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  • डिजिटल पेमेंट की ओर बढ़ रहा देश… ATM की संख्या घटी, बचत खातों में जमा हुए 3.3 लाख करोड़

    डिजिटल पेमेंट की ओर बढ़ रहा देश… ATM की संख्या घटी, बचत खातों में जमा हुए 3.3 लाख करोड़


    नई दिल्ली।
    भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में एटीएम (ATM) की संख्या में कमी आई है, क्योंकि लोग डिजिटल पेमेंट (Digital payments) की ओर बढ़ रहे हैं। ई-पेमेंट नेटवर्क ने ग्राहकों की नकद निकासी की जरूरत को कम कर दिया है, भले ही बैंक शाखाओं का विस्तार जारी रहा।


    प्राइवेट बैंकों ने एटीएम सबसे ज्यादा घटाए

    रिपोर्ट के मुताबिक, निजी बैंकों ने अपना एटीएम नेटवर्क 79,884 से घटाकर 77,117 कर दिया। वहीं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने मुख्य रूप से ऑफसाइट मशीनें बंद करके अपने एटीएम 134,694 से 133,544 कर दिए।


    व्हाइट लेबल एटीएम बढ़े

    इसके विपरीत, व्हाइट लेबल एटीएम (नॉन-बैंकिंग संस्थाओं द्वारा स्थापित) ऑपरेटरों ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई और इनकी संख्या 34,602 से बढ़कर 36,216 हो गई।


    शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अंतर

    सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने ग्रामीण, अर्ध-शहरी, शहरी और महानगरीय क्षेत्रों में अपने एटीएम संतुलित रूप से वितरित रखे। हालांकि, निजी और विदेशी बैंक अभी भी अपने एटीएम मुख्य रूप से शहरी और महानगरीय केंद्रों में केंद्रित रखते हैं।


    बैंक शाखाओं का विस्तार जारी

    इस दौरान, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के तेज विस्तार के चलते बैंक शाखाओं की संख्या 2.8 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1,64,000 हो गई। सार्वजनिक बैंकों द्वारा खोली गई दो-तिहाई से अधिक नई शाखाएं ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में थीं, जबकि निजी बैंकों की केवल 37.5 प्रतिशत नई शाखाएं इन क्षेत्रों में खुलीं।

    बचत खातों और जमा राशि में वृद्धि
    बेसिक बचत बैंक जमाखातों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई, जो 2.6 प्रतिशत बढ़कर 72.4 करोड़ खाते हो गए। इन खातों में जमा राशि 9.5 प्रतिशत बढ़कर 3.3 लाख करोड़ रुपये हो गई। अधिकांश खाते बिजनेस करिस्पॉन्डेंट के माध्यम से संचालित होते हैं, जो जमीनी स्तर पर बैंकिंग पहुंच बढ़ाने में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है।


    जमा बीमा कवरेज

    जमा बीमा के संदर्भ में, रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025 के अंत तक 97.6 प्रतिशत खाते मौजूदा 5 लाख रुपये के बीमा सीमा के दायरे में थे। हालांकि, बीमाकृत जमा राशि का अनुपात पिछले वर्ष के 43.1 प्रतिशत से थोड़ा घटकर 41.5 प्रतिशत हो गया।


    डिजिटलीकरण है मुख्य कारण

    आरबीआई ने एटीएम संख्या में कमी का कारण भुगतानों के बढ़ते डिजिटलीकरण को बताया है, जिसने ग्राहकों की एटीएम के माध्यम से लेनदेन की आवश्यकता को कम कर दिया है।

  • देश के औद्योगिक उत्पादन में इजाफा, दो साल के उच्च स्तर पर पहुंची वृद्धि दर

    देश के औद्योगिक उत्पादन में इजाफा, दो साल के उच्च स्तर पर पहुंची वृद्धि दर


    नई दिल्ली।
    खनन और विनिर्माण क्षेत्रों (Mining and Manufacturing sectors) के मजबूत प्रदर्शन से नवंबर महीने में देश के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर (Country’s Industrial Production growth rate) दो साल के उच्च स्तर 6.7 प्रतिशत पर पहुंच गई। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन को मापने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) नवंबर, 2024 में पांच प्रतिशत बढ़ा था। इससे पहले औद्योगिक उत्पादन का उच्च स्तर नवंबर, 2023 में 11.9 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

