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  • 30 जुलाई से होगी सावन की शुरुआत, जानें शिव पूजा, उपवास और सोमवार व्रत के जरूरी नियम

    30 जुलाई से होगी सावन की शुरुआत, जानें शिव पूजा, उपवास और सोमवार व्रत के जरूरी नियम


    नई दिल्ली। भगवान शिव को समर्पित पवित्र श्रावण मास का शुभारंभ 30 जुलाई, गुरुवार से आयुष्मान योग और श्रवण नक्षत्र में होगा। इस दिन चंद्रमा मकर राशि और सूर्य कर्क राशि में रहेंगे। श्रावण कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि रात 9:30 बजे तक रहेगी। इस वर्ष सावन 31 दिनों का होगा और इसका समापन 28 अगस्त को होगा। पूरे माह में श्रद्धालु शिव कृपा प्राप्त करने के लिए सोमवार व्रत, प्रदोष व्रत, सावन शिवरात्रि और मंगला गौरी व्रत का पालन करेंगे।

    पहली बार व्रत रखने वालों के लिए शुरुआत कैसे करें?
    जो श्रद्धालु पहली बार सावन का व्रत रखना चाहते हैं, वे 3 अगस्त से पहले सावन सोमवार व्रत का संकल्प ले सकते हैं। इस वर्ष कुल चार सावन सोमवार और चार मंगला गौरी व्रत पड़ेंगे।

    सावन सोमवार की तिथियां
    3 अगस्त – पहला सोमवार
    10 अगस्त – दूसरा सोमवार
    17 अगस्त – तीसरा सोमवार
    24 अगस्त – चौथा सोमवार

    मंगला गौरी व्रत
    4 अगस्त
    11 अगस्त
    18 अगस्त
    25 अगस्त

    अन्य प्रमुख व्रत
    10 अगस्त – प्रदोष व्रत
    11 अगस्त – सावन शिवरात्रि
    25 अगस्त – प्रदोष व्रत

    व्रत का संकल्प और उद्यापन जरूरी
    यदि आप सावन सोमवार व्रत शुरू कर रहे हैं तो 3 अगस्त से संकल्प लेकर चारों सोमवार व्रत करें और 24 अगस्त को विधि-विधान से उद्यापन करें। कुछ परंपराओं में भाद्रपद के पहले सोमवार को पांचवां व्रत रखकर उद्यापन करने की भी मान्यता है। वहीं 16 सोमवार व्रत करने वाले श्रद्धालु भी इसकी शुरुआत पहले सावन सोमवार से करते हैं।

    व्रत के दौरान रखें इन नियमों का ध्यान
    सावन शुरू होने से पहले ही यह संकल्प लें कि पूरे महीने मांस, मदिरा, धूम्रपान और अन्य तामसिक पदार्थों से दूरी बनाए रखेंगे। इस दौरान ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करना भी शुभ माना गया है। व्रत वाले दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और जल हाथ में लेकर भगवान शिव की पूजा तथा व्रत का संकल्प लें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत तभी फलदायी होता है जब व्यक्ति मन, वचन और कर्म से पवित्र रहे। छल, कपट, क्रोध और घृणा जैसे भावों से दूर रहकर शिव भक्ति करना अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।

    ऐसे करें भगवान शिव की पूजा
    हर सोमवार या व्रत वाले दिन शिवलिंग का जलाभिषेक करें। पूजन में बेलपत्र, अक्षत, कच्चा दूध, शहद, चंदन, पुष्प, भांग, धतूरा और शमी के पत्ते अर्पित किए जा सकते हैं। पुरुष श्रद्धालु ‘ॐ नमः शिवाय’ तथा महिलाएं ‘नमः शिवाय’ मंत्र का जप करें। इसके साथ शिव चालीसा का पाठ और आरती करें। शाम के समय शिवलिंग के समीप दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है।

    पूरे सावन में करें शिव आराधना
    जिन दिनों व्रत न हो, उन दिनों भी भगवान शिव का जलाभिषेक और नियमित पूजा करना शुभ माना गया है। यदि संभव हो तो किसी एक व्रत के दिन रुद्राभिषेक भी कराया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई शिव उपासना से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

