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  • अल्डाब्रा द्वीप पर 1.83 लाख पहुंचे विशाल कछुए, सेशेल्स की इंसानी आबादी से भी ज्यादा हुई इनकी संख्या

    अल्डाब्रा द्वीप पर 1.83 लाख पहुंचे विशाल कछुए, सेशेल्स की इंसानी आबादी से भी ज्यादा हुई इनकी संख्या

    नई दिल्ली: हिंद महासागर में स्थित सेशेल्स के अल्डाब्रा एटोल पर विशाल कछुओं की आबादी करीब 1.83 लाख होने का अनुमान लगाया गया है। यह संख्या पूरे सेशेल्स की लगभग 1.35 लाख की मानव आबादी से भी अधिक है। हालिया वैज्ञानिक सर्वेक्षण में सामने आया है कि अल्डाब्रा के विशाल कछुए दुनिया में प्राकृतिक वातावरण में स्वतंत्र रूप से रहने वाले विशाल कछुओं की सबसे बड़ी आबादी बनाते हैं। कभी बड़े पैमाने पर शिकार के कारण इनकी संख्या घटकर 1,000 से भी कम रह गई थी। लंबे समय तक किए गए संरक्षण प्रयासों और निगरानी से इस प्रजाति को दोबारा फलने-फूलने का अवसर मिला है।

    इस सर्वेक्षण के लिए 2018 से 2022 के बीच जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में वयस्क और लगभग वयस्क कछुओं की संख्या करीब 1.83 लाख आंकी गई है। यह 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में लगाए गए लगभग एक लाख कछुओं के पुराने अनुमान से काफी अधिक है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि नए आंकड़ों का यह अर्थ नहीं है कि वर्ष 1999 के बाद कछुओं की आबादी लगभग दोगुनी हो गई है। पुराने सर्वेक्षणों में घनी झाड़ियों और पेड़ों की छाया में छिपे कछुए अक्सर गिनती में शामिल नहीं हो पाते थे। इस बार वैज्ञानिकों ने उन कछुओं की संख्या का भी सांख्यिकीय अनुमान लगाया, जो सर्वेक्षण के दौरान सीधे दिखाई नहीं दिए।

    अल्डाब्रा के विशाल कछुओं की आबादी में सुधार के पीछे उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है। 19वीं सदी में बड़े पैमाने पर शिकार और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आई थी। इसके बाद इस प्रजाति को बचाने के लिए संरक्षण के उपाय किए गए। वर्ष 1981 में अल्डाब्रा को सख्त सुरक्षा वाले प्राकृतिक आरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिया गया। इसके अगले वर्ष, 1982 में, इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। लगातार संरक्षण और निगरानी से कछुओं को सुरक्षित वातावरण मिला। नए अध्ययन में यह भी सामने आया कि 2018 से 2022 के दौरान इनकी आबादी अपेक्षाकृत स्थिर रही।

    सर्वेक्षण के दौरान कछुओं की संख्या और उनके आवास के बीच संबंध भी सामने आया। वैज्ञानिकों ने पाया कि घास वाले क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी सबसे अधिक है। ऐसे क्षेत्रों को टॉरटॉइज टर्फ कहा जाता है। इसके बाद खुले भूभाग और कम घनी झाड़ियों वाले इलाकों में कछुओं का घनत्व अधिक पाया गया। इसके विपरीत, घनी झाड़ियों, मैंग्रोव और कुछ विशेष प्रकार की वनस्पतियों वाले क्षेत्रों में इन्हें देखना अधिक कठिन था। अलग-अलग प्राकृतिक परिस्थितियों में कछुओं की दृश्यता के अंतर को ध्यान में रखकर वैज्ञानिकों ने उनकी कुल आबादी का अधिक विश्वसनीय अनुमान तैयार किया।

    आबादी में सुधार के बावजूद अल्डाब्रा के विशाल कछुओं के सामने कई खतरे बने हुए हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में सूखे की अवधि लंबी और बार-बार होने की आशंका है। इससे कछुओं के लिए भोजन और छाया की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर एटोल के निचले हिस्सों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। इसके अलावा, जंगली बिल्लियां और काले चूहे कछुओं के अंडों तथा नवजात बच्चों को नुकसान पहुंचाते हैं। जंगली बकरियों को वर्ष 2012 में यहां से हटाया जा चुका है, क्योंकि वे वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाती थीं। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में आबादी में होने वाले बदलावों पर नजर रखने के लिए नियमित सर्वेक्षण जरूरी हैं। करीब 1.83 लाख कछुओं का नया अनुमान आगे की निगरानी के लिए आधार उपलब्ध कराएगा, जिससे पर्यावरणीय बदलावों और अन्य खतरों के प्रभाव का समय रहते आकलन किया जा सकेगा।

  • अंटार्कटिका में पेंग्विन की आबादी में 63% की गिरावट, गर्म होता समुद्र और भोजन की कमी बढ़ा रही चिंता