    त्योहारों से पहले देश में मांग और खपत को बढ़ावा देने के लिए कई उपभोक्ता वस्तुओं पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में 22 सितंबर 2025 से कटौती की गई थी। इससे जीएसटी दरों में कमी का लाभ उठाने के लिए विनिर्माण ऑर्डरों में तेजी आई।


    अक्टूबर के आंकड़ों में बदलाव

    इसके साथ एनएसओ ने अक्टूबर 2025 के लिए औद्योगिक उत्पादन वृद्धि के आंकड़े को भी संशोधित किया है। अक्टूबर के लिए आईआईपी वृद्धि को बढ़ाकर 0.5 प्रतिशत कर दिया गया है जबकि पिछले महीने जारी अस्थायी अनुमान 0.4 प्रतिशत का था।


    बिजली उत्पादन का प्रदर्शन कमजोर

    आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2025 में विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन आठ प्रतिशत बढ़ा, जो एक साल पहले इसी महीने में 5.5 प्रतिशत था। खनन क्षेत्र का उत्पादन भी नवंबर में 5.4 प्रतिशत बढ़ा जबकि नवंबर 2024 में यह वृद्धि 1.9 प्रतिशत रही थी। हालांकि, बिजली उत्पादन का प्रदर्शन पिछले महीने कमजोर रहा। नवंबर में बिजली उत्पादन में 1.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में इसमें 4.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।


    प्रमुख क्षेत्रों में रफ्तार की वापसी

    नवंबर महीने के आईआईपी आंकड़ों में सुधार से संकेत मिलता है कि औद्योगिक गतिविधियों में खासकर विनिर्माण और खनन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में रफ्तार की वापसी हो रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल-नवंबर के दौरान देश का औद्योगिक उत्पादन 3.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा 4.1 प्रतिशत था। विनिर्माण क्षेत्र के तहत 23 में 20 उद्योग समूहों ने नवंबर 2025 में सालाना आधार पर सकारात्मक वृद्धि दर्ज की।


    अमेरिकी टैरिफ का असर

    इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, अमेरिकी टैरिफ और जुर्माने का असर कुछ विनिर्माण खंडों में दिखाई दे सकता है, जिससे जीएसटी दरों में बदलाव के सकारात्मक प्रभाव का असर कम हो सकता है।

    उन्होंने कहा कि दो महीने के बाद दिसंबर 2025 में बिजली की मांग बढ़ी है, जिससे उस महीने बिजली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और यह आईआईपी वृद्धि के लिए सकारात्मक संकेत है। नायर ने आगे कहा, हमें उम्मीद है कि दिसंबर 2025 में आईआईपी वृद्धि घटकर 3.5 से 5.0 प्रतिशत के दायरे में आ सकती है, क्योंकि तुलनात्मक आधार प्रभाव सामान्य होगा।


    औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी का मतलब

    औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी का मतलब है कि अर्थव्यवस्था की सेहत बेहतर हो रही है। इसका सीधा लाभ नौकरी, आय, व्यापार और सरकारी सेवाओं के जरिए आम आदमी तक पहुंचता है। हालांकि इसका पूरा असर दिखने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन संकेत सकारात्मक माने जाते हैं। इसे इस तरह समझा जा सकता है—


    रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना

    जब फैक्ट्रियां और उद्योग ज्यादा उत्पादन करते हैं, तो उन्हें अधिक मजदूर, तकनीशियन और कर्मचारियों की जरूरत होती है। नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। अस्थायी और कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों में भी बढ़ोतरी होती है। इससे बेरोजगारी का दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।


    आमदनी और खर्च करने की क्षमता में सुधार

    उद्योगों की स्थिति बेहतर होने पर वेतन में बढ़ोतरी, ओवरटाइम और बोनस मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इससे लोगों की खरीदने की ताकत सुधरती है।


