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  • डॉक्टर की चेतावनी, परिवार से छुपाया सच और फिर नई शुरुआत, राम कपूर ने सुनाई संघर्ष से वापसी की कहानी

    डॉक्टर की चेतावनी, परिवार से छुपाया सच और फिर नई शुरुआत, राम कपूर ने सुनाई संघर्ष से वापसी की कहानी

    नई दिल्ली ।लोकप्रिय अभिनेता राम कपूर ने रियलिटी शो ‘लॉक अप 2’ में अपनी निजी जिंदगी से जुड़ा ऐसा अनुभव साझा किया, जिसने सभी को भावुक कर दिया। उन्होंने बताया कि करियर के शिखर पर पहुंचने के बावजूद वह मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद कठिन दौर से गुजर रहे थे। अभिनेता ने स्वीकार किया कि एक समय उनकी सेहत इतनी खराब हो गई थी कि डॉक्टरों ने उन्हें गंभीर परिणामों की चेतावनी दी थी। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने इस स्थिति की जानकारी अपनी पत्नी गौतमी कपूर और परिवार के अन्य सदस्यों से भी लंबे समय तक छुपाकर रखी।

    राम कपूर ने कहा कि जिस समय उन्हें टीवी धारावाहिक ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ से व्यापक लोकप्रियता मिल रही थी, उसी दौरान उनका निजी जीवन कई चुनौतियों से घिरा हुआ था। बाहर से सब कुछ सामान्य और सफल दिखाई देता था, लेकिन भीतर वह लगातार मानसिक तनाव और अवसाद का सामना कर रहे थे। उन्होंने बताया कि लगातार काम का दबाव, अनियमित दिनचर्या और अपनी सेहत की अनदेखी ने उनकी स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया।

    अभिनेता ने बताया कि समय के साथ उनका वजन लगातार बढ़ता गया और जीवनशैली पूरी तरह असंतुलित हो गई। उन्होंने स्वीकार किया कि उस दौर में उन्होंने अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं दी। जब चिकित्सकीय जांच कराई गई तो डॉक्टरों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि उन्होंने तुरंत अपनी आदतों में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि उनका ब्लड शुगर स्तर कई बार सामान्य सीमा से काफी ऊपर पहुंच जाता था, जिससे जोखिम लगातार बढ़ रहा था।

    राम कपूर ने अपने व्यवहार को याद करते हुए आत्मस्वीकृति भी जताई। उन्होंने कहा कि सफलता और व्यस्तता के बीच वह खुद को खो बैठे थे। उन्होंने माना कि वह शूटिंग पर समय से नहीं पहुंचते थे, कई बार अनुशासन का पालन नहीं करते थे और सहकर्मियों के साथ भी उनका व्यवहार पहले जैसा नहीं रह गया था। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय की अपनी गलतियों को याद करके आज भी उन्हें अफसोस होता है और वह उस दौर को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख मानते हैं।

    उन्होंने यह भी बताया कि अपनी मानसिक और शारीरिक परेशानियों के बारे में उन्होंने परिवार को पूरी सच्चाई नहीं बताई थी। उनका मानना था कि इससे उनके अपने लोग अनावश्यक रूप से चिंतित हो जाएंगे। हालांकि समय के साथ उन्हें यह एहसास हुआ कि मुश्किल परिस्थितियों में परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत होता है। उन्होंने कहा कि उनके बच्चों ने उन्हें जीवन को नए नजरिए से देखने की प्रेरणा दी और आगे बढ़ने का हौसला दिया। उनके अनुसार यदि परिवार का भावनात्मक सहारा नहीं मिलता, तो परिस्थितियां और अधिक कठिन हो सकती थीं।

    राम कपूर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपने जीवन में कई सकारात्मक बदलाव किए हैं। उन्होंने अपनी दिनचर्या, खानपान और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना शुरू किया तथा मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए भी लगातार प्रयास किए। अभिनेता का कहना है कि अब वह पहले की तुलना में अधिक संतुलित, खुश और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। उन्होंने अपने अनुभव के माध्यम से यह संदेश भी दिया कि सफलता के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य, अनुशासित जीवनशैली और परिवार का साथ भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही कठिन समय में व्यक्ति को संभालने की सबसे बड़ी ताकत बनते हैं।

  • पीएम मोदी की अपील के बाद नाबालिग लड़की की मां ने जताया आभार, एफआईआर वापस लेने की लगाई गुहार

    पीएम मोदी की अपील के बाद नाबालिग लड़की की मां ने जताया आभार, एफआईआर वापस लेने की लगाई गुहार

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र नारेबाजी करने के आरोप में चर्चा में आई 15 वर्षीय नाबालिग लड़की की मां ने प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा है कि उनकी बेटी को सुधार का अवसर देकर नया जीवन मिला है। उन्होंने कहा कि कठोर कार्रवाई की बजाय क्षमा और मार्गदर्शन का संदेश समाज के लिए सकारात्मक उदाहरण है। साथ ही उन्होंने बेटी के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने की भी अपील की है।

