Author: bharati

  • फर्जी 1967 अखबार कटिंग से सियासी बवाल: सोना अपील पर इंदिरा गांधी का नाम जोड़कर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा दावा, फैक्ट-चेक में खुली पोल

    फर्जी 1967 अखबार कटिंग से सियासी बवाल: सोना अपील पर इंदिरा गांधी का नाम जोड़कर सोशल मीडिया में फैलाया जा रहा दावा, फैक्ट-चेक में खुली पोल




    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया “सोना न खरीदने” जैसी अपील के बाद सोशल मीडिया पर एक पुराना राजनीतिक दावा फिर से चर्चा में आ गया है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ी एक कथित 1967 की अखबार कटिंग शेयर की जा रही है। इस दावे के जरिए कहा जा रहा है कि इंदिरा गांधी ने भी आर्थिक संकट के दौरान लोगों से सोना न खरीदने की अपील की थी, लेकिन जांच में यह दावा फर्जी पाया गया है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार सोशल मीडिया पर वायरल हो रही यह कथित “द हिंदू” अखबार की कटिंग 6 जून 1967 की बताई जा रही है, जिसमें इंदिरा गांधी के नाम से “सोना न खरीदने” की अपील का दावा किया गया है। लेकिन खुद अखबार “द हिंदू” ने इस कटिंग को पूरी तरह फर्जी और डिजिटल रूप से एडिटेड बताया है और स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई पेज उनके आर्काइव में मौजूद नहीं है।

    अखबार ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी वायरल कंटेंट को शेयर करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करें। तथ्य यह है कि 1960 के दशक में भारत विदेशी मुद्रा संकट और आर्थिक दबाव से गुजर रहा था, लेकिन उस समय सोना खरीदने पर ऐसी कोई राष्ट्रीय स्तर की औपचारिक रोक या सार्वजनिक अपील नहीं की गई थी।

    इस विवाद के बीच बीजेपी नेताओं द्वारा भी इस कथित कटिंग को शेयर किए जाने पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने इस दावे का हवाला देते हुए पीएम मोदी की अपील का समर्थन किया, जबकि विपक्ष ने इसे गलत और भ्रामक जानकारी फैलाने का आरोप लगाया है।

    कांग्रेस का कहना है कि आज की आर्थिक अपील को ऐतिहासिक रूप से गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, जबकि बीजेपी का तर्क है कि अतीत में भी आर्थिक अनुशासन की बातें होती रही हैं। इस पूरे मामले ने एक बार फिर सोशल मीडिया पर फैक्ट-चेक और राजनीतिक दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • सोना खरीदने और ईंधन खपत कम करने की अपील पर विवाद, व्यापारियों और विपक्ष ने उठाए सवाल

    सोना खरीदने और ईंधन खपत कम करने की अपील पर विवाद, व्यापारियों और विपक्ष ने उठाए सवाल


    नई दिल्ली । देश में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से संसाधनों के सीमित उपयोग और सोना-चांदी की खरीदारी को लेकर की गई अपील के बाद राजनीतिक और आर्थिक हलकों में बहस तेज हो गई है। इस बयान के बाद जहां विपक्षी दलों ने सरकार की आर्थिक स्थिति और नीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, वहीं सराफा व्यापार से जुड़े संगठनों ने भी इसे लेकर अपनी चिंता खुलकर जाहिर की है।

    प्रधानमंत्री द्वारा लगातार दो दिनों तक पेट्रोल-डीजल के सीमित इस्तेमाल और अनावश्यक खर्च से बचने की अपील को कई लोग एहतियाती कदम मान रहे हैं, लेकिन व्यापारिक वर्ग का कहना है कि इस तरह की सार्वजनिक अपीलों का सीधा असर बाजार की गतिविधियों और लोगों की खरीदारी की मानसिकता पर पड़ता है। खासकर ज्वेलरी उद्योग से जुड़े कारोबारियों का मानना है कि सोना-चांदी की खरीद को लेकर पैदा हुई आशंका बाजार में मंदी ला सकती है।

    राजनीतिक मोर्चे पर भी इस मुद्दे ने तेजी से तूल पकड़ लिया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा हो रही हो, तो सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जनता के बीच अचानक इस तरह की अपीलें आने से असमंजस की स्थिति पैदा होती है और इसका असर आम लोगों के साथ-साथ व्यापारियों पर भी पड़ता है।

