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  • सरकार ने पेट्रोल निर्यात शुल्क शून्य किया, डीजल और विमान ईंधन पर बढ़ाई एक्सपोर्ट ड्यूटी..

    सरकार ने पेट्रोल निर्यात शुल्क शून्य किया, डीजल और विमान ईंधन पर बढ़ाई एक्सपोर्ट ड्यूटी..

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के निर्यात पर लागू शुल्कों में बदलाव किया है। वित्त मंत्रालय की ओर से शनिवार, 31 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोल के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क घटाकर शून्य कर दिया गया है। वहीं, डीजल और एटीएफ के निर्यात पर शुल्क में बढ़ोतरी की गई है। सरकार के इस फैसले के बाद पेट्रोल पर पहले लागू 2.50 रुपये प्रति लीटर का शुल्क समाप्त हो गया है।

    संशोधित दरों के तहत डीजल के निर्यात पर शुल्क 8.50 रुपये से बढ़ाकर 11.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इसमें तीन रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। इसी तरह, एटीएफ के निर्यात पर शुल्क 10.50 रुपये से बढ़ाकर 11 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इस तरह विमान ईंधन पर निर्यात शुल्क में 50 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। पेट्रोल पर शुल्क शून्य होने के साथ तीनों पेट्रोलियम उत्पादों के लिए अलग-अलग दरें लागू हो गई हैं।

    सरकार ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बने हालात के बीच इन शुल्कों की समीक्षा की है। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने के बाद मार्च के अंत में पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर शुल्क लागू किए गए थे। इन दरों की समीक्षा केंद्र सरकार हर 15 दिन में करती है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के अनुसार शुल्कों में बदलाव किया जा सके।

    निर्यात शुल्क लागू करने का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तेल रिफाइनरियां घरेलू बाजार में आपूर्ति करने के बजाय अधिक मुनाफे के लिए विदेशी बाजारों को प्राथमिकता न दें। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें घरेलू बाजार की तुलना में अधिक आकर्षक होती हैं, तब निर्यात से बेहतर कमाई की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे हालात में निर्यात शुल्क के माध्यम से घरेलू खरीदारों के लिए पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश की जाती है।

    इस बीच, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर 113.10 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। बीते एक सप्ताह में इसकी कीमत में 1.55 प्रतिशत और एक महीने के दौरान 15.71 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले तीन महीनों में ब्रेंट क्रूड करीब 26 प्रतिशत महंगा हुआ है।

    भारत के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व भी काफी अधिक है। मध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने से पहले देश के कच्चे तेल के आयात का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर आता था। यह मार्ग फारस की खाड़ी को वैश्विक बाजारों से जोड़ता है और तेल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़े हैं।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और आपूर्ति से जुड़े इन घटनाक्रमों के बीच सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात शुल्क की समीक्षा कर रही है। नई दरों के तहत पेट्रोल पर निर्यात शुल्क समाप्त हो गया है, जबकि डीजल और एटीएफ पर शुल्क बढ़ाया गया है। इन बदलावों का उद्देश्य घरेलू आपूर्ति और निर्यात से जुड़े आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखना है।

  • सेंसेक्स-निफ्टी में मामूली बढ़त के बावजूद शेयर बाजार में बिकवाली हावी, कच्चे तेल और ग्लोबल गिरावट ने बढ़ाई चिंता

    सेंसेक्स-निफ्टी में मामूली बढ़त के बावजूद शेयर बाजार में बिकवाली हावी, कच्चे तेल और ग्लोबल गिरावट ने बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार, 30 अक्टूबर को कारोबार के दौरान दबाव देखने को मिला। सेंसेक्स और निफ्टी मामूली बढ़त के साथ हरे निशान में कारोबार करते नजर आए, लेकिन व्यापक बाजार में बिकवाली का रुख बना रहा। खासतौर पर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में निवेशकों की ओर से लगातार बिकवाली देखने को मिली। आईटी और फार्मा कंपनियों के शेयरों में खरीदारी ने प्रमुख सूचकांकों को गिरावट से बचाने में मदद की, लेकिन बाजार की कुल स्थिति कमजोर बनी रही।

    शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 74,422.42 के ऊपरी स्तर और 74,099.33 के निचले स्तर के बीच कारोबार कर रहा था। इसी तरह निफ्टी ने 23,019.25 का उच्चतम और 22,919.85 का न्यूनतम स्तर दर्ज किया। प्रमुख सूचकांकों में मामूली तेजी के बावजूद ज्यादातर शेयरों में गिरावट ने बाजार की वास्तविक स्थिति को कमजोर बनाए रखा।

    बाजार में बिकवाली का अंदाजा मार्केट ब्रेड्थ के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर शुरुआती कारोबार के दौरान कुल 3,076 शेयरों में कारोबार हो रहा था। इनमें से 934 शेयर बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे, जबकि 2,053 शेयर गिरावट में थे। वहीं, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर कुल 3,541 शेयरों में कारोबार हुआ। इनमें 1,234 शेयरों में तेजी और 2,097 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट था कि बाजार में तेजी का दायरा सीमित था और अधिकांश शेयरों पर बिकवाली का दबाव बना हुआ था।

    बाजार में कमजोरी की एक प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी रही। शुक्रवार सुबह ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 1.20 प्रतिशत बढ़कर 112.13 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी क्रूड ऑयल की कीमत में लगभग 1.12 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 103.15 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। कच्चे तेल के महंगे होने से भारत जैसे आयात पर निर्भर देश की अर्थव्यवस्था और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। इसी वजह से तेल की कीमतों में तेजी को बाजार के लिए अहम चिंता माना जा रहा है।

    दूसरा बड़ा कारण एशियाई शेयर बाजारों में आई गिरावट रही। शुक्रवार को जापान का निक्केई 225 करीब 2.58 प्रतिशत टूट गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी 3.87 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रहा था। ताइवान के बाजार में 2.53 प्रतिशत और इंडोनेशिया के जकार्ता कंपोजिट में 1.61 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे पहले अमेरिकी बाजार में भी नैस्डैक करीब 1.42 प्रतिशत की कमजोरी के साथ बंद हुआ था। वैश्विक बाजारों के इस रुख का असर भारतीय निवेशकों की धारणा पर भी दिखाई दिया।

    तीसरा महत्वपूर्ण संकेत बाजार में बढ़ती अस्थिरता का रहा। इंडिया VIX शुक्रवार सुबह करीब 3.24 प्रतिशत उछलकर 15.61 के स्तर पर पहुंच गया। इसे बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव और निवेशकों की अनिश्चितता का संकेतक माना जाता है। इसमें बढ़ोतरी से संकेत मिलता है कि निवेशक आने वाले समय में बाजार में अधिक उतार-चढ़ाव की आशंका जता रहे हैं। इसका असर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर विशेष रूप से पड़ सकता है।

    हालांकि, बिकवाली के बीच आईटी और फार्मा शेयरों में खरीदारी ने बाजार को कुछ सहारा दिया। निफ्टी आईटी इंडेक्स में 1.37 प्रतिशत और निफ्टी फार्मा में 0.96 प्रतिशत की तेजी रही। हेल्थकेयर इंडेक्स भी 0.82 प्रतिशत ऊपर कारोबार कर रहा था। दूसरी ओर कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स 1.78 प्रतिशत गिर गया। निफ्टी बैंक में 0.27 प्रतिशत, निफ्टी मेटल में 0.67 प्रतिशत और निफ्टी ऑटो में 0.32 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई।

    इस तरह शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में प्रमुख सूचकांकों की मामूली बढ़त और व्यापक स्तर पर जारी बिकवाली के बीच अंतर दिखाई दिया। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, विदेशी बाजारों की कमजोरी और इंडिया VIX में उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई।

  • कमजोर वैश्विक संकेतों और महंगे कच्चे तेल से शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 396 अंक तक फिसला

    कमजोर वैश्विक संकेतों और महंगे कच्चे तेल से शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 396 अंक तक फिसला

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार, 27 अक्टूबर को कारोबार की शुरुआत कमजोरी के साथ हुई। वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण निवेशकों का रुख सतर्क बना रहा। बाजार में यह लगातार छठा कारोबारी सत्र रहा, जब गिरावट का दबाव देखने को मिला। इस सप्ताह भी बाजार लगातार दूसरे दिन कमजोरी के साथ कारोबार करता नजर आया।

    शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 122.37 अंक यानी 0.17 प्रतिशत गिरकर 73,484.38 पर खुला। वहीं, एनएसई निफ्टी 50 में 44.40 अंक यानी 0.20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 22,708.80 के स्तर पर खुला। कारोबार आगे बढ़ने के साथ प्रमुख सूचकांकों पर दबाव और बढ़ गया। सेंसेक्स एक समय अपने पिछले बंद स्तर 73,606.75 से 395.99 अंक यानी 0.53 प्रतिशत नीचे आकर 73,210.76 के दिन के निचले स्तर तक पहुंच गया। निफ्टी 50 भी अपने पिछले बंद स्तर 22,753.20 से 100 अंक यानी 0.43 प्रतिशत गिरकर 22,653.20 तक फिसल गया।

    हालांकि, व्यापक बाजार में प्रमुख सूचकांकों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 1.6 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई, जबकि निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 0.54 प्रतिशत चढ़ा। इससे संकेत मिला कि प्रमुख कंपनियों के शेयरों में दबाव के बावजूद छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों के कुछ शेयरों में खरीदारी बनी रही।

    सेक्टरवार कारोबार में आईटी, सीमेंट और ऑयल एंड गैस कंपनियों के शेयरों में बिकवाली देखने को मिली। निफ्टी आईटी इंडेक्स एक प्रतिशत से अधिक गिर गया। निफ्टी सीमेंट में 0.98 प्रतिशत और निफ्टी ऑयल एंड गैस में 0.53 प्रतिशत की कमजोरी रही। दूसरी ओर, फार्मा, हेल्थकेयर और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयरों में खरीदारी दर्ज की गई। निफ्टी पीएसयू बैंक 0.68 प्रतिशत चढ़ा, जबकि निफ्टी फार्मा में 0.44 प्रतिशत और निफ्टी हेल्थकेयर में 0.39 प्रतिशत की बढ़त रही।

    मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मामूली मजबूती दिखाई। रुपया दो पैसे बढ़कर 95.17 प्रति डॉलर पर खुला। इससे पिछले कारोबारी सत्र में यह 95.19 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। हालांकि, रुपये का कमजोर स्तर और कच्चे तेल की महंगाई बाजार के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।

    बाजार के सामने प्रमुख चुनौतियों में ब्रेंट क्रूड का 114 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहना और अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड का लगभग 4.97 प्रतिशत पर रहना शामिल है। ऐसे माहौल में विदेशी संस्थागत निवेशकों के जोखिम लेने से बचने की आशंका जताई गई है। हालांकि, दूसरी तिमाही के कॉर्पोरेट नतीजों में दिखाई दे रहे बेहतर कारोबारी संकेत और घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी बाजार को सहारा दे सकते हैं।

    तकनीकी स्तरों के लिहाज से निफ्टी 50 के लिए 22,690 के आसपास रिकवरी की कोशिश और कमजोरी, दोनों संभावनाएं बनी हुई हैं। यदि सूचकांक 22,630 के ऊपर टिकता है, तो 23,000 से 23,500 तक पहुंचने की संभावना पर नजर रखी जा सकती है। हालांकि, 22,800 से 22,900 के दायरे में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, 22,630 का स्तर टूटने पर निफ्टी 22,250 से 22,000 तक फिसल सकता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, बड़ी गिरावट की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।

    संस्थागत निवेशकों के आंकड़ों के मुताबिक, सोमवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 1,462 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिकवाली की। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगातार दसवें कारोबारी सत्र में खरीदारी जारी रखते हुए 2,609 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। वैश्विक बाजारों में अमेरिकी शेयर बाजार सोमवार को बढ़त के साथ बंद हुए। एसएंडपी 500 में 0.7 प्रतिशत और नैस्डैक में 0.82 प्रतिशत की तेजी रही, जबकि एशियाई बाजारों में शुरुआती कारोबार के दौरान मिला-जुला रुख रहा।

    आगे बाजार की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव, रुपये की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों का असर पड़ सकता है। साप्ताहिक और मासिक डेरिवेटिव अनुबंधों की समाप्ति के कारण कारोबार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका है। इसके साथ ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक और कंपनियों के दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजे भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।

  • कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई वैश्विक बाजारों की चिंता, इंडियन बास्केट 120 डॉलर के करीब पहुंचने से बढ़ा दबाव

    कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई वैश्विक बाजारों की चिंता, इंडियन बास्केट 120 डॉलर के करीब पहुंचने से बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली ।
    वश्विक बाजारों में सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर अंतरराष्ट्रीय संकेतों के कारण निवेशकों की चिंता बनी रही। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि भारत के लिए महत्वपूर्ण इंडियन क्रूड बास्केट का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। महंगे तेल का असर भारत के आयात खर्च, महंगाई और तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर पड़ने की आशंका है।

    ब्रेंट क्रूड का भाव पिछले कारोबारी सत्र में बढ़कर 117.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। बाद में यह 116.72 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। सोमवार सुबह इसमें पिछले बंद स्तर के मुकाबले करीब 1.55 प्रतिशत की गिरावट आई और कीमत 114.91 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही। इसके बावजूद कच्चे तेल का भाव ऊंचे स्तर पर बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल और मई के दौरान भी तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंची थीं।

    अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड का भाव अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने की स्थिति में रहा है। सऊदी अरब में हूती हमलों के बाद तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने भी कीमतों को समर्थन दिया। सोमवार को भाव में नरमी आने के बावजूद आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं और वैश्विक परिस्थितियों के कारण बाजार पर दबाव बना हुआ है।

    भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की वास्तविक लागत भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 22 अक्टूबर को इंडियन क्रूड बास्केट का भाव 119.99 डॉलर प्रति बैरल दर्ज किया गया। अक्टूबर का औसत भाव भी लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल बताया गया है। इस स्तर पर कच्चे तेल की खरीद भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती है और रुपये तथा महंगाई पर दबाव डाल सकती है।

    महंगे तेल का असर तेल विपणन कंपनियों की कमाई पर भी पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनियों को प्रतिदिन 500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो रहा है। पेट्रोल पर करीब 8 रुपये और डीजल पर 9 रुपये प्रति लीटर का नुकसान बताया गया है। इसके अलावा, प्रत्येक एलपीजी सिलिंडर पर लगभग 300 रुपये की अंडर रिकवरी होने की जानकारी सामने आई है।

    त्योहारी मौसम में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की आशंका कम बताई जा रही है। हालांकि, यदि त्योहारों के बाद भी कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाने पर विचार कर सकती हैं। फिलहाल, खुदरा कीमतों में बदलाव को लेकर कोई निश्चित फैसला सामने नहीं आया है।

    अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली। शुक्रवार को अमेरिकी बाजार में डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 652.82 अंक यानी करीब 1.23 प्रतिशत गिरकर 52,215.16 पर बंद हुआ। एसएंडपी 500 में 0.52 प्रतिशत और नैस्डैक कंपोजिट में 0.21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, सोमवार सुबह अमेरिकी वायदा बाजार में कुछ सुधार दिखाई दिया। डाउ जोन्स फ्यूचर्स 0.24 प्रतिशत बढ़कर 52,341.69 पर कारोबार कर रहा था।

    एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा। जापान के निक्केई 225 में करीब 0.26 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया के कोस्पी में 0.92 प्रतिशत, चीन के शंघाई कंपोजिट में 0.36 प्रतिशत और सिंगापुर के स्ट्रेट्स टाइम्स में 0.43 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, हांगकांग का हैंग सेंग 0.31 प्रतिशत ऊपर रहा।

