Category: Religious Astrology

  • उज्जैन का काल भैरव मंदिर क्यों है दुनिया भर में प्रसिद्ध, जानिए शराब के भोग और अनोखी मान्यता का रहस्य

    उज्जैन का काल भैरव मंदिर क्यों है दुनिया भर में प्रसिद्ध, जानिए शराब के भोग और अनोखी मान्यता का रहस्य


    नई दिल्ली। धार्मिक नगरी उज्जैन अपने विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के साथ साथ अनेक प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं में से एक है बाबा काल भैरव का प्राचीन मंदिर जहां सदियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा आज भी निभाई जाती है जो पहली बार सुनने वाले को हैरान कर देती है। यहां भगवान को पेड़े लड्डू या मिठाई का नहीं बल्कि मदिरा का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु फूल माला और प्रसाद के साथ शराब की बोतल लेकर मंदिर पहुंचते हैं और इसे बाबा काल भैरव को श्रद्धा भाव से अर्पित करते हैं। यही अनूठी परंपरा इस मंदिर को देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में विशेष पहचान दिलाती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूप माने जाते हैं। तंत्र साधना और शैव परंपरा में उनका विशेष महत्व है। तांत्रिक मान्यता के अनुसार काल भैरव की पूजा में मदिरा का भोग स्वीकार्य माना गया है। इसी कारण इस मंदिर में वर्ष भर श्रद्धालु बाबा को मदिरा अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह परंपरा कई सौ वर्षों से लगातार चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा और विधि विधान के साथ निभाई जाती है।

    इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण वह रहस्यमयी दृश्य है जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन यहां पहुंचते हैं। जब कोई भक्त मदिरा अर्पित करता है तो मंदिर के पुजारी उसे एक छोटी धातु की थाली या पात्र में लेकर बाबा काल भैरव की प्रतिमा के मुख से लगाते हैं। कुछ ही क्षणों में पूरा पात्र खाली हो जाता है और ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रतिमा स्वयं भोग ग्रहण कर रही हो। प्रतिमा में कोई स्पष्ट छेद या पाइप दिखाई नहीं देता फिर भी मदिरा गायब हो जाती है। वर्षों से यह दृश्य लोगों के लिए कौतूहल और आस्था का विषय बना हुआ है। इस रहस्य को लेकर अनेक तरह की चर्चाएं होती रही हैं लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह बाबा काल भैरव की दिव्य कृपा और चमत्कार का प्रतीक है।

    मंदिर के बाहर का वातावरण भी अन्य धार्मिक स्थलों से अलग दिखाई देता है। जहां अधिकांश मंदिरों के बाहर फूल माला नारियल और मिठाई की दुकानें होती हैं वहीं यहां पूजा सामग्री के साथ मदिरा की अधिकृत बोतलें भी उपलब्ध रहती हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग के लिए बोतल खरीदते हैं और मंदिर में अर्पित करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार भोग अर्पित करने के बाद शेष मदिरा को प्रसाद स्वरूप श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है जिसे लोग आस्था के साथ ग्रहण करते हैं।

    काल भैरव को उज्जैन नगरी का कोतवाल या रक्षक भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि महाकालेश्वर के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन किए बिना उज्जैन की धार्मिक यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहले बाबा महाकाल के दर्शन करते हैं और फिर काल भैरव मंदिर पहुंचकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। विशेष अवसरों पर यहां दूरदराज के राज्यों और विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    काल भैरव मंदिर केवल अपनी अनोखी परंपरा के कारण ही नहीं बल्कि आस्था और आध्यात्मिक विश्वास के केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहां आने वाले भक्तों के लिए मदिरा का भोग किसी सामान्य वस्तु का अर्पण नहीं बल्कि धार्मिक परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक है। यही वजह है कि उज्जैन का यह प्राचीन मंदिर आज भी देश के सबसे अनूठे और चर्चित धार्मिक स्थलों में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है।

  • घर की सुख-समृद्धि और धन लाभ से जुड़ा है झाड़ू का नियम, शनिवार और अमावस्या के खास मुहूर्त पर पुरानी वस्तु बदलने से दूर हो सकता है बड़ा वास्तु दोष

    घर की सुख-समृद्धि और धन लाभ से जुड़ा है झाड़ू का नियम, शनिवार और अमावस्या के खास मुहूर्त पर पुरानी वस्तु बदलने से दूर हो सकता है बड़ा वास्तु दोष

    नई दिल्ली । भारतीय सनातन परंपरा और वास्तु शास्त्र के प्राचीन सिद्धांतों में घर की हर छोटी-बड़ी वस्तु का संबंध परिवार की आर्थिक और मानसिक स्थिति से जोड़ा गया है। इसी कड़ी में घर की नियमित सफाई के लिए उपयोग होने वाली झाड़ू को केवल एक साधारण वस्तु न मानकर, धन की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक और सकारात्मक ऊर्जा का संवाहक माना गया है। वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, दैनिक जीवन में अनजाने में की जाने वाली कुछ छोटी-सी गलतियां और झाड़ू का गलत दिशा में रखरखाव घर में कंगाली और आर्थिक तंगी का एक बड़ा कारण बन सकता है।

