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  • इंजीनियर से HCLTech के शीर्ष पद तक का सफर, रिकॉर्ड 176 करोड़ के पैकेज के साथ चर्चा में आए C. विजयकुमार

    इंजीनियर से HCLTech के शीर्ष पद तक का सफर, रिकॉर्ड 176 करोड़ के पैकेज के साथ चर्चा में आए C. विजयकुमार

    नई दिल्ली । भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में HCLTech के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक C. विजयकुमार इन दिनों अपने रिकॉर्ड वेतन पैकेज को लेकर चर्चा में हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए उन्हें लगभग 176.47 करोड़ रुपये का कुल पारिश्रमिक मिला है, जिसके साथ वह देश के आईटी क्षेत्र के सबसे अधिक वेतन पाने वाले CEO बन गए हैं। यह पैकेज पिछले वित्त वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक है और कॉर्पोरेट जगत में नेतृत्व, प्रदर्शन और पारिश्रमिक को लेकर नई चर्चा का विषय बन गया है।

    C. विजयकुमार का पेशेवर सफर एक इंजीनियर के रूप में शुरू हुआ था। उन्होंने अपने करियर के शुरुआती वर्षों में तकनीकी और प्रबंधन से जुड़ी विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं और धीरे-धीरे कंपनी के नेतृत्व तक पहुंचे। लंबे समय तक संगठन में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करने के बाद उन्हें वर्ष 2016 में HCLTech का CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में कंपनी ने वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी को मजबूत किया और नई तकनीकों पर केंद्रित रणनीति अपनाई।

    पिछले कुछ वर्षों में HCLTech ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और इंजीनियरिंग सेवाओं जैसे क्षेत्रों में लगातार विस्तार किया है। कंपनी ने दुनिया के कई बड़े ग्राहकों के साथ अपने कारोबारी संबंध मजबूत किए हैं और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाया है। इसी रणनीति का असर कंपनी की व्यावसायिक वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उसकी स्थिति पर भी देखने को मिला है।

    विजयकुमार के कुल पारिश्रमिक में केवल मासिक वेतन ही शामिल नहीं है। इसमें मूल वेतन, प्रदर्शन आधारित बोनस, विभिन्न भत्ते और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शेयर आधारित प्रोत्साहन का है। बड़ी आईटी कंपनियां वरिष्ठ अधिकारियों को लंबे समय तक संगठन से जोड़कर रखने और उनके प्रदर्शन को प्रोत्साहित करने के लिए स्टॉक आधारित इंसेंटिव देती हैं। इसी कारण उनका कुल पैकेज 176 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचा है।

    कंपनी के निदेशक मंडल ने उनके नेतृत्व में प्राप्त व्यावसायिक उपलब्धियों और भविष्य की विकास रणनीति को ध्यान में रखते हुए पारिश्रमिक में वृद्धि को मंजूरी दी। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तकनीकी उद्योग में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है और ऐसे माहौल में अनुभवी नेतृत्व को बनाए रखने के लिए कंपनियां आकर्षक वेतन और दीर्घकालिक प्रोत्साहन योजनाओं का सहारा लेती हैं। यही वजह है कि बड़े कॉर्पोरेट समूहों में CEO के वेतन पैकेज में स्टॉक इंसेंटिव का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है।

    HCLTech आज दुनिया के 60 से अधिक देशों में अपनी सेवाएं प्रदान कर रही है और विभिन्न उद्योगों के ग्राहकों के साथ काम कर रही है। कंपनी की डिजिटल सेवाओं, क्लाउड समाधान और AI आधारित तकनीकों पर बढ़ती पकड़ ने उसे वैश्विक आईटी उद्योग में मजबूत पहचान दिलाई है। C. विजयकुमार के नेतृत्व में कंपनी ने नवाचार और तकनीकी निवेश पर विशेष जोर दिया, जिससे उसकी प्रतिस्पर्धी क्षमता और कारोबारी विस्तार को नई गति मिली। उनके रिकॉर्ड वेतन पैकेज ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि वैश्विक स्तर पर सफल नेतृत्व, कारोबारी प्रदर्शन और शेयरधारकों के हितों के बीच संतुलन बनाते हुए शीर्ष प्रबंधन के पारिश्रमिक का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है।