    महंगाई पर मिला-जुला असर

    ज्यादा उत्पादन होने से बाजार में वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ती है, जिससे कई सामानों के दाम स्थिर रह सकते हैं। कुछ चीजें सस्ती भी हो सकती हैं। हालांकि अगर कच्चा माल महंगा है या ब्याज दरें ऊंची हैं, तो महंगाई पूरी तरह कम होना जरूरी नहीं।


    छोटे कारोबार और एमएसएमई को सहारा

    बड़े उद्योगों की रफ्तार बढ़ने से छोटे उद्योगों, ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग और सप्लाई चेन को भी काम मिलता है। इससे स्थानीय कारोबार को फायदा होता है।


    सरकार की आय बढ़ने से, सुविधाएं बेहतर होंगी

    उद्योगों के अच्छे प्रदर्शन से टैक्स संग्रह बढ़ता है। सरकार के पास बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च के लिए ज्यादा संसाधन होते हैं जिसका फायदा आम नागरिकों को मिलता है।


    शेयर बाजार और निवेश पर असर

    औद्योगिक उत्पादन में तेजी से बाजार में भरोसा बढ़ता है। म्यूचुअल फंड और शेयर में निवेश करने वालों को फायदा हो सकता है। हालांकि यह असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता।

  • मध्य यूरोप के इस देश में लड़कियों के हिजाब पहनने पर लगा वैन… संसद में पास हुआ बिल

    मध्य यूरोप के इस देश में लड़कियों के हिजाब पहनने पर लगा वैन… संसद में पास हुआ बिल


    वियना।
    मध्य यूरोप (Central Europe) में स्थित ऑस्ट्रिया ( Austria, located) में हाल ही में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने वाले बिल को मंजूरी मिल गई है। ऑस्ट्रियाई सांसदों ने गुरुवार को 14 साल से कम उम्र की लड़कियों के स्कूलों में हेडस्कार्फ़ पर बैन लगाने वाले कानून के पक्ष में भारी बहुमत से समर्थन दिया है। इससे पहले ऑस्ट्रिया की सरकार ने इस साल की शुरुआत में इस बैन का प्रस्ताव दिया था। सरकार ने तर्क दिया है कि इसका मकसद लड़कियों को उत्पीड़न से बचाना है।

    सरकार ने बताया कि नए नियम सितंबर में नए वार्षिक सत्र की शुरुआत के साथ पूरी तरह से लागू हो जाएंगे। इसके बाद कुछ समय तक शिक्षकों, माता-पिता और बच्चों को नए नियमों के बारे में जागरूक किया जाएगा। इस दौरान नियम तोड़ने पर कोई जुर्माना नहीं लगेगा। हालांकि बार-बार नियमों का पालन न करने पर, माता-पिता को 150 से 800 यूरो यानी करीब 175-930 डॉलर तक का जुर्माना देना होगा। सरकार ने कहा है कि इस नए कानून से लगभग 12,000 लड़कियां प्रभावित होंगी।

    बता दें कि इससे पहले 2019 में भी देश ने प्राइमरी स्कूलों में हेडस्कार्फ़ पर बैन लगा दिया था। हालांकि संवैधानिक अदालत ने इस फैसले को रद्द कर दिया था। अब एक बार फिर इस तरह के कानून को लागू करने की खबर सामने आने के बाद मानवाधिकार समूहों और विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कानून मुस्लिमों के प्रति भेदभावपूर्ण है और सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकता है।

    वहीं बिल पेश करते समय सरकार ने कहा है कि इस तरह के पर्दे से लड़कियों की आजादी छिनती है। बिल पेश कर रहीं मंत्री ने कहा, “जब किसी लड़की को… यह कहा जाता है कि उसे पुरुषों की नजर से खुद को बचाने के लिए अपने शरीर को छिपाना होगा, तो यह कोई धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि उत्पीड़न है।”