    आधुनिक जीवनशैली में अक्सर लोग घर की सफाई करने के बाद झाड़ू को किसी भी स्थान पर रख देते हैं, अथवा बहुत अधिक घिस जाने और टूटने के बाद भी उसका निरंतर उपयोग करते रहते हैं। वास्तु विज्ञान के मुताबिक, यह आदत घर की सकारात्मकता को नष्ट करती है। जब किसी झाड़ू के बाल झड़ने लगें या उसका हैंडल टूट जाए, तो उसे तुरंत घर से हटा देना चाहिए। टूटी हुई झाड़ू से सफाई करने पर घर के भीतर वित्तीय बाधाएं उत्पन्न होने लगती हैं और संचित धन अनावश्यक कार्यों में खर्च होने लगता है।

    शास्त्रों में पुरानी झाड़ू को घर से बाहर निकालने और नई झाड़ू को घर में प्रवेश कराने के लिए भी विशेष दिन और मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं। किसी भी दिन झाड़ू बदलना वर्जित माना गया है। इसके लिए शनिवार का दिन सबसे उत्तम और शुभ फलदायी माना जाता है। शनिवार के दिन नई झाड़ू को उपयोग में लाने से घर की संचित नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता का पूरी तरह से नाश होता है। इसके अलावा, अमावस्या की तिथि, शुक्ल पक्ष की एकादशी या किसी भी शुभ नक्षत्र के दौरान नई झाड़ू खरीदना घर की बरकत को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है।

    इसके साथ ही, झाड़ू को रखने के स्थान और उसकी स्थिति को लेकर भी कड़े नियम बताए गए हैं। झाड़ू को कभी भी घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने या ऐसी जगह पर नहीं रखना चाहिए, जहां बाहर से आने वाले किसी भी अतिथि की नजर उस पर सीधे पड़े। इसे हमेशा घर के किसी छिपे हुए और सुरक्षित स्थान पर ही लिटाकर रखना चाहिए। वास्तु के नियमों के अनुसार, झाड़ू को खड़ा करके रखना एक गंभीर दोष माना जाता है, जो घर के सदस्यों के बीच वैचारिक मतभेद और तनाव को बढ़ाता है। दिशाओं के संदर्भ में, इसे रखने के लिए हमेशा दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा यानी नैऋत्य कोण का ही चुनाव करना सबसे अधिक उपयुक्त माना गया है।

    समय चक्र के अनुसार भी सफाई व्यवस्था के कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनका उल्लंघन आर्थिक नुकसान का कारण बनता है। भारतीय परिवारों में सूर्यास्त के बाद यानी शाम के समय घर में झाड़ू लगाना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। ऐसी मान्यता है कि संध्याकाल के समय सफाई करने से घर में मौजूद लक्ष्मी जी का अनादर होता है और वह घर से बाहर चली जाती हैं, जिससे परिवार को धन की कमी का सामना करना पड़ता है।

    वास्तु सिद्धांतों के अनुसार, पुरानी झाड़ू का विसर्जन करते समय भी बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। जब भी घर में नई झाड़ू लाई जाए, तो पुरानी झाड़ू को केवल शनिवार या अमावस्या के दिन ही घर की सीमा से बाहर करना चाहिए। इसे किसी सुनसान स्थान पर या किसी बड़े पेड़ के नीचे छोड़ देना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुपयोगी हो चुकी पुरानी झाड़ू को भूलकर भी जलाना नहीं चाहिए, क्योंकि झाड़ू को अग्नि के हवाले करना सीधे तौर पर महालक्ष्मी के अपमान के समान माना जाता है, जिससे घर की बरकत पूरी तरह से समाप्त हो सकती है।

  • 30 जुलाई से शुरू होगा सावन का पावन महीना, जानिए कब पड़ेंगे चारों सावन सोमवार

    30 जुलाई से शुरू होगा सावन का पावन महीना, जानिए कब पड़ेंगे चारों सावन सोमवार


    नई दिल्ली। भगवान शिव की आराधना और भक्ति का सबसे पवित्र माने जाने वाला सावन माह इस वर्ष 30 जुलाई 2026 से शुरू हो रहा है। हिंदू धर्म में इस महीने का विशेष धार्मिक महत्व है, क्योंकि पूरा सावन भगवान भोलेनाथ की उपासना को समर्पित माना जाता है। इस दौरान देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और भक्त व्रत, पूजा-अर्चना तथा जलाभिषेक कर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

    सावन में चार सोमवार का रहेगा विशेष संयोग
    सावन के सोमवार का व्रत अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और नियमपूर्वक सोमवार का व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा करते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। वर्ष 2026 के सावन माह में कुल चार सोमवार पड़ेंगे।

    सावन सोमवार की तिथियां इस प्रकार हैं:

    प्रथम सोमवार – 3 अगस्त 2026
    द्वितीय सोमवार – 10 अगस्त 2026
    तृतीय सोमवार – 17 अगस्त 2026
    चतुर्थ सोमवार – 24 अगस्त 2026

    क्यों खास माना जाता है सावन?
    सावन केवल धार्मिक आस्था का महीना ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना और आत्मिक शांति का भी प्रतीक माना जाता है। वर्षा ऋतु के बीच हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह समय भगवान शिव की उपासना के लिए अनुकूल माना जाता है। पूरे महीने शिव मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु जल, दूध, दही, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा तथा चंदन अर्पित कर भोलेनाथ को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

