Category: Religious Astrology

  • अहोई अष्टमी आज, संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं रखेंगी व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों के दर्शन और व्रत कथा

    अहोई अष्टमी आज, संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं रखेंगी व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों के दर्शन और व्रत कथा

    नई दिल्ली ।अहोई अष्टमी का व्रत आज 1 नवंबर 2026, रविवार को रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, तरक्की और सुखी जीवन की कामना के लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं सुबह से निर्जला या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से अहोई माता की आराधना करने और व्रत कथा सुनने से संतान पर देवी की कृपा बनी रहती है।

    करवा चौथ के बाद आने वाला यह त्योहार उत्तर भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है। इसे अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस दिन शाम को पूजा करने के बाद तारों को अर्घ्य देने की परंपरा है। कुछ परिवारों में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की भी मान्यता है।

    पंचांग के अनुसार, इस वर्ष अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि और शाम की पूजा परंपरा को ध्यान में रखते हुए व्रत 1 नवंबर को रखा जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। तारों के दर्शन का समय शाम करीब 6 बजे बताया गया है, जबकि चंद्रोदय रात करीब 11 बजकर 40 मिनट पर होगा। ये समय दिल्ली के पंचांग के अनुसार हैं। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त और चंद्रोदय के समय में अंतर हो सकता है।

    अहोई अष्टमी के दिन पूजा के लिए अहोई माता का चित्र या पोस्टर, रोली, अक्षत, हल्दी, फूल, माला, दीपक, घी, अगरबत्ती, जल से भरा कलश, दूध, फल और मिठाई की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा हलवा, पूरी, पुए, गेहूं और सरई की सात सींकें भी पूजा सामग्री में शामिल की जाती हैं। पूजा के लिए चौकी और लाल कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है।

    व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करके संतान की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम को पूजा स्थल की सफाई करके चौकी पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है और अहोई माता का चित्र स्थापित किया जाता है। कुछ घरों में दीवार पर भी माता का चित्र बनाने की परंपरा है। इसके बाद माता को रोली, अक्षत, हल्दी, फूल और माला अर्पित की जाती है। दीपक जलाकर धूप-अगरबत्ती दिखाई जाती है और फल-मिठाई का भोग लगाया जाता है।

    पूजा के दौरान अहोई अष्टमी की व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। इसके बाद माता की आरती करके संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। शाम को तारे दिखाई देने पर उन्हें जल से अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण किया जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता को मां पार्वती का स्वरूप माना जाता है। उन्हें संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। पहले यह व्रत मुख्य रूप से पुत्र की लंबी उम्र के लिए रखा जाता था, लेकिन अब माताएं बेटे और बेटी दोनों के अच्छे स्वास्थ्य और सुखद भविष्य की कामना से यह व्रत करती हैं। इस पर्व का संबंध मथुरा के राधा कुंड से भी माना जाता है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले कई दंपति इस दिन राधा कुंड में स्नान और पूजा करते हैं।

    अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की साफ-सफाई के लिए उसकी बहुएं और बेटी जंगल में मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी की कुदाल से अनजाने में एक सेह के बच्चे की मृत्यु हो गई। अपने बच्चे को खोने से दुखी सेह ने साहूकार की बेटी को श्राप देने का निश्चय किया। छोटी बहू ने अपनी ननद को बचाने के लिए श्राप स्वयं लेने की बात कही। इसके बाद उसे संतान से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

    कथा के अनुसार, छोटी बहू ने एक पंडित की सलाह पर गौ माता की सेवा शुरू की। उसकी श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर गौ माता ने उसकी सहायता की। बाद में सेह भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुई और उसने श्राप वापस ले लिया। इसके बाद छोटी बहू के जीवन में खुशियां लौट आईं। मान्यता है कि इसी घटना के बाद संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए अहोई माता का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।

  • शिवभक्तों के लिए जरूरी खबर, असली और नकली रुद्राक्ष में ऐसे पहचानें अंतर, इन चार बातों पर दें ध्यान

    शिवभक्तों के लिए जरूरी खबर, असली और नकली रुद्राक्ष में ऐसे पहचानें अंतर, इन चार बातों पर दें ध्यान


    नई दिल्ली । भगवान शिव की पूजा और उपासना में रुद्राक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष को भगवान शिव का प्रिय माना गया है और इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा तथा मानसिक शांति मिलने की मान्यता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु रुद्राक्ष की माला या एकल दाने को अपने पास रखते हैं। लेकिन इसकी बढ़ती मांग के बीच बाजार में नकली रुद्राक्ष भी बेचे जाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। कई बार प्लास्टिक लकड़ी या दूसरे बीजों से तैयार किए गए दानों को असली बताकर ग्राहकों को बेच दिया जाता है। ऐसे में जरूरी है कि रुद्राक्ष खरीदते समय उसकी बनावट और गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए। कुछ सामान्य तरीकों से शुरुआती जांच जरूर की जा सकती है लेकिन किसी भी घरेलू परीक्षण को असली होने का पक्का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

    रुद्राक्ष की पहचान के लिए सबसे पहले उसकी प्राकृतिक बनावट पर ध्यान देना जरूरी है। असली रुद्राक्ष पर ऊपर से नीचे तक प्राकृतिक धारियां बनी होती हैं। इन धारियों को मुख कहा जाता है। हर दाने में मुखों की संख्या अलग-अलग हो सकती है। इनकी बनावट प्राकृतिक होती है और धारियां दाने के एक सिरे से दूसरे सिरे तक दिखाई देती हैं। नकली रुद्राक्ष में कई बार मशीन या हाथ से बनाई गई कृत्रिम लकीरें देखने को मिलती हैं। इसलिए खरीदते समय दाने को ध्यान से देखना चाहिए। हालांकि केवल धारियां देखकर भी असली होने का अंतिम फैसला नहीं किया जा सकता क्योंकि नकली दानों पर भी ऐसी बनावट तैयार की जा सकती है।

    दूसरा तरीका पानी से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक रूप से कुछ लोग रुद्राक्ष को पानी से भरी कटोरी में डालकर उसकी जांच करते हैं। ऐसी मान्यता है कि असली रुद्राक्ष पानी में डूब जाता है जबकि नकली दाना ऊपर तैर सकता है। लेकिन यह तरीका पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है। रुद्राक्ष की नमी उसके अंदर मौजूद हवा और प्राकृतिक संरचना के कारण उसका व्यवहार बदल सकता है। कई असली रुद्राक्ष भी पानी में तैर सकते हैं और कुछ नकली दाने डूब सकते हैं। इसलिए केवल इस परीक्षण के आधार पर खरीदारी का फैसला करना ठीक नहीं है।

    इसी तरह तांबे के सिक्कों वाला परीक्षण भी काफी प्रचलित है। इसमें रुद्राक्ष को तांबे के दो सिक्कों के बीच रखकर उसके कंपन या हलचल को देखने की बात कही जाती है। कुछ लोग इसे असली रुद्राक्ष की पहचान बताते हैं लेकिन इसके समर्थन में कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए सिक्कों के बीच किसी तरह की हलचल महसूस होना या नहीं होना रुद्राक्ष की शुद्धता का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

    रुद्राक्ष पर रंग या पॉलिश चढ़ाकर उसे आकर्षक बनाने की संभावना भी रहती है। इसलिए खरीदते समय उसके रंग और सतह पर ध्यान देना चाहिए। यदि दाने पर असामान्य चमक दिखाई दे या रंग असमान नजर आए तो विक्रेता से उसकी प्रक्रिया और गुणवत्ता के बारे में जानकारी लें। सरसों के तेल में भिगोकर रंग जांचने का तरीका भी प्रचलित है लेकिन यह प्रमाणित जांच नहीं है। तेल के कारण प्राकृतिक दाने की सतह प्रभावित हो सकती है इसलिए बिना जानकारी के ऐसा प्रयोग करने से बचना चाहिए।

    रुद्राक्ष खरीदते समय सबसे जरूरी बात विश्वसनीय विक्रेता का चुनाव करना है। विक्रेता से दाने की उत्पत्ति और गुणवत्ता की जानकारी मांगें। महंगे या दुर्लभ मुखी रुद्राक्ष को खरीदने से पहले किसी अनुभवी विशेषज्ञ या विश्वसनीय रत्न एवं बीज परीक्षण प्रयोगशाला से जांच कराने पर विचार करें। जरूरत पड़ने पर माइक्रोस्कोप से इसकी प्राकृतिक संरचना और धारियों की जांच की जा सकती है।

    धार्मिक आस्था से जुड़े रुद्राक्ष को खरीदते समय जल्दबाजी और कम कीमत के लालच में फैसला नहीं करना चाहिए। याद रखें कि पानी का परीक्षण तांबे के सिक्के या तेल से जांच करने जैसे घरेलू नुस्खे असली होने की गारंटी नहीं देते। सही जानकारी और भरोसेमंद जांच ही नकली रुद्राक्ष खरीदने से बचने का बेहतर तरीका है।

  • मंदिर की छत से सीधे शिवलिंग पर गिरता है बारिश का पानी, माउंट आबू के शंकर मठ की अनोखी बनावट खींचती है भक्तों का ध्यान

    मंदिर की छत से सीधे शिवलिंग पर गिरता है बारिश का पानी, माउंट आबू के शंकर मठ की अनोखी बनावट खींचती है भक्तों का ध्यान


    नई दिल्ली । राजस्थान का नाम आते ही लोगों के मन में रेगिस्तान महल और ऐतिहासिक किलों की तस्वीर उभरने लगती है लेकिन इस प्रदेश में कई ऐसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जो अपनी अनोखी बनावट और आध्यात्मिक वातावरण के कारण देशभर में पहचान रखते हैं। इन्हीं में से एक है माउंट आबू की अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित प्रसिद्ध शंकर मठ। यह मठ भगवान शिव के भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र होने के साथ ही अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मंदिर का शिखर किसी सामान्य गुंबद की तरह नहीं बल्कि विशाल शिवलिंग के आकार में बनाया गया है। इसके अलावा गर्भगृह में स्थापित 27 टन वजनी विशाल काले संगमरमर का शिवलिंग श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

    शंकर मठ का निर्माण और स्थापना भी अपने आप में एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस मठ की नींव वर्ष 1960 से 1962 के बीच संत स्वामी महेशानंद गिरि महाराज ने रखी थी। इसके बाद वर्ष 1965 से यहां संतों और संन्यासियों का निवास शुरू हुआ। मंदिर परिसर के निर्माण की प्रक्रिया वर्ष 1975 में शुरू की गई। वर्तमान में मठ की देखरेख स्वामी पुण्यानंद गिरि महाराज के मार्गदर्शन में की जा रही है। अरावली की पहाड़ियों और हरियाली से घिरा होने के कारण यहां पहुंचने वाले लोगों को एक अलग तरह की शांति का अनुभव होता है।

