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  • दिशा सालियान मामले में पिता सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे और अनिल देशमुख से 500 करोड़ रुपये हर्जाना मांगा

    दिशा सालियान मामले में पिता सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे और अनिल देशमुख से 500 करोड़ रुपये हर्जाना मांगा

    नई दिल्ली । दिशा सालियन मामले में उनके पिता सतीश सालियन की ओर से शिवसेना यूबीटी नेता आदित्य ठाकरे और एनसीपी नेता अनिल देशमुख को 500 करोड़ रुपये के हर्जाने का कानूनी नोटिस भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। नोटिस में दोनों नेताओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग भी की गई है। यह मामला दिशा सालियन की मौत से जुड़ा है, जिनकी 8 जून 2020 को मुंबई में एक ऊंची इमारत से गिरने के बाद मौत हुई थी। दिशा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर थीं।

    सतीश सालियन ने नोटिस में आरोप लगाया है कि उनकी बेटी की मौत की सच्चाई जानने और न्याय की मांग को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की गई। उनके अनुसार, उनके बारे में ऐसी बातें कही गईं जिनसे उनकी छवि प्रभावित हुई और उनके इरादों पर सवाल उठे। उन्होंने इन बातों को गलत और बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि उनकी मांग का उद्देश्य केवल अपनी बेटी की मौत की सच्चाई सामने लाना है और इसे किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

    नोटिस में आदित्य ठाकरे पर भी सतीश सालियन के न्याय के लिए चल रहे संघर्ष को राजनीति से जोड़कर पेश करने का आरोप लगाया गया है। नोटिस के मुताबिक, इस तरह उनके संघर्ष और उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़े हुए। सतीश सालियन ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपनी बेटी के लिए न्याय की मांग की है और उनकी इस लड़ाई को राजनीतिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    कानूनी नोटिस में दिशा सालियन मामले की सीबीआई जांच को लेकर दिए गए एक बयान का भी उल्लेख किया गया है। इसमें आदित्य ठाकरे के उस कथित बयान का जिक्र है, जिसमें कहा गया था कि सीबीआई ने मामले की जांच की और उन्हें क्लीन चिट दी। नोटिस भेजने वाले पक्ष ने इस दावे को गलत बताया है। इसी क्रम में अनिल देशमुख के 23 मार्च 2025 के कथित बयान का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें दिशा सालियन मामले को आदित्य ठाकरे को बदनाम करने की साजिश बताया गया था।

    सतीश सालियन ने 500 करोड़ रुपये के हर्जाने के अलावा दोनों नेताओं से बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग की है। नोटिस में यह भी कहा गया है कि माफी सार्वजनिक रूप से दी जाए और उसे टीवी, अखबार तथा डिजिटल मीडिया में प्रसारित किया जाए। इसके साथ ही वीडियो के माध्यम से माफी देने और उसे दोनों नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी करने की मांग भी रखी गई है।

    इस बीच आदित्य ठाकरे ने दिशा सालियन से किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि वह दिशा से कभी नहीं मिले और उन्हें जानते भी नहीं थे। उनके मुताबिक, करीब छह वर्षों से कुछ लोग उनका नाम इस मामले से जोड़ रहे हैं। उन्होंने इसे अपनी छवि खराब करने की कोशिश बताया और कहा कि मामले की आधिकारिक दोबारा जांच को राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए।

    मामले में सोमवार को सीबीआई की ओर से एफआईआर दर्ज किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसमें हत्या और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं। दिशा सालियन की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड में एक ऊंची रिहायशी इमारत से गिरने के बाद हुई थी। उनकी मौत को लेकर पहले भी अलग-अलग दावे और आरोप सामने आते रहे हैं।

  • ट्विशा शर्मा मौत मामले में पूर्व जज गिरिबाला सिंह की जमानत पर हाईकोर्ट में सुनवाई, CBI ने मांगा एक सप्ताह का समय

    ट्विशा शर्मा मौत मामले में पूर्व जज गिरिबाला सिंह की जमानत पर हाईकोर्ट में सुनवाई, CBI ने मांगा एक सप्ताह का समय


    जबलपुर:
     एक्ट्रेस और मॉडल ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में पूर्व जज गिरिबाला सिंह की नियमित जमानत याचिका पर मंगलवार को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। करीब तीन सप्ताह से लंबित याचिका पर अदालत ने दोनों पक्षों की ओर से पेश वकीलों की दलीलें सुनीं। सुनवाई के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसी ने मामले में जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा।

    गिरिबाला सिंह फिलहाल जेल में बंद हैं। उन्होंने अपनी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए नियमित जमानत की मांग की है। मंगलवार की सुनवाई में उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेंद्र सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत के सामने गिरिबाला सिंह की उम्र और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत दिए जाने की दलील रखी।