    पूजा के दौरान रखें इन बातों का ध्यान
    सावन में सात्विक जीवनशैली अपनाने का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु इस दौरान तामसिक भोजन से परहेज करते हैं और सोमवार के दिन व्रत रखकर भगवान शिव का ध्यान करते हैं। कई भक्त पूरे दिन निराहार रहते हैं, जबकि कुछ फलाहार ग्रहण कर व्रत का पालन करते हैं।

    पूजा के समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है। इसके साथ ही शिव चालीसा का पाठ और रुद्राभिषेक करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

  • आज का राशिफल 4 जुलाई: किस राशि पर होगी मां लक्ष्मी की कृपा, किसे बरतनी होगी सावधानी, जानें पूरे दिन का भविष्यफल

    आज का राशिफल 4 जुलाई: किस राशि पर होगी मां लक्ष्मी की कृपा, किसे बरतनी होगी सावधानी, जानें पूरे दिन का भविष्यफल


    नई दिल्ली। 4 जुलाई का दिन ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार कई राशियों के लिए नई शुरुआत और महत्वपूर्ण फैसलों का संकेत लेकर आया है। कुछ लोगों को करियर और व्यापार में सफलता मिलने के योग बन रहे हैं तो कुछ राशियों को आर्थिक मामलों और पारिवारिक संबंधों में संयम बरतने की सलाह दी गई है। आज का दिन मेहनत करने वालों के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आ सकता है जबकि जल्दबाजी और गुस्से से नुकसान होने की भी संभावना है। आइए जानते हैं सभी 12 राशियों का दैनिक राशिफल।

    मेष राशि के जातकों के लिए आज का दिन उत्साह और ऊर्जा से भरपूर रहेगा। कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत की सराहना होगी। आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और रुका हुआ धन मिलने के संकेत हैं। परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा।

    वृषभ राशि वालों को आज खर्चों पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है। किसी पुराने मित्र से मुलाकात हो सकती है। नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी मिल सकती है। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा।

    मिथुन राशि के लिए दिन लाभदायक रहेगा। व्यापार में नए अवसर मिलेंगे और विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के संकेत हैं। प्रेम संबंधों में मधुरता बनी रहेगी।

    कर्क राशि वालों को आज भावनाओं में बहकर कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए। पारिवारिक मामलों में धैर्य रखें। नौकरी में वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलेगा और आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर होगी।

    सिंह राशि के जातकों के लिए यात्रा के योग बन रहे हैं। करियर में आगे बढ़ने के नए अवसर मिल सकते हैं। निवेश करने से पहले पूरी जानकारी अवश्य लें। परिवार में खुशियों का माहौल रहेगा।

    कन्या राशि वालों को आज मेहनत का पूरा फल मिलने की संभावना है। लंबे समय से रुके कार्य पूरे होंगे। व्यापार में लाभ होगा और दांपत्य जीवन सुखद रहेगा।

    तुला राशि के लिए दिन सामान्य रहेगा। किसी भी विवाद से दूरी बनाए रखें। आर्थिक मामलों में सोच समझकर निर्णय लें। स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें और खानपान संतुलित रखें।

    वृश्चिक राशि वालों को आज करियर में नई उपलब्धि मिल सकती है। अधिकारियों का सहयोग मिलेगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा। परिवार में शुभ समाचार मिलने के योग हैं।

    धनु राशि के जातकों के लिए दिन भाग्यशाली रहेगा। नई योजनाएं सफल होंगी और व्यापार में लाभ मिलेगा। धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी तथा मानसिक शांति का अनुभव होगा।

    मकर राशि वालों को आज कार्यों में थोड़ी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है लेकिन धैर्य से सभी समस्याओं का समाधान मिलेगा। जीवनसाथी का सहयोग मनोबल बढ़ाएगा।

    कुंभ राशि के लिए दिन शुभ रहेगा। नौकरी और व्यापार में प्रगति के संकेत हैं। पुराने निवेश से लाभ मिल सकता है। मित्रों के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा।

    मीन राशि वालों के लिए आज का दिन सफलता और सम्मान दिलाने वाला रहेगा। पारिवारिक वातावरण सुखद रहेगा। विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए समय अनुकूल है। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा।

    कुल मिलाकर 4 जुलाई का दिन अधिकांश राशियों के लिए सकारात्मक संकेत लेकर आया है। मेहनत ईमानदारी और संयम के साथ किए गए कार्य सफलता दिला सकते हैं। आर्थिक मामलों में सतर्कता और पारिवारिक रिश्तों में मधुर व्यवहार पूरे दिन को बेहतर बनाएगा।

  • 5 जुलाई से बदलेगी मंगल की चाल, ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन चार राशियों पर मंडराएगा आर्थिक और मानसिक संकट, रहें बेहद सतर्क

    5 जुलाई से बदलेगी मंगल की चाल, ज्योतिषीय गणना के अनुसार इन चार राशियों पर मंडराएगा आर्थिक और मानसिक संकट, रहें बेहद सतर्क

