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  • बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट में 31 सीटों का मुद्दा उठा, हटाए गए वोट और जीत के अंतर पर मांगा गया विस्तृत डेटा

    बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट में 31 सीटों का मुद्दा उठा, हटाए गए वोट और जीत के अंतर पर मांगा गया विस्तृत डेटा

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई अब विधानसभा चुनाव के नतीजों तक पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान 31 विधानसभा सीटों का मुद्दा सामने आया, जहां भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों की जीत का अंतर उन मतदाताओं की संख्या से कम बताया गया है, जिनके नाम SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए थे।

    मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 31 सीटों पर जीत का अंतर और हटाए गए मतदाताओं की संख्या के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। इसी संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि क्या ऐसी स्थिति में अदालत नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दे सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी पश्चिम बंगाल में दोबारा विधानसभा चुनाव कराने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने संबंधित पक्ष को इस मुद्दे पर औपचारिक आवेदन दाखिल करने को कहा है। साथ ही चुनाव आयोग से SIR से जुड़ी अपीलों का विस्तृत और श्रेणीवार आंकड़ा पेश करने को कहा गया है।

    सुनवाई में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में SIR से संबंधित करीब 38.1 लाख अपीलें दाखिल हुई हैं। इनमें लगभग 7 लाख अपीलें ऐसे लोगों से जुड़ी हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। दूसरी ओर करीब 31 लाख अपीलें मतदाता सूची में लोगों के नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति से संबंधित बताई गई हैं।

    सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा उन अपीलों का है जिन पर अब तक फैसला हो चुका है। अदालत को बताया गया कि करीब 83 हजार अपीलों का निपटारा हुआ है। इनमें 75,443 मामलों में मतदाताओं के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए गए। इसका अर्थ है कि निपटाए गए मामलों में 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में बाहर किए गए मतदाताओं को राहत मिली।

    यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR के दौरान हटाए गए नामों को लेकर पहले से राजनीतिक और कानूनी विवाद चल रहा है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 90 प्रतिशत का आंकड़ा पूरे SIR के तहत हटाए गए मतदाताओं पर लागू नहीं होता। यह केवल अब तक निपटाई गई उन अपीलों से संबंधित है, जिनमें नाम हटाए जाने को चुनौती दी गई थी।

    न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान चुनाव परिणाम और मतदाता सूची के बीच संभावित संबंध को समझाने के लिए एक उदाहरण रखा। उन्होंने कहा कि यदि किसी सीट पर जीत का अंतर 50 वोट हो और 100 मतदाताओं के नाम हटाए गए हों, तो बाद में इनमें से बड़ी संख्या में नाम हटाया जाना गलत पाए जाने पर स्थिति गंभीर हो सकती है।

    यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से लंबित और निपटाई गई अपीलों का विस्तृत विवरण मांगा है। अदालत यह जानना चाहती है कि कितने मामले नाम जोड़ने और कितने मामले नाम हटाने से संबंधित हैं तथा अब तक उनके संबंध में क्या कार्रवाई हुई है।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 80 सीटें मिलीं। सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। चुनाव परिणाम के बाद SIR से जुड़ी मतदाता सूची में बदलाव को लेकर राजनीतिक विवाद और तेज हुआ।

    अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का केंद्र यह तय करना नहीं है कि चुनाव स्वतः रद्द होंगे या नहीं, बल्कि यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि मतदाता सूची से जुड़े विवादों का वास्तविक चुनावी परिणामों पर कितना प्रभाव पड़ा। अदालत के सामने चुनाव आयोग का विस्तृत डेटा आने के बाद इस मामले की कानूनी दिशा और स्पष्ट हो सकती है।

  • सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने टीएमसी छोड़ी, भाजपा और तृणमूल दोनों पर साधा निशाना

    सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने टीएमसी छोड़ी, भाजपा और तृणमूल दोनों पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला है। स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से उनका मोहभंग हो चुका है। अब वे नेताजी के आदर्शों और सिद्धांतों पर आधारित एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच स्थापित करने की योजना बना रहे हैं। उनके इस निर्णय ने राज्य के राजनीतिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

    तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के महज चार माह के भीतर ही उन्होंने पार्टी से अलग होने का मन बना लिया। उन्होंने अप्रैल 2026 में तृणमूल का दामन थामा था। अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा की कार्यशैली में कोई मौलिक अंतर नजर नहीं आता। दोनों ही दल जनहित के बुनियादी मुद्दों को किनारे कर केवल सत्ता केंद्रित राजनीति में लगे हुए हैं, जिससे आम जनता के हित प्रभावित हो रहे हैं।

    अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभवों का जिक्र करते हुए चंद्र कुमार बोस ने कहा कि वे ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के साथ काम कर चुके हैं। इन सभी राजनीतिक यात्राओं के बाद उन्हें अहसास हुआ कि वर्तमान राजनीतिक ढांचा उनके जनसेवा के उद्देश्यों और सोच से मेल नहीं खाता। देश को इस समय समावेशी राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और वास्तविक सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देने वाली राजनीति की सख्त जरूरत है।

    उन्होंने आगे कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचार ही उनकी राजनीति का मुख्य आधार रहे हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए वे एक नई राजनीतिक पहल की नींव रखेंगे। इस नए मंच का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों से जोड़ना और राजनीति में नैतिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना होगा। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक हलकों में भी इस नए विचार को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं, जहां समान विचारधारा वाले लोगों को एकजुट करने की तैयारी है।

    उल्लेखनीय है कि चंद्र कुमार बोस ने वर्ष 2016 में भाजपा की सदस्यता ली थी। वे पार्टी के राज्य उपाध्यक्ष रहने के साथ-साथ विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी भी रहे। हालांकि, नीतियों से असहमति के चलते उन्होंने 2023 में भाजपा से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद अप्रैल 2026 में वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन यह साथ भी महज चार महीने ही चल सका। तृणमूल कांग्रेस की ओर से फिलहाल इस इस्तीफे और बयानों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है।

  • तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर शुभेंदु अधिकारी बोले, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ राज्य आने के लिए हमेशा स्वागत

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में लंबे अंतराल के बाद निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन की सार्वजनिक मौजूदगी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। करीब 19 वर्ष बाद कोलकाता में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उनका स्वागत करते हुए भरोसा दिलाया कि जब भी वह पश्चिम बंगाल आना चाहेंगी, उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इस अवसर को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर केंद्रित साहित्यिक कार्यक्रम में तस्लीमा नसरीन ने हिस्सा लिया। लंबे समय बाद शहर में उनकी सार्वजनिक उपस्थिति ने साहित्य, समाज और राजनीति से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार प्रत्येक लेखक और विचारक के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करती है। उन्होंने तस्लीमा नसरीन को आश्वस्त किया कि वह अपनी इच्छा के अनुसार जितनी बार चाहें पश्चिम बंगाल आ सकती हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि तस्लीमा नसरीन की रचनाओं को बड़ी संख्या में पाठक पढ़ते हैं और साहित्य के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि एक लोकतांत्रिक समाज में लेखकों और बुद्धिजीवियों को अपने विचार रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इसी भावना के तहत राज्य सरकार उनकी यात्रा और सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक इंतजाम करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए तस्लीमा नसरीन ने अपनी वापसी को प्रतीकात्मक बताया। उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद कोलकाता लौटना इस बात का संकेत है कि अन्याय हमेशा कायम नहीं रहता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर आधारित रहा है। उनके अनुसार समाज में स्वतंत्र सोच और अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित वातावरण आवश्यक है।

    तस्लीमा नसरीन वर्ष 1994 से निर्वासन का जीवन जी रही हैं। अपनी लेखनी और विचारों के कारण उन्हें कट्टरपंथी संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिलने के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। बाद के वर्षों में वह भारत सहित विभिन्न देशों में रहीं। वर्ष 2007 में कोलकाता में उनके लेखन को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद उनकी सार्वजनिक रूप से कोलकाता वापसी नहीं हो सकी थी।

    करीब दो दशक बाद उनकी यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने भविष्य के लिए ऐसी दुनिया की उम्मीद जताई, जहां किसी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने के कारण अपना घर या देश छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य समाज में संवाद और विचारों का विस्तार करना है, न कि भय का वातावरण बनाना।

    तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी और राज्य सरकार की ओर से दिए गए सुरक्षा आश्वासन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई चर्चा को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह मुद्दा साहित्यिक और सामाजिक विमर्श के साथ-साथ सार्वजनिक बहस का भी महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

  • नीट धांधली के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई न करने का पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा फैसला

    नीट धांधली के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई न करने का पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा फैसला

    नई दिल्ली । नीट परीक्षा में कथित धांधली और अनियमितताओं को लेकर देश भर में जारी उथल-पुथल के बीच राज्य सरकारों का रुख बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए घोषणा की है कि आंदोलन में भाग लेने वाले सामान्य और निर्दोष छात्रों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या कठोर प्रशासनिक कदम नहीं उठाया जाएगा। हालांकि राज्य के गृह विभाग की ओर से जारी आधिकारिक रुख में यह भी साफ कर दिया गया है कि आपराधिक इतिहास रखने वाले या हिंसा में संलिप्त लोगों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

    राज्य सरकार द्वारा जारी औपचारिक बयान में स्पष्ट किया गया है कि नीट परीक्षा से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और छात्र असंतोष पर काफी गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया है। गहन समीक्षा के बाद प्रशासन ने यह तय किया है कि जो युवा या विद्यार्थी केवल अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर उतरे थे, उनके खिलाफ कोई नई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी और न ही उन्हें बेवजह परेशान किया जाएगा। लेकिन इस सुरक्षा का दायरा केवल निर्दोष विद्यार्थियों तक ही सीमित रहेगा और पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रखने वाले तत्वों पर कानून का शिकंजा कसता रहेगा।

    प्रशासनिक स्तर पर यह कदम सर्वोच्च न्यायालय के हालिया दिशानिर्देशों और न्यायिक टिप्पणियों के अनुरूप उठाया गया है। शीर्ष अदालत ने भी हाल ही में विभिन्न याचिकाओं पर विचार करते हुए साफ कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए, जबकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर जांच एजेंसियां नियमानुसार कार्रवाई जारी रख सकती हैं। इसी के तहत राज्य के गृह विभाग ने अपने पुलिस बलों को निर्देश दिए हैं कि वे पुराने दर्ज मामलों की समीक्षा करें और छात्रों की पहचान सुनिश्चित करके ही आगे की प्रक्रिया बढ़ाएं।

    आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कोलकाता और राज्य के अन्य हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों और अव्यवस्था के सिलसिले में पुलिस में मामला दर्ज किया गया था। इस दर्ज मुकदमे की कड़ी में जांच एजेंसियों ने व्यापक छानबीन की है और अब तक कई संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर उन लोगों की पहचान की जा रही है जिन्होंने प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भड़काने या पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों पर हमला करने का प्रयास किया था।

    उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल से पहले पूर्वोत्तर राज्य असम और पड़ोसी राज्य बिहार की सरकारों ने भी इसी तरह का उदार रुख अपनाया था। दोनों राज्यों ने घोषणा की थी कि परीक्षा में धांधली के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों और आम नागरिकों पर दर्ज मामलों को वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। राज्य सरकारों का मानना है कि छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत किए गए प्रदर्शनों पर दंडात्मक रुख अपनाना उचित नहीं है, बशर्ते उसमें किसी असामाजिक तत्व की साजिश शामिल न हो।

    देशव्यापी स्तर पर नीट परीक्षा को लेकर मचा बवाल जुलाई के अंतिम सप्ताह में केंद्रीय स्तर पर हुए बड़े घटनाक्रमों के बाद थमता नजर आया था। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद त्यागने के बाद विभिन्न संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ सरकार के दो दौर की सकारात्मक बातचीत हुई थी। उस वार्ता के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों ने यह सहमति व्यक्त की थी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को निरस्त किया जाएगा, पुलिसिया उत्पीड़न रोका जाएगा और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त कानून लाया जाएगा। अब राज्य सरकारें उसी समझौते और न्यायिक आदेशों का क्रियान्वयन कर रही हैं।

