Author: bharati

  • रतलाम में प्रशासनिक दबाव ने ली जान? 4 दिन में 3 नोटिस और छुट्टी से इनकार, पटवारी रविशंकर के सुसाइड नोट ने खोली व्यवस्था की पोल

    रतलाम में प्रशासनिक दबाव ने ली जान? 4 दिन में 3 नोटिस और छुट्टी से इनकार, पटवारी रविशंकर के सुसाइड नोट ने खोली व्यवस्था की पोल


    रतलाम । मध्य प्रदेश के रतलाम जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है, जिसने उत्सव के माहौल को पल भर में चीख-पुकार और मातम में बदल दिया। आलोट तहसील में पदस्थ पटवारी “रविशंकर खराड़ी” ने अपने घर की तीसरी मंजिल पर साफे से फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह घटना उस वक्त और भी मार्मिक हो गई जब पता चला कि महज एक दिन पहले ही रविशंकर अपने छोटे भाई की शादी के जश्न में डूबे थे और बारात में जमकर डांस कर रहे थे। लेकिन उस मुस्कान के पीछे “प्रशासनिक प्रताड़ना” का जो दर्द छिपा था, उसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा होगा।

    पुलिस की शुरुआती जांच में घटनास्थल से तीन मोबाइल फोन और एक “ओरिजिनल सुसाइड नोट” बरामद हुआ है, जिसने जिले के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है। सुसाइड नोट में रविशंकर ने स्पष्ट रूप से नायब तहसीलदार “सविता राठौर” पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मृतक पटवारी ने लिखा कि उन पर न केवल काम का अनुचित दबाव बनाया जा रहा था, बल्कि उन्हें “गलत काम” करने के लिए भी मजबूर किया गया। सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि छोटे भाई की शादी जैसे महत्वपूर्ण पारिवारिक आयोजन के लिए भी उन्हें छुट्टी नहीं दी गई और उन्हें बार-बार नोटिस देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

    घटना की पृष्ठभूमि को खंगालने पर पता चलता है कि अप्रैल माह के दौरान रविशंकर को महज 4 दिनों के भीतर “तीन कारण बताओ नोटिस” थमाए गए थे। ये नोटिस 6 अप्रैल, 8 अप्रैल और 9 अप्रैल को जारी किए गए थे, जिनमें जमीन नामांतरण और सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों जैसे मामलों में लापरवाही का हवाला दिया गया था। सुसाइड से कुछ घंटे पहले रविशंकर ने पटवारी संघ के व्हाट्सएप ग्रुप में एक भावुक मैसेज भी किया था, जिसमें उन्होंने पूछा था, “मेरे साथ कितने पटवारी मेरा सपोर्ट करेंगे?” इसके बाद उन्होंने तहसील अध्यक्ष को अपना सुसाइड नोट भेजा और फिर कभी किसी का फोन नहीं उठाया।

    रविशंकर के परिवार की कहानी भी कम दुखद नहीं है। उनके पिता रकमेश्वर खराड़ी भी पटवारी थे, जिनकी दिसंबर 2023 में “हार्ट अटैक” से मौत हो गई थी। पिता की मृत्यु के बाद ही रविशंकर को “अनुकंपा नियुक्ति” मिली थी। अभी उन्हें नौकरी ज्वाइन किए महज चार महीने ही हुए थे। रविशंकर की एक 4 साल की छोटी बेटी है और उनकी पत्नी वर्तमान में “प्रेग्नेंट” हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी रविशंकर के कंधों पर थी, लेकिन अधिकारियों के कथित उत्पीड़न ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया कि उन्होंने अपनी और अपने अजन्मे बच्चे की परवाह किए बिना यह आत्मघाती कदम उठा लिया।

    इस घटना के बाद आक्रोशित परिजनों और पटवारी संघ ने मेडिकल कॉलेज में करीब “7 घंटे तक धरना” दिया। सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए और नायब तहसीलदार के खिलाफ “हत्या का केस” दर्ज करने की मांग की। मामले की गंभीरता और बढ़ते जन आक्रोश को देखते हुए कलेक्टर ने तत्काल कार्रवाई करते हुए नायब तहसीलदार सविता राठौर को “निलंबित” कर दिया है। फिलहाल पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है और मृतक के पास से मिले डिजिटल सबूतों और रिकॉर्डिंग्स को खंगाला जा रहा है ताकि इस सुसाइड मिस्ट्री की पूरी सच्चाई सामने आ सके।

  • सीएम हाउस के पास प्रदर्शन पर सख्ती भोपाल के प्रमुख चौराहे दो महीने के लिए प्रतिबंधित

    सीएम हाउस के पास प्रदर्शन पर सख्ती भोपाल के प्रमुख चौराहे दो महीने के लिए प्रतिबंधित


    भोपाल । भोपाल शहर में कानून व्यवस्था और यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया गया है। पुलिस आयुक्त द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 163 के तहत आदेश जारी करते हुए शहर के प्रमुख और अत्यधिक व्यस्त चौराहों पर धरना प्रदर्शन और पुतला दहन जैसे आयोजनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस आदेश के तहत पॉलिटेक्निक चौराहा आकाशवाणी चौराहा और किलोल पार्क चौराहा सहित आसपास के क्षेत्रों को प्रतिबंधित घोषित किया गया है।

    यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब इन स्थानों पर लगातार बढ़ती गतिविधियों के कारण यातायात व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा था। प्रशासन का मानना है कि ये चौराहे शहर के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों से जुड़े हुए हैं जहां से एयरपोर्ट और हमीदिया अस्पताल जैसे प्रमुख स्थानों तक आवागमन होता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का धरना प्रदर्शन या आंदोलन न केवल आम नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बनता है बल्कि आपातकालीन सेवाओं के संचालन में भी बाधा उत्पन्न करता है।

    पुलिस द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इन क्षेत्रों में अक्सर विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा प्रदर्शन की अनुमति मांगी जाती रही है लेकिन यहां वैकल्पिक मार्गों की कमी के चलते हर बार शहर की यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। यही वजह है कि प्रशासन को यह सख्त कदम उठाना पड़ा है ताकि शहर में अनावश्यक जाम और अव्यवस्था को रोका जा सके।

    आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है और आगामी दो महीनों तक प्रभावी रहेगा। इस अवधि के दौरान इन चौराहों पर किसी भी प्रकार का धरना प्रदर्शन हड़ताल या पुतला दहन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। प्रशासन ने साफ कर दिया है कि इस आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    इस फैसले को शहर में ट्रैफिक प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जहां एक ओर आम नागरिकों को राहत मिलने की उम्मीद है वहीं दूसरी ओर यह भी सवाल उठ रहा है कि प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थानों की व्यवस्था किस तरह की जाएगी।

    कुल मिलाकर यह आदेश प्रशासन की उस प्राथमिकता को दर्शाता है जिसमें शहर की सुचारू व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस निर्णय का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव पड़ता है और क्या इससे भोपाल की यातायात व्यवस्था में वास्तविक सुधार देखने को मिलता है।

  • नोटिस पर पलटवार: BJP विधायक चिंतामणि का सवाल-CM का क्या? Ujjain में सियासी घमासान

    नोटिस पर पलटवार: BJP विधायक चिंतामणि का सवाल-CM का क्या? Ujjain में सियासी घमासान


    नई दिल्ली । उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय में सरकारी आवास खाली कराने की कार्रवाई ने राजनीतिक रंग ले लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बंगलों पर वर्षों से काबिज लोगों को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब यह मुद्दा सीधे सत्ता और संगठन तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि नोटिस मिलते ही भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री के आवास पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे ‘कब्जा पॉलिटिक्स’ और गरमा गई है।
    6 लोगों को नोटिस, एक महीने की मोहलत
    विश्वविद्यालय के कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने बताया कि हाल ही में हुई कार्यपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जिन लोगों का विश्वविद्यालय से कोई सीधा संबंध नहीं है, उनसे आवास खाली कराया जाएगा। इसी के तहत आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय सहित करीब 6 लोगों को नोटिस जारी कर एक महीने के भीतर
    बंगले खाली करने के निर्देश दिए गए हैं।
    जानकारी के मुताबिक, इन आवासों में पूर्व पुलिस अधिकारी, शिक्षक और अन्य लोग भी शामिल हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि इन कब्जों के कारण वास्तविक कर्मचारियों को आवास नहीं मिल पा रहा है, जबकि 50 से ज्यादा कर्मचारी लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं।
    विधायक का पलटवार: “सीएम का क्या?”
    नोटिस मिलते ही विधायक चिंतामणि मालवीय ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव स्वयं कुलपति का बंगला उपयोग कर रहे हैं, तो फिर बाकी लोगों पर कार्रवाई क्यों? उन्होंने इसे “नैतिक सवाल” बताते हुए कहा कि वे भी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं।
    मालवीय ने यह भी दावा किया कि उनका विश्वविद्यालय से वित्तीय हिसाब लंबित है। उन्होंने बताया कि 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने करीब 9 लाख रुपए जमा किए थे और जब तक पूरा हिसाब नहीं हो जाता, तब तक आवास खाली करना उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि अगर गहराई से जांच हुई तो मामला लंबा खिंच सकता है।
    प्रशासन का पक्ष: कर्मचारियों को प्राथमिकता
    कुलगुरु अर्पण भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय के आवास केवल कर्मचारियों के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कई कर्मचारी जर्जर भवनों में रहने को मजबूर हैं, जबकि अच्छे आवास बाहरी लोगों के कब्जे में हैं। प्रशासन ने यह भी योजना बनाई है कि 21 जर्जर भवनों को हटाकर नई व्यवस्था विकसित की जाएगी।
    सीएम आवास पर भी उठे सवाल
    विवाद का एक बड़ा कारण मुख्यमंत्री को आवंटित कुलपति का बंगला भी बना हुआ है। जानकारी के अनुसार, उज्जैन के देवास रोड स्थित यह बंगला मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव के लिए तैयार कराया गया था और वे उज्जैन प्रवास के दौरान अक्सर वहीं रुकते हैं। इसी को आधार बनाकर विधायक ने सवाल उठाए हैं, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया है।
    सियासी तापमान बढ़ा
    यह पूरा विवाद अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। एक ओर विश्वविद्यालय नियमों का हवाला देकर आवास खाली कराने पर अड़ा है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि इसे चयनात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या विधायक नोटिस का पालन करेंगे या यह मामला और बड़े सियासी टकराव में बदलेगा।

  • ट्रंप का नया प्लान: ‘दोस्त’ और ‘कमजोर सहयोगी’ देशों की बनेगी लिस्ट, क्या बदल जाएगी US की नीति?

    ट्रंप का नया प्लान: ‘दोस्त’ और ‘कमजोर सहयोगी’ देशों की बनेगी लिस्ट, क्या बदल जाएगी US की नीति?


    वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी सख्त विदेश नीति को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ऐसे देशों की सूची तैयार कर रहा है जिन्होंने हालिया तनाव के दौरान उसका साथ नहीं दिया। साथ ही, उन देशों की अलग लिस्ट भी बनाई जा रही है जो वॉशिंगटन के साथ मजबूती से खड़े रहे।

    क्या है पूरा मामला?

    रिपोर्ट के अनुसार, नाटो सदस्य देशों के योगदान का आकलन किया जा रहा है। इस आधार पर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की योजना है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि किन देशों को “अच्छे” और किन्हें “कमजोर” सहयोगी माना जाएगा।

    NATO प्रमुख की अहम यात्रा

    इस बीच NATO प्रमुख मार्क रुट्टे की वॉशिंगटन यात्रा प्रस्तावित है। बताया जा रहा है कि इस दौरे से पहले ही अमेरिकी अधिकारी एक रणनीति तैयार कर रहे हैं, जिसमें हर देश की भूमिका और योगदान का पूरा ब्योरा शामिल होगा।

    पहले भी दिया गया था संकेत

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दिसंबर में ही इशारा दिया था कि:

    इज़रायल
    दक्षिण कोरिया
    पोलैंड
    जर्मनी
    बाल्टिक देश

    जैसे सहयोगियों को प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं, जो देश अपेक्षा पर खरे नहीं उतरेंगे, उन्हें “परिणाम भुगतने” पड़ सकते हैं।

    कौन हो सकता है ‘फेवरेट’?

    सूत्रों के अनुसार:

    रोमानिया और पोलैंड अमेरिका की “अच्छी सूची” में हो सकते हैं
    पोलैंड नाटो में रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में है और वहां 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं
    रोमानिया ने अपने मिहैल कोगलनीसिएनु एयर बेस का विस्तार कर अमेरिका को सैन्य उपयोग की अनुमति दी है
    क्या हो सकता है असर?

    इस योजना के तहत अमेरिका:

    “कमजोर सहयोगियों” से अपनी सेना या सैन्य अभ्यास कम कर सकता है
    हथियारों की सप्लाई घटा सकता है
    “मजबूत सहयोगियों” को ज्यादा सैन्य और रणनीतिक फायदे दे सकता है

    अगर यह योजना लागू होती है, तो यह वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। अमेरिका की “रिवार्ड और पनिशमेंट” नीति नाटो के भीतर संतुलन को प्रभावित कर सकती है और सहयोगी देशों के बीच नई प्रतिस्पर्धा भी पैदा कर सकती है।

  • गेहूं खरीदी में नया रिकॉर्ड संभव एमपी सरकार ने केंद्र से बढ़ाया कोटा मांग

    गेहूं खरीदी में नया रिकॉर्ड संभव एमपी सरकार ने केंद्र से बढ़ाया कोटा मांग


    भोपाल । भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं खरीदी को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार से निर्धारित लक्ष्य बढ़ाने की मांग की है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जानकारी देते हुए कहा कि प्रदेश में इस बार गेहूं का उत्पादन काफी अच्छा हुआ है और मौजूदा लक्ष्य से अधिक खरीदी होने की पूरी संभावना है। ऐसे में किसानों को पूरा लाभ दिलाने के लिए केंद्र से कोटा बढ़ाने को लेकर लगातार संवाद किया जा रहा है।

    रबी विपणन वर्ष 2026 27 के लिए केंद्र सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन प्रदेश में बंपर पैदावार और किसानों की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए यह लक्ष्य कम पड़ता नजर आ रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि यदि लक्ष्य नहीं बढ़ाया गया तो कई किसानों को समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने का अवसर नहीं मिल पाएगा।

    मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार किसानों के हितों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और खरीदी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है। पहले छोटे किसानों से गेहूं खरीदा जा रहा है इसके बाद मध्यम और अंत में बड़े किसानों की बारी आएगी ताकि सभी वर्गों को समान अवसर मिल सके।

    इस वर्ष गेहूं उपार्जन के लिए किसानों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। करीब 19 लाख 4 हजार किसानों ने पंजीयन कराया है जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 3 लाख अधिक है। अब तक 2 लाख 21 हजार 455 किसानों से 95 लाख 17 हजार 550 क्विंटल गेहूं की खरीदी की जा चुकी है। इसमें से 75 लाख 57 हजार 580 क्विंटल गेहूं का परिवहन भी किया जा चुका है जिससे भंडारण व्यवस्था पर दबाव कम हुआ है।

    सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर गेहूं बेचने वाले किसानों को तेजी से भुगतान भी किया जा रहा है। अब तक 1 लाख 6 हजार 55 किसानों को 1091 करोड़ रुपये से अधिक की राशि उनके खातों में ट्रांसफर की जा चुकी है। यह पहल किसानों के विश्वास को मजबूत करने और खरीदी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर भी इस प्रक्रिया पर पड़ा है। पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थितियों के कारण शुरुआती दौर में बारदानों की उपलब्धता चुनौती बनी रही लेकिन सरकार ने समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था कर स्थिति को संभाल लिया। जूट के नए बारदानों के साथ साथ पीपी बैग और पुनः उपयोग योग्य बारदानों का उपयोग किया गया जिससे खरीदी प्रक्रिया प्रभावित नहीं हुई।

    वर्तमान में किसानों से 2585 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य के साथ 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस जोड़कर कुल 2625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं खरीदा जा रहा है। यह दर किसानों को बेहतर आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में मददगार साबित हो रही है।

    प्रदेश सरकार का यह कदम न केवल किसानों को आर्थिक मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण है बल्कि यह भी दर्शाता है कि बेहतर उत्पादन के साथ नीति स्तर पर त्वरित निर्णय कितने जरूरी होते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार राज्य की इस मांग पर क्या निर्णय लेती है और क्या वास्तव में गेहूं खरीदी का लक्ष्य बढ़ाया जाता है

  • संसद में विवाद के बाद जनरल नरवणे की नई किताब लॉन्च, फिर सेना पर फोकस

    संसद में विवाद के बाद जनरल नरवणे की नई किताब लॉन्च, फिर सेना पर फोकस

    नई दिल्ली। जनरल एम.एम. नरवणे एक बार फिर अपनी नई किताब को लेकर चर्चा में हैं। संसद में उनकी पिछली किताब को लेकर हुए विवाद के बाद अब उन्होंने नई नॉन-फिक्शन पुस्तक ‘The Curious and the Classified: Unearthing Military Myths and Mysteries’ लॉन्च की है, जिसका फोकस भी सेना से जुड़े विषयों पर ही है।

    क्या है नई किताब में खास?
    प्रकाशक रूपा पब्लिकेशंस के मुताबिक, इस किताब में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े कई रोचक किस्से, रहस्य और परंपराओं को सामने लाया गया है।
    यह किताब सैन्य इतिहास और उससे जुड़े मिथकों की गहराई से पड़ताल करती है, साथ ही सैनिकों की जिज्ञासा और साहस की कहानियों को उजागर करती है।

    शशि थरूर से क्या है कनेक्शन?
    इस किताब की प्रेरणा का एक दिलचस्प पहलू भी सामने आया है। जनरल नरवणे ने बताया कि उन्हें यह किताब लिखने का विचार शशि थरूर की किताब ‘A Wonderland of Words’ पढ़ने के बाद आया।
    उन्होंने प्रस्तावना में भी इसका जिक्र किया है कि कैसे थरूर की लेखनी ने उन्हें नई किताब लिखने के लिए प्रेरित किया।

    पहले भी हो चुका है विवाद
    इससे पहले जनरल नरवणे की संस्मरण आधारित किताब ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर संसद में बड़ा विवाद हुआ था।

    राहुल गांधी ने संसद में इस अप्रकाशित किताब के कुछ हिस्सों का जिक्र किया था

    इसके बाद स्पीकर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया

    पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया था कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है और उसके अधिकार उनके पास हैं

    क्यों चर्चा में है नई किताब?
    नई किताब भले ही संस्मरण नहीं है, लेकिन सैन्य विषयों पर आधारित होने के कारण यह फिर से चर्चा में है। खासकर उस विवाद के बाद, जिसमें सेना से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गए थे।

    जनरल नरवणे की नई किताब सैन्य दुनिया के अनछुए पहलुओं को सामने लाने की कोशिश करती है। साथ ही, थरूर से मिला प्रेरणा का कनेक्शन इसे और दिलचस्प बनाता है। अब देखना होगा कि यह किताब पाठकों के बीच कितना प्रभाव छोड़ती है।

  • बुलंदशहर से शुरू हुआ सफर और करोड़ों दिलों पर किया राज; महज 30 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गईं मशहूर अदाकारा।

    बुलंदशहर से शुरू हुआ सफर और करोड़ों दिलों पर किया राज; महज 30 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गईं मशहूर अदाकारा।


    नई दिल्ली ।क्षेत्रीय मनोरंजन जगत से एक बेहद दुखद और विचलित कर देने वाली खबर सामने आई है। अपनी बेहतरीन अदाकारी और नृत्य कौशल से करोड़ों दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाली मशहूर अभिनेत्री दिव्यांका सिरोही अब हमारे बीच नहीं रहीं। महज 30 वर्ष की अल्पायु में हृदय गति रुकने के कारण उनका आकस्मिक निधन हो गया है। इस खबर ने न केवल उनके परिवार को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि उन तमाम प्रशंसकों को भी गहरे सदमे में डाल दिया है जो उन्हें भविष्य के एक बड़े सितारे के रूप में देख रहे थे। अभिनेत्री के निधन की जानकारी मिलते ही सोशल मीडिया पर शोक संवेदनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा है।

    दिव्यांका की मृत्यु के बाद उनका एक पुराना संदेश तेजी से चर्चा में आ गया है, जिसे पढ़कर हर किसी का दिल भर आ रहा है। कुछ समय पहले साझा किए गए इस संदेश में दिव्यांका ने ईश्वर के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की थी। मरून रंग की पगड़ी पहने हुए अपनी एक तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा था कि महादेव उन्हें अपने साथ ले चलें। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि उनकी यह आध्यात्मिक पुकार इतनी जल्दी और इस रूप में सच हो जाएगी। आज उनके चाहने वाले उसी संदेश को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। प्रशंसकों का कहना है कि एक प्रतिभावान कलाकार का इस तरह जाना पूरी इंडस्ट्री के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

    उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जन्मी दिव्यांका का जीवन सपनों को हकीकत में बदलने की एक कहानी रहा है। उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा में एमबीए की डिग्री भी हासिल की थी। शिक्षित और जागरूक होने के बावजूद उनका रुझान हमेशा से अभिनय की ओर रहा। बचपन से ही कला के प्रति समर्पित दिव्यांका ने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए की थी, जहाँ उनकी प्रतिभा को दर्शकों का भरपूर समर्थन मिला। इसी लोकप्रियता ने उनके लिए संगीत और अभिनय की दुनिया के दरवाजे खोल दिए, जिसके बाद उन्होंने दर्जनों प्रसिद्ध प्रोजेक्ट्स में अपनी छाप छोड़ी।

    दिव्यांका ने अपने करियर के दौरान 50 से अधिक संगीत वीडियो में काम किया और कई स्थापित कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि डिजिटल जगत में उनके चाहने वालों की संख्या करोड़ों में पहुँच गई थी। जानकारी के अनुसार, अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इतनी कम उम्र में इस तरह के हादसे ने स्वास्थ्य के प्रति भी लोगों को चिंता में डाल दिया है। एक सक्रिय और ऊर्जावान कलाकार का इस तरह चले जाना सभी को खटक रहा है।

    दिव्यांका सिरोही की अंतिम विदाई की प्रक्रिया उनके निवास स्थान के पास संपन्न होगी, जहाँ कला जगत के कई लोग और उनके प्रशंसक उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुँचेंगे। एक हंसमुख और सकारात्मक व्यक्तित्व के रूप में पहचानी जाने वाली दिव्यांका की कमी हमेशा महसूस की जाएगी। उन्होंने हमेशा अपनी कला के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करने का लक्ष्य रखा था। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अदाकारी और उनकी यादें उनके करोड़ों चाहने वालों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी। क्षेत्रीय सिनेमा ने निश्चित रूप से एक बहुत ही होनहार और समर्पित कलाकार को खो दिया है।

  • DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला


    अहमदाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि डीएनए जांच से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के पालन-पोषण के लिए गुजारा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता—even अगर बच्चे का जन्म विवाह के दौरान ही क्यों न हुआ हो।

    क्या है मामला?

    यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया।

    अदालत महिला की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

    कोर्ट ने क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि:

    डीएनए टेस्ट से यदि पितृत्व खारिज हो जाता है, तो गुजारा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता
    वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA) को कानूनी अनुमान से अधिक महत्व मिलेगा
    संबंधित व्यक्ति ने खुद टेस्ट के लिए सहमति दी थी और रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं उठाई
    पुराने फैसलों का भी जिक्र

    अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण मामलों का हवाला दिया, जैसे:

    अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया
    इवान रतिनम बनाम मिलान जोसेफ
    नंदलाल बडवाइक बनाम लता बडवाइक

    इन मामलों में कोर्ट ने पहले भी कहा था कि डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत सावधानी से दिया जाना चाहिए।

    हालांकि, मौजूदा केस में टेस्ट पहले ही हो चुका था और उसकी रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए इसे निर्णायक माना गया।

    कानून बनाम विज्ञान

    अदालत ने माना कि जब वैज्ञानिक प्रमाण और कानूनी अनुमान (जैसे विवाह के दौरान जन्मे बच्चे का पिता पति माना जाना) के बीच टकराव हो, तो विज्ञान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    महिला को क्या राहत मिली?

    हालांकि महिला की अपील खारिज कर दी गई, लेकिन कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि बच्चे की स्थिति का आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराई जाए।

    पूरा मामला समझिए
    दंपति की शादी 2016 में हुई
    विवाद के बाद महिला ने बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांगा
    पति ने डीएनए टेस्ट की मांग की
    रिपोर्ट में वह बच्चे का जैविक पिता नहीं निकला
    ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने गुजारा देने से इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे साफ संदेश गया है कि पितृत्व से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

  • सबूतों की कमी पर सख्ती: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा -बिना ठोस आधार नहीं चलेगा केस, असीमानंद के बयान पर उठे सवाल

    सबूतों की कमी पर सख्ती: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा -बिना ठोस आधार नहीं चलेगा केस, असीमानंद के बयान पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । 2006 मालेगांव ब्लास्ट से जुड़े बहुचर्चित मामले में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। Bombay High Court ने बुधवार को इस केस में चल रही स्पेशल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी। कोर्ट के इस फैसले से महू के लोकेश शर्मा, देपालपुर के राजेंद्र चौधरी समेत धनसिंह और मनोहर नरवरिया को राहत मिली है। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि बिना ठोस और पुख्ता सबूतों के किसी भी मामले को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
    कमजोर साक्ष्यों पर उठे सवाल
    सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकील कौशिक म्हात्रे ने कोर्ट में दलील दी कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस बयान के आधार पर केस दर्ज किया गया, वह खुद विवादों में रहा है। यह बयान स्वामी असीमानंद का था, जिसे बाद में उन्होंने दबाव में दिया गया बताते हुए वापस ले लिया था। कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए माना कि ऐसे आधार पर आरोप तय करना न्यायसंगत नहीं है।
    NIA की चार्जशीट पर भी सवाल
    इस मामले की जांच National Investigation Agency (NIA) द्वारा की गई थी। एजेंसी ने लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि चार्जशीट में पेश किए गए साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि ट्रायल को जारी रखा जाए।
    6 साल जेल में रहे आरोपी
    बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि दोनों मुख्य आरोपी 2013 में गिरफ्तार हुए थे और करीब 6 साल तक जेल में रहे। 2019 में उन्हें जमानत मिली थी। उस समय भी कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि बिना ट्रायल इतने लंबे समय तक किसी को जेल में रखना उचित नहीं है। अब एक बार फिर कोर्ट ने आरोपियों को राहत देते हुए ट्रायल पर रोक लगा दी है।
    क्या था पूरा मामला?
    8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव शहर में सिलसिलेवार चार बम धमाके हुए थे। ये धमाके बेहद संवेदनशील स्थानों हमीदिया मस्जिद और कब्रिस्तान के पास शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद हुए थे। इस दर्दनाक घटना में 31 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
    जांच में कई मोड़
    शुरुआत में मामले की जांच एटीएस ने की और 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया, जिन्हें 2016 में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। बाद में जांच Central Bureau of Investigation (CBI) और फिर NIA को सौंप दी गई। जांच एजेंसियों ने बाद में इस मामले में अलग दिशा में जांच करते हुए दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया।
    आगे क्या?
    सितंबर 2025 में स्पेशल कोर्ट ने चारों आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद केस की दिशा बदलती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि जांच एजेंसियां नए सिरे से सबूत पेश कर पाती हैं या मामला यहीं ठहर जाता है।

  • प्रशासनिक लापरवाही पर CAT की टिप्पणी, देरी से प्रभावित पुलिस अधिकारियों को मिली राहत

    प्रशासनिक लापरवाही पर CAT की टिप्पणी, देरी से प्रभावित पुलिस अधिकारियों को मिली राहत


    जबलपुर । जबलपुर में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण CAT ने एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह मामला उन पुलिस अधिकारियों से जुड़ा है जिन्होंने वर्षों की सेवा के बावजूद भारतीय पुलिस सेवा में अपने चयन के अवसर से वंचित होने का आरोप लगाया है। आवेदक जितेन्द्र सिंह सत्येंद्र सिंह तोमर और मुकेश कुमार वैश्य ने अधिकरण के समक्ष याचिका दायर कर यह मांग की थी कि 56 वर्ष की आयु सीमा पार करने के बावजूद उनके अभ्यर्थित्व पर विचार किया जाए।

    याचिका में स्पष्ट रूप से बताया गया कि सरकार द्वारा हर पांच वर्ष में किया जाने वाला अनिवार्य कैडर रिव्यू समय पर नहीं किया गया। वर्ष 2018 में प्रस्तावित यह प्रक्रिया 2022 में पूरी हुई जिससे चार वर्षों की देरी हुई। इस देरी का सीधा असर उन अधिकारियों पर पड़ा जो उस दौरान आयु सीमा पार कर गए और चयन प्रक्रिया में शामिल होने के पात्र नहीं रह गए। आवेदकों का कहना है कि यदि कैडर रिव्यू समय पर हो जाता तो वे नियमों के तहत भारतीय पुलिस सेवा में चयन के लिए पात्र होते।

    इन अधिकारियों ने यह भी बताया कि वे 26 से 27 वर्षों की लंबी सेवा दे चुके हैं और अनुभव के आधार पर पूरी तरह योग्य हैं। इसके बावजूद उन्हें अब तक चयन का अवसर नहीं मिल सका। उनके अनुसार यह स्थिति न केवल उनके अधिकारों का हनन है बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करती है।

    मामले में आवेदकों की ओर से अधिवक्ता पंकज दुबे और अक्षय खंडेलवाल ने जोरदार पैरवी की। उन्होंने अधिकरण के समक्ष यह दलील रखी कि कैडर रिव्यू में हुई देरी पूरी तरह से सरकारी तंत्र की विफलता है और इसका खामियाजा आवेदकों को नहीं भुगतना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण योग्य अधिकारियों को अवसर से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।

    दलीलों को सुनने के बाद CAT ने प्रथम दृष्टया मामला आवेदकों के पक्ष में बनता हुआ पाया और उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की। अधिकरण ने आदेश दिया कि फिलहाल यथास्थिति बनाए रखी जाए और इस संबंध में केंद्र एवं राज्य सरकार से जवाब मांगा जाए। यह आदेश आवेदकों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इससे उनके मामले को आगे सुनवाई में मजबूती मिलेगी।

    यह फैसला केवल तीन अधिकारियों तक सीमित नहीं है बल्कि यह उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है जहां प्रशासनिक देरी के कारण कर्मचारियों के अधिकार प्रभावित होते हैं। CAT का यह रुख यह दर्शाता है कि न्यायिक संस्थाएं अब ऐसी लापरवाहियों को गंभीरता से ले रही हैं और प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

    अब सभी की नजरें केंद्र और राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि सरकार इस मामले में क्या रुख अपनाती है और भविष्य में ऐसी देरी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।