    नई दिल्ली । ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के राशि और नक्षत्र परिवर्तन को मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना गया है। इसी कड़ी में शौर्य, साहस, पराक्रम और शारीरिक शक्ति के कारक माने जाने वाले उग्र ग्रह मंगल का एक बड़ा नक्षत्र गोचर होने जा रहा है। आगामी 5 जुलाई 2026, रविवार की आधी रात 12 बजकर 01 मिनट पर मंगल ग्रह रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और वे 24 जुलाई 2026 तक इसी स्थिति में गतिमान रहेंगे। यद्यपि मंगल का यह नक्षत्र परिवर्तन कई राशियों के लिए शुभ और प्रगतिशील परिणाम लेकर आएगा, परंतु ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार चार ऐसी विशेष राशियां भी हैं जिनके जातकों के लिए यह गोचर अत्यधिक चुनौतीपूर्ण और कष्टदायी साबित हो सकता है। इस अवधि में प्रभावित जातकों को विशेष रूप से बड़े फैसले लेने से बचने, अनियंत्रित क्रोध पर काबू रखने और आर्थिक मामलों में अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

    इस खगोलीय गोचर से प्रभावित होने वाली पहली मुख्य राशि वृष है। वृष राशि के जातकों के लिए मंगल का यह नक्षत्र परिवर्तन जीवन में कई तरह की विपरीत परिस्थितियां और चुनौतियां उत्पन्न कर सकता है। इस दौरान इन्हें अपने आर्थिक मामलों में विशेष रूप से सतर्कता बनाए रखनी होगी। खर्चों की अधिकता के कारण संचित धन पानी की तरह बह सकता है, जिससे बजटीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। इसके अतिरिक्त, कार्यस्थल या ऑफिस में सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत करते समय अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना अनिवार्य होगा। किसी भी प्रकार के विवाद से दूर रहकर धैर्यपूर्वक समस्याओं का समाधान खोजना ही इस समय हितकर रहेगा।

    द्वितीय प्रभावित राशि तुला है, जिसके जातकों के लिए मंगल का रोहिणी नक्षत्र में जाना प्रतिकूल समय की शुरुआत का संकेत है। इस अवधि में जातक अपनी ऊर्जा, कार्यक्षमता और आत्मविश्वास में एक अप्रत्याशित कमी महसूस कर सकते हैं। इसके साथ ही, स्वभाव में अकारण ही आक्रामकता और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दौरान किसी भी तरह का महत्वपूर्ण अथवा रणनीतिक निर्णय जल्दबाजी में लेने से भारी नुकसान हो सकता है। पारिवारिक जीवन में मधुरता बनाए रखने के लिए अपने रिश्तों में अहंकार या ‘इगो’ को बिल्कुल भी आड़े न आने दें और अपने शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के प्रति पूरी तरह सजग रहें।

    इस सूची में तीसरी प्रभावित राशि मकर है, जिसके जातकों के लिए मंगल का यह नक्षत्र गोचर बड़ी आर्थिक क्षति का मुख्य कारक बन सकता है। मकर राशि वाले लोगों को इस समय सीमा के भीतर किसी भी तरह के नए निवेश या बड़े वित्तीय लेन-देन से पूरी तरह दूरी बनाकर रखनी चाहिए। अनापेक्षित और अनावश्यक खर्चों में भारी वृद्धि होने के योग बन रहे हैं। कार्यक्षेत्र या व्यापार में किसी भी बाहरी व्यक्ति पर आंख मूंदकर भरोसा करने से बचें, अन्यथा विश्वासघात या बड़ा धोखा मिलने की पूरी संभावना है। इस कठिन दौर में मानसिक तनाव को स्वयं पर हावी न होने दें और अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखें।

    चौथी और अंतिम प्रभावित राशि मीन है, जिसके जातकों के लिए मंगल का यह गोचर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिकूल और कठिन परिस्थितियां उत्पन्न करने वाला साबित होगा। इस अवधि के दौरान किसी भी प्रकार के जोखिम भरे कार्यों, सट्टेबाजी या लॉटरी जैसे निवेशों से पूरी तरह दूर रहना ही समझदारी होगी। पारिवारिक संबंधों में वैचारिक मतभेद के कारण तनाव और कड़वाहट बढ़ने के प्रबल संकेत हैं। यह संपूर्ण समय मीन राशि के जातकों के लिए अत्यंत धैर्य, संयम और विवेक से काम लेने का है। लापरवाही बरतने पर गंभीर धन हानि और मान-प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचने की आशंका व्यक्त की गई है।

  • आषाढ़ मास की योगिनी एकादशी पर बन रहा विशेष संयोग; गृहस्थों और वैष्णव संप्रदाय के लिए पंचांग ने जारी किए अलग-अलग शुभ मुहूर्त

    आषाढ़ मास की योगिनी एकादशी पर बन रहा विशेष संयोग; गृहस्थों और वैष्णव संप्रदाय के लिए पंचांग ने जारी किए अलग-अलग शुभ मुहूर्त

