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  • UP Election 2027 से पहले PDA की नई परिभाषा पर मायावती का हमला, अखिलेश यादव की रणनीति पर उठाए सवाल

    UP Election 2027 से पहले PDA की नई परिभाषा पर मायावती का हमला, अखिलेश यादव की रणनीति पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली ।
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्य की राजनीति में जातीय समीकरणों को लेकर बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से PDA फॉर्मूले में ‘P’ का अर्थ पंडित बताए जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। मायावती ने आरोप लगाया कि सपा चुनावी परिस्थितियों और राजनीतिक जरूरतों के अनुसार अपने सामाजिक समीकरण की व्याख्या बदलती रहती है। उनके बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में PDA को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    मायावती ने कहा कि समाजवादी पार्टी पहले PDA में ‘P’ का अर्थ पिछड़ा बताती थी, जबकि इसके साथ दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ा जाता था। अब अखिलेश यादव की ओर से ‘P’ को पंडित बताए जाने को उन्होंने चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा है। मायावती का कहना है कि ब्राह्मण समाज के लोगों का बसपा की ओर बढ़ता जुड़ाव देखकर सपा ने अपने राजनीतिक संदेश में बदलाव किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव नजदीक आने पर अलग-अलग सामाजिक वर्गों को साधने के लिए सपा अपनी राजनीतिक भाषा और समीकरण में परिवर्तन करती है।

    उत्तर प्रदेश में लंबे समय से जातीय और सामाजिक गठजोड़ चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रमुख राजनीतिक दल अलग-अलग समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला भी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को राजनीतिक रूप से एकजुट करने की रणनीति के तौर पर सामने आया था। अब इसमें पंडित शब्द को शामिल किए जाने से सपा की रणनीति को लेकर विपक्षी दलों को हमला करने का नया मुद्दा मिल गया है।

    मायावती ने इस दौरान बसपा की राजनीतिक विचारधारा को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी किसी एक जाति, समुदाय या वर्ग के हित तक सीमित नहीं है। बसपा ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की नीति पर काम करने का दावा करती है और उसका उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना है। मायावती ने अपनी पार्टी की पिछली सरकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकारों के दौरान भी सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाई गई थीं।

    बसपा प्रमुख ने लोगों से जाति आधारित राजनीतिक नारों और चुनावी समीकरणों को लेकर सतर्क रहने की अपील भी की। उनका कहना है कि चुनाव के समय अलग-अलग समुदायों को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दल अपनी भाषा और रणनीति बदल सकते हैं, लेकिन इससे समाज की मूल समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होता। मायावती ने सपा पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनावी लाभ के लिए राजनीतिक समीकरण बदलने के बजाय सभी वर्गों के व्यापक हित पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका को देखते हुए अखिलेश यादव के बयान और मायावती की प्रतिक्रिया को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जातीय संतुलन और सामाजिक गठबंधन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है। आने वाले समय में PDA की परिभाषा और इसके दायरे को लेकर सपा, बसपा तथा अन्य दलों के बीच बयानबाजी और बढ़ सकती है। मायावती का ताजा हमला इसी व्यापक राजनीतिक मुकाबले का हिस्सा माना जा रहा है।

  • यूपी चुनाव 2027 की पहली बड़ी घोषणा, अयोध्या सीट से पवन पांडे होंगे सपा के उम्मीदवार, अखिलेश का ऐलान

    यूपी चुनाव 2027 की पहली बड़ी घोषणा, अयोध्या सीट से पवन पांडे होंगे सपा के उम्मीदवार, अखिलेश का ऐलान

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होती जा रही हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी ने अपनी पहली बड़ी चुनावी घोषणा करते हुए अयोध्या विधानसभा सीट से तेज नारायण पांडे उर्फ पवन पांडे को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान इस फैसले का ऐलान किया। इसके साथ ही स्पष्ट हो गया है कि समाजवादी पार्टी अयोध्या जैसी महत्वपूर्ण सीट पर एक बार फिर अनुभवी और पुराने चेहरे पर भरोसा जता रही है।

    उम्मीदवार की घोषणा ऐसे समय की गई है जब प्रदेश में चुनावी तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं। कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि पवन पांडे जनता का भरोसा एक बार फिर जीतेंगे। उन्होंने कहा कि पवन पांडे का क्षेत्र से मजबूत जुड़ाव है और उन्होंने पहले भी यहां के लोगों का विश्वास हासिल किया है। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि उनका अनुभव आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    तेज नारायण पांडे, जिन्हें राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में पवन पांडे के नाम से जाना जाता है, लंबे समय से समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए हैं। उनका राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। उन्होंने युवाओं से जुड़े विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और संगठन में लगातार जिम्मेदारियां निभाते हुए अपनी पहचान बनाई। छात्र जीवन से ही सक्रिय राजनीति में रहने के कारण उन्हें संगठनात्मक कार्यों का भी व्यापक अनुभव प्राप्त हुआ।

