वैभव लक्ष्मी व्रत कैसे करें?
वैभव लक्ष्मी मंत्र-
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥
वैभव लक्ष्मी व्रत के महत्वपूर्ण नियम-

वैभव लक्ष्मी मंत्र-
वैभव लक्ष्मी व्रत के महत्वपूर्ण नियम-

मोक्षदा एकादशी 2025: तिथि और पारण
एकादशी तिथि आरंभ: 30 नवंबर 2025, रात 9 बजकर 29 मिनट
एकादशी तिथि समाप्त: 1 दिसंबर 2025, शाम 7 बजकर 01 मिनट
व्रत का दिन: 1 दिसंबर 2025 सोमवार उदय तिथि को ध्यान में रखते हुए व्रत 1 दिसंबर को रखा जाएगा। पारण का समय अगले दिन सुबह शुभ मुहूर्त में करना शुभ माना जाता है। पारण से पहले किसी ब्राह्मण को भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
मोक्षदा एकादशी व्रत में ये काम न करें
मोक्ष और समृद्धि के लिए मंत्र
भगवान धन्वंतरि स्वास्थ्य मंत्र

विवाह पंचमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विवाह पंचमी के दिन मिथिला नगरी में राजा जनक की पुत्री सीता का विवाह अयोध्या के राजकुमार श्रीराम से वैदिक रीति से संपन्न हुआ था। यह विवाह न केवल एक ऐतिहासिक घटना है, बल्कि आदर्श दांपत्य, मर्यादा, निष्ठा और धर्म का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने भी इसी दिन रामचरितमानस की रचना पूरी की थी, जिससे यह तिथि और भी अधिक महत्व रखती है।
विवाह पंचमी के दिन व्रत का महत्व
विवाह पंचमी के दिन व्रत रखने से दांपत्य जीवन में प्रेम, स्थिरता और सौहार्द बढ़ता है। विशेष रूप से यह व्रत कुंवारे युवक-युवतियों के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। इसके अलावा, इस दिन व्रत रखने से घर में सुख, शांति, समृद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती है। इस दिन की पूजा से जीवन में संतुलन और मानसिक शांति प्राप्त होती है, जो दांपत्य जीवन में प्रेम और समर्पण को बढ़ावा देती है।
विवाह पंचमी के दिन शादी क्यों नहीं होती
हालांकि विवाह पंचमी एक विवाह का प्रतीक दिन है, फिर भी इस दिन परंपरागत रूप से विवाह का आयोजन नहीं किया जाता। इसका कारण यह है कि यह तिथि एक धार्मिक और आध्यात्मिक दिन है, जो राम और सीता के विवाह के पुण्य स्मरण के लिए होती है, न कि नए विवाहों के आयोजन के लिए। हिंदू समाज में यह मान्यता है कि इस दिन विवाह की बजाय पूजा और व्रत करने से अधिक लाभ मिलता है।
विवाह पंचमी 2025: शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
विवाह पंचमी 2025 की तिथि 24 नवम्बर को शाम 9:22 बजे से आरंभ होगी और 25 नवम्बर को रात 10:56 बजे तक रहेगी। इस दिन पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय विशेष रूप से शुभ माना गया है, जो सुबह 4:20 बजे से 4:59 बजे तक रहेगा।
विवाह पंचमी पर पूजा करने के लिए सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ मन से पूजा स्थल पर जाएं। फिर पीले वस्त्रों से ढकी एक चौकी पर राम और सीता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल, फल, फूल, धूप, दीप और प्रसाद अर्पित करें। इसके साथ-साथ रामचरितमानस के बालकांड में वर्णित विवाह प्रसंग का पाठ करें और दांपत्य जीवन में प्रेम और सुख-शांति की कामना करते हुए संकल्प लें।
विवाह पंचमी का संदेश
विवाह पंचमी का संदेश है प्रेम, समर्पण और पारिवारिक स्थिरता। यह तिथि भक्ति और आध्यात्मिक अनुशासन को जागृत करने का भी एक अवसर है। इस दिन से दांपत्य जीवन में सच्चे प्रेम, समर्पण और सम्मान को बढ़ावा मिलता है, जो कि किसी भी रिश्ते की मजबूती का आधार होता है।
इस दिन के व्रत और पूजा से हम न केवल भगवान राम और माता सीता के आदर्श दांपत्य का पालन करने का संकल्प लेते हैं, बल्कि अपने जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक शांति की कामना भी करते हैं।
विवाह पंचमी के दिन हमें प्रेम, सम्मान और भक्ति की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

