Author: bharati

  • राजधानी में संसाधन बचाने की मुहिम तेज: दिल्ली सरकार ने विदेश यात्राओं और सरकारी खर्चों में कटौती का किया ऐलान

    राजधानी में संसाधन बचाने की मुहिम तेज: दिल्ली सरकार ने विदेश यात्राओं और सरकारी खर्चों में कटौती का किया ऐलान

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में अब सरकारी कार्यप्रणाली को अधिक सादगीपूर्ण और संसाधन-केंद्रित बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। ऊर्जा बचत, सरकारी खर्चों में कटौती और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिल्ली सरकार ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। इन फैसलों के तहत आने वाले एक वर्ष तक सरकार का कोई भी मंत्री या अधिकारी सरकारी विदेश यात्रा पर नहीं जाएगा। इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर भी कई नई व्यवस्थाएं लागू करने की तैयारी शुरू हो चुकी है।

    सरकार का मानना है कि मौजूदा समय में ईंधन और संसाधनों का संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। इसी सोच के साथ राजधानी में एक व्यापक जन-अभियान की शुरुआत की जा रही है, जिसका उद्देश्य केवल सरकारी स्तर पर बदलाव करना नहीं बल्कि आम लोगों को भी इस पहल से जोड़ना है। सरकार का कहना है कि यदि प्रशासन और जनता दोनों मिलकर छोटे-छोटे कदम उठाएं तो बड़े स्तर पर बचत और सकारात्मक बदलाव संभव हो सकते हैं।

    वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था को इस अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है। सरकारी विभागों में सप्ताह में दो दिन घर से काम करने की योजना तैयार की गई है। साथ ही निजी कंपनियों और संस्थानों से भी अपील की जाएगी कि वे अपने कर्मचारियों को सीमित दिनों के लिए घर से काम करने की सुविधा दें। माना जा रहा है कि इससे सड़कों पर वाहनों की संख्या कम होगी, ट्रैफिक का दबाव घटेगा और पेट्रोल-डीजल की खपत में कमी आएगी।

    सरकारी वाहनों के इस्तेमाल को भी सीमित करने का फैसला लिया गया है। प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्रियों के काफिलों में गाड़ियों की संख्या कम की जाएगी और जहां संभव होगा वहां सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी जाएगी। अगले छह महीनों तक नई पेट्रोल, डीजल, सीएनजी या हाइब्रिड गाड़ियों की खरीद नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कर्मचारियों को मेट्रो और बस जैसे सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करने की योजना भी बनाई गई है।

    राजधानी में मेट्रो स्टेशनों तक पहुंच आसान बनाने के लिए विशेष बस सेवाएं शुरू करने की तैयारी की गई है। इसके अलावा बैठकों और प्रशासनिक गतिविधियों को अधिक से अधिक ऑनलाइन मोड में करने की योजना बनाई जा रही है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों से भी ऑनलाइन क्लास और मीटिंग्स को बढ़ावा देने की अपील की गई है, ताकि अनावश्यक यात्रा को कम किया जा सके।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगले कुछ महीनों तक बड़े सरकारी आयोजन और खर्चीले कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। इसके साथ ही “मेड इन India” उत्पादों को बढ़ावा देने और सरकारी विभागों में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को प्राथमिकता देने की दिशा में भी काम किया जाएगा।

    ऊर्जा बचत के तहत सरकारी दफ्तरों में बिजली उपयोग को नियंत्रित करने के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। एयर कंडीशनर के तापमान को सीमित रखने और बिजली की अनावश्यक खपत रोकने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

    कुल मिलाकर राजधानी में शुरू की गई यह पहल केवल खर्च कम करने का प्रयास नहीं बल्कि एक नई प्रशासनिक सोच का संकेत मानी जा रही है। सरकार इस अभियान के जरिए सादगी, जिम्मेदारी और संसाधनों के संतुलित उपयोग का संदेश जनता तक पहुंचाना चाहती है।

  • रिलायंस कम्युनिकेशंस मामले में जांच तेज, कई शहरों में पूर्व अधिकारियों के ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई

    रिलायंस कम्युनिकेशंस मामले में जांच तेज, कई शहरों में पूर्व अधिकारियों के ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई


    नई दिल्ली । रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में जांच अब और अधिक गंभीर होती दिखाई दे रही है। देश के कई बड़े शहरों में एक साथ चलाए गए तलाशी अभियान ने कारोबारी और वित्तीय जगत में नई हलचल पैदा कर दी है। यह कार्रवाई उन मामलों से जुड़ी बताई जा रही है जिनमें भारी वित्तीय नुकसान और नियमों के कथित उल्लंघन की जांच की जा रही है।

    जानकारी के मुताबिक जांच एजेंसियों की टीमों ने मुंबई, गुरुग्राम और बेंगलुरु समेत कई स्थानों पर एक साथ छापेमारी की। यह कार्रवाई कंपनी के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और निदेशकों से जुड़े परिसरों पर केंद्रित रही। बताया जा रहा है कि जिन अधिकारियों के यहां तलाशी ली गई, वे वर्ष 2015 से 2017 के बीच कंपनी के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे और वित्तीय संचालन से जुड़े फैसलों में उनकी अहम भूमिका थी।

    तलाशी के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन से जुड़ी सामग्री बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है। जांच एजेंसियां इन दस्तावेजों की गहराई से जांच कर रही हैं ताकि कथित गड़बड़ियों और पैसों के इस्तेमाल से जुड़े तथ्यों का पता लगाया जा सके। अधिकारियों का मानना है कि इन रिकॉर्ड्स से जांच को नई दिशा मिल सकती है।

    पिछले कुछ महीनों में इस मामले में लगातार नई कार्रवाइयां देखने को मिली हैं। कई वित्तीय संस्थानों और बैंकों की शिकायतों के बाद यह जांच शुरू हुई थी। आरोप है कि संबंधित मामलों में हजारों करोड़ रुपये के कथित वित्तीय नुकसान की आशंका है। यही कारण है कि जांच एजेंसियां लगातार अलग-अलग स्तरों पर दस्तावेजों और लेनदेन की जांच कर रही हैं।

    इस पूरे मामले में पहले भी कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाए जा चुके हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि अब तक बड़ी मात्रा में दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत एकत्र किए गए हैं, जिनकी फॉरेंसिक जांच जारी है। अधिकारियों का मानना है कि मामले में कई जटिल वित्तीय लेनदेन शामिल हो सकते हैं, जिनकी परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं।

    इससे पहले कंपनी से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को भी हिरासत में लिया गया था। उन पर बैंकिंग संचालन और फंड के इस्तेमाल से जुड़ी कथित अनियमितताओं में शामिल होने के आरोप लगे हैं। फिलहाल उनसे पूछताछ की प्रक्रिया जारी है और जांच एजेंसियां मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण होती है। बड़े कॉरपोरेट संस्थानों से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों की सख्ती यह संदेश देती है कि वित्तीय नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जा रहा है। वहीं, कारोबारी जगत की नजरें अब इस जांच के अगले चरण पर टिकी हुई हैं।

    आने वाले समय में इस मामले से जुड़े और भी बड़े खुलासे सामने आने की संभावना जताई जा रही है। लगातार बढ़ती जांच गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि एजेंसियां इस पूरे मामले की हर परत तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं, ताकि वित्तीय अनियमितताओं की पूरी तस्वीर साफ हो सके।

  • दिल्ली में बस्तर के भविष्य पर बड़ी बैठक, अमित शाह और सीएम विष्णु देव साय ने तैयार किया विकास का खाका

    दिल्ली में बस्तर के भविष्य पर बड़ी बैठक, अमित शाह और सीएम विष्णु देव साय ने तैयार किया विकास का खाका

    नई दिल्ली ।छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अब केवल सुरक्षा चुनौतियों के लिए नहीं बल्कि तेजी से बदलते विकास मॉडल के लिए भी चर्चा में आने लगा है। इसी बदलाव को लेकर नई दिल्ली में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें बस्तर के विकास कार्यों, स्वास्थ्य सुविधाओं और नक्सल प्रभावित इलाकों में प्रशासनिक पहुंच को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

    बैठक में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बताया कि बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों में अब सरकारी योजनाओं का असर जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है। जिन गांवों तक पहले स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना बेहद कठिन माना जाता था, वहां अब डॉक्टरों और स्वास्थ्य टीमों की नियमित पहुंच सुनिश्चित की जा रही है। कई इलाकों में मेडिकल टीमें पैदल पहुंचकर लोगों की जांच कर रही हैं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है।

