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  • राष्ट्रपति मुर्मु ने फिल्म सितारों से कहा, लोकप्रियता का इस्तेमाल समाज के हित में करें..

    राष्ट्रपति मुर्मु ने फिल्म सितारों से कहा, लोकप्रियता का इस्तेमाल समाज के हित में करें..

    नई दिल्ली ।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुजरात के एकता नगर में आयोजित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह के दौरान फिल्म जगत से जुड़े कलाकारों को महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने लोकप्रिय फिल्म सितारों से अपनी प्रसिद्धि और प्रभाव का इस्तेमाल सकारात्मक उद्देश्यों के लिए करने की अपील की। राष्ट्रपति ने कहा कि लोकप्रिय कलाकारों में खास तौर पर बच्चों और युवाओं को प्रभावित करने की बड़ी क्षमता होती है।

    अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि जब सफल कलाकार अनुशासित जीवनशैली और स्वस्थ आदतों के फायदे बताते हैं तो बड़ी संख्या में बच्चे और युवा उनसे प्रभावित होते हैं। इसी प्रभाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने फिल्म कलाकारों से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों का प्रचार नहीं करने का अनुरोध किया।

    राष्ट्रपति ने कहा कि लोकप्रिय कलाकारों को ऐसे उत्पादों के विज्ञापन से बचना चाहिए, जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक माने जाते हैं। उन्होंने अपने संदेश को एक प्रभावशाली वाक्य में रखते हुए कहा कि स्टार वही है जो रोशनी फैलाए, अंधेरा नहीं।

    राष्ट्रपति की यह अपील ऐसे समय में सामने आई जब फिल्म जगत के कई चर्चित कलाकार अलग-अलग मौकों पर पान मसाला और अन्य उत्पादों के विज्ञापनों से जुड़े रहे हैं। कुछ कलाकारों ने ऐसे विज्ञापनों में काम किया है, जबकि कुछ ने बाद में सार्वजनिक प्रतिक्रिया के बीच संबंधित ब्रांड से दूरी बना ली।

    अभिनेता अक्षय कुमार भी पहले एक पान मसाला विज्ञापन का हिस्सा बने थे। हालांकि, लोगों की प्रतिक्रिया के बाद उन्होंने संबंधित कंपनी से अपना जुड़ाव खत्म कर लिया था। दूसरी ओर, कुछ दक्षिण भारतीय कलाकारों ने ऐसे उत्पादों के विज्ञापन के प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए। इनमें अल्लू अर्जुन, यश और आर. माधवन के नाम शामिल हैं।

    राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में केवल फिल्म सितारों की जिम्मेदारी की बात नहीं की, बल्कि सिनेमा निर्माण से जुड़े उन लोगों को भी याद किया, जिनका योगदान अक्सर पर्दे के पीछे रह जाता है। उन्होंने कहा कि किसी फिल्म को बनाने में बड़ी संख्या में लोगों की मेहनत शामिल होती है।

    उन्होंने सभी पुरस्कार विजेताओं से अनुरोध किया कि अपनी फिल्मों को मिली सराहना और सम्मान को टीम के प्रत्येक सदस्य तक पहुंचाएं। इनमें मजदूर, छोटे कलाकार, सहायक और संघर्षरत लोग भी शामिल हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले इन लोगों को सम्मान और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।

    72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में विभिन्न श्रेणियों के विजेताओं को सम्मानित किया गया। यह पहली बार था जब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का आयोजन दिल्ली से बाहर किया गया। गुजरात के एकता नगर में हुए इस समारोह में राष्ट्रपति ने विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए।

    समारोह में कन्नड़ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को भारतीय सिनेमा में पांच दशकों से अधिक के योगदान के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    फिल्म ‘आर्टिकल 370’ को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म चुना गया और इसकी मुख्य अभिनेत्री यामी गौतम को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। वहीं ‘भ्रमयुगम’ के लिए मैमूटी और ‘चंदू चैंपियन’ के लिए कार्तिक आर्यन को संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान दिया गया।

    राष्ट्रपति ने सिनेमा को समाज का दर्पण बताते हुए कहा कि यह भारतीय संस्कृति, संवेदनाओं और जीवन मूल्यों को दुनिया तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में बनने वाली फिल्मों की सराहना करते हुए कहा कि क्षेत्रीय सिनेमा देश की जड़ों और विविध कहानियों को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

  • राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की 72 साल की कहानी, सत्यजीत रे के 36 सम्मान से शबाना आजमी के रिकॉर्ड तक

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की 72 साल की कहानी, सत्यजीत रे के 36 सम्मान से शबाना आजमी के रिकॉर्ड तक

    नई दिल्ली ।राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भारतीय सिनेमा के सबसे महत्वपूर्ण सम्मानों में शामिल हैं। 1954 में शुरू हुई इस पुरस्कार व्यवस्था ने सात दशकों से अधिक समय में फिल्मों, कलाकारों, निर्देशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी है। 22 सितंबर 2026 को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का आयोजन गुजरात के एकता नगर में हो रहा है। यह पहली बार है जब यह समारोह दिल्ली से बाहर आयोजित किया जा रहा है।

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत 1954 में हुई थी। उस समय 1953 में रिलीज हुई फिल्मों को सम्मान के लिए चुना गया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे और सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीवी केसकर थे। शुरुआत में इन पुरस्कारों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं, बल्कि स्टेट अवॉर्ड फॉर फिल्म के नाम से जाना जाता था।

    इससे पहले 1949 में भारत सरकार ने फिल्म जांच समिति का गठन किया था। समिति का उद्देश्य भारतीय फिल्म उद्योग की स्थिति, फिल्मों की गुणवत्ता और उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव का अध्ययन करना था। समिति की सिफारिशों के बाद फिल्मों को सरकारी स्तर पर सम्मान देने की व्यवस्था शुरू की गई।