यह योजना स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर एसपीए भोपाल द्वारा तैयार की गई है। इसके तहत उज्जैन के मंदिरों, धार्मिक कथाओं और अमूर्त सांस्कृतिक स्मृतियों को डिजिटल रिपोजिटरी इंटरैक्टिव तकनीक, स्टोरीटेलिंग एप्स और बोर्ड गेम्स के माध्यम से प्रदर्शित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य न केवल स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर लोगों को उज्जैन की विरासत से जोड़ना है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शहर की सांस्कृतिक महत्ता को उजागर करना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह डिजिटल मॉडल सिंहस्थ 2028 के आयोजन से पहले उज्जैन को विश्वस्तरीय धार्मिक और सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा। भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में वर्ष 2028 में महाकुंभ का आयोजन होने जा रहा है, जिसमें लगभग 30 करोड़ श्रद्धालुओं के आगमन का अनुमान है।
योजना के तहत उज्जैन की धार्मिक कथाओं, मंदिरों के इतिहास और स्थानीय परंपराओं को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जाएगा। इसमें इंटरैक्टिव मैप्स, आभासी टूर, 3डी मॉडलिंग, एनीमेशन और स्टोरीटेलिंग ऐप्स शामिल होंगे। इससे न केवल श्रद्धालु और पर्यटक, बल्कि शोधकर्ता और इतिहासकार भी आसानी से शहर की सांस्कृतिक धरोहर तक पहुँच सकेंगे। इस डिजिटल संग्रहालय और रिपोजिटरी में शहर के मंदिरों, प्राचीन स्थलों और पौराणिक कथाओं का विस्तृत विवरण रखा जाएगा, जो उज्जैन के धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को प्रदर्शित करेगा।
एसपीए के विशेषज्ञों ने बताया कि यह परियोजना केवल तकनीकी दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। डिजिटल माध्यम से युवा पीढ़ी को शहर की विरासत से जोड़ने के साथ-साथ पर्यटकों को भी आकर्षित किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, यह पहल स्थानीय कलाकारों, कथाकारों और इतिहासकारों को अपनी कला और ज्ञान साझा करने का अवसर भी प्रदान करेगी।
शहर के पर्यटन विभाग ने इस पहल को उज्जैन के वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में अहम कदम बताया है। विभाग के अनुसार, डिजिटल तकनीक के माध्यम से तैयार यह परियोजना शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में सहायक होगी। इसके साथ ही यह पहल स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग को भी मजबूती प्रदान करेगी।
उज्जैन में पौराणिक वैभव और आधुनिक डिजिटल तकनीक का यह संगम, आने वाले समय में शहर को न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में एक प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह परियोजना सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान को नई दिशा देने में निर्णायक साबित होगी और शहर को आधुनिक युग की डिजिटल विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी।

नई दिल्ली। अगर आपके विवाह की योजनाएँ बार बार अटक रही हैं या रिश्ते बनते बनते बिगड़ जाते हैं। तो 25 नवंबर 2025 को आने वाली विवाह पंचमी आपके लिए शुभ अवसर साबित हो सकती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन किए गए विशेष उपाय मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले माने जाते हैं। और विवाह से जुड़े सभी बाधाओं को दूर करने में मदद करते हैं।
विवाह पंचमी की महत्ता इस तथ्य में है कि यह वही पावन तिथि है। जब भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह संपन्न हुआ था। इस कारण इसे दांपत्य सुख शुभ विवाह और मनोकामनाओं की सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष यह तिथि पूरे वर्ष की सबसे मंगलमय तिथियों में गिनी जा रही है। और इसका महत्व उन सभी युवाओं और परिवारों के लिए विशेष है। जो विवाह में किसी न किसी कारणवश रुकावटों का सामना कर रहे हैं।
देवघर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंदकिशोर मुद्गल ने शादी में रुकावट दूर करने के लिए सरल और असरदार उपाय बताए हैं। पहला उपाय है एक पोटली तैयार करना। जिसमें 11 हल्दी की गांठ और 11 दुर्वा यानी दूब घास को पीले कपड़े में बांधकर एक छोटी पोटली बनाई जाती है। यह पोटली पूजा के दौरान भगवान श्री गणेश जी के चरणों में श्रद्धा पूर्वक अर्पित की जाती है।
दूसरा महत्वपूर्ण कदम है मनोकामना व्यक्त करना। इस दौरान अपने मन की शुद्ध इच्छा के साथ विवाह से जुड़ी सभी इच्छाओं को भगवान गणेश के समक्ष स्पष्ट रूप से रखें। तीसरा कदम है दही-हल्दी का लेप भगवान गणेश पर चढ़ाना। इसे शुभ लेप माना गया है। जो विशेष रूप से विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने में फलदायी होता है। इस प्रक्रिया को सच्ची श्रद्धा संयम और विश्वास के साथ करने से विवाह से जुड़े सभी समस्याओं में राहत मिलती है।
ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि विवाह पंचमी के दिन किए गए ये उपाय विवाह बाधाओं को कम करने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जिससे रिश्ते बनने लगते हैं और विवाह के योग जल्दी बनते हैं। इस उपाय को करने वाले युवक युवतियों के जीवन में जल्द ही शुभ संकेत दिखाई देने लगते हैं। और कई बार तो इन्हें विवाह संबंधी निर्णय लेने में स्पष्ट मार्गदर्शन भी मिलता है।
विवाह पंचमी के दिन भगवान श्री गणेश की आराधना करने से केवल विवाह संबंधी बाधाएँ ही दूर नहीं होतीं। बल्कि मन में शांति, संतुलन और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। जिससे जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देते हैं। पंडित मुद्गल ने यह भी सलाह दी है। कि यह पूजा श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाए। और किसी भी प्रकार की जल्दबाजी या अधूरी भावना से बचा जाए।
इस दिन विवाह संबंधी उपायों को करने से परिवार के सभी सदस्य भी सुख और सहयोग का अनुभव करते हैं। और रिश्तों में सामंजस्य बढ़ता है। विवाह पंचमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि यह जीवन में नए आरंभ और शुभ संयोगों का प्रतीक भी है। इसलिए इसे विशेष महत्व देना चाहिए। और इस दिन किए गए उपायों से शादी में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सकता है।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि 25 नवंबर 2025 की विवाह पंचमी युवा जोड़ों के लिए एक सुनहरा अवसर है। पंडित मुद्गल द्वारा बताए गए उपायों का पालन करने से विवाह में रुकावटें कम होती हैं। रिश्तों में समझ बढ़ती है। और विवाह के योग शीघ्र बनते हैं। यह उपाय सरल हैं। प्रभावशाली हैं। और सही श्रद्धा के साथ किए जाने पर जीवन में खुशहाली और सफलता लेकर आते हैं।

व्रत शुरू करने का सही समय और संख्या
यदि आप पहली बार गुरुवार व्रत कर रहे हैं, तो इसे किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से शुरू करना शुभ माना जाता है। खासकर पुष्य नक्षत्र में आने वाले गुरुवार को व्रत आरंभ करना अधिक फलदायी होता है। हालांकि पौष माह में गुरुवार का व्रत नहीं रखना चाहिए। व्रत की अवधि भक्त की आस्था पर निर्भर करती है। इसे 16 गुरुवार तक रखा जा सकता है, इसके अलावा 5, 11, 21, 51 या 101 दिनों तक भी उपवास किया जा सकता है। कुछ भक्त इसे लगातार तीन साल तक भी निभाते हैं।
पूजन के लिए आवश्यक सामग्री
गुरुवार व्रत की पूजा के लिए भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति, पीले रंग के वस्त्र, हल्दी, गुड़, भीगी हुई चने की दाल, केला, पीले चावल और घी का दीपक आवश्यक हैं। पीले रंग का कपड़ा पूजा चौकी पर बिछाने के साथ स्वयं पहनने के लिए भी शुभ माना जाता है।
गुरुवार व्रत की विधि
सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर चौकी पर पीले कपड़े को बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। मूर्ति पर जल और हल्दी से शुद्धिकरण करें और पीले चावल अर्पित करें। घी का दीपक जलाएँ और भगवान विष्णु के मंत्रों और श्लोकों का जाप करें। इस दिन गुरुवार व्रत कथा का पाठ करना या सुनना शुभ माना जाता है।
इसके अतिरिक्त, यदि घर के पास केला का पेड़ है तो उसकी भी पूजा करें। पेड़ के सामने घी का दीपक जलाएँ और केले के पेड़ पर हल्दी, चावल और चने की दाल अर्पित करें। भगवान कृष्ण के मंत्रों का जाप करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। व्रत का समापन कथा पढ़ने या सुनने के बाद करें। इस दिन केवल एक बार भोजन करें और वह भी बिना नमक वाला होना चाहिए।