    गिरिबाला सिंह के वकील के मुताबिक, उनकी मुवक्किल की ओर से ऐसा कोई कृत्य नहीं किया गया है, जिसके आधार पर उन्हें अपराध में संलिप्त माना जाए। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि ट्विशा शर्मा ने आत्महत्या की थी। वकील ने गिरिबाला सिंह की ओर से किसी तरह की गलती किए जाने से इनकार किया।

    सुनवाई के दौरान CBI की ओर से अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया। एजेंसी ने कहा कि वह मामले की केस डायरी अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना चाहती है और जमानत याचिका पर अपनी आपत्ति भी दर्ज कराना चाहती है। इसके लिए एक सप्ताह का समय मांगा गया।

    अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं। इसके बाद मामले की आगे की सुनवाई के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया। फिलहाल गिरिबाला सिंह की नियमित जमानत याचिका पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। उनकी जमानत का निर्णय अगली सुनवाई में CBI के जवाब और मामले से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़ेगा।

    मामले के अनुसार, ट्विशा शर्मा 12 मई को अपने ससुराल में फंदे से लटकी हुई पाई गई थीं। उनकी मौत के बाद मामले की जांच आगे बढ़ी और गिरिबाला सिंह तथा उनके बेटे समर्थ सिंह को गिरफ्तार किया गया। दोनों पर दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा से जुड़े आरोप लगाए गए हैं।

    फिलहाल गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह जेल में हैं। इसी मामले में गिरिबाला सिंह की ओर से नियमित जमानत के लिए अदालत का रुख किया गया है। मंगलवार को हुई सुनवाई में बचाव पक्ष ने उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ी परिस्थितियों को जमानत के पक्ष में रखा, जबकि CBI ने जवाब और केस डायरी प्रस्तुत करने के लिए समय मांगा।

    अदालत द्वारा अगली सुनवाई के लिए एक सप्ताह का समय दिए जाने के बाद अब मामले में CBI का जवाब महत्वपूर्ण होगा। इसके बाद अदालत जमानत याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलों और जांच से जुड़े रिकॉर्ड के आधार पर आगे सुनवाई करेगी। अभी पूर्व जज गिरिबाला सिंह को जमानत नहीं मिली है और वह न्यायिक हिरासत में हैं।

  • आरजी कर केस में पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ ने सीबीआई जांच पर उठाए सवाल, डॉक्टरों की गिरफ्तारी को लेकर भी बोलीं

    आरजी कर केस में पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ ने सीबीआई जांच पर उठाए सवाल, डॉक्टरों की गिरफ्तारी को लेकर भी बोलीं


    नई दिल्ली ।
    कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में पीड़िता की मां और बीजेपी विधायक रत्ना देबनाथ ने जांच की प्रगति पर असंतोष जताया है। उन्होंने कहा कि बेटी की मौत के बाद परिवार को न्याय की उम्मीद थी, लेकिन अब भी उन्हें लगता है कि न्याय दिलाने की प्रक्रिया पर्याप्त गति से आगे नहीं बढ़ रही है।

    बैरकपुर में बुधवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान रत्ना देबनाथ ने कहा कि वह मूल रूप से राजनीति में आने की इच्छुक नहीं थीं। उनका परिवार सामान्य जीवन जी रहा था और उनके पति का कारोबार था। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने भी उन्हें राजनीति में आने से दूर रहने की सलाह दी थी।

    रत्ना देबनाथ के अनुसार, बेटी की दर्दनाक मौत के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। उस समय परिवार को यह भरोसा दिलाया गया था कि सरकार बदलने के बाद राज्य में हालात बेहतर होंगे और मामले में न्याय की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार बदल गई है तो क्या वास्तव में जमीन पर स्थिति में भी बदलाव आया है।

    बीजेपी विधायक ने सीबीआई की जांच को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है कि वह जांच की वर्तमान प्रगति से संतुष्ट नहीं हैं। अदालत की ओर से मामले में नई विशेष जांच टीम गठित किए जाने के बाद भी उन्होंने जांच की दिशा और गति को लेकर सवाल उठाए।

    उन्होंने मामले में डॉक्टरों की भूमिका से जुड़े मुद्दे पर भी सवाल खड़ा किया। रत्ना देबनाथ के मुताबिक, उन्हें बताया गया कि आरोपी डॉक्टर हैं और उन्हें इस तरह गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत में इस तरह की बात सामने आई थी कि डॉक्टरों को सीधे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

    इस पर रत्ना देबनाथ ने सवाल किया कि यदि कोई डॉक्टर अपराध में शामिल है और उनकी बेटी की हत्या से उसका संबंध सामने आता है तो केवल डॉक्टर होने के आधार पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी भी डॉक्टर थी और परिवार के लिए यह समझना कठिन है कि किसी पेशे से जुड़े व्यक्ति पर अपराध का आरोप होने के बावजूद कानूनी प्रक्रिया में अलग मानक क्यों अपनाया जाए।

    रत्ना देबनाथ ने यह भी कहा कि उनका परिवार शुरुआत में राजनीति में शामिल नहीं होना चाहता था। उनकी प्राथमिकता अपनी बेटी के लिए न्याय हासिल करना थी। उन्होंने बताया कि उन्हें राज्य की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी चिंताएं बताई गई थीं और इन्हीं परिस्थितियों के बीच वह सार्वजनिक जीवन में आईं।

    आरजी कर मामला अगस्त 2024 में सामने आया था, जब अस्पताल के सेमिनार हॉल में एक महिला डॉक्टर का शव मिला था। घटना के बाद पूरे देश में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे और अस्पतालों में चिकित्सकों की सुरक्षा तथा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।

    मामले की जांच को लेकर लंबे समय से विभिन्न स्तरों पर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई चलती रही है। अब पीड़िता की मां के ताजा बयान ने जांच की गति और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर बहस फिर तेज कर दी है। रत्ना देबनाथ ने स्पष्ट किया कि सरकार बदलने के बावजूद उनके परिवार की न्याय की प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई है। उनके बयान से यह भी सामने आया कि परिवार अब भी मामले में व्यापक और प्रभावी कानूनी कार्रवाई की उम्मीद कर रहा है।

  • ईडी के 715 करोड़ रुपये मामले में रिलायंस पावर को नोटिस, नकारात्मक खबर के बीच शेयर पांच फीसदी से ज्यादा चढ़े

    ईडी के 715 करोड़ रुपये मामले में रिलायंस पावर को नोटिस, नकारात्मक खबर के बीच शेयर पांच फीसदी से ज्यादा चढ़े

    नई दिल्ली । अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस पावर के शेयरों में शुक्रवार को तेज उछाल देखने को मिला। कंपनी को करीब 715 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नोटिस मिलने की जानकारी सामने आने के बावजूद कारोबार के दौरान शेयर 5.55 प्रतिशत से अधिक चढ़कर 23.38 रुपये तक पहुंच गया। इस तेजी ने बाजार में निवेशकों के रुख को लेकर भी चर्चा बढ़ा दी है।

    रिलायंस पावर और उसकी सहायक कंपनी रिलायंस क्लीनजेन लिमिटेड को नई दिल्ली स्थित विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश की ओर से प्री-कॉग्निजेंस नोटिस मिला है। यह नोटिस प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत के आधार पर जारी किया गया है। मामला रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड और उससे जुड़े अन्य पक्षों से संबंधित बताया गया है।

    प्रवर्तन निदेशालय ने करीब 715 करोड़ रुपये की कथित रकम से जुड़े मामले में प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत शिकायत दर्ज की है। इसमें अधिनियम की धारा 3 और 4 का उल्लेख किया गया है। शिकायत में रिलायंस पावर और उसकी सहायक कंपनी का नाम संभावित आरोपियों के रूप में शामिल किए जाने की जानकारी कंपनी की ओर से दी गई है।

    नोटिस की खबर सामान्य तौर पर कंपनी के लिए नकारात्मक मानी जा सकती है, लेकिन शुक्रवार को शेयर बाजार में इसका तत्काल असर अलग दिखाई दिया। रिलायंस पावर के शेयरों में खरीदारी बढ़ी और कीमत 23.38 रुपये तक पहुंच गई। हालांकि शेयर की मौजूदा स्थिति को केवल एक कारोबारी सत्र की तेजी से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि पिछले कुछ समय में स्टॉक में काफी उतार-चढ़ाव रहा है।

    कंपनी के शेयरों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो छह महीने की अवधि में इसमें करीब 9.73 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। एक साल के दौरान शेयर करीब 53 प्रतिशत टूट चुका है। हालांकि पांच साल की अवधि में स्टॉक ने लगभग 131.49 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। इससे कंपनी के शेयर में लंबी अवधि और छोटी अवधि के प्रदर्शन के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

    शुक्रवार को कारोबार के दौरान रिलायंस पावर का बाजार पूंजीकरण करीब 9,574 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। कंपनी के शेयर का 52 सप्ताह का उच्च स्तर 50.90 रुपये और निचला स्तर 20.23 रुपये बताया गया है। मौजूदा भाव इन दोनों स्तरों के बीच कारोबार कर रहा है।

    रिलायंस पावर मुख्य रूप से बिजली उत्पादन से जुड़ी कंपनी है। इसे भारत और विदेशों में बिजली परियोजनाओं के विकास, निर्माण और संचालन के लिए स्थापित किया गया था। कंपनी के पास बिजली उत्पादन से संबंधित परियोजनाओं का पोर्टफोलियो है, जिसमें चालू और निर्माणाधीन परियोजनाएं शामिल हैं। इन परियोजनाओं का संचालन कंपनी सीधे या अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से करती है।

    715 करोड़ रुपये के मामले में जारी नोटिस अब कंपनी के लिए कानूनी और कारोबारी दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हालांकि नोटिस मिलना अपने आप में आरोपों का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाता। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया के दौरान संबंधित पक्षों का पक्ष और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया जाएगा।

    इस बीच शेयरों में आई तेजी यह दिखाती है कि बाजार में किसी खबर पर तत्काल प्रतिक्रिया हमेशा उसी दिशा में नहीं होती, जिस दिशा में खबर को सामान्य तौर पर देखा जाता है। रिलायंस पावर के मामले में भी कानूनी खबर के बीच शेयरों में खरीदारी देखने को मिली है, जबकि निवेशकों के लिए कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन और आगे की कानूनी प्रक्रिया दोनों पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा।

  • सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी से जुड़े आय से अधिक संपत्ति मामले में CBI और ED जांच पर लगाई अंतरिम रोक

    सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी से जुड़े आय से अधिक संपत्ति मामले में CBI और ED जांच पर लगाई अंतरिम रोक

    नई दिल्ली । कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को आय से अधिक संपत्ति के आरोपों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत मिली है। सर्वोच्च अदालत ने मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय की जांच पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है, जिसके तहत दोनों जांच एजेंसियों को मामले की जांच करने के निर्देश दिए गए थे।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने शिकायतकर्ता के साथ-साथ CBI और ED को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की आगे की प्रक्रिया पर विचार करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही कार्यवाही को फिलहाल टालने का निर्देश दिया।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने पहले आय से अधिक संपत्ति के आरोपों से संबंधित मामले में CBI और ED से जांच कराने का आदेश दिया था। इसी आदेश के खिलाफ राहुल गांधी की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया। याचिका में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए जांच एजेंसियों को दिए गए निर्देशों की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह इस मामले के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करना चाहता है। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर विचार करने की जरूरत बताई कि जांच एजेंसियों को कार्रवाई के लिए किस प्रक्रिया के तहत निर्देश दिए गए। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों का पालन महत्वपूर्ण है।

    पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से 20 अगस्त को प्रस्तावित सुनवाई को फिलहाल टालने को कहा है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि राहुल गांधी की याचिका की प्रति शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराई जाए, ताकि संबंधित पक्ष मामले में अपना पक्ष रख सकें। इस निर्देश के बाद हाई कोर्ट में होने वाली अगली कार्यवाही पर भी फिलहाल विराम लग गया है।

    सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिली यह राहत फिलहाल अंतरिम प्रकृति की है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आय से अधिक संपत्ति से जुड़े आरोपों पर अंतिम निर्णय हो गया है। अदालत ने अभी केवल जांच और संबंधित न्यायिक कार्यवाही को लेकर अंतरिम स्तर पर हस्तक्षेप किया है तथा मामले में आगे की सुनवाई के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।

    मामले में CBI और ED को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब दोनों जांच एजेंसियों के साथ शिकायतकर्ता का पक्ष भी अदालत के सामने आएगा। सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि हाई कोर्ट द्वारा जांच के निर्देश दिए जाने की प्रक्रिया कानूनी और न्यायिक मानकों के अनुरूप थी या नहीं।

    राहुल गांधी के लिए यह आदेश फिलहाल महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है, क्योंकि जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई है। हालांकि मामले की अंतिम दिशा सर्वोच्च अदालत में होने वाली आगामी सुनवाई और उसके बाद दिए जाने वाले आदेश पर निर्भर करेगी।

  • NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले में CBI का बड़ा खुलासा, विशेषज्ञों ने परीक्षा से पहले छात्रों तक पहुंचाए सवाल

    NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले में CBI का बड़ा खुलासा, विशेषज्ञों ने परीक्षा से पहले छात्रों तक पहुंचाए सवाल

    नई दिल्ली । NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले की जांच कर रही केंद्रीय जांच एजेंसी ने परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाले दावे किए हैं। जांच के अनुसार प्रश्नपत्र किसी प्रिंटिंग प्रेस से सीधे बाहर नहीं निकला, बल्कि प्रश्नों की जांच, अनुवाद और सुधार की प्रक्रिया से जुड़े कुछ लोगों ने अपने अधिकार का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया। एजेंसी की चार्जशीट में कई लोगों के नाम सामने आए हैं और मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में होनी है।

    जांच में सामने आए तथ्यों के मुताबिक, प्रश्नपत्र तैयार करने और उसकी समीक्षा से जुड़ी प्रक्रिया के दौरान कुछ विषय विशेषज्ञों के पास परीक्षा से पहले प्रश्नों तक पहुंच थी। आरोप है कि इसी दौरान बॉटनी, जूलॉजी, केमिस्ट्री और फिजिक्स से जुड़े कुछ विशेषज्ञों ने प्रश्नों को निर्धारित प्रक्रिया से बाहर पहुंचाया। एजेंसी का मानना है कि उन्हें मिली गोपनीय जानकारी और जिम्मेदारी का इस्तेमाल परीक्षा की निष्पक्षता को प्रभावित करने के लिए किया गया।

    जांच का एक अहम हिस्सा पुणे में आयोजित कथित गुप्त पढ़ाई के सत्रों से जुड़ा है। एजेंसी के अनुसार कुछ छात्रों को परीक्षा से पहले ऐसे स्थानों पर बुलाया गया, जहां उन्हें संभावित प्रश्न, उनके चार विकल्प और सही उत्तर बताए गए। इन सवालों को छात्रों से हाथ से लिखवाने की बात भी जांच में सामने आई है। कथित तौर पर ऐसा इसलिए किया गया ताकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल से बचा जा सके और गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड न बने।

    सीबीआई की जांच के अनुसार कुछ प्रश्नों की तस्वीरें भी बाद में ली गईं और उन्हें दूसरे लोगों तक पहुंचाया गया। जांच में इस पूरे नेटवर्क में पैसों के लेन-देन की आशंका भी सामने आई है। एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि प्रश्न कितने लोगों तक पहुंचे और इस प्रक्रिया में कौन-कौन लोग सीधे या परोक्ष रूप से शामिल थे।

    मामले में लातूर से जुड़ी गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है। जांच के मुताबिक कुछ छात्रों को अस्पताल बुलाकर कथित तौर पर पूरे प्रश्न याद कराए गए। इसके बाद लीक हुए प्रश्नों की एक पीडीएफ तैयार की गई और उसे टेलीग्राम के माध्यम से आगे भेजा गया। जांच एजेंसी का दावा है कि यह फाइल कई लोगों तक पहुंची और बाद में लाखों रुपये के बदले दूसरे व्यक्ति को दी गई।

    जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर प्रश्नों के इस नेटवर्क में 10 से 12 लाख रुपये तक के लेन-देन की बात सामने आई है। हालांकि, पूरे मामले में प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और आर्थिक लेन-देन की वास्तविक स्थिति जांच के आगे बढ़ने के साथ स्पष्ट होगी।

    NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्नों की गोपनीयता और परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में यदि जांच में सामने आए आरोप अदालत में साबित होते हैं, तो यह परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद गंभीर खामियों की ओर संकेत कर सकते हैं। फिलहाल सीबीआई पूरे नेटवर्क, प्रश्नों के स्रोत और उन्हें आगे पहुंचाने वाले लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। मामले में अदालत की अगली सुनवाई के बाद आगे की कानूनी स्थिति भी स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • बैंक फ्रॉड की जांच तेज, 1109 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में सीबीआई ने चार राज्यों के छह ठिकानों पर चलाया सर्च अभियान

    बैंक फ्रॉड की जांच तेज, 1109 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में सीबीआई ने चार राज्यों के छह ठिकानों पर चलाया सर्च अभियान


    नई दिल्ली ।
    देश के बड़े बैंक धोखाधड़ी मामलों में शामिल 1109 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय अनियमितता प्रकरण में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने जांच को तेज करते हुए चार राज्यों में एक साथ व्यापक तलाशी अभियान चलाया है। इस कार्रवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड और अन्य सामग्री जब्त की गई है, जिन्हें जांच के लिए अहम माना जा रहा है। एजेंसी अब इन दस्तावेजों के आधार पर पूरे लेनदेन, कर्ज के उपयोग और कथित धोखाधड़ी की प्रक्रिया की विस्तार से जांच कर रही है।

    जांच एजेंसी के अनुसार यह मामला एक निजी कंपनी द्वारा बैंक से वित्तीय सुविधाएं प्राप्त करने के दौरान कथित रूप से गलत और भ्रामक जानकारी प्रस्तुत करने से जुड़ा है। आरोप है कि कंपनी ने फंड आधारित और नॉन-फंड आधारित ऋण सुविधाएं हासिल करने के लिए अपने वित्तीय रिकॉर्ड में हेरफेर किया। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि कंपनी ने स्टॉक का मूल्य वास्तविक से अधिक दर्शाया, व्यापारिक बकाया को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया और वित्तीय स्थिति को वास्तविकता से बेहतर दिखाकर अधिक क्रेडिट सीमा प्राप्त करने का प्रयास किया।

    सीबीआई का कहना है कि बैंक से प्राप्त ऋण राशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप नहीं किया गया। जांच में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि धनराशि को अन्य संस्थाओं अथवा अलग-अलग व्यावसायिक गतिविधियों में स्थानांतरित किया गया। साथ ही खातों को नियमित दर्शाने के लिए कथित रूप से एवरग्रीनिंग जैसी वित्तीय प्रक्रिया अपनाई गई। इन अनियमितताओं के कारण संबंधित बैंक को लगभग 1109 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान होने का आरोप है।

    विशेष अदालत से प्राप्त तलाशी वारंट के आधार पर सीबीआई ने ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और उत्तराखंड में कुल छह स्थानों पर एक साथ कार्रवाई की। इस दौरान कंपनी से जुड़े निदेशकों के आवासों, पंजीकृत कार्यालय तथा विभिन्न विनिर्माण इकाइयों की तलाशी ली गई। तलाशी अभियान के दौरान एजेंसी ने कई दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य अपने कब्जे में लिए हैं, जिनका परीक्षण किया जा रहा है।

    जांच अधिकारियों के अनुसार जब्त किए गए रिकॉर्ड से यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि बैंक से प्राप्त ऋण राशि का वास्तविक उपयोग किन गतिविधियों में हुआ, वित्तीय लेनदेन की प्रकृति क्या रही और कथित धोखाधड़ी में किन व्यक्तियों अथवा संस्थाओं की भूमिका रही। एजेंसी संबंधित वित्तीय दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी साक्ष्यों का मिलान भी कर रही है ताकि पूरे मामले की सटीक तस्वीर सामने लाई जा सके।

    वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े बैंक ऋण मामलों में कथित अनियमितताओं की समयबद्ध और विस्तृत जांच बैंकिंग प्रणाली की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मामलों में दस्तावेजी साक्ष्य, धन के प्रवाह और वित्तीय लेनदेन का विश्लेषण जांच का प्रमुख आधार बनता है। सीबीआई ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच अभी जारी है और जांच के दौरान प्राप्त होने वाले साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। एजेंसी का उद्देश्य पूरे प्रकरण में कथित वित्तीय अनियमितताओं की परत-दर-परत जांच कर जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट करना और बैंकिंग प्रणाली को हुए संभावित नुकसान के सभी पहलुओं का तथ्यात्मक आकलन करना है।

  • NEET-UG पेपर लीक केस में CBI का बड़ा खुलासा: NTA के पेपर-सेटर पर सवाल, आरोपी के फोन में मिले 111 मैचिंग प्रश्न

    NEET-UG पेपर लीक केस में CBI का बड़ा खुलासा: NTA के पेपर-सेटर पर सवाल, आरोपी के फोन में मिले 111 मैचिंग प्रश्न


    नई दिल्ली। NEET-UG पेपर लीक मामले की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बड़ा खुलासा किया है। जांच एजेंसी ने विशेष अदालत को बताया कि पेपर लीक के तार कथित तौर पर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के उस पैनल तक पहुंच रहे हैं, जो परीक्षा के प्रश्न तैयार करता है।

    CBI के अनुसार, लातूर के एक कोचिंग सेंटर संचालक शिवराज रघुनाथ मोटेगांवकर ने NTA के पेपर-सेटर पैनल में शामिल पी वी कुलकर्णी से केमिस्ट्री के प्रश्न हासिल करने के लिए 5 लाख रुपये दिए थे। इस खुलासे के बाद परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।

    आरोपी के मोबाइल से मिले 36 फोटो, 111 सवाल परीक्षा से मैच
    CBI ने आरोपी मोटेगांवकर की जमानत याचिका का विरोध करते हुए अदालत में डिजिटल सबूत पेश किए। जांच के दौरान जब्त किए गए मोबाइल फोन की जांच में गैलरी से केमिस्ट्री के हाथ से लिखे हुए प्रश्नों की 36 तस्वीरें मिलीं।

    इन तस्वीरों में कुल 132 सवाल लिखे हुए थे। CBI ने जब इन प्रश्नों का मिलान NTA के मास्टर क्वेश्चन बैंक से किया तो इनमें से 111 सवाल NEET-UG परीक्षा के प्रश्नपत्र से हूबहू मैच पाए गए। जांच एजेंसी के मुताबिक, मोबाइल फोन के मेटाडेटा विश्लेषण से पता चला कि ये तस्वीरें 3 मई को आयोजित परीक्षा से करीब 10 दिन पहले खींची गई थीं। CBI का कहना है कि ये हस्तलिखित नोट्स कथित तौर पर मोटेगांवकर की लिखावट में हैं।

    5 लाख रुपये की डील और रकम बरामद
    CBI ने अदालत को बताया कि कथित पेपर लीक की कड़ी मोटेगांवकर के बेटे के जरिए जुड़ी, जो आरोपी पेपर-सेटर पी वी कुलकर्णी की केमिस्ट्री ट्यूटोरियल क्लास में पढ़ता था। जांच के अनुसार, इसी दौरान गोपनीय प्रश्न उपलब्ध कराए गए।

    जांच एजेंसी ने बताया कि प्रश्न हासिल करने के लिए हुई 5 लाख रुपये की डील की रकम एक अन्य आरोपी मनोज भगवानराव शिरुरे की निशानदेही पर बरामद कर ली गई है। इस मामले में अब तक 13 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और सभी आरोपी फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं।

    विवाद के बाद रद्द हुई थी परीक्षा
    NEET-UG पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसके बाद NTA ने 12 मई को 3 मई को आयोजित NEET-UG परीक्षा को रद्द कर दिया था। बाद में मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए 21 जून को दोबारा परीक्षा (Re-exam) आयोजित की गई थी। CBI की जांच में सामने आए इन नए तथ्यों के बाद परीक्षा प्रक्रिया की सुरक्षा व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है।

  • रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस बैंक धोखाधड़ी मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, पहली चार्जशीट दाखिल; दो कंपनियों समेत सात आरोपी नामजद

    रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस बैंक धोखाधड़ी मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, पहली चार्जशीट दाखिल; दो कंपनियों समेत सात आरोपी नामजद

    नई दिल्ली । रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड से जुड़े कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने जांच को आगे बढ़ाते हुए पहली चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल कर दी है। इस आरोपपत्र में दो रिलायंस समूह की कंपनियों सहित कुल सात आरोपियों को नामजद किया गया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि इस मामले में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ, जबकि संबंधित कंपनियों और कुछ अधिकारियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। मामले की जांच अभी भी जारी है और आगे पूरक आरोपपत्र दाखिल किए जाने की संभावना जताई गई है।

    जांच एजेंसी के अनुसार आरोपपत्र में रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड तथा रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड के पांच पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों के नाम शामिल किए गए हैं। इनमें तत्कालीन निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, निदेशक तथा जोखिम प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ पदों पर कार्यरत अधिकारी शामिल हैं। सीबीआई ने सभी आरोपियों पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वित्तीय नुकसान पहुंचाने से संबंधित आरोप लगाए हैं।

    जांच में यह आरोप सामने आया है कि बैंकों से प्राप्त ऋण राशि का उपयोग निर्धारित शर्तों के अनुरूप नहीं किया गया। एजेंसी का दावा है कि ऋण की राशि को विभिन्न मध्यस्थ और शेल कंपनियों के माध्यम से समूह की अन्य कंपनियों में स्थानांतरित किया गया। जांच के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया के कारण ऋण देने वाले सरकारी बैंकों को भारी वित्तीय क्षति हुई और संबंधित पक्षों को अनुचित आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ।

    यह मामला बैंक ऑफ महाराष्ट्र सहित सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों की शिकायतों के आधार पर दर्ज किया गया था। जांच एजेंसी के अनुसार बैंकिंग कंसोर्टियम से जुड़े 13 सरकारी बैंकों को कुल 4,097 करोड़ रुपये का कथित नुकसान हुआ है। इसी आधार पर विस्तृत जांच शुरू की गई, जिसके बाद पहली चार्जशीट अदालत में प्रस्तुत की गई है।

    सीबीआई ने स्पष्ट किया है कि जांच केवल वर्तमान आरोपियों तक सीमित नहीं है। एजेंसी अन्य निदेशकों, कंपनियों तथा संभावित रूप से जुड़े सार्वजनिक अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त आरोपियों के खिलाफ पूरक चार्जशीट दाखिल की जाएगी। एजेंसी का कहना है कि पूरे मामले की हर कड़ी की गहन जांच की जा रही है।

    इस मामले में अब तक तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें रिलायंस कैपिटल लिमिटेड के पूर्व उपाध्यक्ष अमिताभ झुनझुनवाला, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी देवांग मोदी तथा रिलायंस कैपिटल के पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी अमित बापना शामिल हैं। वर्तमान में दो आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं, जबकि एक आरोपी जांच एजेंसी की हिरासत में है।

    सीबीआई के अनुसार रिलायंस समूह की विभिन्न कंपनियों से जुड़े मामलों में अब तक कई प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस होम फाइनेंस, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस और रिलायंस टेलीकॉम से संबंधित मामले शामिल हैं। इन मामलों में विभिन्न सरकारी बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम की शिकायतों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

    जांच एजेंसी ने यह भी बताया कि इससे पहले रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े मामले में भी आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। मौजूदा कार्रवाई उसी श्रृंखला का अगला महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है। एजेंसी का कहना है कि सभी मामलों की निष्पक्ष, व्यापक और समयबद्ध जांच जारी है तथा आगे मिलने वाले साक्ष्यों के आधार पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

  • भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के सभी कानूनी रास्ते बंद: मानवाधिकार अदालत में आखिरी लड़ाई भी हारा, प्रत्यर्पण की प्रशासनिक औपचारिकताएं शुरू

    भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के सभी कानूनी रास्ते बंद: मानवाधिकार अदालत में आखिरी लड़ाई भी हारा, प्रत्यर्पण की प्रशासनिक औपचारिकताएं शुरू

    नई दिल्ली । पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले के मुख्य आरोपी और लंबे समय से फरार चल रहे हीरा कारोबारी नीरव मोदी को भारत लाए जाने की दिशा में एक बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ECHR) में अपनी आखिरी कानूनी लड़ाई हारने के बाद अब नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण पूरी तरह से तय हो गया है। राजनयिक और आधिकारिक सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरव मोदी के पास मौजूद सभी कानूनी विकल्प अब पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार की ओर से उसे भारत सौंपने की प्रशासनिक प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

    इससे पहले यह तथ्य सामने आया था कि स्ट्रैसबर्ग स्थित यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स ने नीरव मोदी द्वारा दायर की गई याचिका को पूरी तरह गोपनीय रखा था। इस अदालत की यह स्थापित प्रक्रिया है कि मामलों के लंबित रहने के दौरान वह किसी भी प्रकार की जानकारी सार्वजनिक नहीं करती है। नीरव मोदी ने ब्रिटेन की अदालतों में अपने सभी कानूनी रास्ते बंद होने के बाद अप्रैल 2026 में ईसीएचआर का दरवाजा खटखटाया था। इस कदम से ठीक पहले यूके सरकार ने उसे तुरंत भारत भेजने से संबंधित आवश्यक प्रत्यर्पण दस्तावेजों को अपनी मंजूरी दे दी थी, जिसे रोकने के लिए उसने मानवाधिकार अदालत की शरण ली थी।

    नीरव मोदी द्वारा अंतरराष्ट्रीय अदालत में यह याचिका तब दायर की गई थी, जब यूके हाईकोर्ट ने उसे प्रत्यर्पण के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में अपील करने की अनुमति देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था। ब्रिटिश अदालत ने अपने फैसले में माना था कि भारत सरकार द्वारा भारतीय जेलों की स्थिति, चिकित्सा सुविधाओं और आरोपी की सुरक्षा को लेकर दिए गए आश्वासन पूरी तरह से पर्याप्त और संतोषजनक हैं। अब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार अदालत द्वारा भी किसी भी प्रकार की राहत देने से मना किए जाने के बाद उसके प्रत्यर्पण के मार्ग में मौजूद अंतिम तकनीकी और कानूनी अड़चन भी समाप्त हो गई है।

    उल्लेखनीय है कि नीरव मोदी मार्च 2019 में लंदन में अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही वहां की वांड्सवर्थ जेल में न्यायिक हिरासत में बंद है। भारत में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडीडी) को पीएनबी धोखाधड़ी, कर्ज जालसाजी और मनी लॉन्ड्रिंग के बेहद गंभीर मामलों में उसकी लंबे समय से तलाश है। भारतीय जांच एजेंसियों ने ब्रिटेन की अदालत में बेहद प्रभावी ढंग से पैरवी की है, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश अधिकारियों ने अब उसे भारतीय कानून के हवाले करने की अंतिम कागजी कार्रवाई शुरू कर दी है और उसे किसी भी समय भारत लाया जा सकता है।

    इससे पूर्व, लंदन की हाईकोर्ट ऑफ जस्टिस ने नीरव मोदी की उस याचिका को भी पूरी तरह खारिज कर दिया था, जिसमें उसने अपने प्रत्यर्पण आदेश के खिलाफ बंद हो चुकी अदालती कार्यवाही को दोबारा शुरू करने की गुहार लगाई थी। नीरव मोदी ने ब्रिटेन के एक अन्य चर्चित मामले का हवाला देते हुए दावा किया था कि भारत भेजे जाने पर उसे प्रताड़ना और मानसिक टॉर्चर का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई के अधिकारियों ने अदालत में अकाट्य तथ्य और पुख्ता सबूत पेश कर नीरव मोदी के इन दावों को पूरी तरह से खारिज करवा दिया, जिसके बाद अदालत ने उसकी दलीलों को आधारहीन माना था।