भोजशाला विवाद: HC में हिन्दू पक्ष की दलील… केवल नमाज पढ़ लेने से वह जगह मस्जिद नहीं बन जाती…


इंदौर।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की इंदौर बेंच (Indore Bench) में धार (Dhar) के भोजशाला परिसर (Bhojshala Complex) के धार्मिक स्वरूप को लेकर चल रहे विवाद के मुकदमे में मंगलवार को हिंदू पक्ष ने दलील दी कि किसी स्थान पर केवल नमाज पढ़ लेने से वह जगह कानूनन मस्जिद नहीं बन जाती है। 11वीं सदी का भोजशाला परिसर स्थित विवादित ढांचा वक्फ संपत्ति नहीं है। बता दें कि हिंदू पक्ष भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है।


सरस्वती मंदिर पहले से था मौजूद

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप से जुड़ी याचिकाओं पर सोमवार 6 अप्रैल से रोज सुनवाई कर रही है। दूसरे दिन हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में अपनी दलीलें जारी रखीं। उन्होंने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के सामने कहा कि विवादित परिसर में धार के परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर पहले से मौजूद था।


किताबों, एएसआई, पुरातत्व विभाग के ग्रंथों का हवाला

वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि इस जगह को ऐतिहासिक एवं राजस्व रिकॉर्ड में ‘भोजशाला’ के रूप में ही जाना जाता है। विष्णु शंकर जैन भोजशाला को मंदिर होने के पक्ष में देशी-विदेशी लेखकों की किताबों, एएसआई, पुरातत्व विभाग के प्रकाशित ग्रंथों और अन्य स्रोतों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भोजशाला परिसर में बने मंदिर को आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त किया गया। इसके अवशेषों से विवादित ढांचे को खड़ा किया गया। फिर नमाज के लिए इस्तेमाल किया गया।


मूर्तियां, श्लोकों के शिलालेख, मंडप और हवन कुंड गिनाए सुबूत

विष्णु शंकर जैन का दावा है कि परिसर में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत श्लोकों वाले शिलालेख, मंडप और हवन कुंड मौजूद हैं। यह विवादित स्मारक उस हिंदू ढांचे का हिस्सा है जिसे धार के परमार राजा भोज ने 1034 ईस्वी में बनवाया था। उन्होंने धार पर हुए मुस्लिम आक्रमणों का जिक्र करते हुए कहा कि लंबे समय तक हिंदू प्रतीकों को मिटाने की कोशिशों के बाद भी ये निशानियां आज परिसर में मौजूद हैं।


महज नमाज पढ़ने से कोई जगह मस्जिद नहीं बन जाती

जैन ने कहा कि विवादित परिसर में कोई मस्जिद नहीं थी। महज नमाज पढ़ने से कोई जगह कानूनी रूप से मस्जिद नहीं बन जाती है। इस्लामी कानून के मुताबिक मस्जिद बनाने के लिए जमीन का खुशी से वक्फ किया जाना जरूरी है। भोजशाला 1909 से पहले से एक संरक्षित स्मारक है। इसका विवादित ढांचा बिल्कुल भी वक्फ संपत्ति नहीं है। उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा होते ही वह जगह देवताओं की संपत्ति बन जाती है। एक बार मंदिर बनने के बाद वह हमेशा मंदिर ही रहता है।


मंदिर गिरा देने से जगह का स्वभाव नहीं बदलता

विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यदि कोई मंदिर ढहा दिया जाए तब भी वह मंदिर होने का अपना मूल स्वभाव नहीं खोता इसलिए भोजशाला परिसर में केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। बता दें कि भोजशाला विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने सात अप्रैल 2003 को एक आदेश दिया था जिसके अनुसार अब तक चली आ रही व्यवस्था के तहत हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा करने और मुस्लिमों को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की अनुमति है।


हाईकोर्ट ने दिया था सर्वे का आदेश

हिंदू पक्ष का मानना है कि भोजशाला में स्थापित देवी सरस्वती की मूर्ति अभी लंदन के एक म्यूजियम में है। मूर्ति को भारत वापस लाकर दोबारा इसी परिसर में स्थापित किया जाना चाहिए। बता दें कि एएसआई ने हाई कोर्ट के आदेश पर दो साल पहले इस विवादित जगह का वैज्ञानिक सर्वे किया था। साथ ही अपनी विस्तृत रिपोर्ट दी थी।


एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा?

एएसआई की 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से विद्यमान थी। इसके बाद वहां एक विवादित ढांचा मंदिरों के हिस्सों को इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था। मुस्लिम पक्ष ने एएसआई के सर्वेक्षण पर सवाल उठाते हुए दावे को खारिज किया है। मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि एएसआई ने उसकी पुरानी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए विवादित परिसर में ‘रखी गईं चीजों’ को सर्वेक्षण में शामिल किया ।