  • हरियाली तीज 2026: कब है व्रत? जानें शुभ तिथि, पूजा विधि, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम

    हरियाली तीज 2026: कब है व्रत? जानें शुभ तिथि, पूजा विधि, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम


    नई दिल्ली। सावन का महीना अपने साथ हरियाली, उमंग और धार्मिक आस्था लेकर आता है। इसी पावन माह में मनाई जाने वाली हरियाली तीज सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखती है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए पूजा-अर्चना करती हैं।

    कब है हरियाली तीज 2026?
    हिंदू पंचांग के अनुसार हरियाली तीज हर वर्ष सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में हरियाली तीज 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा का विधान है।
    पूजा मुहूर्त – सुबह 7.29 – सुबह 9.08
    दोपहर का मुहूर्त – दोपहर 12.25 – शाम 5.22

    हरियाली तीज का धार्मिक महत्व
    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। उनके अटूट समर्पण और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया। इसी कारण यह पर्व अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सुहागिन महिलाएं माता गौरी से सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मांगती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं योग्य वर की कामना करती हैं।

    ऐसे करें हरियाली तीज की पूजा
    – ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले स्नान कर हरे या लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
    – मिट्टी से बनी भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
    – पूजा में मेहंदी, सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी, काजल सहित सुहाग का पूरा श्रृंगार अर्पित करें।
    – व्रत का संकल्प लेकर माता गौरी का ध्यान करें और सोलह श्रृंगार अर्पित करें।
    – भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भांग और अक्षत चढ़ाकर शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा करें।
    – पूजा के अंत में हरियाली तीज की व्रत कथा सुनना या पढ़ना आवश्यक माना गया है।

    त्योहार की रौनक
    हरियाली तीज पर महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाती हैं, पारंपरिक गीत गाती हैं और झूला झूलकर पर्व का आनंद लेती हैं। इस अवसर पर घेवर, मालपुआ और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। यह त्योहार मायके और ससुराल के रिश्तों में प्रेम और अपनापन बढ़ाने का भी प्रतीक माना जाता है।

    व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें

    क्या करें
    – सात्विक भोजन का पालन करें।
    – दान-पुण्य करें और बड़ों का आशीर्वाद लें।
    – घर में सकारात्मक और धार्मिक वातावरण बनाए रखें।

    क्या न करें
    – काले या नीले रंग के वस्त्र पहनने से बचें।
    – क्रोध, विवाद और किसी के प्रति द्वेष की भावना न रखें।
    – तामसिक भोजन का सेवन न करें और व्रत के नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करें।

  • आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि

    आज नृसिंह जयंती, ऐसे करें भगवान नृसिंह की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली। आज नृसिंह जयंती पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह दिन भगवान विष्णु के उग्र अवतार भगवान नृसिंह को समर्पित है, जिन्होंने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अवतार लिया था। आधा मनुष्य और आधा सिंह के रूप में प्रकट होकर उन्होंने अधर्म का अंत किया और धर्म की स्थापना की।

    शुभ मुहूर्त और तिथि
    नृसिंह चतुर्दशी की तिथि 29 अप्रैल को शाम 7:51 बजे से शुरू होकर 30 अप्रैल को रात 9:12 बजे तक रहेगी। मध्याह्न संकल्प का समय सुबह 10:59 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा।
    वहीं, सायंकाल पूजा का शुभ समय शाम 4:17 बजे से 6:56 बजे तक निर्धारित किया गया है।
    व्रत का पारण 1 मई को सुबह 5:41 बजे किया जाएगा।

    नृसिंह जयंती का महत्व
    वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह जयंती विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन संध्या समय खंभे से प्रकट होकर भगवान नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया था। यह पर्व भक्तों की रक्षा, शत्रुओं के नाश और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    भगवान नृसिंह की महिमा
    भगवान नृसिंह को शक्ति और संरक्षण के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनकी आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, विरोधियों से राहत मिलती है और भय व संकटों से सुरक्षा प्राप्त होती है। साथ ही मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