  • करंट हादसों से भड़का किसानों का गुस्सा, सीहोर से भोपाल पहुंचे ग्रामीणों ने बिजली मुख्यालय घेरा, कार्रवाई और मुआवजे की उठाई मांग

    करंट हादसों से भड़का किसानों का गुस्सा, सीहोर से भोपाल पहुंचे ग्रामीणों ने बिजली मुख्यालय घेरा, कार्रवाई और मुआवजे की उठाई मांग

    मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में करंट लगने की लगातार सामने आई घटनाओं के विरोध में किसानों और ग्रामीणों का आक्रोश राजधानी भोपाल तक पहुंच गया। जिले के कई गांवों से सैकड़ों किसान भोपाल स्थित मध्य प्रदेश विद्युत मंडल के गोविंदपुरा मुख्यालय पहुंचे और बिजली विभाग की कथित लापरवाही के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि जर्जर बिजली लाइनों और झूलते तारों की बार-बार शिकायत करने के बावजूद विभाग ने समय रहते आवश्यक सुधार नहीं किए, जिसके कारण कई गंभीर हादसे हुए। किसानों ने दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को पर्याप्त आर्थिक सहायता और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।

    सीहोर जिले के बड़वेली, चंदेरी, बिलकिसगंज, ढाबला, मंगरखेड़ा, पचामा, पाली, जामुनिया, रामाखेड़ी और अन्य गांवों से पहुंचे किसानों ने समाजसेवी एमएस मेवाड़ा के नेतृत्व में मुख्यालय के बाहर करीब तीन घंटे तक धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने बिजली विभाग के खिलाफ नारेबाजी करते हुए कहा कि खेतों के ऊपर से गुजर रही जर्जर 11 केवी और एलटी लाइनें किसानों की जान के लिए लगातार खतरा बनी हुई हैं। उनका आरोप है कि शिकायतों के बावजूद अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था सुधारने में गंभीरता नहीं दिखाई।

    प्रदर्शन के दौरान किसानों ने बताया कि हाल के वर्षों में करंट की चपेट में आने से पांच किसान गंभीर हादसों का शिकार हुए। इनमें तीन किसानों की मौत हो चुकी है, जबकि दो किसानों के हाथ काटने पड़े। ग्रामीणों का कहना है कि इन हादसों ने प्रभावित परिवारों को आर्थिक और सामाजिक संकट में डाल दिया है। उनका आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे लोगों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।

    प्रदर्शनकारियों ने विद्युत मंडल के प्रबंध निदेशक ऋषि गर्ग को ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने और पीड़ित परिवारों को नियमानुसार राहत उपलब्ध कराने की मांग की। किसानों ने यह भी कहा कि वे पहले मुख्यमंत्री कार्यालय, ऊर्जा मंत्री, जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को कई बार ज्ञापन दे चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका। उनका कहना है कि यदि समय रहते बिजली लाइनों की मरम्मत और रखरखाव किया जाता तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

    धरने के बाद प्रबंध निदेशक ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत करते हुए मामले की जांच कराने और नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया। किसानों ने हालांकि स्पष्ट किया कि केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा और यदि निर्धारित समय में कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। उनका कहना है कि प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता के साथ परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जानी चाहिए, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके।

    इसके बाद किसान प्रतिनिधिमंडल ने मानव अधिकार आयोग और महिला आयोग को भी ज्ञापन सौंपकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की। आयोग के अधिकारियों ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराने का भरोसा दिया। किसानों ने चेतावनी दी कि यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को 25 लाख रुपये का मुआवजा और अन्य मांगें पूरी नहीं हुईं तो सीहोर, भोपाल, शाजापुर और उज्जैन सहित आसपास के जिलों के किसान संयुक्त रूप से बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।

  • एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने पर विशाल मेगा मार्ट पर उपभोक्ता आयोग सख्त, 2.80 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश

    एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने पर विशाल मेगा मार्ट पर उपभोक्ता आयोग सख्त, 2.80 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश


    नई दिल्ली ।
    आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में एक ग्राहक को एक्सपायर्ड खाद्य उत्पाद बेचना एक रिटेल स्टोर को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने के मामले में विशाल मेगा मार्ट के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए मुआवजे और जनहित राशि सहित कुल 2.80 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने इसे उपभोक्ता सेवा में गंभीर कमी और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही माना है।

    मामला 20 मार्च 2025 का है, जब कुरनूल जिले के येमिगनूर निवासी पी. श्रवण कुमार ने विशाल मेगा मार्ट से दो पैकेट आटा नूडल्स खरीदे थे। घर पहुंचने के बाद उन्होंने उसी रात एक पैकेट तैयार कर उसका सेवन किया। कुछ ही समय बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें तेज बुखार, उल्टी और पेट दर्द की शिकायत हुई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में उपचार कराना पड़ा। चिकित्सकीय जांच में इसे फूड पॉइजनिंग का मामला बताया गया।

    स्वास्थ्य खराब होने के बाद श्रवण कुमार ने घर में रखे दूसरे नूडल्स पैकेट की जांच की। इस दौरान उन्हें पता चला कि उस उत्पाद की एक्सपायरी तिथि 18 मार्च 2025 थी, जबकि खरीदारी 20 मार्च को की गई थी। यानी संबंधित उत्पाद की वैध अवधि समाप्त होने के दो दिन बाद भी उसे बिक्री के लिए रखा गया था। इसके बाद उन्होंने पूरे मामले को कानूनी रूप से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।

    पीड़ित ने दिसंबर 2025 में स्टोर प्रबंधन को कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन निर्धारित समय में कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने मामले की सुनवाई के लिए स्टोर को नोटिस जारी किया, लेकिन सुनवाई के दौरान स्टोर का कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हुआ। शिकायतकर्ता ने खरीद का बिल, मेडिकल रिपोर्ट और एक्सपायर्ड उत्पाद का पैकेट आयोग के समक्ष साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया, जिन्हें आयोग ने महत्वपूर्ण प्रमाण माना।

    आयोग ने अपने फैसले में कहा कि एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री की बिक्री उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है और यह सेवा में स्पष्ट कमी की श्रेणी में आता है। आयोग का मानना था कि ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इससे आम लोगों के जीवन और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। आयोग ने यह भी कहा कि व्यवसायिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे बिक्री से पहले प्रत्येक खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता और वैधता सुनिश्चित करें।

    अपने आदेश में आयोग ने विशाल मेगा मार्ट को शिकायतकर्ता को मानसिक पीड़ा के लिए 25 हजार रुपये तथा मुकदमे के खर्च के रूप में 5 हजार रुपये देने का निर्देश दिया। इसके अलावा जनहित को ध्यान में रखते हुए 2.50 लाख रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराने का भी आदेश दिया गया। आयोग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी राशि 45 दिनों के भीतर जमा करनी होगी। निर्धारित समय सीमा का पालन नहीं होने पर संबंधित राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

    यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही यह सभी खुदरा दुकानों और सुपरमार्केट के लिए स्पष्ट संदेश है कि खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और एक्सपायरी तिथि की अनदेखी गंभीर कानूनी परिणाम ला सकती है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि उपभोक्ताओं को किसी भी खाद्य उत्पाद की खरीदारी से पहले उसकी निर्माण और एक्सपायरी तिथि अवश्य जांचनी चाहिए, ताकि इस प्रकार की घटनाओं से बचा जा सके।

  • 'मुख्यमंत्री के कामकाज में अदालत दखल नहीं दे सकती', करूर हादसे पर विजय के दौरे के खिलाफ डीएमके की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