    वहीं, सराफा व्यापार से जुड़े संगठनों ने भी सरकार के रुख पर नाराज़गी जाहिर की है। व्यापारिक प्रतिनिधियों का कहना है कि देशभर में लाखों परिवार इस उद्योग पर निर्भर हैं और यदि बाजार में खरीदारी कम होती है, तो इसका असर सीधे रोजगार और छोटे कारोबारियों की आय पर पड़ेगा। उनका मानना है कि किसी भी बड़े फैसले या सार्वजनिक संदेश से पहले उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से चर्चा की जानी चाहिए थी।

    व्यापारियों का यह भी कहना है कि ज्वेलरी सेक्टर केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि देश की पारंपरिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। शादी-विवाह और सामाजिक आयोजनों में सोना-चांदी की खरीदारी लंबे समय से भारतीय समाज का हिस्सा रही है, इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता बाजार की गति को प्रभावित कर सकती है।

    इस मुद्दे पर विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी सरकार को घेरने की कोशिश की है। उनका कहना है कि यदि जनता से बार-बार त्याग और खर्च कम करने की अपील की जा रही है, तो यह देश की आर्थिक चुनौतियों की ओर इशारा करता है। विपक्ष ने इसे आम लोगों पर मानसिक दबाव बनाने वाला कदम बताया है।

    हालांकि, सरकार की ओर से इन तमाम आशंकाओं को खारिज किया गया है। केंद्रीय स्तर पर यह स्पष्ट किया गया कि देश में तेल और गैस का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है और किसी प्रकार की कमी की स्थिति नहीं है। सरकार का कहना है कि नागरिकों से केवल संसाधनों के जिम्मेदार और विवेकपूर्ण उपयोग की अपील की गई है, ताकि ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सके।

    फिलहाल, इस मुद्दे ने राजनीतिक बहस के साथ-साथ व्यापारिक जगत में भी नई चिंता पैदा कर दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस पर आगे क्या रुख अपनाती है और बाजार में इसका क्या प्रभाव देखने को मिलता है।

  • मंगलवार व्रत के नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नहीं मिलेगा हनुमान जी का आशीर्वाद

    मंगलवार व्रत के नियम: भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नहीं मिलेगा हनुमान जी का आशीर्वाद


    नई दिल्ली।  मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित माना गया है। इस दिन भक्त व्रत रखकर बजरंगबली की पूजा करते हैं और जीवन के संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से किया गया व्रत व्यक्ति के जीवन में शक्ति, साहस और सफलता लाता है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि व्रत में नियमों का पालन न किया जाए तो उसका पूरा फल नष्ट भी हो सकता है।

     व्रत की सही विधि क्या है?
    व्रत की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान से होती है। इसके बाद साफ लाल वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। फिर हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर दीपक जलाया जाता है। उन्हें सिंदूर, चमेली का तेल, लाल फूल और पान के पत्तों की माला अर्पित की जाती है। भोग के रूप में बेसन के लड्डू या बूंदी चढ़ाना शुभ माना जाता है।
    पूजा के दौरान ‘राम’ नाम का जप और मंगलवार व्रत कथा का पाठ करना जरूरी होता है।

     मंगलवार व्रत में जरूर बचें इन गलतियों से
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुछ नियमों का पालन न करने से व्रत का फल प्रभावित हो सकता है:–

    व्रत में नमक का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है
    प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा से दूर रहना चाहिए
    मानसिक और शारीरिक पवित्रता बनाए रखना जरूरी है
    व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना शुभ माना गया है
    दिनभर निराहार रहकर संयम रखना चाहिए

    शाम की पूजा के बाद ही गेहूं और गुड़ से बना सादा भोजन करना उचित माना जाता है, उसमें भी नमक का उपयोग नहीं करना चाहिए।

    आस्था और संयम का प्रतीक है मंगलवार व्रत
    मंगलवार व्रत केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मसंयम और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त पूरी निष्ठा और नियमों के साथ हनुमान जी की आराधना करते हैं, उनके जीवन से भय, संकट और बाधाएं दूर हो जाती हैं।

  • सेलिना जेटली की दर्दभरी कहानी: बेटे की मौत, रिश्तों में तनाव और अब बच्चों के लिए कानूनी लड़ाई

    सेलिना जेटली की दर्दभरी कहानी: बेटे की मौत, रिश्तों में तनाव और अब बच्चों के लिए कानूनी लड़ाई