विशेष नियम और वर्जित चीजें
पहली बार व्रत करने वाले इस दिन बालों में शैम्पू न करें। नमक वाला भोजन और उड़द की दाल तथा चावल का सेवन वर्जित है। पूजा के बाद गुड़, पीला कपड़ा, चने की दाल और केला गरीबों को दान करें। धार्मिक मान्यता अनुसार इस दिन गाय को रोटी और गुड़ खिलाने से सभी कष्ट दूर होते हैं। व्रत के दौरान मन को शांत रखें, क्रोध न करें और पूरी भक्ति के साथ भगवान विष्णु को समर्पित रहें।
इस प्रकार श्रद्धा और नियम के साथ किया गया गुरुवार व्रत जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आता है। यह व्रत न केवल व्यक्तिगत दोषों को कम करता है बल्कि परिवार और सामाजिक जीवन में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
यदि आप पहली बार गुरुवार व्रत कर रहे हैं तो इस विधि को अपनाकर भगवान विष्णु और गुरु बृहस्पति की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में मंगलकारी बदलाव ला सकते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, राम-सीता का विवाह होने के तुरंत बाद भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास सहना पड़ा। माता सीता को इसी दौरान रावण द्वारा अपहरण, वनवास और अग्निपरीक्षा जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस आधार पर यह मान्यता बनी कि इस दिन मानव विवाह करने से नवविवाहित जोड़े के जीवन में बाधाएं और कष्ट आ सकते हैं। इस दिन विवाह करने से शुभ और सुखमय दांपत्य जीवन की संभावना कम मानी जाती है, इसलिए पारंपरिक रूप से विवाह पंचमी को नए विवाह के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।
रामायण में वर्णित है कि विवाह के बाद राम को राजसिंहासन छोड़ वनवास जाना पड़ा, जबकि सीता माता को अलगाव, अपहरण और सार्वजनिक अपमान सहना पड़ा। यही कारण है कि कई पीढ़ियों से इस दिन को शोक स्मरण और पूजा-अर्चना का दिन माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में भी पंचमी तिथि को भगवान राम से जोड़ा गया है। पंचांग विशेषज्ञों के अनुसार इस दिन के ग्रह-योग विवाह के लिए अनुकूल नहीं होते। विवाह मुहूर्त के लिए गौरी-मंगल जैसे विशेष योगों की आवश्यकता होती है, जो इस दिन उपलब्ध नहीं होते।
विवाह पंचमी के अवसर पर अयोध्या और नेपाल के जनकपुर में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ आयोजन किए जाते हैं। इन स्थानों पर राम-सीता के विवाह की झांकियां सजाई जाती हैं, भजन-कीर्तन होते हैं और हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं। अविवाहित कन्याएं माता सीता की पूजा कर मनचाहा वर पाने की कामना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं विशेष पूजा कर अपने दांपत्य जीवन में प्रेम, सौभाग्य और खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।
श्री राम जन्मभूमि मंदिर के वरिष्ठ पुजारी पंडित विजय शर्मा का कहना है कि विवाह पंचमी दिव्य विवाह का स्मरण है। इसे नई मानव शादी के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और पूजा-अर्चना के लिए उपयोग करना चाहिए। इस दिन के ग्रह-योग मानव विवाह के लिए अनुकूल नहीं हैं, इसलिए पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इसे नए विवाह का दिन नहीं माना जाता। जोड़े जो विवाह की योजना बना रहे हैं, उन्हें शुभ मुहूर्त का चयन कर इस दिन पूजा-अर्चना में समय व्यतीत करना चाहिए।
इस प्रकार, विवाह पंचमी 2025 धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन हमें राम-सीता के दिव्य विवाह की याद दिलाता है और आध्यात्मिक मूल्य और भक्ति भाव को प्रकट करता है। विवाह पंचमी पर होने वाली पूजा-अर्चना नवविवाहितों के लिए मार्गदर्शक नहीं है, बल्कि यह दिन श्रद्धालुओं को जीवन में आस्था, भक्ति और धार्मिक परंपराओं के महत्व को समझने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन मनाए जाने वाले उत्सवों और पूजा-अर्चना के कार्यक्रम समाज में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को भी मजबूत बनाते हैं।
