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  • Skanda Sashti 2026: संतान प्राप्ति और खुशहाल जीवन के लिए आज रखें व्रत

    Skanda Sashti 2026: संतान प्राप्ति और खुशहाल जीवन के लिए आज रखें व्रत


    नई दिल्ली । आज 22 फरवरी 2026 को हिंदू धर्म में विशेष व्रत संकद षष्ठी का दिन है। इसे संतान प्राप्ति और संतान के सुख-समृद्ध जीवन के लिए श्रेष्ठ व्रत माना जाता है। फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर यह व्रत रखा जाता है। स्कंद षष्ठी के दिन माता गौरी और भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय, जिन्हें हम भगवान स्कंद, मुरुगन या सुब्रह्मणयम के नाम से जानते हैं, की पूजा की जाती है। खासकर माताएं इस व्रत का पालन संतान की कामना और उसके सुख-समृद्ध जीवन के लिए करती हैं।

    पंचांग के अनुसार, आज सुबह 11:09 बजे से षष्ठी तिथि प्रारंभ होगी और कल 23 फरवरी को सुबह 09:09 बजे तक रहेगी। पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त हैं। सुबह 05:12 से 06:03 बजे तक पूजा का शुभ मुहूर्त है, दोपहर 12:12 से 12:58 बजे तक अभिजीत मुहूर्त, दोपहर 02:29 से 03:14 बजे तक विजय मुहूर्त और शाम 06:14 से 06:39 बजे तक गोधूलि मुहूर्त। इस समय के दौरान पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है।

    स्कंद षष्ठी पूजा की विधि सरल लेकिन नियमबद्ध होती है। सुबह उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। सूर्य देव को जल अर्पित करें और फिर पूजाघर में पूजा की तैयारी करें। एक चौकी पर भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। सबसे पहले गंगाजल से भगवान को स्नान कराएं, फिर चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद पीले फूल, फल, भोग, धूप और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करें। भगवान स्कंद के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करें।

    व्रत के दौरान कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है। पूरे दिन सात्विक भोजन करें, जैसे फल, दूध और मेवे। अनाज और तामसिक चीजों से परहेज करें। व्रत के दौरान किसी की बुराई या निंदा न करें। अगले दिन विधिपूर्वक व्रत का पारण करें। यह नियम व्रत की सफलता और मनोकामना पूर्ण होने के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    स्कंद षष्ठी व्रत का महत्व केवल संतान प्राप्ति तक सीमित नहीं है। यह व्रत माता-पिता की भक्ति, परिवार में खुशहाली और संतान के जीवन में स्वास्थ्य और सफलता की कामना से भी जुड़ा है। श्रद्धा और नियम के साथ व्रत करने से इसे रखन वाले परिवार को मानसिक संतोष और आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है। इसलिए आज 22 फरवरी को अगर आप संतान सुख या संतान के सुख-समृद्ध जीवन की कामना रखते हैं, तो स्कंद षष्ठी का व्रत श्रद्धापूर्वक रखें, पूजा विधि और नियमों का पालन करें और लाभ प्राप्त करें।

  • ढुण्ढिराज चतुर्थी 2026: बाधाओं के नाश और मनोकामना पूर्ति का पावन दिन, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    ढुण्ढिराज चतुर्थी 2026: बाधाओं के नाश और मनोकामना पूर्ति का पावन दिन, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि


    नई दिल्ली । फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाने वाली ढुण्ढिराज चतुर्थी इस वर्ष 21 फरवरी 2026 शनिवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार यह तिथि भगवान श्री गणेश को समर्पित है जिन्हें विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता कहा जाता है। मत्स्य पुराण में इस चतुर्थी को ‘मनोरथ चतुर्थी’ के नाम से भी वर्णित किया गया है क्योंकि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। कहा जाता है कि जीवन में आ रही बाधाओं रुकावटों और मानसिक अशांति को दूर करने के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी होता है।

    इस बार ढुण्ढिराज चतुर्थी का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इस दिन शुभ योगों का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन शुभ शुक्ल और रवि योग का निर्माण हो रहा है जो धार्मिक कार्यों और पूजन-अर्चन के लिए अत्यंत अनुकूल माने जाते हैं। ऐसे शुभ संयोग में भगवान गणेश की आराधना करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

    पूजा के लिए दिनभर कई शुभ मुहूर्त रहेंगे। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 13 मिनट से 6 बजकर 4 मिनट तक रहेगा जो साधना और जप के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 28 मिनट से 3 बजकर 14 मिनट तक रहेगा जिसमें किए गए कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है। गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 13 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा जो पूजन के लिए शुभ है। वहीं निशिता मुहूर्त रात 12 बजकर 9 मिनट से 1 बजे तक रहेगा जो विशेष साधना और मंत्र जप के लिए उत्तम माना गया है।

    ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है। गणपति को लाल पुष्प दूर्वा मोदक और सिंदूर अर्पित करना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से दूर्वा और मोदक भगवान को अत्यंत प्रिय हैं। पूजा के दौरान ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जप या गणेश स्तोत्र का पाठ करने से बुद्धि विवेक और सफलता की प्राप्ति होती है। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ की गई आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और कार्यों में सफलता मिलने लगती है।

    मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से न केवल आर्थिक समृद्धि आती है बल्कि पारिवारिक सुख-शांति भी बनी रहती है। विद्यार्थी वर्ग के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना जाता है क्योंकि भगवान गणेश को बुद्धि और विद्या का देवता कहा गया है। जो व्यक्ति सच्चे मन से इस दिन उपवास रखकर पूजा-अर्चना करता है उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और अधूरे कार्य पूर्ण होने लगते हैं।

    ढुण्ढिराज चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आत्मविश्वास और आस्था को मजबूत करने का अवसर भी है। शुभ योगों से युक्त इस पावन दिन पर भगवान गणेश की आराधना कर अपने जीवन से विघ्नों को दूर करने और सफलता की ओर कदम बढ़ाने का यह श्रेष्ठ अवसर है।

  • Aamlaki Ekadashi 2026: नवविवाहित महिलाओं के लिए क्यों खास है आमलकी एकादशी? जानें महत्व और लाभ

    Aamlaki Ekadashi 2026: नवविवाहित महिलाओं के लिए क्यों खास है आमलकी एकादशी? जानें महत्व और लाभ


    नई दिल्ली । आमलकी एकादशी हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी जिसे रंगभरी एकादशी भी कहते हैं का अपना एक अलग ही आकर्षण है. यह दिन न केवल भगवान विष्णु को समर्पित है, बल्कि नवविवाहित महिलाओं के लिए यह सौभाग्य और खुशहाल वैवाहिक जीवन का द्वार खोलने वाला माना जाता है.

    आमलकी एकादशी शुभ मुहूर्त 2026

    पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आमलकी एकादशी की तिथि और समय कुछ इस प्रकार है.

    नवविवाहित महिलाओं के लिए क्यों है खास?
    मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे. इसलिए इसे रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है. नवविवाहित महिलाओं के लिए यह काफी व्रत खास माना जाता है.जो महिलाएं शादी के बाद शुरुआती सालों में यह व्रत करती हैं, उन्हें माता पार्वती और भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है, जिससे वैवाहिक जीवन में प्रेम बना रहता है. आमलकी एकादशी का व्रत रखने से घर में सुख-शांति आती है और संतान प्राप्ति की राह आसान होती है. स्वास्थ्य का वरदान: आमलकी का अर्थ है आंवला. आयुर्वेद और धर्म दोनों में आंवले को अमृत माना गया है. इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा करने से महिलाओं को आरोग्य और शारीरिक शक्ति मिलती है.

    इस दिन क्या करें?

    आमलकी एकादशी पर कुछ विशेष कार्यों को करने से व्रत का फल दोगुना हो जाता है. आंवले के पेड़ की पूजा: इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की पूजा करें. पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और परिक्रमा करें.आंवले का दान और सेवन: इस दिन आंवले का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है. साथ ही, प्रसाद के रूप में आंवले का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है.

    रंग और गुलाल: चूंकि इसे रंगभरी एकादशी भी कहते हैं, इसलिए भगवान विष्णु और शिव-पार्वती को गुलाल अर्पित करें.पौराणिक महत्व: शास्त्रों के अनुसार, आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है क्योंकि इसकी उत्पत्ति विष्णु जी के आंसुओं से हुई थी. इसलिए इस दिन आंवले की पूजा सीधे श्रीहरि की पूजा मानी जाती है.

    आमलकी एकादशी के लाभ

    पापों से मुक्ति: अनजाने में हुई गलतियों और पापों के प्रभाव को कम करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है.मोक्ष की प्राप्ति: एकादशी का व्रत करने वाले साधक को आखिर में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती हैआर्थिक उन्नति: शुक्रवार के दिन एकादशी पड़ने से लक्ष्मी-नारायण योग बनता है, जो धन और ऐश्वर्य में वृद्धि करता है. 

  • देशभर में महाशिवरात्रि पूर्व की धूम…. जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    देशभर में महाशिवरात्रि पूर्व की धूम…. जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि


    नई दिल्ली।
    देश भर में आज रविवार को फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर महाशिवरात्रि का पर्व (Mahashivratri festival) धूमधाम से मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि में त्रयोदशी-चतुर्दशी का मेल होता है, त्रयोदशी समाप्त होकर चतुर्दशी शुरू होती है, वही समय महाशिवरात्रि का विशेष पुण्यकाल (Special Auspicious time.) माना जाता है। ज्योतिषचार्यों के अनुसार 15 फरवरी को दिन में त्रयोदशी तिथि रहेगी, लेकिन शाम 5:04 बजे चतुर्दशी तिथि आरंभ हो जाएगी। ऐसे में पूरी रात्रि में चतुर्दशी ही व्याप्त रहेगी। इसलिए महाशिवरात्रि पर्व 15 फरवरी को मनाया जा रहा है।

    इस वर्ष महाशिवरात्रि पर व्यतिपात, वरियान व अमृत नामक महा औदायिक योग व निशीथ काल भी बन रहा है। पं. शरद चंद मिश्र के अनुसार, इस दिन सूर्योदय प्रातः 6 बजकर 25 मिनट पर होगा। फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी सायं 4 बजकर 23 मिनट तक रहेगी, इसके बाद चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होकर रात्रि भर रहेगी। उत्तराषाढ़ नक्षत्र सायं 7 बजकर 26 मिनट तक रहेगा, इसके बाद श्रवण नक्षत्र प्रारंभ होगा। व्यतिपात योग दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा, इसके पश्चात वरियान योग लगेगा। साथ ही अमृत सिद्धि योग पूरे दिन-रात्रि विद्यमान रहेगा। निशीथ काल रात्रि 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा, जो भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए सर्वोत्तम समय माना गया है। प. नरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग प्रातः 6:25 से सायं 7:26 तक रहेगा। व्यतिपात योग साधना और जप-तप के लिए विशेष फलदायी माना गया है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर में रहेगा, जिसमें पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है।

    महाशिवरात्रि का महत्त्व : पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या कालरात्रि भी कहा गया है। पौराणिक व्याख्यानों के अनुसार इसे शिव विवाह महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। महाशिवरात्रि को वर्षभर में पड़ने वाली सिद्ध रात्रियों में से एक माना गया है।

    मुहूर्त
    ● चतुर्दशी तिथि उपस्थित : 15 फरवरी शाम 5:04 से 16 फरवरी शाम 5:34 बजे
    ● शिवरात्रि का विशष पुण्यकाल : 15 की शाम 5:04 से आरम्भ
    ● जलाभिषेक का समय : 15 को प्रातःकाल से आरम्भ
    ● विशेष पुण्यकाल : शाम 5:04 के बाद विशेष पुण्यकाल का अभिषेक होगा

    शिव पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त-
    निशिता काल पूजा समय – 12:37 ए एम से 01:32 ए एम, फरवरी 16
    अवधि – 55 मिनट
    शिवरात्रि पारण समय – 16 फरवरी को 07:57 ए एम से 01:04 पी एम तक।
    रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – 06:11 पी एम से 09:38 पी एम
    रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – 09:38 पी एम से 01:04 ए एम, फरवरी 16
    रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – 01:04 ए एम से 04:31 ए एम, फरवरी 16
    रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – 04:31 ए एम से 07:57 ए एम, फरवरी 16

    महाशिवरात्रि की पूजा विधि (घर और मंदिर में कैसे करें पूजा)-
    महाशिवरात्रि की पूजा विधि: घर में कैसे करें पूजा- महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। घर में पूजा करने से पहले पूजा की जगह अच्छे से साफ कर लें। शिवलिंग को भी पानी से धोकर साफ जगह पर रखें। सबसे पहले शिवलिंग पर साफ जल से अभिषेक करें। इसके बाद दूध, दही, घी और शहद से एक-एक करके अभिषेक किया जा सकता है। अभिषेक करते समय मन में “ॐ नमः शिवाय” का जप करते रहें। अगर सब चीजें उपलब्ध न हों तो सिर्फ जल और दूध से भी पूजा पूरी मानी जाती है। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र जरूर चढ़ाएं। साथ में धतूरा, आक के फूल और सफेद फूल चढ़ा सकते हैं। फूल चढ़ाते समय मन में अपनी इच्छा रखें और शिवजी को याद करें। इसके बाद धूप-दीप जलाएं और थोड़ी देर शांत बैठकर शिव मंत्रों का जप करें। मन की बात भगवान शिव से कहें। शिव चालीसा या महामृत्युंजय मंत्र का पाठ भी कर सकते हैं। जो लोग रात में जागकर पूजा कर पाते हैं, वे घर पर ही सरल तरीके से रुद्राभिषेक कर सकते हैं।