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना और आत्मशुद्धि के लिए सबसे उत्तम और पवित्र दिनों में गिना जाता है। इसी कड़ी में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी का स्थान बेहद विशिष्ट माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में इसे समस्त कष्टों और अनजाने में हुए पापों को दूर करने वाला एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत बताया गया है। इस वर्ष वर्ष 2026 में एक खास ज्योतिषीय और खगोलीय स्थिति बन रही है, क्योंकि एकादशी तिथि 10 जुलाई और 11 जुलाई, दोनों ही तारीखों को स्पर्श कर रही है। इसी तिथि विस्तार के कारण देश भर के श्रद्धालुओं और व्रत रखने वाले परिवारों के मन में सही तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वैदिक पंचांग की गणना और शास्त्रों के नियमों के आधार पर ज्योतिषाचार्यों ने इस भ्रम को दूर करते हुए सही तिथि और शुभ मुहूर्त का निर्धारण किया है।

    वैदिक पंचांग की गणितीय गणना के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 10 मिनट पर होने जा रहा है। यह तिथि अगले दिन यानी 11 जुलाई 2026, शनिवार की सुबह 5 बजकर 23 मिनट तक प्रभावी बनी रहेगी, जिसके तत्काल बाद द्वादशी तिथि का आगमन हो जाएगा। इस बार एक अनोखा ज्योतिषीय संयोग यह देखने को मिल रहा है कि दोनों ही दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं रहेगी। 11 जुलाई को सूर्योदय होने से पूर्व ही एकादशी तिथि समाप्त हो जाएगी और द्वादशी का आरंभ हो जाएगा। शास्त्रों में इस तरह की स्थिति को तकनीकी रूप से एकादशी क्षय की संज्ञा दी जाती है।

    शास्त्रों और पुराणों में वर्णित नियमों के अनुसार, जब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जहां किसी भी दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि पूर्ण रूप से उपलब्ध न हो, तब पहले दिन ही व्रत रखने का विधान सबसे श्रेष्ठ और उत्तम माना गया है। इस शास्त्रीय मान्यता और पंचांगीय गणना के आधार पर गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले सामान्य श्रद्धालुओं के लिए 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखना पूरी तरह से शास्त्र-सम्मत और उचित रहेगा। वहीं दूसरी ओर, वैष्णव संप्रदाय और सन्यासी परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु 11 जुलाई 2026, शनिवार को इस पावन व्रत का संपादन करेंगे।

    धार्मिक नियमों के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत के कड़े आचरण और संयम की शुरुआत एक दिन पूर्व यानी दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाती है। दशमी के दिन व्रती को पूरी तरह से सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और हर प्रकार के तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। इस दौरान मूंग, मसूर, गेहूं, जौ और बैंगन जैसी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। एकादशी के मुख्य दिन श्रद्धालुओं को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थल पर कलश की स्थापना कर भगवान विष्णु के स्वरूप की विधिवत आराधना की जाती है, जिसमें पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विशेष रूप से तुलसी दल अर्पित किया जाता है। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

    इस व्रत के दौरान कुछ विशेष और कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है, जिसमें सबसे प्रमुख चावल का त्याग है। एकादशी के दिन व्रती के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी चावल का सेवन वर्जित रहता है। इसके अतिरिक्त, एकादशी और द्वादशी दोनों ही दिनों में तुलसी दल यानी तुलसी के पत्ते तोड़ना पूरी तरह निषेध माना गया है, इसलिए पूजा के लिए आवश्यक पत्तों को एक दिन पूर्व ही तोड़कर सुरक्षित रख लेना चाहिए। व्रत का समापन अगले दिन यानी द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करके किया जाता है। पारण से पूर्व अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न और धन का दान देना पद्म पुराण के अनुसार अत्यंत कल्याणकारी माना गया है, जो मानव जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

  • गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

    गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

    नई दिल्ली । सनातन धर्म के अठारह पुराणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण महाग्रंथ गरुड़ पुराण में मनुष्य के जीवन, मृत्यु और उसके पश्चात मिलने वाले अगले जन्म को लेकर कई गूढ़ और चौंकाने वाले तथ्यों का विश्लेषण किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार, मृत्यु के बाद किसी जीव को कौन सा शरीर प्राप्त होगा, यह कोई आकस्मिक घटना या भाग्य का खेल नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से मनुष्य द्वारा अपने वर्तमान जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों के लेखा-जोखा पर निर्भर करता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मनुष्य अपने जीवित रहते ही अपने अगले जन्म की पृष्ठभूमि तैयार कर लेता है और उसके वर्तमान कर्म ही यह सुनिश्चित करते हैं कि वह पुनः मानव योनि में आएगा या किसी पशु-पक्षी के रूप में धरती पर जन्म लेगा।

    धार्मिक ग्रंथ के प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवनकाल में सदाचार का पालन करते हैं, निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों की सहायता करते हैं और धर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते, उन्हें मृत्यु के उपरांत पुनः मनुष्य जीवन का उपहार मिलता है। ऐसी पुण्यात्माओं को अगले जन्म में संस्कारी, समृद्ध और प्रतिष्ठित परिवारों में जन्म लेने का सुअवसर प्राप्त होता है, जहां उन्हें समाज में उचित मान-सम्मान और तमाम भौतिक सुख-सुविधाएं सुलभ होती हैं। इसके विपरीत, जो लोग जीवन भर केवल लोभ, मोह, छल-कपट, चोरी और दूसरों को प्रताड़ित करने जैसे कृत्य में संलिप्त रहते हैं, उनका अगला जीवन अत्यंत कष्टदायी और दयनीय हो जाता है। ऐसे नकारात्मक आचरण वाले व्यक्तियों को मानव चोले से वंचित होकर विभिन्न पशु-पक्षियों की निकृष्ट योनियों में भटकना पड़ता है।