    उन्होंने यह भी बताया कि बड़े स्तर पर स्वास्थ्य जांच अभियान चलाकर लाखों लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड तैयार किए गए हैं। डिजिटल हेल्थ प्रोफाइल के जरिए अब मरीजों की स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा सकेगी, जिससे इलाज की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बनेगी। इसके साथ ही गंभीर मरीजों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है।

    बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ अब बुनियादी सुविधाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पुराने सुरक्षा शिविरों को धीरे-धीरे जन सुविधा केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी योजनाओं से जुड़ी सेवाएं एक ही स्थान पर मिल रही हैं। इससे उन लोगों को राहत मिली है जिन्हें पहले छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी।

    बैठक में बस्तर के लिए तैयार किए गए विकास रोडमैप पर भी चर्चा हुई। इसमें सड़क निर्माण, रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। सरकार का लक्ष्य है कि बस्तर के युवाओं को स्थानीय स्तर पर अवसर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे मुख्यधारा से तेजी से जुड़ सकें।

    जगदलपुर में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को भी इस बदलाव का अहम हिस्सा बताया गया। नए चिकित्सा संस्थानों और आपातकालीन सेवाओं के विस्तार से अब लोगों को इलाज के लिए बड़े शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। प्रशासन का मानना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं की पहुंच बढ़ने से क्षेत्र में स्थायी बदलाव संभव होगा।

    मुख्यमंत्री ने बैठक में यह भी कहा कि बस्तर में अब सकारात्मक माहौल बन रहा है और लोगों का भरोसा सरकार की योजनाओं पर बढ़ रहा है। पहले जो इलाके लंबे समय तक विकास से दूर रहे, वहां अब सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी सहायता पहुंच रही हैं। इससे आम लोगों के जीवन में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देने लगा है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी बस्तर में हो रहे कार्यों की सराहना की और संकेत दिए कि आने वाले समय में इस मॉडल को और मजबूत किया जाएगा। केंद्र और राज्य सरकार मिलकर बस्तर को विकास, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के नए उदाहरण के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम कर रही हैं।

  • सावधान! इन गलतियों की वजह से खराब होजाता जाता है अचार, ऐसे रखें सुरक्षित

    सावधान! इन गलतियों की वजह से खराब होजाता जाता है अचार, ऐसे रखें सुरक्षित


    नई दिल्ली। भारतीय रसोई में अचार सिर्फ एक साइड डिश नहीं बल्कि स्वाद और परंपरा का हिस्सा होता है। आम, नींबू, मिर्च या आंवले का अचार हर घर में खास जगह रखता है। लेकिन कई बार मेहनत से तैयार किया गया अचार कुछ ही दिनों या महीनों में खराब होने लगता है और उसके ऊपर सफेद या हरे रंग की फफूंदी दिखाई देने लगती है। यह समस्या किसी एक मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि साल के किसी भी समय हो सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार अचार में फफूंदी लगने का सबसे बड़ा कारण नमी और हवा का संपर्क है। जब भी जार के अंदर नमी पहुंचती है या अचार खुले वातावरण के संपर्क में आता है, तो उसमें फफूंदी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कई बार छोटी-छोटी गलतियां जैसे गीला चम्मच इस्तेमाल करना या जार को खुला छोड़ देना भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं।

    गंध और स्वाद से मिलते हैं शुरुआती संकेत
    अचार खराब होने का पहला संकेत उसकी गंध से मिलता है। ताजा अचार की खुशबू तीखी और खट्टी होती है, लेकिन अगर उसमें सड़ी हुई या अजीब सी बदबू आने लगे, तो यह खराब होने का संकेत है। कई बार स्वाद में भी बदलाव आने लगता है, जिससे अचार कड़वा, फीका या अजीब सा लगने लगता है। ऐसे अचार का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

    बनावट और रंग में बदलाव भी खतरे का संकेत
    जब अचार खराब होने लगता है, तो उसकी बनावट में भी बदलाव दिखाई देता है। अगर अचार चिपचिपा, बहुत नरम या रंग बदलने लगे, तो इसे खाने से बचना चाहिए। उदाहरण के लिए आम का अचार भूरा और मुलायम हो जाए या लहसुन का अचार लिसलिसा महसूस हो, तो यह संकेत है कि उसमें खराबी शुरू हो चुकी है।

    तेल की स्थिति भी काफी अहम होती है। अगर अचार का तेल धुंधला दिखे, अलग-अलग परतों में बंट जाए या उसमें झाग बनने लगे, तो यह भी खराबी की निशानी है।