    मंत्री ने कहा कि यह बैन हिजाब और बुर्का सहित इस्लामी पर्दे के सभी रूपों पर लागू होगा। एक अन्य सांसद यानिक शेट्टी ने कहा कि हेडस्कार्फ सिर्फ कपड़ों का एक टुकड़ा नहीं है बल्कि इसके जरिए लड़कियों को सेक्सुअलाइज किया जाता है।

  • देश में पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी 2027 की जनगणना, जानें इसके फायदे-नुकसान

    देश में पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी 2027 की जनगणना, जानें इसके फायदे-नुकसान


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में जनगणना 2027 (Census 2027) में आयोजित की जाएगी और यह पहली बार पूरी तरह डिजिटल (First time All digital) रूप से होगी। गृह मंत्रालय ने मंगलवार को लोकसभा में एक लिखित जवाब में इसकी पुष्टि की। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय (Minister of State for Home Nityanand Rai.) ने कहा कि डेटा कलेक्शन मोबाइल ऐप (Data Collection Mobile App) के माध्यम से किया जाएगा। यह कदम भारत को अमेरिका, ब्रिटेन, घाना और केन्या जैसे देशों की श्रेणी में ला खड़ा करता है, जहां डिजिटल या हाइब्रिड जनगणनाएं पहले ही हो चुकी हैं। लेकिन 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले इस विविध देश में यह महत्वाकांक्षी प्रयास उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। आइए जानते हैं कि यह डिजिटल जनगणना क्या है, कैसे काम करेगी, इसके फायदे-नुकसान क्या हैं, और इससे जुड़ी चिंताएं।


    जनगणना में क्यों हुई देरी और अब क्या नया है?

    भारत में जनगणना हर दशक में होती है, जो जनसांख्यिकीय, सामाजिक, आर्थिक और अब जाति-आधारित डेटा एकत्र करती है। 1872 में पहली गैर-समकालीन जनगणना हुई थी। स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में हुई। 2011 की आखिरी पूर्ण जनगणना के बाद 2021 वाली कोविड-19 महामारी के कारण टल गई। उसके बाद चुनाव, प्रशासनिक देरी और सीमाओं को फ्रीज करने की समयसीमा बढ़ने से यह 2027 तक खिसक गई।


    2027 जनगणना भारत की 16वीं जनगणना होगी, जो दो चरणों में होगी:

    चरण 1: घर सूचीकरण और हाउस मैपिंग – अप्रैल से सितंबर 2026 तक।
    चरण 2: जनसंख्या गणना – फरवरी-मार्च 2027 (बर्फीले क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान)।


    नए पहलू:

    पूरी तरह डिजिटल: पारंपरिक कागजी फॉर्म के बजाय गणनाकारक (इनुमरेटर) अपने स्मार्टफोन (एंड्रॉयड/आईओएस) पर ऐप इस्तेमाल करेंगे। नागरिक वेब पोर्टल के जरिए स्व-गणना (सेल्फ-इनुमरेशन) कर सकेंगे।
    जाति गणना: स्वतंत्र भारत में पहली बार एससी/एसटी के अलावा अन्य जातियों का डेटा एकत्र होगा। आखिरी पूर्ण जाति गणना 1931 में हुई थी।

    भाषाई समावेशिता: ऐप 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा।
    हाइब्रिड फॉर्मेट: कनेक्टिविटी की समस्या वाले क्षेत्रों में कागजी फॉर्म का बैकअप भी होगा।
    यह जनगणना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत सीमांकन (डिलिमिटेशन), आरक्षण नीतियों, एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) और महिलाओं के 33% आरक्षण के लिए आधार बनेगी।


    मोबाइल ऐप से डेटा कलेक्शन, वेब पोर्टल से स्वंय गणना

    लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बताया- यह निर्णय लिया गया है कि जनगणना 2027 डिजिटल माध्यम से की जाएगी। डेटा मोबाइल ऐप के जरिए एकत्र किया जाएगा। जनता वेब पोर्टल के माध्यम से भी स्वयं-जनगणना कर सकेंगी।

