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  • इस साल जन्माष्टमी की तिथि को लेकर असमंजस …. पंचांग में देखें सही तारीख और मुहूर्त

    इस साल जन्माष्टमी की तिथि को लेकर असमंजस …. पंचांग में देखें सही तारीख और मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    भगवान श्रीकृष्ण (Lord Sri Krishna) का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (Krishna Paksha Ashtami) तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. इस वजह से हर साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Shri Krishna Janmashtami) इस तिथि को ही मनाते हैं और कोशिश करते हैं कि उस दिन तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी हो. लेकिन ऐसा हर बार हो, यह संभव नहीं है. इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को है या फिर 5 सितंबर को? इस पर कन्फ्यूजन दूर करने के लिए पंचांग से जानते हैं जन्माष्टमी की सही तारीख और मुहूर्त के बारे में.

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि 4 सितंबर को 2:25 एएम पर शुरू हो रही है और 5 सितंबर को 12:13 एएम तक विद्यमान रहेगी. उदयातिथि के आधार पर देखा जाए तो जन्माष्टमी की तिथि 4 सितंबर को पूरे दिन है, वहीं रोहिणी नक्षत्र में रात 11 बजकर 04 मिनट तक है।

    भगवान श्रीकृष्ण जन्म मध्य रात्रि में हुआ था, तो 4 और 5 सितंबर की रात वह समय भी प्राप्त होगा. इस आधार पर इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सिंतबर शुक्रवार को मनाना उत्तम रहेगा. भाद्रपद में और भी कई व्रत-त्योहार हैं।


    वज्र योग और मृगशिरा नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव

    4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के समय मृगशिरा नक्षत्र और वज्र योग होगा. बाल गोपाल भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उत्सव मध्य रात्रि में मनाते हैं. उस दिन हर्षण योग प्रात:काल से लेकर दोपहर 03:44 पी एम तक रहेगा. उसके बाद से वज्र योग प्रारंभ होगा, जो 5 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. वहीं रोहिणी नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 11:04 पी एम तक है, उसके बाद से मृगशिरा नक्षत्र प्रारंभ है।


    जन्माष्टमी मुहूर्त 2026

    इस साल जन्माष्टमी का मुहूर्त रात में 11:57 बजे से लेकर देर रात 12:43 बजे तक है. इसमें भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होगा और उत्सव मनाया जाएगा. जन्माष्टमी का ब्रह्म मुहूर्त 04:30 ए एम से 05:15 ए एम तक रहेगा. इस समय में स्नान करके व्रत का संकल्प कर लें. अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:55 बजे से लेकर दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा. अमृत काल रात में 08:03 पी एम से लेकर 09:33 पी एम तक है.


    जन्माष्टमी व्रत का पारण समय

    जो लोग जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे, वे देर रात 12:43 बजे के बाद पारण करके व्रत को पूरा करेंगे. जिनके यहां उदयाति​थि यानि सूर्योदय के बाद पारण होता है, वे 5 सितंबर को सूर्योदय बाद पारण करेंगे.

    जन्माष्टमी पर राहुकाल कब है?
    जन्माष्टमी के दिन राहुकल सुबह में 10 बजकर 45 मिनट पर प्रारंभ होगा और दोपहर में 12 बजकर 20 मिनट पर खत्म होगा. उस दिन आपको कोई शुभ काम करना है तो राहुकाल का ध्यान रखें. उसमें न करें।

  • देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

    देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    आज देशभर में रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2026) का पावन पर्व मनाया जा रहा है और इसी के साथ आज साल का आखिरी चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) भी लग रहा है. राहत की बात तो यह है कि यह चंद्रग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा, इसी कारण भारत में आज रक्षाबंधन का पर्व पूरी धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है।

    रक्षाबंधन के इस खास दिन पर बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं. वहीं, भाई भी अपनी बहनों की जीवनभर रक्षा करने और हर सुख-दुख में उनका साथ देने का वचन देते हैं. इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा, ऐसे में पूरे दिन राखी बांधना शुभ माना जा रहा है. बहनें सुबह से ही अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी. आइए जानते हैं कि आज राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) कब से कब तक है और इस दिन कौन-कौन से शुभ संयोग बन रहे हैं।


    रक्षाबंधन 2026 की तिथि (Raksha Bandhan 2026 Date)

    पंचांग के मुताबिक, हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार सावन पूर्णिमा की तिथि 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट पर शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 28 अगस्त यानी आज सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर होगा।


    रक्षाबंधन 2026 भद्रा काल का समय (Raksha Bandhan 2026 Bhadra kaal Timing)

    शास्त्रों के मुताबिक, भद्रा के दौरान राखी बांधना बहुत ही अशुभ होता है. हालांकि, इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा. सावन पूर्णिमा पर भद्रा 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर कल रात 9 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो चुकी है. यानी रक्षाबंधन का मुहूर्त शुरू होने से पहले ही भद्रा काल समाप्त हो चुका है.


    रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Raksha Bandhan 2026 Shubh muhurat)

    रक्षाबंधन पर भाई को राखी बांधने का सबसे पहला शुभ मुहूर्त आज सुबह 05 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. यानी भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के लिए बहनों को करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलने वाला है.

    इसके अलावा, अगर आप किसी कारणवश इस मुहूर्त में राखी बांध पाएं तो अभिजीत मुहूर्त भी रहेगा. जिसका समय आज सुबह 11 बजकर 56 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक रहेगा।

    राखी बांधने के कुछ अन्य मुहूर्त भी हैं जैसे-
    शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:28 बजे से 2:03 बजे तक
    अपराह्न काल: दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:16 बजे तक
    चर चौघड़िया: शाम 5:13 बजे से 6:48 बजे तक

    रक्षाबंधन पर बन रहे कई शुभ योग (Raksha Bandhan 2026 Shubh Yog)
    रक्षाबंधन पर आज करीब 11 शुभ योगों का संयोग बन रहा है. शतभिषा नक्षत्र के साथ अतिगंड, शोभन, शिव और विजय जैसे योग बनने की बात कही जा रही है. इसके अलावा चंद्रादि, बुधादित्य, विमल, विपरीत राजयोग, धन, उभयचरी, शकट और सुनफा योग का भी संयोग बताया जा रहा है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ऐसे शुभ योगों में पूजा-पाठ, दान और भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने जैसे धार्मिक कार्यों को विशेष फलदायी माना जाता है. रक्षाबंधन के दिन ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है. सूर्य सिंह राशि में रहेंगे, जबकि गुरु कर्क राशि में स्थित होंगे. ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल, प्रतिष्ठा और ऊर्जा का कारक माना जाता है, वहीं गुरु को ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और समृद्धि से जोड़ा जाता है. चंद्रमा कुंभ राशि में रहेंगे. ऐसे में ग्रहों और नक्षत्रों का यह संयोग रक्षाबंधन को धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टि से खास बना रहा है।


    इस अशुभ मुहूर्त में ना बांधें राखी? (Raksha Bandhan 2026 Rahu kaal Timing)

    हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन पर जिस तरह भद्रा काल का ध्यान रखा जाता है उसी तरह राहु काल का ध्यान रखना चाहिए. राहु काल कल सुबह 10 बजकर 46 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा. वहीं, यमगंड दोपहर 3 बजकर 35 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगा. ऐसे में, ज्योतिषविदों की सलाह है कि रक्षाबंधन पर राहु काल लगने से पहले या बाद में भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधें।


    कैसे मनाएं रक्षाबंधन? (Raksha Bandhan 2026 Rituals)

    रक्षाबंधन के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने इष्टदेव का स्मरण करें. इसके बाद पूजा की थाली सजाएं, जिसमें रोली, चंदन, अक्षत, दही, राखी, मिठाई और घी का दीपक रखें. सबसे पहले भगवान की विधिवत पूजा करें. इसके बाद भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं. राखी बांधते समय इस बात का ध्यान रखें कि भाई और बहन दोनों का सिर ढका होना चाहिए. बहन सिर पर चुनरी रखें और भाई साफ रुमाल या किसी स्वच्छ वस्त्र से अपना सिर ढकें।

    अब भाई के माथे पर रोली या चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत रखें. भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें. इसके बाद भाई की कलाई पर राखी बांधें, आरती उतारें और मिठाई खिलाकर उसके मंगलमय जीवन की प्रार्थना करें. राखी बांधने के बाद माता-पिता और घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद जरूर लें. वहीं, भाई अपनी सामर्थ्य के अनुसार बहन को उपहार या आशीर्वाद दें और जीवनभर उसकी रक्षा व सहयोग का संकल्प लें।