    अचार में फफूंदी क्यों लगती है?
    Pickle में फफूंदी तब लगती है जब उसमें नमी, हवा या गंदगी पहुंच जाती है। कई बार अचार को स्टोर करते समय सावधानी नहीं बरती जाती, जिससे बैक्टीरिया और फंगस तेजी से बढ़ने लगते हैं।

    अचार को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखें?
    Pickle को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी सावधानियां अपनानी चाहिए। हमेशा सूखे और साफ चम्मच का इस्तेमाल करें, क्योंकि एक बूंद पानी भी फफूंदी का कारण बन सकती है। जार को हर बार अच्छी तरह बंद करें ताकि हवा अंदर न जा सके।

    अचार को हमेशा ठंडी और सूखी जगह पर रखें। सीधी धूप और ज्यादा गर्मी मसालों और तेल को खराब कर सकती है। इसके अलावा ध्यान रखें कि अचार पूरी तरह तेल की परत में ढका रहे। अगर तेल कम हो जाए, तो ऊपर से साफ तेल डालकर उसे सुरक्षित रखा जा सकता है।

    इन छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर अचार को लंबे समय तक ताजा और स्वादिष्ट रखा जा सकता है, जिससे उसका असली स्वाद बरकरार रहता है और वह फफूंदी से सुरक्षित रहता है।

  • बारिश और ओलावृष्टि के बीच चार धाम यात्रा: आस्था का सफर बना चुनौती, यात्रियों के लिए जारी हुए अहम सुरक्षा संकेत

    बारिश और ओलावृष्टि के बीच चार धाम यात्रा: आस्था का सफर बना चुनौती, यात्रियों के लिए जारी हुए अहम सुरक्षा संकेत

    नई दिल्ली ।  उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में इन दिनों मौसम ने करवट ले ली है और लगातार हो रही भारी बारिश तथा ओलावृष्टि ने चार धाम यात्रा को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यह यात्रा, जो आस्था और श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है, अब यात्रियों के लिए सावधानी और तैयारी की परीक्षा बन गई है। पहाड़ी इलाकों में बदलते मौसम ने यात्रा मार्गों पर जोखिम बढ़ा दिया है और प्रशासन लगातार यात्रियों को सतर्क रहने की अपील कर रहा है।

    चार धाम यात्रा का मार्ग अपने आप में कठिन माना जाता है, लेकिन बारिश के मौसम में यह और भी संवेदनशील हो जाता है। कई जगहों पर भूस्खलन, सड़क फिसलन और अचानक रास्ता बंद होने जैसी परिस्थितियां बन जाती हैं, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे हालात में बिना तैयारी यात्रा करना खतरनाक साबित हो सकता है और किसी भी समय अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

    यात्रा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात मौसम की लगातार निगरानी रखना है। पहाड़ों में मौसम बहुत तेजी से बदलता है, जहां कुछ ही घंटों में साफ आसमान अचानक घने बादलों और तेज बारिश में बदल सकता है। इस कारण यात्रियों को यात्रा शुरू करने से पहले और यात्रा के दौरान मौसम के अपडेट पर ध्यान देना जरूरी है। यदि किसी क्षेत्र में खराब मौसम या चेतावनी जैसी स्थिति बनी हो तो यात्रा को कुछ समय के लिए रोक देना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

    चार धाम यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए समय प्रबंधन भी बेहद जरूरी भूमिका निभाता है। सुबह के समय यात्रा शुरू करना अधिक सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि दिन के शुरुआती हिस्से में मौसम अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। वहीं शाम के समय पहाड़ी क्षेत्रों में धुंध और बारिश का असर बढ़ जाता है, जिससे दृश्यता कम हो जाती है और दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी यात्रा दिन के उजाले में ही पूरी करने की कोशिश करें।

    यात्रा के दौरान हल्का और आवश्यक सामान ही साथ रखना समझदारी भरा कदम है। भारी बैग और अनावश्यक वस्तुएं पहाड़ी रास्तों पर चलने में कठिनाई पैदा कर सकती हैं। बारिश से बचाव के लिए रेनकोट और वाटरप्रूफ कपड़े, साथ ही मजबूत पकड़ वाले जूते यात्रा का हिस्सा होना चाहिए। विशेष रूप से ट्रैकिंग मार्गों पर फिसलन का खतरा अधिक होता है, इसलिए सही जूते और सावधानी बेहद जरूरी है।