    'मुख्यमंत्री के कामकाज में अदालत दखल नहीं दे सकती', करूर हादसे पर विजय के दौरे के खिलाफ डीएमके की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के करूर भगदड़ मामले से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री विजय को पीड़ित परिवारों से मिलने तथा मुआवजा और नियुक्ति पत्र वितरित करने से रोकने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मुख्यमंत्री के प्रशासनिक या सार्वजनिक कार्यक्रमों का निर्धारण करना न्यायालय का कार्य नहीं है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनीतिक मतभेदों को अदालत के माध्यम से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और राजनीतिक मंचों पर सुलझाया जाना चाहिए।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता पक्ष से कहा कि अदालत को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि यदि किसी राजनीतिक दल या सरकार के नेता किसी मुद्दे पर सार्वजनिक बयान देते हैं, तो विपक्ष भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है। न्यायालय ने इस प्रकार के विवादों में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया।

    यह मामला पिछले वर्ष करूर में आयोजित एक राजनीतिक रैली के दौरान हुई भगदड़ से जुड़ा है, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई थी। घटना के बाद राज्य में व्यापक चर्चा हुई और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठी। प्रारंभिक स्तर पर जांच विशेष जांच दल को सौंपी गई थी, लेकिन बाद में जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंप दी गई। मामले की निगरानी भी न्यायिक व्यवस्था के तहत गठित समिति द्वारा की जा रही है, जिससे जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।

    मुख्यमंत्री विजय ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों से मुलाकात करने और प्रत्येक प्रभावित परिवार को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की घोषणा की है। इसके अलावा पात्र परिवारों को सरकारी नौकरी से संबंधित नियुक्ति पत्र भी दिए जाने की योजना है। इसी प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया कि इससे चल रही जांच प्रभावित हो सकती है।

    याचिका में यह भी कहा गया था कि पीड़ित परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया जांच पर असर डाल सकती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि अदालत किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रमों या प्रशासनिक निर्णयों पर इस प्रकार का निर्देश जारी नहीं कर सकती। न्यायालय का मानना था कि जब जांच पहले से स्वतंत्र एजेंसी की निगरानी में चल रही है, तब केवल आशंका के आधार पर किसी कार्यक्रम पर रोक लगाने का औचित्य नहीं बनता।

    इस फैसले को राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि करूर हादसा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। एक ओर सरकार पीड़ित परिवारों को राहत और सहायता उपलब्ध कराने की बात कह रही है, वहीं विपक्ष जांच की निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब मुख्यमंत्री विजय के निर्धारित कार्यक्रम का रास्ता साफ हो गया है और वे पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर सहायता राशि तथा अन्य घोषित लाभ प्रदान कर सकेंगे। वहीं, हादसे की जांच अपनी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ती रहेगी और संबंधित एजेंसियां मामले के सभी पहलुओं की जांच जारी रखेंगी।

  • सड़कों पर गाड़ियों से पहले पैदल चलने वालों का हक, फुटपाथ और सुरक्षित आवागमन पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

    सड़कों पर गाड़ियों से पहले पैदल चलने वालों का हक, फुटपाथ और सुरक्षित आवागमन पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने पैदल यात्रियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि फुटपाथ पर सुरक्षित रूप से चलना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों का उपयोग केवल मोटर वाहनों के लिए नहीं है, बल्कि पैदल चलने वाले नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए। इस टिप्पणी को शहरी बुनियादी ढांचे, सड़क सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण माना जा रहा है।

    अदालत ने अपने फैसले में कहा कि देश के संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार में सुरक्षित पैदल आवागमन भी शामिल है। यदि किसी सड़क का निर्माण किया जाता है तो वहां पैदल यात्रियों के लिए उपयुक्त फुटपाथ और आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराना भी संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की जिम्मेदारी है। केवल वाहनों की सुविधा को प्राथमिकता देकर पैदल यात्रियों की जरूरतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

    न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित और निर्धारित मार्ग उपलब्ध कराना कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसे कानूनी रूप से लागू कराया जा सकता है। अदालत का मानना है कि आधुनिक शहरी विकास के साथ-साथ पैदल यात्रियों की सुरक्षा को भी नीति निर्माण का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

    यह फैसला एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया। मामले में एक छोटे बच्चे की दुखद मृत्यु हो गई थी। बच्चे के पिता उसे स्कूल लेकर जा रहे थे, तभी पीछे से आए एक भारी वाहन ने टक्कर मार दी। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि बच्चे की जान नहीं बच सकी। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि दुर्घटनास्थल पर न तो कोई फुटपाथ था और न ही पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग की व्यवस्था मौजूद थी।