    गरुड़ पुराण में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट अपराधों और पापों के आधार पर मिलने वाले विशिष्ट जन्मों और उनके दंड का भी विस्तृत विवरण दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार, जो मनुष्य जीवन भर दूसरों के अन्न की चोरी करता है अथवा छल से किसी के धन को हड़पता है, वह अपने अगले जन्म में चूहा या नेवला बनता है। इसी प्रकार, जो लोग समाज में पूजनीय अपने माता-पिता, गुरुजनों अथवा वयोवृद्ध बुजुर्गों का अनादर और अपमान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में कौआ या कोई ऐसा अप्रिय पक्षी बनना पड़ता है जिसे मानव समाज सहज रूप से देखना पसंद नहीं करता। इसके अतिरिक्त, पराई महिलाओं पर कुदृष्टि रखने वाले और अपनों के साथ विश्वासघात करने वाले पुरुषों के लिए गरुड़ पुराण में कठोरतम दंड का प्रावधान है; ऐसे लोग अगले जन्म में भयानक अजगर या रेंगने वाले विषैले जीवों के रूप में धरती पर आते हैं।

    आलस्य और अकर्मण्यता को भी सनातन व्यवस्था में एक बड़ा दोष माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो लोग पूर्णतः आलसी होते हैं और स्वयं पुरुषार्थ न करके केवल दूसरों की गाढ़ी कमाई पर ऐश करते हैं, वे अगले जन्म में गधा या बैल के रूप में जन्म लेते हैं ताकि वे प्रकृति के नियम के तहत कठिन शारीरिक श्रम का वास्तविक महत्व समझ सकें। इसी क्रम में, जो लोग समाज में अपने ऊंचे पद, सत्ता और बाहुबल के घमंड में चूर होकर असहाय एवं कमजोर वर्गों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें अगले जन्म में हिंसक प्रवृत्ति के पशुओं जैसे शेर या भेड़िए का शरीर प्राप्त होता है, जहां उन्हें स्वयं के अस्तित्व की रक्षा और भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।

    मूलतः, गरुड़ पुराण यह दार्शनिक संदेश देता है कि संपूर्ण प्रकृति हर जीव को उसके मूल स्वभाव और आचरण के अनुरूप ही अगला भौतिक शरीर प्रदान करती है। यदि किसी व्यक्ति का आंतरिक स्वभाव हिंसक, क्रूर और तामसी है, तो उसे स्वाभाविक रूप से जानवर का शरीर मिलता है, और यदि वह भीतर से शांत, करुणामयी तथा परोपकारी है, तो वह पुनः मनुष्य का श्रेष्ठ जीवन प्राप्त करता है। यह आध्यात्मिक व्यवस्था मानव को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उसके वर्तमान आचरण में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रतिपादित की गई है। गरुड़ पुराण का परम संदेश यही है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभता से मिलता है, इसलिए सांसारिक नफरत और लोभ को त्यागकर प्रेम, दया और धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए क्योंकि मृत्यु के बाद केवल कर्म ही जीव के साथ जाते हैं।

  • जब अजेय बजरंगबली की शक्ति भी पड़ गई थी कम; जानिए उन तीन महायोद्धाओं की गाथा जिनके सामने वीर हनुमान को स्वीकार करनी पड़ी थी हार

    जब अजेय बजरंगबली की शक्ति भी पड़ गई थी कम; जानिए उन तीन महायोद्धाओं की गाथा जिनके सामने वीर हनुमान को स्वीकार करनी पड़ी थी हार

    नई दिल्ली । सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों में पवनपुत्र हनुमान जी को असीम बल, बुद्धि और अजेय शक्ति का प्रतीक माना गया है। रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक उनके पराक्रम की अनगिनत गाथाएं प्रचलित हैं, जहां बड़े से बड़े मायावी राक्षस और योद्धा उनके सामने टिक नहीं सके। लेकिन धार्मिक इतिहास में कुछ ऐसे अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट प्रसंगों का भी वर्णन मिलता है, जब अप्रतिहत शक्तियों के स्वामी बजरंगबली को भी विशेष परिस्थितियों के कारण झुकना पड़ा या अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी। पौराणिक वृत्तांतों के अनुसार, ऐसे तीन प्रमुख अवसर आए जब हनुमान जी की शक्ति भी काम नहीं आई और उन्हें पराजय का वधु स्वीकार करना पड़ा।