    स्वास्थ्य सुरक्षा भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ठंड और कम ऑक्सीजन के कारण थकान, सांस लेने में कठिनाई और कमजोरी जैसी समस्याएं आम हो सकती हैं। बुजुर्गों और बच्चों को इस मौसम में विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। जिन लोगों को पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, उन्हें यात्रा से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।

    इसके साथ ही यात्रियों को यह भी समझना होगा कि मौसम खराब होने पर धैर्य रखना और प्रशासन के निर्देशों का पालन करना सबसे सुरक्षित विकल्प है। कई बार यात्रा को रोकना या मार्ग बदलना असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन यह निर्णय जीवन सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो चार धाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का मार्ग नहीं बल्कि प्रकृति की कठिन परिस्थितियों में धैर्य, तैयारी और सावधानी की परीक्षा भी है। सही योजना, सतर्कता और मौसम के प्रति जागरूकता इस पवित्र यात्रा को सुरक्षित और सफल बनाने की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

    Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली। नवजात शिशु की देखभाल जितनी खुशी देती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। खासतौर पर जब बात बच्चे को नहलाने की हो, तो माता-पिता को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है। जन्म के बाद शुरुआती महीनों में शिशु की त्वचा बहुत कोमल होती है और उसका शरीर बाहरी वातावरण के अनुसार खुद को पूरी तरह ढाल नहीं पाता। ऐसे में नहलाते समय की गई छोटी-सी गलती भी बच्चे के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
    विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात या प्रीमैच्योर बच्चे को नहलाते समय पानी का तापमान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। पानी हमेशा हल्का गुनगुना होना चाहिए। ज्यादा गर्म पानी बच्चे की त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि ठंडा पानी सर्दी-जुकाम या शरीर का तापमान गिरने का कारण बन सकता है। नहलाने से पहले हाथ से पानी का तापमान जरूर जांच लेना चाहिए।
    बच्चे को लंबे समय तक पानी में रखना भी सही नहीं माना जाता। नवजात शिशु जल्दी ठंड पकड़ लेते हैं, इसलिए उनका स्नान बहुत कम समय में और आरामदायक तरीके से होना चाहिए। कई लोग बच्चे को तेजी से रगड़कर साफ करने लगते हैं, लेकिन ऐसा करना नुकसानदायक हो सकता है। शिशु की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है, इसलिए उसे हमेशा मुलायम कपड़े और हल्के हाथों से साफ करना चाहिए।
    डॉक्टरों का मानना है कि तेज खुशबू वाले साबुन, बॉडी वॉश या केमिकल युक्त प्रोडक्ट नवजात की त्वचा पर बुरा असर डाल सकते हैं। इसलिए बच्चे के लिए केवल माइल्ड और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए प्रोडक्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए। कई मामलों में सिर्फ साफ गुनगुने पानी और मुलायम कपड़े से सफाई करना ही पर्याप्त होता है।
    नहलाते समय कमरे का तापमान भी सामान्य और आरामदायक होना चाहिए। ठंडी हवा, तेज पंखा या एसी वाले कमरे में बच्चे को नहलाने से वह जल्दी बीमार पड़ सकता है। स्नान के तुरंत बाद बच्चे को मुलायम तौलिए से अच्छी तरह सुखाकर गर्म कपड़े पहनाना जरूरी है।
    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर दिन नवजात को पानी से नहलाना जरूरी नहीं होता। खासकर प्रीमैच्योर बच्चों के लिए स्पंज बाथ यानी गीले मुलायम कपड़े से शरीर साफ करना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। इससे बच्चा साफ भी रहता है और ठंड लगने का खतरा भी कम होता है।
    अगर बच्चे को नहलाने के बाद त्वचा लाल हो जाए, ज्यादा रोना आए, सांस लेने में दिक्कत हो या शरीर ठंडा महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। सही देखभाल और सावधानी के साथ ही नवजात शिशु स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है।
  • शुक्रवार व्रत स्पेशल: संतोषी माता को प्रसन्न करने के लिए जानें पूजा विधि और कथा का महत्व

    शुक्रवार व्रत स्पेशल: संतोषी माता को प्रसन्न करने के लिए जानें पूजा विधि और कथा का महत्व


    नई दिल्ली। सनातन धर्म में शुक्रवार का दिन मां संतोषी की आराधना के लिए विशेष माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन और श्रद्धा के साथ मां संतोषी का व्रत रखते हैं, उनके जीवन से दुख, दरिद्रता और परेशानियां दूर हो जाती हैं। मां संतोषी को संतोष, धैर्य और प्रेम की देवी माना जाता है। कहा जाता है कि उनकी कृपा से घर में सुख-शांति, धन-धान्य और समृद्धि बनी रहती है।

    हिंदू मान्यताओं के अनुसार मां संतोषी भगवान गणेश की पुत्री हैं। शुक्रवार के दिन उनका व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से विशेष पुण्यफल प्राप्त होता है। खास बात यह है कि इस व्रत में खट्टी चीजों का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। भक्त माता को गुड़, चना, केला और सफेद मिठाई का भोग लगाते हैं।

    कैसे करें संतोषी माता की पूजा?
    व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें। एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर मां संतोषी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। माता को फूलों की माला अर्पित करें और सिंदूर, हल्दी तथा अक्षत चढ़ाएं।

    इसके बाद कलश स्थापना करें। कलश में जल भरकर आम के पत्ते रखें और उसके पास घी का दीपक जलाएं। पूजा में अगरबत्ती और धूप का प्रयोग करें। माता को गुड़ और भुने हुए चने का भोग लगाएं। पूजा के दौरान संतोषी माता की कथा सुनना या पढ़ना बेहद शुभ माना जाता है। अंत में माता की आरती करें और प्रसाद सभी में बांटें।

    व्रत के दौरान रखें इन बातों का ध्यान
    संतोषी माता के व्रत में खट्टी चीजें खाना पूरी तरह निषिद्ध माना गया है। व्रती को दिनभर संयम और शुद्धता बनाए रखनी चाहिए। कई लोग इस व्रत में केवल एक समय भोजन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि लगातार 16 शुक्रवार तक यह व्रत करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

    क्या है इस व्रत का महत्व?
    मान्यता है कि मां संतोषी का व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं। अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है, वहीं नौकरी और कारोबार में भी सफलता मिलने की मान्यता है। छात्र-छात्राओं के लिए भी यह व्रत शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे शिक्षा और परीक्षा में सफलता प्राप्त होती है।

    धार्मिक विश्वास के अनुसार मां संतोषी अपने भक्तों की हर इच्छा पूरी करती हैं और जीवन में संतोष का भाव बनाए रखती हैं। इसलिए शुक्रवार का यह व्रत आस्था और विश्वास का प्रतीक माना जाता है।

  • टेलीकॉम दिग्गज में नई पीढ़ी की एंट्री का रास्ता साफ: मित्तल ने 10 साल की उत्तराधिकार योजना का संकेत दिया

    टेलीकॉम दिग्गज में नई पीढ़ी की एंट्री का रास्ता साफ: मित्तल ने 10 साल की उत्तराधिकार योजना का संकेत दिया


    नई दिल्ली ।  भारतीय टेलीकॉम उद्योग की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक भारती एयरटेल एक ऐसे दौर में प्रवेश करती दिख रही है, जहां नेतृत्व और रणनीति दोनों स्तरों पर बड़े बदलावों की नींव रखी जा रही है। कंपनी के शीर्ष नेतृत्व ने संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में संगठन की जिम्मेदारी धीरे-धीरे नई पीढ़ी को सौंपी जाएगी, जिससे कंपनी के भविष्य को एक नई दिशा मिल सके।

    कंपनी के चेयरमैन ने हालिया बातचीत में स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य अगले दशक के भीतर नेतृत्व हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब कंपनी लगातार विस्तार कर रही है और डिजिटल तथा टेलीकॉम क्षेत्र में अपनी पकड़ को और मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रही है। हालांकि उन्हें हाल ही में एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन के रूप में दोबारा नियुक्त किया गया है, जिससे यह स्पष्ट है कि वर्तमान समय में उनका अनुभव और नेतृत्व कंपनी के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा।

    इस दौरान कंपनी के हालिया वित्तीय प्रदर्शन पर भी चर्चा हुई, जिसमें प्रबंधन ने मिश्रित परिणामों की ओर इशारा किया। जहां एक ओर राजस्व में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है, वहीं दूसरी ओर मुनाफे में कुछ गिरावट दर्ज की गई है। कंपनी का ध्यान अब प्रति उपयोगकर्ता औसत आय को बढ़ाने पर केंद्रित है, जिसे दीर्घकालिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

    वित्तीय आंकड़ों से यह भी स्पष्ट हुआ कि कंपनी का कारोबार लगातार विस्तार कर रहा है और ग्राहक आधार में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है। बढ़ते उपयोगकर्ता आधार और सेवाओं के विस्तार के कारण कंपनी के कुल राजस्व ने नए स्तर को छुआ है। इसके बावजूद कुछ एकमुश्त वित्तीय प्रावधानों के कारण शुद्ध लाभ पर दबाव देखा गया है, जो अस्थायी माना जा रहा है।

    कंपनी का अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय भी लगातार मजबूत हो रहा है, खासकर अफ्रीकी बाजार में इसके प्रदर्शन ने कुल आय में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह दर्शाता है कि एयरटेल अब केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।

    बाजार में इस प्रकार के संकेतों को सकारात्मक रूप में देखा गया और निवेशकों ने कंपनी की दीर्घकालिक रणनीति पर भरोसा जताया। वित्तीय परिणाम उम्मीदों से थोड़े कमजोर रहे, लेकिन कंपनी की मजबूत बुनियाद और व्यापक ग्राहक नेटवर्क ने निवेशकों की धारणा को स्थिर बनाए रखा।

    कंपनी ने हाल ही में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए अपने ग्राहक आधार में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की है, जिससे यह वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े टेलीकॉम नेटवर्क में शामिल हो गई है। आने वाले समय में चुनौती यह होगी कि इस विशाल ग्राहक आधार को अधिक लाभकारी और उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं में कैसे बदला जाए।

    इस पूरे घटनाक्रम से यह संकेत मिलता है कि एयरटेल एक योजनाबद्ध और दीर्घकालिक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है, जहां नेतृत्व परिवर्तन के साथ-साथ कारोबारी रणनीति में भी संतुलित सुधार किए जा रहे हैं, ताकि कंपनी भविष्य में और अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी बन सके।

  • वैश्विक बहस के बीच भारत का पलटवार, हम कचरा नहीं, रीसाइक्लिंग हब हैं

    वैश्विक बहस के बीच भारत का पलटवार, हम कचरा नहीं, रीसाइक्लिंग हब हैं

    नई दिल्ली ।  भारत के टेक्सटाइल उद्योग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठे सवालों के बीच सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि देश को “कपड़ा कचरे का डंपिंग ग्राउंड” बताना न केवल गलत है बल्कि वास्तविक तथ्यों से परे भी है। सरकार का कहना है कि भारत का टेक्सटाइल सेक्टर एक मजबूत और विकसित होता हुआ पुनर्चक्रण तंत्र है, जो लंबे समय से पुनः उपयोग और संसाधन बचत की परंपरा पर आधारित है।

    हाल ही में इस क्षेत्र को लेकर कुछ आलोचनात्मक दावे सामने आए, जिनमें विशेष रूप से कुछ औद्योगिक क्लस्टर्स की परिस्थितियों को आधार बनाकर भारत के पूरे टेक्सटाइल सिस्टम को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। सरकार का कहना है कि इस तरह के आकलन अधूरे हैं, क्योंकि वे केवल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं और सुधार की दिशा में हो रहे व्यापक बदलावों को नजरअंदाज करते हैं।

    वस्त्र मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत में टेक्सटाइल उत्पादन और प्रसंस्करण से जुड़ा बड़ा हिस्सा पहले से ही पुनर्चक्रण प्रणाली का हिस्सा बन जाता है। विशेष रूप से उत्पादन चरण में उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा दोबारा उपयोग या रीसाइक्लिंग प्रक्रिया में चला जाता है। यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि उद्योग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि अपशिष्ट प्रबंधन को भी समान रूप से महत्व दे रहा है।

    सरकार ने यह भी कहा कि देश में उत्पन्न होने वाले कुल टेक्सटाइल कचरे का अधिकांश भाग घरेलू स्रोतों से आता है, जबकि विदेशी कचरे का योगदान अपेक्षाकृत बहुत कम है। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि भारत बाहरी देशों के फास्ट-फैशन कचरे का केंद्र बन गया है। इसके बजाय, भारत का सिस्टम घरेलू स्तर पर उत्पन्न कचरे को ही प्रभावी ढंग से संभालने और पुनः उपयोग करने पर केंद्रित है।

    टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से जुड़ा यह पूरा तंत्र केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक ढांचा भी बन चुका है। इस क्षेत्र से जुड़े उद्योग हर वर्ष बड़ी आर्थिक गतिविधि उत्पन्न करते हैं, जिससे रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों को भी इस सेक्टर से मजबूती मिल रही है, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों अर्थव्यवस्थाओं में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।

