जानिए क्या है सनी देओल की फिल्म लाहौर 1947 की कहानी? मुस्लिम होगा किरदार, आमिर खान हैं प्रोड्यूसर

नई दिल्ली। बॉलीवुड एक्टर सनी देओल के लिए ये साल बेहद खास होने वाला है। इस साल उनकी शानदार फिल्में आ रही हैं जिसमें से एक लाहौर 1947 है। हालांकि, अभी ये टाइटल कन्फर्म नहीं है। लेकिन ये वही फिल्म है जिसे प्रोड्यूस करने के लिए आमिर खान आगे आए थे। सनी देओल को एक्शन अवतार में देखने वालों के लिए ये फिल्म सरप्राइज कर सकती है। नाम लाहौर 1947 से ऐसा माना गया था कि ये एक एक्शन से भरपूर फिल्म होगी जिसमें भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को दिखाया जाएगा। लेकिन इस फिल्म की कहानी से सनी देओल आपको रुला देंगे। वो एक्शन नहीं बल्कि एक इमोशनल अवतार में नजर आने वाले हैं। इस फिल्म की कहानी सनी देओल के दिल के बेहद करीब है जिस पर वो सालों से फिल्म बनाना चाहते थे। अब डायरेक्टर राजकुमार संतोषी ने इस खास कहानी पर फिल्म बना दी है।

लाहौर 1947 की कहानी
लाहौर 1947 एक इमोशनल कर देने वाली फिल्म होने वाली है जिसकी कहानी एक मुस्लिम परिवार के भारत से पाकिस्तान बसने को दिखाया गया है। इस कहानी में एक माई भी हैं जो रतन की मां हैं और बंटवारे के दौरान अपने उसे पाकिस्तान में ही छोड़ आए। लाहौर में बूढी माई की एक शानदार हवेली है जिसमें अब भारत से आया वो मुस्लिम परिवार रहता है। लाहौर 1947 इसी बूढी माई और भारत के लखनऊ को छोड़ कर पाकिस्तान गए सिकंदर मिर्जा और उनके परिवार की कहानी है।

भारत और पाकिस्तान का बंटवारा
सिकंदर अपनी पत्नी हामिद मिर्जा, बेटा जावेद और बेटी तनवीर मिर्जा के साथ भारत के लखनऊ में खुशहाल जिंदगी जी रहे थे। लेकिन तभी देश का बंटवारा होता है और सिकंदर को अपने परिवार के साथ मजबूरन लखनऊ छोड़ पाकिस्तान के लाहौर में जाना पड़ता है। ये वही समय था जब भारत और पाकिस्तान रिफ्यूजी के संकट से जूझ रहे थे। उसी समय लाहौर की बड़ी हवेली में अपने परिवार के साथ रहने वाली माई का साथ भी अपनों से छूट जाता है। रतन अपनी माई को पाकिस्तान में ही छोड़ भारत में बस जाता है।

लाहौर की वो हवेली
लाहौर में सिकंदर और उनके परिवार को रहने के लिए एक शानदार हवेली मिलती है। ये वही हवेली होती है जहां माई रहा करती थी। अब माई दर-दर भटकती है और सिकंदर पर उनकी हवेली पर कब्ज़ा करने का आरोप लगाती है। याकूब पहलवान जो खुद को मुस्लिम धर्म का रक्षक बताता है उसे हिंदू माई रास नहीं आती और वो उसे परेशान करता है। इसी दौरान माई और सिकंदर के परिवार के बीच एक खास रिश्ता बन जाता है। माई सिकंदर के घर का हिस्सा बन जाती हैं। इसी बीच एक कवि नासिर काजमी की एंट्री होती है जो याकूब पहलवान को धर्म से हटकर इंसानियत की सीख देता है।

कहानी का अंत
कहानी में आगे माई का निधन हो जाता है और अब बहस होती है उनके अंतिम संस्कार की। काजमी साहब कहते है कि वो एक हिंदू महिला थीं उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीतिरिवाजों से होना चाहिए। हिंदू धर्म समर्थन की ये बात याकूब को पसंद नहीं आती और वो काजमी साहब को जान से मार देता है। अंत में सिकंदर और लाहौर के मुस्लिम माई का अंतिम संस्कार हिंदू तरीके से करते हैं।

फिल्म के किरदार और रिलीज
सनी देओल की फिल्म लाहौर 1947 की कहानी प्रोफेसर असगर वजाहत के 1989 के एक नाटक पर आधारित है जिसका नाम है ‘जिस लाहौर नई देख्या, ओ जम्याई नई’। इसका मतलब है जिसने लाहौर नहीं देखा उसने जीवन जिया नहीं है। विकिपीडिया की मानें तो इस फिल्म में सिकंदर का किरदार सनी देओल निभा रहे हैं, प्रीति जिंटा उनकी पत्नी हामिदा के किरदार में होंगी। शबाना आजमी माई का किरदार निभा रही हैं। म्यूजिक AR रहमान ने तैयार किया है। गानों के बोल जावेद अख्तर ने लिखे हैं। फिल्म इस साल अगस्त में थिएटर पर दस्तक दे सकती है।