    आखिर कहां से शुरू हुई राखी की परंपरा

    एक समय की बात है कि राजपूत मुस्लिमों के खिलाफ लड़ रहे थे. अपने पति राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ की कमान रानी कर्णावती के हाथों में थी. उस समय गुजरात के बहादुर शाह ने मेवाड़ पर दूसरी बार आक्रमण किया था. कर्णावती ने तब हुमायूं से मदद मांगने के लिए उसे राखी भेजी. हुमायूं उस समय एक युद्ध के बीच में था, मगर रानी के इस कदम ने उसे भीतर से छू लिया. हुमायूं ने अपनी फौज फौरन मेवाड़ के लिए भेज दी. दुर्भाग्‍यवश, उसके सैनिक समय पर नहीं पहुंच पाए और चित्‍तौड़ में राजपूत सेना की हार हुई. रानी ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर (खुद को आग लगा ली) कर लिया. लेकिन हुमायूं की सेना ने चित्‍तौड़ से शाह को खदेड़ कर रानी के पुत्र विक्रमजीत को गद्दी सौंप दी और अपनी राखी का मान रखा।


    देवराज इंद्र और इंद्राणी की राखी

    माना जाता है कि एक बार दैत्‍य वृत्रासुर ने इंद्र का सिंहासन हासिल करने के लिए स्‍वर्ग पर चढ़ाई कर दी. वृत्रासुर बहुत ताकतवर था और उसे हराना आसान नहीं था. युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए उनकी बहन इंद्राणी ने अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांध दिया. इस रक्षासूत्र ने इंद्र की रक्षा की और वह युद्ध में विजयी हुए. तभी से बहनें अपने भाइयों की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर राखी बांधने लगीं।

  • पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!

    पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!


    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म ( Hinduism) में सावन पूर्णिमा (Sawan Purnima) का विशेष महत्व है। इस दिन रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) या राखी का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक है। इस साल सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 09: 09 मिनट पर प्रारंभ हो गई है और 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:47 बजे समाप्त होगी।

    प्रदोष काल और चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि व्याप्त होने के कारण सावन पूर्णिमा व्रत आज 27 अगस्त को है। 27 अगस्त को पूर्णिमा व्रत के दिन भद्रा और पंचक का साया भी रहेगा। इस बार पूर्णिमा तिथि पर चंद्र ग्रहण का संयोग भी बन रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) के कारण सावन पूर्णिमा व्रत के दिन ही रक्षा बंधन मनाया जाएगा और भद्रा के कारण राखी बांधने में अड़चन आएगी या नहीं। आइए जानते हैं रक्षा बंधन कब मनाएं?

    27 या 28 अगस्त कब मनाएं रक्षा बंधन:

    पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, हिंदू धर्म में किसी भी पर्व या त्योहार को उदया तिथि में मनाना सर्वोत्तम माना गया है। सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह प्रारंभ होगी। शास्त्रों में पूर्णिमा व्रत का विधान उस दिन है, दिन समय पूर्णिमा तिथि के साथ चंद्रोदय होता है। ऐसा संयोग 27 अगस्त को ही मिल रहा है। 28 अगस्त को सुबह के समय पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी जिसके कारण पूर्णिमा युक्त चंद्रोदय संभव नहीं है। इसलिए सावन पूर्णिमा का व्रत 27 अगस्त को मान्य रहेगा।

    अगर रक्षा बंधन के पर्व की बात करें तो यह त्योहार हमेशा भद्रा रहित पूर्णिमा में मनाना उत्तम माना गया है। 27 अगस्त को भद्रा सुबह 07 बजे से शाम 06:02 बजे तक रहेगी। 28 अगस्त को सूर्योदय से पूर्व भद्रा समाप्त हो जाएगी और उदया पूर्णिमा मिलेगी। इसलिए उदयाव्यापी पूर्णिमा में रक्षा बंधन और सावन पूर्णिमा का स्नान-दान मनाना उत्तम रहने वाला है। हालांकि इस दिन पंचक भी रहेगा। लेकिन रक्षा बंधन पर भद्रा ज्यादा महत्वपूर्ण मानी गई है। मान्यता है कि भद्रा काल में भाई को राखी बांधने से भाई-बहन दोनों को ही नकारात्मक फलों की प्राप्ति होती है। इसलिए भद्रा के समय राखी बांधने से बचना चाहिए।


    28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:

    28 अगस्त 2026 को भाई की कलाई पर राखी बांधने का सबसे उत्तम और श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 5:57 बजे से सुबह 9:48 बजे तक रहेगा। अगर आप सुबह के समय राखी नहीं बांध पाते हैं तो दोपहर 12:04 बजे से दोपहर 12:53 बजे तक भी राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रहेगा। शुभ मुहूर्त में राखी बांधना अत्यंत शुभ माना गया है। भद्रा विराजमान नहीं होने के कारण 28 अगस्त को पूरे दिन राखी का पर्व मनाया जा सकेगा। हालांकि राहुकाल का विचार अनिवार्य है।

    28 अगस्त को राहुकाल कब से कब तक है:
    ज्योतिष शास्त्र में राहुकाल को शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि इस समय किए गए कार्यों का अशुभ फल प्राप्त होता है। 28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:22 बजे के बीच रहेगा।


    चंद्र ग्रहण का राखी पर असर:

    28 अगस्त को साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लगेगा। भारतीय समयानुसार इस ग्रहण की शुरुआत सुबह 06 बजकर 53 मिनट पर होगी और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगा। यह ग्रहण अपने चरम पर सुबह 09 बजकर 43 मिनट के आसपास होगा। यह ग्रहण दिन में लगेगा, जिसके कारण भारत में यह नजर नहीं आएगा। ग्रहण नहीं दिखने के कारण इसका सूतक काल मान्य नहीं रहेगा। सूतक काल नहीं लगने के कारण चंद्र ग्रहण का राखी के पर्व पर कोई असर नहीं रहेगा।

  • कब मनेगा रक्षाबंधन, क्‍या भद्रा की रहेगी बाधा ? जानिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

    कब मनेगा रक्षाबंधन, क्‍या भद्रा की रहेगी बाधा ? जानिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली। रक्षाबंधन 2026 को लेकर 27 और 28 अगस्त की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस है। वाराणसी पंचांग के अनुसार इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। खास बात यह है कि राखी बांधने के समय भद्रा नहीं रहेगी। ऐसे में बहनों को राखी बांधने के लिए भद्रा खत्म होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

    27 अगस्त को रहेगी भद्रा
    पंडित श्रीपति त्रिपाठी के अनुसार श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 को सुबह 8:31 बजे शुरू होकर 28 अगस्त की सुबह 9:18 बजे तक रहेगी। 27 अगस्त को सुबह 8:31 बजे से रात 8:54 बजे तक भद्रा रहेगी। इसके बाद भद्रा समाप्त हो जाएगी। वहीं 28 अगस्त को रक्षाबंधन के समय भद्रा नहीं होगी। इसलिए इस दिन राखी बांधने में भद्रा की बाधा नहीं मानी जाएगी।

    राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
    रक्षाबंधन पर राखी बांधने का प्रमुख शुभ मुहूर्त सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक रहेगा। यदि यह समय छूट जाए तो अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक भी राखी बांधी जा सकती है।

    भद्रा को क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण?
    हिंदू पंचांग में समय को अलग-अलग करणों में बांटा गया है। इनमें विष्टि करण को भद्रा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा को उग्र प्रकृति वाला समय माना जाता है, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ और अन्य मांगलिक कार्यों में इसका विचार किया जाता है। रक्षाबंधन में भी भद्रा की स्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालांकि 2026 में 27 अगस्त को भद्रा है, जबकि 28 अगस्त को राखी बांधने के समय भद्रा नहीं होगी।

    राखी बांधते समय बोलें यह मंत्र
    राखी बांधते समय इस रक्षासूत्र मंत्र का जाप किया जा सकता है—

    येन बद्धो बलि राजा दानवेंद्रो महाबलः।
    तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

    इसका भावार्थ है कि जिस रक्षा सूत्र से शक्तिशाली राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से तुम्हें बांधती हूं। हे रक्षासूत्र, तुम स्थिर रहो और रक्षा करो।

    भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप भी किया जा सकता है।

    ऐसे करें रक्षाबंधन की पूजा
    रक्षाबंधन के दिन भाई-बहन स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनें। पूजा की थाली में रोली या कुमकुम, अक्षत, फूल, दीपक, धूप, मिठाई और राखी रखें।

    सबसे पहले भगवान का पूजन करें। इसके बाद भाई को तिलक और अक्षत लगाकर दीपक से आरती करें। रक्षासूत्र मंत्र का जाप करते हुए भाई की कलाई पर राखी बांधें। इसके बाद दोनों एक-दूसरे के सुख, स्वास्थ्य और सफलता की कामना करें।

    इस दौरान ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः…’ मंगल श्लोक का पाठ भी किया जा सकता है।

    वाराणसी और मिथिला पंचांग में अंतर
    वाराणसी और मिथिला पंचांग की गणना पद्धति में कुछ अंतर हो सकता है। स्थानीय सूर्योदय और गणना के कारण मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर संभव है। हालांकि 2026 में दोनों परंपराओं में रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाए जाने की बात सामने आती है।

    भाई-बहन के रिश्ते का पर्व है राखी
    रक्षाबंधन केवल राखी बांधने का त्योहार नहीं है। बहन भाई के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु, सुख और सफलता की कामना करती है, जबकि भाई बहन के प्रति प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी का संकल्प लेता है। 2026 में रक्षाबंधन भद्रा रहित पूर्णिमा में मनाया जाएगा। इसलिए 28 अगस्त को राखी बांधते समय भद्रा की बाधा नहीं रहेगी।

  • सावन का महीना आज से शुरू, जानें जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और पूरे महीने के जरूरी नियम

    सावन का महीना आज से शुरू, जानें जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और पूरे महीने के जरूरी नियम


    नई दिल्ली । भगवान शिव को समर्पित पवित्र सावन मास का शुभारंभ आज से हो गया है, जो 28 अगस्त तक चलेगा। हिंदू धर्म में इस पूरे महीने को शिव आराधना, तप, व्रत और भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि सावन में विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा और जलाभिषेक करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस वर्ष सावन के पहले दिन कई शुभ योग भी बन रहे हैं, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।

    आज जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त
    सावन के पहले दिन भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए कई शुभ समय निर्धारित हैं—
    ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:36 बजे से 5:24 बजे तक
    प्रातः संध्या: सुबह 4:39 बजे से 5:41 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:20 बजे से 1:12 बजे तक
    विजय मुहूर्त: शाम 4:28 बजे से 5:29 बजे तक
    प्रदोष काल: शाम 5:32 बजे से रात 8:30 बजे तक

    पहले दिन बन रहे हैं कई शुभ योग
    सावन के आरंभ पर श्रवण नक्षत्र, आयुष्मान योग, शश महापुरुष राजयोग, हंस राजयोग और गुरु-आदित्य राजयोग का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इन योगों में शिव पूजा और जलाभिषेक करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    सावन सोमवार की तिथियां
    3 अगस्त – पहला सावन सोमवार
    10 अगस्त – दूसरा सावन सोमवार
    17 अगस्त – तीसरा सावन सोमवार
    24 अगस्त – चौथा सावन सोमवार

    ऐसे करें भगवान शिव की पूजा
    सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग पर तांबे के पात्र से शुद्ध जल, गंगाजल और कच्चा दूध अर्पित करें। बेलपत्र, धतूरा, भांग, आंकड़े के फूल, शमी के पत्ते, सफेद चंदन, अक्षत और शहद चढ़ाकर धूप-दीप करें। फिर शिव चालीसा, रुद्राष्टकम का पाठ तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। अंत में फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाकर आरती करें।

    सावन में क्या करें
    – प्रतिदिन शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करें।
    – सात्विक भोजन का पालन करें।
    – जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करें।
    – ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का नियमित जाप करें।

    किन बातों से करें परहेज
    – मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और बासी भोजन का सेवन न करें।
    – बाल, नाखून और दाढ़ी कटवाने से बचें।
    – घर में कलह और किसी का अपमान करने से परहेज करें।
    – मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखें।

    सावन का धार्मिक महत्व
    हिंदू मान्यता के अनुसार सावन भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था, जिसके कारण उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष की ज्वाला शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था। तभी से सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक की परंपरा चली आ रही है।

  • देवशयनी एकादशी: 24 या 25 जुलाई? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय

    देवशयनी एकादशी: 24 या 25 जुलाई? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय


    नई दिल्ली। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास की शुरुआत होती है और विवाह, गृह प्रवेश सहित अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल है कि वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 24 जुलाई को मनाई जाएगी या 25 जुलाई को। आइए जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय।

    देवशयनी एकादशी कब है?
    देवशयनी एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई 2026 को सुबह 9:13 बजे से होगी और इसका समापन 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:35 बजे होगा। उदया तिथि के आधार पर देवशयनी एकादशी का व्रत और पर्व 25 जुलाई 2026 (शनिवार) को मनाया जाएगा।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के लिए प्रातःकाल का समय सबसे उत्तम माना गया है।
    प्रातः पूजन मुहूर्त: सुबह 4:17 बजे से 6:10 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:55 बजे तक
    संध्या पूजन मुहूर्त: शाम 7:17 बजे से रात 8:19 बजे तक

    व्रत पारण का समय
    एकादशी व्रत का पारण अगले दिन किया जाता है। इस वर्ष 26 जुलाई 2026 को सुबह 5:40 बजे से 8:20 बजे के बीच व्रत खोलना शुभ माना गया है।

    ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
    देवशयनी एकादशी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

    भगवान विष्णु का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद पीले पुष्प, चंदन, रोली, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। श्रीहरि को पीले फल और सात्विक भोग अर्पित करें तथा भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें। पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करें, एकादशी व्रत कथा का श्रवण या पाठ करें और अंत में धूप-दीप से आरती करें।

    देवशयनी एकादशी पर क्या करें?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, भगवान विष्णु की आराधना, जप-तप और दान का विशेष महत्व है। यदि किसी कारणवश व्रत न रख सकें, तो भी श्रद्धापूर्वक दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है।

    क्या दान करना शुभ माना गया है?
    देवशयनी एकादशी पर अन्नदान को सर्वोत्तम माना गया है। इस दिन चावल, दाल, आटा, घी, गुड़, नमक, फल और सब्जियों का दान करना शुभ माना जाता है।

  • आज शनि प्रदोष व्रत, बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए पूजा का शुभ समय और मुहूर्त

    आज शनि प्रदोष व्रत, बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए पूजा का शुभ समय और मुहूर्त


    नई दिल्ली। आज, 27 जून 2026 को शनि प्रदोष व्रत का विशेष और दुर्लभ संयोग बना है। शनिवार को पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि पर रखा जाने वाला यह व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की आराधना के साथ शनिदेव की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से शिव एवं शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

    शनि प्रदोष व्रत का महत्व
    हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह तिथि शनिवार को आती है, तब इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है और इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव और उनके परिवार की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि, दीर्घायु और मानसिक शांति का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अन्य अशुभ प्रभावों से राहत मिलने की भी मान्यता है।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    प्रदोष व्रत में प्रदोष काल को सबसे शुभ समय माना गया है। आज 27 जून 2026 को प्रदोष काल शाम 7:04 बजे से रात 9:06 बजे तक रहेगा। इसी अवधि में भगवान शिव की पूजा करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। इसके अलावा दिन का अभिजित मुहूर्त दोपहर 1:21 बजे से 2:26 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

    पूजा की विधि
    व्रत के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूरे दिन उपवास का संकल्प लें।

    प्रदोष काल में सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें।

    पूजा के दौरान भगवान शिव को सफेद चंदन, सफेद पुष्प, भांग, धतूरा, अक्षत और शमी पत्र अर्पित करें। चूंकि यह शनि प्रदोष है, इसलिए शमी पत्र का विशेष महत्व माना गया है।

    इसके बाद भगवान गणेश, माता पार्वती, कार्तिकेय और नंदी महाराज का स्मरण करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्री शिवाय नमस्तुभ्यं’ मंत्र का जप करें। अंत में भगवान शिव की आरती कर घर में बनी शुद्ध खीर का भोग अर्पित करें।

    व्रत पारण का समय
    शनि प्रदोष व्रत का पारण अगले दिन 28 जून 2026 को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। श्रद्धालु सुबह 5:49 बजे के बाद व्रत का पारण कर सकते हैं।

    विशेष उपाय
    धन-समृद्धि की कामना रखने वाले श्रद्धालु प्रदोष काल में दूध में केसर मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। वहीं परिवार की सुख-शांति और कष्टों से मुक्ति के लिए जौ के आटे की रोटियां बनाकर गाय के बछड़े को खिलाना शुभ और फलदायी माना गया है।

  • आज ज्येष्ठ का दूसरा बड़ा मंगल, जानिए हनुमान पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

    आज ज्येष्ठ का दूसरा बड़ा मंगल, जानिए हनुमान पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि


    नई दिल्ली ।
    आज 12 मई को ज्येष्ठ माह का दूसरा बड़ा मंगल मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी माह के मंगलवार को भगवान राम और हनुमान जी की पहली भेंट हुई थी। इसलिए ज्येष्ठ के मंगलवार को विशेष रूप से बजरंगबली की पूजा का महत्व माना जाता है।

    मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, पूजा-पाठ करने, दान देने और भंडारा करवाने से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। हालांकि इस बार बड़ा मंगल पंचक काल में पड़ रहा है, जिसके चलते कई लोग पूजा के शुभ समय और पंचक के प्रभाव को लेकर सवाल कर रहे हैं।

    पूजा का शुभ मुहूर्त
    दूसरे बड़े मंगल पर पूजा का शुभ समय सुबह 8:55 बजे से दोपहर 1:59 बजे तक रहेगा। इसके अलावा शाम को भी पूजा की जा सकती है। संध्या पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7:03 बजे से रात 8:06 बजे तक बताया गया है। इस दिन हनुमान जी को चोला चढ़ाना बेहद शुभ माना जाता है।

    पंचक में भी कर सकते हैं पूजा
    इस बार बड़ा मंगल रोग पंचक में पड़ रहा है। सामान्य तौर पर पंचक में शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है, लेकिन ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी की पूजा पंचक में भी की जा सकती है। कहा जाता है कि पंचमुखी हनुमान की आराधना करने से भय, तनाव और शत्रु बाधाएं दूर होती हैं। इस दौरान भंडारा करवाना भी शुभ माना गया है। हालांकि नए मांगलिक कार्य शुरू करने से बचने की सलाह दी गई है।

    ऐसे करें हनुमान जी की पूजा
    बड़ा मंगल पर हनुमान जी को सिंदूर, लाल चंदन और लाल फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। साथ ही चमेली के तेल का दीपक जलाने का भी विशेष महत्व है।

    भक्त इस मंत्र का जाप कर सकते हैं:-
    “ॐ नमो भगवते पंचवदनाय, पूर्वकपि मुखाय, सकल शत्रु संहारणाय स्वाहा।”
    इस दिन हनुमान चालीसा, हनुमान बीसा और सुंदरकांड का पाठ करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है। हालांकि पंचक के दौरान हवन और यज्ञ करने से बचने की सलाह दी गई है।

    इन बातों का रखें ध्यान
    – पूजा के दौरान काले और नीले रंग के कपड़े पहनने से बचें। लाल, पीले और सफेद रंग को शुभ माना गया है।
    – व्रत रखने वाले लोगों को गुस्सा और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए।
    – पूरे दिन सात्विक भोजन करें और मांसाहार व शराब से परहेज रखें।
    – ब्रह्मचर्य का पालन करना भी शुभ माना गया है।

  • 22 अप्रैल का पंचांग स्कंद षष्ठी पर रवि योग और विजय मुहूर्त का विशेष संयोग जानिए शुभ और अशुभ समय

    22 अप्रैल का पंचांग स्कंद षष्ठी पर रवि योग और विजय मुहूर्त का विशेष संयोग जानिए शुभ और अशुभ समय


    नई दिल्ली:
    धार्मिक आस्था और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार 22 अप्रैल का दिन विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस दिन स्कंद षष्ठी का पावन पर्व मनाया जा रहा है यह पर्व भगवान कार्तिकेय को समर्पित होता है जिन्हें भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र के रूप में पूजा जाता है इस अवसर पर श्रद्धालु व्रत रखकर विधि विधान से पूजा अर्चना करते हैं और सुख समृद्धि की कामना करते हैं

    पंचांग के अनुसार यह दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ रहा है जो रात 10 बजकर 49 मिनट तक प्रभावी रहेगी इसके बाद सप्तमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी सूर्योदय सुबह 5 बजकर 49 मिनट पर होगा और सूर्यास्त शाम 6 बजकर 51 मिनट पर निर्धारित है वहीं आर्द्रा नक्षत्र रात 10 बजकर 13 मिनट तक रहेगा जिसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र का आरंभ होगा

    इस दिन का सबसे खास पहलू रवि योग का निर्माण है जो सुबह 5 बजकर 49 मिनट से रात 10 बजकर 13 मिनट तक रहेगा ज्योतिष के अनुसार यह योग शुभ कार्यों के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है हालांकि इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं बन रहा है लेकिन विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 30 मिनट से 3 बजकर 22 मिनट तक रहेगा जो किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की सफलता के लिए उपयुक्त माना जाता है इसके अलावा अमृत काल दोपहर 12 बजकर 57 मिनट से 2 बजकर 26 मिनट तक रहेगा जो अत्यंत शुभ समय माना जाता है

    दिन की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त से होगी जो सुबह 4 बजकर 21 मिनट से 5 बजकर 5 मिनट तक रहेगा यह समय पूजा और ध्यान के लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है वहीं शाम को गोधूलि मुहूर्त 6 बजकर 50 मिनट से 7 बजकर 12 मिनट तक रहेगा जो धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल माना जाता है

    अशुभ समय की बात करें तो राहुकाल दोपहर 12 बजकर 20 मिनट से 1 बजकर 58 मिनट तक रहेगा इस दौरान किसी भी नए या महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है इसके अलावा यमगंड काल सुबह 7 बजकर 27 मिनट से 9 बजकर 4 मिनट तक रहेगा और गुलिक काल सुबह 10 बजकर 42 मिनट से दोपहर 12 बजकर 20 मिनट तक प्रभावी रहेगा दुर्मुहूर्त का समय दोपहर 11 बजकर 54 मिनट से 12 बजकर 46 मिनट तक रहेगा जिसे अशुभ माना जाता है

    इसके साथ ही वर्ज्य काल सुबह 7 बजकर 45 मिनट से 9 बजकर 14 मिनट तक रहेगा इस दौरान भी शुभ कार्यों से परहेज करना उचित माना जाता है ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार सही मुहूर्त का चयन जीवन में सकारात्मक परिणाम लाने में सहायक होता है

     22 अप्रैल का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है जहां एक ओर स्कंद षष्ठी का व्रत और पूजा का विशेष महत्व है वहीं दूसरी ओर शुभ योगों का संयोग इसे और भी खास बनाता है ऐसे में श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे दिन के शुभ और अशुभ समय का ध्यान रखते हुए अपने कार्यों की योजना बनाएं ताकि उन्हें बेहतर फल प्राप्त हो सके

  • अक्षय तृतीया पर बन रहा दुर्लभ योग सोना खरीदने का सबसे शुभ समय और पूजा तरीका

    अक्षय तृतीया पर बन रहा दुर्लभ योग सोना खरीदने का सबसे शुभ समय और पूजा तरीका


    नई दिल्ली । अक्षय तृतीया का पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन को “अबूझ मुहूर्त” भी कहा जाता है, यानी किसी भी शुभ कार्य के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप, तप और पूजा का फल अक्षय होता है, यानी उसका कभी क्षय नहीं होता। इस वर्ष अक्षय तृतीया 2026 का पर्व विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस बार अक्षय तृतीया पर रवि योग, त्रिपुष्कर योग, सौभाग्य योग और आयुष्मान योग जैसे कई शुभ संयोग बन रहे हैं। इसके साथ ही शुक्र ग्रह के अपनी स्वराशि में होने से मालव्य महापुरुष राजयोग और गजकेसरी योग का निर्माण भी हो रहा है, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ गया है।

    पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सुबह 10:48 बजे शुरू होगी और 20 अप्रैल को सुबह 7:27 बजे समाप्त होगी। इस अवधि को अत्यंत शुभ माना गया है और इस दौरान किए गए कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है।

    इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष रूप से की जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था और इसका संबंध सतयुग एवं त्रेतायुग की शुरुआत से भी जोड़ा जाता है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा पांडवों को दिया गया अक्षय पात्र भी इसी दिन की महिमा से जुड़ा माना जाता है।

    पूजा विधि के अनुसार घर में चौकी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सबसे पहले कलश स्थापना कर उनका आह्वान करें। गंगाजल से स्नान कराकर चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें। पीले वस्त्र, फल, मिठाई और विशेष रूप से खीर या सत्तू का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इसके बाद मंत्र जप और आरती करें।

    सोना खरीदने के लिए इस दिन कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। 19 अप्रैल को सुबह 10:49 से 20 अप्रैल की सुबह 05:51 तक सोना खरीदना शुभ माना गया है। इसके अलावा 20 अप्रैल को दोपहर 02:26 से 03:52 तक अमृत मुहूर्त और 02:30 से 03:22 तक विजय मुहूर्त भी बेहद शुभ माना गया है। इस समय किया गया निवेश और खरीदारी विशेष फलदायी मानी जाती है।