    अंटार्कटिका में पेंग्विन की आबादी में 63% की गिरावट, गर्म होता समुद्र और भोजन की कमी बढ़ा रही चिंता


    नई दिल्ली । अंटार्कटिका की बर्फीली दुनिया से वन्यजीवों को लेकर एक चिंताजनक खबर सामने आई है। यहां स्थित जावोडोवस्की द्वीप पर रहने वाले चिनस्ट्रैप पेंग्विन की आबादी में पिछले 14 वर्षों के दौरान भारी गिरावट दर्ज की गई है। कभी दुनिया की सबसे बड़ी चिनस्ट्रैप पेंग्विन कॉलोनी के रूप में पहचाने जाने वाले इस द्वीप पर अब इनकी संख्या पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी के मुताबिक वर्ष 2011 से 2025 के बीच यहां पेंग्विन के घोंसलों की संख्या में करीब 63 प्रतिशत की कमी आई है। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार इस दौरान इनकी प्रजनन करने वाली आबादी लगभग 10.9 लाख से घटकर 4.02 लाख रह गई। यानी करीब 6.8 लाख पेंग्विन के बराबर आबादी कम हो गई है। इस बदलाव ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है और समुद्र के बदलते पर्यावरण पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
    करंट बायोलॉजी नामक वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान को पेंग्विन की आबादी में गिरावट से जुड़े संभावित कारणों के रूप में देखा गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक समुद्र का तापमान बदलने से वहां रहने वाले छोटे जीवों की उपलब्धता और उनके फैलाव पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव उन समुद्री पक्षियों पर पड़ता है जो भोजन के लिए इन्हीं जीवों पर निर्भर रहते हैं। चिनस्ट्रैप पेंग्विन के भोजन में अंटार्कटिक क्रिल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्रिल समुद्र में पाए जाने वाले छोटे जीव हैं जो झींगे जैसे दिखाई देते हैं और पेंग्विन समेत कई समुद्री जीवों के लिए भोजन का प्रमुख स्रोत हैं।
    ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिकों ने पेंग्विन की आबादी और उनकी गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके तहत ड्रोन से तस्वीरें ली गईं और हवाई तस्वीरों तथा सैटेलाइट रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। कुछ पेंग्विन पर ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर यह समझने की कोशिश भी की गई कि वे भोजन की तलाश में किन इलाकों तक जाते हैं। अध्ययन में सामने आया कि ये पेंग्विन द्वीप के उत्तर-पश्चिम में मौजूद ठंडे पानी वाले क्षेत्रों में भोजन तलाशना पसंद करते हैं। वहां क्रिल मिलने की संभावना रहती है। लेकिन समुद्र के गर्म होने से क्रिल की उपलब्धता और उनके रहने के क्षेत्रों में बदलाव हो सकता है। ऐसी स्थिति में पेंग्विन को भोजन खोजने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है जिससे उनकी सेहत और प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
    शोधकर्ताओं ने वर्ष 2016 में जावोडोवस्की द्वीप पर हुए ज्वालामुखी विस्फोट को भी ध्यान में रखा। हालांकि पेंग्विन की आबादी में गिरावट इस घटना से पहले ही शुरू हो चुकी थी। इसलिए वैज्ञानिकों ने विस्फोट को इस लंबे समय से जारी गिरावट का मुख्य कारण नहीं माना है। अध्ययन में समुद्री परिस्थितियों में होने वाले बदलावों को अधिक गंभीरता से समझने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
    पेंग्विन की संख्या में गिरावट के बाद जावोडोवस्की द्वीप अब दुनिया की सबसे बड़ी पेंग्विन कॉलोनी का दर्जा खो चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक अंटार्कटिका के रॉस सागर में स्थित केप अडारे अब दुनिया की सबसे बड़ी पेंग्विन कॉलोनी के रूप में पहचाना जा रहा है जहां बड़ी संख्या में अडेली पेंग्विन रहते हैं। अध्ययन यह भी संकेत देता है कि पर्यावरण में बदलाव का असर सभी पेंग्विन प्रजातियों पर एक जैसा नहीं पड़ रहा है।
    वैज्ञानिकों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह समझना है कि जावोडोवस्की द्वीप पर पेंग्विन की आबादी में गिरावट कितनी तेजी से जारी रह सकती है। यदि समुद्र के तापमान और भोजन की उपलब्धता में बदलाव लंबे समय तक जारी रहते हैं तो इन पक्षियों के लिए अपने बच्चों का पालन-पोषण करना और जीवित रहना अधिक कठिन हो सकता है। यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर उन दूरस्थ इलाकों में भी दिखाई दे रहा है जहां मानवीय गतिविधियां बहुत सीमित हैं। पेंग्विन की घटती संख्या अंटार्कटिका के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत बन गई है।
  • ग्लोबल वार्मिंग का खतरनाक असर: समुद्र का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर पर, मुंबई-कोलकाता समेत करोड़ों लोगों के भविष्य पर संकट