    ऐसी ही पहली घटना महान संत और सिद्ध तपस्वी मच्छिंद्रनाथ जी से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार मच्छिंद्रनाथ जी भगवान श्रीराम की भक्ति में पूरी तरह लीन होकर रामेश्वरम के समीप समुद्र में स्नान कर रहे थे। उसी समय वहां मौजूद हनुमान जी ने एक साधारण वानर का रूप धारण कर उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। हनुमान जी ने अपनी मायावी शक्ति से वहां मूसलाधार बारिश शुरू कर दी और स्वयं को बचाने के लिए एक कृत्रिम गुफा बनाने का उपक्रम करने लगे। जब मच्छिंद्रनाथ जी ने उन्हें इस कृत्य पर टोकते हुए ज्ञान दिया, तो हनुमान जी ने उनकी आध्यात्मिक क्षमता पर प्रश्न उठाते हुए उन्हें युद्ध की सीधी चुनौती दे दी। इसके बाद दोनों के मध्य एक भीषण युद्ध छिड़ गया, परंतु मच्छिंद्रनाथ जी की मंत्र शक्ति और योग बल के सामने हनुमान जी का प्रत्येक प्रहार निष्फल साबित हुआ। अंततः वायुदेव के हस्तक्षेप के बाद इस युद्ध को विराम दिया गया और हनुमान जी ने सहर्ष अपनी हार स्वीकार की।

    द्वितीय प्रसंग रामायण काल के सबसे विनाशकारी युद्ध के दौरान का है, जो रावण के परम पराक्रमी पुत्र मेघनाद यानी इंद्रजीत से संबद्ध है। माता सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया और रावण के छोटे पुत्र अक्षय कुमार का वध कर दिया, तब लंकाधिपति ने क्रोधित होकर मेघनाद को रणभूमि में भेजा। युद्ध क्षेत्र में जब मेघनाद के सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र हनुमान जी के सामने विफल हो गए, तब उसने अत्यंत विवश होकर पवनपुत्र पर सीधे ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया। यद्यपि हनुमान जी को स्वयं ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी अस्त्र उनका अनिष्ट नहीं कर सकता, परंतु सृष्टि के रचयिता और ब्रह्मास्त्र की मर्यादा एवं मान रखने के लिए हनुमान जी ने स्वेच्छा से स्वयं को उस बंधन में बंधने दिया। तकनीकी दृष्टिकोण से इस प्रसंग में मेघनाद हनुमान जी की गति को रोकने और उन्हें बंदी बनाने में सफल रहा था।

    तृतीय और सर्वाधिक भावुक कर देने वाला वृत्तांत भगवान श्रीराम के आत्मज लव और कुश से जुड़ा हुआ है। लंका विजय के पश्चात जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का भव्य आयोजन किया गया, तो यज्ञ का अश्व देश के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण कर रहा था। इसी दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निवास कर रहे बालक लव और कुश ने उस अश्व को बंदी बना लिया। अश्व को मुक्त कराने हेतु जब श्रीराम की चतुरंगिणी सेना वहां पहुंची, तो दोनों बालकों के अभूतपूर्व युद्ध कौशल के सम्मुख लक्ष्मण और शत्रुघ्न जैसे महारथी भी परास्त हो गए। स्थिति को नियंत्रण से बाहर होते देख स्वयं हनुमान जी, भरत और सुग्रीव के साथ युद्ध के मैदान में उतरे।

    रणभूमि में जब हनुमान जी ने इन दो अत्यंत छोटे बालकों के अलौकिक शौर्य और पराक्रम को देखा, तो वे विस्मय में पड़ गए। वास्तविकता का पता लगाने के लिए जब उन्होंने नेत्र बंद कर ध्यान लगाया, तो उन्हें तुरंत यह बोध हो गया कि ये दोनों बालक कोई साधारण क्षत्रिय नहीं, बल्कि उनके आराध्य प्रभु श्रीराम और माता सीता के ही अंश हैं। इस सत्य से अवगत होने के पश्चात हनुमान जी के लिए अपने ही स्वामी की संतानों पर अस्त्र उठाना सर्वथा असंभव हो गया। उन्होंने तुरंत युद्ध न करने का नीतिगत निर्णय लिया और अस्त्र त्याग कर शांत खड़े हो गए। इसके बाद लव और कुश ने उन पर निरंतर कई तीखे प्रहार किए, किंतु हनुमान जी ने बिना किसी प्रतिरोध या पलटवार के सब कुछ अत्यंत शांत भाव से सहन किया और प्रेम पूर्वक अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

  • संतोषी माता व्रत का पूरा विधान जानें कब रखें कैसे करें पूजा और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

    संतोषी माता व्रत का पूरा विधान जानें कब रखें कैसे करें पूजा और किन बातों का रखें विशेष ध्यान


    नई दिल्ली । संतोषी माता का व्रत हिंदू धर्म में सबसे लोकप्रिय और श्रद्धा से किए जाने वाले व्रतों में से एक माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से शुक्रवार के दिन रखा जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से संतोषी माता का व्रत करते हैं उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और घर में सुख शांति समृद्धि तथा संतोष का वास होता है। यह व्रत महिलाएं और पुरुष दोनों कर सकते हैं। विवाह में बाधा संतान सुख आर्थिक परेशानियों और पारिवारिक कलह जैसी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए भी इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।

    संतोषी माता का व्रत किसी भी शुक्रवार से शुरू किया जा सकता है। सामान्य रूप से लगातार 16 शुक्रवार तक यह व्रत रखने की परंपरा है। यदि किसी कारणवश बीच में व्रत छूट जाए तो अगले शुक्रवार से फिर श्रद्धापूर्वक व्रत जारी रखा जा सकता है। व्रत की शुरुआत से पहले माता का स्मरण कर अपनी मनोकामना का संकल्प लिया जाता है।

    व्रत वाले दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा स्थल में संतोषी माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। माता को लाल या पीला वस्त्र अर्पित करें और धूप दीप जलाकर पूजा करें। गुड़ और भुने हुए चने का भोग लगाना इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। इसके बाद संतोषी माता की व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ करें। कथा के बाद आरती करें और प्रसाद सभी लोगों में बांटें।

    संतोषी माता के व्रत में सबसे महत्वपूर्ण नियम खट्टी वस्तुओं का त्याग है। व्रत करने वाला स्वयं तो खट्टी चीजें नहीं खाता ही है साथ ही व्रत के दिन किसी अन्य को भी खट्टी वस्तु खिलाने से बचना चाहिए। नींबू इमली आमचूर अचार दही में खट्टापन और अन्य अम्लीय खाद्य पदार्थों से इस दिन परहेज किया जाता है। मान्यता है कि इस नियम का पालन करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

    व्रत के दौरान श्रद्धालु दिनभर फलाहार या एक समय सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। पूजा में माता के समक्ष अपनी मनोकामना व्यक्त करते हुए परिवार की सुख शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। पूरे व्रत काल में संयम सकारात्मक सोच और संतोष का भाव बनाए रखना भी इस व्रत का प्रमुख संदेश माना जाता है।

    जब 16 शुक्रवार का व्रत पूरा हो जाए तब उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दिन संतोषी माता की विशेष पूजा की जाती है और गुड़ चने का प्रसाद वितरित किया जाता है। परंपरा के अनुसार आठ बच्चों को भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा तथा उपहार भी दिए जाते हैं। भोजन में भी किसी प्रकार की खट्टी वस्तु शामिल नहीं की जाती। इसके बाद माता का आशीर्वाद लेकर व्रत का समापन किया जाता है।

    धार्मिक मान्यता है कि संतोषी माता का व्रत केवल मनोकामनाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं बल्कि जीवन में संतोष धैर्य और सकारात्मकता का संदेश भी देता है। जो व्यक्ति श्रद्धा विश्वास और नियमों के साथ यह व्रत करता है उसके जीवन में सुख शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है तथा परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

  • शुक्रवार व्रत कैसे करें धन सुख और समृद्धि पाने के लिए अपनाएं पूजा की सही विधि और उपाय

    शुक्रवार व्रत कैसे करें धन सुख और समृद्धि पाने के लिए अपनाएं पूजा की सही विधि और उपाय


    नई दिल्ली । शुक्रवार का व्रत माता लक्ष्मी और शुक्र ग्रह की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से घर में सुख समृद्धि धन वैभव और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। जिन लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो या परिवार में सुख शांति की कामना हो उनके लिए शुक्रवार का व्रत विशेष फलदायी माना गया है।

    व्रत के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ या सफेद रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर और मुख्य द्वार की सफाई करें। पूजा स्थान पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाकर माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि भगवान विष्णु की प्रतिमा भी हो तो उनका पूजन अवश्य करें क्योंकि माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ पूजी जाती हैं।

    पूजा में कमल का फूल या सफेद सुगंधित पुष्प अर्पित करें। रोली हल्दी अक्षत चंदन धूप दीप नैवेद्य फल मिठाई और खीर का भोग लगाना शुभ माना जाता है। घी का दीपक जलाकर माता लक्ष्मी का ध्यान करें और श्रीसूक्त कनकधारा स्तोत्र या लक्ष्मी अष्टोत्तर नामावली का पाठ करें। इसके साथ ही ऊँ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र की कम से कम 108 बार माला जपना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर सात्विक भोजन का पालन करें। कई लोग केवल फलाहार करते हैं जबकि कुछ श्रद्धालु एक समय बिना लहसुन प्याज का भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान क्रोध कटु वचन और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि माता लक्ष्मी स्वच्छता विनम्रता और मधुर व्यवहार से प्रसन्न होती हैं।

    शाम के समय पुनः माता लक्ष्मी की आरती करें और दीपक जलाएं। यदि संभव हो तो घर के मुख्य द्वार पर भी दीपक रखें। पूजा के बाद परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद बांटें और जरूरतमंद लोगों को भोजन वस्त्र या सफेद रंग की वस्तुओं का दान करें। शुक्रवार के दिन कन्याओं को मिठाई या खीर खिलाना भी शुभ माना जाता है।

    मान्यता है कि लगातार 11 या 16 शुक्रवार तक विधिपूर्वक व्रत करने से आर्थिक संकट दूर होते हैं और घर में सुख समृद्धि का आगमन होता है। हालांकि व्रत का सबसे महत्वपूर्ण नियम श्रद्धा सच्ची निष्ठा और सकारात्मक आचरण माना गया है।

    शुक्रवार का व्रत केवल धन प्राप्ति का माध्यम नहीं बल्कि आत्मसंयम सदाचार और ईश्वर के प्रति आस्था को मजबूत करने का भी अवसर है। जब पूजा के साथ सेवा दान और सद्भाव जुड़ जाता है तब उसका आध्यात्मिक और सकारात्मक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।