    इस मठ की सबसे बड़ी पहचान गर्भगृह में स्थापित विशाल शिवलिंग है। यह शिवलिंग करीब 9.5 फीट ऊंचा और 7.5 फीट चौड़ा बताया जाता है। इसका वजन लगभग 27 टन है। इसे काले संगमरमर के एक ही विशाल पत्थर को तराशकर तैयार किया गया है। इसकी बनावट को लेकर भी कई रोचक बातें बताई जाती हैं। मान्यता के अनुसार पत्थर को तराशते समय उस पर भगवान शिव की तीसरी आंख और जटाओं जैसी आकृतियां उभर आई थीं। यही वजह है कि श्रद्धालु इस शिवलिंग को बेहद विशेष मानते हैं।

    मंदिर की एक और खास बात यहां होने वाला प्राकृतिक जलाभिषेक है। बारिश के मौसम में मंदिर की छत से पानी सीधे शिवलिंग पर गिरता है। श्रद्धालु इस दृश्य को बेहद पवित्र मानते हैं और इसे भगवान शिव का प्राकृतिक जलाभिषेक कहते हैं। मंदिर का निर्माण लाल पत्थरों से किया गया है और इसकी वास्तुकला इसे दूसरे शिव मंदिरों से अलग पहचान देती है। यहां पारंपरिक गुंबद की जगह शिवलिंग जैसी विशाल संरचना बनाई गई है।

    मंदिर परिसर में कमल का सुंदर तालाब और रुद्राक्ष के पेड़ भी मौजूद हैं। इनकी वजह से पूरे परिसर का वातावरण बेहद शांत और आकर्षक दिखाई देता है। यहां रुकने वाले श्रद्धालुओं के लिए शंकर धाम नाम से ठहरने की व्यवस्था भी बताई गई है। मठ में प्रतिदिन सुबह और शाम वेदांत तथा उपनिषदों का पाठ किया जाता है। भगवान शिव की दिन में तीन बार आरती होती है जबकि सोमवार को विशेष भस्म आरती का आयोजन किया जाता है। इसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    अगर आप माउंट आबू घूमने का कार्यक्रम बना रहे हैं तो शंकर मठ को अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। हालांकि दर्शन के लिए जाने से पहले मंदिर के समय का ध्यान रखना जरूरी है। दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक मुख्य मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। अपनी अनोखी वास्तुकला विशाल शिवलिंग और शांत आध्यात्मिक वातावरण के कारण शंकर मठ माउंट आबू के प्रमुख दर्शनीय धार्मिक स्थलों में शामिल है।

  • दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ क्यों होती है गणेश जी की पूजा, जानिए धन-संपत्ति और बुद्धि से जुड़ी पौराणिक मान्यता

    दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ क्यों होती है गणेश जी की पूजा, जानिए धन-संपत्ति और बुद्धि से जुड़ी पौराणिक मान्यता


    नई दिल्ली ।दिवाली हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल कार्तिक महीने की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। साल 2026 में दिवाली 8 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन घरों और दुकानों को दीपों से सजाया जाता है और सुख-समृद्धि की कामना के साथ विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दिवाली के अवसर पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दोनों देवी-देवताओं की एक साथ आराधना करने के पीछे विशेष महत्व और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

    हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है। वहीं, भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और शुभ कार्यों के आरंभ के देवता के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि जीवन में केवल धन का होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका सही इस्तेमाल करने के लिए समझदारी और विवेक भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त धन हो, लेकिन उसे सही तरीके से खर्च करने और संभालने की बुद्धि न हो तो वह संपत्ति उसके लिए लाभकारी नहीं रह सकती। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए दिवाली पर लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की पूजा की जाती है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी की आराधना से धन-संपत्ति और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है, जबकि भगवान गणेश की पूजा से बुद्धि, विवेक और जीवन की बाधाओं से मुक्ति का आशीर्वाद मांगा जाता है। दोनों की संयुक्त पूजा का संदेश है कि व्यक्ति के जीवन में आर्थिक संपन्नता के साथ सही निर्णय लेने की क्षमता भी होनी चाहिए। धन और सद्बुद्धि का संतुलन ही सुखी एवं समृद्ध जीवन का आधार माना जाता है।

    मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की एक साथ पूजा करने के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी को अपने धन और वैभव पर अभिमान हो गया था। तब भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि संसार में भले ही हर कोई उनकी कृपा प्राप्त करना चाहता हो, लेकिन मातृत्व के बिना उनका जीवन अधूरा है। भगवान विष्णु की यह बात सुनकर मां लक्ष्मी दुखी हो गईं।

    मां लक्ष्मी को उदास देखकर माता पार्वती ने अपने पुत्र भगवान गणेश को उनकी गोद में बैठा दिया। इससे लक्ष्मीजी बेहद प्रसन्न हुईं और उन्होंने गणेशजी को अपना पुत्र स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने वरदान दिया कि जो भी भक्त उनकी पूजा करेगा, उसे भगवान गणेश की आराधना भी करनी होगी। तभी उसे दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होगा। इसी पौराणिक मान्यता को दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की संयुक्त पूजा की एक प्रमुख वजह माना जाता है।

    भगवान गणेश से जुड़ी रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ की मान्यताएं भी इस परंपरा को विशेष बनाती हैं। धार्मिक कथाओं में रिद्धि और सिद्धि को गणेशजी की पत्नियां बताया गया है। रिद्धि को समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है, जबकि सिद्धि सफलता और उपलब्धियों से जुड़ी हैं। वहीं, शुभ और लाभ को रिद्धि-सिद्धि का पुत्र माना जाता है। शुभ का अर्थ मंगल और कल्याण से है, जबकि लाभ उन्नति और तरक्की का प्रतीक है।

    इसी कारण दिवाली के अवसर पर कई लोग अपने घरों, दुकानों और पूजा स्थलों के प्रवेश द्वार पर शुभ-लाभ लिखते हैं। धार्मिक विश्वास है कि इससे घर में सकारात्मकता, सुख और समृद्धि बनी रहती है। इस तरह दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा केवल धन प्राप्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में संपन्नता के साथ बुद्धि, विवेक, सफलता और मंगल की कामना का भी प्रतीक मानी जाती है।

  • दिवाली से पहले घर के इन 5 हिस्सों की जरूर करें सफाई, वास्तु मान्यताओं के अनुसार मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए हैं खास

    दिवाली से पहले घर के इन 5 हिस्सों की जरूर करें सफाई, वास्तु मान्यताओं के अनुसार मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए हैं खास

    नई दिल्ली । दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही घरों में साफ-सफाई और सजावट की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। हिंदू धर्म में दीपावली को मां लक्ष्मी के स्वागत और सुख-समृद्धि का पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, साफ-सुथरे और व्यवस्थित घर में मां लक्ष्मी का वास होता है। यही वजह है कि लोग त्योहार से पहले घर के हर हिस्से की सफाई करते हैं। वास्तु शास्त्र में भी घर को स्वच्छ रखने पर जोर दिया गया है। मान्यता है कि गंदगी और अनुपयोगी सामान जमा रहने से घर का वातावरण प्रभावित हो सकता है।

    दिवाली की सफाई के दौरान कुछ ऐसी जगहें होती हैं, जिन पर अक्सर लोगों का ध्यान नहीं जाता। घर के इन हिस्सों की अनदेखी करने से धूल-मिट्टी और कबाड़ जमा होता रहता है। वास्तु से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, त्योहार से पहले इन पांच स्थानों को साफ और व्यवस्थित रखना शुभ माना जाता है।

    मुख्य दरवाजे की सफाई जरूरी
    घर का मुख्य दरवाजा वास्तु शास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मान्यता है कि इसी रास्ते से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है। इसलिए दिवाली से पहले दरवाजे और उसके आसपास की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। वहां जमा धूल-मिट्टी, जाले और गंदगी को हटाना जरूरी है। दरवाजे के पास पुराने जूते-चप्पल, टूटे गमले और बेकार सामान जमा नहीं रखना चाहिए। सफाई के बाद मुख्य द्वार पर रंगोली बनाई जा सकती है और दीपक जलाकर सजावट की जा सकती है।

    पूजा घर को भी करें साफ

    दिवाली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसे में घर के मंदिर की सफाई को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पूजा स्थल में रखी देवी-देवताओं की मूर्तियों और तस्वीरों को साफ करें। पूजा के बर्तन भी अच्छी तरह धोकर व्यवस्थित रखें। वहां रखे पुराने फूल, माला और इस्तेमाल की जा चुकी पूजन सामग्री को हटा दें। मंदिर में साफ कपड़ा बिछाकर दीपक, धूपबत्ती और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुएं सही जगह पर रखें। धार्मिक मान्यता है कि स्वच्छ पूजा स्थल पर पूजा करने से मन को शांति मिलती है।

    ईशान कोण से हटाएं अनुपयोगी सामान
    वास्तु शास्त्र में घर की उत्तर-पूर्व दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। इसे पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियों के लिए शुभ माना जाता है। दिवाली से पहले इस हिस्से की विशेष सफाई करनी चाहिए। यहां रखे पुराने डिब्बे, बेकार सामान और कबाड़ को हटा देना चाहिए। कोशिश करें कि यह स्थान खाली, साफ और व्यवस्थित रहे। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, ईशान कोण में गंदगी और अव्यवस्था रहने से घर की सकारात्मकता प्रभावित हो सकती है।

    अलमारी और तिजोरी के आसपास रखें सफाई
    दिवाली पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान कुबेर की पूजा भी की जाती है। इसलिए घर में धन रखने वाली जगह की सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए। अलमारी और तिजोरी में रखे पुराने कागज, अनुपयोगी रसीदें और फालतू सामान बाहर निकाल दें। इसके बाद तिजोरी और अलमारी को साफ कपड़े से पोंछें। पैसे और जरूरी दस्तावेजों को व्यवस्थित तरीके से रखें। वास्तु से जुड़ी मान्यताओं में धन रखने के स्थान को साफ-सुथरा बनाए रखना शुभ माना गया है।

    छत, बालकनी और स्टोर रूम को न भूलें
    दिवाली की सफाई में छत, बालकनी और स्टोर रूम अक्सर छूट जाते हैं। इन जगहों पर पुराने डिब्बे, टूटे-फूटे सामान और कबाड़ जमा हो सकता है। त्योहार से पहले इन सभी हिस्सों की अच्छी तरह सफाई करें। बालकनी में रखे पौधों की सूखी पत्तियां हटा दें और गमलों को व्यवस्थित करें। छत पर जमा कचरा और बेकार सामान भी साफ कर दें। स्टोर रूम में लंबे समय से रखी अनुपयोगी वस्तुओं को अलग करना बेहतर रहता है।

    दिवाली की तैयारियों में इन पांच जगहों की सफाई करने से घर अधिक व्यवस्थित और स्वच्छ दिखाई देता है। साथ ही सजावट और पूजा की व्यवस्था करना भी आसान हो जाता है। धार्मिक और वास्तु मान्यताओं के अनुसार, साफ-सुथरा घर मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए शुभ माना जाता है। इसलिए त्योहार की तैयारी करते समय केवल दिखाई देने वाली जगहों पर ही नहीं, बल्कि घर के उन कोनों पर भी ध्यान देना चाहिए, जहां आमतौर पर सफाई नहीं हो पाती।

  • कार्तिक अमावस्या पर याद की जाती है भगवान कृष्ण की दामोदर लीला, जब माता यशोदा के प्रेम के आगे छोटी पड़ गई रस्सी..

    कार्तिक अमावस्या पर याद की जाती है भगवान कृष्ण की दामोदर लीला, जब माता यशोदा के प्रेम के आगे छोटी पड़ गई रस्सी..

    नई दिल्ली । कार्तिक अमावस्या और दीपावली का संबंध केवल भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की परंपरा तक सीमित नहीं है। द्वापर युग में इस पर्व को भगवान श्रीकृष्ण की दामोदर लीला के स्मरण से भी जोड़ा जाता है। यह वही प्रसंग है, जिसमें माता यशोदा ने बालकृष्ण को बांधने के लिए रस्सी का सहारा लिया था, लेकिन हर बार रस्सी छोटी पड़ जाती थी। अंत में माता के प्रेम और समर्पण को देखकर भगवान स्वयं बंधने के लिए तैयार हो गए। इसी लीला के कारण भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम दामोदर पड़ा।

    कार्तिक मास को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी बाल लीलाओं के स्मरण के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने मंदिरों में भगवान के दामोदर स्वरूप की पूजा की जाती है। श्रद्धालु प्रतिदिन दीपक जलाकर भगवान के सामने अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक मास में दीपदान और हरिनाम संकीर्तन का विशेष महत्व है। भक्त इस अवधि में भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और आत्मीयता का भाव रखते हुए पूजा-अर्चना करते हैं।

    माता यशोदा के प्रेम से बंधे भगवान
    श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित दामोदर लीला के अनुसार, बालकृष्ण अपनी शरारतों से माता यशोदा को परेशान करते रहते थे। एक दिन उनकी शरारतों से तंग आकर माता यशोदा ने उन्हें बांधने का निश्चय किया। उन्होंने रस्सी से बालकृष्ण को बांधने की कोशिश की, लेकिन हर बार रस्सी दो अंगुल छोटी रह जाती थी।

    माता यशोदा ने हार नहीं मानी। वह एक रस्सी के साथ दूसरी रस्सी जोड़ती गईं, लेकिन हर प्रयास के बाद भी रस्सी भगवान के पेट तक पहुंचने के लिए छोटी पड़ जाती थी। इस तरह कई बार प्रयास करने के बाद भी वह बालकृष्ण को बांध नहीं सकीं। आखिरकार माता की थकान, स्नेह और निष्कपट प्रयास देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को बंधने दिया। इसके बाद माता ने उन्हें ओखल से बांध दिया।

    इसी प्रसंग से भगवान का नाम दामोदर प्रचलित हुआ। धार्मिक व्याख्या के अनुसार, ‘दाम’ का अर्थ रस्सी और ‘उदर’ का अर्थ पेट होता है। इस तरह दामोदर नाम का संबंध उस लीला से है, जिसमें भगवान को पेट के पास रस्सी से बांधा गया था। यह कथा भगवान की असीम शक्ति और माता के वात्सल्य के बीच प्रेम के महत्व को दर्शाती है।

    दो अंगुल छोटी रस्सी का धार्मिक संदेश
    दामोदर लीला में बार-बार रस्सी का छोटी पड़ना भी विशेष अर्थ रखता है। भक्तिभाव से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, भगवान को केवल बाहरी शक्ति या साधना के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए निष्कपट प्रेम, समर्पण और सच्ची भक्ति का भाव आवश्यक है। माता यशोदा ने अपने मातृत्व और स्नेह के बल पर भगवान को अपने प्रेम के बंधन में बांध लिया था।

    कार्तिक मास में कृष्ण की लीलाओं का स्मरण
    कार्तिक महीने में भगवान श्रीकृष्ण की कई लीलाओं को याद करने की परंपरा है। गोपाष्टमी पर गौचारण लीला से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार गौमाता का पूजन किया जाता है। गोवर्धन पूजा के अवसर पर भगवान के गिरिराज धरण स्वरूप का स्मरण होता है। मान्यता है कि भगवान ने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत धारण किया था।

    इसी महीने भगवान द्वारा इंद्र के अभिमान का दमन करने, कालिया नाग का मर्दन करने और ब्रज में महारास लीला रचाने जैसे प्रसंगों का भी स्मरण किया जाता है। ये सभी कथाएं कृष्णभक्ति की परंपरा में विशेष स्थान रखती हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास में मनाया जाता है, जबकि उनके नामकरण का संबंध कार्तिक महीने से बताया जाता है। इस माह में उनकी बाल लीलाओं का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण कार्तिक मास में दामोदर स्वरूप के दर्शन, पूजा और दीपदान की परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु दीपक जलाकर भगवान के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं और उनके प्रेम तथा भक्ति से जुड़े संदेश को जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं।