    पूजा विधि
    इस दिन सुबह जल्दी उठकर घर की साफ-सफाई कर स्नान के बाद शुद्ध वस्त्र धारण करें। चूंकि भगवान नृसिंह का प्राकट्य गोधूली बेला में हुआ था, इसलिए सूर्यास्त के समय पूजा करना विशेष फलदायी माना गया है। पूजा के दौरान भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं, लाल फूल अर्पित करें और श्रद्धा से मंत्र जाप करते हुए अपनी मनोकामना व्यक्त करें।

    व्रत नियम
    व्रत रखने वाले भक्त इस दिन फलाहार या जलाहार ग्रहण करते हैं और संयम का पालन करते हैं। अगले दिन दान-पुण्य कर व्रत का पारण किया जाता है। जो व्रत नहीं रखते, वे भी भक्ति भाव से पूजा कर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

    विशेष उपाय
    यदि कोई व्यक्ति शत्रु या मुकदमे से परेशान है, तो भगवान नृसिंह को लाल फूल अर्पित कर लाल रेशमी धागा चढ़ाएं। इसके बाद घी का चौमुखी दीपक जलाकर “ऊं नृसिंहाय शत्रु भुजबल विधराय स्वाहा” मंत्र का 3, 5 या 11 माला जाप करें। पूजा के बाद उस धागे को दाहिने हाथ में बांधने से बाधाएं शांत होने की मान्यता है।

  • मां अम्बे की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर, बस सही तरीके से करें इन मंत्रों का जाप

    मां अम्बे की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर, बस सही तरीके से करें इन मंत्रों का जाप


    नई दिल्ली । मां अम्बे के मंत्रों का सही जाप आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, साहस और बाधाओं से मुक्ति लाने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। आइए इसे आसान और प्रभावी तरीके से समझते हैं
    मंत्रों की शक्ति समझें

    मंत्र सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा के स्रोत हैं। जब आप उन्हें विश्वास, श्रद्धा और ध्यान के साथ जपते हैं, तो यह मन, शरीर और वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

    शक्तिशाली मंत्र उदाहरण:

    ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे – साहस और सुरक्षा देने वाला
    सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो… – सभी बाधाओं को दूर करने वाला
    रोगानशेषानपहंसि… – स्वास्थ्य और इच्छाओं की पूर्ति के लिए
    ऊं दुं दुर्गायै नमः – नकारात्मक ऊर्जा दूर करने वाला सरल मंत्र

     जप की तैयारी
    शांत और स्वच्छ स्थान चुनें।
    सात्विक भोजन करें और मन को शांत रखें।
    जप से पहले छोटा संकल्प लें कि आप किस उद्देश्य के लिए यह जाप कर रहे हैं।
    समय और नियमितता
    सुबह का ब्रह्म मुहूर्त (4-6 बजे) सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
    यदि संभव न हो, तो दिन का कोई भी शांत समय चुनें।
    नियमित जप करना आवश्यक है; लगातार अभ्यास से प्रभाव अधिक होता है।
    जप की संख्या
    कम से कम 108 बार (एक माला) जप करें।
    उन्नत साधना में सवा लाख जाप तक भी किया जाता है।
    जप की संख्या पर ध्यान दें; इससे आपकी एकाग्रता और शक्ति बढ़ती है।
    ध्यान और मन की शुद्धि
    जप करते समय मन केवल मां अम्बे पर केन्द्रित रहे।
    किसी के प्रति बुरा भाव या नकारात्मक सोच न रखें।
    शुद्ध मन और विश्वास से ही मंत्र का पूरा प्रभाव दिखता है।
    नियमित अभ्यास का लाभ
    धीरे-धीरे जीवन में बाधाएं कम होती हैं।
    आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है।
    नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-समृद्धि आती है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: अखंड ज्योति बुझ जाए तो न घबराएं, तुरंत करें ये सरल उपाय

    चैत्र नवरात्रि 2026: अखंड ज्योति बुझ जाए तो न घबराएं, तुरंत करें ये सरल उपाय


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि में मां दुर्गा की उपासना के दौरान अखंड ज्योति जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह ज्योति श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक होती है, जिसे पूरे नौ दिनों तक निरंतर जलाने का विधान है। हालांकि, कई बार हवा, घी की कमी या बाती के कारण यह ज्योति बुझ जाती है। ऐसे में भक्तों के मन में डर और चिंता पैदा हो जाती है कि कहीं यह अपशकुन तो नहीं।

    धार्मिक ग्रंथों और ज्योतिष के अनुसार, अखंड ज्योति का बुझना कोई बड़ा अपशकुन नहीं है। यह एक सामान्य भौतिक कारण से होने वाली घटना भी हो सकती है। सबसे महत्वपूर्ण आपकी श्रद्धा और भक्ति है। यदि मन सच्चा है, तो छोटी-मोटी त्रुटियां पूजा को प्रभावित नहीं करतीं।

    अखंड ज्योति का महत्व बहुत गहरा है। यह घर में सुख-शांति, सकारात्मक ऊर्जा और देवी कृपा का प्रतीक मानी जाती है। दुर्गा सप्तशती और मार्कण्डेय पुराण में भी बताया गया है कि पूजा में कर्मकांड से अधिक महत्व भाव और श्रद्धा का होता है।

    अगर किसी कारणवश ज्योति बुझ जाए, तो घबराने की बजाय शांत मन से तुरंत उपाय करना चाहिए। सबसे पहले मां दुर्गा का ध्यान करें और एक छोटा साक्षी दीपक जलाएं। इसके बाद अखंड ज्योति के दीपक को साफ करें और जली हुई बाती को निकाल दें। नई और लंबी बाती डालकर उसमें शुद्ध घी भरें। फिर साक्षी दीपक की लौ से ही अखंड ज्योति को पुनः प्रज्वलित करें।

    इसके बाद हाथ जोड़कर मां से अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा मांगें और ॐ दुं दुर्गायै नमः या ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मंत्र का 11 या 21 बार जाप करें। इस प्रक्रिया से आपकी पूजा और साधना पुनः सुचारु रूप से जारी रहती है।

    यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ज्योति बुझने को अपशकुन मानकर पूजा बंद करना या डर जाना गलत धारणा है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि अनजाने में हुई गलतियां क्षमा योग्य होती हैं। देवी भागवत और अन्य ग्रंथों में भी भक्ति को कर्मकांड से ऊपर बताया गया है।

    अखंड ज्योति को बुझने से बचाने के लिए कुछ सावधानियां भी अपनाई जा सकती हैं। हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाली लंबी बाती और शुद्ध घी का उपयोग करें। दीपक को हवा से बचाने के लिए कांच या मिट्टी का कवर लगाएं। समय-समय पर घी की मात्रा जांचते रहें और जरूरत पड़ने पर तुरंत भरें। पूजा स्थान को हवादार लेकिन सुरक्षित रखें।

    नवरात्रि का यह संदेश है कि भक्ति में भाव सबसे महत्वपूर्ण है। यदि आपकी श्रद्धा सच्ची है, तो छोटी भूलों से घबराने की आवश्यकता नहीं है। मां दुर्गा भक्तों की सच्ची भावना को समझती हैं और उन्हें हमेशा आशीर्वाद देती हैं।

  • चैत्र नवरात्रि में समय की कमी? दुर्गा सप्तशती के बराबर फल देगा यह छोटा मंत्र

    चैत्र नवरात्रि में समय की कमी? दुर्गा सप्तशती के बराबर फल देगा यह छोटा मंत्र


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व माना जाता है। इन नौ दिनों में दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी बताया गया है। हालांकि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के लिए इनका पूरा पाठ करना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में शास्त्रों में कुछ सरल उपाय भी बताए गए हैं जिनसे समान फल की प्राप्ति संभव मानी गई है।

    दुर्गा सप्तशती में मां दुर्गा की महिमा शक्ति और उनकी महिषासुर पर विजय का वर्णन 13 अध्यायों में किया गया है। मान्यता है कि इसका पाठ करने से जीवन के कष्ट भय और बाधाएं दूर होती हैं तथा साधक को मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही कारण है कि नवरात्रि में नवचंडी और शतचंडी यज्ञ जैसे अनुष्ठान भी किए जाते हैं।

