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  • NATO के हाइब्रिड वॉरफेयर पेपर में भारतीय सेना के दो पूर्व अधिकारियों का 10 बार जिक्र, जनरल वीके सिंह ने उपलब्धि बताया

    NATO के हाइब्रिड वॉरफेयर पेपर में भारतीय सेना के दो पूर्व अधिकारियों का 10 बार जिक्र, जनरल वीके सिंह ने उपलब्धि बताया

    नई दिल्ली ।भारतीय सेना के दो पूर्व अधिकारियों लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा और लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) पवित्रन राजन के रणनीतिक अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। NATO से जुड़े हाइब्रिड वॉरफेयर पर तैयार एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन में दोनों अधिकारियों के काम का कम से कम 10 बार उल्लेख किया गया है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने इसे भारतीय रणनीतिक सोच के लिए बड़ी उपलब्धि बताया है।

    डीएस हुड्डा नॉर्दर्न आर्मी के पूर्व कमांडर रह चुके हैं। हुड्डा और पवित्रन राजन ने मिलकर ‘बियॉन्ड द काइनेटिक: डीकंस्ट्रक्टिंग वॉरफेयर इन द सोशियो-टेक्निकल-कॉग्निटिव बैटल्सपेस’ नाम से एक पेपर तैयार किया था। यह पेपर जनवरी 2026 में नई दिल्ली स्थित काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस रिसर्च की ओर से प्रकाशित किया गया था।

    जनरल वीके सिंह ने दोनों अधिकारियों के काम को हाइब्रिड, कॉग्निटिव और तकनीकी क्षेत्रों में भारतीय रणनीतिक सोच की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि उनके काम को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना महत्वपूर्ण है और दोनों पूर्व सैन्य अधिकारियों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी।

    हुड्डा और राजन के अध्ययन का मुख्य विषय आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति है। उनके अनुसार युद्ध अब केवल आमने-सामने के सैन्य संघर्ष या भौतिक लक्ष्यों को नष्ट करने तक सीमित नहीं रह गया है। संघर्ष का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र ऐसा भी बन गया है, जिसे उन्होंने ‘सोशियो-टेक्निकल-कॉग्निटिव बैटल्सपेस’ यानी STCB के रूप में समझाया है।

    इस अवधारणा में सूचना, तकनीक और लोगों की सोच के बीच संबंध को महत्वपूर्ण माना गया है। दोनों अधिकारियों के अध्ययन के मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिदम के माध्यम से लोगों तक पहुंचने वाली सूचनाएं उनकी राय और निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं। इसका रणनीतिक प्रभाव युद्ध के पारंपरिक क्षेत्रों में सैन्य कार्रवाई के प्रभाव जैसा हो सकता है।

    पेपर में कॉग्निटिव वॉरफेयर को आधुनिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। इसमें कहा गया कि विरोधी सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर सूचना के प्रवाह को प्रभावित कर पहले से मौजूद सामाजिक विभाजन और सूचना की कमी का फायदा उठा सकते हैं। उद्देश्य केवल गलत सूचना फैलाना नहीं, बल्कि लोगों के घटनाओं को देखने और फैसले लेने के तरीके को प्रभावित करना भी हो सकता है।

    अध्ययन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसके अनुसार AI की मदद से गलत सूचना फैलाने वाले अभियान ज्यादा सटीक और बड़े स्तर पर चलाए जा सकते हैं। व्यक्तिगत या सामाजिक कमजोरियों को ध्यान में रखकर संदेश तैयार करना भी संभव हो सकता है।

    इस चुनौती से निपटने के लिए मीडिया साक्षरता, मजबूत संस्थानों, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और विदेशी नियंत्रण वाले डिजिटल तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जांच-पड़ताल के जरिए मजबूती बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया गया।

    NATO से जुड़े प्रकाशन में हुड्डा और राजन के पेपर का उल्लेख विशेष रूप से ‘AI एंड कॉग्निटिव वॉरफेयर’ अध्याय में किया गया। इस अध्याय में कॉग्निटिव वॉरफेयर और OODA लूप पर चर्चा की गई है। OODA का अर्थ ऑब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड और एक्ट है, जिसके जरिए सैन्य कमांडर किसी स्थिति को समझकर निर्णय लेते हैं और कार्रवाई करते हैं।

    प्रकाशन में रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में तकनीक, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, सोशल मीडिया और AI के इस्तेमाल पर भी चर्चा की गई है। यूक्रेन द्वारा स्टारलिंक जैसी निजी सैटेलाइट कम्युनिकेशन व्यवस्था के इस्तेमाल और Clearview AI के जरिए रूसी सैनिकों की पहचान से जुड़े पहलुओं का उल्लेख किया गया है।

