरी वापसी की मांग कर रहा है, वहीं जेलेंस्की ने स्पष्ट किया कि यूक्रेन अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं करेगा।

    आर्थिक सुरक्षा और भविष्य का विजन सुरक्षा गारंटी के साथ-साथ जेलेंस्की ने यूक्रेन की आर्थिक स्थिरता पर भी जोर दिया। उन्होंने दोहराया कि उनका लक्ष्य 2027 तक यूरोपीय संघ की पूर्ण सदस्यता हासिल करना है। उन्होंने इसे ‘आर्थिक सुरक्षा की गारंटी’ करार दिया। अबू धाबी में अगली दौर की बातचीत आगामी रविवार 1 फरवरी को होने की संभावना है, जिसमें अमेरिकी मध्यस्थ और दोनों देशों के सैन्य प्रतिनिधि शेष तकनीकी और राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करेंगे।
  • ताइवान ने दिया जवाब, काउंटर कॉम्बैट एक्सरसाइज लॉन्च; थल, जल और वायुसेना हाई अलर्ट पर

    ताइवान ने दिया जवाब, काउंटर कॉम्बैट एक्सरसाइज लॉन्च; थल, जल और वायुसेना हाई अलर्ट पर


    नई दिल्ली।/बीजिंग।ताइवान जलडमरूमध्य में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंच गया है। चीन ने ताइवान को पांच दिशाओं से घेरते हुए बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी PLA ने ताइवान के उत्तर, उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और पूर्वी तट के आसपास अलग-अलग सैन्य जोन बनाकर लाइव-फायर ड्रिल शुरू की है। इस कदम को हाल के वर्षों का सबसे आक्रामक सैन्य अभ्यास माना जा रहा है।चीन की इस कार्रवाई के जवाब में ताइवान ने भी तत्काल काउंटर कॉम्बैट एक्सरसाइज शुरू कर दी है। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उसकी थलसेना, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह अलर्ट पर रखा गया है और चीनी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    पांच दिशाओं से सैन्य घेराबंदी

    चीनी सेना ने इस सैन्य अभियान को ‘जस्टिस मिशन 2025’ नाम दिया है। PLA के मुताबिक, इस अभ्यास में नौसेना, वायुसेना और रॉकेट फोर्स को एक साथ तैनात किया गया है। युद्धाभ्यास में अत्याधुनिक युद्धपोत, फाइटर जेट, बॉम्बर विमान, ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस ड्रिल का उद्देश्य समुद्री और हवाई लक्ष्यों पर हमला करने, बंदरगाहों की नाकाबंदी, रणनीतिक ठिकानों को निष्क्रिय करने और बाहरी हस्तक्षेप को रोकने की तैयारी बताया जा रहा है। इसके साथ ही चीनी कोस्ट गार्ड को भी ताइवान के आसपास के समुद्री क्षेत्र में सक्रिय कर दिया गया है।

    ताइवान की जवाबी तैयारी

    ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि वह किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। ताइवान की सेना ने कॉम्बैट-रेडीनेस ड्रिल शुरू की है, जिसमें वायु रक्षा प्रणाली, नौसैनिक गश्त और थलसेना की त्वरित तैनाती शामिल है।ताइवान कोस्ट गार्ड ने चीन पर आरोप लगाया है कि इस सैन्य अभ्यास से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को खतरा पैदा हो गया है। कोस्ट गार्ड के अनुसार, चीनी गतिविधियों के कारण समुद्री जहाजों की आवाजाही और मछुआरों की सुरक्षा पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।

    पूर्वी तट बना सबसे अहम मोर्चा

    अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार चीन का सैन्य अभ्यास पहले की तुलना में अधिक व्यापक और ताइवान के बेहद करीब किया जा रहा है। खास तौर पर ताइवान के पूर्वी तट के पास बनाए गए सैन्य जोन को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि संकट की स्थिति में इसी दिशा से ताइवान को अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से सैन्य या मानवीय मदद मिल सकती है। ऐसे में पूर्वी तट पर दबाव बनाना चीन की रणनीतिक प्राथमिकता माना जा रहा है।

