Category: Economy

  • म्यूचुअल फंड में बढ़ा निवेश का जोश, फरवरी में इक्विटी इनफ्लो 25,977 करोड़ पार; AUM 82 लाख करोड़ से ऊपर

    म्यूचुअल फंड में बढ़ा निवेश का जोश, फरवरी में इक्विटी इनफ्लो 25,977 करोड़ पार; AUM 82 लाख करोड़ से ऊपर


    नई दिल्ली। भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग में फरवरी के दौरान इक्विटी निवेश में मजबूती देखने को मिली। Association of Mutual Funds in India (AMFI) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में नेट इक्विटी इनफ्लो बढ़कर 25,977.91 करोड़ रुपये हो गया। यह जनवरी के 24,028.59 करोड़ रुपये से अधिक है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशकों का भरोसा इक्विटी म्यूचुअल फंड में बना हुआ है। लंबी अवधि के निवेश के लिए निवेशक लगातार इस विकल्प को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसके कारण इक्विटी फंड में निवेश की गति बनी हुई है।

    इक्विटी AUM में भी हुआ इजाफा
    फरवरी के अंत तक म्यूचुअल फंड उद्योग का इक्विटी एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 35,39,475.91 करोड़ रुपये हो गया। जनवरी में यह आंकड़ा 34,86,777.63 करोड़ रुपये था।

    अगर डेट और अन्य फंड कैटेगरी को भी शामिल किया जाए तो पूरे म्यूचुअल फंड उद्योग का कुल AUM फरवरी के अंत तक 82,02,956.35 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। वहीं पूरे फरवरी महीने में औसत AUM 83,42,616.57 करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले जनवरी के अंत में कुल AUM 81,01,305.58 करोड़ रुपये था और पूरे महीने का औसत AUM 82,01,174.62 करोड़ रुपये रहा था।

    फ्लेक्सी कैप फंड में सबसे ज्यादा निवेश
    फरवरी में सबसे ज्यादा निवेश Flexi Cap Funds में दर्ज किया गया। इस श्रेणी में 6,924.65 करोड़ रुपये का नेट इक्विटी इनफ्लो आया। इसके अलावा Multi Cap Funds में 1,933.53 करोड़ रुपये और Large Cap Funds में 2,111.68 करोड़ रुपये का निवेश हुआ। वहीं Large and Mid Cap Funds में 3,137.73 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया।

    मिडकैप और स्मॉलकैप फंड में निवेश जारी
    फरवरी में Mid Cap Funds में 4,002.99 करोड़ रुपये और Small Cap Funds में 3,881.06 करोड़ रुपये का निवेश दर्ज किया गया।

    इसके अलावा Sectoral and Thematic Funds में भी 2,987.29 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो देखने को मिला। इससे साफ है कि निवेशक अलग-अलग कैटेगरी के फंड में संतुलित निवेश कर रहे हैं।

    हाइब्रिड और डेट स्कीम में भी निवेश
    फरवरी में Hybrid Mutual Fund Schemes में कुल 11,983.37 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो आया, हालांकि यह जनवरी के 17,356.02 करोड़ रुपये से कम रहा।

    वहीं Debt Mutual Fund Schemes में फरवरी के दौरान 94,530 करोड़ रुपये का कुल इनफ्लो दर्ज किया गया, जो जनवरी में आए 1,56,458.63 करोड़ रुपये से कम है।

    गोल्ड ETF और इंडेक्स फंड में भी निवेश
    फरवरी में निवेशकों ने अन्य निवेश विकल्पों में भी रुचि दिखाई। Gold ETFs में 5,254.95 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। इसके अलावा Index Funds में 3,233.44 करोड़ रुपये और अन्य Exchange Traded Funds में 4,487.15 करोड़ रुपये का निवेश आया।

    फरवरी में लॉन्च हुए 21 नए फंड
    फरवरी के दौरान म्यूचुअल फंड उद्योग में कई नए निवेश विकल्प भी सामने आए। इस महीने कुल 21 नए फंड लॉन्च किए गए। इनमें 8 इक्विटी फंड, 1 डेट स्कीम, 1 हाइब्रिड स्कीम, 4 इंडेक्स फंड और 7 ETF शामिल हैं।

  • निवेशकों का भरोसा बरकरार! फरवरी में म्यूचुअल फंड SIP इनफ्लो 29,845 करोड़ रुपये पहुंचा

    निवेशकों का भरोसा बरकरार! फरवरी में म्यूचुअल फंड SIP इनफ्लो 29,845 करोड़ रुपये पहुंचा


    नई दिल्ली। म्यूचुअल फंड में निवेश का लोकप्रिय माध्यम बन चुके SIP (सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के जरिए फरवरी 2026 में 29,845 करोड़ रुपये का निवेश आया। यह आंकड़ा जनवरी 2026 के 31,002 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रहा। यह जानकारी Association of Mutual Funds in India (AMFI) द्वारा मंगलवार को जारी किए गए आंकड़ों से सामने आई है।

    हालांकि, सालाना आधार पर निवेश में मजबूत बढ़त देखने को मिली है। फरवरी 2025 में SIP इनफ्लो 25,999 करोड़ रुपये था, जबकि इस साल यह बढ़कर 29,845 करोड़ रुपये हो गया। यानी एक साल में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो म्यूचुअल फंड में बढ़ते निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।

    इक्विटी फंड में भी बढ़ा निवेश
    इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेशकों की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है। फरवरी में नेट इक्विटी इनफ्लो बढ़कर 25,977.91 करोड़ रुपये हो गया, जो जनवरी में 24,028.59 करोड़ रुपये था। यह संकेत देता है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद निवेशक इक्विटी फंड में निवेश जारी रखे हुए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि के निवेश के लिए SIP और इक्विटी फंड को निवेशक बेहतर विकल्प मान रहे हैं। यही कारण है कि बाजार में अस्थिरता के बावजूद निवेश की रफ्तार बनी हुई है।

    फ्लेक्सी कैप फंड में सबसे ज्यादा निवेश
    फरवरी में सबसे अधिक निवेश Flexi Cap Funds में देखा गया। इस श्रेणी में 6,924.65 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। हालांकि यह आंकड़ा जनवरी के 7,672.36 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रहा।

    वहीं Multi Cap Funds में फरवरी के दौरान 1,933.53 करोड़ रुपये का निवेश आया, जो जनवरी के 1,995.23 करोड़ रुपये से थोड़ा कम है।

    इसके अलावा Large Cap Funds में निवेश बढ़कर 2,111.68 करोड़ रुपये हो गया, जबकि जनवरी में यह 2,004.98 करोड़ रुपये था।

    मिडकैप और स्मॉलकैप फंड में भी निवेशकों की दिलचस्पी
    मिडकैप और स्मॉलकैप फंड में भी निवेशकों की रुचि बनी रही। फरवरी में Mid Cap Funds में 4,002.99 करोड़ रुपये का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया। वहीं Small Cap Funds में निवेश बढ़कर 3,881.06 करोड़ रुपये हो गया, जो जनवरी में 2,942.11 करोड़ रुपये था।

    इसके अलावा Sectoral and Thematic Funds में भी निवेश बढ़कर 2,987.29 करोड़ रुपये हो गया, जो जनवरी के 1,042.56 करोड़ रुपये से काफी ज्यादा है।

    म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का AUM भी बढ़ा
    फरवरी के अंत तक म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री का इक्विटी एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 35,39,475.91 करोड़ रुपये हो गया। जनवरी में यह 34,86,777.63 करोड़ रुपये था।

    अगर डेट फंड को मिलाकर देखा जाए तो कुल AUM (Assets Under Management) फरवरी के अंत तक 82,02,956.35 करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं पूरे फरवरी महीने में औसत AUM 83,42,616.57 करोड़ रुपये रहा।

    इसके मुकाबले जनवरी के अंत में कुल AUM 81,01,305.58 करोड़ रुपये था और पूरे महीने का औसत AUM 82,01,174.62 करोड़ रुपये रहा था।

    SIP के जरिए निवेश का ट्रेंड लगातार मजबूत
    विशेषज्ञों के मुताबिक SIP के जरिए निवेश का ट्रेंड लगातार मजबूत हो रहा है। छोटे निवेशकों से लेकर बड़े निवेशक तक नियमित निवेश के इस तरीके को अपनाते जा रहे हैं।

    बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद SIP निवेशकों को लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न देने का भरोसा देता है। यही वजह है कि हर महीने म्यूचुअल फंड उद्योग में SIP के जरिए बड़ी मात्रा में निवेश आता रहा है और भविष्य में भी इसके और बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। 📊

  • चंडीगढ़ ब्रांच फ्रॉड केस में बड़ा कदम, IDFC First Bank ने चुकाए 645 करोड़ रुपये के दावे

    चंडीगढ़ ब्रांच फ्रॉड केस में बड़ा कदम, IDFC First Bank ने चुकाए 645 करोड़ रुपये के दावे


    नई दिल्ली। निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक IDFC First Bank ने मंगलवार को बताया कि उसने अपनी चंडीगढ़ शाखा में सामने आए धोखाधड़ी मामले से जुड़े सभी दावों का निपटारा कर दिया है। बैंक ने प्रभावित खातों से जुड़े कुल 645 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया है। यह राशि बैंक के शुरुआती अनुमान से करीब 55 करोड़ रुपये अधिक है।

    बैंक ने यह जानकारी स्टॉक एक्सचेंज को दी और स्पष्ट किया कि अब तक की जांच में कोई नई गड़बड़ी सामने नहीं आई है। बैंक के मुताबिक सभी दावे उसी घटना और उसी चंडीगढ़ शाखा से जुड़े हैं और फिलहाल किसी नए मामले की पुष्टि नहीं हुई है।

    शुरुआती अनुमान से बढ़ी भुगतान राशि
    बैंक के अनुसार शुरुआत में धोखाधड़ी की राशि करीब 590 करोड़ रुपये आंकी गई थी। हालांकि बाद में जांच और खातों के मिलान के दौरान कुछ अतिरिक्त दावे सामने आए, जिसके बाद कुल भुगतान बढ़कर 645 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। बैंक ने कहा कि उसने सभी प्रभावित ग्राहकों के दावों का निपटारा अपने निर्धारित सिद्धांतों और प्रक्रियाओं के अनुसार किया है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि 25 फरवरी 2026 के बाद देश भर में इस घटना से संबंधित कोई नया दावा सामने नहीं आया है।

    ग्राहकों के खातों का पूरा मिलान
    आईडीएफसी फर्स्ट बैंक ने बताया कि इस मामले से जुड़े सभी खातों का मिलान पूरा कर लिया गया है। बैंक ने कहा कि यह घटना केवल चंडीगढ़ की एक शाखा तक सीमित थी और पूरे बैंकिंग सिस्टम पर इसका कोई व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा है।

    बैंक ने अपने ग्राहकों का भरोसा बनाए रखने के लिए यह भी कहा कि वह इस मामले में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगा और धोखाधड़ी से हुई राशि की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया जारी रखेगा।

    बैंक के डिपॉजिट बेस पर नहीं पड़ा असर
    बैंक के मुताबिक इस घटना के बावजूद उसके डिपॉजिट बेस पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। 28 फरवरी 2026 तक बैंक का कुल डिपॉजिट 2,92,381 करोड़ रुपये रहा, जबकि दिसंबर 2025 के अंत में यह 2,91,133 करोड़ रुपये था।

    इससे साफ संकेत मिलता है कि ग्राहकों का भरोसा बैंक पर बना हुआ है और जमा राशि में स्थिरता बनी हुई है। बैंक ने यह भी बताया कि उसका लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) मौजूदा तिमाही में 114 प्रतिशत के आरामदायक स्तर पर है, जो बैंक की वित्तीय स्थिति को मजबूत दर्शाता है।

    हरियाणा सरकार के खातों से जुड़ा था मामला
    इससे पहले सामने आई जानकारी के अनुसार यह मामला Haryana सरकार के कुछ खातों से जुड़े लगभग 590 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी से संबंधित था। इस मामले में बैंक के कुछ कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। मामले की गंभीरता को देखते हुए बैंक ने अंतरराष्ट्रीय ऑडिट फर्म KPMG को फॉरेंसिक ऑडिट का जिम्मा सौंपा है। उम्मीद है कि इस ऑडिट की अंतिम रिपोर्ट अगले चार से पांच सप्ताह के भीतर सामने आ जाएगी, जिससे पूरे मामले की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।

    जांच पूरी होने तक चार अधिकारी निलंबित
    बैंक ने इस घटना के बाद त्वरित कार्रवाई करते हुए चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। बैंक का कहना है कि जांच पूरी होने तक ये अधिकारी अपने पद पर नहीं रहेंगे। इस बीच घटना के बाद Government of Haryana ने एहतियाती कदम उठाते हुए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के साथ-साथ AU Small Finance Bank को भी सरकारी कामकाज से तत्काल प्रभाव से हटा दिया है।

    बैंक ने कहा कि जांच पूरी होने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल वह ग्राहकों के हितों की सुरक्षा और बैंकिंग प्रणाली की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए हर संभव कदम उठा रहा है।

  • ग्लोबल संकेतों से बाजार में जोश, हरे निशान में खुला शेयर मार्केट; कंज्यूमर स्टॉक्स में जोरदार खरीदारी

    ग्लोबल संकेतों से बाजार में जोश, हरे निशान में खुला शेयर मार्केट; कंज्यूमर स्टॉक्स में जोरदार खरीदारी


    नई दिल्ली। वैश्विक बाजारों से मिले मजबूत संकेतों के चलते भारतीय शेयर बाजार ने मंगलवार को जोरदार शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में निवेशकों का रुझान सकारात्मक रहा और प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ खुले। BSE Sensex 809 अंक यानी करीब एक प्रतिशत की तेजी के साथ 78,375.73 के स्तर पर खुला। वहीं Nifty 50 भी 252 अंक या लगभग एक प्रतिशत की मजबूती के साथ 24,280.80 के स्तर पर कारोबार करता नजर आया। वैश्विक बाजारों में सकारात्मक माहौल और घरेलू स्तर पर निवेशकों की मजबूत खरीदारी के चलते शुरुआती सत्र में बाजार में उत्साह दिखाई दिया।

    कंज्यूमर ड्यूरेबल्स शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी
    मंगलवार के शुरुआती कारोबार में बाजार की तेजी का नेतृत्व कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर ने किया। Nifty Consumer Durables Index दो प्रतिशत से अधिक की तेजी के साथ टॉप गेनर बनकर उभरा। इसके अलावा ऑटो, पीएसयू बैंक, रियल्टी, मैन्युफैक्चरिंग, मेटल, फार्मा, डिफेंस, हेल्थकेयर, मीडिया, कमोडिटी और एनर्जी सेक्टर के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर आईटी और ऑयल एंड गैस सेक्टर के शेयरों में हल्की कमजोरी दर्ज की गई, जिसके चलते ये सूचकांक लाल निशान में कारोबार करते दिखे।

    मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी तेजी
    लार्जकैप शेयरों के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों के शेयरों में भी तेजी का रुख देखने को मिला। Nifty Midcap 100 Index 618 अंक यानी 1.10 प्रतिशत की बढ़त के साथ 56,884 के स्तर पर पहुंच गया। वहीं Nifty Smallcap 100 Index 224 अंक या 1.39 प्रतिशत की तेजी के साथ 16,357 के स्तर पर कारोबार करता दिखा। इससे साफ संकेत मिला कि बाजार में केवल बड़ी कंपनियों ही नहीं, बल्कि मिड और स्मॉलकैप कंपनियों में भी निवेशकों का भरोसा बना हुआ है।

    इन दिग्गज कंपनियों के शेयरों में रही बढ़त
    सेंसेक्स पैक में कई दिग्गज कंपनियों के शेयर तेजी के साथ कारोबार करते नजर आए। इनमें InterGlobe Aviation, UltraTech Cement, Asian Paints, Mahindra & Mahindra, Adani Ports, Titan Company, Tata Steel, Larsen & Toubro, ICICI Bank, State Bank of India, Maruti Suzuki, Bajaj Finserv, HDFC Bank, Hindustan Unilever, Trent Limited, Kotak Mahindra Bank, Bharat Electronics Limited और Sun Pharmaceutical शामिल रहे। वहीं दूसरी ओर Infosys, Tech Mahindra, HCLTech, Power Grid Corporation of India, Bharti Airtel, ITC Limited और Axis Bank के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली।

    एशियाई और अमेरिकी बाजारों का मिला सपोर्ट
    वैश्विक बाजारों से भी सकारात्मक संकेत मिले। एशिया के प्रमुख बाजार जैसे Nikkei 225, Shanghai Composite Index और Hang Seng Index बढ़त के साथ खुले। इसके अलावा बैंकॉक, जकार्ता और सोल के बाजारों में भी तेजी का रुख देखने को मिला। अमेरिकी बाजार भी सोमवार के कारोबारी सत्र में मजबूती के साथ बंद हुए थे। Dow Jones Industrial Average में करीब 0.50 प्रतिशत और टेक्नोलॉजी आधारित Nasdaq Composite में 1.38 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई।

    एफआईआई ने बेचे शेयर, डीआईआई ने किया निवेश
    निवेश के मोर्चे पर विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों का रुख अलग-अलग रहा। विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी Foreign Institutional Investors ने सोमवार को 6,345.57 करोड़ रुपये के शेयरों की बिकवाली की। वहीं घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी Domestic Institutional Investors ने 9,013.80 करोड़ रुपये का निवेश कर बाजार को सहारा दिया।

    कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी
    अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी के बाद अब कुछ नरमी देखने को मिल रही है। खबर लिखे जाने तक WTI Crude Oil 6.30 प्रतिशत गिरकर 88.80 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। वहीं Brent Crude 6.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 92.69 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक वैश्विक संकेतों की मजबूती और घरेलू निवेशकों की खरीदारी से फिलहाल बाजार में सकारात्मक रुख बना हुआ है, हालांकि आगे के सत्रों में वैश्विक घटनाक्रम और कच्चे तेल की कीमतें बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

  • ट्रंप के ईरान युद्ध जल्द खत्म होने के संकेत के बाद कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट,,,

    ट्रंप के ईरान युद्ध जल्द खत्म होने के संकेत के बाद कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट,,,


    नई दिल्ली।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के यह संकेत देने के बाद कि ईरान में युद्ध जल्द (Iran War) ही समाप्त हो जाएगा, कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Price) में भारी गिरावट आई है। ब्रेंट क्रूड 91.55 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमत में 10% तक की गिरावट आई और यह 85.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है।

    यह गिरावट सोमवार को हुए उतार-चढ़ाव भरे कारोबारी सत्र के बाद आई है, जब तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का दायरा महामारी के दौरान कीमतों के नकारात्मक होने के बाद सबसे ज्यादा था। बता दें मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने ग्लोबल एनर्जी माार्केट्स को हिलाकर रख दिया है और मुद्रास्फीति संकट को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    ब्लूमबर्ग के मुताबिक फ्लोरिडा में एक संवाददाता सम्मेलन में ट्रंप ने कहा कि वह तेल से संबंधित प्रतिबंधों में छूट देने और होर्मुज स्ट्रेट्स से टैंकरों को एस्कॉर्ट करने के लिए अमेरिकी नौसेना को तैनात करने की योजना बना रहे हैं।

    ट्रंप ने सोमवार देर रात पत्रकारों से कहा, “हम तेल की कीमतों को कम रखना चाहते हैं।” उन्होंने कहा, “इस संकट की वजह से कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ गई थीं,” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि यह संघर्ष इस सप्ताह के अंत तक खत्म होगा।


    तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं थीं

    सोमवार को तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं, जब फारस की खाड़ी के प्रमुख उत्पादक देशों को होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने के कारण उत्पादन कम करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। यह संकरे जलमार्ग आमतौर पर वैश्विक कच्चे तेल के प्रवाह का पांचवां हिस्सा संभालता है। हालांकि, बाद में सत्र में कीमतों में गिरावट आई क्योंकि, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने आपातकालीन भंडार जारी करने के प्रयास पर विचार किया।


    ट्रंप पर अतिरिक्त दबाव

    यह संघर्ष अब अपने दूसरे सप्ताह में है और इसमें एक दर्जन से अधिक देश शामिल हो गए हैं, जिससे तेल, प्राकृतिक गैस और गैसोइल जैसे उत्पादों सहित ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल आया है। अमेरिका में खुदरा पेट्रोल की कीमतें अगस्त 2024 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे ट्रंप पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने टैंकरों को एस्कॉर्ट करने या तेल संबंधी प्रतिबंधों में छूट देने की योजना पर अतिरिक्त जानकारी नहीं दी, सिवाय इसके कि उन्होंने सोमवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर इस विषय पर चर्चा की थी। पिछले सप्ताह, ट्रंप प्रशासन ने भारत के लिए रूसी कच्चे तेल की अपनी खरीद में अस्थायी रूप से वृद्धि करने का रास्ता साफ कर दिया, जो इस व्यापार पर महीनों से चल रहे दबाव से उलट था।


    बाजार की नजरें होर्मुज पर

    बाजार की नजरें होर्मुज से टैंकरों के आवागमन को फिर से शुरू होते देखने पर टिकी हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से कई जहाजों पर हमले के कारण अधिकांश जहाजों ने इस जलमार्ग से बचना शुरू कर दिया है। फिर भी, हाल के दिनों में सऊदी कच्चा तेल ले जाने वाला एक टैंकर वहां से गुजरा, जबकि ईरान ने इस मार्ग से बड़ी मात्रा में तेल भेजना जारी रखा है।


    होर्मुज के बंद होने के कारण

    भंडारण तेजी से भर जाने के कारण सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात ने उत्पादन कम कर दिया है। मध्य पूर्व से कच्चे तेल और तेल उत्पादों के प्रवाह पर पड़े इस संकट के कारण रिफाइनरियों ने कुछ कार्यों और आपूर्ति को रोक दिया है, और एशियाई ऊर्जा खरीदारों ने मूल रूप से अन्य क्षेत्रों के लिए जाने वाले ईंधन शिपमेंट को लुभाने के लिए प्रतिस्पर्धियों से आगे बढ़कर बोली लगाई है।

  • Iran युद्ध के बीच सोने की कीमतों में जोरदार उछाल… 35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा कुल बाजार मूल्य

    Iran युद्ध के बीच सोने की कीमतों में जोरदार उछाल… 35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचा कुल बाजार मूल्य


    नई दिल्ली।
    ईरान युद्ध (Iran America War) के कारण दुनियाभर के बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी है। दूसरी तरफ, इस अनिश्चितता के बीच सोने (Gold) की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है। लिहाजा, निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में तेजी से सोने की ओर रुख कर रहे हैं। इस वजह से वैश्विक स्तर पर सोने का कुल बाजार मूल्य लगभग 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह मूल्य भारत और ब्रिटेन यानी यूनाइटेड किंगडम (UK) की संयुक्त अर्थव्यवस्था यानी साझा GDP से भी काफी बड़ा माना जा रहा है।

    विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका और इजरायल के हमलों और उसके जवाब में ईरान की सैन्य कार्रवाई के बाद वैश्विक बाजारों में भारी अस्थिरता आई है। इसी वजह से निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से पैसा निकालकर सोने में लगाना शुरू कर दिया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत 5,400 डॉलर प्रति औंस से ऊपर पहुंच गई है और यह 5,600 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंचने वाली है।


    क्यों कहा जा रहा है ‘फाइनेंशियल सुपरपावर’?

    एक रिपोर्ट के मुताबिक सोने की कीमतों में इस तेज बढ़ोत्तरी के कारण दुनिया में मौजूद कुल सोने का अनुमानित मूल्य 30–35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। तुलनात्मक रूप से देखें तो भारत की कुल जीडीपी फिलहाल लगभग 3.5 से 4 ट्रिलियन डॉलर के बीच है जिसके जल्द ही 5 ट्रिलियन डॉलर को पार करने की उम्मीद है। दूसरी तरफ यूनाइडेट किंगडम यानी ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर की है। इस तरह सोने का कुल मूल्य दोनों देशों की संयुक्त जीडीपी से कई गुना बड़ा हो गया है। इसी कारण कुछ विश्लेषक इसे “गोल्ड सुपरपावर” कह रहे हैं।


    निवेशकों के लिए सुरक्षित ठिकाना

    जब दुनिया में युद्ध, महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक सोने को सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद संपत्ति मानते हैं। इसलिए हर बार किसी बड़े भू-राजनीतिक तनाव के दौरान सोने की मांग और कीमत दोनों बढ़ जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार हाल के महीनों में सोने की कीमत बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। इनमें वैश्विक युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव, केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीद, महामारी के बाद बढ़ी महंगाई, डॉलर और अन्य मुद्राओं पर बढ़ती अनिश्चितता।


    आगे क्या होगा?

    हालांकि विशेषज्ञों की राय इस पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि यदि ईरान संघर्ष कम होता है, वैश्विक अर्थव्यवस्था मजबूत होती है या ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो सोने की कीमतों में गिरावट आ सकती है। वहीं कई विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कागजी मुद्राओं पर कम होते भरोसे के कारण सोना लंबे समय तक मजबूत निवेश बना रह सकता है। बहरहाल, ईरान युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बीच सोना एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी सुरक्षित संपत्ति के रूप में उभर रहा है, जिसका कुल मूल्य कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से भी अधिक हो चुका है।

  • ईरान युद्ध के कारण देश में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित… जानें कैसे पूरी होगी जरूरतें?

    ईरान युद्ध के कारण देश में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित… जानें कैसे पूरी होगी जरूरतें?


    नई दिल्ली।
    वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) में उथल-पुथल मची हुई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध (America, Israel, and Iran War) ने मध्य पूर्व की ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से तेल और गैस की सप्लाई चेन बाधित हो गई है, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर गहरा असर पड़ रहा है। इस तनाव के कारण भारत की 40% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की सप्लाई अचानक ठप हो गई है। यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं है; इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था, उद्योगों की रफ्तार और भविष्य में महंगाई की दर पर पड़ सकता है। सरकार एक्शन मोड में है और पेट्रोलियम मंत्रालय युद्ध स्तर पर ‘ऑप्टिमाइजेशन प्लान’ (गैस वितरण की नई योजना) तैयार कर रहा है। आइए इस संकट की गहराई, उद्योगों पर इसके प्रभाव और भारत के ‘प्लान बी’ का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।


    संकट के मुख्य कारण

    वर्तमान संकट की जड़ मध्य पूर्व में है। मार्च 2026 तक, ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी रूप से ब्लॉक कर दिया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। कतर ने अपनी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) उत्पादन को अस्थायी रूप से रोक दिया है, जिससे यूरोप और भारत जैसे आयातकों पर दबाव बढ़ा है। भारत के लिए यह इसलिए गंभीर है क्योंकि उसकी लगभग 52% कच्चे तेल की आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरती है। इसके परिणामस्वरूप, वैश्विक तेल कीमतें 83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो फरवरी 2026 के 72 डॉलर से 15% ऊपर है। भारत में एलपीजी (कुकिंग गैस) की कीमतें 7% बढ़कर दिल्ली में 913 रुपये प्रति 14.2 किलोग्राम सिलेंडर हो गई हैं, जबकि कमर्शियल एलपीजी 1,883 रुपये तक पहुंच गई है।

    भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता FY26 के पहले 10 महीनों में 88.6% तक पहुंच गई है, जो पिछले साल के 88.2% से अधिक है। घरेलू उत्पादन स्थिर रहने (23.5 मिलियन टन) के बावजूद मांग 1.6% बढ़कर 202.2 मिलियन टन हो गई है। एलएनजी आयात में भी 50% कटौती की संभावना है, क्योंकि पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर से सप्लाई पर फोर्स मेजर घोषित कर दिया है।

    यह खबर आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
    यह संकट सिर्फ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है। LNG का उपयोग सिर्फ कारखानों में नहीं होता, बल्कि यह शहरों में पाइप वाली गैस (PNG), वाहनों के ईंधन (CNG), बिजली उत्पादन और कृषि (उर्वरक) के लिए रीढ़ की हड्डी है। गैस की सप्लाई घटने से खुले बाजार में इसकी कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे परोक्ष रूप से परिवहन, माल ढुलाई और रोजमर्रा के उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। इसलिए, इस संकट को समझना हर नागरिक के लिए आवश्यक है।


    किन उद्योगों पर गिरेगी गाज?

    सरकार के नए ‘ऑप्टिमाइजेशन प्लान’ के तहत गैस की राशनिंग तय है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि उपलब्ध गैस को प्राथमिकता के आधार पर बांटा जाएगा। गैर-प्राथमिकता वाले उद्योग (सबसे बड़ा खतरा): रिपोर्ट के अनुसार, गैर-प्राथमिकता वाले सेक्टरों को गैस सप्लाई में भारी कटौती का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें तुरंत कोयला, नेफ्था या फर्नेस ऑयल जैसे वैकल्पिक ईंधनों की ओर रुख करना होगा।

    आम तौर पर सिरेमिक, कांच उद्योग, स्पंज आयरन और कुछ पेट्रोकेमिकल इकाइयों को गैर-प्राथमिकता की श्रेणी में रखा जाता है। इन उद्योगों में उत्पादन धीमा होने की आशंका है। फर्टिलाइजर सेक्टर प्राथमिकता वाला है, लेकिन कटौती संभव है: यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली 60% LNG अकेले कतर से आती है। हालांकि सरकार इसे ‘प्राथमिकता’ मानती है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उर्वरक क्षेत्र की सप्लाई में भी हल्की कटौती से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

    खेती और किसानों के लिए क्या है स्थिति?
    कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए फिलहाल पैनिक (घबराने) का कोई कारण नहीं है। सरकार और उद्योग ने इसके लिए पहले से एक मजबूत ‘शॉक-एब्जॉर्बर’ तैयार रखा है। खरीफ की बुवाई जून में शुरू होगी। अभी मांग कम है, इसलिए उर्वरक कंपनियां अपने कारखानों का नियमित रखरखाव कर रही हैं। देश में उर्वरक का 17.7 मिलियन टन (MT) का सुरक्षित भंडार है, जो पिछले साल (लगभग 13 MT) की तुलना में 36.5% अधिक है। DAP और NPK की बहुतायत: इनका स्टॉक पिछले साल से 70-80% अधिक है। फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए भारत ने अपनी सप्लाई चेन को विविध किया है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता न रहे।


    भारत कैसे करेगा अपनी जरूरतें पूरी?

    भारत हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। गैस की इस भारी कमी को पूरा करने के लिए ‘प्लान बी’ पर तेजी से काम हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की ओर रुख: भारत अपनी 60% LNG पहले से ही पश्चिम एशिया के बाहर से मंगाता है। अब कतर की भरपाई के लिए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों की कंपनियों से अतिरिक्त सप्लाई के लिए बातचीत तेज कर दी गई है।


    सामने खड़ी हैं 2 बड़ी चुनौतियां

    जहाजों का इंतजाम: अचानक नई जगह से गैस लाने के लिए विशेष क्रायोजेनिक LNG टैंकर (जहाज) रातों-रात जुटाना बेहद मुश्किल है।
    लिक्विफिकेशन क्षमता: जिन नए देशों से हम गैस मांग रहे हैं, उनके पास गैस को तरल में बदलने की अतिरिक्त क्षमता तुरंत उपलब्ध होनी चाहिए।

  • पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से LNG सप्लाई को बड़ा झटका… भारत में 40% घटी सप्लाई

    पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से LNG सप्लाई को बड़ा झटका… भारत में 40% घटी सप्लाई


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध (West Asia War) के कारण भारत में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (Liquefied Natural Gas) यानी LNG की सप्लाई को बड़ा झटका लगा है। लगभग 40% LNG सप्लाई प्रभावित होने के बाद, सरकार उर्वरक (फर्टिलाइजर) जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों सहित विभिन्न उद्योगों के लिए एक गैस वितरण योजना (‘ऑप्टिमाइजेशन प्लान’) पर तेजी से काम कर रही है।


    फर्टिलाइजर क्षेत्र पर प्रभाव और सरकार की रणनीति

    टाइम्स ऑफ इंडिया ने मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों के हवाले से लिखा है कि पेट्रोलियम मंत्रालय जल्द ही नई वितरण व्यवस्था को अंतिम रूप दे सकता है। हो सकता है कि ये व्यवस्था आज ही यानी मंगलवार तक लागू भी हो जाए। इसमें उर्वरक क्षेत्र की सप्लाई में कुछ कमी किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, इस कटौती का असर खेती पर नहीं पड़ेगा।

    पर्याप्त गैस आपूर्ति: उर्वरक इकाइयों को उनकी क्षमता के इष्टतम स्तर पर काम करने के लिए पर्याप्त गैस दी जाएगी।

    रखरखाव का समय: गैस की कम उपलब्धता फिलहाल बड़ी चिंता का विषय नहीं है क्योंकि कुछ उर्वरक कंपनियां इस समय का इस्तेमाल अपने कारखानों के नियमित रखरखाव (मेंटेनेंस शटडाउन) के लिए कर रही हैं।

    सुस्ती का दौर: फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के अनुसार, कृषि क्षेत्र में अभी मांग कम है। खरीफ फसलों की बुवाई जून में शुरू होगी। इस दौरान खपत मध्यम रहती है, जिससे उद्योग को अपना स्टॉक भरने और रखरखाव का समय मिल जाता है।


    बंपर स्टॉक से दूर हुई चिंता

    आंकड़ों के अनुसार, भारत के पास उर्वरकों का पर्याप्त भंडार है, जो संकट के समय एक बड़े ‘कुशन’ (सुरक्षा कवच) का काम करेगा। शुक्रवार तक कुल उर्वरक स्टॉक 36.5% बढ़कर 17.7 मिलियन टन (MT) हो गया है, जो पिछले साल इसी समय लगभग 13 MT था। FAI के मुताबिक, DAP और NPK का भंडार पिछले साल की तुलना में 70-80% अधिक है।

    फरवरी के अंत तक एजेंसियों ने 9.8 MT उर्वरक का आयात किया है। इसके अलावा, अगले तीन महीनों के लिए 1.7 MT का अतिरिक्त आयात तय किया जा चुका है। उर्वरक विभाग ने स्पष्ट किया है कि भारत ने फॉस्फेटिक उर्वरकों के आयात स्रोतों में विविधता लाई है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण किसानों को खाद की कमी का सामना न करना पड़े।


    गैर-प्राथमिकता वाले उद्योगों की चुनौतियां

    विशेषज्ञों की मानें तो उर्वरक सरकार की प्राथमिकता है, इसलिए इसमें भारी कटौती नहीं होगी। हालांकि, गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कम गैस सप्लाई से ही काम चलाना होगा। इन उद्योगों को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तुरंत वैकल्पिक ईंधन की व्यवस्था करनी होगी।


    नए LNG स्रोतों की तलाश और बाधाएं

    भारत वर्तमान में अपनी कुल जरूरत का 60% LNG पश्चिम एशिया के अलावा अन्य स्रोतों से प्राप्त करता है। अब सरकार और कंपनियां बचे हुए हिस्से की भरपाई के लिए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों से अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं।

    इसमें दो मुख्य चुनौतियां हैं:

    शिपिंग: गैस के परिवहन के लिए विशेष LNG टैंकरों की व्यवस्था करना।
    क्षमता: यह सुनिश्चित करना कि नए सप्लायर देशों के पास जहाजों पर लादने से पहले गैस को लिक्विफाई (तरलीकृत) करने की अतिरिक्त क्षमता हो।


    संकट का मुख्य कारण क्या है?

    भारत में यूरिया निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली 60% LNG कतर से आयात की जाती है। हाल ही में ईरान द्वारा कतर की कतरएनर्जी फैसिलिटी पर किए गए हमले के बाद, कतर को अपना उत्पादन रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसी कारण भारत की सप्लाई चेन में यह बड़ी रुकावट आई है।

  • जंग के डर से शेयर बाजार में भूचाल: सेंसेक्स 1862 अंक टूटा, निफ्टी 582 अंक लुढ़का

    जंग के डर से शेयर बाजार में भूचाल: सेंसेक्स 1862 अंक टूटा, निफ्टी 582 अंक लुढ़का


    नई दिल्‍ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध की आशंका ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को हिला कर रख दिया है। इसी का असर सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिला जहां सप्ताह के पहले कारोबारी दिन बाजार भारी गिरावट के साथ खुला। निवेशकों में घबराहट के माहौल के बीच बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1, 862 अंकों की तेज गिरावट के साथ 77, 056 के स्तर पर खुला जबकि एनएसई का 50 शेयरों वाला निफ्टी 582 अंक टूटकर 23, 868 के स्तर पर पहुंच गया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में जोखिम की भावना को बढ़ा दिया है। युद्ध की आशंका के चलते निवेशक जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी बना रहे हैं और सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर शेयर बाजारों पर पड़ रहा है जहां व्यापक स्तर पर बिकवाली देखने को मिल रही है।