    कम समय में भी करें प्रभावशाली पाठ

    अगर आपके पास पूरा पाठ करने का समय नहीं है तो आप दुर्गा सप्तशती के केवल रात्रि सूक्त प्रथम अध्याय और देवी सूक्त पंचम अध्याय का पाठ कर सकते हैं। इसे भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है और इससे माता की कृपा प्राप्त होती है।

    मंत्र जप से मिलेगा समान फल

    यदि इतना समय भी नहीं है तो शास्त्रों के अनुसार यह बीज मंत्र सबसे सरल और शक्तिशाली उपाय माना गया है

    ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

    इस मंत्र का 108 या 1008 बार जप करने से दुर्गा सप्तशती के पाठ के समान फल मिलने की मान्यता है।

    इसके अलावा

    या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
    का नियमित जप भी जीवन से भय बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। और यदि आप सबसे आसान उपाय चाहते हैं तो जय माता दी या दुर्गा-दुर्गा का सच्चे मन से स्मरण करना भी उतना ही फलदायी माना गया है। इस प्रकार समय की कमी होने पर भी श्रद्धा और भक्ति के साथ किए गए छोटे-छोटे मंत्र जप से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

  • हिंदू नववर्ष 2026: ब्रह्म मुहूर्त में करें ये शुभ कार्य, पूरे साल मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद

    हिंदू नववर्ष 2026: ब्रह्म मुहूर्त में करें ये शुभ कार्य, पूरे साल मिलेगा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में नववर्ष का विशेष महत्व माना गया है जो चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से आरंभ होता है। वर्ष 2026 में यह पावन अवसर 19 मार्च को पड़ रहा है इसी दिन से विक्रम संवत 2083 की शुरुआत होगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नववर्ष का पहला दिन पूरे साल की दिशा तय करता है इसलिए इस दिन विशेष रूप से ब्रह्म मुहूर्त में किए गए कार्य अत्यंत फलदायी माने जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस शुभ समय में किया गया हर सकारात्मक प्रयास पूरे वर्ष जीवन में खुशियां सफलता और समृद्धि लेकर आता है।

    ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार नववर्ष के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय वातावरण शुद्ध और ऊर्जा से भरपूर होता है जो मन और शरीर को सकारात्मकता से भर देता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाकर विधिपूर्वक पूजा अर्चना करें। विशेष रूप से भगवान विष्णु मां दुर्गा और भगवान गणेश की पूजा करने का विधान बताया गया है। ऐसा करने से घर में सुख शांति बनी रहती है और पूरे वर्ष ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

    नववर्ष के पहले दिन घर की साफ सफाई का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि स्वच्छ और सुसज्जित घर में देवी देवताओं का वास होता है। इस दिन घर के मुख्य द्वार को सजाना चाहिए रंगोली बनानी चाहिए और आम के पत्तों या फूलों से तोरण लगाना चाहिए। यह न केवल घर की सुंदरता बढ़ाता है बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है और नकारात्मकता को दूर करता है।

    इसके साथ ही दान पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व बताया गया है। जरूरतमंदों को भोजन वस्त्र या अन्य आवश्यक चीजें दान करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। दान करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि यह हमारे भीतर करुणा और सेवा की भावना को भी जागृत करता है। ऐसा करने से जीवन में समृद्धि और संतोष का भाव बना रहता है।

    हिंदू नववर्ष को नई शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन व्यक्ति को अपने जीवन के लिए सकारात्मक संकल्प लेना चाहिए। जैसे नियमित पूजा करना अच्छे कर्म करना दूसरों की सहायता करना और जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से जीने का प्रण लेना। कई लोग इस शुभ अवसर पर नया व्यवसाय नई योजना या किसी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत भी करते हैं क्योंकि इसे अत्यंत शुभ समय माना गया है।

    अंतत ब्रह्म मुहूर्त में किया गया हर शुभ कार्य व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि इस पावन दिन को श्रद्धा भक्ति और सकारात्मकता के साथ मनाया जाए तो पूरे वर्ष जीवन में खुशहाली सफलता और मानसिक शांति बनी रहती है।