    अमेरिका-ताइवान हथियार सौदे से बढ़ा तनाव

    चीन के इस सैन्य अभ्यास के पीछे अमेरिका और ताइवान के बीच हाल ही में हुई बड़ी हथियार डील को अहम कारण माना जा रहा है। अमेरिका ने ताइवान को करीब 11.1 अरब डॉलर के रक्षा उपकरण बेचने की घोषणा की है, जो अब तक का सबसे बड़ा रक्षा पैकेज बताया जा रहा है।इस पैकेज में उन्नत मिसाइल सिस्टम, रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सैन्य तकनीक शामिल है। चीन इसे अपनी संप्रभुता में सीधा हस्तक्षेप मानता है। इसी नाराजगी के चलते चीन ने 26 दिसंबर को अमेरिका की 20 डिफेंस कंपनियों और 10 वरिष्ठ अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था।

    ताइवान को लेकर चीन का रुख

    चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और किसी भी तरह के अलगाव या विदेशी समर्थन का कड़ा विरोध करता है। वहीं, ताइवान खुद को एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक इकाई मानता है।भौगोलिक रूप से ताइवान जापान से सिर्फ 110 किलोमीटर दूर है। यह क्षेत्र जापान के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से होकर उसका बड़ा समुद्री व्यापार मार्ग गुजरता है और जापान में अमेरिका का सबसे बड़ा विदेशी सैन्य अड्डा भी मौजूद है।मौजूदा हालात ने पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।

  • ईरान ने अमेरिका, इजराइल और यूरोप को बताया युद्धरत पक्ष, राष्ट्रपति बोले-हम पर दबाव बढ़ा लेकिन ताकत भी बढ़ी

    ईरान ने अमेरिका, इजराइल और यूरोप को बताया युद्धरत पक्ष, राष्ट्रपति बोले-हम पर दबाव बढ़ा लेकिन ताकत भी बढ़ी


    नई दिल्ली।/तेहरान।मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने बड़ा और सख्त बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि ईरान इस समय अमेरिका, इजराइल और यूरोपीय देशों के साथ पूर्ण स्तर के टकराव की स्थिति में है। यह बयान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया है, जिससे इसकी राजनीतिक और रणनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है। राष्ट्रपति पेजेशकियन ने कहा कि मौजूदा हालात 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध से भी अधिक जटिल और खतरनाक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि आर्थिक राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चों पर भी ईरान को अभूतपूर्व दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

    यह पारंपरिक युद्ध से अलग है

    अपने बयान में राष्ट्रपति ने कहा कि आज का संघर्ष केवल हथियारों तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, हम पर प्रतिबंध, राजनीतिक अलगाव, साइबर हमले और सैन्य धमकियां-सब एक साथ हैं। यह पारंपरिक युद्ध से कहीं अधिक कठिन स्थिति है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को घुटनों पर लाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन देश पहले से ज्यादा संगठित और मजबूत हुआ है।

    राष्ट्रीय एकता की अपील

    पेजेशकियन ने ईरानी जनता से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि दुश्मन देश के भीतर विभाजन पैदा करना चाहते हैं ताकि आंतरिक अस्थिरता के जरिए ईरान को कमजोर किया जा सके। राष्ट्रपति के अनुसार, राष्ट्रीय एकता ही इस चुनौतीपूर्ण दौर में सबसे बड़ा हथियार है।

    परमाणु कार्यक्रम पर विवाद

    अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, ईरान लगातार इस आरोप को खारिज करता आया है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और ऊर्जा व शोध के उद्देश्य से संचालित किया जा रहा है।जनवरी 2025 में अमेरिका में सत्ता में लौटने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति को फिर से लागू किया। इसके तहत ईरान के तेल निर्यात को शून्य करने और नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने के कदम उठाए गए। वहीं, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने भी संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रतिबंधों को दोबारा लागू किया है, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

    जून 2025 का ईरान-इजराइल युद्ध
    जून 2025 में ईरान और इजराइल के बीच 12 दिनों तक सीधा सैन्य संघर्ष हुआ था। इस दौरान इजराइल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। ईरान में इस युद्ध में 1,000 से अधिक लोगों की मौत हुई, जबकि ईरानी मिसाइल हमलों में इजराइल में 28 लोग मारे गए।बाद में अमेरिका भी इस संघर्ष में शामिल हो गया और उसने नतांज, फोर्डो और इस्फहान स्थित ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके बाद अमेरिकी मध्यस्थता से संघर्षविराम लागू हुआ और अप्रैल से चल रही परमाणु वार्ता ठप हो गई।

