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  • सिंधु जल संधि को लेकर वायरल दावों पर सच्चाई: क्या वाकई पाकिस्तान में पानी का संकट बढ़ा?

    सिंधु जल संधि को लेकर वायरल दावों पर सच्चाई: क्या वाकई पाकिस्तान में पानी का संकट बढ़ा?



    नई दिल्ली। हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि Indus Waters Treaty खत्म या स्थगित हो गई है, जिसके कारण पाकिस्तान में गंभीर जल संकट और कृषि संकट पैदा हो गया है। हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक और ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर यह दावा पूरी तरह सही नहीं पाया गया है।

    सिंधु जल संधि की वास्तविक स्थिति
    सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। इसके तहत:

    भारत को पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास, सतलुज) मिलीं

    पाकिस्तान को पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम, चिनाब) मिलीं यह संधि आज भी कानूनी रूप से लागू है और इसे अब तक किसी आधिकारिक निर्णय द्वारा समाप्त नहीं किया गया है।

    पाकिस्तान में जल संकट की सच्चाई
    पाकिस्तान में जल संकट की समस्या वास्तविक है, लेकिन इसके पीछे कई आंतरिक और पर्यावरणीय कारण है

    पुरानी और कमजोर सिंचाई व्यवस्था

    जल संरक्षण की कमी और पानी की बर्बादी

    बढ़ती जनसंख्या का दबाव

    जलवायु परिवर्तन और बारिश में अनियमितता

    भूजल का अत्यधिक उपयोग

    विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या लंबे समय से बनी हुई संरचनात्मक (systemic) समस्या है, न कि केवल किसी एक संधि का परिणाम।

    कृषि पर प्रभाव
    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि का बड़ा योगदान है, जो मुख्य रूप से सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। लेकिन, चावल, गेहूं और गन्ने की खेती पहले से जल संकट से प्रभावित हैसिंचाई प्रणाली में सुधार की आवश्यकता हैकुछ क्षेत्रों में किसानों को पानी की कमी का सामना करना पड़ता है हालांकि यह कहना कि संधि खत्म होने से अचानक कृषि ठप हो गई है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

    भारत की भूमिका पर दावे
    कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि भारत ने किसी घटना के बाद संधि को स्थगित किया है। लेकिन अब तक किसी भी आधिकारिक सरकारी या अंतरराष्ट्रीय घोषणा में यह पुष्टि नहीं हुई है कि संधि स्थगित या समाप्त की गई हो।

    सिंधु जल संधि अभी भी एक सक्रिय अंतरराष्ट्रीय जल समझौता है। पाकिस्तान में जल संकट वास्तविक है, लेकिन इसका मुख्य कारण आंतरिक जल प्रबंधन और पर्यावरणीय चुनौतियाँ हैं, न कि संधि का समाप्त होना।

  • ओजोन परत की रिकवरी में आ रही बाधा, फीडस्टॉक रसायनों के रिसाव से सुधार में आ सकती है देरी

    ओजोन परत की रिकवरी में आ रही बाधा, फीडस्टॉक रसायनों के रिसाव से सुधार में आ सकती है देरी

    नई दिल्ली। ओजोन परत की सुधार प्रक्रिया को लेकर अब तक मिल रहे सकारात्मक संकेतों के बीच एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। Nature Communications में प्रकाशित शोध के अनुसार, औद्योगिक फीडस्टॉक रसायनों का छिपा हुआ रिसाव ओजोन परत की रिकवरी को धीमा कर सकता है। यह रिसाव पहले के अनुमान से कई गुना अधिक पाया गया है, जिससे 1980 के स्तर तक वापसी में अतिरिक्त समय लग सकता है।

    ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की एक अहम सुरक्षा परत है, जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया था कि अंटार्कटिका के ऊपर यह परत तेजी से पतली हो रही है, जिसे ओजोन छिद्र के रूप में जाना गया। इसका मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसे रसायन थे, जिनका उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और एयरोसोल उत्पादों में होता था।

    इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल लागू किया गया, जिसके तहत 197 देशों ने ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का संकल्प लिया। वैज्ञानिकों के अनुसार इन प्रयासों का असर दिख रहा है और ओजोन परत धीरे-धीरे सुधर रही है। अनुमान है कि यह 2040 से 2060 के बीच 1980 के स्तर के करीब पहुंच सकती है, जिससे त्वचा कैंसर और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों में कमी आने की संभावना है।

    हालांकि, नए अध्ययन में एक अहम खामी सामने आई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि फीडस्टॉक रसायन जिनका उपयोग प्लास्टिक, नॉन-स्टिक कोटिंग्स और अन्य उत्पादों के निर्माण में होता है वास्तव में अपेक्षा से अधिक मात्रा में वातावरण में रिस रहे हैं। पहले जहां इनसे लगभग 0.5 प्रतिशत उत्सर्जन का अनुमान था, वहीं अब यह तीन से चार प्रतिशत तक पाया गया है। यह अतिरिक्त रिसाव ओजोन परत के सुधार की गति को प्रभावित कर रहा है।

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो ओजोन परत को 1980 के स्तर तक पहुंचने में करीब सात साल की अतिरिक्त देरी हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि औद्योगिक रसायनों के उपयोग और उनके उत्सर्जन पर सख्त निगरानी जरूरी है। साथ ही, रासायनिक उद्योग के पास मौजूद कम हानिकारक विकल्पों को अपनाकर इस जोखिम को कम किया जा सकता है।