    पावर-ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों की समीक्षा वाले हिस्से में भी कॉग्निटिव वॉरफेयर, गलत सूचना, मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन और AI से पैदा होने वाली अव्यवस्था को जनता के भरोसे तथा निर्णय प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव से जोड़ा गया है। दोनों अधिकारियों का जनवरी 2026 का पेपर इस प्रकाशन की संदर्भ सूची में भी औपचारिक रूप से शामिल किया गया है।

  • आईआईटी बीएचयू से पढ़े अनिल चक्रवर्ती बने एडोबी के नए सीईओ, शांतनु नारायण संभालेंगे एग्जीक्यूटिव चेयरमैन की जिम्मेदारी

    आईआईटी बीएचयू से पढ़े अनिल चक्रवर्ती बने एडोबी के नए सीईओ, शांतनु नारायण संभालेंगे एग्जीक्यूटिव चेयरमैन की जिम्मेदारी


    नई दिल्ली ।
    सिलिकॉन वैली की दिग्गज टेक कंपनी एडोबी ने नेतृत्व में बड़ा बदलाव करते हुए अनिल चक्रवर्ती को अपना नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया है। वह करीब 18 वर्षों तक कंपनी का नेतृत्व करने वाले शांतनु नारायण की जगह लेंगे। नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय हुआ है जब एडोबी को जनरेटिव एआई के तेजी से बढ़ते प्रभाव और बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अपने कारोबार को आगे बढ़ाने की चुनौती है।

    शांतनु नारायण अब एडोबी के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन की भूमिका निभाएंगे। उनके कार्यकाल में कंपनी ने अपने पारंपरिक सॉफ्टवेयर कारोबार को बड़े स्तर पर बदला और फोटोशॉप जैसे प्रमुख उत्पादों को सब्सक्रिप्शन आधारित क्रिएटिव क्लाउड मॉडल की दिशा में आगे बढ़ाया। यह बदलाव शुरुआती दौर में विवाद और विरोध के बावजूद कंपनी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

    अनिल चक्रवर्ती के लिए एडोबी की कमान संभालना उनके लंबे तकनीकी और प्रबंधन अनुभव का अगला बड़ा पड़ाव है। उन्होंने आईआईटी बीएचयू वाराणसी से कंप्यूटर साइंस में बीटेक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एमएस और पीएचडी की डिग्री हासिल की।

    एडोबी में आने से पहले चक्रवर्ती इनफॉर्मेटिका के सीईओ रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने मैकिन्से, सिमेंटेक और वेरीसाइन जैसी कंपनियों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। जनवरी 2020 में एडोबी से जुड़ने के बाद उन्होंने कंपनी के डिजिटल एक्सपीरियंस कारोबार की जिम्मेदारी संभाली और एआई आधारित पहलों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।

    नई जिम्मेदारी संभालने के बाद चक्रवर्ती के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनरेटिव एआई से बदलता क्रिएटिव सॉफ्टवेयर बाजार होगा। मिडजर्नी और ओपनएआई जैसे एआई आधारित टूल्स ने डिजाइन, तस्वीर और वीडियो निर्माण को पहले की तुलना में आसान बनाया है। ऐसे में एडोबी को अपने प्रमुख उत्पादों को एआई के साथ और प्रभावी ढंग से जोड़ना होगा।

    कंपनी को कैनवा और फिग्मा जैसे ब्राउजर आधारित डिजाइन प्लेटफॉर्म से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। इन प्लेटफॉर्म्स ने खासकर नए डिजाइनरों और छोटे कारोबारों के बीच आसान और सहयोगात्मक डिजाइनिंग को लोकप्रिय बनाया है। ऐसे में एडोबी के लिए अपने मौजूदा पेशेवर ग्राहकों को बनाए रखने के साथ नए उपयोगकर्ताओं तक पहुंच बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

    निवेशकों का भरोसा भी नई नेतृत्व टीम के लिए चुनौती रहेगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कंपनी के शेयर 2025 में करीब 21 प्रतिशत गिरे थे और 2026 में भी अब तक लगभग 18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वित्तीय नेतृत्व में बदलाव के बीच कंपनी को बाजार की चिंताओं का जवाब भी देना होगा।

    चक्रवर्ती ने नई जिम्मेदारी को सम्मान बताते हुए कहा है कि कंपनी अब क्रिएटिविटी और प्रोडक्टिविटी के लिए एजेंटिक सॉफ्टवेयर के अगले दौर में प्रवेश कर रही है। उनके नेतृत्व में एडोबी की रणनीति इस बात पर काफी हद तक निर्भर करेगी कि कंपनी एआई को अपने मौजूदा उत्पादों की ताकत के साथ कितनी प्रभावी तरीके से जोड़ पाती है।