    भारतीय बाजार के लिए शुरुआती संकेत लगभग सपाट रहे। सुबह 7:36 बजे गिफ्ट निफ्टी 22,599.50 पर था, जो पिछले बंद स्तर से 8.50 अंक यानी 0.04 प्रतिशत नीचे था। इस सप्ताह 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक भी निवेशकों के लिए अहम है। ऊंची ऊर्जा कीमतों के बीच ब्याज दरों और महंगाई पर फेड के रुख से वैश्विक बाजारों की आगे की दिशा प्रभावित हो सकती है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 609 अंक टूटा और निफ्टी भी फिसला

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच शेयर बाजार में गिरावट, सेंसेक्स 609 अंक टूटा और निफ्टी भी फिसला

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिससे घरेलू बाजार के प्रमुख सूचकांक लाल निशान में खुले। बाजार में गिरावट का यह लगातार पांचवां कारोबारी सत्र रहा। शुरुआती कारोबार के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में दबाव देखने को मिला। दिन के कारोबार में सेंसेक्स 600 अंक से अधिक टूट गया, जबकि निफ्टी भी एक प्रतिशत के करीब गिरावट के साथ अपने निचले स्तर तक पहुंच गया।

    बीएसई का सेंसेक्स पिछले कारोबारी सत्र में 73,123.83 अंक पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 72,990.04 अंक पर खुला, जो पिछले बंद स्तर से 133.79 अंक यानी 0.18 प्रतिशत नीचे था। कारोबार आगे बढ़ने के साथ बिकवाली का दबाव बढ़ा और सेंसेक्स 609.25 अंक यानी 0.83 प्रतिशत गिरकर 72,514.57 अंक के निचले स्तर तक पहुंच गया।

    इसी तरह एनएसई का निफ्टी 50 पिछले बंद स्तर 22,600 अंक के मुकाबले 22,524.40 अंक पर खुला। इसमें शुरुआती स्तर पर 75.59 अंक यानी 0.33 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बाद में सूचकांक 212.65 अंक यानी 0.94 प्रतिशत फिसलकर 22,387.35 अंक के निचले स्तर पर पहुंच गया।

    बाजार में कमजोरी केवल प्रमुख सूचकांकों तक सीमित नहीं रही। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी मिडकैप 100 में 0.81 प्रतिशत और स्मॉलकैप सूचकांक में 0.91 प्रतिशत की कमी आई। इससे व्यापक बाजार में भी निवेशकों के सतर्क रुख का संकेत मिला।

    सेक्टर के स्तर पर निफ्टी पीएसयू बैंक, एफएमसीजी, ऑटो, फाइनेंशियल सर्विसेज और आईटी सूचकांकों में एक प्रतिशत से अधिक तक की गिरावट देखी गई। इसके विपरीत निजी बैंकिंग शेयरों ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। निफ्टी प्राइवेट बैंक करीब 0.49 प्रतिशत चढ़ा। फार्मा और हेल्थकेयर से जुड़े शेयरों में भी अन्य प्रमुख क्षेत्रों की तुलना में कम दबाव रहा।

    निवेशकों की नजर अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली नीतिगत बैठक पर है। बाजार में व्यापक उम्मीद है कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बदलाव नहीं करेगा। हालांकि, बैठक के बाद भविष्य की मौद्रिक नीति को लेकर मिलने वाले संकेत अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, डॉलर और उभरते बाजारों में विदेशी निवेश के प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा सितंबर तिमाही के कंपनियों के नतीजे भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।

    कच्चे तेल की कीमतें भी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड दो प्रतिशत से अधिक गिरकर करीब 114 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। वहीं, अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई क्रूड दो प्रतिशत से अधिक टूटकर 100.70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। हालिया नरमी के बावजूद तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे महंगाई और कंपनियों की लागत को लेकर चिंताएं कायम हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले सप्ताह मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में तेज गिरावट की एक वजह मार्जिन फंडिंग पर आधारित सौदों का बंद होना भी रही। हालांकि, गिरावट के बाद कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में निवेश के अवसर बन सकते हैं, लेकिन निवेशकों को आर्थिक जोखिमों पर नजर रखनी होगी।

    विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों के आंकड़े बाजार के लिए एक अलग संकेत भी देते हैं। 23 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 887 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध खरीदारी की थी। वहीं, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगातार चौथे कारोबारी सत्र खरीदारी जारी रखते हुए 3,236 करोड़ रुपये की इक्विटी खरीदी थी।

    एशियाई बाजारों में भी निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है। वैश्विक केंद्रीय बैंकों की बैठकें, कंपनियों के तिमाही नतीजे, कच्चे तेल की कीमतें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी निवेश धारणा आने वाले दिनों में बाजार की चाल को प्रभावित कर सकती हैं।

  • कच्चे तेल की कीमतों में 2027 तक बड़ी गिरावट की संभावना, ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 80 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान

    कच्चे तेल की कीमतों में 2027 तक बड़ी गिरावट की संभावना, ब्रेंट क्रूड का औसत भाव 80 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच आने वाले समय में बड़ी गिरावट की संभावना जताई गई है। मौजूदा समय में ब्रेंट क्रूड का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जबकि अगले महीने डिलीवरी के लिए निर्धारित डेटेड ब्रेंट की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बताई गई है। हालांकि, अनुमान है कि वर्ष 2027 में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है और ब्रेंट क्रूड का औसत भाव घटकर 80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। यह अनुमान पश्चिम एशिया में तेल की आपूर्ति में संभावित सुधार और वैश्विक बाजार में मांग तथा आपूर्ति के बीच बदलते अंतर पर आधारित है।

    तेल बाजार के विशेषज्ञ डान स्ट्रुवेन और उनकी टीम के आकलन के मुताबिक, दिसंबर 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 90 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। यह उनके पहले के 85 डॉलर प्रति बैरल के अनुमान से अधिक है। इसके बावजूद, वर्ष 2027 के लिए औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल रहने की संभावना जताई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति पर पड़ा असर धीरे-धीरे कम हो सकता है। यदि आपूर्ति सामान्य होती है और बाजार में पर्याप्त तेल उपलब्ध रहता है, तो कीमतों पर दबाव घट सकता है।

    तेल की कीमतों में संभावित गिरावट की एक प्रमुख वजह फारस की खाड़ी से निर्यात में हुआ सुधार बताया गया है। आकलन के अनुसार, सितंबर के अंत से इस क्षेत्र का तेल निर्यात वर्ष 2025 के औसत स्तर के आसपास बना हुआ है। इसमें प्रतिदिन लगभग 40 लाख बैरल ऐसे तेल का अनुमानित निर्यात भी शामिल है, जिसे ऐसे टैंकरों के जरिए ले जाया जाता है जिनके ट्रांसपोंडर बंद होने के कारण उनकी आवाजाही का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। इस तरह निर्यात में सुधार से वैश्विक बाजार में उपलब्ध तेल की मात्रा बढ़ने की संभावना है।

    वैश्विक तेल बाजार में मांग और आपूर्ति के अंतर में कमी भी कीमतों के अनुमान को प्रभावित कर रही है। आकलन के मुताबिक, मार्च में तेल की मांग आपूर्ति से प्रतिदिन लगभग 72 लाख बैरल अधिक थी, जबकि सितंबर में यह अंतर घटकर करीब तीन लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। फारस की खाड़ी के बाहर उत्पादन में बढ़ोतरी और कमजोर मांग ने इस अंतर को कम करने में योगदान दिया। अनुमान है कि वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में वैश्विक तेल बाजार अधिशेष की स्थिति में आ सकता है। वर्ष 2027 में भी यह स्थिति बनी रहने की संभावना है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है।

    पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति में आई बाधाओं ने बाजार को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस संकट से जुड़ी मांग में आई भारी कमी वर्ष 2027 की चौथी तिमाही तक काफी हद तक दूर हो सकती है। हालांकि, कीमतों में दोबारा तेजी आने का जोखिम बना हुआ है। यदि क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ता है या आपूर्ति में नई बाधाएं पैदा होती हैं, तो कच्चे तेल के दाम अनुमान से अधिक समय तक ऊंचे रह सकते हैं।