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री Celina Jaitly एक बार फिर अपनी निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में हैं। फिल्मों से लंबे समय से दूर रहने वाली सेलिना इन दिनों अपने वैवाहिक विवाद, बच्चों की कस्टडी और निजी संघर्षों को लेकर सुर्खियों में बनी हुई हैं। हाल ही में उन्होंने अपने पति पीटर हाग के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं और कानूनी लड़ाई शुरू की है।

    सेलिना ने अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दौर को याद करते हुए बताया कि बीते कुछ वर्षों में उन्होंने लगातार कई निजी दुख झेले हैं। उन्होंने अपने बेटे शमशेर को जन्म के कुछ समय बाद ही खो दिया था। बच्चे को एक दुर्लभ हृदय संबंधी बीमारी थी, जिसके इलाज के लिए उन्होंने कई विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपने बेटे को बचा नहीं सकीं। इस घटना ने उन्हें मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था।

    बेटे की मौत के कुछ समय पहले ही उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया था। लगातार हुए इन पारिवारिक हादसों ने उनके जीवन को गहरे दुख में डाल दिया। इसके बाद उनकी मां का निधन भी हो गया, जिससे सेलिना पूरी तरह अकेली और भावनात्मक रूप से कमजोर महसूस करने लगीं।

    इसी बीच उनके वैवाहिक रिश्ते में भी तनाव बढ़ता गया। सेलिना ने आरोप लगाया कि शादी के दौरान उन्हें मानसिक और भावनात्मक दबाव का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि कई मौकों पर उन्हें अपमानित किया गया और रिश्ते में लगातार तनाव बना रहा। उनके अनुसार, हालात इतने खराब हो गए थे कि उन्हें अपना घर छोड़कर भारत लौटना पड़ा।

    उन्होंने यह भी दावा किया कि परिस्थितियां ऐसी बन गई थीं, जहां उन्हें अपने बच्चों से दूर रहना पड़ा। अब वह अपने बच्चों की कस्टडी और उनसे मिलने के अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सेलिना का कहना है कि एक मां के लिए अपने बच्चों से दूर रहना सबसे बड़ा दर्द होता है और यही संघर्ष इस समय उनकी जिंदगी का सबसे कठिन हिस्सा है।

    हाल ही में साझा किए गए एक भावुक वीडियो में सेलिना अपने दिवंगत बेटे शमशेर की कब्र के पास नजर आईं। वीडियो में वह बेटे की कब्र को साफ करते हुए भावुक दिखाई दीं। इस दृश्य ने उनके प्रशंसकों को भी भावुक कर दिया। कई लोगों ने उनके साहस और संघर्ष की सराहना की है।

    सेलिना ने यह भी कहा कि वह अब अपने अधिकारों और बच्चों के भविष्य के लिए मजबूती से खड़ी हैं। उनका मानना है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं माननी चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में आए इस कठिन दौर को बेहद दर्दनाक बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि वह अपने बच्चों के लिए हर लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।

    फिलहाल यह मामला कानूनी प्रक्रिया में है और इसकी जांच जारी है। वहीं, सेलिना जेटली की यह कहानी केवल एक अभिनेत्री के संघर्ष की नहीं, बल्कि एक मां के दर्द, टूटते रिश्तों और अपने बच्चों के लिए लड़ने के साहस की कहानी बन गई है।

  • साउथ सिनेमा में बढ़ा उत्साह, दशकों बाद साथ दिखेंगे रजनीकांत-कमल हासन, तृषा भी बन सकती हैं हिस्सा

    साउथ सिनेमा में बढ़ा उत्साह, दशकों बाद साथ दिखेंगे रजनीकांत-कमल हासन, तृषा भी बन सकती हैं हिस्सा


    नई दिल्ली । तमिल सिनेमा में इन दिनों एक ऐसी फिल्म को लेकर जबरदस्त चर्चा हो रही है, जिसने फैंस की उत्सुकता को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। वजह सिर्फ एक बड़ी स्टारकास्ट नहीं, बल्कि दो दिग्गज सुपरस्टार्स का लंबे समय बाद एक साथ आना है। अब इस बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट से जुड़ी एक और बड़ी खबर सामने आई है, जिसने फिल्म को लेकर उत्साह को और बढ़ा दिया है। चर्चा है कि लोकप्रिय अभिनेत्री तृषा कृष्णन भी इस मेगा प्रोजेक्ट का हिस्सा बन सकती हैं।