    घरेलू बाजार में भी निवेशकों की चिंता साफ नजर आई। निफ्टी फ्यूचर्स पिछले बंद स्तर की तुलना में करीब 722 अंकों की गिरावट के साथ कारोबार करते दिखे जो इस बात का संकेत है कि बाजार में दबाव अभी और बढ़ सकता है। विश्लेषकों के अनुसार यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं तो आने वाले दिनों में बाजार में और अधिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है।

    केवल भारत ही नहीं बल्कि एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में भी सोमवार को बड़ी गिरावट दर्ज की गई। जापान का निक्की 225 सूचकांक करीब 6.22 प्रतिशत गिरकर 53, 000 के स्तर से नीचे आ गया जबकि टॉपिक्स इंडेक्स में 5.27 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स भी बुरी तरह लुढ़क गया। पिछले सप्ताह 11 प्रतिशत गिरने के बाद सोमवार को इसमें 8 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हुई जिसके कारण सर्किट ब्रेकर सक्रिय हो गया और लगभग 20 मिनट के लिए ट्रेडिंग रोकनी पड़ी। वहीं हांगकांग का हैंग सेंग इंडेक्स भी वायदा कारोबार में भारी गिरावट के साथ खुला।

    अमेरिकी शेयर बाजारों के फ्यूचर्स में भी भारी दबाव देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में डॉउ जोन्स फ्यूचर्स करीब 950 अंक तक गिर गए जबकि एसएंडपी 500 फ्यूचर्स 100 अंकों से अधिक नीचे कारोबार करते दिखे। टेक्नोलॉजी शेयरों पर भी दबाव रहा और नैस्डैक फ्यूचर्स करीब 400 अंक तक गिर गए।

    इस गिरावट की बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेज उछाल भी है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने और हुर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका के कारण वैश्विक तेल बाजार में हलचल मच गई है। इसके अलावा कुवैत ईरान और यूएई जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन में कटौती की खबरों ने भी बाजार को प्रभावित किया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 18.03 प्रतिशत बढ़कर 109.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 20.23 प्रतिशत की तेजी के साथ 109.29 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में हालात और बिगड़ते हैं और तेल उत्पादन प्रभावित होता है तो कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं। ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था और शेयर बाजारों पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। फिलहाल निवेशक हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं और बाजार में भारी उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।

  • सोना-चांदी में भारी गिरावट: वैश्विक तनाव और मजबूत डॉलर से कीमतें फिसलीं, निवेशकों को झटका

    सोना-चांदी में भारी गिरावट: वैश्विक तनाव और मजबूत डॉलर से कीमतें फिसलीं, निवेशकों को झटका


    नई दिल्‍ली । सोने और चांदी में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए सप्ताह की शुरुआत अच्छी नहीं रही। 9 मार्च 2026 को शुरुआती कारोबार में दोनों कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव मजबूत होते अमेरिकी डॉलर और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर कमोडिटी बाजार पर साफ दिखाई दिया। इसके चलते सोना और चांदी दोनों दबाव में आ गए और निवेशकों को दोहरी मार झेलनी पड़ी क्योंकि शेयर बाजार में भी उतार चढ़ाव बना हुआ है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर सोमवार को 24 कैरेट शुद्धता वाले सोने का 10 ग्राम वायदा भाव 0.83 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1 60 293 रुपये पर खुला। वहीं चांदी की कीमतों में भी कमजोरी देखी गई और यह करीब 1 प्रतिशत गिरकर 2 65 590 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक स्तर पर पैदा हुए तनावपूर्ण माहौल और डॉलर की मजबूती ने कीमती धातुओं की मांग पर दबाव बनाया है।

    दरअसल अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। इस तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है जिससे निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई है। जब तेल महंगा होता है और डॉलर मजबूत होता है तब आमतौर पर सोना और चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं पर दबाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इनकी कीमतों में गिरावट देखने को मिली।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार की बात करें तो शुरुआती कारोबार में स्पॉट गोल्ड करीब 1.70 प्रतिशत गिरकर 5 071.20 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। वहीं कॉमेक्स पर चांदी में और ज्यादा कमजोरी देखने को मिली और यह करीब 4.25 प्रतिशत गिरकर 80.89 डॉलर प्रति औंस तक आ गई। हालांकि बाद के कारोबार में सोने के दाम में हल्की रिकवरी देखी गई और यह 5 098.30 डॉलर प्रति औंस पर ट्रेड करता नजर आया लेकिन यह भी पिछले बंद भाव से करीब 1.17 प्रतिशत कम रहा। इसी तरह चांदी ने भी अपनी कुछ गिरावट से उबरने की कोशिश की और यह 82.74 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार करती दिखी जो फिर भी करीब 1.86 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जारी भू राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण कमोडिटी बाजार में फिलहाल उतार चढ़ाव बना रह सकता है। यदि डॉलर और तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो सोना और चांदी पर दबाव बना रह सकता है। वहीं यदि वैश्विक तनाव कम होता है तो इनकी कीमतों में फिर से तेजी लौटने की संभावना भी बनी रहेगी। ऐसे में निवेशकों को फिलहाल बाजार की चाल पर नजर रखते हुए सावधानी के साथ निवेश करने की सलाह दी जा रही है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का सीधा असर कीमती धातुओं की कीमतों पर पड़ रहा है।