यह आयोजन संत शिवानंद महाराज के सानिध्य में संपन्न हुआ जिसमें दूर-दूर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। महायज्ञ की शुरुआत 18 मार्च से हुई थी और 21 दिनों तक लगातार धार्मिक अनुष्ठान पूजा-पाठ और हवन का क्रम चलता रहा। प्रतिदिन करीब 21 क्विंटल हवन सामग्री से महाहवन किया गया जिसमें विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों के साथ विशेष सामग्रियों का उपयोग किया गया। पूरे आयोजन के दौरान लगभग 41 टन हवन सामग्री की आहुति दी गई जिसमें सोने और चांदी की आहुति भी शामिल रही।
समापन के दिन सबसे खास क्षण वह रहा जब टैंकरों के माध्यम से 11 हजार लीटर दूध लाकर मां नर्मदा का अभिषेक किया गया। यह दृश्य बेहद भव्य और भावुक करने वाला था। श्रद्धालु भक्ति में डूबे नजर आए और पूरे क्षेत्र में मंत्रोच्चार और घंटियों की गूंज सुनाई देती रही। दीपों की रोशनी और धार्मिक माहौल ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
महायज्ञ के दौरान श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में नारियल अर्पित किए और पुण्य लाभ अर्जित किया। समापन अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया जिसमें हजारों लोगों ने प्रसादी ग्रहण की। आयोजन के लिए करीब 5 एकड़ क्षेत्र में विशाल पंडाल तैयार किया गया था जहां व्यवस्थाएं सुव्यवस्थित तरीके से की गई थीं।
सातदेव क्षेत्र को प्राचीन काल से सप्त ऋषियों की तपोभूमि माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्माजी के मानस पुत्र सप्त ऋषियों ने यहां कठोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव पातालेश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए थे। यही कारण है कि यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र और आस्था का केंद्र बना हुआ है।
इतिहास के अनुसार यह क्षेत्र गोंड शासकों के अधीन रहा और बाद में मराठा साम्राज्य की महान शासक अहिल्याबाई होल्कर ने यहां कई धार्मिक निर्माण कराए जिससे इसकी महत्ता और बढ़ गई। आज भी यह स्थान धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इस तरह सीहोर का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना बल्कि सामूहिक सहभागिता और परंपरा के संरक्षण का भी एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है।
