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  • TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा

    TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा


    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और बगावत खुलकर सामने आने लगी है। इसी बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने विरोधियों को जवाब देते हुए एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की नई सूची चुनाव आयोग को भेजकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि संगठन पर उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है।

    दरअसल सोमवार को पार्टी के बागी नेताओं ने कोलकाता में एक बैठक आयोजित कर तृणमूल कांग्रेस की समानांतर वर्किंग कमेटी बनाने का दावा किया था। इस बैठक में ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा की गई और उनकी जगह अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। इतना ही नहीं बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार का पद देने का प्रस्ताव भी सामने आया।

    बागी नेताओं की इस कार्रवाई के बाद ममता बनर्जी ने तुरंत राजनीतिक जवाबी रणनीति अपनाई। उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्यों की नई सूची चुनाव आयोग को भेज दी। इस सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है जबकि अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव और सुब्रत बख्शी को उपाध्यक्ष के रूप में दर्शाया गया है।

    नई सूची के चुनाव आयोग तक पहुंचने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध और प्रभावी बनाए रखने के लिए सक्रिय हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बागी गुट को सीधा संदेश देने की रणनीति भी है।

    दूसरी ओर बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि पार्टी में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। उनका दावा है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और नए संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए गए। इसी वजह से उन्होंने समानांतर कार्यसमिति के गठन को उचित ठहराया है।

    अब पार्टी पर नियंत्रण को लेकर दोनों गुट आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला आधिकारिक संगठन है तो दूसरी तरफ बागी नेताओं का गुट अपने दावों के साथ मैदान में उतर चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि विवाद और बढ़ता है तो मामला चुनाव आयोग के साथ-साथ अदालत तक भी पहुंच सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी ने नई सूची भेजकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह पार्टी नेतृत्व को लेकर किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले समय में नए समीकरण पैदा कर सकता है और TMC के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • अभिषेक बनर्जी की 6 साल पुराने मामले में हो सकती है गिरफ्तारी… एमपी HC ने खारिज की याचिका

    अभिषेक बनर्जी की 6 साल पुराने मामले में हो सकती है गिरफ्तारी… एमपी HC ने खारिज की याचिका


    जबलपुर।
    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) में तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) की करारी हार के बाद ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) चौतरफा मुसीबतों से घिरे हुए हैं। इस बीच अभिषेक बनर्जी पर गिरफ्तारी की तलावर लटक गई है। एक छह साल पुराने मानहानि के मामले में मध्य प्रदेश पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। अदालत ने इसके लिए रास्ता साफ कर दिया है। अदालत का यह आदेश उस दिन आया जिस दिन सांसद के खिलाफ पश्चिम बंगाल में भी दो नए केस दर्ज किए गए हैं।

    ईडी समेत कई जांच एजेंसियों के रडार पर आए अभिषेक बनर्जी को जहां एक तरफ जनता के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ उनके खिलाफ कई कानूनी मोर्चे भी खुल गए हैं। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने अभिषेक बनर्जी की याचिका को खारिज कर दिया और हाई कोर्ट से 12 नवंबर 2025 को मिले स्टे को हटा दिया। भोपाल में विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने यह अरेस्ट वारंट जारी किया था। अदालत ने कहा, ‘पहले चरण में भी याचिकाकर्ता की ओर से कोई पेश नहीं हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता की इस याचिका की कार्यवाही में कोई दिलचस्पी नहीं है। याचिकाकर्ता के पक्ष में दिए गए स्टे को भी हटाया जा रहा है।


    अभिषेक बनर्जी की हो सकती है गिरफ्तारी

    अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ जारी अरेस्ट वारंट पर लगी रोक को हटा दिया है। इससे बनर्जी की गिरफ्तारी का रास्ता साफ हो गया है। माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश पुलिस जल्द ही पश्चिम बंगाल जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। यह भी संभव है कि एमपी पुलिस के ऐक्शन से पहले वह सुप्रीम कोर्ट जाकर राहत की मांग करें।