    इस बदलाव के साथ एडोबी में एक युग का अंत और नए दौर की शुरुआत हुई है। भारतीय मूल के चक्रवर्ती के सामने कंपनी की मजबूत विरासत को बनाए रखते हुए तेजी से बदलती एआई अर्थव्यवस्था में विकास की नई दिशा तय करने की जिम्मेदारी होगी।

  • यूनिसेफ की रिपोर्ट में खुलासा, एक साल में करीब दो करोड़ बच्चों ने ऑनलाइन यौन शोषण का सामना किया

    यूनिसेफ की रिपोर्ट में खुलासा, एक साल में करीब दो करोड़ बच्चों ने ऑनलाइन यौन शोषण का सामना किया

    नई दिल्ली ।इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के बीच बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार बीते एक साल में दुनियाभर के करीब दो करोड़ बच्चों को ऑनलाइन यौन शोषण या उससे जुड़े अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है।

    यह रिपोर्ट 21 देशों में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले करीब 21 हजार बच्चों से जुटाए गए सर्वे पर आधारित है। इसके लिए 2020 से 2025 के बीच जानकारी एकत्र की गई। अध्ययन में ब्राजील और पाकिस्तान समेत कई देश शामिल रहे। केन्या और सर्बिया भी सर्वे का हिस्सा थे, जबकि भारत को इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया।

    रिपोर्ट के मुताबिक 12 से 17 वर्ष की उम्र के करीब 1.5 करोड़ बच्चे अनचाहे और आपत्तिजनक यौन कंटेंट के संपर्क में आए। वहीं लगभग 90 लाख बच्चों ने ऐसी यौन प्रकृति की बातचीत या संपर्क के लिए दबाव का सामना करने की जानकारी दी।

    डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होने वाले गलत व्यवहार में सोशल मीडिया की भूमिका प्रमुख रही। रिपोर्ट में सामने आया कि दर्ज किए गए ऐसे व्यवहारों में लगभग 60 प्रतिशत मामले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हुए। इनमें फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म शामिल रहे।

    ऑनलाइन गेमिंग भी बच्चों के लिए जोखिम का एक क्षेत्र सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार करीब 14 प्रतिशत गलत व्यवहार के मामले ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े थे। इससे संकेत मिलता है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए केवल सोशल मीडिया पर निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि अलग-अलग ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा उपायों की जरूरत है।

    रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। बच्चों के ऑनलाइन यौन उत्पीड़न से जुड़े आधे से अधिक मामलों में कथित रूप से ऐसा व्यक्ति शामिल था, जिसे बच्चा पहले से जानता था। इनमें दोस्त, रिश्तेदार या पार्टनर जैसे लोग शामिल थे। यानी बच्चों के लिए ऑनलाइन खतरा हमेशा किसी अनजान व्यक्ति से ही नहीं आता।

    अध्ययन के अनुसार करीब 38 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि वे पहली बार ऑनलाइन इस तरह की यौन गतिविधि या उत्पीड़न के शिकार हुए। अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोप के सर्वेक्षण वाले देशों में 12 से 17 वर्ष की उम्र के पांच में से एक से अधिक बच्चों ने ऑनलाइन यौन शोषण के कम से कम एक रूप का अनुभव बताया।

    रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से जुड़े खतरे को लेकर भी चिंता जताई गई है। नौ देशों से जुटाए गए आंकड़ों में अनुमानित 11 लाख बच्चों ने बताया कि उनकी एआई से तैयार की गई आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो बनाए गए थे। ऐसे अनुभवों से बच्चों में चिंता और मानसिक दबाव का स्तर भी बढ़ा हुआ पाया गया।

    डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनियों की ओर से सुरक्षा उपायों में सुधार किए जाने की बात कही गई है। किशोरों के अकाउंट को अधिक निजी बनाने और वयस्कों के लिए किशोरों को संदेश भेजने की क्षमता सीमित करने जैसे कदम उठाए गए हैं। हालांकि बच्चों के ऑनलाइन शोषण के सामने आए आंकड़े लगातार सतर्कता की जरूरत बताते हैं।

    बच्चों को डिजिटल खतरों की जानकारी देने के साथ अभिभावकों और स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बच्चों को अनचाहे संपर्क, आपत्तिजनक सामग्री और दबाव वाली बातचीत की पहचान करने के बारे में जागरूक करना जरूरी है। किसी संदिग्ध स्थिति में भरोसेमंद व्यक्ति से मदद लेने की जानकारी भी उन्हें दी जानी चाहिए।

    रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा एक व्यापक चुनौती बन चुकी है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और एआई आधारित सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के बीच तकनीकी सुरक्षा, जागरूकता और प्रभावी निगरानी को साथ लेकर चलना जरूरी है।

  • सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे बोले, विनियमित संस्थाएं एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के उपयोग की खुद होंगी जिम्मेदार

    सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे बोले, विनियमित संस्थाएं एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के उपयोग की खुद होंगी जिम्मेदार

    नई दिल्ली ।भारतीय वित्तीय बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसी बीच भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया है कि सेबी के दायरे में आने वाली सभी विनियमित संस्थाएं अपने द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एआई और मशीन लर्निंग उपकरणों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार रहेंगी।

    मुंबई में आयोजित एक उद्योग सम्मेलन को संबोधित करते हुए सेबी चेयरमैन ने कहा कि किसी संस्था द्वारा इस्तेमाल की जा रही तकनीक चाहे उसके भीतर विकसित की गई हो या किसी बाहरी कंपनी अथवा तीसरे पक्ष से प्राप्त की गई हो, उसकी जिम्मेदारी संबंधित संस्था की ही होगी। इसका उद्देश्य वित्तीय बाजारों में तकनीकी नवाचार के साथ जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत बनाए रखना है।

    तुहिन कांत पांडे ने कहा कि वित्तीय बाजारों में तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, तकनीकी बदलाव के बीच निवेशकों के हितों की सुरक्षा और बाजार की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देना जरूरी है। सेबी इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए नियामकीय ढांचे को विकसित करने पर काम कर रहा है।

    सेबी अध्यक्ष के अनुसार नियामकीय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नई तकनीकों और नवाचार को बढ़ावा दे, लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही से समझौता न हो। एआई आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि संस्थाएं अपने तकनीकी फैसलों और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से निभाएं।

    उन्होंने बाजार अवसंरचना संस्थानों की तकनीकी क्षमता और जोखिम से निपटने की तैयारी को मापने के लिए एक सूचना प्रौद्योगिकी सुदृढ़ता सूचकांक की संभावना पर भी जानकारी दी। सेबी इस तरह के ढांचे की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहा है। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण तकनीकी प्रणालियों की मजबूती और जोखिम प्रतिरोधक क्षमता का वस्तुनिष्ठ तरीके से आकलन करना है।

    तुहिन कांत पांडे ने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण में तकनीक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी। वित्तपोषण के नए माध्यम विकसित करने, निवेश के अवसरों का विस्तार करने और नियामकीय व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाने में तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। इसके लिए नियामक व्यवस्था को भी बदलते तकनीकी वातावरण के साथ आगे बढ़ना होगा।

    सेबी की रणनीति को उन्होंने संतुलित, अनुपातिक और भविष्य केंद्रित बताया। उनके अनुसार बाजार में नवाचार के लिए पर्याप्त अवसर होने चाहिए, लेकिन साथ ही निवेशकों के हित, निष्पक्षता, सुरक्षा और बाजार की विश्वसनीयता भी कायम रहनी चाहिए।

    सेबी चेयरमैन ने भारतीय पूंजी बाजार में घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड और सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के माध्यम से बड़ी संख्या में परिवार बाजार आधारित निवेश से जुड़े हैं। इससे भारतीय पूंजी बाजार की पहुंच और मजबूती बढ़ी है, हालांकि निवेशकों की भागीदारी को और व्यापक बनाने की गुंजाइश अभी बनी हुई है।

    उन्होंने कहा कि भारतीय पूंजी बाजार अब केवल आर्थिक गतिविधियों का प्रतिबिंब नहीं रह गए हैं, बल्कि आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण माध्यमों में भी शामिल हो चुके हैं। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ निवेश और वित्तपोषण की जरूरतें भी बढ़ेंगी। ऐसे में पूंजी बाजार को अधिक गहरा और नवोन्मेषी बनाने के साथ उन्हें निष्पक्ष, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाए रखना भी जरूरी होगा।

  • दक्षिण कोरिया में जनरेटिव एआई का रोजगार पर असर, युवाओं की 2.85 लाख नौकरियां घटीं, वरिष्ठ कर्मचारियों को मिला फायदा

    दक्षिण कोरिया में जनरेटिव एआई का रोजगार पर असर, युवाओं की 2.85 लाख नौकरियां घटीं, वरिष्ठ कर्मचारियों को मिला फायदा


    नई दिल्ली ।
    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल का असर अब रोजगार बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। दक्षिण कोरिया के केंद्रीय बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जनरेटिव एआई तकनीकों के तेजी से विस्तार के बाद एआई से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं के रोजगार में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि तकनीकी बदलाव का असर अलग-अलग आयु वर्ग के कर्मचारियों पर समान नहीं रहा है।

    जून 2022 से जून 2026 के बीच दक्षिण कोरिया में 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लोगों द्वारा किए जा रहे कुल रोजगारों की संख्या में 2.85 लाख की कमी दर्ज की गई। इस गिरावट का सबसे बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों से जुड़ा रहा जिन्हें एआई के प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता है। कुल कम हुए रोजगारों में करीब 2.68 लाख यानी लगभग 94 प्रतिशत नौकरियां एआई प्रभावित क्षेत्रों से संबंधित थीं।

    इन क्षेत्रों में आईटी सेवाएं, प्रकाशन, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और प्रोफेशनल सर्विसेज प्रमुख हैं। इन क्षेत्रों में ऐसे काम बड़ी संख्या में शामिल हैं जिन्हें जनरेटिव एआई, ऑटोमेशन और डिजिटल टूल्स के जरिए तेजी से बदला या आसान किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, आईटी सेवाओं में युवाओं का रोजगार 31.4 प्रतिशत घटा। यह उन क्षेत्रों में सबसे बड़ी गिरावट रही, जहां एआई आधारित तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।

    प्रकाशन क्षेत्र में भी युवा रोजगार में 27.4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस श्रेणी में सॉफ्टवेयर और वेब डिजाइन से जुड़े पेशे भी शामिल हैं। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग क्षेत्र में युवाओं के रोजगार में 16.6 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि प्रोफेशनल सर्विसेज में यह कमी 11.6 प्रतिशत रही। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि एआई का शुरुआती प्रभाव उन नौकरियों पर अधिक पड़ सकता है जिनमें डिजिटल, दोहराए जाने वाले या सामग्री आधारित कार्य बड़ी भूमिका निभाते हैं।

    इसके विपरीत 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के कर्मचारियों के रोजगार में इसी अवधि के दौरान 2.30 लाख की बढ़ोतरी हुई। खास बात यह रही कि इनमें से 1.73 लाख रोजगार एआई प्रभावित क्षेत्रों में ही बढ़े। इससे यह संकेत मिलता है कि अनुभव, विशेषज्ञता और कार्यक्षेत्र की गहरी समझ वाले कर्मचारियों की मांग कई जगहों पर अभी भी मजबूत बनी हुई है।

    रिपोर्ट में 2022 को आधार वर्ष माना गया है। इसी वर्ष के अंत में चैटजीपीटी के लॉन्च के बाद जनरेटिव एआई तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ा। इसके बाद कंपनियों में कंटेंट तैयार करने, कोडिंग, डेटा विश्लेषण और अन्य डिजिटल कार्यों के लिए एआई आधारित उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे कंपनियों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ कुछ पारंपरिक भूमिकाओं की जरूरत पर भी असर पड़ा है।

    शिक्षा के आधार पर रोजगार की स्थिति में भी बदलाव सामने आया है। 2019 से 2022 के बीच स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रीधारकों की औसत बेरोजगारी दर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि माध्यमिक या जूनियर कॉलेज स्तर तक पढ़े युवाओं में यह 8 प्रतिशत थी। 2022 के बाद उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर 7 प्रतिशत रही, जबकि कम शैक्षणिक योग्यता वाले युवाओं में यह 5.4 प्रतिशत दर्ज की गई।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दक्षिण कोरिया की लगातार घटती आबादी युवाओं के रोजगार में बदलाव का एक कारण हो सकती है। हालांकि एआई ने इस बदलाव को और तेज किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार एआई युवा कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ा सकता है, लेकिन यही तकनीक कुछ भूमिकाओं में उनके काम को प्रतिस्थापित भी कर सकती है। इसलिए चुनौती केवल नौकरियां घटने की नहीं, बल्कि युवाओं के लिए पारंपरिक करियर की शुरुआती सीढ़ियों के कमजोर होने की भी है।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    मेटा के एआई मॉडल ने टेस्टिंग के दौरान बाहरी सिस्टम में लगाई सेंध, इंटरनेट कनेक्शन की गड़बड़ी बनी वजह

    नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती क्षमताओं के बीच एक नया मामला सामने आया है, जिसने एआई सुरक्षा और परीक्षण प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। मेटा ने खुलासा किया है कि उसके एक एआई मॉडल ने साइबर सिक्योरिटी परीक्षण के दौरान अनजाने में इंटरनेट तक पहुंच बना ली और इसके बाद एक बाहरी सर्विस सिस्टम की सुरक्षा कमजोरी का फायदा उठाकर उसमें अनधिकृत प्रवेश कर लिया। हालांकि कंपनी ने स्पष्ट किया है कि यह घटना परीक्षण के दौरान हुई तकनीकी गड़बड़ी का परिणाम थी और इसकी विस्तृत जांच जारी है।

    कंपनी के अनुसार यह घटना उसके हाल ही में जारी किए गए एआई मॉडल ‘म्यूज स्पार्क 1.1’ के परीक्षण के दौरान हुई। परीक्षण के लिए तैयार किए गए विशेष वातावरण में एक गलत कॉन्फिगरेशन के कारण मॉडल इंटरनेट से कनेक्ट हो गया। सामान्य परिस्थितियों में इस प्रकार के परीक्षण पूरी तरह नियंत्रित और सीमित नेटवर्क पर किए जाते हैं, लेकिन तकनीकी त्रुटि के चलते मॉडल बाहरी नेटवर्क तक पहुंच गया। इसके बाद उसने एक थर्ड पार्टी सर्विस में मौजूद सुरक्षा कमजोरी का उपयोग करते हुए अनधिकृत पहुंच प्राप्त कर ली।

    मेटा ने कहा कि परीक्षण प्रक्रिया एक स्वतंत्र साइबर सिक्योरिटी पार्टनर के सहयोग से संचालित की जा रही थी। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि तकनीकी सेटअप में हुई कॉन्फिगरेशन संबंधी गलती के कारण यह स्थिति बनी। कंपनी ने जोर देकर कहा कि यह किसी जानबूझकर किए गए साइबर हमले का मामला नहीं था, बल्कि परीक्षण वातावरण में हुई चूक के कारण उत्पन्न हुई अप्रत्याशित घटना थी। पूरे घटनाक्रम की विस्तृत समीक्षा की जा रही है और सभी तथ्य सामने आने के बाद विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाएगी।

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया भर की प्रमुख एआई कंपनियां अधिक सक्षम और स्वायत्त मॉडल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान अन्य बड़ी एआई कंपनियों ने भी परीक्षण के दौरान अपने मॉडल्स द्वारा बाहरी सिस्टम तक अनपेक्षित पहुंच बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी साझा की थी। इन घटनाओं ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि अत्यधिक सक्षम एआई मॉडल्स के परीक्षण के लिए वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक एआई एजेंट अब केवल निर्देशों का पालन करने तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे नेटवर्क संरचना, सिस्टम की कमजोरियों और संभावित सुरक्षा खामियों की पहचान करने में भी पहले से अधिक सक्षम हो रहे हैं। यदि परीक्षण वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और अलग-थलग न हो तो इस प्रकार की घटनाएं भविष्य में बड़े जोखिम का कारण बन सकती हैं। यही वजह है कि नियंत्रित परीक्षण ढांचे, मजबूत नेटवर्क आइसोलेशन और बहुस्तरीय सुरक्षा उपायों की आवश्यकता लगातार बढ़ती जा रही है।

    घटना के बाद एआई सुरक्षा मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं की समीक्षा की मांग भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई पीढ़ी के एआई मॉडल्स की बढ़ती क्षमताओं को देखते हुए केवल पारंपरिक सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। कंपनियों को अधिक कठोर परीक्षण प्रोटोकॉल, सुरक्षित नेटवर्क संरचना और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट अपनाने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। फिलहाल मेटा पूरे मामले की जांच में जुटा है और अंतिम निष्कर्ष आने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

  • एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    एंथ्रोपिक और एडब्ल्यूएस की बड़ी साझेदारी, भारत के एआई डाटा की सुरक्षा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगी मजबूती

    नई दिल्ली । कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई क्षेत्र की प्रमुख कंपनी एंथ्रोपिक ने भारत में अपने कारोबार का रणनीतिक विस्तार करते हुए एक बड़ी योजना की घोषणा की है। कंपनी के क्लाउड एआई मॉडल अब अमेजन बेडरॉक के भारतीय बुनियादी ढांचे के जरिए देश के भीतर ही संचालित होंगे। इस नई व्यवस्था से भारतीय उपयोगकर्ताओं और बड़े संगठनों का संवेदनशील एआई डाटा देश की सीमाओं के भीतर सुरक्षित रहेगा, जिससे डेटा रेजिडेंसी और कानूनी नियमों का पालन करना अत्यधिक सुगम हो जाएगा।

    स्थानीय स्तर पर डेटा प्रोसेसिंग होने का सबसे बड़ा लाभ बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, सरकारी एजेंसियों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और अन्य विनियमित क्षेत्रों को प्राप्त होगा। इन क्षेत्रों में डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सर्वोपरि होती है। अमेजन वेब सर्विसेज इंडिया के अनुसार, भारतीय सर्वरों पर क्लाउड मॉडलों की उपलब्धता से घरेलू एआई आधारित एप्लीकेशन तैयार करने वाले डेवलपर्स और कंपनियों को कम लेटेंसी और बेहतर प्रदर्शन का लाभ मिलेगा।

    एंथ्रोपिक के अधिकारियों का मानना है कि भारत क्लाउड एआई के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में शामिल है। स्थानीय एआई विशेषज्ञता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कंपनी अपने पार्टनर नेटवर्क के माध्यम से भारत में 5,000 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित करने जा रही है। इसके साथ ही कंपनी भारत में अपने कार्यबल का विस्तार करने और भारतीय भाषाओं के लिए अपने मॉडल के समर्थन को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

