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  • उच्च शिक्षा या नौकरी के बावजूद परिवार की देखभाल करने वाली महिला 'गृहिणी', कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

    उच्च शिक्षा या नौकरी के बावजूद परिवार की देखभाल करने वाली महिला 'गृहिणी', कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

    नई दिल्ली ।कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक सड़क हादसे से जुड़े मुआवजे के मामले की सुनवाई करते हुए ‘गृहिणी’ और ‘होममेकर’ शब्द की परिभाषा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक टिप्पणी की है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने घर पर परिवार के सदस्यों की सेवा और देखभाल करती है, तो उसे कानूनी व सामाजिक रूप से ‘गृहिणी’ ही माना जाएगा। इसके लिए महिला का अनपढ़ होना या केवल घर के कामों तक सीमित रहना बिल्कुल आवश्यक नहीं है, भले ही उसके पास उच्च शैक्षणिक डिग्री हो या वह कोई नौकरी करती हो।

    न्यायमूर्ति चिल्लाकुर सुमलता की एकल पीठ ने यह टिप्पणी कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम से जुड़े एक दुर्घटना मुआवजे के मामले पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में बायोटेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर एक महिला वर्ष 2013 में बस दुर्घटना के दौरान घायल हो गई थी। पीड़िता ने दुर्घटना के कारण हुए आर्थिक नुकसान और अपनी कार्यक्षमता प्रभावित होने का हवाला देते हुए मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। वहीं परिवहन निगम का तर्क था कि महिला की उच्च शिक्षा को देखते हुए उसे केवल एक सामान्य गृहिणी मानकर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता।

    उच्च न्यायालय ने परिवहन निगम की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि कोई महिला कितनी भी पढ़ी-लिखी हो या उसके पास डॉक्टरेट जैसी उच्च उपाधि ही क्यों न हो, यदि वह घर पर अपने परिवार की भलाई के लिए योगदान दे रही है, तो वह गृहिणी की श्रेणी में आती है। पीठ ने माना कि एक पेशेवर या कामकाजी महिला भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए गृहिणी की भूमिका निभाती है और उसके इस योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने गृहिणी शब्द के अर्थ को और अधिक विस्तार देते हुए कहा कि जो व्यक्ति बिना थके परिवार के लिए मेहनत करता है, अपने आराम का त्याग करता है और एक खुशहाल घर का आधार बनता है, वह होममेकर है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह अवधारणा केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कोई भी व्यक्ति जो घर चलाने और परिवार के पोषण में योगदान देता है, वह इस परिभाषा के दायरे में आता है।

    इस मामले में अदालत ने महिला के चिकित्सकीय स्थिति और उपचार की अवधि का आकलन करते हुए माना कि चोटों के कारण पीड़िता को कम से कम तीन महीने तक पूर्ण विश्राम करना पड़ा। इस दौरान वह अपने परिवार की सेवा करने में असमर्थ रही, जो कि एक प्रत्यक्ष क्षति है। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए पीड़िता की काल्पनिक आय तय की और निचली अदालत द्वारा निर्धारित राशि के अतिरिक्त 1,96,800 रुपये का बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश जारी किया।

    मध्य प्रदेश सहित देश भर के कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों के बीच उच्च न्यायालय के इस फैसले की काफी सराहना हो रही है। इस निर्णय को महिलाओं द्वारा घर और परिवार के प्रति दिए जाने वाले अमूल्य और अनपेक्षित योगदान को कानूनी रूप से मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

  • कर्नाटक में तीन तमिलों की कथित मुठभेड़ पर विवाद गहराया, विपक्ष ने निष्पक्ष जांच और बढ़े मुआवजे की मांग की

    कर्नाटक में तीन तमिलों की कथित मुठभेड़ पर विवाद गहराया, विपक्ष ने निष्पक्ष जांच और बढ़े मुआवजे की मांग की


    नई दिल्ली ।कर्नाटक के चामराजनगर और मैसूर क्षेत्र में वन विभाग के कर्मियों के साथ कथित मुठभेड़ में तीन तमिल लोगों की मौत के बाद विवाद लगातार गहराता जा रहा है। घटना को लेकर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों और नेताओं ने सवाल उठाए हैं। मृतकों के परिवारों के लिए घोषित मुआवजे को बढ़ाने के साथ ही मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की जा रही है।