    शुरुआती दौर में पुरस्कार मुख्य रूप से फीचर फिल्म, डॉक्यूमेंट्री और बच्चों की फिल्मों पर केंद्रित थे। उस समय कलाकारों के लिए अलग-अलग पुरस्कार नहीं दिए जाते थे। शुरुआत से ही अलग-अलग भारतीय भाषाओं की फिल्मों को इसमें जगह देने की नीति अपनाई गई। यही व्यवस्था आगे चलकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की प्रमुख विशेषता बनी।

    पहला पुरस्कार समारोह 10 अक्टूबर 1954 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ था। सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मराठी फिल्म श्यामची आई को मिला था। सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म का पुरस्कार महाबलीपुरम को दिया गया। दो बीघा जमीन और भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य को भी ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया था। बच्चों की फिल्म खेला घर को भी सम्मान मिला था।

    कलाकारों और तकनीशियनों के लिए अलग पुरस्कारों की शुरुआत 1967 में रिलीज फिल्मों के लिए हुई और 1968 में विजेताओं को सम्मानित किया गया। उत्तम कुमार पहले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बने, जबकि नरगिस दत्त पहली सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुनी गईं। उस समय इन पुरस्कारों को भारत अवॉर्ड और उर्वशी अवॉर्ड कहा जाता था।

    1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शुरू हुआ और देविका रानी इसकी पहली प्राप्तकर्ता बनीं। 1973 से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के प्रशासन की जिम्मेदारी डायरेक्टरेट ऑफ फिल्म फेस्टिवल ने संभाली। 2022 में इसके पुनर्गठन के दौरान इसका राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम में विलय कर दिया गया।

    समय के साथ पुरस्कारों का दायरा भी बढ़ता गया। सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, संगीत, प्लेबैक सिंगिंग, स्क्रीनप्ले, कॉस्ट्यूम, मेकअप, साउंड, कोरियोग्राफी, स्टंट और विजुअल इफेक्ट्स जैसे क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया।

    अभिनय की श्रेणी में शबाना आजमी ने पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतकर रिकॉर्ड बनाया है। उन्हें अंकुर, अर्थ, खंडहर, पार और गॉडमदर के लिए सम्मान मिला। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में अमिताभ बच्चन ने चार पुरस्कार जीते हैं, जबकि ममूटी ने ब्रमायुगम के लिए अपना चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया।

    प्लेबैक गायन में के. जे. येसुदास के नाम आठ राष्ट्रीय पुरस्कार हैं। संगीतकार ए. आर. रहमान ने सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते हैं। महान फिल्मकार सत्यजीत रे के नाम भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में 36 सम्मानों का उल्लेख किया जाता है। उनके योगदान ने भारतीय सिनेमा को देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग पहचान दिलाई।

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का उद्देश्य केवल फिल्मों को सम्मान देना नहीं रहा है। इनका लक्ष्य कलात्मक और तकनीकी उत्कृष्टता वाली फिल्मों को प्रोत्साहित करना तथा भारत की विविध संस्कृतियों और भाषाओं को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना भी रहा है।

  • महेश भट्ट का संघर्ष: मां को सहारा देने के लिए कलम उठाई, फिर सिनेमा को बनाया अपनी पहचान

    महेश भट्ट का संघर्ष: मां को सहारा देने के लिए कलम उठाई, फिर सिनेमा को बनाया अपनी पहचान

    नई दिल्ली । 20 वर्ष का एक लड़का मां को आर्थिक सहारा देने के लिए रोजगार की तलाश में निकला। कलम चलाने की प्रतिभा थी और उसी की राह पकड़ी। विज्ञापन लिखने शुरू किए। मगर, उस लड़के की जिंदगी में तमाम अनुभव थे। इमोशंस थे। उन भावनाओं को व्यक्त कर पाने का हुनर था। इसके लिए उसने सिनेमा को माध्यम बनाया। कुछ अपने निजी अनुभवों पर तो कुछ समाज के अनुभवों पर ऐसा सिनेमा रचा, जो दर्शकों के दिलों को छूने लगा। आज दुनिया उस लड़के को नामी निर्देशक महेश भट्ट के रूप में जानती है, जिनका आज जन्मदिन है।

    मां की मदद के लिए साधी थी कलम

    महेश भट्ट इंडस्ट्री के चर्चित निर्देशक, निर्माता और स्क्रीनराइटर हैं। उनका जन्म 20 सितंबर 1948 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता का नाम नानाभाई भट्ट और मां का नाम शिरीन मोहम्मद अली है। महेश भट्ट ने अपनी स्कूली पढ़ाई डॉन बॉस्को हाई स्कूल, माटुंगा से की है। महेश शुरू से ही प्रतिभा के धनी हैं, वे ना सिर्फ एक होनहार छात्र थे, बल्कि अपनी मां के कामों में भी इन्होंने शुरू से मदद की। बहुत ही कम उम्र में वे पैसे भी कमाने लगे थे। उन्होंने स्कूल के दिनों में ही नौकरी शुरू की। वहीं, महेश भट्ट ने 20 साल की उम्र में विज्ञापनों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। उनके मुताबिक, परिवार को आर्थिक रूप से सहारा देने के लिए उन्होंने यह शुरुआत की।

    26 की उम्र में बतौर निर्देशक शुरुआत

    अपने संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए महेश भट्ट ने फिल्मी उद्योग में कदम रखा। महेश ने स्मिता पाटिल और विनोद खन्ना के सेक्रेटरी के रूप में काम किया। निर्देशन की बात करें तो महेश भट्ट ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1970 में आई डॉक्यूमेंट्री ‘संकट’ के निर्देशन से की थी। मगर, सिनेमा की दुनिया में बतौर निर्देशक महेश भट्ट ने फिल्म ‘मंजिलें और भी हैं’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया। तब उनकी उम्र महज 26 साल थी।

    ‘कब्जा’ से निर्माता की कुर्सी पर बैठे

    पांच दशक से अधिक के करियर में महेश भट्ट ने कई चर्चित और हिट फिल्मों का निर्देशन किया है। कई प्रोड्यूस की हैं। वहीं, 100 से ज्यादा फिल्मों की कहानी को बतौर स्क्रिप्ट राइटर उन्होंने आकार दिया है। निर्देशक के रूप में अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने 1987 में अपने भाई मुकेश भट्ट के साथ विशेष फिल्म्स के बैनर तले फिल्म ‘कब्जा’ के साथ निर्माता की भूमिका निभाई। अपने अब तक के फिल्मी करियर में महेश भट्ट ने ‘अर्थ’, ‘आशिकी’, ‘सारांश’ जैसी एक से बढ़कर एक फिल्में बनाई हैं।

    महेश की फिल्म ‘सारांश’ को 14वें मॉस्को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में दिखाया गया था। यह उस साल के सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए अकादमी पुरस्कार के लिए भारत की ओर से थी। 1986 की फिल्म ‘नाम’ उनकी पहली व्यावसायिक सिनेमाई फिल्म थी। वे ‘लहू के दो रंग’, ‘अभिमन्यु’, ‘अर्थ’, ‘सारांश’, ‘आशिकी’, ‘डैडी’, ‘दिल है के मानता नहीं’ और ‘हम हैं राही प्यार के’ जैसी 80 से ज्यादा फिल्मों का निर्देशन और प्रोडक्शन कर चुके हैं।

    छोटे पर्दे पर भी दिखाया दमखम

    फिल्मों के अलावा महेश भट्ट ने छोटे पर्दे पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने ‘स्वाभिमान’, ‘कभी कभी’ और ‘नामकरण’ जैसे कई चर्चित टीवी सीरियल्स का भी निर्देशन किया है।

    महेश भट्ट को उनकी फिल्मों के लिए काफी पुरस्कार दिए गए। सबसे पहले उन्हें 1984 में फिल्म ‘अर्थ’ के लिए फिल्मफेयर बेस्ट स्क्रीन प्ले अवार्ड दिया गया। इसके बाद 1985 में फिल्म ‘सारांश’ को बेस्ट स्टोरी अवार्ड दिया गया। 1994 में ‘हम हैं राही प्यार के’ के लिए महेश को नेशनल फिल्म अवार्ड दिया गया। 1999 में उनकी फिल्म ‘जख्म’ को फिल्मफेयर बेस्ट स्टोरी अवार्ड दिया गया।

    फिल्मों में दिखा निजी जिंदगी का प्रतिबिंब

    महेश भट्ट ऐसे निर्देशक हैं, जिनके विचार कई बार लोगों को चौंकाते हैं। उनकी निजी विचारधारा की तरह उनकी फिल्मों के विषय और फिल्में दर्शकों को चौंकाती रही हैं। कभी विवाद हुए तो कभी आलोचना। उतार-चढ़ावों के बीच तारीफें भी खूब मिलीं। उन्होंने 70-80 के दशक में समाज के ऐसे विषयों पर फिल्में बनाने का साहस किया, जिन पर लोग बातें भी दबी जुबान से करते हों। आलोचनाओं से बेफिक्र रहते हुए उन्होंने बोल्ड विषयों को चुना। वे अपनी फिल्मों में नए प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं।

    बेहद खुले विचारों वाले महेश भट्ट ने समाज की बंदिशों को तोड़ समाज की सोच बदलने वाली फिल्में बनाईं। उन्होंने ‘जहर’, ‘मर्डर 2’, ‘जिस्म 2’ जैसी फिल्में बनाकर अपना नाम बॉलीवुड के बोल्ड विषयों पर फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर में शामिल कर लिया। महेश भट्ट ने कई फिल्मों में अपनी निजी जिंदगी को परदे पर भी उतारा है।

    पूजा भट्ट को लेकर विवादित बयान पर हुआ था हंगामा

    विवादों से भी महेश भट्ट का नाता रहा है। महेश अपनी बेटी पूजा भट्ट को लेकर भी विवादों में रहे। पूजा भट्ट के साथ एक फोटोशूट को लेकर काफी आलोचना हुई थी। एक इंटरव्यू में महेश भट्ट ने अपनी बेटी को लेकर विवादित बयान भी दिया था। बहरहाल महेश भट्ट कितने भी विवादों में रहे हों लेकिन वो उसे गंभीरता से नहीं लेते। आज भी वो हर मुद्दे पर बेबाक तरीके से राय रखते हैं।

    महेश भट्ट की निजी जिंदगी और शादी

    महेश भट्ट की निजी जिंदगी की बात करें तो उनकी पहली शादी किरण भट्ट (लोरिएन ब्राइट) से हुई। किरण से महेश कॉलेज के दिनों में मिले और प्यार हो गया। महेश भट्ट और किरण भट्ट के दो बच्चे पूजा भट्ट और राहुल भट्ट हैं। हालांकि, किरण भट्ट के साथ महेश भट्ट का रिश्ता टूट गया। इसके बाद उन्होंने सोनी राजदान से शादी रचाई। सोनी राजदान के साथ महेश भट्ट की दो बेटियां आलिया भट्ट और शाहीन भट्ट हैं।

    महेश भट्ट का वर्क फ्रंट

    महेश भट्ट के वर्क फ्रंट की बात करें तो वे फिल्म ‘नाम-टू लिव इज वॉर’ को लेकर चर्चा में हैं। इसमें वीर पहाड़िया अहम भूमिका में नजर आएंगे। महेश भट्ट इस फिल्म को पेश कर रहे हैं। वहीं, निर्देशन की कमान सिद्धांत सचदेव के कंधों पर है।