    फिल्म को लेकर पहले ही दर्शकों के बीच जबरदस्त माहौल बना हुआ है, क्योंकि इसमें रजनीकांत और कमल हासन जैसे दिग्गज कलाकार एक साथ नजर आने वाले हैं। दोनों सितारों ने अपने करियर में अलग-अलग कई ऐतिहासिक फिल्में दी हैं, लेकिन लंबे समय बाद एक ही स्क्रीन पर उनकी वापसी को लेकर फैंस बेहद उत्साहित हैं। अब अगर तृषा कृष्णन भी इस फिल्म से जुड़ती हैं, तो यह प्रोजेक्ट और भी भव्य बन सकता है।

    इंडस्ट्री में यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि फिल्म के लिए अभिनेत्री से बातचीत जारी है। हालांकि अभी तक आधिकारिक तौर पर किसी तरह की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन माना जा रहा है कि निर्माता इस फिल्म को तमिल सिनेमा की सबसे बड़ी मल्टीस्टारर फिल्मों में शामिल करने की तैयारी में हैं।

    फिल्म के निर्देशक इस प्रोजेक्ट को बेहद बड़े स्तर पर तैयार करने में जुटे हुए हैं। कहानी, लोकेशन, तकनीकी टीम और कलाकारों के चयन पर तेजी से काम चल रहा है। बताया जा रहा है कि फिल्म का विजुअल स्केल और प्रस्तुति दर्शकों को एक बिल्कुल अलग सिनेमाई अनुभव देने वाली है।

    इस फिल्म को लेकर सोशल मीडिया और फिल्म जगत में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की भी है कि आखिर मुख्य भूमिका किस सुपरस्टार की होगी। दोनों दिग्गज कलाकारों की लोकप्रियता इतनी बड़ी है कि फैंस लगातार इस बात को लेकर अपनी राय दे रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म की असली ताकत इसकी स्टारकास्ट नहीं, बल्कि इन कलाकारों का एक साथ आना है, जो इसे खास बना रहा है।

    तृषा कृष्णन का नाम सामने आने के बाद फिल्म के प्रति दर्शकों की दिलचस्पी और बढ़ गई है। अभिनेत्री पहले भी कई बड़े सितारों के साथ सफल फिल्में दे चुकी हैं और उनकी मौजूदगी इस प्रोजेक्ट में एक नया आकर्षण जोड़ सकती है। फैंस अब आधिकारिक घोषणा का इंतजार कर रहे हैं, ताकि यह साफ हो सके कि वह इस फिल्म का हिस्सा बनेंगी या नहीं।

    फिल्म की शूटिंग को लेकर भी तैयारियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इसकी शूटिंग शुरू हो सकती है और इसके लिए बड़े स्तर पर सेट तथा तकनीकी व्यवस्थाएं तैयार की जा रही हैं।

  • शेयर बाजार में तबाही का तूफान, दो दिन में निवेशकों के ₹15 लाख करोड़ साफ, सेंसेक्स 1500 अंक टूटा

    शेयर बाजार में तबाही का तूफान, दो दिन में निवेशकों के ₹15 लाख करोड़ साफ, सेंसेक्स 1500 अंक टूटा

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन बड़ी गिरावट देखने को मिली, जिसने निवेशकों की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। बाजार में बिकवाली का दबाव इतना तेज रहा कि दो कारोबारी सत्रों में निवेशकों की करीब ₹15 लाख करोड़ की संपत्ति साफ हो गई। सेंसेक्स में 1500 अंकों तक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी भी महत्वपूर्ण स्तरों के नीचे फिसल गया।

    बाजार में यह गिरावट केवल घरेलू कारणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर कर दिया। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान विवाद ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डर का माहौल पैदा कर दिया, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दिया।

    विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव बढ़ाने वाली मानी जाती है, क्योंकि इससे महंगाई, आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर असर पड़ सकता है।

    इसके साथ ही भारतीय रुपये में भी बड़ी कमजोरी देखने को मिली। डॉलर के मुकाबले रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जिससे विदेशी निवेशकों की चिंता और बढ़ गई। रुपये की कमजोरी का असर विदेशी फंड्स के रिटर्न पर पड़ता है, जिसके कारण वे बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली ने बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनाया। बड़े वैश्विक फंड जोखिम कम करने के लिए लगातार भारतीय इक्विटी से दूरी बना रहे हैं। इसका असर खासतौर पर बड़े शेयरों और बैंकिंग सेक्टर में देखने को मिला, जहां भारी बिकवाली दर्ज की गई।