    सेना को लेकर राष्ट्रपति का दावा

    राष्ट्रपति पेजेशकियन ने कहा कि हालिया हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य क्षमता कमजोर नहीं हुई है। उन्होंने दावा किया कि ईरानी सेना हथियारों और मानव संसाधनों—दोनों मामलों में पहले से अधिक मजबूत है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर फिर से हमला हुआ, तो ईरान कड़ा और निर्णायक जवाब देगा।

    संभावित युद्ध के असर

    विश्लेषकों के मुताबिक, यदि मौजूदा तनाव पूर्ण युद्ध में बदलता है तो इसका असर ईरान की अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और सामाजिक स्थिरता पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। हालांकि ईरान का नेतृत्व लगातार यह संदेश दे रहा है कि देश किसी भी हालात का सामना करने के लिए तैयार है।

  • यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    यूक्रेन युद्ध रूस पर डाल रहा भारी आर्थिक बोझ, विशेषज्ञों की चेतावनी-आने वाले साल और कठिन

    Russia Ukraine War
    नई दिल्ली/रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध अब अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करने वाला है। बीते लगभग चार वर्षों में इस संघर्ष ने न केवल हजारों सैनिकों और आम नागरिकों की जान ली हैबल्कि अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचे को भी तबाह कर दिया है। अब अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक रूस को आगाह कर रहे हैं कि इस युद्ध की कीमत उसे लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही युद्ध आज समाप्त हो जाएरूस को आर्थिक रूप से इससे उबरने में कई साल लग सकते हैं। विश्लेषकों के अनुसारयूक्रेन युद्ध के चलते रूस के सैन्य खर्च में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। रक्षा बजट में 30 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि ने सरकारी वित्त पर जबरदस्त दबाव डाला है। इसके साथ ही पश्चिमी देशोंखासकर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस की आमदनी के प्रमुख स्रोतों-तेल और गैस-को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ऊर्जा निर्यात से होने वाली कमाई में गिरावट ने रूस की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।

    बढ़ते खर्च और घटती आय के बीच रूसी सरकार की कर्ज पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। हाल ही में रूसी सरकार ने बॉन्ड जारी कर करीब 108.9 अरब रूबल का कर्ज उठाया। इसके साथ ही 2025 में अब तक कुल कर्ज जारी करने का आंकड़ा 7.9 ट्रिलियन रूबल तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि सरकार के पास बजट घाटा पाटने के लिए सीमित विकल्प रह गए हैं। रूस की एक और बड़ी चिंता उसका नेशनल वेल्थ फंड या आपातकालीन रिजर्व है। रिपोर्ट्स के मुताबिकइस रिजर्व का आधे से ज्यादा हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है। ऐसे में भविष्य में किसी बड़े आर्थिक झटके से निपटने की रूस की क्षमता कमजोर होती जा रही है। बजट घाटा लगातार बढ़ रहा है और इसकी मुख्य वजह सैन्य अभियानों पर हो रहा भारी खर्च माना जा रहा है।

    आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में रूस के सामने कई और चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें दबाव में रहींरूबल मजबूत बना रहा और आर्थिक विकास अनुमान से कम रहातो सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी। मजबूत रूबल निर्यात को महंगा बना देता हैजिससे विदेशी मुद्रा कमाने में दिक्कत आती हैजबकि ऊंची ब्याज दरें कर्ज को और महंगा कर देती हैं।विश्लेषकों के अनुसारयदि तेल और गैस से होने वाली आय में और गिरावट आती है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैंतो रूस के सामने केवल तीन ही विकल्प बचेंगे। पहलासरकार टैक्स बढ़ा सकती हैजिससे आम जनता और उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। दूसरासामाजिक कल्याण और विकास से जुड़े अन्य जरूरी खर्चों में कटौती की जा सकती हैजिसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। तीसरा विकल्प है और अधिक कर्ज लेनाजो भविष्य में आर्थिक संकट को और गहरा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर दिया है। लंबे समय तक चले इस संघर्ष ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है और विदेशी निवेश लगभग ठप हो चुका है। ऐसे में युद्ध के बाद भी रूस के लिए आर्थिक स्थिरता हासिल करना आसान नहीं होगा।कुल मिलाकरयूक्रेन युद्ध रूस के लिए सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहींबल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है-इस जंग की कीमत रूस को आने वाले कई वर्षों तक चुकानी पड़ सकती है।