    बताया गया है कि वन क्षेत्र में तीन लोगों और वन विभाग के कर्मचारियों के बीच कथित मुठभेड़ हुई थी। इसमें तीनों लोगों की मौत हो गई। शुरुआती तौर पर उन्हें शिकारी होने के संदेह से जोड़ा गया। हालांकि घटना के बाद सामने आए आरोपों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने पूरे मामले की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    घटना के बाद चामराजनगर के हनूर क्षेत्र में मृतकों के परिवारों और स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी जताई और घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की। मामले को लेकर तमिलनाडु में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हुई।

    तमिलनाडु के कई नेताओं ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कर्नाटक सरकार से विस्तृत जांच कराने की मांग की है। कुछ नेताओं ने कथित मुठभेड़ को फर्जी मुठभेड़ करार देते हुए मृतकों के परिवारों को पर्याप्त आर्थिक सहायता देने की मांग की। साथ ही दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है।

    तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने घटना पर गंभीर चिंता जताते हुए हत्या का मामला दर्ज करने और पारदर्शी तथा निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग की। उन्होंने मृतकों के परिवारों को उचित मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग भी रखी।

    पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के पलानीस्वामी ने भी मामले को लेकर कर्नाटक सरकार पर सवाल उठाए और केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि मृतकों के परिजनों के लिए घोषित पांच लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त नहीं है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए।

    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने भी घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने वन विभाग की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को अस्वीकार्य बताते हुए मामले में गंभीर जांच की जरूरत बताई। उनके अनुसार, घटना की वास्तविक परिस्थितियां सामने आनी चाहिए और मृतकों के परिवारों को न्याय मिलना चाहिए।

    दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। विरोध बढ़ने के बाद मजिस्ट्रेट जांच का निर्णय भी लिया गया है। जांच का उद्देश्य घटना के दौरान वास्तव में क्या हुआ, मुठभेड़ की परिस्थितियां क्या थीं और इसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका क्या रही, जैसे सवालों का जवाब तलाशना है।

    मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर उठ रही मांग है। एक तरफ वन विभाग की ओर से घटना को मुठभेड़ की परिस्थितियों से जोड़ा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मृतकों के परिवार और राजनीतिक दल इसे गंभीर संदेह के साथ देख रहे हैं।

    अब निगाह मजिस्ट्रेट जांच के निष्कर्षों पर है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि तीनों लोगों की मौत किन परिस्थितियों में हुई और क्या कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी। फिलहाल मुआवजा बढ़ाने, जिम्मेदारी तय करने और स्वतंत्र जांच की मांग के कारण यह मामला कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • किसानों से भूमि अधिग्रहण पर उन्हें दिया जाएगा चार गुना मुआवजा : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    किसानों से भूमि अधिग्रहण पर उन्हें दिया जाएगा चार गुना मुआवजा : मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि हमारी सरकार खेती और किसान के हितों की रक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता से कार्य कर रही है। उन्होंने किसानों को भरोसा देते हुए कहा कि किन्हीं भी शासकीय योजनाओं के निर्माण के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण करने पर किसानों को एक-दो नहीं, पूरे चार गुना मुआवजा दिया जाएगा।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव मंगलवार शाम को मंत्रालय से भोपाल की करौंद कृषि उपज मंडी परिसर में हुए बलराम कृषि महोत्सव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने किसानों से अपनी जमीन हर हाल में सुरक्षित रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि भूमि हमारी माता है। यह हमारा उदर-पोषण करती है। इसे किसी को न बेचें।

    मुख्यमंत्री ने किसानों से कहा कि आपके खेत सरकार के लिए देवस्थल है और आपका एक-एक दाना हमारे लिए प्रसाद के समान है। आपके पसीने की हरेक बूंद के सम्मान के लिए हमारी सरकार हमेशा आपके साथ है। उन्होंने कहा कि बलराम कृषि महोत्सव किसानों की मेहनत, समर्पण और कृषि क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को सम्मान देने का माध्यम है।