  • धुरंधर की कहानी पर तिग्मांशु धूलिया ने उठाए सवाल, रणवीर सिंह की फिल्म की तारीफ के बावजूद बोले- क्या यही कहानी है

    धुरंधर की कहानी पर तिग्मांशु धूलिया ने उठाए सवाल, रणवीर सिंह की फिल्म की तारीफ के बावजूद बोले- क्या यही कहानी है


    नई दिल्ली । रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर’ ने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई और बॉक्स ऑफिस पर भी मजबूत प्रदर्शन किया। फिल्म की सफलता के बावजूद इसके कंटेंट और कहानी को लेकर अब फिल्म निर्माता-निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में बदलते कहानी कहने के तरीके पर चर्चा करते हुए ‘धुरंधर’ को मौजूदा फिल्मी फॉर्मूले का उदाहरण बताया।

    तिग्मांशु धूलिया के मुताबिक आज के दौर में कॉरपोरेट संस्कृति और एक जैसे फिल्मी टेम्पलेट के कारण मौलिक कहानियों की संख्या कम होती जा रही है। उनका मानना है कि बड़े स्तर पर बनने वाली कई फिल्मों में कहानी से ज्यादा प्रस्तुति, एक्शन और स्टार पावर पर जोर दिखाई देता है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘पुष्पा’, ‘केजीएफ’ और ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों का उदाहरण दिया।

    हालांकि, तिग्मांशु ने ‘धुरंधर’ को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने फिल्म के पहले पार्ट की प्रस्तुति की तारीफ की और कहा कि उन्हें फिल्म पसंद आई। उनके अनुसार फिल्म को अच्छे तरीके से पेश किया गया था और इसका संगीत भी प्रभावशाली था। लेकिन जब बात कहानी की आती है तो उन्होंने इसकी मौलिकता पर सवाल खड़ा किया।

    तिग्मांशु ने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर किसी दर्शक से ‘धुरंधर’ की कहानी सुनाने के लिए कहा जाए तो वह वास्तव में कितनी विस्तृत कहानी बता पाएगा। उन्होंने फिल्म की कहानी को एक ऐसे व्यक्ति की कहानी के रूप में बताया जो अंडरकवर एजेंट बनकर पाकिस्तान जाता है और वहां तबाही मचाता है। इसी आधार पर उन्होंने सवाल किया कि क्या इसे पूरी तरह एक मौलिक और मजबूत कहानी माना जा सकता है।

    उनकी टिप्पणी केवल ‘धुरंधर’ तक सीमित नहीं रही। तिग्मांशु ने हिंदी सिनेमा में मौलिक कहानियों की कमी को लेकर व्यापक चिंता जताई। उनका कहना है कि पहले ऐसे लोग मौजूद थे जो अलग तरह की कहानियां सुनाते थे, लेकिन अब ऐसे कहानीकारों को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। फिल्म उद्योग में यह धारणा भी बनी हुई है कि अलग और प्रयोगात्मक कहानियां दर्शकों को पसंद नहीं आएंगी।

    तिग्मांशु के अनुसार इसी सोच की वजह से फिल्मों में एक जैसे फॉर्मूले दोहराए जा रहे हैं। उनका मानना है कि इसका असर केवल फिल्मों की कहानियों पर नहीं बल्कि समाज और संस्कृति की विविधता पर भी दिखाई देता है। उन्होंने पूंजीवाद और एक जैसी उपभोक्ता संस्कृति का उदाहरण देते हुए कहा कि आज लोगों की पसंद, पहनावे और यहां तक कि शहरों की पहचान में भी समानता बढ़ती जा रही है।

    उन्होंने कहा कि जब हर चीज एक ही पैटर्न पर तैयार होने लगे तो अलग पहचान धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। उनके मुताबिक यही स्थिति फिल्म इंडस्ट्री में भी दिखाई दे रही है, जहां अलग तरह की कहानियों के बजाय सफल साबित हो चुके फॉर्मूलों को दोहराने पर ज्यादा भरोसा किया जाता है।

    तिग्मांशु धूलिया के अपने काम की बात करें तो उनकी आगामी फिल्म ‘घमासान’ 11 सितंबर 2026 को रिलीज होने वाली है। ऐसे में ‘धुरंधर’ की कहानी पर उनकी टिप्पणी उस समय सामने आई है जब हिंदी सिनेमा में बड़े बजट की फिल्मों, स्टार आधारित कहानियों और मौलिक कंटेंट को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। उनकी बातों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि दर्शकों को आकर्षित करने वाली भव्य प्रस्तुति के साथ क्या मजबूत और नई कहानी को भी बराबर महत्व मिल रहा है।

  • इला अरुण ने फेमिनिज्म और महिलाओं की बदलती स्थिति पर कहा, बराबरी के साथ जिम्मेदारी और शोषण के खिलाफ आवाज जरूरी

    इला अरुण ने फेमिनिज्म और महिलाओं की बदलती स्थिति पर कहा, बराबरी के साथ जिम्मेदारी और शोषण के खिलाफ आवाज जरूरी

    नई दिल्ली ।महिला समानता दिवस के मौके पर अभिनेत्री और गायिका इला अरुण ने सिनेमा में महिलाओं की स्थिति, अपने करियर और फेमिनिज्म को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने अपने चर्चित गीत चोली के पीछे क्या है से जुड़ी पहचान का जिक्र करते हुए कहा कि इस गीत ने उन्हें लोकप्रियता तो दी, लेकिन इसके साथ उनके ऊपर एक ऐसा ठप्पा भी लगा, जिसके कारण उनके दूसरे कामों पर पर्याप्त ध्यान नहीं गया।

    इला अरुण ने कहा कि लोगों ने उनके कई अन्य गीतों और एल्बमों को उस तरह नहीं सुना, जिस तरह एक चर्चित फिल्मी गीत को सुना गया। उनका मानना है कि सिनेमा का प्रभाव बहुत व्यापक होता है और किसी एक लोकप्रिय गीत या किरदार के आधार पर कलाकार की पूरी पहचान तय कर देना उचित नहीं है।