    बाजार में गिरावट को और तेज करने में डेरिवेटिव एक्सपायरी का भी बड़ा योगदान रहा। कमजोर सेंटीमेंट के बीच ट्रेडर्स ने अपनी पोजीशन घटानी शुरू कर दी, जिससे अचानक वॉलेटिलिटी बढ़ गई और बाजार में गिरावट और गहरी हो गई।

    सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो आईटी, रियल एस्टेट और वित्तीय सेवाओं से जुड़े शेयरों में सबसे ज्यादा कमजोरी देखी गई। निवेशकों को डर है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर टेक्नोलॉजी कंपनियों की कमाई पर पड़ सकता है। हालांकि कमोडिटी और ऑयल एंड गैस सेक्टर में कुछ मजबूती जरूर देखने को मिली, क्योंकि ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों का इन कंपनियों को लाभ मिल सकता है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार दबाव वाले दौर में है और निवेशकों को सावधानी के साथ कदम उठाने की जरूरत है। उनका कहना है कि ऐसे समय में घबराहट में फैसले लेने से बचना चाहिए और मजबूत कंपनियों पर लंबी अवधि के नजरिए से ध्यान देना चाहिए।

    फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के रुख पर बनी हुई है। आने वाले कारोबारी सत्रों में यही तय करेगा कि बाजार में स्थिरता लौटेगी या गिरावट का दबाव और बढ़ेगा।

  • रूस-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती से बढ़ी भारत की चिंता! सस्ते तेल से लेकर सैन्य सहयोग तक गहराते रिश्ते

    रूस-पाकिस्तान की बढ़ती दोस्ती से बढ़ी भारत की चिंता! सस्ते तेल से लेकर सैन्य सहयोग तक गहराते रिश्ते




    नई दिल्ली। पाकिस्तान और रूस के बीच तेजी से बढ़ती नजदीकियों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ऊर्जा संकट, तेल व्यापार और सैन्य सहयोग को लेकर दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। रूस में पाकिस्तान के राजदूत Faisal Niaz Tirmizi ने संकेत दिए हैं कि पाकिस्तान एक बार फिर रूस से बड़े पैमाने पर तेल आयात बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इस बयान के बाद क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

    रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने होर्मुज जलडमरूमध्य संकट और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता के बीच रूसी तेल आयात बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया है। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और बढ़ती महंगाई से जूझ रहा है। ऐसे में सस्ता रूसी तेल इस्लामाबाद के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    दरअसल, पाकिस्तान ने पहली बार रूस से सस्ते तेल खरीदने की पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री Imran Khan के कार्यकाल में की थी। इमरान खान की मॉस्को यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत तेज हुई थी। इसके बाद अप्रैल 2023 में पाकिस्तान ने रूस को रियायती दरों पर कच्चे तेल का पहला आधिकारिक ऑर्डर दिया। जून 2023 में रूसी कच्चे तेल की पहली खेप कराची बंदरगाह पहुंची थी, जिसमें करीब 45 हजार मीट्रिक टन यूराल क्रूड शामिल था। खास बात यह रही कि पाकिस्तान ने इस तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर की बजाय चीनी युआन में किया था।

    हालांकि बाद में पाकिस्तान ने रूसी तेल आयात धीमा कर दिया था। इसकी बड़ी वजह रूसी क्रूड का भारी होना और खाड़ी देशों की तुलना में ट्रांसपोर्ट लागत ज्यादा होना बताया गया। लेकिन अब वैश्विक ऊर्जा संकट और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान फिर से रूस की ओर झुकता दिखाई दे रहा है।

    सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि रक्षा और सैन्य सहयोग में भी रूस और पाकिस्तान के संबंध मजबूत हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच नियमित सैन्य अभ्यास और सुरक्षा सहयोग पहले से जारी हैं। यही कारण है कि रूस-पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियों को भारत के लिए रणनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रूस पारंपरिक रूप से भारत का करीबी सहयोगी रहा है, लेकिन बदलती वैश्विक राजनीति में मॉस्को अब दक्षिण एशिया में अपने विकल्प भी मजबूत करना चाहता है। वहीं पाकिस्तान अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था और ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूस के साथ रिश्ते गहरे करने में जुटा है।

    हालांकि भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी अब भी बेहद मजबूत मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान और रूस के बढ़ते संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा जरूर तेज कर दी है।