    मुख्यमंत्री ने वीसी से बलराम कृषि महोत्सव में मौजूद किसानों से संवाद भी किया। उन्होंने कहा कि आपकी खुशी हमारे लिए होली और सबसे बड़ी दिवाली है। उन्होंने किसानों से पूरे उत्साह के साथ बलराम कृषि महोत्सव में सहभागी बनने का आह्वान किया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के सभी जिलों में बलराम कृषि महोत्सव आयोजित किए जा रहे हैं। बीते 26 दिनों में यह प्रदेश का 14वां बलराम कृषि महोत्सव आयोजन है। उन्होंने कहा कि बहुत जल्द भोपाल मुख्यालय में भी एक बड़ा कृषि महोत्सव आयोजित किया जाएगा।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारी सरकार ने किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से “कवच” योजना शुरू की है। इससे सहकारी खातों की पुरानी गड़बड़ियां दूर कर पांच हजार किसानों को ऋण और विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलाया गया है। किसानों को बिना ब्याज के ऋण और ऋण चुकाने के लिए पूरे 12 महीने का समय देने की व्यवस्था भी इस योजना में की गई है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्य प्रदेश का किसान अपने परिश्रम से प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है। मध्य प्रदेश दलहन में पहले अन्न उत्पादन में देश में दूसरे, , तिलहन में दूसरे और दुग्ध उत्पादन में तीसरे स्थान पर है। जैविक खेती और जैविक कपास उत्पादन में प्रदेश पूरे देश में अव्वल है।

    उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की आय के साधन बढ़ाने, खेती की लागत घटाने तथा तकनीक और नवाचार के माध्यम से उत्पादन एवं आमदनी बढ़ाने पर विशेष जोर दे रही है। हमने प्रदेश में सिंचाई क्षमता को 100 लाख हैक्टेयर तक बढ़ाने, उद्यानिकी का रकबा 30 लाख हैक्टेयर करने तथा 10 हजार नई सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने किसानों से फसल विविधीकरण अपनाने, उद्यानिकी और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने तथा पशुपालन एवं मछली पालन से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदेश में खेती को सिर्फ अन्न उत्पादन का जरिया होने तक सीमित न रखकर इसे प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग से जोड़कर किसानों की आय के नए रास्ते खोले जा रहे है।

    बलराम कृषि महोत्सव में स्थानीय विधायक विष्णु खत्री, तीरथ सिंह मीणा, गोपाल सिंह मीणा, कलेक्टर प्रियंक मिश्रा सहित अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधिगण, वरिष्ठ जिलाधिकारीगण सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रीय किसान बंधु उपस्थित थे। विधायक रामेश्वर शर्मा और अपर मुख्य सचिव नीरज मंडलोई ने मंत्रालय से ही बलराम कृषि महोत्सव में सहभागिता की।

  • नेटफ्लिक्स पर टॉप ट्रेंड कर रही 'मुसाफिर कैफे', मुख्य किरदार 'चंदर' के लिए विक्रांत मैसी को मिली मोटी रकम

    नेटफ्लिक्स पर टॉप ट्रेंड कर रही 'मुसाफिर कैफे', मुख्य किरदार 'चंदर' के लिए विक्रांत मैसी को मिली मोटी रकम


    नई दिल्ली । ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई रोमांटिक ड्रामा सीरीज ‘मुसाफिर कैफे’ दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है। रिलीज होते ही यह सीरीज प्लेटफॉर्म की टॉप 10 ट्रेंडिंग लिस्ट में पहले स्थान पर काबिज हो चुकी है। मशहूर लेखक दिव्य प्रकाश दुबे के इसी नाम से लिखे गए चर्चित उपन्यास पर आधारित इस सीरीज को दर्शकों का जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है। रुचिर अरुण के निर्देशन में बनी इस सीरीज की कहानी, किरदारों की अदाकारी और इसकी स्टारकास्ट की फीस को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीरीज में मुख्य किरदार ‘चंदर’ की भूमिका निभाने वाले अभिनेता विक्रांत मैसी सबसे ज्यादा फीस लेने वाले कलाकार बने हैं। दावों के अनुसार, विक्रांत मैसी को इस सीरीज में काम करने के लिए 10 से 15 करोड़ रुपये के बीच की मोटी रकम मिली है। वहीं, सीरीज में चंदर की पहली पसंद और बिंदास लड़की ‘सुधा’ का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री वेदिका पिंटो को अपने रोल के लिए लगभग 3 से 5 करोड़ रुपये की फीस दी गई है।

    सीरीज में दूसरा मुख्य महिला किरदार ‘प्रीति’ का है, जिसे अभिनेत्री महिमा मकवाना ने निभाया है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि महिमा की फीस वेदिका पिंटो से थोड़ी कम रही है। महिमा को इस रोल के लिए करीब 2 से 3 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। इसके अलावा, सीरीज में ‘मार्क’ के महत्वपूर्ण सपोर्टिंग रोल में नजर आए दिग्गज अभिनेता आदिल हुसैन को 3 से 4 करोड़ रुपये की फीस मिली है।