    6 साल पहले कोलकाता में दिया था बयान

    सांसद अभिषेक बनर्जी के अरेस्ट वारंट से स्टे हटाते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि आदेश की कॉपी तुरंत ट्रायल कोर्ट को भेजी जाए। यह मामला 6 साल पुराना है, जब नवंबर 2020 में एक चुनावी रैली के दौरान अभिषेक बनर्जी ने आकाश विजयवर्गीय के लिए कथित तौर पर ‘गुंडा’ वाला बयान दिया था। आकाश विजयवर्गीय ने एमपी-एमएलए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। एमपी-एमएलए की विशेष अदालत ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे, जिसके बाद अभिषेक बनर्जी ने हाई कोर्ट की शरण ली थी। याचिका में कहा गया था कि वह वर्तमान में एक सांसद हैं, ऐसे में उनके फरार होने की संभावना नहीं है। इस बीच पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेता अभिजीत दास की शिकायत पर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दक्षिण 24 परगना जिले में दो एफआईआर दर्ज की गई है।

  • TMC में बगावत के बीच ममता के साथ खड़े हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, बागियों पर साधा निशाना

    TMC में बगावत के बीच ममता के साथ खड़े हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद, बागियों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कई नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बागी रुख अपनाने की चर्चाओं के बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को उस समय बड़ी राहत मिली जब वरिष्ठ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद खुलकर उनके समर्थन में सामने आए।

    आसनसोल से सांसद और लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे Shatrughan Sinha ने पार्टी छोड़ने या किसी बागी गुट में शामिल होने की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह ममता बनर्जी के साथ थे, हैं और आगे भी रहेंगे। उनके अनुसार राजनीति में कठिन समय ही रिश्तों और निष्ठा की असली परीक्षा होती है।

    शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि जब उनके राजनीतिक जीवन में चुनौतीपूर्ण दौर आया था, तब Mamata Banerjee ने उन पर भरोसा जताया था। उन्होंने दावा किया कि ऐसे समय में उनका कर्तव्य बनता है कि वे भी ममता बनर्जी का साथ दें। उन्होंने यह भी कहा कि उनके नाम को लेकर जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे निराधार हैं और उनका किसी कथित बागी समूह से कोई संबंध नहीं है।

    अपने विशेष अंदाज में शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वह स्वयं अपने लिए “तीन लाइन का व्हिप” जारी कर रहे हैं कि उनका राजनीतिक और नैतिक समर्थन ममता बनर्जी तथा टीएमसी के साथ बना रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों में उनके मित्र हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पार्टी छोड़ने जा रहे हैं।

    इसी क्रम में बर्धमान-दुर्गापुर से सांसद Kirti Azad भी पार्टी नेतृत्व के समर्थन में मजबूती से सामने आए। उन्होंने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए दावा किया कि कुछ लोग राजनीतिक दबाव और अन्य कारणों से पार्टी छोड़ रहे हैं। कीर्ति आजाद ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल टीएमसी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ नेताओं को प्रभावित किया जा रहा है।

    उन्होंने बागी नेताओं के उस दावे को भी चुनौती दी, जिसमें बड़ी संख्या में सांसदों के समर्थन की बात कही गई थी। कीर्ति आजाद के अनुसार, पार्टी के भीतर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इससे संगठन की मूल ताकत कमजोर नहीं होती। उन्होंने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक क्षमता और अनुभव के बल पर मौजूदा संकट से पार्टी को बाहर निकाल लेंगी।

    इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच सामने आए मतभेदों पर भी प्रतिक्रिया दी गई। कीर्ति आजाद ने कहा कि कल्याण बनर्जी लंबे समय से पार्टी के महत्वपूर्ण नेता रहे हैं और उन्होंने हमेशा संगठन के लिए काम किया है। उनके अनुसार, नेतृत्व स्तर पर उत्पन्न मतभेदों का समाधान बातचीत और संगठनात्मक प्रक्रिया के जरिए निकाला जा सकता है।

    गौरतलब है कि हाल के दिनों में टीएमसी के कई नेताओं और सांसदों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। कुछ रिपोर्टों में बागी खेमे द्वारा समर्थन जुटाने की बात कही गई है, जबकि पार्टी नेतृत्व इन दावों को गंभीरता से नहीं ले रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस चुनौती से कैसे निपटती है।

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पार्टी के संकट के दौर में शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद जैसे वरिष्ठ नेताओं का सार्वजनिक समर्थन ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके बयानों ने यह संकेत दिया है कि टीएमसी के भीतर चल रही उठापटक के बावजूद नेतृत्व के साथ खड़े रहने वाले नेताओं की संख्या भी कम नहीं है।

  • अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: कल्याण बनर्जी के बेटे ने छोड़ा केस, बोले- सम्मान नहीं मिलेगा तो साथ नहीं देंगे

    अभिषेक बनर्जी पर बढ़ा दबाव: कल्याण बनर्जी के बेटे ने छोड़ा केस, बोले- सम्मान नहीं मिलेगा तो साथ नहीं देंगे


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही खींचतान अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को लेकर वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी के परिवार की नाराजगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। अधिवक्ता शीर्षाण्य बनर्जी, जो वरिष्ठ टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी के पुत्र हैं, ने दावा किया है कि पेशेवर सम्मान और वकालत की परंपराओं की अनदेखी किए जाने के कारण उन्होंने अभिषेक बनर्जी से जुड़े कानूनी मामलों से खुद को अलग करने का निर्णय लिया है।

    शीर्षाण्य बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे 2 जून से एक मामले पर काम कर रहे थे और उनका प्रयास था कि अभिषेक बनर्जी को कानूनी राहत मिल सके। उनका दावा है कि बाद में उन्हें जानकारी दी गई कि मामले की पैरवी के लिए किसी अन्य वकील को जिम्मेदारी दी जा रही है, जो उनके पिता कल्याण बनर्जी से जूनियर हैं। शीर्षाण्य के अनुसार, वकालत के पेशे में वरिष्ठता और पेशेवर शिष्टाचार का विशेष महत्व होता है और इसी सिद्धांत के आधार पर उन्होंने मामले से अलग होने का फैसला किया।

    उन्होंने कहा कि वकीलों का भी आत्मसम्मान होता है और पेशेवर सम्मान हर व्यक्ति का अधिकार है। उनका दावा है कि यदि किसी पेशेवर को उचित सम्मान नहीं दिया जाता है तो उसके लिए ऐसे मामलों में काम जारी रखना मुश्किल हो जाता है। शीर्षाण्य ने यह भी कहा कि उन्होंने जो निर्णय लिया है, वह पूरी तरह पेशेवर आधार पर लिया गया है और इसका उद्देश्य अपने पेशे की गरिमा बनाए रखना है।

    हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका यह फैसला पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के प्रति उनके रुख को प्रभावित नहीं करता। शीर्षाण्य ने कहा कि वे ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी के लिए पहले की तरह काम करते रहेंगे। उनका कहना था कि टीएमसी केवल किसी एक नेता का नाम नहीं है, बल्कि बूथ स्तर पर काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं का सामूहिक संगठन है।

    इस बीच, वरिष्ठ टीएमसी नेता Kalyan Banerjee ने भी अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी आपत्तियां रखते हुए अभिषेक बनर्जी पर अहंकारी व्यवहार का आरोप लगाया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि वे अभिषेक से जुड़े कानूनी मामलों में आगे काम नहीं करेंगे। हालांकि, इन बयानों पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी के भीतर विभिन्न स्तरों पर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। कई नेता संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व शैली को लेकर अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हैं। ऐसे में कल्याण बनर्जी और शीर्षाण्य बनर्जी की टिप्पणियां पार्टी के अंदर चल रही बहस को और तेज कर सकती हैं।

    फिलहाल यह पूरा विवाद राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर अभिषेक बनर्जी पार्टी संगठन में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी पार्टी के लिए नई चुनौती के रूप में देखी जा रही है। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे को किस तरह संभालता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

  • हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद सड़कों पर घुमाए गए TMC नेता जहांगीर खान, बंगाल पुलिस की कार्रवाई पर उठा विवाद

    हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद सड़कों पर घुमाए गए TMC नेता जहांगीर खान, बंगाल पुलिस की कार्रवाई पर उठा विवाद


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था और राजनीतिक घटनाक्रम के बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता जहांगीर खान से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गया है। हाल ही में गिरफ्तार किए गए जहांगीर खान को पुलिस द्वारा दक्षिण 24 परगना जिले के फालता क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से पैदल ले जाने के वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब कुछ दिन पहले ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने की प्रथा पर कड़ी टिप्पणी की थी।

