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पाक-सऊदी रक्षा समझौते का प्रभाव
भारत और GCC के बीच बातचीत उस समय शुरू हो रही है जब क्षेत्रीय भू-राजनीति जटिल है। सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ‘सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौता’SMDA पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य गतिरोधऑपरेशन सिंदूर के कुछ महीनों बाद हुआ। अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर हमला किया था।
UAE और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव
जहां पाकिस्तान-सऊदी नजदीकियां बढ़ रही हैं वहीं UAE और पाकिस्तान के संबंधों में खटास देखी जा रही है। UAE ने पाकिस्तान के साथ एक विमानतल प्रबंधन सौदा रद्द कर दिया। एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार यह सौदा स्थगित किया गया क्योंकि पाकिस्तान ने स्थानीय साझेदार का नाम नहीं भेजा।
विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौते के बाद UAE-पाकिस्तान दूरी बढ़ी है।
भारत-UAE के बढ़ते संबंध
UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की दिल्ली यात्रा ने भारत-UAE संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। यात्रा के कुछ घंटों बाद दोनों देशों ने 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार $200 बिलियन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा। खाड़ी देशों में UAE और सऊदी अरब भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार हैं।विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की रणनीतिक साझेदारी और UAE के साथ भारत के बढ़ते संबंध खाड़ी देशों की प्राथमिकताओं में बदलाव को दिखाते हैं।

इस कदम से श्रीलंका को भी आर्थिक और लॉजिस्टिकल नुकसान होने की संभावना है। ऐसे में श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने पाकिस्तान को दो पेज का पत्र भेजा, जिसमें 2009 के आतंकी हमले और पाकिस्तान के कठिन समय में श्रीलंका के समर्थन को याद दिलाया गया। SLC ने PCB से इस मामले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया।
पत्र में कहा गया है कि अगर निर्धारित मैच नहीं होते, तो को-होस्ट देशों को वित्तीय, लॉजिस्टिकल और प्रतिष्ठान से जुड़ा बड़ा नुकसान होगा। SLC ने स्पष्ट किया कि ICC T20 वर्ल्ड कप 2026 के लिए श्रीलंका पूरी तरह तैयार है और भारत-पाकिस्तान मैच के लिए टिकट बिक्री पहले ही तेज गति से हो चुकी है।
SLC ने अपने पत्र में लिखा, श्रीलंका ICC पुरुष T20 वर्ल्ड कप 2026 का बेसब्री से इंतजार कर रहा है। होस्ट वेन्यू के रूप में हमने कमर्शियल, ऑपरेशनल, लॉजिस्टिकल और सुरक्षा से जुड़े सभी इंतजाम पहले ही पूरे कर लिए हैं। इस मैच में हॉस्पिटैलिटी प्लानिंग और टिकट बिक्री भी शामिल है। निर्धारित मैचों में भाग न लेने के दूरगामी नतीजे होंगे, जिसमें बड़े वित्तीय नुकसान और टूर्नामेंट की इंटरनेशनल अपील कम होना शामिल है।”
श्रीलंका सरकार भी संभावित बॉयकॉट के असर पर नजर रख रही है, क्योंकि इन मैचों की मेजबानी से बड़ी आर्थिक उम्मीदें जुड़ी हैं। SLC ने पत्र में यह भी याद दिलाया कि श्रीलंका ने कई बार पाकिस्तान का दौरा किया है, कठिन सुरक्षा परिस्थितियों और हमलों के बावजूद इंटरनेशनल मैचों में हिस्सा लिया। इसमें नेशनल टीम के काफिले पर हुए हमले भी शामिल हैं, जिनसे खिलाड़ियों और अधिकारियों को शारीरिक और मानसिक चोटें आईं।
SLC ने PCB से सम्मानपूर्वक अनुरोध किया कि 15 फरवरी को भारत-पाकिस्तान मैच में भाग न लेने के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए। पत्र में जोर दिया गया कि क्रिकेट के व्यापक हित, दोनों बोर्डों के बीच सहयोग और खेल भावना को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान टीम निर्धारित सभी मैचों में शामिल हो। अंत में SLC ने PCB और पाकिस्तान सरकार को धन्यवाद देते हुए शीघ्र सकारात्मक प्रतिक्रिया की उम्मीद जताई।

