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  • अमेरिका-ईरान तनाव, एआई शेयरों की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतें तय करेंगी भारतीय बाजार की दिशा: निवेशक सतर्क

    अमेरिका-ईरान तनाव, एआई शेयरों की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतें तय करेंगी भारतीय बाजार की दिशा: निवेशक सतर्क


    नई दिल्ली ।
    भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला सप्ताह महत्वपूर्ण संकेत लेकर आ सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क कर दिया है। मध्य पूर्व में अमेरिका के ठिकानों पर ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया और इजरायल की लेबनान में बमबारी की खबरें बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। निवेशक इन geopolitical घटनाओं पर नजर रखकर जोखिम और अवसर का मूल्यांकन करेंगे।

    कच्चे तेल की कीमतें भी बाजार के मूड पर सीधे असर डाल रही हैं। ब्रेंट क्रूड वर्तमान में 93 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ऊर्जा और इनर्जी सेक्टर से जुड़े शेयरों की चाल को प्रभावित कर सकता है। उच्च तेल मूल्य न केवल ए너지 कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करता है, बल्कि आर्थिक महंगाई को भी बढ़ा सकता है।

    अमेरिका में एआई से जुड़े शेयरों की गिरावट ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी टेक्नोलॉजी इंडेक्स नैस्डैक में शुक्रवार को 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। विशेष रूप से एनवीडिया, माइक्रोन टेक्नोलॉजी और मार्वल टेक्नोलॉजी जैसी एआई थीम वाले शेयरों में लगभग 17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस प्रवृत्ति से भारतीय निवेशक भी प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि कई एआई और टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयर वैश्विक निवेश प्रवाह से जुड़े हैं।

    भारत में निवेशकों की निगाह 12 जून को जारी होने वाले खुदरा महंगाई आंकड़ों पर भी रहेगी। महंगाई के आंकड़े समग्र आर्थिक स्थिति और केंद्रीय बैंक की नीतियों पर असर डालते हैं। यदि महंगाई दर उम्मीद से अधिक होती है, तो इससे ब्याज दरों में संभावित बदलाव और निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है।

    बीते सप्ताह भारतीय शेयर बाजार नुकसान के साथ बंद हुआ। निफ्टी 181.05 अंक या 0.77 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 23,366.70 पर रहा। सेंसेक्स 532.40 अंक या 0.71 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,243.34 पर बंद हुआ। हालांकि, कुछ सेक्टरों ने बेहतर प्रदर्शन किया। मीडिया और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स शेयरों में तेजी रही। निफ्टी मीडिया 6.69 प्रतिशत, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 1.49 प्रतिशत और निफ्टी पीएसयू बैंक 1.26 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए।

    वहीं, निफ्टी एफएमसीजी, निफ्टी कमोडिटीज, निफ्टी इन्फ्रा, निफ्टी रियल्टी, निफ्टी मेटल, निफ्टी पीएसई और निफ्टी एनर्जी सेक्टरों में कमजोरी देखने को मिली। क्रमशः 1.30 से 2.19 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज हुई। यह संकेत है कि निवेशकों ने जोखिम वाले और साइकिलिक सेक्टरों से परहेज किया और सुरक्षित या अधिक स्थिर क्षेत्रों की ओर रुख किया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सप्ताह में बाजार की दिशा कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की कीमत, एआई शेयरों की चाल और महंगाई के आंकड़े मिलकर निवेशकों की रणनीति और बाजार की उतार-चढ़ाव की सीमा तय करेंगे। इस अवधि में निवेशक सतर्क रहकर बाजार की हर छोटी-सी प्रतिक्रिया का अध्ययन करेंगे।

    कुल मिलाकर, अगले सप्ताह भारतीय इक्विटी बाजार में सतर्कता और रणनीति की आवश्यकता होगी। निवेशक वैश्विक और घरेलू आर्थिक संकेतकों के आधार पर अपने निवेश निर्णय लेंगे। सुरक्षित सेक्टरों और स्थिर प्रदर्शन वाले शेयरों में निवेश को प्राथमिकता मिल सकती है, जबकि जोखिम वाले क्षेत्र अस्थिर रह सकते हैं।

  • शेयर बाजार में बड़ी गिरावट, सेंसेक्स-निफ्टी लाल निशान में खुले, ग्लोबल टेंशन से निवेशकों में घबराहट

    कमजोर वैश्विक संकेतों और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ खुला। सेंसेक्स 75,000 के नीचे फिसल गया और निफ्टी में भी तेज गिरावट देखी गई।

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    भारतीय शेयर बाजार सप्ताह के पहले कारोबारी सत्र में भारी दबाव के साथ खुला, जहां वैश्विक संकेतों की कमजोरी का सीधा असर घरेलू बाजार पर देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स में तेज गिरावट दर्ज की गई और यह 75,000 के स्तर के नीचे फिसल गया। निफ्टी भी कमजोर रुख के साथ खुला और इसमें भी महत्वपूर्ण अंकों की गिरावट देखी गई, जिससे निवेशकों के बीच सतर्कता और चिंता का माहौल बन गया।

    सुबह के समय बाजार खुलते ही चौतरफा बिकवाली का दबाव दिखाई दिया। लगभग सभी प्रमुख सेक्टर लाल निशान में कारोबार करते नजर आए, जिनमें ऑटो, रियल्टी, बैंकिंग, मीडिया और फाइनेंशियल सर्विसेज जैसे सेक्टर शामिल थे। मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह साफ हुआ कि दबाव केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक स्तर पर बाजार प्रभावित हुआ है।

    विश्लेषकों के अनुसार वैश्विक स्तर पर जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखा गया है, जो आयात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय माना जाता है। इसके साथ ही अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी बाजारों में गिरावट ने भी निवेशकों के भरोसे को कमजोर किया है।

    एशियाई बाजारों में भी मिलाजुला रुख देखने को मिला, जहां कई प्रमुख बाजार लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। इसका सीधा असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा और निवेशकों ने जोखिम कम करने के लिए बिकवाली का रास्ता चुना। इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया, जहां लगातार बिकवाली का रुझान देखने को मिला।

    सेंसेक्स और निफ्टी में आई इस गिरावट ने यह संकेत दिया है कि फिलहाल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है और वैश्विक घटनाक्रम आने वाले दिनों में भी निवेश धारणा को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिति स्थिर नहीं होती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

  • बाजार पर मंडरा रहा वैश्विक तनाव का साया, ईरान-अमेरिका टकराव और कच्चे तेल से तय होगी अगली चाल

    बाजार पर मंडरा रहा वैश्विक तनाव का साया, ईरान-अमेरिका टकराव और कच्चे तेल से तय होगी अगली चाल

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां घरेलू मजबूती से अधिक वैश्विक घटनाक्रम उसकी दिशा तय करते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले सप्ताह में बाजार की चाल कई महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर रहने वाली है, जिनमें ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां और देश के प्रमुख आर्थिक आंकड़े शामिल हैं। इन सभी कारकों के कारण निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है और बाजार में सतर्कता बढ़ती जा रही है।

    वैश्विक स्तर पर ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने ऊर्जा बाजारों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग को लेकर उठ रहे विवादों ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर चिंता बढ़ा दी है। इसी अनिश्चितता के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका भी गहरा रही है। ऊर्जा कीमतों में यह अस्थिरता सीधे तौर पर भारतीय बाजारों पर भी असर डाल रही है, क्योंकि भारत अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।

    इसी बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी बाजार की धारणा को कमजोर किया है। लगातार हो रही निकासी ने घरेलू बाजार में तरलता और विश्वास दोनों पर दबाव बनाया है। निवेशक फिलहाल सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इक्विटी बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक विदेशी निवेशकों की रणनीति में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

    घरेलू स्तर पर आने वाले आर्थिक आंकड़े भी बाजार की दिशा को प्रभावित करने वाले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की गतिविधियों से जुड़े संकेतक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे। इसके अलावा बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े आंकड़े, क्रेडिट ग्रोथ और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी जानकारियां भी बाजार की धारणा को प्रभावित करेंगी। इन आंकड़ों के आधार पर यह तय होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक दबावों के बीच कितनी मजबूती से खड़ी है।

    बीते सप्ताह बाजार में गिरावट का रुख देखने को मिला, जहां प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे। कई सेक्टर्स में बिकवाली हावी रही, विशेषकर रियल्टी, आईटी और ऑटो जैसे क्षेत्रों में कमजोरी देखने को मिली। हालांकि कुछ क्षेत्रों जैसे फार्मा और मेटल में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही, लेकिन समग्र रूप से बाजार नकारात्मक रुझान में बंद हुआ।

  • तेल संकट से घिरा पाकिस्तान, मंत्री ने की भारत की तारीफ, बोले- वह हमसे काफी आगे..

    तेल संकट से घिरा पाकिस्तान, मंत्री ने की भारत की तारीफ, बोले- वह हमसे काफी आगे..

    इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच बढ़ते वैश्विक तेल संकट ने पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस बीच पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री मुसादिक मलिक ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर भारत की ऊर्जा तैयारियों की सराहना की है। उन्होंने स्वीकार किया कि पाकिस्तान के पास भारत जैसी मजबूत रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता नहीं है, जिसके कारण वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से अधिक प्रभावित हो रहा है।

    मलिक के अनुसार, पाकिस्तान के पास कच्चे तेल का भंडार बेहद सीमित है, जो केवल कुछ दिनों की जरूरत ही पूरी कर सकता है। इसके विपरीत, भारत के पास लगभग 60-70 दिनों का संयुक्त रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार मौजूद है। हाल ही में कच्चे तेल की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो 2022 के बाद का उच्चतम स्तर है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधित जहाजरानी के चलते हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए हैं, जिसका असर पाकिस्तान पर ज्यादा पड़ रहा है।

    राहत के लिए करनी पड़ी गुप्त बातचीत
    पेट्रोलियम मंत्री ने बताया कि आम लोगों को थोड़ी राहत देने के लिए पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसे संस्थानों से गोपनीय स्तर पर बातचीत करनी पड़ी। बजट समझौतों के तहत देश को राजकोषीय घाटा कम करने के लिए ईंधन पर भारी कर लगाने पड़े। डीजल की कीमतों में 3-4 गुना वृद्धि के कारण पेट्रोल पर अतिरिक्त बोझ डालना पड़ा, वहीं मोटरसाइकिल चालकों को सब्सिडी देने से वित्तीय दबाव और बढ़ गया।

    ऊर्जा संकट से बढ़ी जनता की नाराजगी
    देश में ऊर्जा संकट के चलते व्यापक असंतोष देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा पेट्रोल की कीमत में 80 पाकिस्तानी रुपये की कटौती कर इसे 378 रुपये प्रति लीटर करने के बावजूद, इससे पहले हुई 42.7% की वृद्धि ने कीमत को 321.17 रुपये से बढ़ाकर 458.41 रुपये तक पहुंचा दिया था। इससे देशभर में विरोध प्रदर्शन और ईंधन की कमी की स्थिति पैदा हो गई।

    भारत से तुलना पर बोले मंत्री
    मलिक ने साफ तौर पर कहा कि भारत इस मामले में पाकिस्तान से काफी आगे है। उन्होंने कहा कि भारत के पास 60-70 दिनों का तेल भंडार है, जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत उपयोग में लाया जा सकता है, जबकि पाकिस्तान के पास एक दिन का भी पर्याप्त पेट्रोल भंडार नहीं है। उन्होंने यह भी माना कि भारत की मजबूत विदेशी मुद्रा स्थिति और बेहतर रणनीतिक योजना उसे ऐसे संकटों से निपटने में सक्षम बनाती है।

    आईएमएफ पर निर्भरता बनी चुनौती

    मलिक ने यह भी कहा कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति आईएमएफ पर निर्भर है, जबकि भारत इस तरह के किसी कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है। भारत ने तेल की कीमतों में वृद्धि के दौरान करों में कमी कर स्थिति को नियंत्रित किया, जबकि पाकिस्तान के पास ऐसा करने की वित्तीय स्वतंत्रता नहीं है।

    एक इंटरव्यू में मलिक ने बताया कि पाकिस्तान के पास केवल वाणिज्यिक तेल भंडार हैं। कच्चा तेल अधिकतम 5-7 दिन ही चल सकता है, जबकि रिफाइंड उत्पादों का स्टॉक करीब 20-21 दिनों का है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हालात और बिगड़े, तो देश की ऊर्जा व्यवस्था पर गंभीर संकट आ सकता है।

  • तेल की कीमतों में नरमी और वैश्विक संकेतों से शेयर बाजार में तूफानी तेजी सेंसेक्स 800 अंक उछला निफ्टी 24550 के पार

    तेल की कीमतों में नरमी और वैश्विक संकेतों से शेयर बाजार में तूफानी तेजी सेंसेक्स 800 अंक उछला निफ्टी 24550 के पार


    नई दिल्ली। मंगलवार का दिन भारतीय शेयर बाजार के लिए मजबूत तेजी लेकर आया, जहां निवेशकों के बीच उत्साह और भरोसा दोनों में बढ़ोतरी देखने को मिली। पूरे दिन के कारोबार में बाजार ने सकारात्मक रुख बनाए रखा और प्रमुख सूचकांक लगातार ऊंचाई की ओर बढ़ते नजर आए। वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेत और कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी ने इस तेजी को और मजबूती दी।

    कारोबार के दौरान सेंसेक्स में करीब 800 अंकों की तेज बढ़त दर्ज की गई और यह 79 हजार 296 के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी मजबूत प्रदर्शन करते हुए 24 हजार 550 के पार कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार की इस तेजी ने निवेशकों के बीच सकारात्मक माहौल बनाया और खरीदारी का रुझान बढ़ा।

    इस उछाल का सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट रही। ब्रेंट क्रूड के दाम 94 से 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गए, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई को लेकर चिंताएं कुछ कम हुईं। तेल की कीमतों में नरमी से कंपनियों की लागत घटने की उम्मीद बढ़ी, जिसका असर सीधे तौर पर शेयर बाजार पर देखने को मिला।

    इसके साथ ही एशियाई बाजारों में आई मजबूती ने भी भारतीय बाजार को सहारा दिया। एशिया के प्रमुख बाजारों में सकारात्मक रुझान देखने को मिला, जिससे निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ी और घरेलू बाजार में भी खरीदारी तेज हो गई। वैश्विक स्तर पर स्थिरता के संकेतों ने भारतीय निवेशकों का भरोसा मजबूत किया।

    सेक्टोरल स्तर पर देखें तो बैंकिंग शेयरों ने बाजार की तेजी में सबसे अहम भूमिका निभाई। बड़े निजी बैंकों में मजबूत खरीदारी देखने को मिली, जिससे निफ्टी बैंक इंडेक्स में करीब डेढ़ प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। वित्तीय शेयरों में आई इस तेजी ने पूरे बाजार को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    रियल्टी सेक्टर ने आज सबसे बेहतर प्रदर्शन किया और इसमें करीब तीन प्रतिशत के आसपास की बढ़त दर्ज की गई। इसके अलावा मेटल, ऑटो, इंफ्रास्ट्रक्चर और पीएसयू बैंक सेक्टर में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। इससे यह साफ संकेत मिला कि बाजार में व्यापक स्तर पर निवेशकों की भागीदारी बनी हुई है और तेजी केवल कुछ ही सेक्टरों तक सीमित नहीं है।

    आईटी सेक्टर ने भी आज मजबूती दिखाई और शुरुआती कमजोरी से उबरकर इसमें सुधार देखने को मिला। प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयरों में एक प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि कुछ इंश्योरेंस शेयरों में हल्की कमजोरी देखने को मिली, लेकिन इसका असर पूरे बाजार पर सीमित रहा।

    बाजार के आंकड़ों के अनुसार अधिकतर शेयरों में तेजी देखने को मिली, जिससे निवेशकों के बीच सकारात्मक भावना और मजबूत हुई। वोलैटिलिटी इंडेक्स में गिरावट यह संकेत देती है कि बाजार में घबराहट कम हुई है और निवेशक अधिक आत्मविश्वास के साथ ट्रेडिंग कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निफ्टी का 24 हजार 300 के ऊपर बने रहना बाजार के लिए मजबूत संकेत है। आने वाले समय में 24 हजार 450 से 24 हजार 500 का स्तर महत्वपूर्ण रेजिस्टेंस माना जा रहा है, जबकि नीचे की ओर 24 हजार 150 से 24 हजार 200 का स्तर सपोर्ट के रूप में काम कर सकता है। हालांकि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम बाजार की दिशा पर असर डाल सकते हैं।

  • इजरायल-अमेरिका और ईरान तनाव से महंगा हुआ तेल, नेपाल-बांग्लादेश ने बढ़ाईं कीमतें

    इजरायल-अमेरिका और ईरान तनाव से महंगा हुआ तेल, नेपाल-बांग्लादेश ने बढ़ाईं कीमतें


    नई दिल्ली। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के चलते कई देशों ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए हैं, जबकि कुछ जगहों पर ईंधन की राशनिंग तक शुरू हो गई है।

    नेपाल में पेट्रोल-डीजल महंगा

    नेपाल में नेपाल ऑयल कॉर्पोरेशन (NOC) ने पेट्रोल, डीजल और केरोसीन की कीमतों में 15 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। नई दरें आधी रात से लागू हो गई हैं।

    पेट्रोल: 184.50 से 187 रुपये/लीटर (कैटेगरी के अनुसार)
    डीजल/केरोसीन: 164.50 से 167 रुपये/लीटर

    एनओसी ने साफ किया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी के कारण घरेलू कीमतें बढ़ाना जरूरी हो गया था।

    बांग्लादेश में जेट फ्यूल 80% महंगा

    बांग्लादेश में हालात और ज्यादा गंभीर हैं। Bangladesh Energy Regulatory Commission ने जेट फ्यूल की कीमतों में करीब 80% की भारी बढ़ोतरी की है।

    घरेलू उड़ानों के लिए: 112.41 टका से बढ़कर 202.29 टका/लीटर
    अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए: 0.738 डॉलर से बढ़कर 1.3216 डॉलर/लीटर

    इस बढ़ोतरी का सीधा असर हवाई यात्रा और कार्गो लागत पर पड़ेगा।

    पाकिस्तान और यूरोप भी प्रभावित

    पाकिस्तान में पहले से आर्थिक संकट के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 20-25% तक उछाल दर्ज किया गया है। वहीं जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों में गैस और पेट्रोल के दाम 10-15% तक बढ़ गए हैं।

    थाईलैंड में शुरू हुई राशनिंग

    थाईलैंड में हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि पेट्रोल पंपों पर राशनिंग लागू करनी पड़ी है। इसका मतलब है कि एक व्यक्ति को सीमित मात्रा में ही ईंधन दिया जा रहा है, ताकि सप्लाई संतुलित बनी रहे।

    क्या है राशनिंग का मतलब?

    जब किसी देश में ईंधन की भारी कमी हो जाती है या कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं, तो सरकार या पेट्रोल पंप यह तय कर देते हैं कि एक व्यक्ति एक बार में कितना तेल खरीद सकता है। इससे सीमित संसाधनों का संतुलित वितरण किया जाता है।

    आगे क्या असर पड़ेगा?

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो:

    तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं
    महंगाई में तेजी आएगी
    ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे होंगे
    आम लोगों पर सीधा आर्थिक बोझ पड़ेगा

    ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव के कारण तेल महंगा हो रहा है, जिससे नेपाल, बांग्लादेश समेत कई देशों में ईंधन कीमतें बढ़ीं और कुछ जगह राशनिंग तक शुरू हो गई।

  • Crude Oil के दाम आसमान पर, लागत बढ़ने से तेल कंपनियों का मुनाफा घटा… बढ़ सकती है पेट्रोल-डीजल की कीमत!

    Crude Oil के दाम आसमान पर, लागत बढ़ने से तेल कंपनियों का मुनाफा घटा… बढ़ सकती है पेट्रोल-डीजल की कीमत!


    नई दिल्ली।
    अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल की कीमतें (Crude Oil Prices) आसमान छू रही हैं। खाड़ी क्षेत्र में जंग शुरू होने के बाद से भारतीय रिफाइनरियों (Indian Refineries) के लिए कच्चे तेल की लागत में 93% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को यह कीमत 136.56 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई, जिससे इंडियन ऑयल, एचपीसीएल, बीपीसीएल और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी घरेलू तेल कंपनियों के मुनाफे में भारी गिरावट आई है। लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम अभी नहीं बढ़ रहे हैं। दिल्ली में पेट्रोल 94.72 रुपये और डीजल 87.62 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर है, मुंबई में भी यही स्थिति। ये कीमतें आगे भी कुछ समय के लिए बनी रह सकती हैं।


    पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर

    अमेरिका सहित कई देशों ने कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप खुदरा कीमतें बढ़ा दी हैं। अमेरिका में पेट्रोल 3.7 डॉलर प्रति गैलन है। वहीं भारत में तेल कंपनियों ने अब तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई हैं। पिछले कुछ महीनों में मुनाफा कमाने के बाद, अब इन कंपनियों को अपने मार्जिन में नुकसान उठाना पड़ रहा है।


    राज्य चुनाव बने वजह?

    सरकार की ओर से 31 मार्च तक कीमतों या करों में कोई बदलाव किए जाने की संभावना नहीं है, ताकि बजट लक्ष्यों के अनुरूप राजकोषीय संतुलन बनाए रखा जा सके। इसके अलावा, चार राज्यों और पुडुचेरी में होने वाले चुनावों के मद्देनजर, 29 अप्रैल को अंतिम चरण के मतदान तक भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के आसार कम ही हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड में 40% से अधिक और रूसी यूराल क्रूड में 50% से अधिक की वृद्धि हुई है। 26 फरवरी को भारतीय बास्केट की कीमत 70.9 डॉलर प्रति बैरल थी। 12 मार्च को यह बढ़कर 127.2 डॉलर हो गई और शुक्रवार को 7.3% उछलकर 136.5 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई।


    संकट का मुख्य कारण: होर्मुज जलडमरूमध्य

    भारत पिछले कई महीनों से रियायती दर पर रूसी तेल खरीदकर एक लाभदायक स्थिति में था, लेकिन अब उसकी कीमतें भी बढ़ गई हैं। इस वैश्विक कमी का सबसे बड़ा कारण ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लॉक करना है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का 20% हिस्सा संभालता है। भारत के लिए इसका असर और भी गंभीर है, क्योंकि देश की कुल प्रसंस्कृत ऊर्जा का 60% हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से आता है।

    9 मार्च को ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर के तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) द्वारा आपातकालीन भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने के फैसले के बाद कीमतों में थोड़ी राहत मिली थी। लेकिन जब तक जहाजों की आवाजाही सामान्य नहीं होती, कीमतें अस्थिर रहने की उम्मीद है।


    अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

    आर्थिक विशेषज्ञों ने इस संकट के कारण भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य नीलकंठ मिश्रा के अनुसार, यदि कच्चा तेल एक साल तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा। इससे व्यापार संतुलन को लगभग 80 अरब डॉलर (जीडीपी का 2.1%) का भारी नुकसान हो सकता है।

    रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) की रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा आपूर्ति और शिपिंग मार्गों में लंबे समय तक व्यवधान से भारत के वृहद-आर्थिक परिदृश्य पर असर पड़ेगा। कच्चे तेल की औसत कीमत में मात्र 10 डॉलर की वृद्धि से देश का चालू खाता घाटा 30-40 बेसिस पॉइंट बढ़ सकता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने बताया कि इसका असर वैश्विक विकास पर पड़ेगा। उन्होंने रविवार को ‘X’ पर लिखा कि अगर 2026 के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो वैश्विक विकास दर 0.3-0.4 प्रतिशत अंक गिर सकती है और मुख्य मुद्रास्फीति 60 बेसिस पॉइंट बढ़ सकती है।

  • ट्रंप के ईरान युद्ध जल्द खत्म होने के संकेत के बाद कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट,,,

    ट्रंप के ईरान युद्ध जल्द खत्म होने के संकेत के बाद कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट,,,


    नई दिल्ली।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के यह संकेत देने के बाद कि ईरान में युद्ध जल्द (Iran War) ही समाप्त हो जाएगा, कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Price) में भारी गिरावट आई है। ब्रेंट क्रूड 91.55 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमत में 10% तक की गिरावट आई और यह 85.02 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है।

    यह गिरावट सोमवार को हुए उतार-चढ़ाव भरे कारोबारी सत्र के बाद आई है, जब तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का दायरा महामारी के दौरान कीमतों के नकारात्मक होने के बाद सबसे ज्यादा था। बता दें मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने ग्लोबल एनर्जी माार्केट्स को हिलाकर रख दिया है और मुद्रास्फीति संकट को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    ब्लूमबर्ग के मुताबिक फ्लोरिडा में एक संवाददाता सम्मेलन में ट्रंप ने कहा कि वह तेल से संबंधित प्रतिबंधों में छूट देने और होर्मुज स्ट्रेट्स से टैंकरों को एस्कॉर्ट करने के लिए अमेरिकी नौसेना को तैनात करने की योजना बना रहे हैं।

    ट्रंप ने सोमवार देर रात पत्रकारों से कहा, “हम तेल की कीमतों को कम रखना चाहते हैं।” उन्होंने कहा, “इस संकट की वजह से कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ गई थीं,” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि यह संघर्ष इस सप्ताह के अंत तक खत्म होगा।


    तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं थीं

    सोमवार को तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं, जब फारस की खाड़ी के प्रमुख उत्पादक देशों को होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने के कारण उत्पादन कम करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। यह संकरे जलमार्ग आमतौर पर वैश्विक कच्चे तेल के प्रवाह का पांचवां हिस्सा संभालता है। हालांकि, बाद में सत्र में कीमतों में गिरावट आई क्योंकि, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने आपातकालीन भंडार जारी करने के प्रयास पर विचार किया।


    ट्रंप पर अतिरिक्त दबाव

    यह संघर्ष अब अपने दूसरे सप्ताह में है और इसमें एक दर्जन से अधिक देश शामिल हो गए हैं, जिससे तेल, प्राकृतिक गैस और गैसोइल जैसे उत्पादों सहित ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल आया है। अमेरिका में खुदरा पेट्रोल की कीमतें अगस्त 2024 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे ट्रंप पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने टैंकरों को एस्कॉर्ट करने या तेल संबंधी प्रतिबंधों में छूट देने की योजना पर अतिरिक्त जानकारी नहीं दी, सिवाय इसके कि उन्होंने सोमवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर इस विषय पर चर्चा की थी। पिछले सप्ताह, ट्रंप प्रशासन ने भारत के लिए रूसी कच्चे तेल की अपनी खरीद में अस्थायी रूप से वृद्धि करने का रास्ता साफ कर दिया, जो इस व्यापार पर महीनों से चल रहे दबाव से उलट था।


    बाजार की नजरें होर्मुज पर

    बाजार की नजरें होर्मुज से टैंकरों के आवागमन को फिर से शुरू होते देखने पर टिकी हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से कई जहाजों पर हमले के कारण अधिकांश जहाजों ने इस जलमार्ग से बचना शुरू कर दिया है। फिर भी, हाल के दिनों में सऊदी कच्चा तेल ले जाने वाला एक टैंकर वहां से गुजरा, जबकि ईरान ने इस मार्ग से बड़ी मात्रा में तेल भेजना जारी रखा है।


    होर्मुज के बंद होने के कारण

    भंडारण तेजी से भर जाने के कारण सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात ने उत्पादन कम कर दिया है। मध्य पूर्व से कच्चे तेल और तेल उत्पादों के प्रवाह पर पड़े इस संकट के कारण रिफाइनरियों ने कुछ कार्यों और आपूर्ति को रोक दिया है, और एशियाई ऊर्जा खरीदारों ने मूल रूप से अन्य क्षेत्रों के लिए जाने वाले ईंधन शिपमेंट को लुभाने के लिए प्रतिस्पर्धियों से आगे बढ़कर बोली लगाई है।

  • तेल महंगा बेरोजगारी बढ़ी निवेशकों में डर अमेरिकी बाजार में भारी बिकवाली डाउ जोंस गिरा

    तेल महंगा बेरोजगारी बढ़ी निवेशकों में डर अमेरिकी बाजार में भारी बिकवाली डाउ जोंस गिरा

    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते भू राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ती तनातनी के बीच अमेरिकी शेयर बाजार में तेज गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों की चिंता और अनिश्चितता के कारण 6 मार्च को कारोबार के अंत में प्रमुख अमेरिकी सूचकांक डाउ जोंस 453 अंक गिरकर 47,501 के स्तर पर बंद हुआ।

    केवल डाउ जोंस ही नहीं बल्कि अन्य प्रमुख इंडेक्स भी दबाव में नजर आए। टेक्नोलॉजी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाला नैस्डैक कंपोजिट 361 अंक यानी करीब 1.59 प्रतिशत गिरकर 22,387 पर बंद हुआ। वहीं व्यापक बाजार का संकेत देने वाला एस एंड पी 500 इंडेक्स 90 अंक की गिरावट के साथ 6,740 के स्तर पर आ गया। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक परिस्थितियों में बढ़ती अनिश्चितता और कमजोर आर्थिक संकेतकों ने निवेशकों का भरोसा कमजोर कर दिया है।

    मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर भी देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई और कुछ समय के लिए 91 डॉलर से ऊपर भी चली गई। यह अप्रैल 2024 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है और यही कारण है कि निवेशक बाजार में सतर्क रुख अपना रहे हैं।

    इसी बीच अमेरिका से आए कमजोर रोजगार आंकड़ों ने भी निवेशकों की चिंता को बढ़ा दिया है। अमेरिकी श्रम विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले महीने रोजगार वृद्धि उम्मीद से कम रही। गैर कृषि क्षेत्र में नौकरियों के अवसर घटे हैं जबकि बेरोजगारी दर बढ़कर 4.4 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विश्लेषकों का मानना है कि श्रम बाजार की कमजोरी आर्थिक गतिविधियों में संभावित सुस्ती का संकेत हो सकती है।

    इन परिस्थितियों के बीच बाजार में स्टैगफ्लेशन को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। स्टैगफ्लेशन वह स्थिति होती है जब आर्थिक विकास धीमा पड़ जाता है लेकिन महंगाई लगातार बढ़ती रहती है। बढ़ती तेल कीमतें और कमजोर रोजगार आंकड़े इस आशंका को और मजबूत कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह चुनौतीपूर्ण स्थिति बन सकती है।

    इसके साथ ही अमेरिकी केंद्रीय बैंक की ब्याज दरों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि इस साल फेडरल रिजर्व कई बार ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। लेकिन महंगाई बढ़ने की संभावना के कारण अब दरों में कटौती सीमित रहने की संभावना जताई जा रही है। आमतौर पर ऊंची ब्याज दरें शेयर बाजार के लिए नकारात्मक मानी जाती हैं क्योंकि इससे निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता कम हो जाती है।

    जहां अमेरिकी बाजारों में दबाव देखने को मिला वहीं एशियाई बाजारों में मिश्रित रुख रहा। जापान दक्षिण कोरिया और हांगकांग के प्रमुख शेयर सूचकांक हल्की बढ़त के साथ बंद हुए।

    वैश्विक संकेतों का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 1,000 अंक से ज्यादा गिरकर 78,919 पर बंद हुआ जबकि निफ्टी भी गिरावट के साथ 24,450 के स्तर पर आ गया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि जब वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता है और महंगाई की आशंका मजबूत होती है तो निवेशक अक्सर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। ऐसे माहौल में शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ना स्वाभाविक माना जाता है।
  • शेयर बाजार में दबाव, सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में, बैंकिंग और रियल्टी शेयर लीड..

    शेयर बाजार में दबाव, सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में, बैंकिंग और रियल्टी शेयर लीड..


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में कमजोर दिखा और दोपहर तक लाल निशान में रहा। दोपहर 1 बजे तक सेंसेक्स 588 अंक यानी 0.72 प्रतिशत फिसलकर 79,427 पर और निफ्टी 154 अंक यानी 0.62 प्रतिशत कमजोरी के साथ 24,612 पर कारोबार कर रहा था।

    इस गिरावट की अगुवाई बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने की। निफ्टी रियल्टी इंडेक्स 1.85 प्रतिशत और निफ्टी बैंक इंडेक्स 1.31 प्रतिशत कमजोर हुए। इसके अलावा ऑटो, सर्विसेज और कंज्यूमर सेक्टर पर भी दबाव देखा गया। हालांकि, डिफेंस, एनर्जी, पीएसई, ऑयल एंड गैस, कमोडिटी और मेटल इंडेक्स हरे निशान में बने रहे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में इस बड़ी गिरावट के पीछे मुख्य कारण अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध है। युद्ध के लंबा चलने से वैश्विक एनर्जी सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है, जिससे निवेशकों का सेंटीमेंट नकारात्मक हो गया है।

    युद्ध के प्रभाव से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी है। डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत 80.39 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड 84.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। इससे निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से हटकर सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं। खबर लिखे जाने तक कॉमेक्स पर सोने की कीमत 0.81 प्रतिशत बढ़कर 5,120 डॉलर प्रति औंस और चांदी 2.96 प्रतिशत मजबूत होकर 84.61 डॉलर प्रति औंस पर थी।

    अमेरिकी बाजार में भी गिरावट ने भारतीय बाजार की कमजोरी को बढ़ावा दिया। गुरुवार को डाओ इंडेक्स 1.61 प्रतिशत और नैस्डैक 0.26 प्रतिशत कमजोर होकर बंद हुआ। इससे एफआईआई और घरेलू निवेशकों के बीच बिकवाली का दबाव बढ़ा।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली भी सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। गुरुवार को एफआईआई ने 3,752.52 करोड़ रुपए के इक्विटी शेयर बेचे। इस बिकवाली ने भारतीय बाजार में लगातार कमजोरी का माहौल बनाया और निवेशकों में सतर्कता बढ़ा दी।

    विश्लेषकों के अनुसार, निवेशकों की बेचैनी का असर अभी कुछ समय तक जारी रह सकता है, खासकर जब तक वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में स्थिरता नहीं आती। ऐसे समय में बैंकिंग, रियल्टी और ऑटो सेक्टर पर दबाव बना रहेगा, जबकि सोना, चांदी और एनर्जी सेक्टर निवेशकों के लिए सुरक्षित विकल्प बने