    उन्होंने अपने अभिनय करियर के अलग-अलग किरदारों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक कलाकार को लगातार नई भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं। उन्होंने स्क्रीन पर मां, सौतेली मां, मजबूत महिला और वेश्या जैसे अलग-अलग किरदार निभाए हैं, लेकिन इनमें से कोई भी भूमिका उनकी वास्तविक व्यक्तिगत पहचान को परिभाषित नहीं करती। उनके अनुसार कलाकार के किरदार और उसके निजी व्यक्तित्व के बीच अंतर समझना जरूरी है।

    समाज और महिलाओं के रिश्ते पर इला अरुण ने कहा कि वह न तो समाज के दबाव में रहती हैं और न ही समाज को पूरी तरह नजरअंदाज करती हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति और समाज साथ-साथ चलते हैं। उन्होंने खास तौर पर महिलाओं द्वारा मिले समर्थन और प्यार को महत्वपूर्ण बताया।

    फिल्म उद्योग में महिलाओं के साथ भेदभाव के सवाल पर इला ने अपने अनुभव को अलग तरीके से रखा। उन्होंने कहा कि बतौर चरित्र कलाकार उन्हें व्यक्तिगत तौर पर ऐसा भेदभाव बहुत अधिक महसूस नहीं हुआ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके दौर में महिलाओं को लेकर सोच में अंतर नहीं था। उन्होंने कहा कि पहले महिलाओं के लिए केंद्रित और मजबूत भूमिकाओं वाली कहानियां अपेक्षाकृत कम लिखी जाती थीं।

    इला के अनुसार, समय के साथ इस स्थिति में बदलाव आया है। अब महिलाओं को केंद्र में रखकर कहानियां लिखी जा रही हैं और महिला प्रधान भूमिकाओं के लिए पहले की तुलना में अधिक अवसर दिखाई देते हैं। उनका मानना है कि दर्शकों की पसंद भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि दर्शक महिलाओं की मजबूत कहानियों वाली फिल्में देखते हैं तो फिल्म उद्योग भी ऐसी परियोजनाओं में निवेश करने के लिए आगे आता है।

    देश में महिलाओं की स्थिति पर इला अरुण ने कहा कि पूरे भारत को एक ही नजरिए से देखना संभव नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में परिस्थितियां अलग हैं। उन्होंने माना कि कई जगहों पर आज भी लड़कियों को शिक्षा नहीं मिलती और कम उम्र में विवाह जैसी समस्याएं मौजूद हैं, लेकिन इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि देश धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।

    उन्होंने पुरुषों के नजरिए में भी बदलाव की बात कही। उनके अनुसार आज कई पुरुष अधिक संवेदनशील हो रहे हैं, परिवार में जिम्मेदारियां साझा कर रहे हैं और अपनी पत्नियों तथा बच्चों के प्रति सहयोगी भूमिका निभा रहे हैं।

    फेमिनिज्म पर इला अरुण ने संतुलित दृष्टिकोण रखने की बात कही। उन्होंने महिलाओं के अधिकार और बराबरी की जरूरत को स्वीकार किया, लेकिन कहा कि किसी भी विचार का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार बराबरी का अर्थ किसी के साथ अनुचित व्यवहार करना या जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना नहीं है।

    उन्होंने महिलाओं के शोषण के मामलों में आवाज उठाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि पेशेवर जीवन में गलत व्यवहार का सामना करने वाली कई महिलाएं डर या दबाव के कारण बोल नहीं पातीं। ऐसी महिलाओं के लिए समाज और अन्य लोगों को आगे आकर समर्थन देना चाहिए। इला के विचारों में महिला समानता का अर्थ अधिकारों के साथ जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और एक दूसरे के समर्थन से जुड़ा हुआ है।

  • अक्षय खन्ना फिर मचाएंगे तहलका, रहमान डकैत के बाद अब 'महाकाली' में निभाएंगे असुर गुरु शुक्राचार्य का किरदार

    अक्षय खन्ना फिर मचाएंगे तहलका, रहमान डकैत के बाद अब 'महाकाली' में निभाएंगे असुर गुरु शुक्राचार्य का किरदार

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा जगत में अपनी बहुमुखी और सशक्त अभिनय क्षमता के लिए पहचाने जाने वाले अभिनेता अक्षय खन्ना एक बार फिर से एक नए और चुनौतीपूर्ण अवतार में दर्शकों के सामने आने की तैयारी कर रहे हैं। हाल के समय में कई बड़ी फिल्मों और सीरीज़ में अपनी बेहतरीन अदाकारी से वाहवाही बटोरने के बाद अब वे पौराणिक और काल्पनिक सिनेमा के एक बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने जा रहे हैं। अपनी पिछली चर्चित भूमिकाओं में अलग-अलग रंगों को पेश करने के बाद अभिनेता का यह नया रूप दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता पैदा कर रहा है।

    हाल ही में प्रदर्शित हुई फिल्म धुरंधर में रहमान डकैत के नकारात्मक और जटिल किरदार को निभाकर अक्षय खन्ना ने आलोचकों और दर्शकों दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस फिल्म में उनके द्वारा निभाए गए चरित्र की बारीकियों और संवाद अदायगी की काफी सराहना हुई थी। अब वे प्रशांत वर्मा सिनेमैटिक यूनिवर्स की आगामी बड़ी फिल्म महाकाली में पौराणिक चरित्र असुर गुरु शुक्राचार्य की भूमिका में दिखाई देंगे। इस फिल्म से जुड़ा उनका पहला लुक और झलक 24 अगस्त को सार्वजनिक रूप से जारी किए जाने की संभावना है।