    पवन पांडे पहली बार व्यापक चर्चा में वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान आए, जब उन्होंने अयोध्या विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर राज्य की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। विधायक रहने के दौरान उन्होंने क्षेत्र के विकास, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इसी राजनीतिक अनुभव और संगठन में सक्रिय भूमिका को देखते हुए पार्टी ने एक बार फिर उन्हें चुनावी मैदान में उतारने का निर्णय लिया है।

    अयोध्या विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सीटों में गिनी जाती है। ऐसे में इस सीट पर प्रत्याशी की घोषणा को चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुरुआती चरण में उम्मीदवार घोषित कर समाजवादी पार्टी ने चुनावी तैयारियों का स्पष्ट संदेश दिया है और संगठन को समय रहते सक्रिय करने की कोशिश की है।

    पार्टी की इस घोषणा के बाद प्रदेश की राजनीति में चुनावी सरगर्मियां और तेज होने की संभावना है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख दलों की ओर से भी उम्मीदवारों और चुनावी रणनीति को लेकर महत्वपूर्ण घोषणाएं की जा सकती हैं। फिलहाल समाजवादी पार्टी ने अयोध्या से पवन पांडे को उम्मीदवार बनाकर चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत कर दी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर रहेंगी कि अन्य राजनीतिक दल इस महत्वपूर्ण सीट पर किस चेहरे को मैदान में उतारते हैं और चुनावी मुकाबला किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।

  • असम के CM के गोमांस वाले बयान पर गरमाई सियासत… अखिलेश बोले- 'भाजपा हटाओ, गौमाता बचाओ'

    असम के CM के गोमांस वाले बयान पर गरमाई सियासत… अखिलेश बोले- 'भाजपा हटाओ, गौमाता बचाओ'


    दिसपुर।
    असम विधानसभा चुनावों (Assam Assembly elections.) के लिए प्रचार अभियान समाप्त हो गया है। मतदान से महज कुछ घंटे पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Chief Minister Himanta Biswa Sarma) के ‘गोमांस सेवन’ पर दिए गये बयान पर राजनीति में तूफान खड़ा हो गया है। सरमा ने कहा कि गोमांस खाने में कोई रोक नहीं है, लेकिन इसे निजी जगहों तक सीमित रखना चाहिए। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मुस्लिम भाई गोमांस खाते हैं, हम उन्हें मना नहीं कर रहे हैं। हम बस यही कहते हैं कि इसे घर के अंदर खाएं, सार्वजनिक स्थानों पर नहीं। मंदिरों के 5 किलोमीटर दायरे में या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर इसका सेवन नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री के इस बयान से सियासी बवाल तेज हो गया है। विपक्ष इसे भाजपा (BJP) की दोहरी नीति बता रहा है।

    दरअसल, यह बयान मुख्यमंत्री के पिछले कई बयानों से बिल्कुल अलग है। कुछ दिन पहले जोरहाट में चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा था कि गाय का मांस खाने वालों को वह नहीं बख्शेंगे और कानूनी कार्रवाई करेंगे। उन्होंने तब कहा था कि असम में पशु संरक्षण कानून है, सार्वजनिक रूप से गोमांस खाने पर 3 साल की जेल हो सकती है। मैं गाय का मांस खाने वालों के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराऊंगा।

    विपक्ष ने बीजेपी के खिलाफ खोला मोर्चा
    मुख्यमंत्री के इस बयान पर विपक्षी दलों ने हमलावर रुख अपनाया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा, कि भाजपा हटाओ, गौमाता बचाओ। उन्होंने हिमंता के बयान वाला पोस्टर शेयर करते हुए भाजपा पर निशाना साधा।

    वहीं, आम आदमी पार्टी (आप) ने भी भाजपा पर तीखा प्रहार किया। पार्टी ने कहा कि ‘गाय माता’ भाजपा के लिए सिर्फ चुनावी हथकंडा है, जिसका इस्तेमाल दंगे और अशांति फैलाने के लिए किया जाता है। आप ने आरोप लगाया कि उत्तर भारत में भाजपा और उसके समर्थक ‘ रक्षा’ के नाम पर हत्याएं करते हैं, वहीं असम के उनके नेता कह रहे हैं कि गोमांस खाओ लेकिन घर में।

    पुराने बयान और कानून का प्रावधान
    बता दें कि इस महीने के शुरू में हिमंता बिस्वा सरमा ने असम जातीय परिषद (एजेपी) की उम्मीदवार कुंकी चौधरी की मां सुजाता गुरुंग चौधरी पर गोमांस खाने और ‘राष्ट्र-विरोधी व सनातनी-विरोधी’ होने का आरोप लगाया था। उन्होंने चुनाव के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी थी। एजेपी ने इन आरोपों को फर्जी और राजनीतिक साजिश बताया है।

    असम पशु संरक्षण अधिनियम, 2021 गायों के वध पर पूर्ण रोक नहीं लगाता, लेकिन सार्वजनिक स्थानों, रेस्तरां और सामुदायिक कार्यक्रमों में गोमांस के सेवन पर प्रतिबंध है। राज्य में दुकानों से गोमांस खरीदा जा सकता है और निजी स्थानों पर इसका सेवन किया जा सकता है। हाल ही में कैबिनेट ने होटलों और सार्वजनिक स्थानों में गोमांस पर और सख्ती की है।