    ग्लोबल वार्मिंग का खतरनाक असर: समुद्र का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर पर, मुंबई-कोलकाता समेत करोड़ों लोगों के भविष्य पर संकट


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र की नई चेतावनी ने ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को एक बार फिर दुनिया के सामने गंभीर रूप से रख दिया है। समुद्र का लगातार बढ़ता जलस्तर अब केवल छोटे द्वीपीय देशों की समस्या नहीं रह गया है बल्कि भारत समेत दुनिया के बड़े और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शहर भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर का असर भारत के कोलकाता और मुंबई जैसे महानगरों पर भी पड़ सकता है जहां लाखों लोगों के जीवन और संपत्ति पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर और बर्फ की विशाल परतें तेजी से पिघल रही हैं जबकि समुद्र का पानी गर्म होने के कारण उसका फैलाव भी बढ़ रहा है। इन दोनों कारणों से समुद्र का जलस्तर लगातार ऊपर जा रहा है। वर्ष 2024 में समुद्र के जलस्तर में सालाना बढ़ोतरी करीब छह मिलीमीटर दर्ज की गई जो अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक बताई गई है। यह आंकड़ा भले ही छोटा दिखाई दे लेकिन लंबे समय में इसका असर करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ सकता है।

    पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स की 55वीं बैठक के दौरान जारी रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों को विशेष रूप से संवेदनशील बताया गया है। भारत के कोलकाता और मुंबई के साथ बांग्लादेश की राजधानी ढाका जैसे बड़े शहरों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से बड़े पैमाने पर विस्थापन का खतरा पैदा हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक इन क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घर स्थायी रूप से पानी की चपेट में आने का जोखिम है। हालांकि इस स्थिति के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं बताई गई है लेकिन चेतावनी साफ है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं रोकी गई तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

    संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने कहा है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर केवल तटीय क्षेत्रों की जमीन और इमारतों को प्रभावित करने वाली समस्या नहीं है। इसका सीधा असर लोगों की सेहत खाद्य सुरक्षा मानवाधिकार और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ सकता है। जब किसी समुदाय को अपनी पुश्तैनी जमीन और घर छोड़ने पड़ते हैं तो वह केवल एक स्थान नहीं खोता बल्कि अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी खो सकता है। यही कारण है कि सरकारों को समुद्र के बढ़ते जलस्तर को अपनी विकास और शहरी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।

    रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। दक्षिण एशिया में बड़ी संख्या में ग्लेशियर होने के कारण हिमालयी क्षेत्र को तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगले 15 से 20 वर्षों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से दक्षिण एशिया में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके बाद पानी की उपलब्धता में कमी और सूखे जैसी स्थिति पैदा होने की आशंका है जिससे खेती और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    दुनिया भर में करीब 77 करोड़ लोग ऐसे तटीय इलाकों में रहते हैं जो समुद्र के उच्च ज्वार स्तर से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से इन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के साथ परिवहन ऊर्जा जल आपूर्ति इमारतों और भूजल संसाधनों पर भी खतरा बढ़ रहा है। अनुमान है कि दुनिया भर में करीब 1.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य के इंफ्रास्ट्रक्चर पर इसका जोखिम मंडरा रहा है।

    संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट दुनिया के लिए साफ संदेश है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है। अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो समुद्र का बढ़ता पानी आने वाले वर्षों में महानगरों से लेकर छोटे तटीय समुदायों तक की तस्वीर बदल सकता है।

  • ‘आपने 200 साल में किया, हमसे कुछ दशकों में बदलाव की उम्‍मीद क्यों?’ CJI सूर्यकांत ने विकसित देशों से पूछा सवाल

    ‘आपने 200 साल में किया, हमसे कुछ दशकों में बदलाव की उम्‍मीद क्यों?’ CJI सूर्यकांत ने विकसित देशों से पूछा सवाल


    नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने विकसित देशों से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने की उनकी अपेक्षाओं पर सवाल उठाते हुए जलवायु न्याय और साझा जिम्मेदारी की जरूरत बताई। लंदन स्थित कॉमनवेल्थ सचिवालय में 56 देशों के साझा मंच पर ‘जलवायु न्याय पर नीति संवाद’ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिन औद्योगिक देशों को स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बढ़ने में करीब दो सदियां लगीं, वे अब विकासशील देशों से कुछ ही दशकों में उसी बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं।

    विकासशील देशों पर तेजी से बदलाव का दबाव

    CJI ने कहा कि जो देश अभी औद्योगीकरण के दौर से गुजर रहे हैं, उनसे तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की अपेक्षा की जाती है। ऐसा न कर पाने पर उन्हें आलोचना का सामना भी करना पड़ता है। दूसरी ओर, जिन विकसित देशों की ओर से यह बदलाव जल्द करने की मांग की जा रही है, उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक ताकत खड़ी करने में करीब दो सदियां कोयले और तेल पर निर्भर रहकर बिताईं।

    उन्होंने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस बदलाव की रफ्तार तय करते समय विकासशील देशों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा।

    कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम से जुड़ी नई चुनौती

    CJI सूर्यकांत ने कहा कि कॉमनवेल्थ देशों के स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम जैसे खनिजों पर भी निर्भर करता है। इन खनिजों के खनन का पर्यावरण और समाज दोनों पर असर पड़ता है।

    उन्होंने कहा कि विकासशील देश अपनी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण पहले से कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में उन्हें अवास्तविक गति से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए मजबूर करना नई समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए ऊर्जा परिवर्तन की तात्कालिकता को निष्पक्षता और साझा जिम्मेदारी के साथ संतुलित करना जरूरी है।

    पर्यावरण बनाम विकास नहीं, संतुलन का रास्ता जरूरी

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर्यावरण, पारिस्थितिकी और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उन्होंने जाम्बिया हाईकोर्ट के एक मामले का भी उदाहरण दिया, जिसमें पानी को प्रदूषित करने वाली कॉपर खनन कंपनी को जिम्मेदार ठहराया गया था।

    उनके मुताबिक, कॉमनवेल्थ के देश एक-दूसरे के अनुभवों से सीखकर स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव को बेहतर तरीके से लागू कर सकते हैं, ताकि इसकी भारी कीमत आम लोगों को न चुकानी पड़े।

    CJI ने कहा कि जलवायु से जुड़े मामलों में हर देश की अदालत को नए सिरे से अलग कानूनी शब्दावली गढ़ने की जरूरत नहीं है। अदालतें कॉमनवेल्थ के दूसरे देशों में प्रभावी रहे विचारों और समाधानों से सीख सकती हैं। हालांकि, इन्हें अपने देश के संवैधानिक, सामाजिक और पर्यावरणीय हालात के मुताबिक ढालना होगा।

    घायल जवानों के लिए सड़क चौड़ीकरण का दिया उदाहरण

    CJI सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के सामने आए एक मामले का जिक्र करते हुए बताया कि घायल अर्धसैनिक बलों के जवानों को सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल तक पहुंचाने के लिए सड़क चौड़ी करने के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाने का मामला सामने आया था।

    उन्होंने कहा कि अदालत के सामने दुविधा यह थी कि न तो पेड़ काटने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत किया जा सकता था और न ही घायल जवानों के लिए एंबुलेंस के रास्ते को रोका जा सकता था।

    ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क चौड़ीकरण पर रोक लगाने के बजाय बड़े पैमाने पर क्षतिपूरक वनीकरण का आदेश दिया। CJI ने बताया कि इस वनीकरण की निगरानी अब भी की जा रही है।

    ‘कई बार तीसरा रास्ता तलाशना पड़ता है’

    CJI ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को हमेशा एक-दूसरे के विरोधी पक्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। कई परिस्थितियों में अदालतों को ऐसा समाधान तलाशना होता है, जिससे पर्यावरण की सुरक्षा के साथ विकास की जायज जरूरतें भी पूरी हो सकें।

    उनके मुताबिक, न्यायिक रचनात्मकता का उद्देश्य कई बार ऐसा तीसरा रास्ता तलाशना होता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और विकास दोनों को आगे बढ़ाने की गुंजाइश हो।

  • BRICS Summit 2026 से पहले दिल्ली में महामंथन, पर्यावरण पर 4 बड़े मुद्दों को लेकर बनेगी साझा रणनीति

    BRICS Summit 2026 से पहले दिल्ली में महामंथन, पर्यावरण पर 4 बड़े मुद्दों को लेकर बनेगी साझा रणनीति


    नई दिल्ली । ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली में सदस्य देशों के पर्यावरण मंत्रियों की अहम बैठक होने जा रही है। भारत की अध्यक्षता में 18 अगस्त को आयोजित होने वाली इस बैठक में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। बैठक का मुख्य फोकस सतत जीवनशैली को बढ़ावा देने जंगलों की आग से निपटने सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करने और जलवायु परिवर्तन के असर के प्रति बेहतर अनुकूलन की रणनीति तैयार करने पर रहेगा। माना जा रहा है कि बैठक के बाद इन मुद्दों को लेकर साझा बयान भी जारी किया जा सकता है।

    पर्यावरण मंत्रियों की बैठक से एक दिन पहले 17 अगस्त को पर्यावरण कार्य समूह और जलवायु परिवर्तन एवं टिकाऊ विकास से जुड़े संपर्क समूह के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक भी होगी। इन बैठकों को भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता 2026 की व्यापक थीम सुदृढ़शीलता नवाचार सहयोग और सतत विकास से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास को लेकर सामूहिक सहयोग को और मजबूत करना है।

    बैठक में सबसे अहम मुद्दों में से एक सर्कुलर इकोनॉमी यानी चक्रीय अर्थव्यवस्था रहेगा। इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने के साथ कचरे को कम करना और दोबारा उपयोग की संभावनाओं को बढ़ाना है। इसके लिए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व जैसे नीतिगत ढांचे को मजबूत करने और प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन की दिशा में सदस्य देशों के अनुभव साझा किए जाएंगे। माना जा रहा है कि अलग अलग देशों में अपनाई जा रही सफल व्यवस्थाओं से सीख लेकर संसाधनों के कुशल उपयोग के लिए साझा रणनीति पर जोर दिया जाएगा।

    जंगल की आग का प्रबंधन भी बैठक के प्रमुख एजेंडे में शामिल है। दुनियाभर में बढ़ती जंगल की आग पर्यावरण के साथ साथ वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। ऐसे में ब्रिक्स देश डेटा संग्रह निगरानी क्षमता निर्माण और समय रहते आग का पता लगाने जैसी व्यवस्थाओं पर सहयोग बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। रोकथाम से लेकर तैयारी और आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया तक एक बेहतर व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।

    तीसरा प्रमुख मुद्दा सतत जीवनशैली का है। संसाधनों के बढ़ते इस्तेमाल और पर्यावरण पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए लोगों की जीवनशैली में ऐसे बदलाव लाने पर जोर दिया जा रहा है जिससे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रह सके। ब्रिक्स देशों के बीच ज्ञान साझा करने और सफल प्रयोगों को एक दूसरे तक पहुंचाने पर भी चर्चा होगी। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर ऐसे नए और व्यावहारिक मॉडल विकसित करना है जिन्हें बड़े स्तर पर लागू किया जा सके।

    चौथा महत्वपूर्ण मुद्दा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अनुकूलन का रहेगा। इसमें समुदायों को केंद्र में रखकर जलवायु जोखिमों से निपटने की रणनीति तैयार करने पर जोर दिया जाएगा। पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभवों को आधुनिक उपायों के साथ जोड़कर जलवायु अनुकूलन को अधिक प्रभावी बनाने पर चर्चा हो सकती है। इसके अलावा सदस्य देशों के बीच तकनीकी सहयोग और सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान प्रदान को बढ़ावा देने पर भी जोर रहेगा।

    दिल्ली में होने वाली यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन वैश्विक स्तर पर बड़ी चुनौतियां बन चुके हैं। ऐसे में ब्रिक्स देशों के बीच साझा प्रयासों और नीतिगत सहयोग को मजबूत करने की दिशा में इसे अहम कदम माना जा रहा है। बैठक के निष्कर्ष और संभावित साझा बयान से यह संकेत मिल सकता है कि भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह की सामूहिक रणनीति को आगे बढ़ाना चाहता है।

  • कैलिफोर्निया में बढ़ा जंगल की आग का खतरा, रिकॉर्ड वाइल्डफायर से अलर्ट पर प्रशासन

    कैलिफोर्निया में बढ़ा जंगल की आग का खतरा, रिकॉर्ड वाइल्डफायर से अलर्ट पर प्रशासन


    नई दिल्ली ।अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में जंगल की आग यानी वाइल्डफायर का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बढ़ते तापमान, लंबे सूखे और तेजी से सूखती वनस्पतियों ने राज्य को आग के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब अधिकारी पारंपरिक “फायर सीजन” की अवधारणा को छोड़कर पूरे साल आग के खतरे की बात करने लगे हैं। इस वर्ष अभी जंगल की आग का चरम मौसम शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन दमकल विभाग पहले ही 2,580 से अधिक वाइल्डफायर घटनाओं का सामना कर चुका है।

    कैलिफोर्निया वन एवं अग्नि सुरक्षा विभाग के अनुसार इस साल अब तक राज्य में 2,584 जंगल की आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 79,690 एकड़ से अधिक क्षेत्र जलकर राख हो गया है। इन आगजनी की घटनाओं में 25 इमारतें भी नष्ट हुई हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि अब तक किसी की मौत की पुष्टि नहीं हुई है।

    सोमवार को भी रिवरसाइड, केर्न और सैन डिएगो समेत कई इलाकों में जंगलों में आग जलती रही। दमकल अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में तापमान और बढ़ने तथा मौसम के और अधिक शुष्क होने के कारण आग लगने की घटनाएं सामान्य से कहीं ज्यादा हो सकती हैं।

    सीएएल फायर के बटालियन चीफ डेविड एक्यूना ने कहा कि अब “फायर सीजन” शब्द पुराना हो चुका है। उनके मुताबिक जंगलों में आग लगने का खतरा केवल गर्मियों और पतझड़ तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे साल बना रहता है। इसी वजह से विभाग अब “पीक फायर ईयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गंभीर बना रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अच्छी बारिश के कारण बड़ी मात्रा में वनस्पति उगी थी। अब वही वनस्पति गर्म और सूखे मौसम में सूखकर आग के लिए ईंधन का काम कर रही है। इससे आग तेजी से फैलने और बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में लेने की आशंका बढ़ गई है।

    सीएएल फायर के बटालियन प्रमुख ब्रेंट पास्कुआ ने कहा कि सभी प्रेडिक्टिव मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस साल औसत से अधिक खतरनाक वाइल्डफायर सीजन देखने को मिल सकता है। वहीं वैज्ञानिकों ने भी चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कैलिफोर्निया में आग का मौसम पहले की तुलना में जल्दी शुरू हो रहा है और अधिक समय तक बना रहता है।

    यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया लॉस एंजिल्स की एक स्टडी में पाया गया कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण 1992 से 2020 के बीच कैलिफोर्निया में आग का मौसम छह से 46 दिन पहले शुरू होने लगा है। अध्ययन के अनुसार घास, झाड़ियों और पेड़ों में नमी की कमी आग लगने के समय और उसकी तीव्रता को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक है।

    कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने भी हाल ही में चेतावनी दी थी कि जलवायु परिवर्तन मौसम को और अधिक खतरनाक बना रहा है। उन्होंने कहा कि अब जंगल की आग का कोई ऑफ-सीजन नहीं बचा है और एक छोटी सी चिंगारी भी बड़ी तबाही में बदल सकती है।

    राज्य सरकार ने इस खतरे से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में फायर ब्रिगेड के बजट को लगभग दोगुना कर दिया है। साथ ही दमकल कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई है और दुनिया के सबसे बड़े एरियल फायरफाइटिंग बेड़ों में से एक का निर्माण किया गया है। अधिकारियों ने नागरिकों से भी अपील की है कि वे अपने घरों के आसपास सुरक्षा क्षेत्र बनाएं, आपातकालीन किट तैयार रखें और स्थानीय अलर्ट सिस्टम से जुड़े रहें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कैलिफोर्निया के लिए चुनौती और बढ़ सकती है। ऐसे में प्रशासन और नागरिकों दोनों को सतर्क रहकर तैयारी करनी होगी ताकि किसी भी संभावित आपदा से नुकसान को कम किया जा सके।

  • यूरोप पर गर्मी का कहर: फ्रांस में 18 मौतें, ब्रिटेन में रेड अलर्ट, कई देशों में आपात हालात

    यूरोप पर गर्मी का कहर: फ्रांस में 18 मौतें, ब्रिटेन में रेड अलर्ट, कई देशों में आपात हालात


    नई दिल्ली । यूरोप इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में है और हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, जर्मनी और बेल्जियम समेत कई देशों में तापमान सामान्य से कहीं अधिक दर्ज किया जा रहा है। गर्मी का असर केवल लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है बल्कि परिवहन व्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, शिक्षा व्यवस्था और दैनिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस तरह की चरम मौसमीय घटनाएं पहले की तुलना में अधिक खतरनाक और बार-बार देखने को मिल रही हैं।

    फ्रांस में स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। देश के आधे से अधिक हिस्सों में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है और लगभग 3.9 करोड़ लोग इसकी जद में हैं। भीषण गर्मी के कारण अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें दो छोटे बच्चे भी शामिल हैं। बताया गया है कि दोनों बच्चों को एक कार के अंदर बेहोश अवस्था में पाया गया था। हालात की गंभीरता को देखते हुए फ्रांस सरकार ने आपात समीक्षा बैठक बुलाने का फैसला किया है। देशभर में 1,350 से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं ताकि बच्चों को गर्मी के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके।

    ब्रिटेन में भी गर्मी ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यूके हेल्थ सिक्योरिटी एजेंसी ने इंग्लैंड के छह क्षेत्रों में रेड हेल्थ वार्निंग जारी की है। यह चेतावनी बताती है कि अत्यधिक गर्मी स्वस्थ लोगों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इंग्लैंड और वेल्स में तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इससे वर्ष 1976 का जून माह का तापमान रिकॉर्ड भी टूटने की संभावना जताई जा रही है। वैज्ञानिकों ने इसके पीछे “हीट डोम” को जिम्मेदार बताया है जो पश्चिमी यूरोप के ऊपर गर्म हवा को फंसा देता है और तापमान को लगातार बढ़ाता रहता है।

    स्पेन में भी हालात असामान्य बने हुए हैं। आमतौर पर अपेक्षाकृत ठंडा माना जाने वाला सान सेबेस्टियन क्षेत्र भी 40 डिग्री सेल्सियस तापमान झेल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार देश के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से 5 से 10 डिग्री अधिक दर्ज किया जा रहा है। वहीं उत्तरी क्षेत्रों में यह अंतर 10 डिग्री से भी ज्यादा हो सकता है।