साल 2000 में फिल्म ‘रिफ्यूजी’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिषेक ने स्वीकार किया कि 25 साल बीत जाने के बाद भी पिता से उनकी तुलना का दबाव कम नहीं हुआ है। अब 50 वर्ष के हो चुके अभिनेता ने माना कि लगातार मिलती सार्वजनिक असफलताएं और आलोचनाएं किसी भी इंसान को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि जब आप हफ्ते दर हफ्ते जनता के बीच असफल साबित होते हैं, तो नकारात्मकता से दूर रहना और निराशावादी न होना बेहद मुश्किल हो जाता है। हालांकि, उन्होंने कड़वाहट पालने के बजाय हमेशा अपने काम पर ध्यान देने और अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है।
अमिताभ बच्चन द्वारा उनकी प्रशंसा किए जाने पर अभिषेक ने बहुत ही मानवीय दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि दुनिया अक्सर उनके पिता को एक ‘लार्जर देन लाइफ’ व्यक्तित्व के रूप में देखती है और मानती है कि उन्हें एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करने की अनुमति नहीं है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वह भी एक इंसान हैं, एक पिता हैं और एक दादा हैं। उन्हें भी अपने बच्चों की उपलब्धि पर गर्व महसूस करने और एक सामान्य माता-पिता की तरह प्रतिक्रिया देने का पूरा हक है।
अभिषेक ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके माता-पिता, अमिताभ और जया बच्चन, उनके बॉक्स ऑफिस आंकड़ों के बजाय उनकी मेहनत और प्रयासों पर गर्व करते हैं। उनके लिए सफलता का पैमाना हिट फिल्में नहीं, बल्कि ईमानदारी से किया गया काम है। वर्कफ्रंट की बात करें तो हाल ही में ‘हाउसफुल 5’ में नजर आए अभिषेक अब बड़े पर्दे पर धमाका करने को तैयार हैं। वह शाहरुख खान और सुहाना खान की बहुचर्चित फिल्म ‘किंग’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखेंगे, जिससे दर्शकों को काफी उम्मीदें हैं।

पिंकविला की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, फराह खान ने शाहरुख के सामने एक ऐसा कॉन्सेप्ट रखा है जिसमें सुपरस्टार दो विपरीत किरदारों को पर्दे पर जीवंत करेंगे। दिलचस्प बात यह है कि इस सीक्वल का मूल विचार खुद शाहरुख खान ने ही दिया है। फिल्म की कहानी में देशभक्ति का जज्बा, हाई-वोल्टेज एक्शन और वही सिग्नेचर कॉमेडी होगी जिसके लिए पहली फिल्म जानी जाती थी। सूत्र बताते हैं कि फिल्म में भारत के सामने आने वाली एक नई और बड़ी धमकी को दिखाया जाएगा, जिससे निपटने के लिए पुरानी स्टार कास्ट एक बार फिर साथ आ सकती है।
हालांकि, फैंस को थोड़ा इंतजार करना होगा क्योंकि शाहरुख खान फिलहाल अपनी आगामी फिल्म किंग की शूटिंग में व्यस्त हैं। बताया जा रहा है कि किंग की रिलीज के बाद ही वह फराह खान से मैं हूं ना 2 की पूरी स्क्रिप्ट सुनेंगे और उसके बाद ही इस पर अंतिम मुहर लगाएंगे। किंग फिल्म भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है क्योंकि इसमें शाहरुख पहली बार अपनी बेटी सुहाना खान के साथ स्क्रीन शेयर करते दिखेंगे। साथ ही इस फिल्म में दीपिका पादुकोण, अभिषेक बच्चन और अनिल कपूर जैसे बड़े सितारे भी नजर आएंगे।
शाहरुख और फराह की जोड़ी ने इससे पहले मैं हूं नाओम शांति ओम और हैप्पी न्यू ईयर जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं। ऐसे में मैं हूं ना 2 की घोषणा ने दर्शकों की उम्मीदों को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। फैंस का कहना है कि शाहरुख को दोबारा मेजर राम प्रसाद शर्मा के अंदाज में देखना किसी सपने के सच होने जैसा होगा, और ऊपर से डबल रोल का तड़का फिल्म को ब्लॉकबस्टर बनाने के लिए काफी है। अब देखना यह होगा कि कब आधिकारिक तौर पर इस प्रोजेक्ट का ऐलान होता है और किंग खान एक बार फिर बॉक्स ऑफिस पर अपना जादू बिखेरते हैं।

महानायक अमिताभ बच्चन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। साल 1984 में उन्होंने एक्टिंग से ब्रेक लेकर राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद सीट से रिकॉर्ड जीत दर्ज की। उस वक्त माना जा रहा था कि वह राजनीति में लंबी पारी खेलेंगे लेकिन तीन साल बाद ही 1987 में उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में कई मौकों पर बिग बी ने यह संकेत दिया कि राजनीति उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी।
गोविंदा भी उन स्टार्स में शामिल हैं जिन्होंने राजनीति को लेकर खुलकर पछतावा जताया। साल 2004 में कांग्रेस के टिकट पर मुंबई नॉर्थ से लोकसभा चुनाव जीतने वाले गोविंदा ने 2009 में राजनीति से दूरी बना ली। कई इंटरव्यू में उन्होंने माना कि राजनीति ज्वाइन करना उनके जीवन की एक बड़ी गलती थी।
उर्मिला मातोंडकर ने भी कांग्रेस के साथ राजनीति में एंट्री ली। उन्होंने मुंबई नॉर्थ सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के कुछ ही दिनों बाद उर्मिला ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और राजनीति से पूरी तरह किनारा कर लिया।
साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत ने भले ही चुनाव नहीं लड़ा लेकिन उनकी राजनीतिक घोषणा ने देशभर में हलचल मचा दी थी। 2017 में उन्होंने रजनी मक्कल मंडराम पार्टी बनाने का ऐलान किया मगर 2021 में खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राजनीति में सक्रिय रूप से उतरने से इनकार कर दिया।
संजय दत्त ने भी समाजवादी पार्टी के साथ सियासी सफर शुरू किया था। साल 2008 में पार्टी से जुड़े संजय को जनरल सेक्रेटरी बनाया गया लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने न सिर्फ पद छोड़ा बल्कि पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया।
जावेद जाफरी ने 2014 में आम आदमी पार्टी ज्वाइन की और चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद वे राजनीति में सक्रिय नजर नहीं आए। वहीं शेखर सुमन ने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा हार के बाद 2012 में पार्टी छोड़ दी और बाद में साफ कहा कि वह दोबारा राजनीति में नहीं आएंगे।
मराठी सिनेमा के चर्चित नाम महेश मांजरेकर ने भी 2014 में चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद उनका राजनीतिक सफर वहीं थम गया। इन सभी उदाहरणों से साफ है कि फिल्मों की लोकप्रियता राजनीति में सफलता की गारंटी नहीं होती। राजनीति की जटिलताएं दबाव और जिम्मेदारियां हर किसी के बस की बात नहीं होतीं और यही वजह है कि कई सितारे जल्द ही इस दुनिया से दूरी बना लेते हैं।

ओखला बर्ड सैंक्चुरी
दिल्ली हाट
लाल किला

सभी 13 अखाड़ों का एक सुर में समर्थन आयोजन की सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अखाड़ों के बीच का आपसी समन्वय है। महंत रविंद्र पुरी ने बताया कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ हुई बैठक में सभी 13 अखाड़ों ने एक स्वर में कुंभ के मेगा प्लान का समर्थन किया है। किसी भी स्तर पर कोई विरोध नहीं है। निरंजनी अखाड़े में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है, जहाँ आयोजन की बारीकियों पर चर्चा की जा रही है। इस बार का विशेष आकर्षण निरंजनी अखाड़े द्वारा बनाए गए जापानी महामंडलेश्वर होंगे, जो वैश्विक स्तर पर सनातन धर्म के विस्तार का प्रतीक बनकर उभरेंगे।
प्रयागराज के फैसलों और सुरक्षा पर रुख प्रयागराज कुंभ के दौरान लिए गए कड़े फैसलों और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर बात करते हुए महंत रविंद्र पुरी ने धर्म की शुद्धता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हाल के समय में ‘जूस जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसी घटनाओं ने संतों के मन को विचलित किया है। सनातन धर्म में आहार की शुद्धता सर्वोपरि है, ताकि किसी का धर्म भ्रष्ट न हो।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत में हम सबको एक समान दृष्टि से देखते हैं, लेकिन कुंभ की मर्यादा बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है। 2027 के कुंभ के लिए कौन से नियम और कड़े फैसले लागू होंगे, इसका अंतिम निर्णय सभी 13 अखाड़े सामूहिक बैठक में चर्चा के बाद लेंगे। उचित और अनुचित का विचार कर ही अंतिम गाइडलाइन तैयार की जाएगी।
भव्यता और प्रबंधन की नई मिसाल कुंभ 2027 को लेकर शासन और प्रशासन के साथ मिलकर एक ऐसी रूपरेखा तैयार की जा रही है जिससे श्रद्धालुओं को सुगम और सुरक्षित अनुभव मिल सके। हरिद्वार कुंभ को एक उत्सव के रूप में पेश करने की तैयारी है, जहाँ आस्था के साथ-साथ आधुनिक प्रबंधन का भी संगम देखने को मिलेगा।

रुचि न होने के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारण अक्सर माता-पिता बच्चे की अरुचि को उसका ‘आलस’ मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई गहरे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण ‘परफॉर्मेंस प्रेशर’ होता है। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता खेल में सफल रहे हैं, तो उसे हारने से डर लगने लगता है। उसे लगता है कि अगर वह अच्छा नहीं खेला, तो वह अपने माता-पिता के नाम को छोटा कर देगा। इसके अलावा, खेल के मैदान पर होने वाला सोशल जजमेंट या एंग्जाइटी भी उसे पीछे धकेलती है। कभी-कभी कारण शारीरिक भी होते हैं, जैसे लो-एनर्जी लेवल या किसी खेल विशेष में रुचि की कमी। सख्त कोच का व्यवहार या साथी खिलाड़ियों से लगातार तुलना भी बच्चे के मन में खेल के प्रति नफरत पैदा कर सकती है।
फोर्स करना क्यों हो सकता है खतरनाक? यदि आप बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध मैदान पर भेजते हैं, तो इसके परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं। जबरदस्ती करने से बच्चा न केवल खेल से दूर होगा, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी डगमगा सकता है। दबाव में खेलने से उसमें चिड़चिड़ापन, तनाव और माता-पिता के प्रति विद्रोह की भावना पैदा हो सकती है। खेल जो खुशी और मानसिक शांति का माध्यम होना चाहिए, वह उसके लिए एक ‘बोझ’ बन जाता है। लॉन्ग टर्म में, यह आपके और बच्चे के बीच के भावनात्मक रिश्ते को भी कमजोर कर सकता है।
क्या करें कि वह खेलों में रुचि ले? बतौर पेरेंट्स आपकी पहली जिम्मेदारी यह पहचानना है कि बच्चा किस चीज में ‘बेस्ट’ है। यदि उसे क्रिकेट या फुटबॉल पसंद नहीं, तो शायद उसे तैराकी, बैडमिंटन या चेस जैसा कोई अन्य खेल पसंद आ सकता है। उसे विभिन्न खेलों के विकल्प दें और खुद फैसला करने का मौका दें। घर का माहौल ऐसा रखें जहाँ खेल केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि आनंद और सेहत के लिए खेला जाए।
याद रखें, सही पेरेंटिंग का अर्थ बच्चे को अपनी परछाई बनाना नहीं, बल्कि उसे उसकी अपनी चमक खोजने में मदद करना है। अगर वह खेल में करियर नहीं बनाना चाहता, तो भी उसे फिजिकल एक्टिविटी के अन्य तरीकों जैसे डांस या योग के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उसे स्पोर्ट्स के फायदे बताएं, लेकिन उसे अपनी विरासत ढोने के लिए मजबूर न करें। जब बच्चा खुद को सुरक्षित और बिना किसी जजमेंट के महसूस करेगा, तभी वह अपनी असली प्रतिभा को निखार पाएगा।

शास्त्रों के अनुसार जब दो ग्रह एक-दूसरे से दूसरे और बारहवें भाव की दूरी पर स्थित होते हैं तो इसे द्विद्वादश योग की संज्ञा दी जाती है। इस बार का संयोग इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें बुध की तार्किक बुद्धि और शनि की अनुशासनात्मक ऊर्जा का मिलन हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह योग विशेष रूप से न्याय प्रणाली प्रशासन बड़े व्यापारिक घरानों और रणनीतिक योजना बनाने वाले लोगों के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
इस दुर्लभ ग्रह दशा का सर्वाधिक सकारात्मक प्रभाव पांच विशेष राशियों पर देखने को मिलेगा। वृषभ राशि के जातकों के लिए यह समय किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि उनके लिए नौकरी और व्यापार में अचानक लाभ के द्वार खुल सकते हैं। वर्षों पुराना अटका हुआ निवेश न केवल मुनाफा देगा बल्कि विरोधियों पर आपकी बढ़त भी सुनिश्चित होगी। वहीं कर्क राशि के लोगों के लिए यह योग आर्थिक मोर्चे पर बड़ी मजबूती लेकर आ रहा है। व्यापारिक निर्णयों में सूझबूझ और नई साझेदारियां भविष्य की राह आसान करेंगी और पुराने विवादों से छुटकारा मिलेगा।
सिंह राशि के जातकों के लिए यह करियर की उड़ान का समय है। उन्हें कार्यस्थल पर नई जिम्मेदारियां या पदोन्नति मिल सकती है जिससे समाज में उनकी प्रतिष्ठा और आय के स्रोतों में वृद्धि होगी। कन्या राशि के जातकों की बात करें तो उनके लिए यह परिवर्तन शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई उम्मीदें लेकर आएगा। लंबे समय से रुकी हुई परियोजनाएं अब गति पकड़ेंगी और उनकी कार्यक्षमता में जबरदस्त सुधार होगा। अंत में मकर राशि के जातकों के लिए यह पेशेवर जीवन में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है जहाँ योजनाबद्ध तरीके से किए गए प्रयास उन्हें आर्थिक स्थिरता और मानसिक शांति प्रदान करेंगे। हालांकि ज्योतिषाचार्यों का यह भी कहना है कि इन शुभ प्रभावों की तीव्रता व्यक्ति की अपनी जन्म कुंडली और वर्तमान महादशा पर भी निर्भर करेगी इसलिए धैर्य और विवेक के साथ आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर होगा।