    उन्होंने कहा कि जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति की जानकारी उस स्थान पर जुटाई जाती है, जहां वे गणना अवधि के दौरान पाए जाते हैं। इसके साथ ही जन्म स्थान, अंतिम निवास, मौजूदा स्थान पर रहने की अवधि और प्रवास के कारण से संबंधित विस्तृत प्रश्न भी शामिल होंगे। सरकार फील्ड वर्क शुरू होने से पहले प्रश्नावली को आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित करेगी।

    डिजिटल जनगणना के फायदेः तेज और अधिक सटीक जनगणना की उम्मीद
    डिजिटल तरीकों से भारत उन बड़ी समस्याओं को दूर कर सकता है, जो वर्षों से कागज आधारित प्रक्रिया को धीमा और त्रुटिपूर्ण बनाती रही हैं।
    प्रारंभिक आंकड़े 10 दिनों में
    अंतिम आंकड़े 6-9 महीनों में
    (2011 की जनगणना के आंकड़े अंतिम रूप पाने में कई साल लगे थे)

    तेज उपलब्ध डेटा का उपयोग 2029 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, योजनाओं, फंड आवंटन, और जनकल्याण कार्यक्रमों की सटीक योजना में सीधे किया जा सकेगा। जियो-टैगिंग, ऐप के अंदर सत्यापन सुविधाएं और स्वयं-जनगणना से ग्रामीण इलाकों, प्रवासी आबादी और कागजी प्रक्रिया में होने वाली अंडर-काउंटिंग में महत्वपूर्ण कमी आने की उम्मीद है।


    लागत में कमी और रोजगार सृजन

    सरकार को लाखों टैबलेट खरीदने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि गणनाकर्मी अपने ही स्मार्टफोन का उपयोग करेंगे।
    कुल बजट: 14,618 करोड़ रुपये
    लगभग 2.4 करोड़ मानव-दिवस का अस्थायी रोजगार सृजन।
    नुकसान: जोखिम भी कम नहीं


    1. डिजिटल डिवाइड की चुनौती

    देश में लगभग 65% आबादी ऑनलाइन है, लेकिन पूर्वोत्तर, पहाड़ी राज्यों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की गति और उपलब्धता सीमित है। इससे सबसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छूट जाने का खतरा बढ़ जाता है।


    2. डिजिटल साक्षरता की कमी

    जनगणना के लिए तैनात तीन मिलियन से अधिक शिक्षक-आधारित गणनाकर्मियों को नई तकनीक पर गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।
    बुजुर्गों, महिलाओं और प्रवासी मजदूरों में ऐप-आधारित बातचीत के प्रति संकोच और अनिच्छा देखी जा सकती है।


    3. साइबर सुरक्षा और गोपनीयता

    जाति, प्रवास इतिहास और व्यक्तिगत सूचनाएं यदि निजी स्मार्टफोन पर स्टोर होकर मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से भेजी जाएंगी, तो डेटा लीक और साइबर हमलों का जोखिम बना रहेगा। सरकार को एन्क्रिप्शन और सुरक्षित सर्वर आर्किटेक्चर पर विशेष ध्यान देना होगा।


    4. अफ्रीकी देशों का अनुभव भी चेतावनी

    घाना, नाइजीरिया और केन्या में डिजिटल जनगणनाओं के दौरान नेटवर्क बाधाएं, डेटा अपलोड की समस्याएं, उच्च त्रुटि दर और जनता का प्रतिरोध देखने को मिला। भारत को इन अनुभवों से सीखने की जरूरत होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल जनगणना ‘भविष्य में कदम रखने जैसी’ है, लेकिन ‘जोखिम भरा एक्सपेरिमेंट’ भी है। पहुंच, गोपनीयता और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। ऑफलाइन सिंक और रीयल-टाइम सपोर्ट से चुनौतियां हल हो सकती हैं। सरकार ने राज्यों के साथ अंतर-राज्य परिषद बैठकें बढ़ाने का वादा किया है।

  • IndiGo का सिस्टम फेल होने से देश में हवाई यात्रा संकट… एयरपोर्ट पर स्टेशनों जैसा नजारा

    IndiGo का सिस्टम फेल होने से देश में हवाई यात्रा संकट… एयरपोर्ट पर स्टेशनों जैसा नजारा