    घर में शिवलिंग रखने की सही बात-
    घर में बहुत बड़ा शिवलिंग रखने की परंपरा नहीं है। आमतौर पर मिट्टी, पत्थर, पीतल या चांदी का छोटा शिवलिंग घर के लिए ठीक माना जाता है। शिवलिंग के साथ गणेश जी, माता पार्वती और नंदी की छोटी मूर्ति रखकर पूजा करना अच्छा माना जाता है।

    महाशिवरात्रि की पूजा विधि: मंदिर में कैसे करें पूजा-
    अगर मंदिर जाकर पूजा कर रहे हैं तो सुबह स्नान करके साफ कपड़ों में मंदिर जाएं। मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। कई जगहों पर दूध, दही, घी और शहद से अभिषेक की व्यवस्था होती है, वहां श्रद्धा से अभिषेक करें। “ॐ नमः शिवाय” का मन ही मन जप करते रहें।शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और सफेद फूल चढ़ाएं। पुजारी जी के बताए नियमों का पालन करें। धूप-दीप दिखाकर भगवान शिव का ध्यान करें। अगर संभव हो तो रात में मंदिर जाकर रुद्राभिषेक या विशेष पूजा में शामिल हों। मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात की पूजा का खास फल मिलता है।

    महाशिवरात्रि पर करें इन मंत्रों का जप-
    महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की कृपा पाने के लिए कुछ आसान और असरदार मंत्रों का जप किया जा सकता है। सबसे पहले “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें। यह शिव जी का सबसे सरल और शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। इस पावन दिन महामृत्युंजय मंत्र का जप भी किया जाता है–
    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
    उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

    शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं और क्या नहीं- महाशिवरात्रि या रोज की पूजा में शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए जल, दूध, दही, घी और शहद से अभिषेक किया जाता है और इसके बाद बेलपत्र जरूर अर्पित करें, क्योंकि यह शिवजी को सबसे प्रिय माना जाता है। साथ में सफेद फूल, आक और धतूरा भी चढ़ाए जाते हैं। धूप-दीप जलाकर सादे मन से पूजा करें। वहीं शिवलिंग पर केतकी का फूल नहीं चढ़ाना चाहिए, क्योंकि मान्यता के अनुसार यह शिव पूजा में वर्जित माना गया है। तुलसी के पत्ते भी शिवलिंग पर नहीं चढ़ाए जाते, इन्हें विष्णु पूजा के लिए रखा जाता है। लाल रंग के तेज खुशबू वाले फूल, टूटे या मुरझाए फूल, बासी फूल और चढ़ाया हुआ प्रसाद दोबारा शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।

  • Maha Shivratri पर इस बार बन रहे कई दुर्लभ संयोग… जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और विधि

    Maha Shivratri पर इस बार बन रहे कई दुर्लभ संयोग… जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली।
    महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) हिंदू धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व (Holy Festival) है, जिसका भक्त पूरे साल इंतजार करते हैं. साल 2026 में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri 2026) 15 फरवरी, रविवार को मनाई जाएगी. इस बार तिथि को लेकर कुछ लोगों के मन में भ्रम था कि व्रत 15 को रखा जाए या 16 फरवरी को, लेकिन शास्त्रों के अनुसार 15 फरवरी को ही पर्व मनाना उचित रहेगा. फाल्गुन मास (Phalguna Month) के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि इस बार 15 फरवरी शाम 5 बजकर 5 मिनट बजे से शुरू होकर 16 फरवरी शाम 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगी. चूंकि, निशीथकाल (मध्य रात्रि) में चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी की रात को ही रहेगी, इसलिए इसी दिन महाशिवरात्रि मनाना शास्त्रसम्मत है.


    महाशिवरात्रि पर पूजा का सही समय क्या है?

    अगर आप मंदिर में जलाभिषेक करने जा रहे हैं तो दिन में किसी भी समय जा सकते हैं. लेकिन यदि रुद्राभिषेक करना चाहते हैं तो रात्रि का समय सबसे उत्तम माना गया है।
    प्रथम पहर: शाम 7 बजे से 9 बजे तक
    द्वितीय पहर: रात 10 बजे से 12 बजे तक
    तृतीय पहर: रात 1 बजे से 3 बजे तक
    चतुर्थ पहर: सुबह 4 बजे से 6 बजे तक
    यदि चारों पहर संभव न हो, तो कम से कम एक पहर में रुद्राभिषेक अवश्य करें.


    महाशिवरात्रि 2026 शुभ संयोग (Maha Shivratri 2026 Shubh Sanyog)

    महाशिवरात्रि इस बार बहुत ही विशेष मानी जा रही है. दरअसल इस दिन शिव योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, प्रीति योग, आयुष्मान योग, सौभाग्य योग, शोभन योग, साध्य योग, शुक्ल योग, ध्रुव योग, व्यतिपात और वरियान योग का भी प्रभाव बना रहेगा.

    महाशिवरात्रि 2026 जलाभिषेक शुभ मुहूर्त (Maha Shivratri 2026 Jalabhishek Muhurat)
    इस बार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए दिनभर कई शुभ मुहूर्त मिलेंग, जिनमें भक्त पूजा-अर्चना कर सकते हैं. पहला मुहूर्त सुबह 8 बजकर 24 मिनट से शुरू होकर 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. इसके बाद दूसरा मुहूर्त सुबह 9 बजकर 48 मिनट से 11 बजकर 11 मिनट तक का रहेगा.

    तीसरा मुहूर्त अमृत सर्वोत्तम मुहूर्त रहेगा, जो सुबह 11 बजकर 11 मिनट से 12 बजकर 35 मिनट तक का रहेगा, जिसमें जल चढ़ाना अत्यंत फलदायी रहेगा. जो श्रद्धालु शाम को पूजा करना चाहते हैं, वे 6 बजकर 11 मिनट से 7 बजकर 47 मिनट के बीच अभिषेक कर सकते हैं. इन सभी मुहूर्तों में श्रद्धा और सच्चे मन से शिवलिंग पर जल अर्पित करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है.


    रुद्राभिषेक में क्या चढ़ाएं?

    भगवान शिव को जल, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, बेलपत्र, शमी पत्र, भस्म, चंदन और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं. कई लोग पार्थिव शिवलिंग बनाकर भी अभिषेक करते हैं. शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विशेष महत्व है. मान्यता है कि जल हमारे भावों को धारण करता है. जब हम सच्चे मन से जल अर्पित करते हैं, तो हमारे मन की सकारात्मक ऊर्जा भी ईश्वर तक पहुंचती है और नकारात्मकता धीरे-धीरे कम होने लगती है.


    महाशिवरात्रि पर जरूर करें ये उपाय

    अगर जीवन में आर्थिक परेशानी है, आय कम है या मेहनत के अनुसार फल नहीं मिल रहा, तो महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखें. सुबह स्नान के बाद शिव मंदिर जाकर गंगाजल से अभिषेक करें. ”ऊं नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए 11 बेलपत्र चढ़ाएं. दिन भर श्रद्धा से व्रत रखें. शाम को रुद्राभिषेक कराएं और कम से कम 11 माला ”ऊं नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें. नियमित रूप से मंत्र जाप जारी रखने से धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है.


    तनाव और डिप्रेशन दूर करने का उपाय

    अगर मन में तनाव, नकारात्मकता या बेचैनी रहती है, तो महाशिवरात्रि पर गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करें. 11 बेलपत्र अर्पित करें और प्रतिदिन 108 बार ”ऊं नमः शिवाय” का जाप शुरू करें. नियमित मंत्र जाप से मन को शांति मिलती है और सकारात्मक सोच विकसित होती है.

  • 19 January 2026 Panchang: गुप्त नवरात्रि की शुरुआत, सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग

    19 January 2026 Panchang: गुप्त नवरात्रि की शुरुआत, सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग


    नई दिल्ली। अगर आप अपने दिन की शुरुआत शुभ और सकारात्मक ऊर्जा के साथ करना चाहते हैं तो 19 जनवरी 2026 का पंचांग आपके लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकता है। यह दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से खास माना जा रहा है। सोमवार के दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है और इसी दिन से गुप्त नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, जो 27 जनवरी तक चलेगी।

    गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से साधना, तंत्र-मंत्र और देवी उपासना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन मां दुर्गा की गुप्त रूप से आराधना की जाती है। साथ ही आज सोमवार व्रत रखा जाएगा जो भगवान शिव को समर्पित होता है। शिव भक्तों के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना गया है।

    शुभ योग और ग्रह स्थिति
    19 जनवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। यह योग नए कार्यों की शुरुआत, पूजा-पाठ, व्रत, जप-तप और निवेश के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
    इस दिन चंद्रमा मकर राशि में संचार करेगा और सूर्य भी मकर राशि में स्थित रहेगा, जिससे कार्यों में स्थिरता और अनुशासन का प्रभाव देखने को मिलेगा।