    जानकारी के अनुसार, जहांगीर खान को सोमवार को भारत-नेपाल सीमा के निकट उत्तर बंगाल के पानीटंकी क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ जबरन वसूली सहित कई गंभीर आरोपों में सात एफआईआर दर्ज होने की बात कही जा रही है। गिरफ्तारी के बाद अदालत ने उन्हें पांच दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। गुरुवार को सामने आए वीडियो में पुलिसकर्मी उन्हें फालता और आसपास के इलाकों में पैदल ले जाते दिखाई दे रहे हैं, जिसके बाद इस कार्रवाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    जहांगीर खान पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक चर्चित नाम रहे हैं। उन्हें टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद Abhishek Banerjee का करीबी माना जाता है। विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी उनका नाम लगातार चर्चा में रहा था। बताया जाता है कि मतदान से पहले वह क्षेत्र से गायब हो गए थे और उसके बाद से उनके खिलाफ विभिन्न मामलों की जांच जारी थी।

    इस मामले ने इसलिए भी ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने आरोपियों को सार्वजनिक रूप से घुमाने के मामलों पर पश्चिम बंगाल पुलिस से रिपोर्ट मांगी थी। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा था कि पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित या बदनाम करने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया था कि ऐसी कार्रवाइयों को संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में परखा जाना चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में ही कड़े नियंत्रण या हथकड़ी के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। कानून का उद्देश्य सुरक्षा और जांच सुनिश्चित करना है, न कि किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना। यही कारण है कि आरोपी को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की घटनाएं अक्सर न्यायिक समीक्षा और मानवाधिकार संबंधी बहस का विषय बन जाती हैं।

    देश के अन्य राज्यों में भी इस तरह के मामलों पर अदालतें सख्त रुख अपना चुकी हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी पूर्व में ऐसी घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि किसी भी आरोपी के सम्मान और गरिमा के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए, चाहे उसके खिलाफ आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों।

    फिलहाल जहांगीर खान का मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति और पुलिस प्रशासन दोनों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जांच जारी है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की कार्रवाई को लेकर कानूनी और संवैधानिक प्रश्न भी उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में अदालत और प्रशासन की प्रतिक्रिया इस मामले की दिशा तय कर सकती है।

  • TMC-कांग्रेस विलय की अटकलें तेज, ममता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद की पेशकश की चर्चा

    TMC-कांग्रेस विलय की अटकलें तेज, ममता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद की पेशकश की चर्चा


    नई दिल्ली । देश की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संभावित विलय की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। दिल्ली में गांधी परिवार और बनर्जी परिवार के बीच हुई हालिया मुलाकातों के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि दोनों दलों की ओर से अब तक किसी भी प्रकार के विलय या औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के हवाले से सामने आ रही खबरों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है।

    मीडिया रिपोर्ट्स में कांग्रेस सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि यदि भविष्य में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होता है, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव दिया गया है। वहीं, टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को कांग्रेस महासचिव पद की पेशकश किए जाने की भी चर्चा है। हालांकि इन दावों की किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    विलय की संभावनाओं को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह प्रक्रिया कितनी व्यावहारिक होगी। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि टीएमसी के भीतर कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं। कुछ बागी नेताओं की ओर से पार्टी के भीतर असंतोष की बात कही जा रही है। हालांकि इन दावों पर भी पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना है तो कांग्रेस और टीएमसी के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी संदर्भ में हालिया बैठकों को देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि इन मुलाकातों में विपक्षी एकता, INDIA गठबंधन की रणनीति और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत केवल गठबंधन तक सीमित है या भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक समीकरण की भी संभावना है।

    इस बीच टीएमसी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के कांग्रेस में विलय की अटकलों को खारिज किया है। उनका कहना है कि तृणमूल कांग्रेस अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगी। दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो इससे विपक्षी राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। हालांकि पश्चिम बंगाल कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय बताई जा रही है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार फिलहाल स्थिति पूरी तरह अटकलों और सूत्रों पर आधारित है। दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आने वाले दिनों में दिए जाने वाले बयानों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में हुई मुलाकातों ने विपक्षी राजनीति को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है और आगामी दिनों में इस विषय पर और स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।

  • TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..

    TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी All India Trinamool Congress के भीतर कथित असंतोष को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने दावा किया है कि पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर नाराजगी बढ़ रही है और कई नेता वर्तमान नेतृत्व से दूरी बना रहे हैं।

    पूनावाला ने आरोप लगाया कि करीब 60 विधायक खुद को “असली टीएमसी” बता रहे हैं और Mamata Banerjee तथा Abhishek Banerjee के नेतृत्व से असहज हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में परिवारवाद हावी हो गया है, जिससे संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है।

    भाजपा प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि कुछ सांसद भी पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं और संगठन के भीतर मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं। उनके अनुसार यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस के अंदर नेतृत्व संकट की ओर इशारा करती है।

    विवाद उस समय और बढ़ गया जब सोशल मीडिया पर एक कथित सूची वायरल हुई। इस सूची में दावा किया गया कि टीएमसी के 20 सांसदों का एक समूह केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने की तैयारी कर रहा है। सूची में पार्टी के कई वरिष्ठ और नए सांसदों के नाम होने की बात कही गई।

    हालांकि टीएमसी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी नेता Kirti Azad ने वायरल सूची को फर्जी और मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा कि सूची में शामिल कई सांसदों ने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार किया है।

    कीर्ति आजाद ने भाजपा पर “ऑपरेशन लोटस” के जरिए पार्टी में फूट डालने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस एकजुट है और विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम का कोई असर नहीं पड़ेगा।

    फिलहाल भाजपा के आरोपों और टीएमसी के खंडन के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। पार्टी के भीतर वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर जारी है।

  • TMC सांसद सायनी घोष ने अभिषेक बनर्जी से जुड़े दावों को नकारा, कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

    TMC सांसद सायनी घोष ने अभिषेक बनर्जी से जुड़े दावों को नकारा, कानूनी कार्रवाई की चेतावनी


    नई दिल्ली ।
    कोलकाता की राजनीति एक बार फिर संपत्ति विवाद और आरोप-प्रत्यारोप के नए दौर में पहुंच गई है। इस बार चर्चा के केंद्र में तृणमूल कांग्रेस की सांसद सायनी घोष हैं, जिन्होंने अपने ऊपर और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी से कथित तौर पर जुड़ी संपत्तियों को लेकर लगाए गए आरोपों को सख्ती से खारिज कर दिया है। उन्होंने इन दावों को पूरी तरह निराधार और फर्जी बताते हुए कहा है कि कुछ लोग जानबूझकर गलत सूचनाएं फैलाकर राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

    यह विवाद तब और गहरा गया जब कोलकाता नगर निगम द्वारा कुछ संपत्तियों की जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई। यह जांच ऐसे समय में शुरू हुई है जब राजनीतिक हलकों में पहले से ही विभिन्न आरोपों को लेकर तनाव बना हुआ है। आरोपों में यह दावा किया जा रहा था कि कुछ संपत्तियों का संबंध अभिषेक बनर्जी और उनके करीबी लोगों से हो सकता है। हालांकि, इन दावों को लेकर अब तक कोई ठोस आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

    सायनी घोष ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस तरह की बातें न केवल गलत हैं बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी तरह की अफवाह या झूठी खबर को फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कदम उठाया जाएगा। उनके अनुसार, यह प्रयास केवल उनकी और उनकी पार्टी की छवि को खराब करने के लिए किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में इन दावों का कोई आधार नहीं है।

    इस पूरे मामले में राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है क्योंकि विपक्षी दलों की ओर से पहले ही कई सवाल उठाए जा चुके हैं। मुख्यमंत्री से जुड़े राजनीतिक विरोधियों ने इन संपत्ति मामलों को लेकर पारदर्शिता की मांग की है और जांच को आगे बढ़ाने की बात कही है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल का कहना है कि यह सभी आरोप केवल राजनीतिक लाभ लेने के लिए फैलाए जा रहे हैं और इनका उद्देश्य जनता को भ्रमित करना है।

    सायनी घोष ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि हाल के दिनों में उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक दिन पहले ही उन्हें जान से मारने की धमकी मिलने की घटना सामने आई थी और अब उनके खिलाफ झूठी खबरों का सहारा लेकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे एक सुनियोजित अभियान बताया, जिसका मकसद उनकी आवाज को दबाना है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने कोलकाता की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है, जहां एक ओर जांच और आरोपों की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। ऐसे में यह मामला केवल संपत्ति विवाद तक सीमित न रहकर राजनीतिक टकराव का एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि जांच की प्रक्रिया जारी है, लेकिन किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक तौर पर ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है, जिससे राज्य की राजनीति में नई हलचल देखने को मिल सकती है।

  • सत्ता परिवर्तन के बाद बड़ा कदम: हाई-प्रोफाइल नेताओं की सुरक्षा में कमी, ममता बनर्जी की सुरक्षा बरकरार