  • ट्रंप का बड़ा यू-टर्न! जिस अधिकारी को हटाया था, उसी को फिर सौंपी अमेरिका की आपदा सुरक्षा की कमान

    ट्रंप का बड़ा यू-टर्न! जिस अधिकारी को हटाया था, उसी को फिर सौंपी अमेरिका की आपदा सुरक्षा की कमान



    नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रम्प  ने एक बार फिर बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए पूर्व नेवी सील अधिकारी कैमरन हैमिल्टन को संघीय आपातकालीन प्रबंधन एजेंसी यानी फ़ेमा की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया है। खास बात यह है कि यही कैमरन हैमिल्टन एक साल पहले एजेंसी के अस्थायी प्रमुख पद से हटा दिए गए थे। अब उनकी वापसी ने अमेरिकी राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।

    व्हाइट हाउस की ओर से सोमवार को हैमिल्टन के नामांकन की घोषणा की गई। अगर अमेरिकी सीनेट उनकी नियुक्ति को मंजूरी देती है, तो वे आपातकालीन प्रबंधन और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया मामलों में ट्रंप प्रशासन के सबसे अहम सलाहकारों में शामिल होंगे। उन्हें होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के साथ मिलकर अमेरिका की आपदा प्रबंधन रणनीति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी जाएगी।

    कैमरन हैमिल्टन पूर्व नेवी सील अधिकारी रह चुके हैं और सुरक्षा मामलों में उनका लंबा अनुभव माना जाता है। हालांकि पिछले साल उन्हें फ़ेमा के कार्यवाहक प्रमुख पद से हटा दिया गया था। उस समय उन्होंने एजेंसी के अस्तित्व और उसकी जरूरत का खुलकर समर्थन किया था, जबकि ट्रंप प्रशासन लगातार फ़ेमा को कमजोर करने या खत्म करने जैसे संकेत दे रहा था। यही वजह थी कि उनके हटाए जाने को लेकर उस समय काफी विवाद भी हुआ था।

    अब उनकी वापसी ऐसे वक्त में हो रही है जब अमेरिका में प्राकृतिक आपदाओं, तूफानों और आपात स्थितियों से निपटने को लेकर संघीय एजेंसियों की भूमिका पर बहस तेज है। ट्रंप पहले भी फ़ेमा की कार्यप्रणाली की आलोचना कर चुके हैं और कई मौकों पर यह संकेत दे चुके हैं कि राज्यों को आपदा प्रबंधन में ज्यादा जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हैमिल्टन की दोबारा नियुक्ति ट्रंप प्रशासन की नई रणनीति का हिस्सा हो सकती है। एक तरफ ट्रंप फ़ेमा में बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने ऐसे व्यक्ति को चुना है जो एजेंसी की कार्यप्रणाली को अंदर से समझता है और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में मजबूत अनुभव रखता है।

    अमेरिका में अब सबकी नजर सीनेट की मंजूरी पर टिकी है। अगर नामांकन को हरी झंडी मिलती है तो कैमरन हैमिल्टन की वापसी अमेरिकी आपदा प्रबंधन व्यवस्था में बड़े बदलावों का संकेत मानी जा सकती है।

  • पंजाब से अमेरिका पहुंचे परिवार के बेटे ने रचा इतिहास, 176 छात्रों का पूरा एजुकेशन लोन चुकाकर बने मिसाल

    पंजाब से अमेरिका पहुंचे परिवार के बेटे ने रचा इतिहास, 176 छात्रों का पूरा एजुकेशन लोन चुकाकर बने मिसाल



    नई दिल्ली। अमेरिका में भारतीय मूल के समाजसेवी अनिल कोचर इन दिनों चर्चा में हैं। उन्होंने नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के विल्सन कॉलेज ऑफ टेक्सटाइल्स के 176 छात्रों का अंतिम वर्ष का पूरा एजुकेशन लोन चुकाने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। यह ऐलान ग्रेजुएशन समारोह के दौरान किया गया, जहां छात्र अपने भविष्य को लेकर उत्साहित थे, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा आर्थिक बोझ उसी मंच से खत्म होने वाला है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, यह घोषणा यूनिवर्सिटी के रेनॉल्ड्स कोलिजियम में आयोजित दीक्षांत समारोह के दौरान हुई। समारोह में मुख्य वक्ता के तौर पर पहुंचे अनिल कोचर ने कहा कि यह फैसला उनके दिवंगत पिता प्रकाश चंद कोचर को सम्मान देने के लिए लिया गया है। उनके पिता कई दशक पहले पंजाब से अमेरिका आए थे और कठिन संघर्ष के बाद परिवार को नई पहचान दिलाई थी।

