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  • शेयर बाजार में दबाव, सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में, बैंकिंग और रियल्टी शेयर लीड..

    शेयर बाजार में दबाव, सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में, बैंकिंग और रियल्टी शेयर लीड..


    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में कमजोर दिखा और दोपहर तक लाल निशान में रहा। दोपहर 1 बजे तक सेंसेक्स 588 अंक यानी 0.72 प्रतिशत फिसलकर 79,427 पर और निफ्टी 154 अंक यानी 0.62 प्रतिशत कमजोरी के साथ 24,612 पर कारोबार कर रहा था।

    इस गिरावट की अगुवाई बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने की। निफ्टी रियल्टी इंडेक्स 1.85 प्रतिशत और निफ्टी बैंक इंडेक्स 1.31 प्रतिशत कमजोर हुए। इसके अलावा ऑटो, सर्विसेज और कंज्यूमर सेक्टर पर भी दबाव देखा गया। हालांकि, डिफेंस, एनर्जी, पीएसई, ऑयल एंड गैस, कमोडिटी और मेटल इंडेक्स हरे निशान में बने रहे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में इस बड़ी गिरावट के पीछे मुख्य कारण अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध है। युद्ध के लंबा चलने से वैश्विक एनर्जी सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है, जिससे निवेशकों का सेंटीमेंट नकारात्मक हो गया है।

    युद्ध के प्रभाव से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी है। डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत 80.39 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड 84.84 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। इससे निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से हटकर सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं। खबर लिखे जाने तक कॉमेक्स पर सोने की कीमत 0.81 प्रतिशत बढ़कर 5,120 डॉलर प्रति औंस और चांदी 2.96 प्रतिशत मजबूत होकर 84.61 डॉलर प्रति औंस पर थी।

    अमेरिकी बाजार में भी गिरावट ने भारतीय बाजार की कमजोरी को बढ़ावा दिया। गुरुवार को डाओ इंडेक्स 1.61 प्रतिशत और नैस्डैक 0.26 प्रतिशत कमजोर होकर बंद हुआ। इससे एफआईआई और घरेलू निवेशकों के बीच बिकवाली का दबाव बढ़ा।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली भी सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। गुरुवार को एफआईआई ने 3,752.52 करोड़ रुपए के इक्विटी शेयर बेचे। इस बिकवाली ने भारतीय बाजार में लगातार कमजोरी का माहौल बनाया और निवेशकों में सतर्कता बढ़ा दी।

    विश्लेषकों के अनुसार, निवेशकों की बेचैनी का असर अभी कुछ समय तक जारी रह सकता है, खासकर जब तक वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में स्थिरता नहीं आती। ऐसे समय में बैंकिंग, रियल्टी और ऑटो सेक्टर पर दबाव बना रहेगा, जबकि सोना, चांदी और एनर्जी सेक्टर निवेशकों के लिए सुरक्षित विकल्प बने

  • अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर पड़ सकता है असर, जानिए क्‍या-क्‍या होंगे प्रभावित?

    अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर पड़ सकता है असर, जानिए क्‍या-क्‍या होंगे प्रभावित?



    नई दिल्ली। अमेरिका और Iran के बीच बढ़ते सैन्य टकराव का असर सिर्फ इन देशों या Israel तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व के अन्य देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन पर भी इसके प्रभाव दिख रहे हैं। युद्ध के विस्तार की स्थिति में भारत पर इसका व्यापक आर्थिक असर पड़ सकता है। आइए जानते हैं कि किस तरह सोना-चांदी, शेयर बाजार और बासमती चावल प्रभावित हो सकते हैं।

    क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल
    पूरा मध्य पूर्व क्षेत्र तेल का प्रमुख उत्पादक है और भारत कच्चे तेल के आयात पर पूरी तरह निर्भर है। हाल के महीनों में रूस की जगह सऊदी अरब से तेल खरीद बढ़ी थी, लेकिन युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

    शेयर बाजार पर दबाव
    अमेरिका-ईरान युद्ध की अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ रहा है। शुक्रवार को बाजार में गिरावट देखी गई, और विशेषज्ञों का अनुमान है कि सोमवार को यह गिरावट जारी रह सकती है। वैश्विक तनाव हमेशा शेयर बाजार में भारी दबाव डालता है, और निवेशक सतर्क हो जाते हैं।

    सोने और चांदी की कीमतों में तेजी
    शेयर बाजार में गिरावट के बीच निवेशक सुरक्षित विकल्प की ओर रुख करते हैं। इससे सोने और चांदी की कीमतों में इजाफा होने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार सोने का भाव 1,70,000 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी 30 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकता है।

    बासमती चावल के निर्यात पर असर
    भारत मध्य पूर्व के कई देशों को बासमती चावल निर्यात करता है, जिसमें ईरान भी शामिल है। युद्ध के कारण इस निर्यात पर असर पड़ सकता है, जिससे किसानों और निर्यातकों की आमदनी प्रभावित हो सकती है।

    डॉलर मजबूत, रुपये कमजोर
    तेल की बढ़ती कीमतों का असर डॉलर और रुपये पर भी पड़ेगा। डॉलर की मांग युद्ध के कारण बढ़ेगी, जिससे अमेरिकी मुद्रा और मजबूत होगी। वहीं, रुपये में गिरावट देखने को मिल सकती है।

    महंगाई पर दबाव
    क्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे देश में महंगाई को बढ़ा सकती है। ईंधन और परिवहन लागत बढ़ने से अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होगा, जिससे आम नागरिक पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा।

    अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में संघर्ष जारी रहा, तो भारत की आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ताओं की जेब पर इसका असर लंबी अवधि तक महसूस होगा।