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  • US में सरकारी खजाने से ट्रंप का प्रचार…. जनता के पैसों से चल रहे थे विज्ञापन…कोर्ट ने लगाई रोक

    US में सरकारी खजाने से ट्रंप का प्रचार…. जनता के पैसों से चल रहे थे विज्ञापन…कोर्ट ने लगाई रोक


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को अपने राजनीतिक संदेश के प्रचार के लिए सरकारी खजाने से चलाए जा रहे टीवी विज्ञापनों पर रोक लगानी होगी। न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत (Federal Court) ने रविवार रात प्रशासन को आदेश दिया कि ऐसे सभी विज्ञापन तुरंत बंद किए जाएं, जो अब भी प्रसारित होने बाकी हैं। खास बात यह है कि प्रशासन पहले ही कह चुका था कि विज्ञापन अभियान (Advertising campaign) जल्द खत्म होने वाला है। इसके बावजूद अदालत ने साफ कर दिया कि रविवार रात प्रसारित होने वाले विज्ञापनों समेत बाकी सभी विज्ञापनों को भी रद्द करना होगा।


    जनता के पैसे से राजनीतिक प्रचार पर उठे सवाल

    यह पूरा मामला उन टीवी विज्ञापनों से जुड़ा है, जिन पर करदाताओं के लाखों डॉलर खर्च किए गए। इन विज्ञापनों के जरिए ट्रंप के राजनीतिक संदेश को लोगों तक पहुंचाया जा रहा था। इस खर्च पर सवाल उठाते हुए एक गठबंधन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। इस गठबंधन में गैर-दलीय निगरानी संगठन कॉमन कॉज (Common Cause) भी शामिल था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि सरकारी धन का इस तरह इस्तेमाल करना नियमों के खिलाफ है और इसे सार्वजनिक धन का अनुचित इस्तेमाल माना जाना चाहिए।


    प्रशासन को विज्ञापन रोकने के लिए मिला साफ आदेश

    न्यूयॉर्क की अमेरिकी जिला अदालत की जज जेनिफर एल. रोचोन ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर विचार करते हुए प्रशासन के खिलाफ फैसला सुनाया। उन्होंने अस्थायी रोक लगाने का आदेश जारी किया, जिसके तहत प्रशासन को बचे हुए सभी टीवी विज्ञापन रद्द करने होंगे। इस आदेश में उन विज्ञापनों को भी शामिल किया गया, जिनका प्रसारण रविवार रात होना था। यानी प्रशासन की ओर से विज्ञापन अभियान खत्म करने की घोषणा के बावजूद अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाया कि कोई भी बाकी विज्ञापन प्रसारित न हो।


    अब सरकारी खर्च और राजनीतिक संदेश के इस्तेमाल पर नजर

    इस मामले ने सरकारी धन के इस्तेमाल और राजनीतिक प्रचार के बीच की सीमा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायत करने वाले संगठनों का कहना है कि जनता के पैसे का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता, जिसे वे किसी राजनीतिक संदेश को बढ़ावा देने का अनुचित तरीका मानते हैं। अदालत के आदेश का तत्काल असर यह है कि प्रशासन को बचे हुए विज्ञापनों को रोकना होगा। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह आदेश अस्थायी रोक के तौर पर जारी किया गया है। मामले में आगे क्या होता है, यह न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरणों पर निर्भर करेगा।

  • क्या जोखिम भरे काम महिलाओं के लिए नहीं? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिर छिड़ी लैंगिक समानता पर बहस

    क्या जोखिम भरे काम महिलाओं के लिए नहीं? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिर छिड़ी लैंगिक समानता पर बहस


    नई दिल्ली।
    रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक पुरानी लेकिन महत्वपूर्ण बहस को फिर सामने ला दिया है। सवाल यह है कि क्या किसी काम में जोखिम होने मात्र से महिलाओं को उससे दूर रखा जा सकता है? अदालत के सामने करीब चार दशक पुराना मामला आया, जिसमें एक महिला को केवल इसलिए नौकरी नहीं दी गई क्योंकि काम में गैस सिलेंडर उठाना शामिल था।

    मामला हरियाणा की सुमित्रा का है। उन्होंने 1988 में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के करनाल स्थित एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में हेल्पर के पद के लिए आवेदन किया था। वह निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं और 49 उम्मीदवारों की सूची में शामिल थीं। इनमें से 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति दे दी गई, लेकिन सुमित्रा को नौकरी नहीं मिली। बाद में सामने आया कि महिला होने के कारण उन्हें सिलेंडर उठाने जैसे काम के लिए अनुपयुक्त माना गया था।

    घर में सिलेंडर उठाने वाली महिला नौकरी के लिए अयोग्य कैसे?

    सुप्रीम कोर्ट ने इसी सोच पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि जब घरों में महिलाएं खुद गैस सिलेंडर उठाती और बदलती हैं, तो केवल महिला होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को ऐसे काम के लिए अयोग्य मानना उचित नहीं कहा जा सकता।

    लंबी कानूनी लड़ाई के कारण अब सुमित्रा की नियुक्ति की उम्र निकल चुकी थी। ऐसे में अदालत ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को उन्हें 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का निर्देश दिया।

    यह फैसला सिर्फ एक महिला को मुआवजा देने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए उस मानसिकता पर भी सवाल खड़ा हुआ है, जिसमें किसी व्यक्ति की क्षमता का आकलन उसके कौशल, प्रशिक्षण और वास्तविक शारीरिक योग्यता के बजाय उसके महिला या पुरुष होने के आधार पर किया जाता है।

    जोखिम से बचाना और अवसर से वंचित करना अलग बात

    आज महिलाएं उन क्षेत्रों में भी अपनी क्षमता साबित कर रही हैं, जिन्हें लंबे समय तक पुरुषों के लिए आरक्षित माना जाता था। वे लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं और सेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। ऐसे में किसी महिला को सिर्फ इसलिए किसी काम के लिए अनुपयुक्त मान लेना कि उसमें जोखिम है, पुराने लैंगिक पूर्वाग्रह को मजबूत करता है।

    हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जोखिम वाले कामों में सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज किया जाए। किसी भी खतरनाक काम के लिए जरूरी सुरक्षा व्यवस्था, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य मानकों का पालन कर्मचारी की लैंगिक पहचान से अलग होना चाहिए।

    दरअसल, महिलाओं को जोखिम से बचाने और जोखिम का हवाला देकर महिलाओं को अवसर से वंचित करने में बड़ा अंतर है। सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को किसी पूरे कार्यक्षेत्र से बाहर कर देना समान अवसर की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

    योग्यता हो कसौटी, लिंग नहीं

    सही तरीका यह है कि किसी काम की वास्तविक जरूरतों और उससे जुड़े जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। उसके बाद कर्मचारियों को जरूरी प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाएं तथा चयन योग्यता के आधार पर हो।

    इस संदर्भ में रिव्यू ऑफ इकनॉमिक स्टडीज में प्रकाशित डेनमार्क के एक अध्ययन का भी उल्लेख किया जा सकता है। अध्ययन में पाया गया कि छोटे व्यवसायों में पुरुष प्रबंधक की पहली संतान बेटी होने के बाद महिलाओं की सापेक्ष रोजगार स्थिति और कमाई में वृद्धि हुई। महिलाओं की सापेक्ष कमाई में 4.4 प्रतिशत और रोजगार में 2.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    हालांकि डेनमार्क के इस अध्ययन के निष्कर्षों को सीधे भारत पर लागू करना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों देशों की सामाजिक परिस्थितियां और श्रम बाजार की संरचना अलग हैं। फिर भी यह शोध इस ओर संकेत करता है कि कार्यस्थल पर महिलाओं को लेकर बनी धारणाएं स्थायी नहीं होतीं और व्यक्तिगत व सामाजिक अनुभवों के साथ उनमें बदलाव संभव है।

    सुरक्षा जरूरी, लेकिन अवसर की कीमत पर नहीं

    भारत में चुनौती यह होनी चाहिए कि हर काम के लिए समान अवसर और समान मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए। गर्भावस्था, मातृत्व और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भेदभाव रहित व्यवस्था बनाना जरूरी है। संरक्षण का उद्देश्य महिलाओं से अवसर छीनना नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित कार्य वातावरण तैयार करना होना चाहिए।

    इसलिए महिलाओं को जोखिम वाले काम से दूर रखने का सवाल उठाने से पहले यह देखना जरूरी है कि क्या उस काम को सुरक्षित बनाया जा सकता है और क्या संबंधित महिला उसके लिए आवश्यक योग्यता रखती है। अगर दोनों सवालों का जवाब हां है, तो केवल महिला होने के कारण उसके लिए अवसर का दरवाजा बंद करने का तार्किक आधार नहीं बचता।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश भी यही है कि रोजगार में समानता केवल नियुक्ति पत्र हासिल करने का अधिकार नहीं है। यह उस सोच को बदलने का सवाल भी है, जो पहले ही तय कर लेती है कि कौन व्यक्ति कौन-सा काम कर सकता है और कौन नहीं।

    समाज को महिलाओं के लिए न तो कृत्रिम विशेषाधिकार चाहिए और न ही कृत्रिम सीमाएं। जरूरत समान अवसर, समान कसौटी और सुरक्षित कार्यस्थल की है। आखिर किसी काम की कठिनाई या जोखिम के आधार पर यह तय नहीं होना चाहिए कि उसे महिला कर सकती है या पुरुष। काम की जरूरतें यह तय करें कि कर्मचारी में कौन-सी योग्यता होनी चाहिए और उस कसौटी पर हर व्यक्ति को समान अवसर मिलना चाहिए।

  • महाराष्ट्र में SIR को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा मामला, ज्ञानेश कुमार के 14 फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाएं दाखिल

    महाराष्ट्र में SIR को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा मामला, ज्ञानेश कुमार के 14 फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाएं दाखिल

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इनमें से एक याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के पिछले करीब दस महीनों के दौरान लिए गए 14 प्रशासनिक फैसलों और कार्रवाइयों को चुनौती दी गई है। याचिका में इन फैसलों को रद्द करने के साथ ही SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की गई है।

    याचिका में दावा किया गया है कि इन 14 मामलों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता सूची के डेटाबेस, चुनाव पंजीकरण अधिकारियों तथा तकनीकी व्यवस्था से जुड़े कई फैसलों पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों पर अदालत की ओर से अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

    याचिका में मतदाता सूची तैयार करने और उसके प्रबंधन से जुड़े विभिन्न प्रशासनिक फैसलों को चुनौती दी गई है। इसमें फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, मतदाताओं के नाम हटाने और फिर बहाल करने तथा चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कुछ फैसले दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए थे।

    महाराष्ट्र में चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर भी याचिका में कई मांगें रखी गई हैं। इसमें प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने और SIR पर रोक लगाने की मांग शामिल है। इसके अलावा उन राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव स्थगित करने की मांग की गई है, जहां SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यह मांग तब तक के लिए की गई है, जब तक नई और कानूनी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती।

    याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की जांच के लिए स्वतंत्र न्यायिक समिति गठित करने की मांग भी की है। इसके साथ ही संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 326 से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। याचिका में मतदाता सूची में पात्र नागरिकों के नाम सुरक्षित रखने और गलत तरीके से नाम हटाए जाने से बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई है।

    दूसरी याचिका महाराष्ट्र में SIR के क्रियान्वयन से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। इसमें SIR कराने के आदेश, उसके आधार और अपनाई जा रही प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग मतदाता की चुनावी पात्रता का आकलन कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम निर्णय करने का अधिकार उसके पास नहीं है।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि SIR के दौरान कुछ बूथ लेवल अधिकारी लोगों से फॉर्म लेते समय सहायक दस्तावेज मांग रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने से बचाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और सुरक्षा उपायों की मांग की है।

    मामले की सुनवाई 28 सितंबर को होने की संभावना है। दोनों याचिकाएं अलग-अलग पीठों के समक्ष सूचीबद्ध हो सकती हैं। फिलहाल अदालत ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों और मांगों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। आगे की सुनवाई में संबंधित पक्षों के तर्क और अदालत की कार्यवाही के बाद मामले की स्थिति स्पष्ट होगी।

  • व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला

    व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से CNN, MS NOW और Politico को व्हाइट हाउस से बैन किए जाने का मामला अब अदालत पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज टिमोथी केली ने प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि मीडिया संस्थानों को बैन से पहले अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

    जज केली ने फिलहाल इस मामले में कोई तत्काल आदेश जारी नहीं किया है। उन्होंने कहा कि वह जल्द फैसला सुनाएंगे। तीनों मीडिया संस्थानों ने अदालत से मांग की है कि उनकी व्हाइट हाउस प्रेस एक्सेस अंतिम कानूनी निर्णय आने तक तुरंत बहाल की जाए।

    जज ने पुराने अदालती फैसलों का किया उल्लेख

    सुनवाई के दौरान जज टिमोथी केली ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स के दो पुराने फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन फैसलों के मुताबिक व्हाइट हाउस की प्रेस एक्सेस वापस लेने से पहले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    केली ने यह भी कहा कि भले ही सरकार इन पुराने अदालती फैसलों को गलत मानती हो, लेकिन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज के तौर पर उन्हें फिलहाल इन्हीं कानूनी मिसालों का पालन करना होगा।

    उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि मीडिया बैन पहले ही लागू कर दिया गया था, तो उसके बाद भेजे गए पत्र किस तरह संबंधित संस्थानों को पहले से नोटिस देने और अपना जवाब रखने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।

    ट्रंप प्रशासन ने सुरक्षा को बनाया आधार

    ट्रंप प्रशासन की ओर से अदालत में दलील दी गई कि व्हाइट हाउस में मीडिया की पहुंच कोई कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति को सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से मीडिया संस्थानों की पहुंच सीमित करने का अधिकार है।

    सरकारी वकील ने यह भी दावा किया कि तीनों मीडिया संस्थानों की कुछ रिपोर्टों से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े हुए थे। प्रशासन ने अपनी दलील के समर्थन में मिसाइल भंडार, व्हाइट हाउस में बन रहे बॉलरूम और रिपब्लिकन पार्टी के मिडटर्म कन्वेंशन से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला दिया।

    मीडिया संस्थानों ने फर्स्ट अमेंडमेंट का दिया हवाला

    CNN, MS NOW और Politico ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। तीनों संस्थानों का कहना है कि व्हाइट हाउस का बैन अमेरिकी संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट में दिए गए प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के साथ-साथ उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन करता है।

    मीडिया संस्थानों ने आरोप लगाया है कि ट्रंप प्रशासन ने उन रिपोर्टों के चलते कार्रवाई की, जो राष्ट्रपति को पसंद नहीं थीं।

    यह विवाद ट्रंप और अमेरिकी मीडिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव के बीच सामने आया है। बैन के बाद कई बड़े अमेरिकी टीवी नेटवर्क ने इसके विरोध में व्हाइट हाउस की साझा वीडियो कवरेज रोकने का कदम भी उठाया था।

    2018 के जिम एकोस्टा मामले की भी चर्चा

    मौजूदा विवाद की तुलना 2018 में CNN के पत्रकार जिम एकोस्टा से जुड़े मामले से भी की जा रही है। उस समय भी जज टिमोथी केली ने व्हाइट हाउस को एकोस्टा का प्रेस पास बहाल करने का आदेश दिया था। अदालत ने उस मामले में माना था कि प्रेस पास वापस लेने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

    अब एक बार फिर व्हाइट हाउस और मीडिया से जुड़े मामले की सुनवाई जज केली के सामने है। फिलहाल अदालत ने CNN, MS NOW और Politico पर लगाया गया बैन हटाने का आदेश नहीं दिया है। मामले में जज केली के अगले फैसले का इंतजार है।

  • 200 करोड़ रंगदारी मामले में जैकलीन को आरोपी बनाने की मांग, अदालत ने याचिका खारिज की

    200 करोड़ रंगदारी मामले में जैकलीन को आरोपी बनाने की मांग, अदालत ने याचिका खारिज की

    नई दिल्ली । दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने 200 करोड़ रुपये की कथित रंगदारी से जुड़े मामले में अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीस और लीपाक्षी एलावाड़ी को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर तलब करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। यह याचिका सुकेश चंद्रशेखर के कथित करीबी सहयोगी नवास कक्कट की ओर से दायर की गई थी।

    विशेष न्यायाधीश गगनदीप सिंह की अदालत ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इसमें जिन लोगों को अतिरिक्त आरोपी बनाए जाने की मांग की गई है, उनके खिलाफ इस स्तर पर पर्याप्त आधार सामने नहीं आता। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों और उपलब्ध बयानों पर विचार करने के बाद यह फैसला सुनाया।

    याचिकाकर्ता का मामला मुख्य रूप से सह-आरोपी पिंकी ईरानी के उस बयान पर आधारित था, जो महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका की धारा 18 के तहत दर्ज किया गया था। अदालत ने इस बयान को आधार मानते हुए याचिका में लगाए गए दावों की जांच की।

    अदालत ने कहा कि यदि पिंकी ईरानी के बयान को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तब भी उसमें उन लोगों की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती, जिन्हें सुकेश के निर्देश पर महंगे उपहार दिए जाने की बात कही गई है। ऐसे में केवल इस बयान के आधार पर जैकलीन फर्नांडीस और लीपाक्षी एलावाड़ी को नए आरोपी के तौर पर तलब करने का आधार नहीं बनता।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने लीपाक्षी एलावाड़ी के बयान का भी उल्लेख किया। कोर्ट के मुताबिक, मामले में उपलब्ध सामग्री को देखते हुए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त आरोपी को तलब करने के लिए आवश्यक आधार इस स्तर पर स्थापित नहीं होता।

    नवास कक्कट की ओर से दायर याचिका में अपने ऊपर लगे आरोपों से संबंधित घटनाक्रम का भी उल्लेख किया गया था। दावा किया गया कि वह सुकेश चंद्रशेखर के निर्देश पर कथित अपराध से जुड़ी रकम को अलग-अलग स्थानों पर रखने, उसे स्थानांतरित करने और उसके लेनदेन को संभालने में मदद करता था।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया था कि बॉलीवुड से जुड़े लोगों के लिए महंगे उपहार और अन्य कीमती सामान खरीदने के भुगतान की व्यवस्था में भी उसकी भूमिका थी। इसके लिए बैंक खातों में लेनदेन से संबंधित प्रविष्टियां कराने की बात कही गई थी।

    मामले में जैकलीन फर्नांडीस का नाम पहले भी सुकेश चंद्रशेखर से जुड़े विवाद में सामने आता रहा है। हालांकि, मौजूदा सुनवाई में अदालत के सामने सवाल यह था कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर उन्हें इस मामले में अतिरिक्त आरोपी के तौर पर तलब किया जा सकता है या नहीं।

    अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए आधारों और संबंधित बयानों पर विचार करने के बाद माना कि अतिरिक्त आरोपी को तलब करने के लिए जरूरी कानूनी आधार मौजूद नहीं है। इसी के साथ जैकलीन फर्नांडीस और लीपाक्षी एलावाड़ी को आरोपी बनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई।

  • नेहा पच्चीसिया मामले में एमपी हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, एफआईआर चुनौती याचिका पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा

    नेहा पच्चीसिया मामले में एमपी हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, एफआईआर चुनौती याचिका पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा

    मध्य प्रदेश /कटनी की निलंबित नगर पुलिस अधीक्षक यानी CSP नेहा पच्चीसिया से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। नेहा पच्चीसिया ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं और उन्हें मामले में फंसाया गया है। मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

    नेहा पच्चीसिया के खिलाफ कटनी के कुठला थाने में मामला दर्ज किया गया है। यह प्रकरण जमीन के सौदे और पद के कथित दुरुपयोग से जुड़े आरोपों को लेकर है। मामले में नेहा पच्चीसिया के अलावा क्षितिज राज बारापात्रे और मारूफ अहमद हनफी भी आरोपी बनाए गए हैं। क्षितिज राज बारापात्रे को मामले में मुख्य फाइनेंसर और मारूफ अहमद हनफी को कागजी खरीदार बताया गया है।

    हाई कोर्ट में दाखिल याचिका के जरिए नेहा पच्चीसिया ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती दी है। उनकी ओर से आरोपों को गलत बताते हुए कानूनी कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं, सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि नेहा पच्चीसिया फिलहाल फरार हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी है।

    मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से नेहा पच्चीसिया के खिलाफ पर्याप्त भ्रष्टाचार संबंधी साक्ष्य होने का दावा किया गया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सुनवाई पूरी कर ली और फैसला सुरक्षित रख लिया। अब इस मामले में अदालत के फैसले का इंतजार है।

    इस मामले से पहले नेहा पच्चीसिया की अग्रिम जमानत याचिका भी जिला अदालत में खारिज हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने गिरफ्तारी और आगे की कानूनी कार्रवाई से राहत पाने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया। एफआईआर दर्ज होने के बाद से नेहा पच्चीसिया के साथ क्षितिज राज बारापात्रे और मारूफ अहमद हनफी के भी फरार होने की जानकारी दी गई है।

    तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। प्रत्येक आरोपी पर 10-10 हजार रुपये का इनाम घोषित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। एफआईआर दर्ज होने के बाद से तीनों के मोबाइल फोन बंद बताए जा रहे हैं। उनकी तलाश के लिए एसआईटी, पुलिस की अलग-अलग टीमें और साइबर सेल संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं।

    नेहा पच्चीसिया का पुलिस सेवा में आने का सफर भी चर्चा में रहा है। उन्होंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 20वीं रैंक हासिल कर पुलिस सेवा में प्रवेश किया था और बाद में कटनी में CSP के पद पर पदस्थ रहीं। वर्तमान मामले के सामने आने के बाद वह निलंबित हैं और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर की वैधता को लेकर हाई कोर्ट में कानूनी लड़ाई चल रही है।

    मामले में आगे की दिशा अब हाई कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगी। अदालत ने बुधवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा है। इस बीच पुलिस की ओर से फरार आरोपियों की तलाश और मामले से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया जारी है। एफआईआर में लगाए गए आरोपों पर अंतिम स्थिति अदालत की प्रक्रिया और जांच के आगे बढ़ने के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियम पर कानूनी जंग, 22 राज्यों ने ट्रंप प्रशासन को कोर्ट में घेरा

    अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियम पर कानूनी जंग, 22 राज्यों ने ट्रंप प्रशासन को कोर्ट में घेरा

    नई दिल्ली। अमेरिका में ग्रीन कार्ड से जुड़े नए ‘पब्लिक चार्ज’ नियम को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के इस नियम को चुनौती देते हुए 14 सितंबर को दो अलग-अलग मुकदमे दायर किए गए। एक याचिका 22 अमेरिकी राज्यों और कोलंबिया जिले ने दाखिल की है, जबकि दूसरी न्यूयॉर्क शहर के नेतृत्व में शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल समेत स्थानीय सरकारों ने दायर की है। नया नियम 18 सितंबर 2026 से लागू होना है।

    ग्रीन कार्ड क्यों अहम है?

    अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देने वाला ग्रीन कार्ड लाखों प्रवासियों के लिए महत्वपूर्ण है। रोजगार आधारित आव्रजन के जरिए स्थायी निवास का इंतजार कर रहे भारतीय पेशेवरों के लिए भी इसका खास महत्व है। ग्रीन कार्ड स्थायी निवास का दर्जा देता है और आगे चलकर अमेरिकी नागरिकता के लिए आवेदन करने का रास्ता भी खोल सकता है।

    क्या है नया ‘पब्लिक चार्ज’ नियम?

    नए नियम के तहत अमेरिकी आव्रजन अधिकारी ग्रीन कार्ड, कुछ वीजा या अमेरिका में प्रवेश से जुड़े आवेदनों पर फैसला लेते समय आवेदक के सार्वजनिक सहायता कार्यक्रमों के इस्तेमाल को भी ध्यान में रख सकेंगे। इनमें मेडिकेड, खाद्य सहायता, आवास सहायता और बच्चों से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य योजनाएं शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि स्थायी निवास हासिल करने वालों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए और नीति का उद्देश्य सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा करना है।

    22 राज्यों ने क्यों दी चुनौती?

    22 राज्यों और कोलंबिया जिले का कहना है कि नियम से उन परिवारों पर असर पड़ सकता है जो कानूनी रूप से सरकारी सहायता के पात्र हैं। मुकदमे में तर्क दिया गया है कि नियम की अस्पष्टता के कारण प्रवासी परिवार सहायता लेने से बच सकते हैं, भले ही वे उसके लिए पात्र हों। राज्यों ने यह भी कहा है कि इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण कार्यक्रमों और राज्य के वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    DHS के अनुमान के मुताबिक करीब 9.5 लाख लोग सार्वजनिक सहायता योजनाओं से नाम वापस ले सकते हैं या उनमें नया नामांकन नहीं करा सकते हैं। राज्यों का कहना है कि इसका असर उन अमेरिकी नागरिक बच्चों पर भी पड़ सकता है जिनके माता-पिता अप्रवासी हैं और जो स्वयं इन योजनाओं के पात्र हो सकते हैं।

    ममदानी के नेतृत्व में दूसरा मुकदमा

    न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी के नेतृत्व में दायर दूसरे मुकदमे में शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल और कुछ काउंटी सरकारें भी शामिल हैं। इन स्थानीय सरकारों का कहना है कि नियम से परिवार जरूरी स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं का इस्तेमाल करने से डर सकते हैं। इस मुकदमे में नियम की वैधानिकता और उसके व्यापक प्रभाव को चुनौती दी गई है।

    ट्रंप प्रशासन का क्या कहना है?

    ट्रंप प्रशासन नए नियम को आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा से जोड़ रहा है। प्रशासन का कहना है कि स्थायी निवास के लिए आवेदन करने वालों की आर्थिक स्थिति और संभावित सरकारी निर्भरता पर विचार करना आव्रजन कानून के तहत सरकार के अधिकारों के दायरे में आता है। दूसरी ओर, मुकदमा दायर करने वाले राज्यों और स्थानीय सरकारों का तर्क है कि नए नियम से आव्रजन अधिकारियों को बहुत व्यापक विवेकाधिकार मिल जाएगा।

    भारतीयों के लिए क्या बदलेगा?

    नियम का मतलब यह नहीं है कि ग्रीन कार्ड के हर आवेदक को सरकारी सहायता लेने पर स्वतः आवेदन खारिज कर दिया जाएगा। प्रभाव आवेदक की व्यक्तिगत परिस्थितियों, संबंधित लाभ और आव्रजन अधिकारी के आकलन पर निर्भर करेगा। हालांकि, भारतीय पेशेवरों और अन्य प्रवासियों के लिए यह अमेरिकी स्थायी निवास प्रक्रिया में एक नया कारक जोड़ता है।

    फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि 18 सितंबर से नियम लागू होने से पहले अदालतें इसकी समीक्षा के दौरान क्या आदेश देती हैं। दोनों मुकदमों में नए नियम को रोकने और उसे गैरकानूनी घोषित करने की मांग की गई है।

  • ट्रंप प्रशासन के वीजा नियम पर कोर्ट की रोक, विदेशी छात्रों और पत्रकारों को मिली राहत

    ट्रंप प्रशासन के वीजा नियम पर कोर्ट की रोक, विदेशी छात्रों और पत्रकारों को मिली राहत


    वॉशिंगटन। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन को संघीय अदालत से झटका लगा है। बोस्टन के एक फेडरल जज ने विदेशी छात्रों, एक्सचेंज विजिटर्स और पत्रकारों के अमेरिका में रहने की अवधि सीमित करने वाले नए नियम पर रोक लगा दी है। अमेरिकी जिला जज एफ. डेनिस सेलॉर ने यूनियनों और उच्च शिक्षा की वकालत करने वाले संगठनों के गठबंधन के पक्ष में फैसला सुनाया। यह आदेश नए नियम के लागू होने से ठीक एक दिन पहले आया।

    जज बोले- पांच दशक पुरानी व्यवस्था बदलने का तर्क कमजोर
    जज सेलॉर ने कहा कि डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने नियम में बदलाव के लिए पर्याप्त मजबूत तर्क नहीं दिए। विभाग ने वीजा व्यवस्था में धोखाधड़ी रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया था, लेकिन अदालत के मुताबिक DHS ने नियम बदलने से जुड़ी समस्याओं का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया और आसान विकल्पों पर भी विचार नहीं किया।

    पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश द्वारा नियुक्त जज ने कहा कि प्रस्तावित नियम अमेरिका में करीब पांच दशक से चली आ रही व्यवस्था को बदल देता। मौजूदा व्यवस्था के तहत विदेशी छात्र अपने कोर्स की अवधि पूरी होने तक अमेरिका में रह और काम कर सकते हैं। अदालत ने इस व्यवस्था के योगदान को भी रेखांकित किया। जज के मुताबिक, इससे करोड़ों छात्रों और शोधकर्ताओं को विज्ञान, मेडिकल और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिला और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी बड़ा फायदा हुआ।

    क्या बदलाव करना चाहता था ट्रंप प्रशासन?
    DHS ने जुलाई में नया नियम प्रस्तावित किया था, जिसमें अमेरिका में विदेशी नागरिकों के रहने की अवधि के लिए निश्चित समयसीमा तय करने का प्रावधान था। इसके तहत विदेशी छात्रों के F वीजा और सांस्कृतिक एक्सचेंज विजिटर्स के J वीजा की अवधि अधिकतम चार साल तक सीमित की जानी थी। इसके अलावा विदेशी पत्रकारों को दिए जाने वाले I वीजा, जो कई वर्षों तक वैध रहते हैं, उनकी अवधि घटाकर केवल 240 दिन करने का प्रस्ताव था। नियम का मकसद वीजा व्यवस्था में धोखाधड़ी रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को नियंत्रित करना बताया गया था।

    21 लाख से ज्यादा वीजा धारकों पर पड़ सकता था असर
    उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अमेरिका में फिलहाल करीब 16 लाख F वीजा और 5 लाख J वीजा धारक हैं। ऐसे में प्रस्तावित बदलाव का असर बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों और एक्सचेंज विजिटर्स पर पड़ सकता था। जज सेलॉर ने उच्च शिक्षा संस्थानों पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक, नई नीति लागू होने पर बड़े विश्वविद्यालयों में विदेशी छात्रों के दाखिले कम हो सकते हैं और संस्थानों को करोड़ों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    MIT-हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालयों पर असर की आशंका
    फैसले में अमेरिका के प्रमुख रिसर्च विश्वविद्यालयों का भी उल्लेख किया गया। जज ने कहा कि MIT और हार्वर्ड जैसे संस्थानों में स्नातक स्तर पर बड़ी संख्या में विदेशी छात्र अध्ययन करते हैं। अदालत के मुताबिक, विदेशी छात्रों की संख्या में बड़ी गिरावट का असर सिर्फ विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अमेरिकी उच्च शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान हो सकता है। जज ने इसे संभावित रूप से विनाशकारी बताया।

    इस तरह अदालत की रोक ने फिलहाल विदेशी छात्रों, एक्सचेंज विजिटर्स और पत्रकारों के लिए प्रस्तावित नई समयसीमा को लागू होने से रोक दिया है। मामले में अदालत की आगे की कार्रवाई और प्रशासन की अगली रणनीति पर अब नजर रहेगी।

  • ट्रंप को कोर्ट से झटका: बर्थराइट सिटिजनशिप सीमित करने वाले आदेश पर रोक

    ट्रंप को कोर्ट से झटका: बर्थराइट सिटिजनशिप सीमित करने वाले आदेश पर रोक


    नई दिल्ली। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बर्थराइट सिटिजनशिप यानी अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों को नागरिकता देने के नियम को सीमित करने के मामले में बड़ा झटका लगा है। मैरीलैंड की संघीय जज डेबोरा बोर्डमैन ने बुधवार को ट्रंप प्रशासन के नए आदेश के अमल पर रोक लगा दी। यह रोक प्रवासी अधिकार संगठनों की मांग पर लगाई गई है।

    जज बोर्डमैन ने कहा कि संबंधित क्लास एक्शन मुकदमे के दायरे में आने वाले बच्चों पर ट्रंप का नया आदेश लागू करना लगभग निश्चित तौर पर असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इस वर्ग में शामिल बच्चे जन्म के समय अमेरिकी नागरिक हैं।

    ट्रंप प्रशासन की दलील भी नहीं मानी
    ट्रंप प्रशासन ने कोर्ट में दलील दी थी कि मुकदमा जल्दबाजी में दाखिल किया गया है, क्योंकि नए आदेश को लागू करने के लिए संबंधित सरकारी एजेंसियों की विस्तृत गाइडलाइन अभी जारी नहीं हुई है। सरकार के मुताबिक यह गाइडलाइन शनिवार तक जारी होने की उम्मीद थी।

    हालांकि, जज बोर्डमैन ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि आदेश की भाषा को देखते हुए उसके अमल पर तत्काल रोक लगाना जरूरी है। साथ ही एजेंसियों को आदेश के क्रियान्वयन से जुड़ी गाइडलाइन तैयार करने की अनुमति दी गई है।

    बर्थ टूरिज्म को निशाना बनाता है आदेश
    राष्ट्रपति ट्रंप ने 6 अगस्त को नया कार्यकारी आदेश जारी किया था। इसका मुख्य निशाना बर्थ टूरिज्म था। इसमें ऐसी महिलाएं अमेरिका आती हैं जो वहां बच्चे को जन्म देकर बच्चे को जन्म के आधार पर अमेरिकी नागरिकता दिलाना चाहती हैं।

    आदेश में उन बच्चों को भी नागरिकता से वंचित करने की कोशिश की गई है, जिनके माता-पिता में से कोई अमेरिका में किसी विदेशी सरकार के लिए काम करता है। इसके अलावा धोखाधड़ी या किसी व्यावसायिक लेनदेन के जरिए नागरिकता हासिल करने की कोशिश वाले मामलों और कुछ ऐसे लोगों के बच्चों को भी आदेश के दायरे में रखा गया है, जिन्हें ‘एलियन एनिमी’ यानी विदेशी दुश्मन की श्रेणी में रखा गया है।

    इससे पहले भी ट्रंप की कोशिश को झटका लगा था
    जन्मसिद्ध नागरिकता को सीमित करने की यह ट्रंप प्रशासन की दूसरी कोशिश है। इससे पहले जून में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के 2025 के शुरुआती आदेश को लागू करने की उनकी कोशिश को खारिज कर दिया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अमेरिका में जन्मे बच्चों को नागरिकता से वंचित करने की कोशिश संविधान के 14वें संशोधन में मौजूद सिटिजनशिप क्लॉज से टकराती है।

    तीन सरकारी एजेंसियों को दखल न देने का आदेश
    ताजा फैसले में जज बोर्डमैन ने अमेरिकी विदेश विभाग, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग और सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन जैसी सरकारी एजेंसियों को संबंधित बच्चों की नागरिकता में दखल नहीं देने का निर्देश दिया है।

    एजेंसियां इन बच्चों की नागरिकता को खारिज नहीं कर सकेंगी और न ही उसे मान्यता देने से इनकार कर सकेंगी। इस आदेश के साथ ट्रंप प्रशासन की बर्थराइट सिटिजनशिप को सीमित करने की कोशिश को एक बार फिर कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ा है।

  • चीफ जस्टिस की कॉकरोच टिप्पणी के दुरुपयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सीबीआई को भेजा नोटिस

    चीफ जस्टिस की कॉकरोच टिप्पणी के दुरुपयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सीबीआई को भेजा नोटिस


    नई दिल्ली । 
    भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्चुअल अदालती कार्यवाही के वीडियो को संपादित कर सोशल मीडिया पर गलत संदर्भ में प्रसारित करने और उसका व्यावसायिक उपयोग करने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस विषय पर केंद्र सरकार और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से विस्तृत जवाब तलब किया है।

    यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा तीन माह पूर्व एक सुनवाई के दौरान की गई कॉकरोच टिप्पणी से जुड़ा हुआ है। दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालती कार्यवाही की चुनिंदा वीडियो क्लिप्स को चालाकी से एडिट कर सार्वजनिक किया गया जिसका मूल संदर्भ से कोई संबंध नहीं था।

    याचिकाकर्ता के अनुसार 15 मई को फर्जी वकीलों और अदालती प्रक्रियाओं के दुरुपयोग पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी की थी। हालांकि बाद में इस वक्तव्य को तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स और व्यावसायिक सामग्री के रूप में प्रचारित किया गया।

    याचिका में दलील दी गई है कि न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने और जजों की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। वर्तमान में अदालती कार्यवाहियों के अनधिकृत उपयोग और उससे होने वाली कमाई को रोकने के लिए कोई प्रभावी कानूनी तंत्र उपलब्ध नहीं है।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न विधिक हलकों में न्यायालयीन कार्यवाहियों की लाइव स्ट्रीमिंग के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई जा रही है। शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि संस्थागत गरिमा की रक्षा के लिए ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए जाएं।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों से इस प्रकार के दुरुपयोग को रोकने तथा संबंधित संस्थाओं की गतिविधियों की जांच करने के संबंध में रुख स्पष्ट करने को कहा है।