    इन मुख्य कलाकारों के अलावा सपोर्टिंग रोल्स में नजर आईं अनुभा फतेहपुरिया, लवलीन मिश्रा और सादिया सिद्दीकी जैसे अनुभवी कलाकारों को 80 लाख रुपये से लेकर 2 करोड़ रुपये तक का पारिश्रमिक दिया गया है। हालांकि, फीस से जुड़ा यह पूरा आंकड़ा मीडिया रिपोर्ट्स के दावों पर आधारित है। रिश्तों की कश्मकश, प्यार और सपनों के बीच बुनी गई ‘मुसाफिर कैफे’ अपनी सादगी और किरदारों के बेहतरीन अभिनय के कारण दर्शकों का दिल जीत रही है।

  • इंजीनियर से HCLTech के शीर्ष पद तक का सफर, रिकॉर्ड 176 करोड़ के पैकेज के साथ चर्चा में आए C. विजयकुमार

    इंजीनियर से HCLTech के शीर्ष पद तक का सफर, रिकॉर्ड 176 करोड़ के पैकेज के साथ चर्चा में आए C. विजयकुमार

    नई दिल्ली । भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में HCLTech के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक C. विजयकुमार इन दिनों अपने रिकॉर्ड वेतन पैकेज को लेकर चर्चा में हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए उन्हें लगभग 176.47 करोड़ रुपये का कुल पारिश्रमिक मिला है, जिसके साथ वह देश के आईटी क्षेत्र के सबसे अधिक वेतन पाने वाले CEO बन गए हैं। यह पैकेज पिछले वित्त वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक है और कॉर्पोरेट जगत में नेतृत्व, प्रदर्शन और पारिश्रमिक को लेकर नई चर्चा का विषय बन गया है।

    C. विजयकुमार का पेशेवर सफर एक इंजीनियर के रूप में शुरू हुआ था। उन्होंने अपने करियर के शुरुआती वर्षों में तकनीकी और प्रबंधन से जुड़ी विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं और धीरे-धीरे कंपनी के नेतृत्व तक पहुंचे। लंबे समय तक संगठन में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करने के बाद उन्हें वर्ष 2016 में HCLTech का CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में कंपनी ने वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी को मजबूत किया और नई तकनीकों पर केंद्रित रणनीति अपनाई।

    पिछले कुछ वर्षों में HCLTech ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और इंजीनियरिंग सेवाओं जैसे क्षेत्रों में लगातार विस्तार किया है। कंपनी ने दुनिया के कई बड़े ग्राहकों के साथ अपने कारोबारी संबंध मजबूत किए हैं और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाया है। इसी रणनीति का असर कंपनी की व्यावसायिक वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उसकी स्थिति पर भी देखने को मिला है।

    विजयकुमार के कुल पारिश्रमिक में केवल मासिक वेतन ही शामिल नहीं है। इसमें मूल वेतन, प्रदर्शन आधारित बोनस, विभिन्न भत्ते और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शेयर आधारित प्रोत्साहन का है। बड़ी आईटी कंपनियां वरिष्ठ अधिकारियों को लंबे समय तक संगठन से जोड़कर रखने और उनके प्रदर्शन को प्रोत्साहित करने के लिए स्टॉक आधारित इंसेंटिव देती हैं। इसी कारण उनका कुल पैकेज 176 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचा है।

    कंपनी के निदेशक मंडल ने उनके नेतृत्व में प्राप्त व्यावसायिक उपलब्धियों और भविष्य की विकास रणनीति को ध्यान में रखते हुए पारिश्रमिक में वृद्धि को मंजूरी दी। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तकनीकी उद्योग में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और ऐसे माहौल में अनुभवी नेतृत्व को बनाए रखने के लिए कंपनियां आकर्षक वेतन और दीर्घकालिक प्रोत्साहन योजनाओं का सहारा लेती हैं। यही वजह है कि बड़े कॉर्पोरेट समूहों में CEO के वेतन पैकेज में स्टॉक इंसेंटिव का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है।

    HCLTech आज दुनिया के 60 से अधिक देशों में अपनी सेवाएं प्रदान कर रही है और विभिन्न उद्योगों के ग्राहकों के साथ काम कर रही है। कंपनी की डिजिटल सेवाओं, क्लाउड समाधान और AI आधारित तकनीकों पर बढ़ती पकड़ ने उसे वैश्विक आईटी उद्योग में मजबूत पहचान दिलाई है। C. विजयकुमार के नेतृत्व में कंपनी ने नवाचार और तकनीकी निवेश पर विशेष जोर दिया, जिससे उसकी प्रतिस्पर्धी क्षमता और कारोबारी विस्तार को नई गति मिली। उनके रिकॉर्ड वेतन पैकेज ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि वैश्विक स्तर पर सफल नेतृत्व, कारोबारी प्रदर्शन और शेयरधारकों के हितों के बीच संतुलन बनाते हुए शीर्ष प्रबंधन के पारिश्रमिक का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है।

  • करंट हादसों से भड़का किसानों का गुस्सा, सीहोर से भोपाल पहुंचे ग्रामीणों ने बिजली मुख्यालय घेरा, कार्रवाई और मुआवजे की उठाई मांग

    करंट हादसों से भड़का किसानों का गुस्सा, सीहोर से भोपाल पहुंचे ग्रामीणों ने बिजली मुख्यालय घेरा, कार्रवाई और मुआवजे की उठाई मांग

    मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में करंट लगने की लगातार सामने आई घटनाओं के विरोध में किसानों और ग्रामीणों का आक्रोश राजधानी भोपाल तक पहुंच गया। जिले के कई गांवों से सैकड़ों किसान भोपाल स्थित मध्य प्रदेश विद्युत मंडल के गोविंदपुरा मुख्यालय पहुंचे और बिजली विभाग की कथित लापरवाही के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि जर्जर बिजली लाइनों और झूलते तारों की बार-बार शिकायत करने के बावजूद विभाग ने समय रहते आवश्यक सुधार नहीं किए, जिसके कारण कई गंभीर हादसे हुए। किसानों ने दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को पर्याप्त आर्थिक सहायता और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।

    सीहोर जिले के बड़वेली, चंदेरी, बिलकिसगंज, ढाबला, मंगरखेड़ा, पचामा, पाली, जामुनिया, रामाखेड़ी और अन्य गांवों से पहुंचे किसानों ने समाजसेवी एमएस मेवाड़ा के नेतृत्व में मुख्यालय के बाहर करीब तीन घंटे तक धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने बिजली विभाग के खिलाफ नारेबाजी करते हुए कहा कि खेतों के ऊपर से गुजर रही जर्जर 11 केवी और एलटी लाइनें किसानों की जान के लिए लगातार खतरा बनी हुई हैं। उनका आरोप है कि शिकायतों के बावजूद अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था सुधारने में गंभीरता नहीं दिखाई।

    प्रदर्शन के दौरान किसानों ने बताया कि हाल के वर्षों में करंट की चपेट में आने से पांच किसान गंभीर हादसों का शिकार हुए। इनमें तीन किसानों की मौत हो चुकी है, जबकि दो किसानों के हाथ काटने पड़े। ग्रामीणों का कहना है कि इन हादसों ने प्रभावित परिवारों को आर्थिक और सामाजिक संकट में डाल दिया है। उनका आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।

    प्रदर्शनकारियों ने विद्युत मंडल के प्रबंध निदेशक ऋषि गर्ग को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने और पीड़ित परिवारों को नियमानुसार राहत उपलब्ध कराने की मांग की। किसानों ने यह भी कहा कि वे पहले मुख्यमंत्री कार्यालय, ऊर्जा मंत्री, जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को कई बार ज्ञापन दे चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका। उनका कहना है कि यदि समय रहते बिजली लाइनों की मरम्मत और रखरखाव किया जाता तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

    धरने के बाद प्रबंध निदेशक ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत करते हुए मामले की जांच कराने और नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया। किसानों ने हालांकि स्पष्ट किया कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा और यदि निर्धारित समय में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। उनका कहना है कि प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता के साथ परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जानी चाहिए, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।

    इसके बाद किसान प्रतिनिधिमंडल ने मानव अधिकार आयोग और महिला आयोग को भी ज्ञापन सौंपकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की। आयोग के अधिकारियों ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराने का भरोसा दिया। किसानों ने चेतावनी दी कि यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को 25 लाख रुपये का मुआवजा और अन्य मांगें पूरी नहीं हुईं तो सीहोर, भोपाल, शाजापुर और उज्जैन सहित आसपास के जिलों के किसान संयुक्त रूप से बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।

  • एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने पर विशाल मेगा मार्ट पर उपभोक्ता आयोग सख्त, 2.80 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश

    एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने पर विशाल मेगा मार्ट पर उपभोक्ता आयोग सख्त, 2.80 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश


    नई दिल्ली ।
    आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में एक ग्राहक को एक्सपायर्ड खाद्य उत्पाद बेचना एक रिटेल स्टोर को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने के मामले में विशाल मेगा मार्ट के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए मुआवजे और जनहित राशि सहित कुल 2.80 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने इसे उपभोक्ता सेवा में गंभीर कमी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही माना है।

    मामला 20 मार्च 2025 का है, जब कुरनूल जिले के येमिगनूर निवासी पी. श्रवण कुमार ने विशाल मेगा मार्ट से दो पैकेट आटा नूडल्स खरीदे थे। घर पहुंचने के बाद उन्होंने उसी रात एक पैकेट तैयार कर उसका सेवन किया। कुछ ही समय बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें तेज बुखार, उल्टी और पेट दर्द की शिकायत हुई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में उपचार कराना पड़ा। चिकित्सकीय जांच में इसे फूड पॉइजनिंग का मामला बताया गया।

    स्वास्थ्य खराब होने के बाद श्रवण कुमार ने घर में रखे दूसरे नूडल्स पैकेट की जांच की। इस दौरान उन्हें पता चला कि उस उत्पाद की एक्सपायरी तिथि 18 मार्च 2025 थी, जबकि खरीदारी 20 मार्च को की गई थी। यानी संबंधित उत्पाद की वैध अवधि समाप्त होने के दो दिन बाद भी उसे बिक्री के लिए रखा गया था। इसके बाद उन्होंने पूरे मामले को कानूनी रूप से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

    पीड़ित ने दिसंबर 2025 में स्टोर प्रबंधन को कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन निर्धारित समय में कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने मामले की सुनवाई के लिए स्टोर को नोटिस जारी किया, लेकिन सुनवाई के दौरान स्टोर का कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ। शिकायतकर्ता ने खरीद का बिल, मेडिकल रिपोर्ट और एक्सपायर्ड उत्पाद का पैकेट आयोग के समक्ष साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया, जिन्हें आयोग ने महत्वपूर्ण प्रमाण माना।

    आयोग ने अपने फैसले में कहा कि एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री की बिक्री उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है और यह सेवा में स्पष्ट कमी की श्रेणी में आता है। आयोग का मानना था कि ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इससे आम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। आयोग ने यह भी कहा कि व्यवसायिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे बिक्री से पहले प्रत्येक खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता और वैधता सुनिश्चित करें।

    अपने आदेश में आयोग ने विशाल मेगा मार्ट को शिकायतकर्ता को मानसिक पीड़ा के लिए 25 हजार रुपये तथा मुकदमे के खर्च के रूप में 5 हजार रुपये देने का निर्देश दिया। इसके अलावा जनहित को ध्यान में रखते हुए 2.50 लाख रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराने का भी आदेश दिया गया। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी राशि 45 दिनों के भीतर जमा करनी होगी। निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं होने पर संबंधित राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

    यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही यह सभी खुदरा दुकानों और सुपरमार्केट के लिए स्पष्ट संदेश है कि खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और एक्सपायरी तिथि की अनदेखी गंभीर कानूनी परिणाम ला सकती है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि उपभोक्ताओं को किसी भी खाद्य उत्पाद की खरीदारी से पहले उसकी निर्माण और एक्सपायरी तिथि अवश्य जांचनी चाहिए, ताकि इस प्रकार की घटनाओं से बचा जा सके।

  • 'मुख्यमंत्री के कामकाज में अदालत दखल नहीं दे सकती', करूर हादसे पर विजय के दौरे के खिलाफ डीएमके की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

    'मुख्यमंत्री के कामकाज में अदालत दखल नहीं दे सकती', करूर हादसे पर विजय के दौरे के खिलाफ डीएमके की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के करूर भगदड़ मामले से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री विजय को पीड़ित परिवारों से मिलने तथा मुआवजा और नियुक्ति पत्र वितरित करने से रोकने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मुख्यमंत्री के प्रशासनिक या सार्वजनिक कार्यक्रमों का निर्धारण करना न्यायालय का कार्य नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनीतिक मतभेदों को अदालत के माध्यम से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और राजनीतिक मंचों पर सुलझाया जाना चाहिए।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता पक्ष से कहा कि अदालत को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि यदि किसी राजनीतिक दल या सरकार के नेता किसी मुद्दे पर सार्वजनिक बयान देते हैं, तो विपक्ष भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है। न्यायालय ने इस प्रकार के विवादों में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया।

    यह मामला पिछले वर्ष करूर में आयोजित एक राजनीतिक रैली के दौरान हुई भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई थी। घटना के बाद राज्य में व्यापक चर्चा हुई और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। प्रारंभिक स्तर पर जांच विशेष जांच दल को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी गई। मामले की निगरानी भी न्यायिक व्यवस्था के तहत गठित समिति द्वारा की जा रही है, जिससे जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।

    मुख्यमंत्री विजय ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों से मुलाकात करने और प्रत्येक प्रभावित परिवार को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की घोषणा की है। इसके अलावा पात्र परिवारों को सरकारी नौकरी से संबंधित नियुक्ति पत्र भी दिए जाने की योजना है। इसी प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया कि इससे चल रही जांच प्रभावित हो सकती है।

    याचिका में यह भी कहा गया था कि पीड़ित परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया जांच पर असर डाल सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि अदालत किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रमों या प्रशासनिक निर्णयों पर इस प्रकार का निर्देश जारी नहीं कर सकती। न्यायालय का मानना था कि जब जांच पहले से स्वतंत्र एजेंसी की निगरानी में चल रही है, तब केवल आशंका के आधार पर किसी कार्यक्रम पर रोक लगाने का औचित्य नहीं बनता।

    इस फैसले को राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि करूर हादसा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार पीड़ित परिवारों को राहत और सहायता उपलब्ध कराने की बात कह रही है, वहीं विपक्ष जांच की निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब मुख्यमंत्री विजय के निर्धारित कार्यक्रम का रास्ता साफ हो गया है और वे पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर सहायता राशि तथा अन्य घोषित लाभ प्रदान कर सकेंगे। वहीं, हादसे की जांच अपनी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ती रहेगी और संबंधित एजेंसियां मामले के सभी पहलुओं की जांच जारी रखेंगी।

  • सड़कों पर गाड़ियों से पहले पैदल चलने वालों का हक, फुटपाथ और सुरक्षित आवागमन पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

    सड़कों पर गाड़ियों से पहले पैदल चलने वालों का हक, फुटपाथ और सुरक्षित आवागमन पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने पैदल यात्रियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि फुटपाथ पर सुरक्षित रूप से चलना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों का उपयोग केवल मोटर वाहनों के लिए नहीं है, बल्कि पैदल चलने वाले नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए। इस टिप्पणी को शहरी बुनियादी ढांचे, सड़क सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण माना जा रहा है।

    अदालत ने अपने फैसले में कहा कि देश के संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार में सुरक्षित पैदल आवागमन भी शामिल है। यदि किसी सड़क का निर्माण किया जाता है तो वहां पैदल यात्रियों के लिए उपयुक्त फुटपाथ और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराना भी संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की जिम्मेदारी है। केवल वाहनों की सुविधा को प्राथमिकता देकर पैदल यात्रियों की जरूरतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

    न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित और निर्धारित मार्ग उपलब्ध कराना कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसे कानूनी रूप से लागू कराया जा सकता है। अदालत का मानना है कि आधुनिक शहरी विकास के साथ-साथ पैदल यात्रियों की सुरक्षा को भी नीति निर्माण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

    यह फैसला एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया। मामले में एक छोटे बच्चे की दुखद मृत्यु हो गई थी। बच्चे के पिता उसे स्कूल लेकर जा रहे थे, तभी पीछे से आए एक भारी वाहन ने टक्कर मार दी। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि बच्चे की जान नहीं बच सकी। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि दुर्घटनास्थल पर न तो कोई फुटपाथ था और न ही पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग की व्यवस्था मौजूद थी।

    अदालत ने माना कि सड़कों पर सुरक्षित पैदल आवागमन की कमी कई बार गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बनती है। ऐसे मामलों में केवल चालक की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित संस्थाओं की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए, जिन्होंने आवश्यक बुनियादी ढांचे की व्यवस्था नहीं की। न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को नागरिक सुरक्षा से जुड़ा व्यापक प्रश्न बताया।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पीड़ित परिवार को मिलने वाले मुआवजे की राशि में भी वृद्धि की। न्यायालय ने कहा कि सड़क सुरक्षा से जुड़े मामलों में पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय दिलाने के लिए उचित और वास्तविक मुआवजा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अदालत ने संबंधित पक्षों को निर्धारित समयसीमा के भीतर भुगतान करने का निर्देश भी दिया।

    फैसले में यह भी कहा गया कि यदि किसी नागरिक के सुरक्षित फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी और संवैधानिक उपाय अपना सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में उपलब्ध कानूनी अधिकार सड़क दुर्घटना मुआवजा कानूनों से अलग और स्वतंत्र भी हो सकते हैं। इससे नागरिकों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अतिरिक्त कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देशभर के शहरी निकायों, नगर प्रशासन और सड़क निर्माण एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। आने वाले समय में शहरों और कस्बों में फुटपाथ, पैदल पार पथ और अन्य सुरक्षा सुविधाओं के विकास को अधिक प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है। यह निर्णय सड़कों को केवल वाहनों के लिए नहीं बल्कि सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित और समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • सतना में लोक अदालत का बड़ा फैसला: हजारों मामलों का निपटारा, करोड़ों का समझौता

    सतना में लोक अदालत का बड़ा फैसला: हजारों मामलों का निपटारा, करोड़ों का समझौता


    नई दिल्ली । सतना में आयोजित नेशनल लोक अदालत में 2888 मामलों का आपसी सुलह से निपटारा हुआ। इस दौरान 9.42 करोड़ रुपये से अधिक के अवार्ड पारित किए गए, जबकि 22 दंपतियों ने पुराने विवाद खत्म कर दोबारा साथ रहने का फैसला किया।

    सतना में चालू वर्ष की दूसरी नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया गया, जिसका शुभारंभ जिला जज गीता सोलंकी ने दीप प्रज्वलन कर किया। इस अवसर पर कई न्यायिक अधिकारी और अधिवक्ता मौजूद रहे। लोक अदालत में आपसी सहमति के आधार पर कुल 2888 मामलों का समाधान किया गया। इन मामलों में कुल 9 करोड़ 42 लाख 81 हजार 737 रुपये के अवार्ड पारित किए गए, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को राहत मिली।

    परिवारिक विवादों में आई सुलह, 22 जोड़े फिर साथ

    कुटुंब न्यायालय की पीठ में पेश 30 मामलों में से 22 विवादित दंपतियों के बीच समझौता कराया गया। वर्षों से अलगाव की स्थिति में चल रहे कई जोड़ों ने अदालत में एक-दूसरे को वरमाला पहनाकर नए सिरे से जीवन शुरू करने का फैसला लिया। तलाक की प्रक्रिया में पहुंचे कई दंपति भी समझाइश के बाद फिर से साथ रहने को तैयार हुए, जिससे पारिवारिक विवादों में सकारात्मक समाधान देखने को मिला।

    मोटर दुर्घटना और बीमा मामलों में बड़ा मुआवजा

    लोक अदालत में मोटर दुर्घटना से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण फैसले हुए। एक मामले में हर्षिता बत्रा को 47 लाख रुपये का चेक प्रदान किया गया। कुल 12 मामलों में 52 लाख रुपये से अधिक का अवार्ड पारित किया गया। इन मामलों में बीमा कंपनियों और पक्षकारों के बीच समझौते के बाद तेजी से निपटारा किया गया।

    विद्युत और श्रम मामलों में भी राहत

    विद्युत विभाग से जुड़े 256 मामलों का निपटारा करते हुए 86 लाख रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ। वहीं श्रम न्यायालय में 7 मामलों में 20 लाख रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति श्रमिकों को दिलाई गई।

    जमीन, चेक बाउंस और ट्रैफिक मामलों का भी समाधान

    लोक अदालत में जमीन विवाद, चेक बाउंस, आपराधिक और ट्रैफिक से जुड़े मामलों का भी समाधान किया गया। इससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने में मदद मिली। सतना की यह लोक अदालत न केवल मामलों के त्वरित निपटारे का उदाहरण बनी, बल्कि आपसी सुलह और सामाजिक संतुलन की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम साबित हुई।