नई दिल्ली । 2006 मालेगांव ब्लास्ट से जुड़े बहुचर्चित मामले में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। Bombay High Court ने बुधवार को इस केस में चल रही स्पेशल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। कोर्ट के इस फैसले से महू के लोकेश शर्मा, देपालपुर के राजेंद्र चौधरी समेत धनसिंह और मनोहर नरवरिया को राहत मिली है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि बिना ठोस और पुख्ता सबूतों के किसी भी मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
कमजोर साक्ष्यों पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकील कौशिक म्हात्रे ने कोर्ट में दलील दी कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस बयान के आधार पर केस दर्ज किया गया, वह खुद विवादों में रहा है। यह बयान स्वामी असीमानंद का था, जिसे बाद में उन्होंने दबाव में दिया गया बताते हुए वापस ले लिया था। कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए माना कि ऐसे आधार पर आरोप तय करना न्यायसंगत नहीं है।
सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकील कौशिक म्हात्रे ने कोर्ट में दलील दी कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस बयान के आधार पर केस दर्ज किया गया, वह खुद विवादों में रहा है। यह बयान स्वामी असीमानंद का था, जिसे बाद में उन्होंने दबाव में दिया गया बताते हुए वापस ले लिया था। कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए माना कि ऐसे आधार पर आरोप तय करना न्यायसंगत नहीं है।
NIA की चार्जशीट पर भी सवाल
इस मामले की जांच National Investigation Agency (NIA) द्वारा की गई थी। एजेंसी ने लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि चार्जशीट में पेश किए गए साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि ट्रायल को जारी रखा जाए।
इस मामले की जांच National Investigation Agency (NIA) द्वारा की गई थी। एजेंसी ने लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि चार्जशीट में पेश किए गए साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि ट्रायल को जारी रखा जाए।
6 साल जेल में रहे आरोपी
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि दोनों मुख्य आरोपी 2013 में गिरफ्तार हुए थे और करीब 6 साल तक जेल में रहे। 2019 में उन्हें जमानत मिली थी। उस समय भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि बिना ट्रायल इतने लंबे समय तक किसी को जेल में रखना उचित नहीं है। अब एक बार फिर कोर्ट ने आरोपियों को राहत देते हुए ट्रायल पर रोक लगा दी है।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि दोनों मुख्य आरोपी 2013 में गिरफ्तार हुए थे और करीब 6 साल तक जेल में रहे। 2019 में उन्हें जमानत मिली थी। उस समय भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि बिना ट्रायल इतने लंबे समय तक किसी को जेल में रखना उचित नहीं है। अब एक बार फिर कोर्ट ने आरोपियों को राहत देते हुए ट्रायल पर रोक लगा दी है।
क्या था पूरा मामला?
8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार चार बम धमाके हुए थे। ये धमाके बेहद संवेदनशील स्थानों हमीदिया मस्जिद और कब्रिस्तान के पास शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद हुए थे। इस दर्दनाक घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार चार बम धमाके हुए थे। ये धमाके बेहद संवेदनशील स्थानों हमीदिया मस्जिद और कब्रिस्तान के पास शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद हुए थे। इस दर्दनाक घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
जांच में कई मोड़
शुरुआत में मामले की जांच एटीएस ने की और 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया, जिन्हें 2016 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। बाद में जांच Central Bureau of Investigation (CBI) और फिर NIA को सौंप दी गई। जांच एजेंसियों ने बाद में इस मामले में अलग दिशा में जांच करते हुए दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया।
शुरुआत में मामले की जांच एटीएस ने की और 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया, जिन्हें 2016 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। बाद में जांच Central Bureau of Investigation (CBI) और फिर NIA को सौंप दी गई। जांच एजेंसियों ने बाद में इस मामले में अलग दिशा में जांच करते हुए दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया।
आगे क्या?
सितंबर 2025 में स्पेशल कोर्ट ने चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद केस की दिशा बदलती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि जांच एजेंसियां नए सिरे से सबूत पेश कर पाती हैं या मामला यहीं ठहर जाता है।
सितंबर 2025 में स्पेशल कोर्ट ने चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद केस की दिशा बदलती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि जांच एजेंसियां नए सिरे से सबूत पेश कर पाती हैं या मामला यहीं ठहर जाता है।