    नई दिल्ली।
    हमारा प्यारा भारत (India) इस समय पर हवाई यात्रा संकट (Air Travel Crisis) का सामना कर रहा है। तेज रफ्तार ट्रेनों के जरिए और भी कम समय में यात्रा करने का सपना देखने वाला आम आदमी (Common man) इस समय इंडिगो (IndiGo Airline) के ठप्प होने से परेशान है। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडियो (IndiGo Airline) ने पिछले कुछ समय में 1 हजार से ज्यादा उड़ानों को रद्द कर दिया है, जिसकी वजह से देश भर के एयरपोर्ट्स रेलवे स्टेशन की तरह नजर आने लगे हैं। चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई है और लोग अपने गंतव्य तक जाने के लिए परेशान नजर आ रहे हैं।

    अंतर्देशीय उड़ानों का सबसे बड़ा नेटवर्क चलाने वाली इंडिगो एयरलाइन के इस संकट के पीछे कोई एक कारण नहीं है। इसके पीछे एक के बाद एक आए कई बदलाव शामिल हैं। तो आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि हजारों की संख्या में लोग एयरपोर्ट पर ही फंसते नजर आए।


    कैसे बढ़ा संकट?

    इंडिगो एयरलाइन शुरुआत से ही फ्लाइट्स के लेट होने की समस्या का सामना कर रही थी। शुरुआत ने एयरलाइन ने इसके पीछे छोटी तकनीकी खराबियां, सर्दियों के लिए फ्लाइट की नई टाइमिंग, एयरपोर्ट पर भीड़ और मौसम को जिम्मेदार बताया था। हालांकि, इसको एयरलाइन को असली झटका तब लगा जब सरकार की तरफ से फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन नामक नए नियम लागू कर दिए गए, जिनका मकसद पायलटों को थकान से बचाना था।


    सरकार ने जारी किए नए नियम

    पहले से ही स्टाफ की कमी के साथ ज्यादा उड़ानों का संचालन कर रही इंडिगो के लिए यह नियम एक बड़ी परेशानी बनकर आए। हालांकि, सरकार ने यह कदम पायलट और एयरलाइन की भलाई के लिए ही उठाया था। लेकिन पहले से ही फंसी हुई इंडिगो के लिए यह नियम झेल पाना आसान नहीं था। इन नियमों की वजह से बड़ी संख्या में पायलट अनिवार्य आराम पर चले गए, जिससे स्टाफ की भारी कमी हो गई। इसकी वजह से कई फ्लाइट्स कैंसिल करनी पड़ी।


    एयरबस 320 की चेतावनी

    फ्लाइट्स की छोटी तकनीकी खराबियों, सरकार के नए नियमों से परेशानी का सामना कर रही इंडिगो एयरलाइन के लिए असली खतरा तब सामने आया जब एयरबस 320 की चेतावनी के बाद देर रात उड़ाने प्रभावित होना शुरू हुईं। रात के 12 बजे के बाद नए नियम लागू हो गए, इसकी वजह से बहुत सारी फ्लाइट्स कैंसिल करने का सिलसिला शुरू हो गया।


    इंडिगो का बड़ा आकार

    भारत में सबसे ज्यादा उड़ानों का परिचालन करने वाली इंडिगो के लिए उसका बड़ा आकार ही संकट का कारण बन गया है। हालांकि, एयरपोर्ट पर यात्रियों की भीड़ और लगातार रद्द होती उड़ानों के बीच सरकार ने नए नियमों में कुछ राहत दी है। डीजीसीए ने शुक्रवार को नया आदेश जारी करके एक महत्वपूर्ण नियम वापस ले लिया। इसके मुताबिक अब पायलट्स की सप्ताहिक आराम को छुट्टी में नहीं बदला जा सकता है। सरकार द्वारा हटाए गए इस नियम से एयरलाइन को पायलट रोटेट करने में आसानी होगी, जिससे कुछ दबाव कम होने की उम्मीद है।

    इंडिगो भले ही इस नियम के हटने के बाद स्थिरता की उम्मीद कर रही हो, लेकिन पायलट संघ इससे नाराज नजर आता है। पायलट संघों का आरोप है कि इंडिगो के मैनेजमेंट ने समय रहते इन नियमों और परेशानियों के लिए तैयारी नहीं की। संघ के मुताबिक इंडिगो के मैनेजमेंट को इस बात की जानकारी थी कि सरकार ऐसे नियम लागू करने वाली है। इसके लिए नई भर्ती की जानी चाहिए थी, लेकिन एयरलाइ्ंस ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पहले से ही कम स्टाफ को और कम कर दिया, जिससे समस्या बिगड़ गई।

    कई विशेषज्ञों का कहना है कि इंडिगो ने इस संकट को बढ़ावा देकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की है। इससे सरकार द्वारा लागू किए गए नियमों में ढिलाई ली जा सके। हालांकि, पायलट संघ ने इसे पायलट और हवाई यात्रियों की सुरक्षा के संकट से जोड़ा है।

    कारण चाहे कुछ भी हो, लेकिन परेशानी आम आदमी को ही हो रही है। देश भर के एयरपोर्ट्स पर इस समय भारी भीड़ मची हुई है। हर दिन एयरलाइन की तरफ से सैकड़ों फ्लाइट्स को कैंसिल किया जा रहा है, जिसकी वजह से एयरपोर्ट पर स्टेशन जैसे हालात बने हुए हैं। सरकार का मानना है कि 10 फरवरी 2026 तक पूरी तरह से स्थिरता लाई जा सकती है।

  • देशभर में अगले साल तक पूरी तरह बंद हो जाएंगे टोल बूथ, नए व्यवस्था होगी शुरू

    देशभर में अगले साल तक पूरी तरह बंद हो जाएंगे टोल बूथ, नए व्यवस्था होगी शुरू


    नई दिल्ली।
    देशभर में टोल टैक्स सिस्टम (Country Toll Tax System ) को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने गुरुवार को कहा कि एक वर्ष में वर्तमान टोल टैक्स कलेक्शन सिस्टम (बैरियर) (Toll Tax Collection System (Barrier)) को पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा। टोल टैक्स को इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से चुकाया जाएगा।

    लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान गडकरी ने बताया कि करीब दस स्थानों पर इस नई व्यवस्था को लागू किया जा चुका है। अगले एक वर्ष के अंदर इसे पूरे देश के नेशनल हाईवे नेटवर्क पर लागू कर दिया जाएगा। इससे टोल बूथ पर रुकने की जरूरत नहीं होगी। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश में करीब 10 लाख करोड़ की 4500 राजमार्ग परियोजनाएं चल रही है। बड़ी मात्रा में हाईवे निर्माण के साथ डिजिटल टोल सिस्टम लागू होने से देश में सड़क यातायात और परिवहन की रफ्तार और तेज हो जाएगी।

    टोल सिस्टम पूरी तरह से डिजिटल होगा : सरकार
    भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम ने राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह (एनईटीसी) तकनीक विकसित की है। इसका मकसद टोल सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल बनाना है। इसमें आरईआईडी यानी की रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन डिवाइस वाहन की विंडस्क्रीन पर लगाया जाता है। यह हाईवे टोल प्लाजा पर वाहन गुजरने के दौरान बिना रुके चालक से जुड़े बैंक खाते से टोल राशि अपने आप काट देता है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने गुरुवार को लोकसभा में दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर कहा सरकार वैकल्पिक ईंधन को प्राथमिकता दे रही है। गडकरी ने हाईड्रोजन को भविष्य का ईंधन भी करार दिया।

    सरकार ने गुरुवार को बताया कि सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के कैशलेस उपचार की योजना के तहत किए गए कुल 6,833 अनुरोधों में से अब तक सिर्फ 5,480 पीड़ित ही पात्र पाए गए हैं। गडकरी ने कहा, सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के कैशलेस उपचार की योजना, 2025 के तहत हर दुर्घटना के मामले में पीड़ित का 1.5 लाख रुपये तक का कैशलेस उपचार किया जाएगा।