    साइबर सुरक्षा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए एंथ्रोपिक ने डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया, एमओएसआईपी और ओपनजीटूपी जैसी संस्थाओं के साथ साझेदारी की है। एआई आधारित सुरक्षा परीक्षण के माध्यम से संगठन अपनी सॉफ्टवेयर कमजोरियों की पहचान कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त भारतीय भाषाओं में एआई के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए कंपनी ने कार्या के साथ भी सहयोग किया है, जिससे डिजिटल सेवाओं की पहुंच आम जनता तक आसान होगी।

  • सरकार का स्पैम कॉल और मैसेज पर बड़ा शिकंजा, पहली तिमाही में 1.83 लाख टेलीकॉम संसाधनों पर कार्रवाई

    सरकार का स्पैम कॉल और मैसेज पर बड़ा शिकंजा, पहली तिमाही में 1.83 लाख टेलीकॉम संसाधनों पर कार्रवाई

    नई दिल्ली । अनचाहे व्यावसायिक कॉल और संदेशों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में व्यापक कार्रवाई की है। संचार मंत्रालय के अनुसार अप्रैल से जून के बीच नियमों का उल्लंघन करने वाले 1.83 लाख टेलीकॉम संसाधनों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जबकि 263 प्रेषकों को ब्लैकलिस्ट किया गया। सरकार का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य मोबाइल उपभोक्ताओं को स्पैम कॉल और अवांछित प्रचार संदेशों से राहत दिलाना तथा दूरसंचार सेवाओं को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है।

    मंत्रालय के मुताबिक बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रेषकों के खिलाफ कई स्तरों पर कार्रवाई की गई। इनमें आउटगोइंग सेवाओं पर रोक लगाना, लंबे समय तक कनेक्शन निलंबित करना, सभी टेलीकॉम कंपनियों के स्तर पर ब्लैकलिस्ट करना और एसएमएस हेडर ब्लॉक करना जैसे कदम शामिल हैं। सरकार का मानना है कि ऐसे कड़े उपायों से अनधिकृत प्रचार गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा।

    आंकड़ों के अनुसार पहली तिमाही के दौरान देश के दूरसंचार नेटवर्क से कुल 730.82 अरब कॉल की गईं। इस दौरान अनचाहे व्यावसायिक संचार से संबंधित 10.85 लाख शिकायतें दर्ज हुईं। औसतन प्रत्येक 10 लाख कॉल पर लगभग 1.5 शिकायतें प्राप्त हुईं। मंत्रालय का कहना है कि लगातार निगरानी और कार्रवाई के कारण शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है।

    स्पैम कॉल और संदेशों की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक का भी उपयोग किया जा रहा है। एआई प्रणाली ने पहली तिमाही में 24.43 अरब संदिग्ध स्पैम कॉल और एसएमएस की पहचान की। इससे उपभोक्ताओं को ऐसे कॉल और संदेशों को लेकर सतर्क रहने तथा उन्हें स्वीकार या नजरअंदाज करने का बेहतर विकल्प मिला। मंत्रालय के अनुसार भविष्य में इस तकनीक को और अधिक उन्नत बनाया जाएगा ताकि धोखाधड़ी और स्पैम गतिविधियों पर तेजी से अंकुश लगाया जा सके।

    सरकार ने नियमों के पालन को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर चेतावनी अभियान भी चलाया। नई चेतावनी प्रणाली लागू होने के केवल एक सप्ताह के भीतर 2.43 लाख से अधिक चेतावनी संदेश संदिग्ध प्रेषकों को भेजे गए। इसका उद्देश्य नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उल्लंघन की घटनाओं को शुरुआती स्तर पर ही रोकना है।

    मंत्रालय ने बताया कि स्पैम शिकायत दर्ज कराने के लिए ट्राई का डीएनडी ऐप सबसे अधिक उपयोग किया जा रहा है। कुल शिकायतों में लगभग 89 प्रतिशत शिकायतें इसी ऐप के माध्यम से दर्ज हुईं। इसके अलावा उपभोक्ता अपने टेलीकॉम सेवा प्रदाता की वेबसाइट, मोबाइल ऐप या 1909 पर कॉल अथवा एसएमएस के जरिए भी अपनी डू नॉट डिस्टर्ब प्राथमिकताएं दर्ज और संशोधित कर सकते हैं।