    शुभ काल Auspicious Timings
    ब्रह्म मुहूर्त: 05:10 AM – 05:58 AM

    अमृत काल: 02:09 AM – 03:50 AM

    अभिजीत मुहूर्त: 11:52 AM – 12:35 PM

    इन समयों में पूजा, ध्यान, मंत्र जाप और महत्वपूर्ण निर्णय लेना शुभ माना जाता है।

    अशुभ काल Inauspicious Timings
    राहु काल: 08:09 AM – 09:30 AM

    यम गण्ड: 10:52 AM – 12:14 PM

    कुलिक काल: 01:35 PM – 02:57 PM

    दुर्मुहूर्त:

    12:35 PM – 01:19 PM

    02:46 PM – 03:29 PM

    वर्ज्यम्: 04:04 PM – 05:45 PM

    इन समयों में शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।

    सूर्य और चंद्रमा का समय
    सूर्योदय: 06:47 AM

    सूर्यास्त: 05:40 PM

    चन्द्रोदय: 07:06 AM

    चन्द्रास्त: 06:16 PM

    क्या करें इस दिन
    मां दुर्गा और भगवान शिव की पूजा करें

    गुप्त नवरात्रि के संकल्प लें

    मंत्र जाप, ध्यान और साधना के लिए दिन उत्तम

    नए कार्यों की योजना बनाना शुभ  इस प्रकार 19 जनवरी 2026 का दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मुहूर्त और पंचांग के अनुसार कार्य करने से दिन सफल और फलदायी बन सकता है।

  • बसंत पंचमी 2026: माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए घर लाएं ये 5 शुभ चीजें, करियर और बुद्धि में होगी उन्नति

    बसंत पंचमी 2026: माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए घर लाएं ये 5 शुभ चीजें, करियर और बुद्धि में होगी उन्नति


    नई दिल्ली । बसंत पंचमी का दिन ‘अबूझ मुहूर्त’ माना जाता है, यानी इस दिन किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि इस दिन कुछ विशेष वस्तुएं घर लाकर माँ सरस्वती को अर्पित की जाएं, तो साधक को ज्ञान, एकाग्रता और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    बसंत पंचमी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त वर्ष 2026 में बसंत पंचमी का पर्व 22 जनवरी को मनाया जाएगा। पंचमी तिथि प्रारंभ: 22 जनवरी 2026 को सुबह से। पूजा का शुभ समय: सुबह 07:13 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक लगभग 5 घंटे 20 मिनट। शेष योग इस दिन रवि योग और अमृत सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है, जो खरीदारी और नई शुरुआत के लिए अत्यंत श्रेष्ठ है।

    इन वस्तुओं को घर लाना माना जाता है अत्यंत शुभ

    माँ सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर यदि आप घर में नई ऊर्जा का संचार करना चाहते हैं, तो इस दिन माँ सरस्वती की प्रतिमा घर लाएं। ध्यान रहे कि माँ सरस्वती शांत मुद्रा में हों और हंस या कमल पर विराजमान हों। इसे घर के ईशान कोण उत्तर-पूर्व में स्थापित करना करियर के लिए शुभ होता है।वीणा संगीत यंत्र वीणा माँ सरस्वती का सबसे प्रिय वाद्य यंत्र है। संगीत और कला से जुड़े लोगों के लिए बसंत पंचमी पर वीणा या कोई भी छोटा वाद्य यंत्र घर लाना सौभाग्य बढ़ाता है। इससे घर का वास्तु दोष दूर होता है और मानसिक शांति मिलती है।

    मोरपंख मोरपंख को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसे बसंत पंचमी के दिन लाकर बच्चों के स्टडी रूम या उनकी किताबों में रखना चाहिए। माना जाता है कि इससे छात्रों की एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ाई में मन लगता है।नई किताबें और पेन कलम पेन को माँ सरस्वती का रूप माना जाता है। इस दिन नया पेन या नई किताबें खरीदकर उनकी पूजा करना और उन पर तिलक लगाना बहुत लाभकारी होता है। यह कार्य विशेष रूप से नई शिक्षा शुरू करने वाले बच्चों अक्षरारंभ के लिए श्रेष्ठ है। पीले वस्त्र या फूल पीला रंग माँ सरस्वती को अत्यंत प्रिय है क्योंकि यह शुद्धता और नई चेतना का प्रतीक है। इस दिन पीले वस्त्र खरीदना या गेंदे के पीले फूलों से घर को सजाना सुख-समृद्धि लेकर आता है।

    माँ सरस्वती की पूजा के लिए विशेष टिप

    पूजा के समय माँ सरस्वती को पीले रंग की मिठाई बेसन के लड्डू या केसरिया भात का भोग लगाएं और ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ मंत्र का जाप करें।
  • 17 जनवरी 2026 का पंचांग: माघ कृष्ण चतुर्दशी आज, शनिवार को शनि देव की पूजा का विशेष महत्व

    17 जनवरी 2026 का पंचांग: माघ कृष्ण चतुर्दशी आज, शनिवार को शनि देव की पूजा का विशेष महत्व


    नई दिल्ली । 17 January 2026 Panchang। आज 17 जनवरी 2026, शनिवार का दिन है और माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। शनिवार का दिन न्याय के देवता शनि देव को समर्पित माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से शनि देव की पूजा करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव में कमी आती है तथा जीवन में स्थिरता और शांति का वास होता है। आज के दिन पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि पर मूल नक्षत्र और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में यह संयोग विशेष माना जाता है।
    मूल नक्षत्र को जहां एक ओर उग्र और तीव्र स्वभाव का माना जाता है, वहीं पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र विजय और सफलता का प्रतीक है। ऐसे में आज का दिन कुछ कार्यों के लिए अनुकूल तो कुछ के लिए सावधानी बरतने वाला माना गया है। धार्मिक दृष्टि से माघ माह को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस महीने में स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व होता है। चतुर्दशी तिथि पर शिव आराधना का भी विशेष फल प्राप्त होता है। आज शनिवार होने के कारण शिव और शनि दोनों की पूजा करने से विशेष लाभ मिल सकता है। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए काले तिल, सरसों का तेल, काले वस्त्र और उड़द दाल का दान करना शुभ माना जाता है।

    आज के शुभ मुहूर्त

    आज के दिन कुछ विशेष समय ऐसे हैं, जिन्हें शुभ कार्यों के लिए उत्तम माना गया है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:15 बजे से 12:58 बजे तक रहेगा। यह समय लगभग सभी प्रकार के शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। वहीं अमृत काल सुबह 5:05 बजे से 6:49 बजे तक रहेगा, जो पूजा-पाठ और ध्यान के लिए श्रेष्ठ है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:37 बजे से 6:25 बजे तक रहेगा, इस समय साधना और आत्मिक चिंतन से विशेष फल प्राप्त होता है।

    आज के अशुभ काल
    आज के दिन कुछ समय ऐसे भी हैं, जिनमें शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। राहु काल सुबह 9:55 बजे से 11:16 बजे तक रहेगा। यम गण्ड दोपहर 1:57 बजे से 3:18 बजे तक रहेगा, जबकि कुलिक काल सुबह 7:14 बजे से 8:35 बजे तक माना जाएगा। इसके अलावा दुर्मुहूर्त सुबह 8:40 बजे से 9:23 बजे तक रहेगा। वर्ज्यम काल दो समय में रहेगा—सुबह 6:25 बजे से 8:11 बजे तक और शाम 6:36 बजे से 8:20 बजे तक।

    सूर्य और चंद्रमा की स्थिति
    आज सूर्य का उदय सुबह 7:14 बजे और सूर्यास्त शाम 5:59 बजे होगा। चंद्रमा का उदय सुबह 6:02 बजे और चंद्रास्त शाम 4:41 बजे होगा। कुल मिलाकर 17 जनवरी 2026 का दिन धार्मिक कार्यों, शनि पूजा, दान-पुण्य और आत्मिक साधना के लिए उपयुक्त है। शुभ मुहूर्त का ध्यान रखते हुए कार्य करने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

  • मकर संक्रांति 2026 पुण्यकाल 16 घंटे का. 15 जनवरी को मनाएं मकर संक्रांति

    मकर संक्रांति 2026 पुण्यकाल 16 घंटे का. 15 जनवरी को मनाएं मकर संक्रांति


    नई दिल्ली । मकर संक्रांति 2026 के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी की रात 9:19 बजे होगा, लेकिन शास्त्रों के अनुसार पुण्यकाल 16 घंटे तक रहेगा, जो 15 जनवरी तक जारी रहेगा। इस दिन विशेष रूप से स्नान, सूर्य पूजा और दान का महत्व है। हिंदू धर्म में मकर संक्रांति को विशेष दिन माना जाता है क्योंकि इस दिन सूर्य उत्तरायण की दिशा में प्रवेश करते हैं, जिससे पृथ्वी पर दिन-ब-दिन तापमान बढ़ता है और ऋतु परिवर्तन की शुरुआत होती है। इसे देवताओं का दिन भी कहा जाता है, क्योंकि सूर्यदेव का उत्तरायण में प्रवेश शुभ होता है।कर्मकांडी अमरेंद्र कुमार शास्त्री और ज्योतिषाचार्य पंडित नरोत्तम द्विवेदी के अनुसार, मकर संक्रांति का त्योहार 15 जनवरी को मनाया जाएगा।
    इस दिन, स्नान, सूर्यदेव की उपासना और तिल का दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।मकर संक्रांति से जुड़ी एक पुरानी कथा भी है, जिसके अनुसार भगवान सूर्य, अपने पुत्र भगवान शनि से मिलने मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से सूर्य उत्तर पथगामी होते हैं और पृथ्वी की ओर उनका रुख बदलता है।मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से स्नान का महत्व है, खासकर गंगा या अन्य पवित्र नदियों में। इस दिन को पुण्यकाल माना गया है, और इस दौरान दान करने से व्यक्ति के जीवन में शुभता आती है।
    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन सूर्यदेव, भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की पूजा करने से जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।मकर संक्रांति के दिन विशेष रूप से नया अन्न, तिल, कम्बल, घी और धार्मिक पुस्तकों का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भोजन में खासतौर पर तिल और खिचड़ी बनाई जाती है, जो प्राचीन परंपराओं के अनुसार भगवान को अर्पित की जाती है, फिर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

    धार्मिक आचार्यों का मानना है कि इस दिन तिल का दान करने से शनि से संबंधित सभी कष्ट समाप्त होते हैं। इसके अलावा, गरीबों को बर्तन, तिल और अन्य सामान दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती हैमौसम को लेकर भी मकर संक्रांति विशेष महत्व रखता है। हालांकि, इस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही है, लेकिन अगर मौसम अनुकूल रहा तो गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या गंगा घाटों पर पहुंच सकती है। विशेष रूप से उत्तर भारत के कई इलाकों से लोग इस दिन गंगा स्नान के लिए पहुंचते हैं।

    इसके अलावा, मकर संक्रांति के बाद खरमास का समय समाप्त हो जाएगा, जिसके चलते मांगलिक कार्यों की शुरुआत होगी। 18 जनवरी को मौनी अमावस्या और 4 फरवरी को पहला वैवाहिक लग्न मुहूर्त भी शुरू होगा। 2026 में मकर संक्रांति का दिन धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं से भरपूर रहेगा। यह दिन सूर्य की उपासना, तिल दान, और अन्य शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त रहेगा। विशेष रूप से इस दिन की महत्वता को समझते हुए श्रद्धालु इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाएंगे।

  • 5 जनवरी का पंचांग भद्राकाल रहेगाआडल योग नहीं लगेगाजानें शुभ-अशुभ मुहूर्त

    5 जनवरी का पंचांग भद्राकाल रहेगाआडल योग नहीं लगेगाजानें शुभ-अशुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली । 5 जनवरी2026 का पंचांग अनुसारइस दिन कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि रहेगी और यह दिन सोमवार को पड़ेगा। सोमवार को भद्राकाल का साया रहेगाजो रात 8 बजकर 53 मिनट से लेकर अगले दिन 7 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। इस समय किसी भी शुभ कार्य को करने से बचना चाहिएक्योंकि भद्राकाल में किया गया शुभ काम भी अशुभ परिणाम दे सकता है। द्वितीया तिथि सुबह 9 बजकर 56 मिनट तक रहेगीइसके बाद तृतीया तिथि का आगमन होगा। आइए जानते हैं आज के शुभ और अशुभ मुहूर्त के बारे में।
    शुभ मुहूर्त

    अभिजित मुहूर्त दोपहर 1206 से 1247 तक, गोधूलि मुहूर्त शाम 536 से 603 तक, अमृत काल मुहूर्त शाम 729 से 858 तक, विजय मुहूर्त दोपहर 210 से 252 तक, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 526 से 620 तक।
    अशुभ मुहूर्त

    राहुकाल सुबह 833 से 951 तक, गुलिक काल दोपहर 145 से 302 तक, यमगण्ड काल सुबह 1109 से 1227 तक, दुर्मुहूर्त दोपहर 1247 से 129 तक।
    विशेष जानकारी
    5 जनवरी को आडल योग नहीं लगेगाजो कि एक शुभ योग माना जाता है। सूर्योदय और सूर्यास्त, सूर्योदय सुबह 715, सूर्यास्त शाम 538,।
    चन्द्रोदय

    चन्द्रोदय शाम 749 चन्द्रोदय की अवधि 6 जनवरी की सुबह 856 तक। 
    दिशाशूल

    रविवार के दिन दिशा शूल पूर्व दिशा में रहेगा। इसका मतलब है कि सोमवार को यदि आप यात्रा पर जाने का सोच रहे हैं तो पूर्व दिशा की यात्रा से बचें। यह दिशा वर्जित मानी जाती है। यदि यात्रा जरूरी होतो दही-जीरा खाकर और दर्पण देखकर यात्रा पर निकलने से नकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं।इस दिन पंचांग में दी गई जानकारी को ध्यान में रखकर अपने कार्यों की योजना बनाना शुभ रहेगा।