    अदालत ने माना कि सड़कों पर सुरक्षित पैदल आवागमन की कमी कई बार गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बनती है। ऐसे मामलों में केवल चालक की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित संस्थाओं की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए, जिन्होंने आवश्यक बुनियादी ढांचे की व्यवस्था नहीं की। न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को नागरिक सुरक्षा से जुड़ा व्यापक प्रश्न बताया।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पीड़ित परिवार को मिलने वाले मुआवजे की राशि में भी वृद्धि की। न्यायालय ने कहा कि सड़क सुरक्षा से जुड़े मामलों में पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय दिलाने के लिए उचित और वास्तविक मुआवजा सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अदालत ने संबंधित पक्षों को निर्धारित समयसीमा के भीतर भुगतान करने का निर्देश भी दिया।

    फैसले में यह भी कहा गया कि यदि किसी नागरिक के सुरक्षित फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी और संवैधानिक उपाय अपना सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में उपलब्ध कानूनी अधिकार सड़क दुर्घटना मुआवजा कानूनों से अलग और स्वतंत्र भी हो सकते हैं। इससे नागरिकों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अतिरिक्त कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देशभर के शहरी निकायों, नगर प्रशासन और सड़क निर्माण एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। आने वाले समय में शहरों और कस्बों में फुटपाथ, पैदल पार पथ और अन्य सुरक्षा सुविधाओं के विकास को अधिक प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है। यह निर्णय सड़कों को केवल वाहनों के लिए नहीं बल्कि सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित और समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • सतना में लोक अदालत का बड़ा फैसला: हजारों मामलों का निपटारा, करोड़ों का समझौता

    सतना में लोक अदालत का बड़ा फैसला: हजारों मामलों का निपटारा, करोड़ों का समझौता


    नई दिल्ली । सतना में आयोजित नेशनल लोक अदालत में 2888 मामलों का आपसी सुलह से निपटारा हुआ। इस दौरान 9.42 करोड़ रुपये से अधिक के अवार्ड पारित किए गए, जबकि 22 दंपतियों ने पुराने विवाद खत्म कर दोबारा साथ रहने का फैसला किया।

    सतना में चालू वर्ष की दूसरी नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया गया, जिसका शुभारंभ जिला जज गीता सोलंकी ने दीप प्रज्वलन कर किया। इस अवसर पर कई न्यायिक अधिकारी और अधिवक्ता मौजूद रहे। लोक अदालत में आपसी सहमति के आधार पर कुल 2888 मामलों का समाधान किया गया। इन मामलों में कुल 9 करोड़ 42 लाख 81 हजार 737 रुपये के अवार्ड पारित किए गए, जिससे बड़ी संख्या में लोगों को राहत मिली।

    परिवारिक विवादों में आई सुलह, 22 जोड़े फिर साथ

    कुटुंब न्यायालय की पीठ में पेश 30 मामलों में से 22 विवादित दंपतियों के बीच समझौता कराया गया। वर्षों से अलगाव की स्थिति में चल रहे कई जोड़ों ने अदालत में एक-दूसरे को वरमाला पहनाकर नए सिरे से जीवन शुरू करने का फैसला लिया। तलाक की प्रक्रिया में पहुंचे कई दंपति भी समझाइश के बाद फिर से साथ रहने को तैयार हुए, जिससे पारिवारिक विवादों में सकारात्मक समाधान देखने को मिला।

    मोटर दुर्घटना और बीमा मामलों में बड़ा मुआवजा

    लोक अदालत में मोटर दुर्घटना से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण फैसले हुए। एक मामले में हर्षिता बत्रा को 47 लाख रुपये का चेक प्रदान किया गया। कुल 12 मामलों में 52 लाख रुपये से अधिक का अवार्ड पारित किया गया। इन मामलों में बीमा कंपनियों और पक्षकारों के बीच समझौते के बाद तेजी से निपटारा किया गया।