    इसलिए 80 डॉलर प्रति बैरल का स्तर फिलहाल भविष्य के बाजार का अनुमान है, निश्चित कीमत नहीं। आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया की स्थिति, तेल निर्यात की रफ्तार, उत्पादन और वैश्विक मांग यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि कीमतें वास्तव में कितनी नीचे आती हैं।

  • महंगाई के आंकड़े, कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर रहेगी बाजार की नजर, आठ हफ्ते बाद सेंसेक्स-निफ्टी में लौटी तेजी

    महंगाई के आंकड़े, कच्चे तेल की कीमत और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर रहेगी बाजार की नजर, आठ हफ्ते बाद सेंसेक्स-निफ्टी में लौटी तेजी


    नई दिल्ली:
    भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला सप्ताह अहम रहने वाला है। निवेशकों की नजर भारत और अमेरिका से जारी होने वाले आर्थिक आंकड़ों, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर रहेगी। इन कारकों के साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियां बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं। अमेरिका में महंगाई, घरों की बिक्री और खुदरा बिक्री से जुड़े आंकड़े जारी होंगे। वहीं, भारत में खुदरा और थोक महंगाई, बेरोजगारी, व्यापार संतुलन तथा विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़े सामने आएंगे। इन आंकड़ों से आर्थिक स्थिति के बारे में संकेत मिल सकते हैं, जिन पर निवेशकों की प्रतिक्रिया बाजार में उतार-चढ़ाव के रूप में दिखाई दे सकती है। बीते सप्ताह भारतीय बाजार में तेजी दर्ज की गई थी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों साप्ताहिक आधार पर बढ़त के साथ बंद हुए, जो आठ सप्ताह बाद पहली बार हुआ। ऐसे में आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशक पिछले सप्ताह की तेजी के साथ नए आर्थिक संकेतों पर भी नजर रखेंगे।

    कच्चे तेल की कीमत अगले सप्ताह बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारकों में शामिल रहेगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। तेल की कीमतों में बदलाव का असर निवेशकों की धारणा और बाजार की गतिविधियों पर पड़ सकता है। इस बीच रूस से डीजल की आपूर्ति को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान भी चर्चा में है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर कहा कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी बातचीत सफल रही है। उनके मुताबिक, रूस अमेरिकी और वैश्विक बाजारों में तुरंत तीन लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा। इसके बाद नवंबर में पांच लाख टन और उसके तुरंत बाद दस लाख टन डीजल की आपूर्ति की जाएगी। इस घोषणा के संभावित प्रभाव को लेकर बाजार की नजर बनी रह सकती है। जानकारों के मुताबिक, रूस से डीजल की आपूर्ति बढ़ने से वैश्विक तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, कीमतों की वास्तविक दिशा बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

    अगले सप्ताह निवेशकों के लिए अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी एक अहम संकेतक रहेगी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड लगातार पांच प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। निवेशक इसके स्तर और इसमें होने वाले बदलावों पर नजर रखेंगे। इसके साथ अमेरिका के महंगाई आंकड़े, खुदरा बिक्री और घरों की बिक्री से जुड़े आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकते हैं। भारत में खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़ों के अलावा बेरोजगारी, व्यापार संतुलन और विदेशी मुद्रा भंडार की जानकारी भी जारी होने वाली है। इन आंकड़ों के आधार पर निवेशक घरेलू अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन कर सकते हैं। कच्चे तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव के बीच इन आर्थिक संकेतकों पर बाजार की प्रतिक्रिया आने वाले सप्ताह में देखने को मिल सकती है।