    सरकारी पक्ष के अनुसार, वैज्ञानिक अध्ययन यह भी बताते हैं कि पुनर्चक्रण प्रक्रिया नए फाइबर उत्पादन की तुलना में पर्यावरण पर कम दबाव डालती है। इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आती है और ऊर्जा की खपत भी घटती है। यह तथ्य भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को केवल आर्थिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।

    हालांकि सरकार ने यह स्वीकार किया है कि पोस्ट-कंज्यूमर वेस्ट मैनेजमेंट, अनौपचारिक क्षेत्र की कार्यप्रणाली और श्रमिक सुरक्षा जैसी चुनौतियां अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए लगातार प्रयास जारी हैं और उद्योग को अधिक संगठित, सुरक्षित और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

  • सस्टेनेबल मोबिलिटी की दिशा में बदलाव: भारत में इलेक्ट्रिक बसों का उपयोग तेजी से बढ़ने के संकेत

    सस्टेनेबल मोबिलिटी की दिशा में बदलाव: भारत में इलेक्ट्रिक बसों का उपयोग तेजी से बढ़ने के संकेत


    नई दिल्ली ।  भारत में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली धीरे-धीरे एक बड़े और महत्वपूर्ण परिवर्तन की ओर बढ़ रही है, जहां इलेक्ट्रिक बसें भविष्य की मुख्य भूमिका निभाने के लिए तैयार दिखाई दे रही हैं। हाल के वर्षों में जिस तरह से स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण पर जोर बढ़ा है, उसने परिवहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को तेजी से बढ़ावा दिया है। अब यह बदलाव केवल शुरुआती चरण में नहीं रहा, बल्कि एक व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन के रूप में सामने आ रहा है।

    देश में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी वर्तमान में अभी सीमित स्तर पर है, लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि वित्त वर्ष 2035 तक यह आंकड़ा लगभग 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में सार्वजनिक परिवहन का स्वरूप पूरी तरह से बदल सकता है। इसी अवधि में यह भी संभावना जताई गई है कि सार्वजनिक परिवहन में चलने वाली कुल बसों में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकती है, जो एक ऐतिहासिक बदलाव होगा।

    भारत में बसें सार्वजनिक परिवहन का सबसे बड़ा माध्यम हैं और लाखों लोग रोजाना इसी पर निर्भर रहते हैं। कुल यात्रियों की यात्रा दूरी का एक बड़ा हिस्सा बसों के माध्यम से तय होता है, ऐसे में इस क्षेत्र का इलेक्ट्रिफिकेशन न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी है, बल्कि यह शहरी प्रदूषण और ईंधन निर्भरता को भी काफी हद तक कम कर सकता है।

    इस बदलाव के पीछे कई प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा कारण सरकारी स्तर पर बढ़ते निवेश और खरीद योजनाएं हैं, जिनके तहत इलेक्ट्रिक बसों की खरीद को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और तकनीकी सुधार भी इस सेक्टर को मजबूती दे रहे हैं। धीरे-धीरे निजी क्षेत्र की भागीदारी भी इस दिशा में बढ़ रही है, जिससे इस मॉडल को और गति मिल रही है।

    वर्तमान समय में देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर चल रही हैं और कई नए ऑर्डर और योजनाएं पाइपलाइन में हैं। हालांकि इस क्षेत्र में अभी भी कुछ चुनौतियां मौजूद हैं, जैसे चार्जिंग स्टेशनों की उपलब्धता, बैटरी तकनीक की लागत और संचालन की दक्षता। इसके बावजूद इस सेक्टर में विकास की गति लगातार बनी हुई है।

    आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ाने, वित्तीय मॉडल को मजबूत करने और चार्जिंग नेटवर्क को व्यापक बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इससे न केवल इलेक्ट्रिक बसों की लागत कम होगी, बल्कि उनका संचालन भी अधिक आसान और प्रभावी बन सकेगा।

    कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत में इलेक्ट्रिक बसों का बढ़ता उपयोग केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह देश के परिवहन तंत्र को अधिक स्वच्छ, आधुनिक और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह गति इसी तरह बनी रही, तो आने वाले दशक में भारत का सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह से हरित ऊर्जा आधारित प्रणाली की ओर बढ़ सकता है।