अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान पाया कि ओला, उबर और रैपिडो जैसी नामी कंपनियां नियमों को ताक पर रखकर निजी नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को कमर्शियल वाहनों की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ये वाहन बिना किसी वैध कमर्शियल लाइसेंस और अनिवार्य परमिट के यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हैं। कानून की नजर में यह न केवल मोटर व्हीकल एक्ट का खुला उल्लंघन है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के लिहाज से भी एक गंभीर जोखिम है। कमर्शियल परमिट न होने की स्थिति में दुर्घटना के समय यात्रियों को बीमा और अन्य कानूनी सुरक्षा मिलने में भी बड़ी बाधा आती है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और परिवहन विभाग को इस मामले में कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए। कोर्ट ने मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 66 का हवाला देते हुए याद दिलाया कि बिना वैध परमिट के किसी भी निजी वाहन का व्यावसायिक उपयोग दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। प्रशासन को आदेश दिया गया है कि वे सड़कों पर अवैध रूप से चल रही ऐसी बाइक-टैक्सी सेवाओं पर तत्काल लगाम लगाएं और उल्लंघन करने वालों पर कठोर कार्रवाई करें।
गौरतलब है कि इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर जैसे महानगरों में रैपिडो और ओला जैसी सेवाओं का जाल काफी फैल चुका है। बड़ी संख्या में कॉलेज जाने वाले छात्र और नौकरीपेशा युवा अपनी निजी बाइक के जरिए पार्ट-टाइम काम करके कमाई कर रहे हैं। कम खर्च और ट्रैफिक से बचने के लिए आम जनता भी इन सेवाओं को काफी पसंद करती रही है। लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद, निजी वाहनों के जरिए यह “पार्ट-टाइम” कमाई अब कानूनी दायरे में अवैध मानी जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश के बाद अब परिवहन विभाग को उन निजी वाहन मालिकों के खिलाफ अभियान चलाना होगा जो ऐप के जरिए सवारियां ढो रहे हैं। अब यदि किसी को टैक्सी सेवा देनी है, तो उसे अनिवार्य रूप से अपने वाहन का कमर्शियल रजिस्ट्रेशन (पीली नंबर प्लेट) कराना होगा और विधिवत परमिट प्राप्त करना होगा। यह फैसला यात्रियों की सुरक्षा और पंजीकृत कमर्शियल टैक्सी चालकों के हितों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