  • कोविड महामारी के दौरान मिले केंद्रीय कोष और उपकरणों के अप्रयुक्त रहने तथा वित्तीय अनियमितताओं पर विपक्षी दल ने जताई आपत्ति

    कोविड महामारी के दौरान मिले केंद्रीय कोष और उपकरणों के अप्रयुक्त रहने तथा वित्तीय अनियमितताओं पर विपक्षी दल ने जताई आपत्ति

    नई दिल्ली । राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नवीनतम रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। प्रतिवेदन में स्वास्थ्य सेवाओं, प्राकृतिक आपदा राहत वितरण तथा बजटीय आवंटन के निष्पादन में कई स्तरों पर पाई गई कमियों को रेखांकित किया गया है। महामारी के संवेदनशील दौर में उपलब्ध कराए गए संसाधनों के पूर्ण उपयोग न होने और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में अनुपालन की अनिमितताओं पर विपक्षी दलों ने कड़ा रुख अपनाते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की है।

    लेखा परीक्षा रिपोर्ट के मुख्य अंशों के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटित बजट का एक बड़ा हिस्सा निर्धारित समय सीमा तक अप्रयुक्त पड़ा रहा। वैश्विक महामारी के समय उपलब्ध कराए गए महत्वपूर्ण चिकित्सा संसाधनों, जैसे ऑक्सीजन संयंत्रों और सघन चिकित्सा इकाई उपकरणों के कई केंद्रों पर चालू न होने का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त, गंभीर प्राकृतिक आपदाओं के उपरांत राहत राशि के पुनरावृत्त वितरण के मामले भी सामने आए हैं, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा। इन निष्कर्षों ने आपदा प्रबंधन और लाभार्थी सत्यापन प्रणालियों की दक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    प्रतिवेदन में औद्योगिक विकास हेतु भूमि आवंटन और विभिन्न राज्य स्तरीय कल्याणकारी योजनाओं के संचालन में भी प्रक्रियागत त्रुटियों की ओर संकेत किया गया है। निर्धारित नियमों का पूरी तरह पालन न होने से हुए वित्तीय नुकसान के साथ-साथ राज्य के समग्र राजकोषीय घाटे और बढ़ते ऋण भार को लेकर चिंता जताई गई है। बजट के एक बड़े हिस्से का वर्ष के अंत तक बिना खर्च हुए रह जाना और अतिरिक्त व्यय के लिए आवश्यक विधायी स्वीकृतियों के लंबित रहने को वित्तीय अनुशासन के दृष्टिकोण से गंभीर माना जा रहा है।

    संसदीय पटल पर रिपोर्ट की प्रति रखे जाने के उपरांत मुख्य विपक्षी दल ने इन निष्कर्षों को प्रशासनिक विफलता करार देते हुए कड़े दंडात्मक कदमों की मांग की है। विपक्षी प्रतिनिधियों का कहना है कि जनकल्याणकारी योजनाओं में पाई गई यह ढिलाई राज्य के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। दूसरी ओर, प्रशासनिक सूत्रों का तर्क है कि ऑडिट रिपोर्ट में उठाए गए अधिकांश बिंदु प्रक्रियागत और तकनीकी प्रकृति के हैं, जिन पर विभागीय समीक्षा के माध्यम से स्थिति स्पष्ट की जाएगी। फिलहाल, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

  • पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के पांच मंजिला कार्यालय पर प्रशासन की कार्रवाई, सुरक्षा के बीच चला बुलडोजर

    पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के पांच मंजिला कार्यालय पर प्रशासन की कार्रवाई, सुरक्षा के बीच चला बुलडोजर

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को उस समय हलचल मच गई जब दक्षिण 24 परगना जिले के अमताला-बारुईपुर रोड स्थित तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के कथित अवैध रूप से निर्मित सांसद कार्यालय पर प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू कर दी। पांच मंजिला इमारत को गिराने के लिए प्रशासन ने भारी मशीनरी और तीन बुलडोजर तैनात किए। कार्रवाई के दौरान पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए और बड़ी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी रही ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।

    जिला प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार संबंधित भवन को अवैध निर्माण की श्रेणी में पाया गया था। प्रशासन का कहना है कि भवन स्वामी और संबंधित पक्ष को पहले नोटिस जारी कर निर्माण से जुड़े वैध दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया था। अधिकारियों के मुताबिक निर्धारित समय सीमा के भीतर आवश्यक दस्तावेज या संतोषजनक जवाब उपलब्ध नहीं कराया गया, जिसके बाद नियमानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का निर्णय लिया गया। प्रशासन का दावा है कि पूरी प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों के तहत की जा रही है।

    शनिवार सुबह जैसे ही बुलडोजर कार्यालय परिसर पहुंचे, बड़ी संख्या में स्थानीय लोग मौके पर एकत्र होने लगे। कुछ ही देर में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी घटनास्थल पर पहुंच गए, जिससे इलाके में तनाव का माहौल बन गया। स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी बढ़ा दी गई। अधिकारियों ने लोगों से शांति बनाए रखने और प्रशासनिक कार्रवाई में सहयोग करने की अपील की।

    जानकारी के अनुसार यह कार्यालय पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद से बंद पड़ा था। इससे पहले डायमंड हार्बर संसदीय क्षेत्र से जुड़े कई संगठनात्मक कार्यक्रम, बैठकों और राजनीतिक गतिविधियों का संचालन इसी कार्यालय से किया जाता था। स्थानीय स्तर पर यह भवन तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है।

    इस कार्रवाई के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रशासन जहां इसे अवैध निर्माण के विरुद्ध सामान्य कानूनी कार्रवाई बता रहा है, वहीं राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप तेज होने की संभावना जताई जा रही है। मामले को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं पर भी नजर बनी हुई है। फिलहाल प्रशासन की निगरानी में भवन को ध्वस्त करने का कार्य जारी है और पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था सख्त रखी गई है। संबंधित पक्ष की ओर से इस कार्रवाई पर आधिकारिक विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है।

  • बिहार-बंगाल समेत पूर्वोत्तर में आज भारी बारिश का अलर्ट… अन्य हिस्सों में साफ रहेगा मौसम

    बिहार-बंगाल समेत पूर्वोत्तर में आज भारी बारिश का अलर्ट… अन्य हिस्सों में साफ रहेगा मौसम


    नई दिल्ली।
    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मंगलवार, 14 जुलाई को पूर्वोत्तर भारत (Northeast India), बिहार (Bihar) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) में एक और दिन भारी बारिश (Heavy rain) का अनुमान लगाया है. वहीं उत्तर-पश्चिम, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के ज्यादातर हिस्सों में मॉनसून की गतिविधियां कमजोर रहने की उम्मीद है।

    मौसम का यह पैटर्न दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में चल रहे ठहराव को दिखाता है, जिसमें मॉनसून ट्रफ हिमालय की तलहटी के करीब खिसक रही है. नतीजतन, भारी बारिश की गतिविधियां देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर हिस्सों में केंद्रित हो गई हैं, जबकि अन्य बड़े हिस्सों में बारिश कमजोर पड़ गई है।

    IMD के अनुसार, अगले तीन से चार दिनों तक पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल और बिहार में कुछ जगहों पर भारी से बहुत भारी बारिश जारी रहेगी।

    सबसे अधिक बारिश मेघालय में होने की उम्मीद जताई जा रही है, जहां कुछ जगहों पर 20 सेमी से अधिक बारिश हो सकती है. उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम के कुछ हिस्सों में भी तेज बारिश की संभावना है.

    यह अनुमान पिछले 24 घंटों में हुई भारी बारिश के बाद लगाया गया है. उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में बहुत ज़्यादा बारिश दर्ज की गई, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, मेघालय और त्रिपुरा में बहुत भारी बारिश हुई है. अरुणाचल प्रदेश, गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से भी 7 से 11 सेमी के बीच भारी बारिश की सूचना मिली है.

    IMD ने इस लगातार बारिश का कारण कई सक्रिय मौसम प्रणालियों को बताया है, जिनमें श्री गंगानगर से मणिपुर तक फैली मॉनसून ट्रफ, दक्षिण बांग्लादेश, उत्तरी बंगाल की खाड़ी और पूर्वी बांग्लादेश के ऊपर साइक्लोनिक सर्कुलेशन, और उत्तर-पश्चिम बिहार से मणिपुर तक फैली एक ट्रफ शामिल हैं. मध्य पाकिस्तान के ऊपर बना एक पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) भी उत्तरी भारत के मौसम को प्रभावित कर रहा है.

  • राज्यसभा उपचुनावः बंगाल में ममता के साथ खेला…BJP ने TMC से आए तीनों सांसदों को बनाया उम्मीदवार

    राज्यसभा उपचुनावः बंगाल में ममता के साथ खेला…BJP ने TMC से आए तीनों सांसदों को बनाया उम्मीदवार


    नई दिल्ली।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal) में चुनाव आयोग (Election Commission) ने खाली हुई राज्यसभा (Rajya Sabha) की तीन सीटों पर उपचुनाव (By-election) की घोषणा कर दी है. इस हादसे की सबसे दिलचस्प बात ये है कि उपचुनाव के बाद भी संसद के उच्च सदन में भेजने वाले चेहरे वही रहने की उम्मीद है, बस उनकी पार्टी का रंग बदल चुका है।

    BJP इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रही है. दूसरी तरफ, आपसी गुटबाजी और बिखराव से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस के सामने राज्यसभा में अपनी ताकत और कम होने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

    जून में टीएमसी के तीन पूर्व राज्यसभा सांसदों- सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक ने अपनी ही पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार के बाद इन नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल उठाए थे।


    बीजेपी में शामिल होते ही उम्मीदवार घोषित

    सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक अब ये बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. उन्होंने आज ही बीजेपी जॉइन की और पार्टी ने आज ही उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना दिया है।

    संसदीय नियमों के मुताबिक, सुखेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाइक का कार्यकाल सितंबर 2029 तक था, जबकि सुष्मिता देव का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक चलना था. अब इन खाली सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहे हैं और यही तीनों नेता एक बार फिर उम्मीदवार होंगे. सिर्फ उनकी पार्टी नई होगी।


    विधानसभा का गणित: बीजेपी का पलड़ा भारी

    बंगाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो नंबर गेम पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ है. 294 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास अपने 208 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव के सिस्टम के मुताबिक, तीन सीटों वाले इस उपचुनाव में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए लगभग 70 वोटों की जरूरत होगी।

    बीजेपी के पास विधायकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वो बिना किसी बाहरी समर्थन के अपने तीनों उम्मीदवारों को आसानी से 70, 69 और 69 वोट दिला सकती है. इस गणित के कारण बीजेपी की तीनों सीटों पर जीत पूरी तरह पक्की मानी जा रही है.


    दो गुटों में बंटी टीएमसी, चुनौती बड़ी

    बीजेपी के इस बड़े ‘खेले’ के सामने टीएमसी बेबस नजर आ रही है. किसी भी विरोधी उम्मीदवार को जीतने के लिए कम से कम 70 वोटों की जरूरत होगी. वैसे तो टीएमसी के टिकट पर जीते विधायकों की कुल संख्या अभी भी करीब 80 है. लेकिन पार्टी के भीतर मचे घमासान ने इसे कमजोर कर दिया है. टीएमसी के विधायक अब दो धड़ों में बंट चुके हैं- एक खेमा ममता बनर्जी के साथ है, तो दूसरा बागी गुट विधानसभा में विपक्ष के नेता रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर टीएमसी एकजुट होती, तो वह कम से कम एक सीट के लिए मुकाबला कड़ा कर सकती थी. लेकिन अंदरूनी लड़ाई इतनी बढ़ चुकी है कि दोनों गुटों के बीच किसी आम सहमति की गुंजाइश खत्म हो गई है. बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पहले ही रीताब्रत बनर्जी का समर्थन किया था और अब उनके साथ करीब 65 विधायक हैं।


    ‘विश्वासघात’ बनाम ‘नेतृत्व का संकट’

    ममता बनर्जी का खेमा इस नुकसान को कम आंकने की कोशिश कर रहा है. उनका कहना है कि ये उन नेताओं का ‘विश्वासघात’ है जिन्होंने संकट के समय पार्टी को छोड़ दिया. टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘ये सीटें टीएमसी की थीं, जो पिछले चुनाव में पार्टी की ताकत के दम पर जीती गई थीं. कुछ लोगों ने मुश्किल समय में पार्टी छोड़ दी, बंगाल की जनता सब देख रही है।

    दूसरी तरफ, बागी गुट के नेताओं का कहना है कि ये कोई आम इस्तीफा नहीं है, बल्कि ये पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेकर अविश्वास का नतीजा है. उन्होंने कहा, ‘नेतृत्व ने संगठन के भीतर से मिल रही चेतावनियों को नजरअंदाज किया, जिसका नतीजा विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. असली मुद्दा राज्यसभा सीट का नहीं, बल्कि ये है कि चुने हुए प्रतिनिधियों का अब मौजूदा नेतृत्व पर भरोसा क्यों नहीं रहा।

    फिलहाल, दोनों गुटों के बीच टीएमसी के नाम, सिंबल और संगठन पर कब्जे की लड़ाई चुनाव आयोग के सामने लंबित है. अगर 24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव में बीजेपी इन तीनों सीटों पर जीत हासिल करती है, तो राज्यसभा में उसकी ताकत बढ़ेगी और टीएमसी का कद घटेगा।

  • बंगाल: शुभेंदु अधिकारी का धर्मांतरण विरोधी कानून, UCC और NRC लागू करने का ऐलान, विपक्ष ने साधा निशाना

    बंगाल: शुभेंदु अधिकारी का धर्मांतरण विरोधी कानून, UCC और NRC लागू करने का ऐलान, विपक्ष ने साधा निशाना


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने शुक्रवार को बड़ा राजनीतिक ऐलान करते हुए कहा कि राज्य सरकार जल्द ही धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून लाएगी। इसके साथ ही उन्होंने समान नागरिक संहिता (UCC) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। उनके इस बयान के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने भाजपा सरकार पर विपक्ष को डराने और दमनकारी कानून लाने का आरोप लगाया।

    रवींद्र सदन में ‘वंदे मातरम्’ गीत की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सीमा पार से होने वाली अवैध घुसपैठ राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव और कथित “लव जिहाद” जैसी समस्याओं का प्रमुख कारण है।

    उन्होंने कहा, “हमें थोड़ा समय दीजिए। बंगाल में धर्मांतरण विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (UCC) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) निश्चित रूप से लागू किए जाएंगे। जो लोग अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर देश की संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं, उन्हें वापस भेजा जाएगा।”

    मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत नागरिकता प्रदान की जाएगी। इसके अलावा उन्होंने घोषणा की कि वर्ष 1975 के आपातकाल का विरोध करने वाले लोकतंत्र सेनानियों को 9 अगस्त को राज्य स्तर पर सम्मानित किया जाएगा। इस दौरान उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र भवानीपुर में भाजपा के नए कार्यालय का उद्घाटन भी किया।

    महुआ मोइत्रा का जवाब
    मुख्यमंत्री के बयान और विधानसभा में प्रस्तावित विधेयकों को लेकर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक के बाद सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को डराने की कोशिश कर रही है, लेकिन जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

    महुआ मोइत्रा ने प्रस्तावित **बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026** को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर बिना न्यायिक सुनवाई के एक वर्ष तक हिरासत में रखा जा सकता है।

    उन्होंने दावा किया कि यह प्रस्तावित कानून आपातकाल के दौरान लागू रहे मीसा (MISA) और मौजूदा यूएपीए (UAPA) से भी अधिक कठोर है तथा इसमें पर्याप्त न्यायिक सुरक्षा प्रावधान नहीं हैं।

    भाजपा ने किया पलटवार
    टीएमसी के आरोपों को खारिज करते हुए भाजपा नेताओं ने कहा कि विपक्ष सत्ता खोने के बाद जनता के बीच भ्रम और भय का माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। भाजपा का कहना है कि प्रस्तावित **एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026** का उद्देश्य गुजरात और उत्तर प्रदेश की तर्ज पर संगठित अपराध, सिंडिकेट राज, जबरन वसूली और राजनीतिक हिंसा पर प्रभावी नियंत्रण करना है। भाजपा के अनुसार, प्रस्तावित कानून में दंगों और हिंसक प्रदर्शनों के दौरान सरकारी एवं निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों से क्षति की भरपाई कराने का भी प्रावधान किया गया है।

  • बंगाल: TMC में सब कुछ ठीक नहीं…. टूट की अटकलें तेज…. 50 MLA छोड़ सकते हैं पार्टी !

    बंगाल: TMC में सब कुछ ठीक नहीं…. टूट की अटकलें तेज…. 50 MLA छोड़ सकते हैं पार्टी !


    कोलकाता।
    तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress- TMC ) में सब ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने सोमवार को ही दो विधायकों को निष्कासित कर दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ, जब पार्षदों लगातार पद छोड़ रहे हैं। वहीं, टीएमसी के कार्यक्रमों से बड़े नेता दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। अब अटकलें ये भी हैं कि टीएमसी के 50 विधायक (50 MLAs) टूट सकते हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है।

    संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, अटकलें हैं कि 50 विधायक तृणमूल कांग्रेस छोड़ सकते हैं और पार्टी टूट सकती है। विधायकों के निष्कासन के बाद टीएमसी के बाद विधानसभा में सदस्यों की संख्या 78 पर आ गई है। चर्चाएं हैं कि रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा के जरिए नई तृणमूल बनाई जा सकती है। हालांकि, इसे लेकर किसी भी नेता ने सार्वजनिक रूप से अब तक कुछ नहीं कहा है।


    महाराष्ट्र जैसा होगा हाल

    अगर टीएमसी के 50 विधायक अलग होकर दूसरा धड़ बनाते हैं तो बंगाल में महाराष्ट्र की राजनीति का रीकैप देखने को मिल सकता है। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना से जब एकनाथ शिंदे (अब उप मुख्यमंत्री) विधायकों के साथ अलग हुए थे, तो ठाकरे ने शिवसेना का नाम और चिह्न गंवा दिए थे। ऐसा ही दिग्गज नेता शरद पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ हुआ था।


    क्यों 2 विधायकों पर हुआ ऐक्शन

    दोनों विधायकों को भेजे गए पत्र में कहा गया है, ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के संज्ञान में सक्षम प्राधिकारी के माध्यम से यह बात लाई गई है कि तृणमूल की तरफ से नामित उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के बावजूद आप पार्टी के अधिकृत नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों में शामिल होने में बार-बार विफल रहे हैं और आपने खुद को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल किया है।’

    पार्टी उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, ‘यह भी पाया गया है कि आप ऐसी गतिविधियों में शामिल रहे हैं और आपने ऐसे बयान दिए हैं, जो तृणमूल कांग्रेस के हितों के प्रतिकूल हैं।’ पत्र में कहा गया है कि मामले पर समुचित विचार-विमर्श के बाद ‘तृणमूल कांग्रेस के सक्षम प्राधिकारी ने आपको पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से निष्कासित करने का फैसला किया है।’


    शुभेंदु अधिकारी ने किया 2 विधायकों का जिक्र

    मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दो टीएमसी विधायकों का जिक्र किया था। इनमें हावड़ा के उलुबेरिया पूर्व सीट जीतने वाले रीताब्रत बनर्जी और मध्य कोलकाता के एंटाली से विधायक संदीपन साहा थे। उन्होंने कहा था कि इनकी तरफ से दर्ज कराई गई शिकायतों के आधार पर ही विधानसभा सचिवालय ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता घोषित करने के लिए तृणमूल विधायक दल के जाली हस्ताक्षर का मामला हरे स्ट्रीट पुलिस थाने में दर्ज कराया था।

    मुख्यमंत्री ने कहा, ‘यह जांच भाजपा द्वारा शुरू नहीं की गई थी। यह तृणमूल कांग्रेस के दो विधायकों द्वारा 27 मई को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष दर्ज कराई गई शिकायत के बाद की कार्रवाई थी। विधायकों ने आरोप लगाया था कि छह मई को हुई उनकी पार्टी की बैठक में विपक्ष के नेता के चयन के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था। उन्होंने शिकायत की थी कि 70 विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित उनकी पार्टी का समर्थन पत्र फर्जी और मनगढंत है, जिसमें से 14 हस्ताक्षर बड़े अक्षरों में किए गए हैं।’