    विद्युत और श्रम मामलों में भी राहत

    विद्युत विभाग से जुड़े 256 मामलों का निपटारा करते हुए 86 लाख रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ। वहीं श्रम न्यायालय में 7 मामलों में 20 लाख रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति श्रमिकों को दिलाई गई।

    जमीन, चेक बाउंस और ट्रैफिक मामलों का भी समाधान

    लोक अदालत में जमीन विवाद, चेक बाउंस, आपराधिक और ट्रैफिक से जुड़े मामलों का भी समाधान किया गया। इससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करने में मदद मिली। सतना की यह लोक अदालत न केवल मामलों के त्वरित निपटारे का उदाहरण बनी, बल्कि आपसी सुलह और सामाजिक संतुलन की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम साबित हुई।

  • अनूपपुर बिल्डिंग हादसा: तीन की मौत, CM डॉ मोहन यादव ने दुख जताया और पीड़ितों को मुआवजे का ऐलान किया

    अनूपपुर बिल्डिंग हादसा: तीन की मौत, CM डॉ मोहन यादव ने दुख जताया और पीड़ितों को मुआवजे का ऐलान किया


    भोपाल। अनूपपुर के कोतमा बस स्टैंड के पास शनिवार को अग्रवाल लॉज की तीन मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई, जिससे तीन लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। हादसे के समय इमारत के बगल में निर्माण कार्य भी चल रहा था, जिससे यह घटना होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है और प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने का ऐलान किया। मृतकों के परिजनों को मुख्यमंत्री स्वेच्छा अनुदान और संबल योजना के तहत चार-चार लाख रुपये दिए जाएंगे। इसके अलावा, रेड क्रॉस से एक-एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। घायलों को मुख्यमंत्री स्वेच्छा अनुदान से दो-दो लाख और रेड क्रॉस से पचास-पचास हजार रुपये की राशि दी जाएगी।

    सीएम डॉ मोहन यादव ने लिखा कि राज्य सरकार प्रभावित परिवारों के साथ खड़ी है और ईश्वर से दिवंगतों की आत्मा की शांति एवं घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता है। उन्होंने कहा कि प्रभावित परिजनों को तत्काल आर्थिक सहायता दी जा रही है ताकि उन्हें राहत मिले और स्थिति संभाली जा सके।

    हादसे की सूचना मिलते ही रेस्क्यू टीम, कोतमा पुलिस, नगर पालिका और एसईसीएल की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और बचाव कार्य शुरू किया। मलबे के नीचे दबे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया और अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहीं प्रशासन ने घटना की जांच शुरू कर दी है।

    इस घटना ने शहर और राज्य में इमारतों की सुरक्षा और निर्माण मानकों के पालन की आवश्यकता को फिर से उजागर किया है। सरकार ने प्रभावित परिवारों और घायलों के साथ खड़े रहने का भरोसा दिया है और कहा है कि पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जाएगी ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी से बचा जा सके।

  • उज्जैन–जावरा ग्रीनफील्ड हाईवे: किसानों की जीत, मुआवजे की लड़ाई जारी

    उज्जैन–जावरा ग्रीनफील्ड हाईवे: किसानों की जीत, मुआवजे की लड़ाई जारी


    नई दिल्ली। उज्जैन–जावरा ग्रीनफील्ड हाईवे परियोजना को अब नॉर्मल हाईवे के रूप में स्वीकृति मिल गई है। यह फैसला प्रभावित 62 गांवों के करीब 400 किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। शनिवार देर रात किसानों ने भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर इस निर्णय के लिए उनका आभार जताया।

    किसानों ने मुख्यमंत्री से अपनी दो प्रमुख मांगों पर चर्चा की। पहली मांग थी कि हाईवे को एक्सेस कंट्रोल रोड के बजाय नॉर्मल हाईवे के रूप में बनाया जाए ताकि गांवों की कनेक्टिविटी और आवागमन प्रभावित न हो। मुख्यमंत्री ने इस मांग को स्वीकार कर किसानों को संतोष दिया।

    दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण मांग थी भूमि अधिग्रहण के लिए वास्तविक बाजार मूल्य पर मुआवजा देने की। किसानों का आरोप है कि जिला प्रशासन द्वारा तय मुआवजा दरें बेहद कम हैं। 2024–25 की गाइडलाइन के अनुसार केवल 1,700 रुपये से 10,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, उज्जैन–इंदौर ग्रीनफील्ड रोड परियोजना में किसानों को कई जगह 45 लाख रुपये प्रति बीघा तक का मुआवजा मिला था। इसके मुकाबले उज्जैन–जावरा परियोजना में केवल 2–4 लाख रुपये प्रति बीघा का प्रस्ताव है, जिसे किसान अन्यायपूर्ण मान रहे हैं।

    मुख्यमंत्री ने किसानों को भरोसा दिलाया कि उचित मुआवजा दिया जाएगा और उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने किसानों से संयम और भरोसा बनाए रखने की अपील भी की।

    इस निर्णय से प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में हल्की राहत की स्थिति है, लेकिन मुआवजे को लेकर संघर्ष अभी जारी है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कोविड वैक्सीन साइड इफेक्ट्स के लिए मुआवजा देने का दिया आदेश: नो-फॉल्ट पॉलिसी लागू, एक्सपर्ट पैनल की जरूरत नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने कोविड वैक्सीन साइड इफेक्ट्स के लिए मुआवजा देने का दिया आदेश: नो-फॉल्ट पॉलिसी लागू, एक्सपर्ट पैनल की जरूरत नहीं

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कोविड वैक्सीनेशन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सरकार को निर्देश दिया कि वैक्सीनेशन से किसी भी व्यक्ति को हुए नुकसान के लिए मुआवजा दिया जाए। इसके लिए सरकार नो-फॉल्ट कम्पनसेशन पॉलिसी बनाए।

    नो-फॉल्ट कम्पनसेशन पॉलिसी का मतलब
    इस नीति के तहत अगर किसी व्यक्ति को वैक्सीन या दवा से नुकसान होता है, तो उसे मुआवजा मिल सकता है, चाहे इसमें किसी की गलती साबित हो या न हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साइड इफेक्ट्स की मॉनिटरिंग के लिए मौजूदा सिस्टम ही जारी रहेगा, अलग से एक्सपर्ट पैनल बनाने की जरूरत नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मुख्य बातें
    साइड इफेक्ट्स के आंकड़े सार्वजनिक होंगे – वैक्सीन से जुड़े मामलों का डेटा समय-समय पर पब्लिक डोमेन में उपलब्ध कराया जाएगा।

    सरकार की गलती साबित नहीं होती – मुआवजा नीति लागू होने का मतलब यह नहीं कि सरकार या कोई अन्य अथॉरिटी अपनी गलती मान रही है।

    याचिकाएं और पृष्ठभूमि
    यह आदेश रचना गंगू और वेणुगोपालन गोविंदन द्वारा 2021 में दायर याचिकाओं पर आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनकी बेटियों की मौत कोविड वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स के कारण हुई थी।

    करुण्या गोविंदन मामला: जुलाई 2021 में कोवीशील्ड वैक्सीन लगने के महीने भर बाद करुण्या की मौत हुई। राष्ट्रीय समिति ने मामले की जांच की, लेकिन पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण वैक्सीन को सीधे मौत का कारण नहीं माना गया।

    8 साल की रितिका मामला: मई 2021 में पहली डोज के 7 दिन बाद तेज बुखार और ब्रेन ब्लड क्लोटिंग के कारण मौत। परिवार ने RTI के जरिए पता लगाया कि मौत का कारण थ्रोम्बोसिस विथ थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम था।

    ICMR और NCDC की स्टडी
    जुलाई 2025 में ICMR और NCDC ने स्टडी जारी की, जिसमें बताया गया कि 18-45 साल के लोगों में अचानक मौतों का कोविड वैक्सीन से कोई सीधा संबंध नहीं है। स्टडी में यह भी कहा गया कि गंभीर साइड इफेक्ट के मामले बहुत दुर्लभ (rare) हैं।

    अन्य संभावित कारणों में जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, पहले से मौजूद बीमारियां और कोविड के बाद के कॉम्प्लिकेशन शामिल हैं।