    सत्ता परिवर्तन के बाद बड़ा कदम: हाई-प्रोफाइल नेताओं की सुरक्षा में कमी, ममता बनर्जी की सुरक्षा बरकरार

    नई दिल्ली ।
    पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया है, जिसने राज्य की वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। नई सरकार द्वारा की गई विस्तृत समीक्षा के बाद यह फैसला लिया गया कि अब सुरक्षा व्यवस्था को आवश्यकता और वास्तविक खतरे के आकलन के आधार पर पुनर्गठित किया जाएगा। इसी प्रक्रिया के तहत कई हाई-प्रोफाइल नेताओं, पूर्व मंत्रियों और कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण कटौती की गई है। इस बदलाव ने राजनीतिक हलकों में हलचल जरूर पैदा कर दी है, लेकिन प्रशासन का कहना है कि यह कदम पूरी तरह से सुरक्षा मानकों और संसाधनों के उचित उपयोग को ध्यान में रखकर उठाया गया है।

    प्रशासनिक समीक्षा के बाद सबसे बड़ा असर तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा पर देखने को मिला है, जिनकी पहले उपलब्ध कराई गई उच्च स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था को कम कर दिया गया है। उनके साथ-साथ कई अन्य सांसदों और वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा में भी संशोधन किया गया है। पहले जहां इन नेताओं के आवासों और कार्यालयों के बाहर भारी पुलिस बल तैनात रहता था, अब उसे काफी हद तक घटा दिया गया है या मानक सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार सीमित कर दिया गया है। इसके अलावा कुछ नेताओं को मिलने वाली विशेष सुविधाएं, जैसे अतिरिक्त सुरक्षा वाहन और पायलट व्यवस्था, भी अब वापस ले ली गई हैं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार यह पूरा कदम एक व्यापक सुरक्षा समीक्षा का हिस्सा है, जिसमें यह आकलन किया गया कि किन व्यक्तियों को वास्तव में उच्च स्तर की सुरक्षा की आवश्यकता है और किन मामलों में सामान्य सुरक्षा पर्याप्त है। इसी समीक्षा के आधार पर यह निर्णय लिया गया कि कई पूर्व मंत्रियों और ऐसे नेताओं, जो अब सक्रिय पदों पर नहीं हैं, उनकी अतिरिक्त सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसी कारण कई जगहों पर सुरक्षा कर्मियों की तैनाती भी कम कर दी गई है और उन्हें अन्य आवश्यक कार्यों में लगाया जा रहा है।

    हालांकि इस पूरे बदलाव के बीच राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की कटौती नहीं की गई है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि उनकी सुरक्षा को लेकर जो मौजूदा प्रोटोकॉल है, वह पहले की तरह पूरी तरह प्रभावी रहेगा। यह निर्णय उनकी सुरक्षा से जुड़े खतरे के आकलन और वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    सरकार का कहना है कि सुरक्षा बलों का उपयोग केवल वीआईपी संरक्षण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे आम जनता की सुरक्षा और कानून व्यवस्था को मजबूत करने में भी लगाया जाना चाहिए। इसी दृष्टिकोण के तहत अतिरिक्त सुरक्षा बलों की पुनर्नियुक्ति की जा रही है ताकि राज्य में कानून व्यवस्था और अधिक प्रभावी ढंग से संचालित की जा सके। इस फैसले के बाद जहां एक ओर प्रशासन इसे संसाधनों के बेहतर उपयोग के रूप में देख रहा है, वहीं राजनीतिक स्तर पर इसे लेकर चर्चाओं का दौर भी तेज हो गया है।

    कुल मिलाकर यह बदलाव राज्य की सुरक्षा नीति में एक बड़े पुनर्गठन की ओर संकेत करता है, जहां सुरक्षा को पद या राजनीतिक स्थिति से नहीं बल्कि वास्तविक जरूरत और खतरे के आधार पर तय किया जा रहा है।

  • बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के निज सहायक की हत्या…. भड़की BJP, अभिषेक बनर्जी पर लगाया आरोप

    बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के निज सहायक की हत्या…. भड़की BJP, अभिषेक बनर्जी पर लगाया आरोप