  • धनतेरस से भाई दूज तक अपनाएं ये 5 वास्तु उपाय, दिवाली पर घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता बनाए रखने में मिलेगी मदद

    धनतेरस से भाई दूज तक अपनाएं ये 5 वास्तु उपाय, दिवाली पर घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता बनाए रखने में मिलेगी मदद

    नई दिल्ली । दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर लोग अपने घरों की साफ-सफाई करने के साथ ही दीपक, रंगोली और फूलों से सजावट करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। वहीं, वास्तु शास्त्र में भी धनतेरस से लेकर भाई दूज तक कुछ विशेष बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इन उपायों को अपनाने से घर का वातावरण साफ-सुथरा, सकारात्मक और खुशनुमा बना रहता है।

    इस वर्ष दिवाली 8 नवंबर 2026, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाएगी। दीपावली से पहले धनतेरस, छोटी दिवाली और अन्य पर्वों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। ऐसे में घर की व्यवस्था और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वास्तु से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, पांच दिवसीय दीपावली पर्व के अलग-अलग दिनों में कुछ खास उपाय अपनाए जा सकते हैं।

    धनतेरस से दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव की शुरुआत होती है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, मां लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर घर के मुख्य द्वार को साफ-सुथरा रखना शुभ माना जाता है। मुख्य दरवाजे को फूलों या तोरण से सजाया जा सकता है। इससे घर का प्रवेश स्थान सुंदर और व्यवस्थित दिखाई देता है।

    इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा भी है। खरीदारी के बाद नए सामान को साफ जगह पर रखना चाहिए। घर में धन रखने वाली तिजोरी और अलमारी को भी व्यवस्थित करना चाहिए। वास्तु मान्यताओं में इसे घर में समृद्धि का वातावरण बनाए रखने से जोड़कर देखा जाता है।

    छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी पर घर की सफाई का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन घर के कोनों, खिड़कियों और दरवाजों के आसपास जमा धूल-मिट्टी को साफ करना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का उत्तर-पूर्व दिशा वाला हिस्सा, जिसे ईशान कोण कहा जाता है, साफ और व्यवस्थित रखना शुभ माना जाता है। शाम के समय घर में दीपक जलाने और मुख्य द्वार पर रंगोली बनाने की भी परंपरा है। घर में अनावश्यक सामान और कबाड़ जमा नहीं होने देना चाहिए।

    दिवाली के दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पूजा से पहले घर के पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। इसके बाद देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित कर दीपक, फूल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री तैयार रखनी चाहिए। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, घर के उत्तर-पूर्व दिशा में पूजा स्थल होना शुभ माना जाता है। हालांकि, पूजा की व्यवस्था करते समय घर में उपलब्ध जगह और परिवार की परंपराओं का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    शाम को पूजा के बाद घर के मुख्य द्वार, खिड़कियों और बालकनी में दीपक जलाकर रोशनी की जाती है। धन रखने वाली अलमारी और तिजोरी को भी व्यवस्थित रखना चाहिए। घर में पर्याप्त रोशनी और साफ-सफाई का ध्यान रखने से त्योहार का माहौल बेहतर बनता है।

    दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की परंपरा है। कई घरों में अन्नकूट तैयार कर भगवान को भोग लगाया जाता है। वास्तु से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, इस दिन रसोई की सफाई करनी चाहिए और अनाज तथा खाद्य सामग्री को व्यवस्थित रखना चाहिए। भोजन बनाते समय स्वच्छता का ध्यान रखने के साथ घर में लगे तुलसी सहित अन्य पौधों की देखभाल भी करनी चाहिए।

    भाई दूज दीपावली पर्व का अंतिम महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिन बहनें भाइयों को तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। परिवार के सदस्य एक साथ समय बिताते हैं और खुशियां साझा करते हैं। इस दिन घर को साफ-सुथरा रखने और परिवार के बीच प्रेमपूर्ण वातावरण बनाए रखने पर जोर दिया जाता है। भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, सम्मान और विश्वास इस पर्व का मुख्य संदेश है।

    दिवाली की सजावट के दौरान टूटे-फूटे और अनुपयोगी सामान को हटा देना चाहिए। पूजा स्थल को साफ रखें और दीपक ऐसी जगह जलाएं, जहां आग लगने का खतरा न हो। बिजली की झालरों और सजावटी लाइटों के तारों की भी जांच कर लेनी चाहिए। इन सावधानियों और पारंपरिक उपायों के साथ त्योहार की तैयारियां अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनाई जा सकती हैं।

  • शनिवार के दिन इन नियमों का रखें विशेष ध्यान, शनिदेव की पूजा से दूर हो सकती हैं जीवन की परेशानियां

    शनिवार के दिन इन नियमों का रखें विशेष ध्यान, शनिदेव की पूजा से दूर हो सकती हैं जीवन की परेशानियां


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शनिवार का दिन न्याय के देवता शनिदेव को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर फल प्रदान करते हैं। यही वजह है कि शनिवार के दिन उनकी पूजा और कुछ विशेष नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से शनिदेव की आराधना करने और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने से जीवन में सुख शांति और सकारात्मकता आती है। कई लोग शनिवार को व्रत रखते हैं और मंदिर जाकर शनिदेव के दर्शन करते हैं। हालांकि इस दिन पूजा के साथ अपने व्यवहार और कर्मों पर भी विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है।

    शनिवार को सुबह जल्दी उठकर करें ये काम

    धार्मिक परंपरा के अनुसार शनिवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर घर के मंदिर में दीपक जलाएं और शनिदेव का स्मरण करें। यदि संभव हो तो शनिदेव के मंदिर जाकर दर्शन करें। पूजा के दौरान शनि मंत्र का जाप करना भी शुभ माना जाता है। ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है। मान्यता है कि इससे मन को शांति मिलती है और व्यक्ति को अपने जीवन में अनुशासन बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।

    सरसों के तेल का दीपक जलाने की मान्यता

    शनिवार को शनिदेव के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपरा है। कुछ लोग पीपल के पेड़ के नीचे भी दीपक जलाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करने से शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है। दीपक जलाते समय स्वच्छता और सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। पूजा के दौरान काले तिल और उड़द की दाल अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।

    जरूरतमंदों की मदद करना माना जाता है शुभ

    शनिवार के दिन दान और सेवा का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना या अपनी क्षमता के अनुसार काले तिल कंबल उड़द की दाल और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में जरूरतमंदों की सहायता को शनिदेव की प्रसन्नता से जोड़कर देखा जाता है। इसके साथ ही पशु-पक्षियों को भोजन देना और श्रमिकों तथा बुजुर्गों का सम्मान करना भी अच्छे कर्मों में शामिल माना जाता है।

    शनिवार को किन बातों से बचें

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिवार को किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए। गरीबों कमजोर लोगों और मेहनतकश व्यक्तियों का अपमान करने से बचना चाहिए। इस दिन झूठ बोलने धोखा देने और किसी का हक छीनने जैसे काम नहीं करने चाहिए। गुस्से और विवाद से दूर रहकर शांत व्यवहार अपनाना चाहिए। कुछ परंपराओं में शनिवार को बाल और नाखून काटने तथा लोहे की वस्तुएं खरीदने से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि ये मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती हैं।

    कर्मों को सुधारने का संदेश देता है शनिवार

    शनिदेव को न्याय और कर्मफल का देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे व्यक्ति को उसके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसलिए शनिवार का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है बल्कि यह दिन ईमानदारी मेहनत और अनुशासन के साथ जीवन जीने की सीख भी देता है। इस दिन जरूरतमंदों की मदद करना और किसी के प्रति गलत व्यवहार न करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धा और अच्छे कर्मों के साथ शनिवार के नियमों का पालन करने से व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास कर सकता है।

  • धनतेरस से पहले महायोग…. 01 नवंबर को रवि पुष्य नक्षत्र, इस अबूझ मुहूर्त का अक्षय तृतीया जैसा पुण्य

    धनतेरस से पहले महायोग…. 01 नवंबर को रवि पुष्य नक्षत्र, इस अबूझ मुहूर्त का अक्षय तृतीया जैसा पुण्य


    नई दिल्ली।
    एक नवंबर को पड़ रहा रवि पुष्य नक्षत्र (Ravi Pushya Nakshatra) का मुहूर्त अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) जितना ही बहुत खास होने वाला है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक रविवार की सुबह 10:37 से लेकर अगले दिन दो नवंबर को सुबह 9.04 बजे तक जो मर्जी, वो खरीदें, इससे घर-परिवार में लंबे समय के लिए खुशहाली आएगी। खासतौर से उनके लिए जो किसी रस्म या शादी की खरीदारी करने जा रहे हैं।

    ज्योतिषाचार्य प्रो. बिहारी लाल शर्मा बताते हैं कि रवि पुष्य (Ravi Pushya) अबूझ मुहूर्त (Auspicious Moment) है। ऐसे मुहूर्त अक्षय तृतीया और भटली नवमी भी होते हैं। इस दिन सोना-चांदी, घर, जमीन और गाड़ी खरीदना अच्छा है। स्थायी समृद्धि के लिए रवि पुष्य में खरीदारी अद्भुत लाभ देती है।

    ज्योतिषाचार्य प्रो. सुभाष पांडेय के मुताबिक एक नवंबर को रवि पुष्य नक्षत्र पर घर की साज-सज्जा और नए कपड़े खरीदने का सबसे उत्तम मुहूर्त है। इससे घर में समृद्धि और काम में स्थायित्व होगा। हालांकि चार नवंबर को आभूषण खरीदने का मुहूर्त बन रहा है। वहीं छह नवंबर को धनतेरस पर चांदी, सोना और पीतल के बर्तन खरीदने का बेहतर मुहूर्त तय किया गया है।


    अशुभ काल में खरीदने पर होता है नुकसान

    प्रो. पांडेय ने बताया कि प्रो. पांडेय के अनुसार, इंसान के जीवन में शरद ऋतु या ठंड के समय खरीद करना काफी उत्तम माना गया है। यह काल 21 अक्तूबर के बाद से ही शुरू हो चुका है जो कि दीपावली और बनारस में देव दीपावली तक चलेगा। ज्योतिष शास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग से शुभ काल (मुहूर्त) तय करने की बात कही गई है। दरअसल, भौतिक या आध्यात्मिक जीवन में शुभ समय का बहुत बड़ा महत्व है। जिस तरह अनुष्ठानों में शुभ मुहूर्त की जरूरत होती है वैसे ही भौतिक वस्तुओं को शुभ मुहूर्त में खरीदने पर उसका स्थायित्व बढ़ जाता है। अशुभ काल में खरीदने पर नुकसान हो सकता है।


    सुबह 10:37 से शुरू होगा रवि पुष्य योग

    रवि पुष्य योग एक नवंबर को सुबह 10:37 से दो नवंबर को सुबह 09.04 तक रहेगा। सर्वार्थ सिद्धि योग एक को सुबह 06:33 से दो को सुबह 04:30 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:42 से 12:27 बजे तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 05:36 बजे से 06:02 बजे तक रहेगा। इस नक्षत्र पर बृहस्पति, शनि और चंद्रमा का प्रभाव होता है।

  • केरल के अनोखे मंदिर में साल के 364 दिन पानी में डूबा रहता है शिवलिंग, महाशिवरात्रि पर खुलते हैं दर्शन के द्वार..

    केरल के अनोखे मंदिर में साल के 364 दिन पानी में डूबा रहता है शिवलिंग, महाशिवरात्रि पर खुलते हैं दर्शन के द्वार..


    नई दिल्ली ।
    भारत में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जो अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और विशेष मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के बीच अलग पहचान रखते हैं। केरल के मलप्पुरम जिले में स्थित श्री अर्धनारीश्वर मंदिर भी ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है। इस मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित शिवलिंग है, जो साल के 364 दिन पानी में डूबा रहता है। श्रद्धालुओं को भगवान शिव के दर्शन करने का विशेष अवसर साल में केवल एक बार महाशिवरात्रि के दिन मिलता है। इस दिन मंदिर परिसर से पानी निकाला जाता है और इसके बाद शिवलिंग के दर्शन कराए जाते हैं।

    यह अनोखा मंदिर केरल के मलप्पुरम जिले के अरक्कुपरम्बा क्षेत्र में स्थित है। पेरिनथलमन्ना से इसकी दूरी लगभग 17 किलोमीटर है। मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती के संयुक्त स्वरूप अर्धनारीश्वर की पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर परिसर में पानी से घिरा रास्ता भी इसकी विशेष पहचान है। वर्ष के अधिकांश समय शिवलिंग पानी के भीतर रहने के कारण यहां की धार्मिक परंपरा अन्य मंदिरों से अलग मानी जाती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर पानी हटाए जाने के बाद भक्तों को शिवलिंग के प्रत्यक्ष दर्शन करने का अवसर मिलता है।

    इस मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा विशेष रूप से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और विवाह संबंधी परेशानियों से मुक्ति की कामना के लिए की जाती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और दांपत्य जीवन में प्रेम तथा आपसी समझ बढ़ती है। मंदिर में होने वाले प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों में उमा महेश्वर पूजा शामिल है। इस पूजा के दौरान भक्त भगवान शिव और माता पार्वती से वैवाहिक जीवन में खुशहाली और परिवार में शांति बनाए रखने का आशीर्वाद मांगते हैं।

    इसके अलावा मंदिर में पट्टुम थालियुम समरप्पणम नामक विशेष अनुष्ठान भी आयोजित किया जाता है। इसमें श्रद्धालु सुखद और सफल वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। इस परंपरा के कारण मंदिर उन लोगों के लिए भी धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है, जो विवाह संबंधी समस्याओं के समाधान और दांपत्य जीवन में खुशहाली की प्रार्थना लेकर यहां पहुंचते हैं।

    मंदिर में पूरे वर्ष अलग-अलग धार्मिक आयोजन और उत्सव होते हैं। दिसंबर या जनवरी के दौरान यहां पांच दिवसीय वार्षिक उत्सव मनाया जाता है। इसकी शुरुआत ध्वजारोहण के साथ होती है और अंतिम दिन थिरु अरट्टू अनुष्ठान के साथ इसका समापन किया जाता है। इसके अलावा जून या जुलाई में भी विशेष धार्मिक आयोजन होता है। इस अवसर पर 1008 कलश जलाभिषेक किया जाता है। इस अनुष्ठान में 1,008 कलशों में रखे पवित्र जल से भगवान का अभिषेक किया जाता है।

    मंदिर में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए सुबह और शाम का समय निर्धारित है। यहां सुबह 6 बजे से 9:30 बजे तक और शाम 4 बजे से 7 बजे तक पूजा-अर्चना और दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर आने वाले भक्तों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था भी उपलब्ध है। हालांकि, महाशिवरात्रि के दिन होने वाले विशेष दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए श्रद्धालुओं को पहले से जानकारी लेना उपयोगी रहेगा।

    श्री अर्धनारीश्वर मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क, रेल और हवाई मार्ग की सुविधा उपलब्ध है। हवाई यात्रा करने वाले श्रद्धालु कालीकट अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक पहुंच सकते हैं, जो मंदिर से लगभग 40 से 50 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से टैक्सी के माध्यम से मंदिर जाया जा सकता है। रेल मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए अंगडीपुरम रेलवे स्टेशन नजदीकी विकल्प है। स्टेशन से टैक्सी, ऑटो-रिक्शा या बस लेकर मंदिर पहुंचा जा सकता है। सड़क मार्ग से पेरिनथलमन्ना होते हुए स्थानीय बस और टैक्सी की मदद से भी मंदिर तक पहुंचना संभव है।