    अनिल कोचर ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा किसी भी युवा के भविष्य की सबसे बड़ी ताकत होती है, लेकिन बढ़ते एजुकेशन लोन कई छात्रों के सपनों पर भारी पड़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि छात्र अपने करियर की शुरुआत कर्ज के दबाव से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आजादी के साथ करें।

    समारोह में मौजूद छात्रों और उनके परिवारों के लिए यह पल बेहद भावुक बन गया। कई छात्र खुशी से रो पड़े, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी पढ़ाई का बड़ा कर्ज अचानक खत्म हो जाएगा। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने भी इस पहल को ऐतिहासिक बताते हुए अनिल कोचर की जमकर सराहना की।

    बताया जा रहा है कि अनिल कोचर लंबे समय से शिक्षा और समाजसेवा से जुड़े कार्यों में सक्रिय हैं। वे मानते हैं कि समाज को वापस लौटाना हर सफल व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उनकी यह पहल अब अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारतीय समुदाय में भी प्रेरणा की मिसाल बन गई है।

  • विकास की रफ्तार का मंत्र: MSME सेक्टर को मजबूत ट्रेड स्किल से जोड़ने की जरूरत..

    विकास की रफ्तार का मंत्र: MSME सेक्टर को मजबूत ट्रेड स्किल से जोड़ने की जरूरत..

    नई दिल्ली । भारत की आर्थिक दिशा और भविष्य की विकास रणनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश सामने आया है, जिसमें देश के सूक्ष्म उद्यमों को विकास की रीढ़ बताया गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत की दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि सूक्ष्म और लघु उद्यमों को किस हद तक सक्षम, प्रशिक्षित और प्रतिस्पर्धी बनाया जाता है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में केवल बड़े उद्योग ही नहीं, बल्कि छोटे स्तर के उद्यम भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। दुनिया भर में कई छोटे उद्यम तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और भारत को भी इसी दिशा में अपने सूक्ष्म उद्यमों को तैयार करना होगा।

    उनके अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था की असली ताकत जमीनी स्तर पर काम करने वाले छोटे उद्यमों में छिपी है। ये उद्यम न केवल रोजगार पैदा करते हैं, बल्कि उत्पादन और सेवा क्षेत्र को भी मजबूत आधार देते हैं। यदि इन्हें सही प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग मिले, तो ये देश की विकास दर को नई ऊंचाई तक ले जा सकते हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि केवल उद्यमियों को ही नहीं, बल्कि उनके कर्मचारियों को भी लगातार अपने कौशल में सुधार करना चाहिए। चाहे वह अकाउंटिंग हो, मानव संसाधन प्रबंधन हो या इन्वेंट्री से जुड़ा काम, हर क्षेत्र में दक्षता बढ़ाने की जरूरत है। इससे न केवल कार्यक्षमता में सुधार होगा बल्कि व्यवसायों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ेगी।

    इस विचार को उद्योग जगत के अन्य विशेषज्ञों ने भी महत्वपूर्ण बताया है। उनका मानना है कि भारत की आर्थिक संरचना में सूक्ष्म और लघु उद्यम एक मजबूत आधार की तरह हैं, जो न केवल ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था को जोड़ते हैं बल्कि सामाजिक स्थिरता में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि कौशल, नवाचार और तकनीक के सही उपयोग पर निर्भर करेगी। यदि छोटे उद्यमों को सही दिशा दी जाए, तो वे बड़े उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो सकते हैं और देश की आर्थिक मजबूती को बढ़ा सकते हैं।

    सरकार की ओर से भी हाल के समय में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिनमें वित्तीय सहायता और ऋण गारंटी जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसका उद्देश्य छोटे उद्यमों को आर्थिक जोखिम से सुरक्षित रखते हुए उन्हें विस्तार का अवसर देना है।

    कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि भारत की विकास यात्रा में सूक्ष्म उद्यमों की भूमिका आने वाले वर्षों में और भी महत्वपूर्ण होने वाली है। यदि इन उद्यमों को सही प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और वित्तीय समर्थन मिलता है, तो यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत और स्थायी विकास की दिशा में ले जा सकता है।