    भारत में विकसित कोविड वैक्सीन
    कोवैक्सिन – भारत बायोटेक ने ICMR के सहयोग से विकसित की।

    कोवीशील्ड – सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका के फॉर्मूले से बनाई।

    सुप्रीम कोर्ट का संदेश
    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वैक्सीनेशन सुरक्षित और जरूरी है, और सरकार की जिम्मेदारी है कि साइड इफेक्ट्स के लिए उचित मुआवजा नीति लागू करे। जनता को इससे घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन नो-फॉल्ट नीति से प्रभावित लोगों को राहत मिलेगी।

  • डिजिटल फ्रॉड के शिकार हुए तो मिलेगी राहत, RBI देगा 25 हजार रुपये तक का मुआवजा

    डिजिटल फ्रॉड के शिकार हुए तो मिलेगी राहत, RBI देगा 25 हजार रुपये तक का मुआवजा

    नई दिल्ली। देश में बढ़ते डिजिटल फ्रॉड के मामलों के बीच आम बैंक ग्राहकों को राहत देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ा कदम उठाया है। अब यदि कोई व्यक्ति ऑनलाइन ठगी का शिकार हो जाता है तो उसे अधिकतम 25,000 रुपये तक का मुआवजा मिल सकता है।

    दरअसल, इसी साल फरवरी में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को देखते हुए ग्राहकों को सुरक्षा देने के लिए इस योजना की घोषणा की थी। इसके तहत धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन की स्थिति में पीड़ित ग्राहक को शर्तों के साथ मुआवजा दिया जाएगा।

    एक बार ही मिलेगा मुआवजा

    RBI के प्रस्ताव के मुताबिक किसी ग्राहक को जीवन में केवल एक बार ही यह क्षतिपूर्ति दी जाएगी। यह भी तभी संभव होगा जब जांच में यह पाया जाए कि धोखाधड़ी जानबूझकर नहीं हुई और ग्राहक ने अनजाने में अपना पैसा गंवाया है।

    गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि अगर किसी ग्राहक के साथ धोखाधड़ी हो जाती है, चाहे उसमें उसकी गलती हो या किसी और की, तब भी बिना ज्यादा सवाल पूछे 25,000 रुपये तक का भुगतान किया जा सकता है, बशर्ते ट्रांजैक्शन अनजाने में हुआ हो।

    ग्राहक को भी उठाना होगा कुछ नुकसान

    प्रस्ताव के अनुसार धोखाधड़ी की कुल राशि का 15 प्रतिशत हिस्सा खाताधारक को खुद वहन करना होगा। वहीं, अगर ठगी की रकम इससे ज्यादा है, तब भी मुआवजे की अधिकतम सीमा 25,000 रुपये ही रहेगी।

    कब से लागू होगा नियम

    यह प्रस्तावित नियम 1 जुलाई 2026 या उसके बाद किए गए इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन पर लागू होंगे। केंद्रीय बैंक ने इस मसौदे पर 6 अप्रैल 2026 तक सभी हितधारकों से सुझाव और टिप्पणियां मांगी हैं।

    मुआवजा पाने के लिए जरूरी शर्त

    इस योजना का लाभ लेने के लिए पीड़ित ग्राहक को

    धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन की जानकारी अपने बैंक को देनी होगी

    साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल या हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करनी होगी

    यह शिकायत 5 कैलेंडर दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा

    ग्राहक सुरक्षा नियमों में भी बदलाव

    RBI ने डिजिटल बैंकिंग में ग्राहकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए नियमों में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव भी दिया है। ड्राफ्ट के अनुसार OTP, PIN, CVV, पासवर्ड या अन्य इलेक्ट्रॉनिक ऑथेंटिकेशन के जरिए मंजूर किए गए ट्रांजैक्शन को अधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन माना जाएगा।

    इसमें ऐसे मामलों को भी शामिल किया जाएगा, जहां ठग खुद को वैध प्राप्तकर्ता बताकर या दबाव बनाकर ग्राहकों से पैसे ट्रांसफर करा लेते हैं।
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