    अक्षय खन्ना के फिल्मी सफर पर नजर डालें तो वे लगातार अलग-अलग प्रकार की भूमिकाओं का चयन करते रहे हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म छावा में मुगल सम्राट औरंगजेब का गंभीर और प्रभावशाली किरदार हो या फिर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म सेक्शन 375 में एक तीक्ष्ण बुद्धि वाले वकील तरुण सलूजा की भूमिका, उन्होंने हर बार अपनी अदाकारी से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी है। इसके अलावा हाल ही में आई वेब सीरीज इक्का में भी उनके नकारात्मक चरित्र शौर्यमान गौर को काफी सराहा गया था।

    सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की भूमिकाओं में समान रूप से सहज दिखने वाले इस अभिनेता ने अपने करियर की शुरुआत से ही कई यादगार फिल्में दी हैं। थ्रिलर शैली की फिल्म हमराज में चालाक प्रेमी करण मल्होत्रा का रोल हो या फिर सुपरहिट फिल्म दृश्यम 2 में आईजी तरुण अहलावत का सख्त पुलिस अधिकारी वाला किरदार, अक्षय खन्ना ने हर बार कहानी में एक अलग तनाव और रोमांच पैदा किया है। इसके अतिरिक्त दिल चाहता है, ताल और रेस जैसी सुपरहिट फिल्मों में निभाए गए उनके किरदारों को आज भी भारतीय सिनेमा के बेहतरीन प्रदर्शनों में गिना जाता है।

    फिल्म प्रेमियों के बीच अक्षय खन्ना की आने वाली फिल्मों को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। महाकाली में असुर गुरु शुक्राचार्य जैसे महत्वपूर्ण पौराणिक चरित्र को वे किस तरह पर्दे पर जीवंत करते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। फिल्म समीक्षकों का मानना है कि अपनी अनूठी संवाद शैली और चेहरे के भावों से गंभीर से गंभीर किरदार में जान फूंकने की उनकी कला इस नई फिल्म को भी एक खास ऊंचाई पर ले जाने में मददगार साबित होगी।

  • यामी गौतम की नई फिल्म 'नई नवेली' का मोशन पोस्टर जारी, दशहरा के मौके पर 16 अक्टूबर को होगी रिलीज

    यामी गौतम की नई फिल्म 'नई नवेली' का मोशन पोस्टर जारी, दशहरा के मौके पर 16 अक्टूबर को होगी रिलीज

    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री यामी गौतम की अगली फिल्म ‘नई नवेली’ की आधिकारिक घोषणा कर दी गई है। अमेज़न एमजीएम स्टूडियोज और कलर येलो प्रोडक्शंस के बैनर तले बनने वाली इस फैंटसी ड्रामा फिल्म का एक आकर्षक मोशन पोस्टर जारी किया गया है। विगत कुछ वर्षों में लीक से हटकर भूमिकाएं निभाने के लिए सराही गई यामी गौतम इस फिल्म में एक अनूठे और कौतूहल पैदा करने वाले किरदार में नजर आएंगी।

    फिल्म निर्माताओं द्वारा जारी जानकारी के अनुसार यह फिल्म एक नवविवाहिता की कहानी पर आधारित है, जो विवाह के उपरांत अपने ससुराल मेरठ पहुंचती है। उसके आगमन से परिवार में खुशियों का माहौल बन जाता है और घर की खोई हुई रौनक वापस लौट आती है। हालांकि, कहानी में नया मोड़ तब आता है जब दुल्हन का देवर उसके अत्यधिक आदर्शवादी व्यवहार पर संदेह व्यक्त करता है और उसे एक रहस्यमयी शक्ति के रूप में देखने लगता है। इसके बाद परिवार के बीच छुपा हुआ रहस्य उजागर होता है।

    इस बहुप्रतीक्षित फिल्म का निर्देशन बालाजी मोहन कर रहे हैं, जबकि इसकी पटकथा हिमांशु शर्मा और दिव्य निधि शर्मा द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई है। फिल्म का निर्माण जाने-माने फिल्ममेकर आनंद एल राय कर रहे हैं और इसमें संगीत जीवी प्रकाश कुमार का होगा। निर्माताओं ने घोषणा की है कि यह फिल्म इस वर्ष विजयादशमी के अवसर पर 16 अक्टूबर को देश भर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित की जाएगी।

    फिल्म के निर्माता आनंद एल राय ने इस परियोजना के बारे में बात करते हुए कहा कि यह एक ऐसी कथावस्तु है जो दर्शकों को हर मोड़ पर चकित करेगी। उन्होंने यामी गौतम के चयन को भूमिका के लिए सर्वथा उपयुक्त बताया और कहा कि उनके अभिनय में गंभीरता और चंचलता का बेहतरीन संतुलन है, जो इस काल्पनिक और ड्रामा से भरपूर किरदार को जीवंत करने के लिए आवश्यक था।

    हालिया दौर में विभिन्न जॉनर की फिल्मों में अपनी छाप छोड़ने के बाद यामी गौतम के फैंस इस नए अवतार को लेकर काफी उत्साहित हैं। फिल्म का मोशन पोस्टर जारी होते ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है और इसके हॉरर तथा फैंटसी के संयोजन को लेकर दर्शकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।

     प्रमुख मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में दशहरा पर्व के दौरान फिल्म की रिलीज को लेकर विशेष तैयारियां की जा रही हैं। ट्रेड विश्लेषकों का मानना है कि त्योहारों के मौसम में यह अनूठी पारिवारिक फैंटसी ड्रामा फिल्म बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों को आकर्षित करने में सफल सिद्ध होगी।

  • अभिनेता यश की फिल्म टॉक्सिक को यूके सेंसर बोर्ड से मिला सख्त रेटिंग सर्टिफिकेट, 26 अगस्त को होगी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज

    अभिनेता यश की फिल्म टॉक्सिक को यूके सेंसर बोर्ड से मिला सख्त रेटिंग सर्टिफिकेट, 26 अगस्त को होगी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज

    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा की बहुप्रतीक्षित बड़े बजट की फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ अपनी वैश्विक रिलीज से पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई है। ब्रिटिश बोर्ड ऑफ फिल्म क्लासिफिकेशन ने फिल्म को ब्रिटेन में प्रदर्शन के लिए सख्त रेटिंग श्रेणी में रखते हुए 18+ का वयस्क प्रमाण पत्र जारी किया है। नियामक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार फिल्म में अत्यधिक हिंसा, बोल्ड सामग्री और संवेदनशील विषयों का समावेश पाया गया है।

    गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी और दक्षिण भारतीय अभिनेता यश द्वारा अभिनीत यह फिल्म आगामी 26 अगस्त को दुनिया भर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने जा रही है। सेंसर बोर्ड द्वारा जारी ब्योरे के अनुसार फिल्म की कुल समयावधि 191 मिनट और 41 सेकंड यानी लगभग तीन घंटे ग्यारह मिनट तय की गई है। हालांकि प्रमाणीकरण की प्रक्रिया के दौरान बोर्ड ने तकनीकी विवरण दर्ज करते समय इसे कन्नड़ के स्थान पर तमिल भाषा की फिल्म के रूप में सूचीबद्ध किया था।

    सेंसर रिपोर्ट में फिल्म की कथावस्तु और दृश्यों के स्तर पर विस्तृत जानकारी साझा की गई है। कहानी का मुख्य केंद्र बिंदु गोवा का एक शक्तिशाली ड्रग नेटवर्क है, जिसकी गतिविधियां और आंतरिक संघर्ष मुख्य कथानक का हिस्सा हैं। नियामक संस्था ने फिल्म में दिखाए गए क्रूर हिंसात्मक दृश्यों, गोलीबारी, घातक हमलों और शारीरिक टॉर्चर की वजह से हिंसा श्रेणी में उच्चतम रेटिंग प्रदान की है। इसके अलावा फिल्म में बोल्ड सीन्स और स्ट्रिप क्लब से जुड़े दृश्यों के चलते यौन सामग्री श्रेणी में भी इसे उच्च रेटिंग मिली है।

    ब्रिटिश वर्गीकरण बोर्ड ने जोखिम और भय, अभद्र भाषा, नशीले पदार्थों के उपयोग, यौन हिंसा तथा संवेदनशील मुद्दों से संबंधित सीन्स की श्रेणी में भी फिल्म को गंभीर रेटिंग दी है। हाल के वर्षों में रिलीज हुई अन्य एक्शन आधारित बहुचर्चित फिल्मों की तुलना में इस फिल्म को कंटेंट के लिहाज से अधिक डार्क और गंभीर माना जा रहा है। हिंसा के मामले में भले ही यह अन्य फिल्मों के समकक्ष खड़ी दिखती हो, लेकिन अन्य संवेदनशील श्रेणियों में इसका स्तर काफी सख्त आंका गया है।

    यह एक वृहद स्तर पर निर्मित पैन-इंडिया फिल्म है, जिसे मुख्य रूप से कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा में शूट किया गया है। फिल्म में मुख्य अभिनेता के साथ कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुक्मिणी वसंत जैसी प्रमुख अभिनेत्रियां महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आएंगी। मध्य प्रदेश सहित देश भर के प्रमुख सिनेमा बाजारों और मल्टीप्लेक्स श्रृंखलाओं में फिल्म के एडवांस टिकट बुकिंग को लेकर दर्शकों के बीच काफी उत्सुकता देखी जा रही है।

    वैश्विक स्तर पर मध्य पूर्व क्षेत्र में बनी परिस्थितियों और अन्य तकनीकी कारणों से फिल्म की रिलीज तिथि में बदलाव किया गया था। अब 26 अगस्त को होने वाले इसके आधिकारिक प्रदर्शन पर पूरे फिल्म उद्योग की नजरें टिकी हुई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सख्त प्रमाणीकरण और डार्क विषयवस्तु के बावजूद यह बड़े बजट की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों को कितना आकर्षित कर पाती है।

  • अभिनेता सनी देओल ने गदर 3 के संभावित विचार पर दी प्रतिक्रिया, पोते की बीवी लाने के सुझाव को बताया दिलचस्प

    अभिनेता सनी देओल ने गदर 3 के संभावित विचार पर दी प्रतिक्रिया, पोते की बीवी लाने के सुझाव को बताया दिलचस्प


    नई दिल्ली । 
    बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता सनी देओल ने अपनी प्रसिद्ध फिल्म फ्रेंचाइजी के अगले भाग को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच एक दिलचस्प प्रतिक्रिया दी है। हाल ही में अपनी नई फिल्म की रिलीज के बाद आयोजित एक विशेष बातचीत के दौरान जब उनसे गदर 3 के संभावित कथानक को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे हास्यप्रद और विचारणीय बताया। अभिनेता ने संकेत दिया कि फिल्म निर्माण के इस विचार को निर्देशक के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

    बातचीत के दौरान एक प्रशंसक की टिप्पणी का हवाला दिया गया, जिसमें पहली और दूसरी फिल्म के घटनाक्रमों की तुलना करते हुए तीसरी किश्त की संभावित कहानी पर चुटकी ली गई थी। इस टिप्पणी में कहा गया था कि पहली फिल्म में मुख्य पात्र अपनी पत्नी को वापस लाने सीमा पार गया था, जबकि दूसरी फिल्म में पुत्र और उसकी पत्नी का संदर्भ था। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए प्रशंसक ने पूछा कि क्या तीसरे भाग में पोते और उसकी पत्नी की कहानी देखने को मिलेगी। इस पर अभिनेता ने सहजता से हंसते हुए प्रतिक्रिया दी कि यह विचार बुरा नहीं है और वे इस बारे में निर्देशक अनिल शर्मा से बात करेंगे।

    गदर फ्रेंचाइजी भारतीय सिनेमा के इतिहास में व्यावसायिक दृष्टिकोण से अत्यंत सफल रही है। वर्ष 2001 में प्रदर्शित हुई इसकी पहली किश्त ने बॉक्स ऑफिस पर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की थी। इसके दो दशक से अधिक समय बाद वर्ष 2023 में इसका दूसरा भाग दर्शकों के सामने आया, जिसने कमाई के कई नए कीर्तिमान स्थापित किए। दोनों ही फिल्मों का निर्देशन अनिल शर्मा द्वारा किया गया था और दोनों में ही मुख्य पात्र तारा सिंह की भूमिका को दर्शकों का भरपूर स्नेह मिला।

    फिल्म के मुख्य चरित्र तारा सिंह पर चर्चा करते हुए अभिनेता ने कहा कि यह किरदार लोगों के दिलों के बेहद करीब रहा है। यह एक सकारात्मक और भावनात्मक जुड़ाव महसूस कराने वाली फिल्म श्रृंखला रही है, जिसे हर वर्ग के दर्शकों ने सराहा है। यही कारण है कि इस फ्रेंचाइजी के हर नए विचार को लेकर दर्शकों में उत्सुकता बनी रहती है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के सिनेमा प्रेमियों के बीच इस फ्रेंचाइजी का विशेष आकर्षण हमेशा से रहा है।

    हालांकि, फिल्म के तीसरे भाग की आधिकारिक पुष्टि को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। पूर्व में दिए गए बयानों में निर्देशक अनिल शर्मा ने स्पष्ट किया था कि वे गदर 3 का निर्माण तभी करेंगे जब उनके पास एक अत्यंत प्रभावशाली और मजबूत पटकथा होगी। उन्होंने कहा था कि कहानी का स्तर पहली और दूसरी फिल्म से भी अधिक दमदार होना अनिवार्य है, तभी इसके निर्माण का औचित्य साबित होगा।

    वर्तमान में अभिनेता की नई फिल्म सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है, जिसे दर्शकों की ओर से प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। इसके साथ ही गदर 3 को लेकर सामने आए इस बयान ने एक बार फिर से सिनेमाई गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह प्रशंसक का विचार वाकई किसी आधिकारिक पटकथा का रूप ले पाता है या नहीं।

  • सिनेमाघरों में मचेगा धमाल टॉक्सिक से लेकर मिर्जापुर द मूवी तक, फैंस को है इन 7 फिल्मों का इंतजार

    सिनेमाघरों में मचेगा धमाल टॉक्सिक से लेकर मिर्जापुर द मूवी तक, फैंस को है इन 7 फिल्मों का इंतजार


    नई दिल्ली ।सिनेमाप्रेमियों के बीच आगामी बड़ी फिल्मों को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्मों को मिले बेहतर प्रतिसाद के बाद अब दर्शक सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली नई फिल्मों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
    इस रुझान को देखते हुए ऑनलाइन मूवी डेटाबेस प्लेटफॉर्म आईएमडीबी ने सबसे ज्यादा प्रतीक्षित फिल्मों की सूची जारी की है, जो यूजर्स के रियल टाइम रुझान और सर्च डेटा पर आधारित है। सूची में पहले स्थान पर कन्नड़ सुपरस्टार यश अभिनीत बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ बनी हुई है। एक्शन क्राइम थ्रिलर शैली की इस फिल्म का निर्देशन गीतू मोहनदास ने किया है।
    इस भव्य प्रोजेक्ट में यश के साथ कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और अक्षय ओबेरॉय जैसे जाने-माने कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे। यह फिल्म बड़े पर्दे पर दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए 26 अगस्त को रिलीज होने जा रही है। दूसरे स्थान पर लोकप्रिय वेब सीरीज पर आधारित फीचर फिल्म ‘मिर्जापुर: द मूवी’ का दबदबा कायम है।
    4 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही इस फिल्म का निर्देशन गुरमीत सिंह ने किया है। फिल्म में पंकज त्रिपाठी, अली फजल, रवि किशन, रसिका दुग्गल, जीतेंद्र कुमार और अभिषेक बनर्जी जैसे दिग्गज कलाकार अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन करेंगे।सूची में तीसरे स्थान पर मलयालम सिनेमा की एक्शन थ्रिलर फिल्म ‘खलीफा’ शामिल है, जिसे वैशाख ने निर्देशित किया है।
    इस फिल्म में पृथ्वीराज सुकुमारन, नील नितिन मुकेश और मोहनलाल मुख्य किरदारों में दिखेंगे। चौथे पायदान पर अक्षय कुमार और सैफ अली खान की थ्रिलर फिल्म ‘हैवान’ है, जिसका निर्देशन प्रियदर्शन ने किया है। इसमें मोहनलाल, राजपाल यादव और शारिब हाशमी भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहे हैं।
    पांचवें स्थान पर तेलुगु भाषा की एक्शन एडवेंचर फिल्म ‘द पैराडाइज’ है, जिसका निर्देशन श्रीकांत ओडेला कर रहे हैं। इस सूची में छठे नंबर पर दुलकर सलमान अभिनीत एक्शन क्राइम थ्रिलर फिल्म ‘आई एम गेम’ है, जिसका निर्देशन नहास हिदायत ने किया है।वहीं सातवें स्थान पर शिवा निर्वाण द्वारा निर्देशित तेलुगु फिल्म ‘इरुमुडी’ शामिल है।
    फिल्म उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारतीय सिनेमा और हिंदी सिनेमा का यह अनूठा संगम बॉक्स ऑफिस पर नए कीर्तिमान स्थापित कर सकता है। मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों के मल्टीप्लेक्स व एकल सिनेमाघरों में इन फिल्मों के लिए अग्रिम बुकिंग और प्रचार अभियान की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं।