Tag: Court

  • शिवपुरी में कोर्ट में गवाही देने नहीं पहुंचे आरक्षक पर कार्रवाई, 5 हजार रुपये का बंधपत्र जब्त, सात दिन में जमा करनी होगी राशि

    शिवपुरी में कोर्ट में गवाही देने नहीं पहुंचे आरक्षक पर कार्रवाई, 5 हजार रुपये का बंधपत्र जब्त, सात दिन में जमा करनी होगी राशि


    शिवपुरी: में निर्धारित तारीख पर न्यायालय में गवाही के लिए उपस्थित नहीं होना करैरा थाने में पदस्थ आरक्षक मनोज कतरोलिया को महंगा पड़ गया। एनडीपीएस एक्ट के विशेष सत्र प्रकरण में गवाही देने के लिए अदालत में उपस्थित नहीं होने पर न्यायालय ने उसके 5 हजार रुपये के बंधपत्र की राशि जब्त कर ली है। विशेष न्यायाधीश दिनेश कुमार शर्मा ने 30 अक्टूबर 2026 को आदेश जारी करते हुए आरक्षक को सात दिन के भीतर यह राशि जमा कराने के निर्देश दिए हैं।

    जानकारी के अनुसार, आरक्षक मनोज कतरोलिया करैरा थाने में पदस्थ है। वह विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक 24/2025 में मध्य प्रदेश राज्य विरुद्ध कमल सिंह व अन्य मामले में साक्षी के रूप में नामित था। इस मामले में उसकी गवाही दर्ज की जानी थी। न्यायालय ने उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 5 हजार रुपये का जमानती वारंट जारी किया था। संबंधित वारंट की तामील भी कराई जा चुकी थी।

    न्यायालय में निर्धारित तारीख पर उपस्थित रहने के लिए आरक्षक ने 11 सितंबर 2026 को 5 हजार रुपये का बंधपत्र निष्पादित किया था। इसके तहत उसे तय तारीख पर अदालत में उपस्थित होना था, लेकिन वह निर्धारित समय पर न्यायालय में पेश नहीं हुआ। उसकी अनुपस्थिति के संबंध में कोई उचित कारण भी प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बाद न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए बंधपत्र की राशि जब्त करने का आदेश दिया।

    विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस एक्ट, शिवपुरी ने एमजेसी प्रकरण क्रमांक 409/2026 में 30 अक्टूबर को आदेश पारित किया। इसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 491 के तहत आरक्षक के 5 हजार रुपये के बंधपत्र को जब्त करने की कार्रवाई की गई। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि संबंधित राशि सात दिन के भीतर जमा कराई जाए।

    आदेश के मुताबिक, आरक्षक मनोज कतरोलिया को 5 हजार रुपये की राशि अनुविभागीय अधिकारी करैरा के माध्यम से न्यायालय में जमा करनी होगी। निर्धारित अवधि के भीतर राशि जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। यह कार्रवाई न्यायालय में उपस्थित रहने के लिए दिए गए बंधपत्र की शर्तों का पालन नहीं करने के मामले में की गई है।

    इस प्रकरण में न्यायालय की ओर से जारी आदेश के तहत आरक्षक को तय समयसीमा में राशि जमा करानी होगी। मामला एनडीपीएस एक्ट से जुड़े विशेष सत्र प्रकरण में गवाही के लिए उपस्थित नहीं होने से संबंधित है। अदालत ने पहले उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी किया था और बंधपत्र भी निष्पादित कराया गया था। इसके बावजूद निर्धारित तारीख पर उपस्थित नहीं होने और अनुपस्थिति का उचित कारण नहीं बताए जाने के बाद बंधपत्र की राशि जब्त करने का आदेश दिया गया।

  • शिवपुरी में बीआरसीसी और एपीसी की नियुक्तियों पर फिर लगी रोक, राज्य शिक्षा केंद्र ने जारी किए नए निर्देश

    शिवपुरी में बीआरसीसी और एपीसी की नियुक्तियों पर फिर लगी रोक, राज्य शिक्षा केंद्र ने जारी किए नए निर्देश

    मध्य प्रदेश । के शिवपुरी जिले में बीआरसीसी और एपीसी पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया एक बार फिर अटक गई है। 30 अक्टूबर को जिला पंचायत सभागार में प्रस्तावित काउंसलिंग के जरिए 12 रिक्त पदों पर नियुक्तियां की जानी थीं, लेकिन राज्य शिक्षा केंद्र से मिले नए निर्देशों के बाद फिलहाल इस प्रक्रिया पर रोक लग गई है। निर्देशों के अनुसार, संबंधित न्यायालयीन प्रकरणों का निराकरण होने तक नियुक्ति की आगे की कार्रवाई नहीं की जाएगी। इससे नियुक्ति की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को फिलहाल इंतजार करना पड़ेगा।

    जिला परियोजना समन्वयक दफेदार सिंह सिकरवार के अनुसार, शिवपुरी में नियुक्ति प्रक्रिया के लिए तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। निर्धारित कार्यक्रम के तहत 30 अक्टूबर को जिला पंचायत सभागार में काउंसलिंग होनी थी। इसके बाद परीक्षा के परिणाम के आधार पर रिक्त पदों पर चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी थी। हालांकि, राज्य स्तर से मिले नए दिशा-निर्देशों के कारण तय कार्यक्रम को रोकना पड़ा है।

    यह मामला सहायक परियोजना समन्वयक यानी एपीसी और बीआरसीसी पदों पर नियोजन से जुड़ा है। राज्य शिक्षा केंद्र, भोपाल ने न्यायालय के निर्णय और उसके अनुपालन को लेकर कलेक्टर को पत्र जारी किया है। इसमें उच्च प्रभार और कूलिंग पीरियड से संबंधित प्रावधानों के तहत आवेदकों को परीक्षा में शामिल करने के न्यायालयीन निर्देशों का उल्लेख किया गया है।

    इन निर्देशों के अनुपालन में शिवपुरी जिले में 16 याचिकाकर्ताओं को परीक्षा में शामिल किया गया था। योजना के अनुसार, परीक्षा परिणाम के आधार पर 30 अक्टूबर को होने वाली काउंसलिंग के बाद नियुक्ति से संबंधित अगली प्रक्रिया पूरी की जानी थी। लेकिन नियुक्तियों से जुड़े न्यायालयीन मामलों के चलते अब पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो गई है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि काउंसलिंग की अगली तारीख कब निर्धारित की जाएगी।

    राज्य शिक्षा केंद्र ने अपने नए निर्देशों में न्यायालयीन प्रकरणों से निपटने के लिए जिला स्तर पर जिम्मेदारी तय करने को कहा है। जिन जिलों में नियुक्ति से जुड़े मामले न्यायालय में लंबित हैं, वहां संबंधित याचिका के अनुसार एक प्रभारी अधिकारी नियुक्त किया जाना है। इस अधिकारी को प्रकरण से जुड़े तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर न्यायालय में जवाबदावा प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी दी जाएगी।

    निर्देशों में यह भी कहा गया है कि जवाबदावा तत्काल प्रस्तुत किया जाए और न्यायालय से मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया जाए। इसका उद्देश्य लंबित प्रकरणों में न्यायालय के समक्ष संबंधित पक्ष का जवाब समय पर प्रस्तुत करना है। राज्य शिक्षा केंद्र ने उन जिलों के लिए भी स्थिति स्पष्ट की है, जहां इस प्रकार के न्यायालयीन प्रकरण नहीं हैं। ऐसे जिलों में 2 सितंबर 2026 को जारी पूर्व पत्र के अनुरूप आगे की कार्रवाई की जानी है।

    ये निर्देश राज्य शिक्षा केंद्र के संचालक हरजिंदर सिंह की ओर से 29 अक्टूबर को जारी किए गए। इसके बाद शिवपुरी में नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय न्यायालयीन मामलों से संबंधित निर्देशों के पालन की तैयारी शुरू कर दी गई है।

    दफेदार सिंह सिकरवार ने बताया कि नए आदेश के बाद नियुक्ति प्रक्रिया कब शुरू हो सकेगी, इसका पता आगे की स्थिति स्पष्ट होने पर ही चलेगा। फिलहाल जिला स्तर पर प्रभारी अधिकारी नियुक्त करने और निर्देशों के अनुपालन की तैयारी की जा रही है। ऐसे में 12 पदों पर चयन की प्रतीक्षा कर रहे अभ्यर्थियों को काउंसलिंग और नियुक्ति के लिए नई तारीख घोषित होने तक इंतजार करना होगा।

  • MP: भोपाल में नाबालिगों के यौन शोषण मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला…78 वर्षीय प्यारे मियां को 10 बार उम्रकैद

    MP: भोपाल में नाबालिगों के यौन शोषण मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला…78 वर्षीय प्यारे मियां को 10 बार उम्रकैद


    भोपाल।
    भोपाल (Bhopal) में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के मामले में विशेष पॉक्सो अदालत (Special POCSO Court) ने पहले एक अखबार चलाने वाले मालिक प्यारे मियां (Pyare Miyan) को 10 बार उम्रकैद (Life imprisonment) की सजा सुनाई है. एजेंसी के मुताबिक अदालत ने उस पर 77.64 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है. इस मामले में उसकी सहयोगी राबिया बी को भी 20 साल जेल की सजा सुनाई गई है. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, प्यारे मियां पांच नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराया गया है।


    नौकरी का लालच देकर बुलाने का आरोप

    अभियोजन पक्ष के अनुसार 78 वर्षीय प्यारे मियां साल 2014 से नाबालिग लड़कियों को निशाना बना रहा था. आरोप था कि वह लड़कियों को हर महीने 10 हजार रुपये की नौकरी देने का लालच देकर अपने पास बुलाता था. इसके बाद उनका यौन शोषण और बलात्कार करता था. मामले में राबिया बी पर भी उसके अपराधों में मदद करने का आरोप साबित हुआ।


    काउंसलिंग के दौरान सामने आया था मामला

    यह मामला 11 जुलाई 2020 को सामने आया था. अभियोजन पक्ष के मुताबिक काउंसलिंग के दौरान एक पीड़िता ने अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी दी थी. उसने बताया कि उसे भोपाल के शाहपुरा इलाके में स्थित एक फ्लैट पर जन्मदिन मनाने के बहाने बुलाया गया था।

    पीड़िता के आरोप के अनुसार, वहां उसे जबरन शराब पिलाई गई और प्यारे मियां ने उसका यौन उत्पीड़न किया. इसके बाद अन्य नाबालिग लड़कियों ने भी इसी तरह के शोषण की घटनाओं के बारे में खुलासा किया।


    आठ मामलों में मृत्यु तक उम्रकैद

    अभियोजन पक्ष के अधिकारी के मुताबिक, विशेष पॉक्सो अदालत ने प्यारे मियां को पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत सजा सुनाई. उसे आठ मामलों में मृत्यु तक उम्रकैद और दो मामलों में उम्रकैद की सजा दी गई है. ये सभी सजाएं एक साथ चलेंगी।

    सरकारी वकील पीएन सिंह राजपूत के अनुसार, पुलिस ने मामले की जांच के बाद प्यारे मियां को गिरफ्तार किया था. इसके बाद राबिया बी और अन्य सहयोगियों के खिलाफ भी मुकदमा चलाया गया. अदालत ने आरोप साबित होने के बाद प्यारे मियां को 10 बार उम्रकैद की सजा सुनाईष

  • सुल्तानपुर कोर्ट से राहुल गांधी को राहत, अमित शाह पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हुए बरी

    सुल्तानपुर कोर्ट से राहुल गांधी को राहत, अमित शाह पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हुए बरी

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की विशेष अदालत ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को मानहानि के एक पुराने मामले में बरी कर दिया है। यह मामला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ कथित टिप्पणी से जुड़ा था। अदालत के फैसले से राहुल गांधी को कानूनी राहत मिली है। फैसला सुनाए जाने के बाद अदालत परिसर के बाहर मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने खुशी जताई। कार्यकर्ताओं ने ढोल बजाकर और नाचकर फैसले का स्वागत किया।

    यह मामला वर्ष 2018 में बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी की ओर से दिए गए कथित बयान से संबंधित था। आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अमित शाह के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर निवासी विजय मिश्रा ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। उस समय विजय मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के जिला उपाध्यक्ष थे। शिकायतकर्ता का कहना था कि राहुल गांधी के बयान से उन्हें ठेस पहुंची थी। इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस नेता के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था।

    मामले की सुनवाई के दौरान राहुल गांधी को अदालत में पेश होने के लिए भी कहा गया था। सुल्तानपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने 16 दिसंबर 2023 को उन्हें पेश होने का निर्देश दिया था। इसके बाद राहुल गांधी अदालत पहुंचे। फरवरी 2024 में अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी। उस समय राहुल गांधी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए खुद को निर्दोष कहा था। इसके बाद मामले में कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ती रही।

    सुनवाई के दौरान शिकायत से जुड़े पक्षों की गवाही और अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की गईं। इसके बाद मामले में अंतिम बहस हुई। राहुल गांधी के वकील ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ता पक्ष उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा। बचाव पक्ष ने इसी आधार पर राहुल गांधी को राहत दिए जाने की मांग की।

    अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद राहुल गांधी को बरी कर दिया। इस फैसले के साथ अमित शाह पर कथित टिप्पणी को लेकर वर्ष 2018 में शुरू हुई मानहानि की कानूनी कार्यवाही में उन्हें राहत मिली। शिकायतकर्ता पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर सका, यह बात राहुल गांधी के वकील ने अदालत में अपनी दलील के रूप में रखी थी।

    फैसले की जानकारी सामने आने के बाद अदालत के बाहर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उत्साह जाहिर किया। उन्होंने ढोल बजाए और नाचकर अपनी खुशी व्यक्त की। राहुल गांधी को मिली राहत के बाद कार्यकर्ताओं के बीच जश्न का माहौल दिखाई दिया।

    यह मामला राजनीतिक बयानबाजी से जुड़ी शिकायतों और उनसे संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं के संदर्भ में भी चर्चा में रहा। वर्ष 2018 में दर्ज शिकायत के बाद मामले की सुनवाई कई चरणों से गुजरी। दिसंबर 2023 में अदालत में पेशी का निर्देश, फरवरी 2024 में जमानत और उसके बाद जारी सुनवाई इस प्रक्रिया के प्रमुख पड़ाव रहे।

    सुल्तानपुर की विशेष अदालत का ताजा फैसला राहुल गांधी के लिए इस मानहानि मामले में महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम है। अदालत ने उन्हें आरोपों से बरी कर दिया है। फैसले के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहत और खुशी जताई, जबकि मामले में शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप अदालत में साबित नहीं हो सके।

  • दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद भी नेहा बोरा का इनकार, 10 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरने से किया मना

    दिल्ली हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद भी नेहा बोरा का इनकार, 10 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरने से किया मना

    नई दिल्ली । ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार देने से इनकार कर दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट से उनकी याचिका खारिज होने के बाद भी उन्होंने अपना रुख नहीं बदला। नेहा बोरा ने स्पष्ट कहा कि उनकी ओर से कोई शर्त नहीं रखी गई है और वह बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने नहीं जा रही हैं। यह मामला दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस की ओर से जारी नोटिस से जुड़ा है।

    मामले की शुरुआत 16 अक्टूबर को हुई थी, जब दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में विरोध प्रदर्शन और ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च के सिलसिले में पुलिस ने नेहा बोरा को हिरासत में लिया था। इसके बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) की अदालत की ओर से उन्हें नोटिस जारी किया गया। इसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की संबंधित धाराओं के तहत जांच के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया था।

    नेहा बोरा ने इस नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी ओर से दलील दी गई कि नोटिस अस्पष्ट है और इसमें तथ्यात्मक गलतियां हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से शांति भंग होने की कोई आशंका नहीं थी। ऐसे में बॉन्ड भरने का निर्देश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करता है। उन्होंने अदालत से नोटिस में हस्तक्षेप करने की मांग की थी।

    हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को इस याचिका को खारिज कर दिया और पुलिस की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास नेहा बोरा के खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध थी। अदालत के अनुसार, जारी किया गया नोटिस कानूनी आवश्यकताओं के अनुरूप था और इसे केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर जारी नहीं किया गया था।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर हाईकोर्ट विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की जगह लेकर उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनकी संतुष्टि का दोबारा आकलन नहीं कर सकता। मामले में उपलब्ध सामग्री में नेहा बोरा का उल्लेख करने वाली छह प्राथमिकी, विभिन्न स्थानों पर हुई घटनाओं से संबंधित सामान्य डायरी की प्रविष्टियां और मंडी हाउस क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू होने की जानकारी शामिल थी। अदालत ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

    हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बावजूद नेहा बोरा ने बॉन्ड भरने से साफ मना कर दिया है। उनका कहना है कि वह इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। इस तरह मामला अब अदालत के फैसले के बाद भी उनके रुख को लेकर चर्चा में है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में बॉन्ड भरने से इनकार करने के बाद उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई के संबंध में कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है।

    यह मामला शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों को सामने लाता है। फिलहाल हाईकोर्ट ने नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है, जबकि नेहा बोरा ने 10,000 रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और जमानतदार देने से इनकार करने का अपना रुख कायम रखा है।

  • पीस बॉन्ड क्या है और नेहा बोरा ने इसे भरने से क्यों किया इनकार, जानिए नियम और जेल तक पहुंचने की वजह

    पीस बॉन्ड क्या है और नेहा बोरा ने इसे भरने से क्यों किया इनकार, जानिए नियम और जेल तक पहुंचने की वजह

    नई दिल्ली । ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा से जुड़े शांति बॉन्ड का मामला दिल्ली में चर्चा का विषय बना हुआ है। नेहा ने दिल्ली पुलिस की ओर से जारी 10 हजार रुपये का पीस बॉन्ड भरने संबंधी नोटिस को चुनौती दी है। उनका कहना है कि इस कार्रवाई के लिए ठोस आधार नहीं दिया गया और इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए किया जा रहा है। दूसरी ओर, पुलिस का पक्ष है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसी निवारक कार्रवाई जरूरी हो सकती है। इस विवाद के बीच यह समझना महत्वपूर्ण है कि पीस बॉन्ड क्या होता है, इसे भरने का आदेश किन परिस्थितियों में दिया जा सकता है और इसका पालन नहीं करने पर क्या कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

    पीस बॉन्ड को सामान्य तौर पर शांति बनाए रखने का कानूनी आश्वासन माना जाता है। यह अपने आप में किसी अपराध की सजा नहीं है, बल्कि भविष्य में शांति भंग होने की आशंका को रोकने के उद्देश्य से की जाने वाली निवारक कार्रवाई है। इसमें संबंधित व्यक्ति को निर्धारित अवधि तक शांति बनाए रखने का वचन देना पड़ सकता है। आदेश के अनुसार बॉन्ड की राशि तय की जाती है और कुछ मामलों में जमानतदार की आवश्यकता भी हो सकती है। इसका उद्देश्य किसी संभावित विवाद या कानून-व्यवस्था की समस्या को पहले ही रोकना है।

    इस प्रक्रिया का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में है। पहले इसी तरह की कार्रवाई का प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 में था। अब BNSS की धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है, जिसके बारे में शांति भंग करने की आशंका से जुड़ी सूचना मिली हो। इसके बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।

    BNSS की धारा 130 के तहत मजिस्ट्रेट को प्रारंभिक आदेश में सूचना का सार, बॉन्ड की राशि, उसकी अवधि और अन्य आवश्यक विवरण दर्ज करने होते हैं। इसके बाद धारा 135 के तहत जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। जांच के दौरान कुछ परिस्थितियों में अंतरिम बॉन्ड भरने का आदेश भी दिया जा सकता है। यदि संबंधित व्यक्ति आदेश का पालन नहीं करता, तो कानून के प्रावधानों के अनुसार उसकी हिरासत का प्रश्न उठ सकता है। जांच पूरी होने पर धारा 136 के तहत अंतिम आदेश जारी किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी कार्रवाई की वैधता संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करती है।

    नेहा बोरा को यह नोटिस अक्टूबर में विरोध प्रदर्शनों से जुड़े घटनाक्रम के बाद मिला था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 16 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। वह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने जा रही थीं और अगले दिन उन्हें रिहा कर दिया गया। इसके बाद उन्हें BNSS की धारा 126, 130 और 135(3) के तहत नोटिस जारी किया गया। इसमें उन्हें 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने के लिए कहा गया था।

    नेहा की याचिका में दावा किया गया है कि नोटिस में आरोपों को साबित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं दी गई। उनके अनुसार, इसमें किसी विशेष घटना और उसकी अवधि का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने मंडी हाउस में शांतिपूर्ण सभा आयोजित करने, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और कनॉट प्लेस जाने के लिए उकसाने से जुड़े आरोपों पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।

    पीस बॉन्ड नहीं भरने के कानूनी परिणाम भी परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। यदि जांच के बाद मजिस्ट्रेट वैध अंतिम आदेश जारी करता है और संबंधित व्यक्ति निर्धारित बॉन्ड नहीं भरता, तो BNSS की धारा 141 के तहत उसे हिरासत में रखने या जेल भेजने की स्थिति बन सकती है। कानून के तहत साधारण कारावास की अवधि अधिकतम एक वर्ष तक हो सकती है। यह परिणाम केवल बॉन्ड भरने से शुरुआती इनकार के आधार पर स्वतः लागू नहीं होता, बल्कि संबंधित कानूनी प्रक्रिया और आदेश पर निर्भर करता है।

    वहीं, बॉन्ड भरने के बाद उसकी शर्तों का उल्लंघन साबित होने पर भी कार्रवाई हो सकती है। परिस्थितियों के अनुसार बॉन्ड की राशि जब्त की जा सकती है और कानून के तहत हिरासत या कारावास से जुड़े आदेश दिए जा सकते हैं। ऐसे मामलों में संबंधित आदेश और लागू कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण होते हैं।

    इस विवाद में एक अन्य घटनाक्रम कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्होंने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर पीस बॉन्ड भरा था। इसके विपरीत, नेहा बोरा के वकीलों ने बॉन्ड पर हस्ताक्षर नहीं करने का रुख रखा। अब मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या शांति भंग होने की आशंका के आधार पर जारी नोटिस पर्याप्त तथ्यों पर आधारित था और क्या संबंधित प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला इस विवाद में आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होगा।

  • सौरव गांगुली को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका, रिलीज से एक दिन पहले फिल्म ‘दूसरा’ रोकने की मांग खारिज

    सौरव गांगुली को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका, रिलीज से एक दिन पहले फिल्म ‘दूसरा’ रोकने की मांग खारिज

    नई दिल्ली । पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली को फिल्म ‘दूसरा’ की रिलीज रोकने की मांग के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। अदालत ने गुरुवार को फिल्म की रिलीज पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। यह फिल्म शुक्रवार, 23 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि प्रथम दृष्टया सुविधा का संतुलन फिल्म के निर्माताओं के पक्ष में है। हालांकि, मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को तय की गई है।

    न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि फिल्म की रिलीज अगले दिन निर्धारित है और फिलहाल रोक लगाने का आधार याचिकाकर्ता के पक्ष में नजर नहीं आता। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के पास कोई महत्वपूर्ण अधिकार हो सकता है, लेकिन इस स्तर पर फिल्म के प्रदर्शन पर रोक नहीं लगाई जा रही है। सौरव गांगुली के साथ लव फिल्म्स एलएलपी भी इस मुकदमे में वादी है। यह कंपनी पूर्व भारतीय कप्तान पर आधारित एक अलग बायोपिक बना रही है।

    मामले में गांगुली की ओर से पेश वकील ने व्यक्तित्व के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका जताई। उनका कहना था कि फिल्म ‘दूसरा’ का प्रचार सौरव गांगुली के नाम पर किया जा रहा है और दर्शकों के सामने उन्हें ही फिल्म का मुख्य नायक बताया जा रहा है। वकील ने दलील दी कि गांगुली और उनका जीवन फिल्म का प्रमुख विषय हैं, जबकि इसके निर्माण के लिए उनसे कोई लाइसेंस या अनुमति नहीं ली गई। उन्होंने फिल्म की रिलीज टालने के लिए निर्माताओं की ओर से किए गए अग्रिम भुगतान की राशि चुकाने की पेशकश भी की।

    दूसरी ओर, फिल्म निर्माताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि ‘दूसरा’ सौरव गांगुली की बायोपिक नहीं है। उन्होंने कहा कि फिल्म की कहानी राजस्थान की एक मध्यमवर्गीय लड़की पर आधारित है, जो पूर्व भारतीय कप्तान से जुड़े कुछ खेल आयोजनों से प्रेरित होकर क्रिकेट की दुनिया में कदम रखती है। निर्माताओं के अनुसार, गांगुली से जुड़ी कुछ क्लिप का इस्तेमाल करने के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी। सुनवाई के दौरान निर्माताओं के वकील ने याचिका को अंतिम समय में दबाव बनाने की कोशिश बताते हुए कहा कि फिल्म के लिए सौ से अधिक सिनेमाघर बुक किए जा चुके हैं और उनके लिए अग्रिम भुगतान भी किया जा चुका है।

    निर्माताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं ने अब तक फिल्म देखी ही नहीं है और उनकी आशंकाएं अनुमानों पर आधारित हैं। वकील ने वर्ष 2002 की नेटवेस्ट वनडे सीरीज की क्लिप का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि ऐसी क्लिप के आधार पर कोई खिलाड़ी व्यक्तित्व के अधिकारों का दावा कैसे कर सकता है। इस तरह सुनवाई में फिल्म की विषयवस्तु, प्रचार और गांगुली के व्यक्तित्व से जुड़े अधिकार प्रमुख मुद्दे रहे।

    सुविधा का संतुलन एक कानूनी कसौटी है, जिसका इस्तेमाल अदालतें अंतरिम रोक लगाने के अनुरोध पर विचार करते समय करती हैं। इसमें यह देखा जाता है कि यदि रोक नहीं लगाई जाती तो याचिकाकर्ता को कितना नुकसान हो सकता है और यदि रोक लगा दी जाती तो दूसरे पक्ष को क्या नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी कसौटी पर विचार करते हुए अदालत ने फिलहाल फिल्म की रिलीज रोकने से इनकार किया।

    ‘दूसरा : इंडियाज अदर फ्रीडम स्ट्रगल’ का निर्देशन अभिनय देव ने किया है। फिल्म में प्लबिता बोरठाकुर, अंकुर विकल और समिधा गुरु मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे। कहानी एक मध्यमवर्गीय राजस्थानी लड़की के क्रिकेट की दुनिया में प्रवेश करने के सफर पर केंद्रित बताई गई है। अदालत ने तत्काल रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की है और मामले की आगे की सुनवाई शुक्रवार को निर्धारित की गई है।

  • दतिया विधायक घनश्याम सिंह की सदस्यता को चुनौती, चुनावी हलफनामे में पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

    दतिया विधायक घनश्याम सिंह की सदस्यता को चुनौती, चुनावी हलफनामे में पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

    मध्य प्रदेश। की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर कानूनी विवाद के कारण चर्चा में है। कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जुलाई 2026 में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान दाखिल चुनावी हलफनामे में उन्होंने वर्ष 1991 के एक पुराने आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। इस मामले के सामने आने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    यह याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने दायर की है। याचिकाकर्ता का दावा है कि घनश्याम सिंह ने उपचुनाव के दौरान अपने शपथ पत्र में कुछ आपराधिक मामलों की जानकारी दी, लेकिन 1991 में दर्ज एक अन्य मामले का उल्लेख नहीं किया। याचिका में इस कथित चूक को उनके निर्वाचन को चुनौती देने का आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से उनके चुनाव को निरस्त करने की मांग की है।

    याचिका में वर्ष 1991 की एक घटना का उल्लेख किया गया है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दतिया में विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम हुआ था। आरोप के मुताबिक, इस घटना के दौरान पुलिस ने 22 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी, जिनमें घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस मामले की जानकारी जुलाई 2026 के उपचुनाव के दौरान दाखिल किए गए हलफनामे में नहीं दी गई।

    मामले में वर्ष 2020 के एक अन्य आपराधिक प्रकरण का भी जिक्र किया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि घनश्याम सिंह ने 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल अपने शपथ पत्र में भी इस मामले से संबंधित जानकारी का उल्लेख नहीं किया था। इस तरह याचिका में अलग-अलग चुनावों के दौरान दिए गए हलफनामों में कथित रूप से जानकारी छिपाने का मुद्दा उठाया गया है।

    शुक्रवार को सुनवाई के दौरान ग्वालियर खंडपीठ ने विधायक को नोटिस जारी कर उनका पक्ष जानना चाहा। अदालत की इस कार्रवाई के बाद अब मामले में उनके जवाब और आगे होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी। हालांकि, केवल नोटिस जारी होने से यह साबित नहीं होता कि विधायक ने जानबूझकर जानकारी छिपाई है या उनका निर्वाचन अवैध है। इन सवालों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होगा।

    दतिया विधानसभा सीट पर यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी वर्ष पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद यहां उपचुनाव कराया गया था। भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में दोषसिद्धि और सजा के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हुई थी। इसके बाद खाली हुई सीट पर जुलाई 2026 में मतदान हुआ, जिसमें कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज की।

    उपचुनाव में घनश्याम सिंह का मुकाबला भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी से हुआ था। अब उनके निर्वाचन को अदालत में चुनौती दिए जाने से दतिया की राजनीति में एक नया कानूनी मुद्दा सामने आया है। हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस मामले में उनकी सदस्यता समाप्त होगी या सीट पर दोबारा उपचुनाव कराना पड़ेगा।

    आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अदालत में याचिकाकर्ता के आरोपों और चुनावी हलफनामे से जुड़े तथ्यों की जांच के बाद क्या निष्कर्ष निकलता है। यदि आरोप न्यायिक प्रक्रिया में साबित होते हैं और अदालत निर्वाचन को प्रभावित करने वाली कानूनी अनियमितता पाती है, तो उसके अनुसार फैसला लिया जा सकता है। फिलहाल हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर विधायक से जवाब मांगा है और मामले का अंतिम परिणाम आना बाकी है।

  • दतिया विधायक घनश्याम सिंह को हाईकोर्ट का नोटिस, 1991 के आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के आरोप से बढ़ी हलचल

    दतिया विधायक घनश्याम सिंह को हाईकोर्ट का नोटिस, 1991 के आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के आरोप से बढ़ी हलचल

    मध्य प्रदेश: की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक चर्चाओं में आ गई है। कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह को नामांकन पत्र में आपराधिक मामले की जानकारी नहीं देने के आरोप से जुड़े प्रकरण में ग्वालियर हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया है। अदालत ने यह कदम इस मामले में दायर याचिका पर उठाया है। नोटिस सामने आने के बाद दतिया में संभावित उपचुनाव को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं, हालांकि फिलहाल उपचुनाव की स्थिति बनने की कोई पुष्टि नहीं हुई है।

    यह मामला वर्ष 1991 में कांग्रेस के एक प्रदर्शन के दौरान दर्ज एफआईआर से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उस प्रदर्शन के दौरान घनश्याम सिंह सहित कुछ अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। आरोप है कि दतिया विधानसभा उपचुनाव के दौरान नामांकन पत्र दाखिल करते समय घनश्याम सिंह ने इस आपराधिक मामले का उल्लेख नहीं किया था।

    इसी आरोप को आधार बनाकर दीपक बेलपत्री सहित कुछ लोगों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में नामांकन पत्र में आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दिए जाने का मुद्दा उठाया गया है। अब अदालत ने विधायक को नोटिस जारी कर इस मामले में जवाब मांगा है। फिलहाल नोटिस जारी होने का अर्थ आरोपों का साबित होना नहीं है। मामले में आगे की स्थिति संबंधित पक्षों के जवाब और अदालत की कार्यवाही पर निर्भर करेगी।

    इस घटनाक्रम के बीच कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अवधेश नायक ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट से नोटिस मिलना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे जरूरत से ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। नायक ने इस मामले को लेकर राजेंद्र भारती की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस घटनाक्रम के पीछे भारती की भूमिका हो सकती है।

    अवधेश नायक ने राजेंद्र भारती पर कानूनी प्रक्रियाओं और दस्तावेजों के माध्यम से राजनीतिक नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2023 में उनका टिकट कटने के पीछे भी भारती की भूमिका थी। ये आरोप नायक की ओर से लगाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी में इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि या राजेंद्र भारती की इस मामले पर प्रतिक्रिया का विवरण नहीं है।

    दतिया विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण भी यह मामला चर्चा में है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था, जबकि कांग्रेस ने दोनों चुनावों में जीत दर्ज की थी। ऐसे में विधायक को जारी हुए नोटिस के बाद स्थानीय राजनीति में इस मामले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    अब सबसे अहम सवाल यह है कि पुराने आपराधिक मामले और नामांकन पत्र में जानकारी नहीं देने के आरोप पर अदालत आगे क्या रुख अपनाती है। यदि कानूनी कार्यवाही में कोई ऐसा आदेश आता है जिसका विधानसभा सदस्यता पर प्रभाव पड़ता हो, तो उसके राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं। हालांकि, केवल नोटिस जारी होने से विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होती और न ही अपने आप उपचुनाव की स्थिति बनती है।

    फिलहाल ग्वालियर हाईकोर्ट के नोटिस के बाद मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने का इंतजार है। विधायक का जवाब, याचिका में उठाए गए सवालों पर अदालत का विचार और आगे आने वाले आदेश ही तय करेंगे कि इस प्रकरण का दतिया की राजनीति पर क्या असर पड़ता है।

  • मेरठ सांप कांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप को फांसी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुला हत्या का राज

    मेरठ सांप कांड में पत्नी रविता और प्रेमी अमरदीप को फांसी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुला हत्या का राज


    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के मेरठ में चर्चित सांप कांड में अदालत ने अमित कश्यप की हत्या के मामले में उसकी पत्नी रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को फांसी की सजा सुनाई है। बहसूमा थाना क्षेत्र के अकबरपुर सादात गांव से जुड़े इस मामले में दोनों को हत्या का दोषी पाया गया। अपर जिला जज, कोर्ट संख्या-12 ने मामले की सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। इस प्रकरण में शुरुआत में अमित की मौत को सांप के काटने से हुई घटना माना जा रहा था, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने के बाद जांच की दिशा बदल गई।

    यह घटना 12 अप्रैल 2025 की है। उस दिन अमित कश्यप अपने घर के अंदर मृत पाया गया था। उसके शव के पास एक सांप भी मौजूद था। घटनास्थल पर पहुंचे पुलिसकर्मियों ने सांप को पकड़कर एक डिब्बे में बंद कर दिया और अमित के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। शुरुआती परिस्थितियों में आशंका जताई गई कि अमित की मौत सर्पदंश के कारण हुई होगी।

    हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह दम घुटना सामने आई। इस खुलासे के बाद पुलिस ने मामले को संभावित हत्या के रूप में लेकर जांच शुरू की। जांच आगे बढ़ने पर अमित की पत्नी रविता और गांव के ही युवक अमरदीप के संबंधों की जानकारी सामने आई। पुलिस के मुताबिक, रविता और अमरदीप के बीच प्रेम संबंध थे और अमरदीप का अमित के घर आना-जाना लगा रहता था। वह अमित के साथ काम भी करता था।

    जांच में आरोप लगाया गया कि रविता और अमरदीप ने मिलकर अमित की हत्या की योजना बनाई थी। इसके बाद उसकी मौत को सांप के काटने से हुई घटना के रूप में दिखाने की कोशिश की गई। पुलिस ने इस मामले में उस व्यक्ति से भी पूछताछ की, जिस पर सांप उपलब्ध कराने का आरोप था। जांच के दौरान उसे सरकारी गवाह बनाया गया। अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष ऐसे साक्ष्य पेश किए, जिनके आधार पर दोनों आरोपियों के खिलाफ हत्या की साजिश और वारदात में शामिल होने का मामला रखा गया।

    अदालत ने सुनवाई के दौरान पेश किए गए साक्ष्यों और मामले से जुड़े तथ्यों पर विचार किया। सात अक्टूबर 2026 को रविता और अमरदीप को हत्या का दोषी ठहराया गया था। इसके बाद 16 अक्टूबर को दोनों को मृत्युदंड सुनाए जाने की जानकारी सामने आई। इस फैसले के साथ ही अमित कश्यप की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। हालांकि, मृत्युदंड के फैसले के बाद आगे की न्यायिक प्रक्रिया और अपील की स्थिति इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।

    मेरठ में यह मामला उस चर्चित नीले ड्रम हत्याकांड की याद भी दिला रहा है, जिसमें सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में उसकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल को भी फांसी की सजा सुनाए जाने की खबर सामने आई थी। दोनों मामलों में पति की हत्या के आरोप में पत्नी और उसके प्रेमी को दोषी ठहराए जाने की समानता चर्चा का विषय बनी है।

    अमित कश्यप हत्याकांड में सबसे अहम मोड़ पोस्टमार्टम रिपोर्ट रही, जिसने शुरुआती तौर पर दिखाई दे रही सर्पदंश की आशंका को बदल दिया। इसके बाद पुलिस की जांच, आरोपियों के संबंधों और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर मामला अदालत तक पहुंचा। अदालत के फैसले के बाद अब इस प्रकरण में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर नजर रहेगी।