    यह मामला उस समय चर्चा में आया जब एक प्रदर्शन के दौरान नाबालिग लड़की का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसमें वह प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाती दिखाई दी। वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया शुरू की और इस संबंध में मामला दर्ज किया गया। बाद में यह मामला संबंधित थाने को स्थानांतरित कर दिया गया, जहां आगे की कार्रवाई की जा रही है।

    इस घटनाक्रम के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश साझा करते हुए कहा कि प्रदर्शनों के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले कई बच्चे परिस्थितियों और बहकावे का शिकार हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि गाली-गलौज या अपमानजनक भाषा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। समाज को ऐसे बच्चों को अपराधी की तरह देखने के बजाय उन्हें सही दिशा दिखाने का प्रयास करना चाहिए ताकि वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बन सकें।

    प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद संबंधित नाबालिग लड़की ने भी सार्वजनिक रूप से हाथ जोड़कर माफी मांगी। उसने कहा कि वह अपने दोस्तों के साथ दिल्ली के कनॉट प्लेस घूमने गई थी और वहीं पास में चल रहे प्रदर्शन के दौरान दूसरों के प्रभाव में आकर आपत्तिजनक नारे लगाने लगी। लड़की ने स्वीकार किया कि उससे गंभीर गलती हुई और उसने इसे अपने जीवन की पहली तथा अंतिम भूल बताते हुए देशवासियों से क्षमा मांगी।

    लड़की की मां ने भावुक होकर कहा कि संयोग से जिस दिन प्रधानमंत्री ने क्षमा का संदेश दिया, उसी दिन उनकी बेटी का जन्मदिन भी था। उनके अनुसार यह उनकी बेटी के लिए सबसे बड़ा उपहार है, क्योंकि उसे अपनी गलती सुधारने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि परिवार अपनी भूल स्वीकार करता है और चाहता है कि गलत नाम और उम्र के साथ दर्ज एफआईआर को निरस्त किया जाए, ताकि उनकी बेटी सामान्य जीवन की ओर लौट सके और अपनी पढ़ाई तथा भविष्य पर ध्यान दे सके।

    मां ने इस पूरे घटनाक्रम के बाद सरकार से एक व्यापक नीति बनाने की भी मांग की। उनका कहना है कि कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि नाबालिगों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण हो और उन्हें राजनीतिक प्रदर्शनों में शामिल होने से भी रोका जाए, क्योंकि कम उम्र में बच्चे आसानी से दूसरों के प्रभाव में आ सकते हैं।

    इस बीच पूरे घटनाक्रम को लेकर सार्वजनिक स्तर पर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री के सुधारवादी दृष्टिकोण की सराहना की है, जबकि कुछ ने कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। फिलहाल संबंधित एफआईआर और मामले की आगे की कार्रवाई पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार जारी है। यह प्रकरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया की भूमिका, नाबालिगों की जिम्मेदारी और कानून के बीच संतुलन को लेकर भी नई चर्चा का विषय बन गया है।

  • भारतीय रेलवे के सहयोग से बनी 'यात्रा' ने 15 एपिसोड में देश की विविध संस्कृति और समाज को दिखाया

    भारतीय रेलवे के सहयोग से बनी 'यात्रा' ने 15 एपिसोड में देश की विविध संस्कृति और समाज को दिखाया

    नई दिल्ली । भारतीय टेलीविजन के स्वर्णिम दौर में दूरदर्शन ने ऐसे कई धारावाहिक दर्शकों को दिए, जिन्होंने केवल मनोरंजन ही नहीं किया बल्कि समाज को नई सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण भी प्रदान किया। इन्हीं यादगार कार्यक्रमों में वर्ष 1986 में प्रसारित धारावाहिक ‘यात्रा’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी इस श्रृंखला ने भारतीय रेल के लंबे सफर को आधार बनाकर देश के अलग-अलग हिस्सों, संस्कृतियों और आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाया। करीब चार दशक बाद भी यह धारावाहिक भारतीय टेलीविजन के सबसे अलग और प्रयोगधर्मी कार्यक्रमों में गिना जाता है।

    ‘यात्रा’ कुल 15 एपिसोड की श्रृंखला थी, जिसमें प्रत्येक कड़ी किसी न किसी रेल यात्रा के दौरान मिलने वाले यात्रियों और उनकी परिस्थितियों पर आधारित थी। ट्रेन यहां केवल परिवहन का माध्यम नहीं थी, बल्कि अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ने वाली एक जीवंत कड़ी के रूप में दिखाई गई। प्रत्येक एपिसोड में नई कहानी, नए पात्र और जीवन का अलग अनुभव दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता था।

    इस धारावाहिक की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे भारतीय रेलवे के सहयोग से तैयार किया गया था। पूरी टीम को विशेष ट्रेन उपलब्ध कराई गई, जिससे देश के विभिन्न हिस्सों में वास्तविक स्थानों पर जाकर शूटिंग की जा सकी। इस वजह से दर्शकों को भारत के अनेक शहरों, रेलवे स्टेशनों और प्राकृतिक दृश्यों की वास्तविक झलक देखने का अवसर मिला। कन्याकुमारी से जम्मू तवी और जैसलमेर से पूर्वोत्तर भारत तक फैले लंबे रेल मार्गों को श्रृंखला का हिस्सा बनाया गया, जिससे इसकी प्रस्तुति और भी प्रामाणिक बन गई।

    ‘यात्रा’ में उस दौर के कई प्रतिष्ठित कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। ओम पुरी, नीना गुप्ता, इला अरुण, मोहन गोखले और हरीश पटेल जैसे कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय से साधारण लोगों की असाधारण कहानियों को जीवंत रूप दिया। प्रत्येक पात्र अपने साथ एक नया अनुभव और सामाजिक संदेश लेकर आता था, जिससे दर्शक भावनात्मक रूप से भी कहानी से जुड़ जाते थे।

    धारावाहिक में केवल मनोरंजन पर ही ध्यान नहीं दिया गया, बल्कि समाज के अनेक गंभीर विषयों को भी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया। लूटपाट, दुर्घटनाएं, महिलाओं की सुरक्षा, आत्महत्या की कोशिश, पारिवारिक संघर्ष, सामाजिक असमानता और मानवीय रिश्तों जैसे विषयों को कहानियों के माध्यम से सहज ढंग से दर्शाया गया। यही कारण था कि यह कार्यक्रम केवल एक रेल यात्रा नहीं, बल्कि समाज का चलता-फिरता आईना बन गया।

    हर एपिसोड की शुरुआत भारतीय रेलवे के इतिहास और उसके महत्व से जुड़े वॉइसओवर से होती थी। इसमें बताया जाता था कि रेलवे किस प्रकार देश के अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़ती है और करोड़ों लोगों के लिए सुलभ तथा किफायती यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण साधन बनी हुई है। इस प्रस्तुति ने कार्यक्रम को एक डॉक्यूमेंट्री जैसी गंभीरता और धारावाहिक जैसी रोचकता, दोनों प्रदान की।

    आज जब डिजिटल प्लेटफॉर्म और आधुनिक तकनीक का दौर है, तब भी ‘यात्रा’ जैसे कार्यक्रम भारतीय टेलीविजन की रचनात्मकता और सामाजिक सरोकारों की मिसाल माने जाते हैं। यह धारावाहिक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि भारत की विविधता, मानवीय संबंधों और रेल यात्रा के अनुभवों को एक साथ प्रस्तुत करने वाला ऐसा प्रयास था, जिसे आज भी दूरदर्शन के सबसे यादगार कार्यक्रमों में शामिल किया जाता है।

  • श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    नई दिल्ली ।अभिनेता कुणाल खेमू के परिवार का श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर एक बार फिर चर्चा में है। वर्षों बाद उनकी बहन करिश्मा खेमू अपने परिवार के साथ इस घर पहुंचीं और वहां बिताए गए बचपन के दिनों से जुड़ी यादों को साझा किया। इस यात्रा का एक भावनात्मक वीडियो सामने आया है, जिसमें परिवार अपने पुराने घर के हर हिस्से को देखते हुए अतीत की स्मृतियों को दोबारा जीता नजर आता है। यह दौरा केवल एक मकान तक लौटने का नहीं, बल्कि उन यादों और भावनाओं से दोबारा जुड़ने का अवसर बन गया, जो समय के साथ पीछे छूट गई थीं।

    वीडियो में करिश्मा खेमू अपने पुश्तैनी घर के अलग-अलग हिस्सों को दिखाते हुए बताती हैं कि कभी यह पूरा भवन उनके परिवार का था, लेकिन अब समय के साथ इसकी संरचना और उपयोग दोनों बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले जिन कमरों में परिवार के सदस्य साथ रहते थे, वे अब अलग-अलग हिस्सों में विभाजित हो चुके हैं और उनमें अन्य लोग निवास करते हैं। इसके बावजूद घर का हर कोना उनके बचपन की किसी न किसी याद को आज भी संजोए हुए है।

    करिश्मा की मां ने भी इस यात्रा के दौरान घर से जुड़ी कई पुरानी स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि विवाह के बाद परिवार की शुरुआती जिंदगी इसी घर की ऊपरी मंजिल पर बीती थी। उन्होंने उन कमरों की ओर इशारा करते हुए पुराने दिनों को याद किया, जहां परिवार एक साथ समय बिताता था। घर की सीढ़ियां, आंगन और कमरे आज भी उन्हें बीते वर्षों की घटनाओं की याद दिलाते हैं। परिवार ने बताया कि इस मकान का हर हिस्सा किसी न किसी व्यक्तिगत अनुभव और पारिवारिक रिश्ते से जुड़ा हुआ है।

    समय के प्रभाव की छाप भी इस पुश्तैनी भवन पर स्पष्ट दिखाई देती है। हवेली की दीवारों का रंग फीका पड़ चुका है, लकड़ी की संरचनाओं पर उम्र के निशान साफ नजर आते हैं और कई हिस्सों में मरम्मत की आवश्यकता महसूस होती है। पारंपरिक कश्मीरी स्थापत्य शैली में बने इस मकान की लकड़ी की बालकनी, नक्काशीदार खंभे और पुराने दरवाजे आज भी इसकी ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखते हैं। हालांकि लंबे समय के दौरान भवन की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है, लेकिन इसकी मूल संरचना अब भी अतीत की कहानी बयान करती है।

    करिश्मा ने बताया कि कभी पूरा परिवार जिस विशाल घर में एक साथ रहता था, आज वह कई छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कमरे अब बंद रहते हैं और कुछ हिस्सों में किरायेदार निवास करते हैं। घर की सीढ़ियों और गलियारों में पहले जैसी रौनक नहीं रही, लेकिन वहां पहुंचते ही बचपन की अनेक यादें स्वतः ताजा हो गईं। परिवार के लिए यह यात्रा भावनात्मक अनुभव साबित हुई, क्योंकि वर्षों बाद वे अपने उस घर की दहलीज पर लौटे, जहां उनके जीवन की शुरुआती स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।

    कुणाल खेमू का जन्म श्रीनगर में हुआ था और बचपन में ही उनका परिवार घाटी छोड़कर मुंबई आ गया था। इसके बाद उन्होंने फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि जीवन की नई यात्रा शुरू होने के बावजूद श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर उनके परिवार की पहचान और विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। करिश्मा खेमू की इस यात्रा ने एक बार फिर उन भावनात्मक संबंधों को सामने लाया है, जो किसी व्यक्ति और उसके पैतृक घर के बीच वर्षों बाद भी कायम रहते हैं। यह कहानी केवल एक भवन की नहीं, बल्कि स्मृतियों, पारिवारिक विरासत और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को भी दर्शाती है।

  • मुंबई में ऋतिक रोशन का बड़ा रियल एस्टेट दांव, ₹17 लाख मासिक किराए पर दिया कमर्शियल ऑफिस

    मुंबई में ऋतिक रोशन का बड़ा रियल एस्टेट दांव, ₹17 लाख मासिक किराए पर दिया कमर्शियल ऑफिस

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता ऋतिक रोशन ने अपनी कमर्शियल रियल एस्टेट निवेश रणनीति को आगे बढ़ाते हुए मुंबई के अंधेरी पश्चिम स्थित अपने एक बड़े ऑफिस स्पेस को पांच वर्ष की अवधि के लिए किराए पर दे दिया है। इस लीज समझौते के तहत शुरुआती तीन वर्षों के लिए मासिक किराया 17 लाख रुपये तय किया गया है, जबकि बाद के दो वर्षों में यह बढ़कर 19.55 लाख रुपये प्रति माह हो जाएगा। इस सौदे ने एक बार फिर फिल्मी हस्तियों के बीच कमर्शियल प्रॉपर्टी निवेश की बढ़ती प्रवृत्ति को चर्चा में ला दिया है।

    यह ऑफिस स्पेस अंधेरी पश्चिम के न्यू लिंक रोड स्थित एक बिजनेस पार्क में मौजूद है। लगभग 6,000 वर्गफुट में फैली यह संपत्ति सात अलग-अलग यूनिट्स में विभाजित है और इसके साथ सात कार पार्किंग की सुविधा भी उपलब्ध है। लीज समझौते के तहत किराएदार ने 68 लाख रुपये की सिक्योरिटी डिपॉजिट भी जमा कराई है। यह अनुबंध 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी माना गया है और 31 मार्च 2031 तक जारी रहेगा।

    समझौते के अनुसार पहले तीन वर्षों तक किराया 17 लाख रुपये प्रतिमाह रहेगा। इसके बाद शेष दो वर्षों के लिए किराया बढ़ाकर 19.55 लाख रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है। इस तरह यह सौदा लंबी अवधि की स्थिर आय सुनिश्चित करने वाली कमर्शियल लीज का उदाहरण माना जा रहा है।

    पिछले कुछ वर्षों में ऋतिक रोशन ने मनोरंजन जगत के साथ-साथ रियल एस्टेट क्षेत्र में भी सक्रिय निवेशक के रूप में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। विशेष रूप से कमर्शियल ऑफिस स्पेस में निवेश और उन्हें कॉर्पोरेट कंपनियों को किराए पर देने की रणनीति उनकी निवेश प्राथमिकताओं का हिस्सा बनती जा रही है। मुंबई और पुणे जैसे प्रमुख शहरों में उनकी संपत्तियां नियमित किराया आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन रही हैं।

    अंधेरी पश्चिम क्षेत्र में उनके परिवार द्वारा हाल के वर्षों में कई कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदे जाने की जानकारी भी सामने आ चुकी है। बीते वर्ष ऋतिक रोशन, उनके पिता राकेश रोशन से जुड़ी कंपनी और उनकी मां की कंपनी ने मिलकर लगभग 28 करोड़ रुपये की लागत से 10 ऑफिस यूनिट्स खरीदी थीं। इसके अलावा परिवार की ओर से करीब 19.68 करोड़ रुपये में पांच अन्य कमर्शियल ऑफिस यूनिट्स का अधिग्रहण भी किया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि परिवार व्यवस्थित रूप से कमर्शियल रियल एस्टेट पोर्टफोलियो का विस्तार कर रहा है।

    ऋतिक रोशन पहले भी अपनी संपत्तियों को लीज पर देने को लेकर चर्चा में रह चुके हैं। इससे पहले उन्होंने मुंबई के जुहू स्थित अपने एक आवासीय फ्लैट को किराए पर दिया था। अब अंधेरी स्थित इस बड़े कमर्शियल ऑफिस स्पेस की लीज उनके निवेश पोर्टफोलियो में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मुंबई के प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में उच्च गुणवत्ता वाले ऑफिस स्पेस की मांग लगातार बनी हुई है। ऐसे में कमर्शियल संपत्तियों से नियमित किराया आय निवेशकों के लिए आकर्षक विकल्प बनती जा रही है। फिल्म उद्योग से जुड़े कई कलाकार भी अब केवल मनोरंजन क्षेत्र तक सीमित न रहकर रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक निवेश कर रहे हैं। ऋतिक रोशन का यह नया सौदा इसी बदलते निवेश रुझान का एक प्रमुख उदाहरण माना जा रहा है।

  • मदुरा द्वीप के पास यात्री फेरी में भीषण आग, पांच लोगों की मौत और 41 यात्रियों की तलाश जारी

    मदुरा द्वीप के पास यात्री फेरी में भीषण आग, पांच लोगों की मौत और 41 यात्रियों की तलाश जारी

    नई दिल्ली । इंडोनेशिया के मदुरा द्वीप के निकट समुद्र में रविवार को एक बड़ा समुद्री हादसा सामने आया, जब यात्रियों से भरी एक फेरी में अचानक भीषण आग लग गई। इस दुर्घटना में कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि 41 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। हादसे के बाद समुद्री क्षेत्र में व्यापक स्तर पर राहत और बचाव अभियान शुरू किया गया है। कई बचाव जहाजों और राहत दलों को मौके पर भेजा गया है, जो लापता लोगों की तलाश में लगातार जुटे हुए हैं। अधिकारियों के अनुसार आग लगने के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है और इसकी विस्तृत जांच की जा रही है।

    प्रारंभिक जानकारी के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त फेरी पूर्वी जावा प्रांत के सुराबाया शहर से दक्षिण सुलावेसी के मकासर के लिए रवाना हुई थी। यात्रा के दौरान जावा के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित मदुरा द्वीप के पास अचानक जहाज में आग भड़क उठी। आग तेजी से फैलने के कारण जहाज पर सवार यात्रियों और चालक दल के बीच अफरा-तफरी मच गई। घटना की सूचना मिलते ही समुद्री बचाव एजेंसियों को सक्रिय किया गया और आसपास मौजूद जहाजों को भी राहत कार्य में शामिल किया गया।

    अधिकारियों ने बताया कि फेरी में यात्रियों और चालक दल सहित कुल 271 लोग सवार थे। अब तक 225 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। बचाए गए यात्रियों को प्राथमिक उपचार और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। वहीं लापता 41 लोगों की तलाश के लिए समुद्र के विस्तृत क्षेत्र में खोज अभियान चलाया जा रहा है। राहत दल समुद्री परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लगातार तलाशी अभियान संचालित कर रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों को सुरक्षित खोजा जा सके।

    घटना के बाद संबंधित एजेंसियों ने आसपास के समुद्री मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी है। बचाव कार्य में कई जहाजों के अलावा अन्य समुद्री संसाधनों का भी उपयोग किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि फेरी में आग कैसे लगी, इसका पता लगाने के लिए तकनीकी जांच शुरू कर दी गई है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक आग लगने के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष नहीं निकाला जाएगा।

    इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े द्वीपीय देशों में शामिल है, जहां हजारों द्वीपों के बीच आवागमन के लिए फेरी सेवाएं प्रमुख परिवहन माध्यम हैं। बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन समुद्री मार्गों का उपयोग करते हैं। ऐसे में किसी भी समुद्री दुर्घटना का प्रभाव व्यापक स्तर पर पड़ता है और राहत एजेंसियों के सामने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।

    देश में इससे पहले भी कई समुद्री दुर्घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जुलाई 2025 में उत्तरी सुलावेसी प्रांत के पास एक यात्री जहाज में आग लगने से तीन लोगों की मौत हुई थी, जबकि बड़ी संख्या में यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया गया था। इससे पहले वर्ष 2021 में मोलुक्का सागर में एक अन्य फेरी में आग लगने के बाद सभी यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को सफलतापूर्वक बचा लिया गया था। इन घटनाओं के बाद समुद्री सुरक्षा मानकों को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया जाता रहा है।

    मौजूदा हादसे के बाद प्रशासन ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा है कि लापता लोगों की तलाश सर्वोच्च प्राथमिकता है। राहत अभियान लगातार जारी है और जांच पूरी होने के बाद हादसे के वास्तविक कारणों तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए आवश्यक कदमों की जानकारी सार्वजनिक की जाएगी।

  • फ्रेंडशिप डे को बनाएं यादगार, दोस्तों के साथ दिल्ली के इन लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर बिताएं खास पल

    फ्रेंडशिप डे को बनाएं यादगार, दोस्तों के साथ दिल्ली के इन लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर बिताएं खास पल

    नई दिल्ली । फ्रेंडशिप डे हर वर्ष मित्रता के रिश्ते को मजबूत बनाने और दोस्तों के साथ यादगार पल बिताने का विशेष अवसर लेकर आता है। इस दिन लोग अपने करीबी दोस्तों के साथ घूमने, बातचीत करने और नई यादें बनाने की योजना बनाते हैं। यदि इस बार आपने अभी तक कोई खास प्लान नहीं बनाया है, तो देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी कई प्रसिद्ध जगहें हैं, जहां कम समय और कम बजट में भी शानदार आउटिंग की जा सकती है। इतिहास, संस्कृति, हरियाली और आधुनिक जीवनशैली का अनूठा मेल दिल्ली को फ्रेंडशिप डे मनाने के लिए एक बेहतरीन शहर बनाता है।

    दोस्तों के साथ समय बिताने के लिए इंडिया गेट सबसे लोकप्रिय स्थानों में शामिल है। शाम के समय यहां का माहौल बेहद आकर्षक होता है। खुला परिसर, रोशनी से जगमगाता स्मारक और आसपास की चहल-पहल लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां बैठकर बातचीत करना, समूह में तस्वीरें लेना और शाम की सैर करना इस दिन को और खास बना सकता है।

    प्राकृतिक वातावरण पसंद करने वालों के लिए लोधी गार्डन एक बेहतरीन विकल्प है। ऐतिहासिक इमारतों और घने पेड़ों से घिरा यह उद्यान शहर की भागदौड़ से दूर सुकून का अनुभव कराता है। यहां दोस्त पिकनिक का आनंद ले सकते हैं, आराम से बैठकर बातचीत कर सकते हैं और हरियाली के बीच यादगार पल बिता सकते हैं।

    कनॉट प्लेस भी युवाओं की पहली पसंद माना जाता है। यहां मौजूद कैफे, रेस्तरां, पुस्तकालय, शॉपिंग आउटलेट और स्ट्रीट फूड लोगों को आकर्षित करते हैं। दोस्त यहां खरीदारी करने के साथ-साथ अपने पसंदीदा कैफे में बैठकर समय बिता सकते हैं। शाम के समय यहां का जीवंत वातावरण पूरे दिन को यादगार बना देता है।

    यदि आप कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं, तो मजनू का टीला भी शानदार विकल्प हो सकता है। तिब्बती संस्कृति, स्थानीय बाजार, आकर्षक कैफे और अलग-अलग तरह के व्यंजन इस जगह की खास पहचान हैं। यहां दोस्तों के साथ घूमना और नए स्वादों का आनंद लेना फ्रेंडशिप डे को और भी खास बना सकता है।

    दिल्ली हाट भी इस अवसर पर घूमने के लिए उपयुक्त स्थानों में गिना जाता है। यहां देश के विभिन्न राज्यों की हस्तशिल्प कला, पारंपरिक वस्तुएं और स्थानीय व्यंजन एक ही स्थान पर देखने को मिलते हैं। दोस्तों के साथ खरीदारी करने और अलग-अलग राज्यों के स्वाद का आनंद लेने का अनुभव इस दिन को लंबे समय तक यादगार बना सकता है।

    हौज खास विलेज और कुतुब मीनार परिसर भी घूमने के लिए बेहतरीन विकल्प हैं। हौज खास में झील, ऐतिहासिक धरोहर और आधुनिक कैफे का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जबकि कुतुब मीनार परिसर इतिहास और वास्तुकला में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करता है। इन स्थानों पर घूमते हुए फोटोग्राफी का आनंद भी लिया जा सकता है।

    फ्रेंडशिप डे का महत्व केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोस्तों के साथ बिताए गए अनमोल समय का उत्सव है। चाहे आप किसी पार्क में बैठकर पुरानी यादें साझा करें, किसी ऐतिहासिक स्थल की सैर करें या किसी कैफे में साथ भोजन करें, ऐसे पल रिश्तों को और मजबूत बनाते हैं। सही योजना और अच्छी संगत इस खास दिन को लंबे समय तक याद रखने लायक बना सकती है।

  • स्यूटा माइग्रेशन संकट के बाद इटली ने स्पेन से आने वालों पर बढ़ाई निगरानी, सीमा जांच हुई सख्त

    स्यूटा माइग्रेशन संकट के बाद इटली ने स्पेन से आने वालों पर बढ़ाई निगरानी, सीमा जांच हुई सख्त

    नई दिल्ली । स्पेन के स्यूटा क्षेत्र में हाल ही में बढ़े अवैध प्रवासन संकट का असर अब पूरे यूरोप की राजनीति और सीमा सुरक्षा व्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। बड़ी संख्या में प्रवासियों के स्यूटा पहुंचने के बाद इटली ने स्पेन से समुद्र और हवाई मार्ग के जरिए आने वाले यात्रियों की जांच को अस्थायी रूप से सख्त करने का फैसला लिया है। इस कदम ने यूरोपीय संघ के भीतर सीमा नियंत्रण और शेंगेन व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    स्यूटा, अफ्रीका में मोरक्को की सीमा से सटा स्पेन का स्वायत्त क्षेत्र है और लंबे समय से यूरोप में प्रवेश का एक प्रमुख मार्ग माना जाता रहा है। हाल के घटनाक्रम में बड़ी संख्या में प्रवासियों के इस क्षेत्र में पहुंचने के बाद कई यूरोपीय देशों ने अपनी सीमा सुरक्षा और प्रवासन नीतियों की समीक्षा शुरू कर दी है। इटली का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में प्रवासी स्पेन पहुंच जाते हैं तो शेंगेन क्षेत्र के मुक्त आवागमन के कारण वे अन्य सदस्य देशों तक भी पहुंच सकते हैं।

    इसी आशंका को देखते हुए इटली सरकार ने स्पेन से आने वाले समुद्री और हवाई यात्रियों की अतिरिक्त जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, यह व्यवस्था फिलहाल एक महीने के लिए लागू की गई है। इस अवधि में प्रमुख बंदरगाहों और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर गैर-यूरोपीय संघ के नागरिकों के दस्तावेजों की गहन जांच की जाएगी। पहचान पत्र के साथ वैध वीजा या निवास परमिट की भी जांच की जा रही है ताकि अनियमित प्रवासन पर प्रभावी निगरानी रखी जा सके।

    इटली सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कदम शेंगेन व्यवस्था को समाप्त करने के उद्देश्य से नहीं उठाया गया है। सरकार का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सुरक्षा कारणों से उपलब्ध विशेष प्रावधानों का उपयोग करते हुए सीमित अवधि के लिए सीमा नियंत्रण को मजबूत किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि इससे अवैध प्रवासन और मानव तस्करी से जुड़े नेटवर्क की गतिविधियों पर नजर रखने में सहायता मिलेगी।

    दूसरी ओर, स्पेन ने इटली के इस निर्णय पर असहमति जताई है। स्पेन सरकार का कहना है कि यूरोप के सामने मौजूद प्रवासन संकट का समाधान सदस्य देशों के बीच समन्वित प्रयासों से ही संभव है। इसी उद्देश्य से स्पेन ने यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व से हस्तक्षेप की मांग करते हुए साझा रणनीति तैयार करने पर जोर दिया है। स्पेन का मानना है कि एकतरफा सीमा नियंत्रण से यूरोपीय सहयोग की भावना प्रभावित हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि स्यूटा में उत्पन्न स्थिति केवल स्पेन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे यूरोप की सुरक्षा और प्रवासन नीति पर पड़ सकता है। सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ मानव तस्करी के नेटवर्क पर कार्रवाई, प्रवासियों के मूल देशों के साथ सहयोग और कानूनी प्रवासन व्यवस्था को प्रभावी बनाना भी आवश्यक माना जा रहा है। यूरोपीय संघ के लिए यह चुनौती सुरक्षा, मानवीय दायित्व और सदस्य देशों के बीच मुक्त आवाजाही के सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

    आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच व्यापक चर्चा होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देश साझा नीति और समन्वित रणनीति अपनाते हैं तो सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ मानवीय दायित्वों का भी बेहतर तरीके से पालन किया जा सकेगा। स्यूटा संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अवैध प्रवासन केवल किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि पूरे यूरोप के लिए साझा चुनौती बन चुका है।

  • भारत ने सौर ऊर्जा विस्तार में अमेरिका को छोड़ा पीछे, दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ी से बढ़ता बाजार बना

    भारत ने सौर ऊर्जा विस्तार में अमेरिका को छोड़ा पीछे, दुनिया का दूसरा सबसे तेज़ी से बढ़ता बाजार बना

    नई दिल्ली ।भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए वैश्विक सौर ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। वर्ष 2025 के दौरान रिकॉर्ड स्तर पर नई सौर क्षमता स्थापित करने के बाद भारत अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे तेजी से बढ़ने वाला सोलर एनर्जी मार्केट बन गया है। यह उपलब्धि देश की ऊर्जा सुरक्षा, हरित विकास और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में देश की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता केवल 3 गीगावाट थी, जो 30 जून 2026 तक बढ़कर 162.15 गीगावाट पहुंच गई है। पिछले एक दशक में हुई यह तेज वृद्धि दर्शाती है कि भारत ने सौर ऊर्जा क्षेत्र में योजनाबद्ध निवेश, नीतिगत सुधार और तकनीकी विस्तार के माध्यम से उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2025 में अकेले 37 गीगावाट नई क्षमता जोड़ने के कारण भारत ने वार्षिक क्षमता वृद्धि के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया।

    सौर ऊर्जा क्षेत्र की इस सफलता के पीछे बिजली उत्पादन की लागत में आई बड़ी कमी भी अहम कारण रही है। प्रतिस्पर्धी ई-रिवर्स ऑक्शन प्रणाली लागू होने के बाद डेवलपर्स के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे सौर बिजली की दरों में लगातार गिरावट दर्ज की गई। वर्ष 2010 में जहां सौर बिजली की कीमत लगभग 18 रुपये प्रति यूनिट थी, वहीं समय के साथ यह घटकर 2.44 रुपये प्रति यूनिट के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गई। इससे उद्योगों, राज्यों और उपभोक्ताओं के लिए सौर ऊर्जा अधिक किफायती विकल्प बन गई।

    कम लागत का लाभ वैश्विक स्तर पर भी दिखाई दिया है। वर्ष 2025 में भारत में यूटिलिटी स्तर के सोलर फोटोवोल्टिक संयंत्रों से बिजली उत्पादन की लेवलाइज्ड कॉस्ट ऑफ इलेक्ट्रिसिटी 35 डॉलर प्रति मेगावाट रही, जबकि वैश्विक औसत 44 डॉलर प्रति मेगावाट था। इससे भारत दुनिया के सबसे कम लागत वाले सौर ऊर्जा बाजारों में अपनी मजबूत पहचान बनाने में सफल रहा है।

    हाल ही में मंजूर की गई प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना से भी सौर ऊर्जा क्षेत्र को नई गति मिलने की उम्मीद है। इस योजना के तहत ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 5,000 मेगावाट क्षमता वाले फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक प्रोजेक्ट विकसित किए जाएंगे। इसके साथ कम से कम 10,000 मेगावाट घंटे की ऊर्जा भंडारण क्षमता तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे बिजली की अधिक मांग के समय राज्यों को बेहतर सहायता मिल सकेगी। जलाशयों और औद्योगिक तालाबों का उपयोग होने से भूमि पर अतिरिक्त दबाव भी कम होगा और बिजली ग्रिड की विश्वसनीयता में सुधार आएगा।

    देश में बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापित क्षमता 118.79 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। राजस्थान का भादला सोलर पार्क, कर्नाटक का पावगाडा सोलर पार्क और मध्य प्रदेश का रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पार्क देश की प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त रूफटॉप सोलर सिस्टम से 27.88 गीगावाट क्षमता प्राप्त हो रही है, जबकि हाइब्रिड और ऑफ-ग्रिड परियोजनाएं भी ऊर्जा आपूर्ति को मजबूत बना रही हैं।

    भारत की कुल गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता अब 283.46 गीगावाट तक पहुंच चुकी है, जिसमें 274.68 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त हो रही है। देश ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता विकसित करने और वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सौर ऊर्जा क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति इन राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भारत की बढ़ती क्षमता, तकनीकी दक्षता और वैश्विक नेतृत्व की मजबूत तस्वीर प्रस्तुत करती है।

  • तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में लंबे अंतराल के बाद निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन की सार्वजनिक मौजूदगी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। करीब 19 वर्ष बाद कोलकाता में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उनका स्वागत करते हुए भरोसा दिलाया कि जब भी वह पश्चिम बंगाल आना चाहेंगी, उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इस अवसर को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम में तस्लीमा नसरीन ने हिस्सा लिया। लंबे समय बाद शहर में उनकी सार्वजनिक उपस्थिति ने साहित्य, समाज और राजनीति से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार प्रत्येक लेखक और विचारक के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करती है। उन्होंने तस्लीमा नसरीन को आश्वस्त किया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जितनी बार चाहें पश्चिम बंगाल आ सकती हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि तस्लीमा नसरीन की रचनाओं को बड़ी संख्या में पाठक पढ़ते हैं और साहित्य के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज में लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने विचार रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी भावना के तहत राज्य सरकार उनकी यात्रा और सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक इंतजाम करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए तस्लीमा नसरीन ने अपनी वापसी को प्रतीकात्मक बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद कोलकाता लौटना इस बात का संकेत है कि अन्याय हमेशा कायम नहीं रहता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर आधारित रहा है। उनके अनुसार समाज में स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित वातावरण आवश्यक है।

    तस्लीमा नसरीन वर्ष 1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं। अपनी लेखनी और विचारों के कारण उन्हें कट्टरपंथी संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिलने के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। बाद के वर्षों में वह भारत सहित विभिन्न देशों में रहीं। वर्ष 2007 में कोलकाता में उनके लेखन को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उनकी सार्वजनिक रूप से कोलकाता वापसी नहीं हो सकी थी।

    करीब दो दशक बाद उनकी यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने भविष्य के लिए ऐसी दुनिया की उम्मीद जताई, जहां किसी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने के कारण अपना घर या देश छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य समाज में संवाद और विचारों का विस्तार करना है, न कि भय का वातावरण बनाना।

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी और राज्य सरकार की ओर से दिए गए सुरक्षा आश्वासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा साहित्यिक और सामाजिक विमर्श के साथ-साथ सार्वजनिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।