    सरकार के अनुसार देश में अब भी 112 करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ताओं ने डीएनडी प्राथमिकताएं दर्ज नहीं कराई हैं। ऐसे उपभोक्ताओं तक पंजीकृत टेलीमार्केटर और कंपनियां व्यावसायिक कॉल तथा संदेश भेज सकती हैं। मंत्रालय ने लोगों से अपनी डीएनडी प्राथमिकताएं दर्ज कराने की अपील की है। सरकार का दावा है कि डीएनडी व्यवस्था के कारण पहली तिमाही में 1.48 अरब प्रमोशनल कॉल और 7.30 अरब प्रमोशनल एसएमएस ब्लॉक किए गए। साथ ही प्रमोशनल कॉल के लिए 140 सीरीज और बैंकिंग तथा सरकारी सेवाओं से जुड़े कॉल के लिए 1600 सीरीज का उपयोग जारी है, जिससे उपभोक्ताओं को आधिकारिक और प्रचार संबंधी कॉल की पहचान करने में आसानी मिल रही है।

  • भारत में डेटा सेंटर का बढ़ता जाल, 2030 तक लाखों नौकरियों और रियल एस्टेट में आएगा बड़ा बदलाव

    भारत में डेटा सेंटर का बढ़ता जाल, 2030 तक लाखों नौकरियों और रियल एस्टेट में आएगा बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । भारत में डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के बीच डेटा सेंटर परियोजनाएं आने वाले वर्षों में रोजगार, बुनियादी ढांचे और रियल एस्टेट क्षेत्र के विकास का बड़ा आधार बन सकती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रस्तावित लगभग 9,030 मेगावाट क्षमता वाली डेटा सेंटर परियोजनाएं वर्ष 2030 तक करीब 4.33 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा इन परियोजनाओं के आसपास आवासीय क्षेत्र में भी बड़ी मांग उत्पन्न होने का अनुमान लगाया गया है।

    डेटा सेंटर आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, क्योंकि इनमें इंटरनेट सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बड़े पैमाने पर डिजिटल डेटा को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी तकनीकी ढांचा तैयार किया जाता है। भारत में डिजिटल गतिविधियों के बढ़ने के साथ डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश को गति मिल रही है।

    रिपोर्ट के मुताबिक भारत वर्तमान में दुनिया के कुल डिजिटल डेटा का लगभग 20 प्रतिशत तैयार करता है, लेकिन वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता में देश की हिस्सेदारी करीब 4 प्रतिशत ही है। यह अंतर बताता है कि भारत में डेटा सेंटर अवसंरचना के विस्तार की काफी संभावनाएं मौजूद हैं। आने वाले वर्षों में डिजिटल सेवाओं की मांग बढ़ने के साथ इस क्षेत्र में बड़े निवेश की उम्मीद जताई जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटर केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनके निर्माण और संचालन से आसपास के क्षेत्रों में कई अन्य गतिविधियां भी विकसित होती हैं। बिजली आपूर्ति व्यवस्था, फाइबर नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा सेवाएं और अन्य व्यावसायिक सुविधाओं का विस्तार होता है, जिससे नए आर्थिक केंद्रों का विकास शुरू हो जाता है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा सेंटर परियोजनाओं का असर लंबे समय तक रहने वाला है। इन परियोजनाओं के आसपास रोजगार बढ़ने के साथ आवासीय मांग भी तेजी से बढ़ सकती है। अनुमान के अनुसार डेटा सेंटर परिसरों के आसपास 5 से 15 किलोमीटर का क्षेत्र सबसे अधिक लाभान्वित हो सकता है। इन क्षेत्रों में सड़क, बिजली और संचार सुविधाओं के विकास के साथ आवासीय टाउनशिप, खुदरा बाजार और अन्य नागरिक सुविधाओं का विस्तार होने की संभावना है।

    डेटा सेंटर आधारित विकास को रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए भी एक नए अवसर के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक इन परियोजनाओं के कारण देश में लगभग 19.5 करोड़ वर्गफुट अतिरिक्त आवासीय मांग पैदा हो सकती है। इससे नए विकास क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    राज्यों के स्तर पर महाराष्ट्र को इसका सबसे अधिक फायदा मिलने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में डेटा सेंटर निवेश के कारण करीब 5.4 करोड़ वर्गफुट से अधिक आवासीय मांग पैदा हो सकती है। इसके बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी बड़े अवसर बनने की संभावना जताई गई है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पहले राजमार्ग, औद्योगिक गलियारे, हवाई अड्डे और आईटी पार्क आर्थिक विकास के प्रमुख केंद्र रहे हैं। अब डेटा सेंटर इस विकास यात्रा का नया आधार बन सकते हैं। इनके लिए जरूरी बिजली, इंटरनेट कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में निवेश बढ़ने से उद्योगों और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड सेवाओं और डिजिटल कारोबार के विस्तार के साथ डेटा सेंटर क्षेत्र आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रोजगार सृजन के साथ-साथ यह क्षेत्र नए शहरी विकास क्षेत्रों को भी आकार देने वाला प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर केंद्र बन सकता है।