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal) में विधायक शुभेंदु अधिकारी (MLA Shubhendu Adhikari.) के निजी सहायक की हत्या का आरोप भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party leaders) नेताओं ने अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) पर लगाया है। अभिषेक, राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) के भतीजे हैं। भाजपा ने कहा है कि इस घटना का जवाब दिया जाएगा। साथ ही पुलिस से कहा है कि हत्या के जिम्मेदारों को कहीं से भी खोज कर लाया जाए।

    भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष आनंद बनर्जी ने कहा, ‘हम लोग ये गुंडागर्दी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे। 2021 के चुनाव के बाद हमारे 300 कार्यकर्ताओं को टीएमसी के इन गुंडों ने कत्ल कर दिया, लेकिन हम राष्ट्रीय पार्टी हैं और हमारा अनुशासन है। ये सब हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हमने हमने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि टीएमसी वाला जो भड़का रहा है, उसमें मत जाइए। लेकिन आप उन्हें कब तक रोक कर रख सकते हैं? मैं कार्यकर्ताओं को धन्यवाद दे रहा हूं।’

    उन्होंने कहा, ‘यह एक नियोजित हत्या थी। हमने पुलिस और प्रशासन को कहा है कि अगर पाताल में भी घुसा है, तो भी निकालिए। पश्चिम बंगाल में ये गुंडागर्दी नहीं चलने वाला है।’


    अभिषेक बनर्जी पर लगाए आरोप

    भाजपा नेता अर्जुन सिंह ने कहा, ‘अभिषेक बनर्जी ने यह हत्या कराई है। वह एक मैसेज देना चाहते हैं कि हम सरकार में भले न हों, लेकिन तुम्हारे ऊपर भारी हैं। लेकिन वह मूर्ख है और हम लोगों के ऊपर भारी नहीं है। इसका जवाब मिलेगा।’

    एक स्थानीय समाचार चैनल से बातचीत में, भाजपा नेता और नवनिर्वाचित विधायक कौस्तव बागची ने कहा, ‘यह एक सुनियोजित हमला था। हमलावरों ने रथ की कार का काफी देर तक पीछा किया और फिर उन पर गोलियों की बौछार कर दी। यह ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की साजिश है। जब तक अपराधियों की पहचान नहीं हो जाती, हम चैन से नहीं बैठेंगे। तब तक हम शव का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे।’

    भाजपा के नव निर्वाचित विधायक तरुणज्योति तिवारी ने कहा, ‘हम शांति का संदेश देते रहे हैं लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने बहुत बड़ी गलती की है।’


    ममता बनर्जी की हार का नतीजा

    भाजपा विधायक अग्निमित्रा पॉल ने कहा, ‘यह शायद भवानीपुर में ममता बनर्जी की हार का नतीजा है… CCTV फुटेज की अभी जांच की जा रही है… चंद्र एक भरोसेमंद इंसान थे, वे नेता प्रतिपक्ष के दफ़्तर के सारे कामकाज देखते थे, हमारे विधायकों के लिए भाई जैसे थे, और कई तरह के दूसरे काम भी संभालते थे… जिस इंसान का BJP से कोई लेना-देना ही नहीं था, उसकी हत्या क्यों की गई? जनता में भारी गुस्सा है… हमने तो शांति चाही थी, लेकिन अब परिवार ज़रूर जवाब मांगेगा… अभी कुछ देर पहले ही, हमारे एक बूथ कार्यकर्ता पर चाकू से हमला किया गया और वह अभी अस्पताल में भर्ती है…।’


    एक्शन में पुलिस

    पश्चिम बंगाल के DGP सिद्ध नाथ गुप्ता ने कहा, ‘हमने इस मामले की जांच शुरू कर दी है। हमने अपराध में इस्तेमाल हुई 4 पहिया गाड़ी को जब्त कर लिया है, लेकिन ऐसी खबरें आ रही हैं कि गाड़ी की नंबर प्लेट नकली है और उसके साथ छेड़छाड़ की गई है। हमें घटनास्थल से जिंदा कारतूस और चले हुए कारतूस मिले हैं। चश्मदीदों और सबूतों की जांच की जा रही है और आगे की जांच जारी है।’

    यह घटना उत्तरी 24 परगना जिले में मध्यमग्राम क्षेत्र के दोहरिया में हुई, जहां शुभेंदु अधिकारी के सहायक चंद्रनाथ रथ पर हमला किया गया। बाइक पर सवार लोगों ने उन्हें करीब से गोली मार दी। इसके बाद हमलावर फरार हो गए। मामले में अभी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।