    इटली ने 12 शहरों में रेड हीट अलर्ट जारी किया है जबकि दक्षिण-पश्चिम फ्रांस में एक परमाणु संयंत्र को नदी के पानी के अत्यधिक गर्म होने के कारण अपना एक रिएक्टर बंद करना पड़ा। जर्मनी में सप्ताहांत के दौरान गर्मी से जुड़े हादसों में पांच लोगों की मौत हुई है। फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर भी यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा जहां विमान लंबे समय तक रनवे पर खड़े रहने के कारण लोग गर्मी से बेहाल हो गए।

    बेल्जियम के मौसम विभाग ने भी चेतावनी दी है कि यह हीटवेव एक सप्ताह तक जारी रह सकती है और तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दिनों में यूरोप के कई देशों में स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और बढ़ सकता है। बढ़ती गर्मी ने एक बार फिर जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है।

  • मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर

    मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली ।देश के कई हिस्सों में मानसून की दस्तक के बावजूद अपेक्षित बारिश नहीं होने से चिंता बढ़ रही है। इसी बीच प्रशांत महासागर से सामने आए नए वैज्ञानिक संकेतों ने मौसम विशेषज्ञों और किसानों की बेचैनी और बढ़ा दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली अल नीनो प्रणाली विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो रही है। यदि यह और मजबूत होती है तो इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न के साथ भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कई हिस्सों में समुद्र की सतह सामान्य से अधिक ऊंची दर्ज की गई है। यह स्थिति इस बात का संकेत मानी जाती है कि समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो वह फैलता है और समुद्र की सतह का स्तर बढ़ जाता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर अल नीनो की स्थिति को जन्म देती है।

    अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। इसके प्रभाव केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते बल्कि यह दुनिया के कई देशों में मौसम के स्वरूप को बदल सकती है। कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी पड़ सकती है तो कुछ स्थानों पर सामान्य से कम या अधिक वर्षा देखने को मिल सकती है।

    मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां वर्ष 1997 में बने अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो से कुछ हद तक मेल खाती हैं। उस समय विकसित हुई प्रणाली को गॉडजिला अल नीनो कहा गया था क्योंकि उसके प्रभाव व्यापक और बेहद गंभीर थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं तो आने वाले महीनों में इसका असर और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

    विशेषज्ञों ने समुद्र में बनने वाली गर्म पानी की विशाल लहरों पर भी ध्यान दिलाया है। इन्हें केल्विन वेव कहा जाता है जो हजारों किलोमीटर तक फैल सकती हैं और समुद्री तापमान में तेजी से बदलाव लाती हैं। ऐसी गतिविधियां आमतौर पर अल नीनो के मजबूत होने का संकेत मानी जाती हैं।

    भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। यदि अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है या वर्षा का वितरण असंतुलित होता है तो खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।

    हालांकि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रारंभिक संकेतों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। आने वाले हफ्तों में समुद्री तापमान और मौसमीय गतिविधियों की लगातार निगरानी की जाएगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अल नीनो कितना मजबूत होगा और उसका वास्तविक प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ेगा।

    फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय की नजर प्रशांत महासागर की बदलती परिस्थितियों पर टिकी हुई है, क्योंकि इनके परिणाम आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम और भारत के मानसून की दिशा तय कर सकते हैं।

  • महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा

    महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा


    नई दिल्ली । धरती पर जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर जंगलों की आग, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ते समुद्र स्तर की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा अदृश्य खतरा तेजी से बढ़ रहा है जो पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बदल सकता है। यह खतरा अटलांटिक महासागर की गहराइयों में बहने वाली विशाल समुद्री धारा AMOC यानी अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन से जुड़ा है, जिसे धरती की जलवायु प्रणाली की रीढ़ भी माना जाता है।

    AMOC एक ऐसा महासागरीय तंत्र है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी को उत्तरी अटलांटिक और यूरोप की ओर ले जाता है। वहां यह पानी ठंडा होकर भारी हो जाता है और हजारों मीटर गहराई में जाकर वापस दक्षिण दिशा की ओर बहता है। यह निरंतर प्रक्रिया सदियों से वैश्विक तापमान, समुद्री लवणता और मौसम संतुलन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती रही है।

    हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह डेटा संकेतों के अनुसार यह शक्तिशाली समुद्री धारा अब धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रणाली और अधिक धीमी पड़ गई या पूरी तरह असंतुलित हो गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार इसके कमजोर होने से उत्तरी यूरोप में सर्दियां और अधिक कठोर हो सकती हैं, जहां तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे तक गिर सकता है। वहीं दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मानसून के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र स्तर बढ़ने का खतरा भी बढ़ सकता है, जिससे तटीय इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

    इस पूरे मुद्दे की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह खतरा दिखाई नहीं देता। यह समुद्र की हजारों मीटर गहराई में बेहद धीमी गति से काम करता है, इसलिए इसका कोई स्पष्ट दृश्य प्रमाण नहीं होता जिसे कैमरे में कैद कर दिखाया जा सके। इसी कारण यह विषय आम जनता की नजरों से अक्सर दूर रह जाता है, जबकि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर बेहद बड़ा हो सकता है।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिक जलवायु संकटों में सबसे बड़ी समस्या यही है कि कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं अदृश्य हैं। वे न तो तूफान की तरह दिखाई देती हैं और न ही आग की तरह तुरंत महसूस होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव लंबे समय में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।

    इस स्थिति की तुलना अक्सर महासागरों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से की जाती है, जो आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन पूरे समुद्री जीवन को प्रभावित करता है। इसी तरह AMOC भी एक ऐसा सिस्टम है जिसकी गिरावट धीरे-धीरे लेकिन गहरे प्रभाव के साथ सामने आ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के जलवायु संकेतों को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए वैश्विक स्तर पर इस पर लगातार निगरानी और शोध बेहद जरूरी है ताकि समय रहते इसके प्रभावों को समझा और नियंत्रित किया जा सके।

  • होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट

    होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट


    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे समुद्री मार्गों का महत्व अक्सर चर्चा में रहता है। इन मार्गों पर किसी भी तरह का भू-राजनीतिक तनाव या सैन्य संघर्ष वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इन दिनों पश्चिमी देशों और वैज्ञानिकों की चिंता किसी समुद्री व्यापारिक मार्ग को लेकर नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राकृतिक समुद्री धारा को लेकर है जो यूरोप के मौसम और जीवनशैली की आधारशिला मानी जाती है। यह धारा है गल्फ स्ट्रीम, जिसके कमजोर पड़ने की आशंका ने वैज्ञानिकों को सतर्क कर दिया है।

    गल्फ स्ट्रीम अटलांटिक महासागर में बहने वाली गर्म समुद्री धारा है, जो एक बड़े समुद्री परिसंचरण तंत्र का हिस्सा है। वैज्ञानिक इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) के नाम से जानते हैं। यह प्रणाली समुद्र के भीतर एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों से गर्म पानी उत्तर दिशा की ओर बहता है और ठंडे क्षेत्रों में पहुंचकर नीचे डूब जाता है। इसके बाद यह ठंडा पानी फिर दक्षिण की ओर लौटता है। यह सतत चक्र पृथ्वी के तापमान और मौसम को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

    यूरोप के अपेक्षाकृत गर्म मौसम के पीछे भी इसी गल्फ स्ट्रीम का बड़ा योगदान माना जाता है। ब्रिटेन, नॉर्वे और पश्चिमी यूरोप के कई देशों में सर्दियां उतनी कठोर नहीं होतीं जितनी समान अक्षांश वाले अन्य क्षेत्रों में होती हैं। इसका कारण यही गर्म समुद्री धारा है, जो इन क्षेत्रों तक गर्मी पहुंचाती रहती है। यदि यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है तो यूरोप का जलवायु संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग इस समुद्री तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। बढ़ते तापमान के कारण आर्कटिक और उत्तरी क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र में मीठे पानी की मात्रा बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मीठा पानी खारे पानी की तुलना में हल्का होता है, जिससे समुद्री जल का सामान्य डूबने वाला चक्र प्रभावित हो सकता है। यदि पानी पर्याप्त मात्रा में नीचे नहीं डूबेगा तो AMOC की गति धीमी पड़ सकती है और गल्फ स्ट्रीम कमजोर हो सकती है।

    यदि ऐसा होता है तो इसके प्रभाव बेहद व्यापक होंगे। उत्तर-पश्चिम यूरोप में तापमान कई डिग्री तक गिर सकता है, जिससे भीषण ठंड का दौर शुरू हो सकता है। दक्षिणी यूरोप में बारिश का पैटर्न बदलने से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, ऊर्जा की मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा वैश्विक मुद्दा बन सकता है।

    हालांकि वैज्ञानिकों को कुछ उम्मीदें भी दिखाई दे रही हैं। हालिया शोधों में संकेत मिले हैं कि आर्कटिक महासागर में बर्फ पिघलने से बनने वाले नए खुले समुद्री क्षेत्र पानी को तेजी से ठंडा करने में मदद कर सकते हैं। इससे समुद्री परिसंचरण तंत्र को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। हालांकि यह संभावना अभी शोध के स्तर पर है और वैज्ञानिक लगातार इस पर निगरानी बनाए हुए हैं।

    कुल मिलाकर गल्फ स्ट्रीम का भविष्य केवल यूरोप ही नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि वैज्ञानिक और नीति निर्माता इस समुद्री धारा की स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं।