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  • गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

    गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

    नई दिल्ली । सनातन धर्म के अठारह पुराणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण महाग्रंथ गरुड़ पुराण में मनुष्य के जीवन, मृत्यु और उसके पश्चात मिलने वाले अगले जन्म को लेकर कई गूढ़ और चौंकाने वाले तथ्यों का विश्लेषण किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार, मृत्यु के बाद किसी जीव को कौन सा शरीर प्राप्त होगा, यह कोई आकस्मिक घटना या भाग्य का खेल नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से मनुष्य द्वारा अपने वर्तमान जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों के लेखा-जोखा पर निर्भर करता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मनुष्य अपने जीवित रहते ही अपने अगले जन्म की पृष्ठभूमि तैयार कर लेता है और उसके वर्तमान कर्म ही यह सुनिश्चित करते हैं कि वह पुनः मानव योनि में आएगा या किसी पशु-पक्षी के रूप में धरती पर जन्म लेगा।

    धार्मिक ग्रंथ के प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवनकाल में सदाचार का पालन करते हैं, निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों की सहायता करते हैं और धर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते, उन्हें मृत्यु के उपरांत पुनः मनुष्य जीवन का उपहार मिलता है। ऐसी पुण्यात्माओं को अगले जन्म में संस्कारी, समृद्ध और प्रतिष्ठित परिवारों में जन्म लेने का सुअवसर प्राप्त होता है, जहां उन्हें समाज में उचित मान-सम्मान और तमाम भौतिक सुख-सुविधाएं सुलभ होती हैं। इसके विपरीत, जो लोग जीवन भर केवल लोभ, मोह, छल-कपट, चोरी और दूसरों को प्रताड़ित करने जैसे कृत्य में संलिप्त रहते हैं, उनका अगला जीवन अत्यंत कष्टदायी और दयनीय हो जाता है। ऐसे नकारात्मक आचरण वाले व्यक्तियों को मानव चोले से वंचित होकर विभिन्न पशु-पक्षियों की निकृष्ट योनियों में भटकना पड़ता है।

    गरुड़ पुराण में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट अपराधों और पापों के आधार पर मिलने वाले विशिष्ट जन्मों और उनके दंड का भी विस्तृत विवरण दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार, जो मनुष्य जीवन भर दूसरों के अन्न की चोरी करता है अथवा छल से किसी के धन को हड़पता है, वह अपने अगले जन्म में चूहा या नेवला बनता है। इसी प्रकार, जो लोग समाज में पूजनीय अपने माता-पिता, गुरुजनों अथवा वयोवृद्ध बुजुर्गों का अनादर और अपमान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में कौआ या कोई ऐसा अप्रिय पक्षी बनना पड़ता है जिसे मानव समाज सहज रूप से देखना पसंद नहीं करता। इसके अतिरिक्त, पराई महिलाओं पर कुदृष्टि रखने वाले और अपनों के साथ विश्वासघात करने वाले पुरुषों के लिए गरुड़ पुराण में कठोरतम दंड का प्रावधान है; ऐसे लोग अगले जन्म में भयानक अजगर या रेंगने वाले विषैले जीवों के रूप में धरती पर आते हैं।

    आलस्य और अकर्मण्यता को भी सनातन व्यवस्था में एक बड़ा दोष माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो लोग पूर्णतः आलसी होते हैं और स्वयं पुरुषार्थ न करके केवल दूसरों की गाढ़ी कमाई पर ऐश करते हैं, वे अगले जन्म में गधा या बैल के रूप में जन्म लेते हैं ताकि वे प्रकृति के नियम के तहत कठिन शारीरिक श्रम का वास्तविक महत्व समझ सकें। इसी क्रम में, जो लोग समाज में अपने ऊंचे पद, सत्ता और बाहुबल के घमंड में चूर होकर असहाय एवं कमजोर वर्गों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें अगले जन्म में हिंसक प्रवृत्ति के पशुओं जैसे शेर या भेड़िए का शरीर प्राप्त होता है, जहां उन्हें स्वयं के अस्तित्व की रक्षा और भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।

    मूलतः, गरुड़ पुराण यह दार्शनिक संदेश देता है कि संपूर्ण प्रकृति हर जीव को उसके मूल स्वभाव और आचरण के अनुरूप ही अगला भौतिक शरीर प्रदान करती है। यदि किसी व्यक्ति का आंतरिक स्वभाव हिंसक, क्रूर और तामसी है, तो उसे स्वाभाविक रूप से जानवर का शरीर मिलता है, और यदि वह भीतर से शांत, करुणामयी तथा परोपकारी है, तो वह पुनः मनुष्य का श्रेष्ठ जीवन प्राप्त करता है। यह आध्यात्मिक व्यवस्था मानव को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उसके वर्तमान आचरण में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रतिपादित की गई है। गरुड़ पुराण का परम संदेश यही है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभता से मिलता है, इसलिए सांसारिक नफरत और लोभ को त्यागकर प्रेम, दया और धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए क्योंकि मृत्यु के बाद केवल कर्म ही जीव के साथ जाते हैं।

  • नारद पुराण: मृत्यु के बाद यमलोक की यात्रा और पाप-पुण्य के फल का रहस्य, जानिए आत्मा को कैसे मिलते हैं परिणाम

    नारद पुराण: मृत्यु के बाद यमलोक की यात्रा और पाप-पुण्य के फल का रहस्य, जानिए आत्मा को कैसे मिलते हैं परिणाम



    नई दिल्ली। नारद पुराण में जीवन, मृत्यु और परलोक से जुड़े गहरे रहस्यों का वर्णन मिलता है। इसमें बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा अपने कर्मों के अनुसार यमलोक की यात्रा करती है और वहीं उसे पाप और पुण्य का फल प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार यह यात्रा साधारण नहीं होती, बल्कि यह पूरी तरह व्यक्ति के जीवन में किए गए कर्मों पर निर्भर करती है।

    नारद पुराण के अनुसार यमलोक का मार्ग अत्यंत लंबा बताया गया है, जिसे छियासी हजार योजन तक फैला हुआ कहा गया है। मान्यता के अनुसार एक योजन लगभग 13 किलोमीटर के बराबर होता है, ऐसे में यह दूरी अत्यंत विशाल मानी जाती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में धर्म, दान और पुण्य कर्म करता है, उसकी यह यात्रा सरल और सुखद होती है, जबकि पाप कर्म करने वालों को इस मार्ग में कठिनाइयों और कष्टों का सामना करना पड़ता है।

    पुराणों में वर्णन मिलता है कि यमलोक के मार्ग में अनेक प्रकार की बाधाएं आती हैं, कहीं कीचड़, कहीं अग्नि, कहीं तीखी धार वाली शिलाएं और कहीं कांटों से भरे मार्ग मिलते हैं। पाप कर्म करने वाले जीवों को यमदूत विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं के बीच यमलोक तक ले जाते हैं। वे भय और कष्ट के साथ अपनी यात्रा पूरी करते हैं और अपने जीवन के पापों का फल भोगते हैं।

    इसके विपरीत, जो लोग अपने जीवन में दान-पुण्य और धर्म का पालन करते हैं, उन्हें इस मार्ग में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। ऐसे जीवों को उत्तम भोजन, वस्त्र, आभूषण और सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि अन्न दान करने वाले को उत्तम भोजन, जल दान करने वाले को शीतल पेय, वस्त्र दान करने वाले को दिव्य वस्त्र और गोदान करने वाले को विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।

    नारद पुराण में यह भी बताया गया है कि जो व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा करता है, ब्राह्मणों का सम्मान करता है, धर्म का पालन करता है और सदैव ईश्वर के ध्यान में लीन रहता है, उसे यमलोक की यात्रा में विशेष सम्मान मिलता है और वह सुखपूर्वक धर्मराज के लोक तक पहुंचता है।

    अंत में धर्मराज जीवों को उनके कर्मों के अनुसार निर्णय देते हैं। पुण्यात्माओं को स्वर्ग और सुखमय लोक प्राप्त होता है, जबकि पापियों को उनके कर्मों के अनुसार कष्टदायक फल भोगना पड़ता है। पुराणों में यह संदेश दिया गया है कि मानव जीवन दुर्लभ है और इसे धर्म, सत्य, दान और अच्छे कर्मों में लगाना चाहिए, क्योंकि अंततः हर जीव को अपने कर्मों का ही फल प्राप्त होता है।