    बीते सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में बढ़त दर्ज की गई। सेंसेक्स 562.63 अंक यानी 0.78 प्रतिशत की तेजी के साथ 72,472.33 पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी में 98.50 अंक यानी 0.44 प्रतिशत की मजबूती रही और यह 22,520.45 के स्तर पर बंद हुआ। आठ सप्ताह बाद यह पहला मौका था, जब दोनों प्रमुख सूचकांक साप्ताहिक आधार पर बढ़त के साथ बंद हुए। क्षेत्रवार प्रदर्शन में बीएसई टेलीकॉम सबसे आगे रहा और इसमें 3.72 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। बीएसई एफएमसीजी में 2.43 प्रतिशत, बीएसई पीएसयू बैंक में 2.31 प्रतिशत, बीएसई फाइनेंशियल सर्विसेज में 1.03 प्रतिशत और बीएसई आईटी में 0.76 प्रतिशत की बढ़त रही। हालांकि, सभी क्षेत्रों में तेजी नहीं रही। बीएसई रियल्टी में 4.19 प्रतिशत और बीएसई मेटल में 4.18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बीएसई यूटिलिटी 2.48 प्रतिशत, बीएसई कमोडिटीज 2.46 प्रतिशत और बीएसई पावर 2.22 प्रतिशत कमजोर हुए। आने वाले सप्ताह में बाजार की दिशा तय करने में आर्थिक आंकड़ों और वैश्विक संकेतों की भूमिका अहम रह सकती है।

  • अगले हफ्ते कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान तनाव और आर्थिक आंकड़े तय करेंगे शेयर बाजार की दिशा

    अगले हफ्ते कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान तनाव और आर्थिक आंकड़े तय करेंगे शेयर बाजार की दिशा

    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार के लिए आने वाला कारोबारी सप्ताह कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों और आर्थिक आंकड़ों के लिहाज से अहम रहने वाला है। बाजार की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव और देश के प्रमुख आर्थिक आंकड़ों का असर देखने को मिल सकता है। इसके अलावा ऑटो बिक्री, जीएसटी संग्रह, पीएमआई, औद्योगिक उत्पादन, राजकोषीय घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़े आंकड़े भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।

    मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों पर बाजार की नजर बनी हुई है। कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव से जुड़ा कोई नया घटनाक्रम बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है। यदि क्षेत्र में तनाव कम होने के संकेत मिलते हैं तो कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी उसका असर दिखाई दे सकता है।

    घरेलू मोर्चे पर अगले सप्ताह कई महत्वपूर्ण आंकड़े जारी होने हैं। इनमें ऑटो बिक्री के आंकड़े, जीएसटी से जुड़े आंकड़े, औद्योगिक और विनिर्माण उत्पादन, पीएमआई, राजकोषीय घाटा तथा विदेशी मुद्रा भंडार शामिल हैं। इन आंकड़ों से अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति और कारोबारी गतिविधियों को लेकर संकेत मिल सकते हैं।

    अगले कारोबारी सप्ताह में गांधी जयंती के कारण बाजार में केवल चार सत्रों में कारोबार होगा। छुट्टी के चलते सप्ताह सामान्य कारोबारी सप्ताह की तुलना में छोटा रहेगा। ऐसे में उपलब्ध कारोबारी सत्रों के दौरान वैश्विक घटनाक्रम और घरेलू आंकड़ों पर निवेशकों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।

    पिछले कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार दबाव में रहा। सेंसेक्स 399.22 अंक यानी 0.54 प्रतिशत की गिरावट के साथ 73,895.74 अंक पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 205.90 अंक यानी 0.88 प्रतिशत कमजोर होकर 23,140.50 अंक पर रहा।

    21 से 25 सितंबर के दौरान बड़े शेयरों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,285.25 अंक यानी 2.07 प्रतिशत गिरकर 60,906 अंक पर बंद हुआ। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 160.45 अंक यानी 0.81 प्रतिशत की कमजोरी रही और यह 19,715.25 अंक पर बंद हुआ।

    क्षेत्रीय प्रदर्शन की बात करें तो पिछले सप्ताह कुछ सेक्टरों में बढ़त रही। निफ्टी रियल्टी में 2.98 प्रतिशत, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में 1.14 प्रतिशत, फार्मा में 1.10 प्रतिशत, एफएमसीजी में 1.04 प्रतिशत, इंडिया डिफेंस में 0.53 प्रतिशत और हेल्थकेयर में 0.39 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई।

    दूसरी ओर आईटी क्षेत्र में 2.40 प्रतिशत की गिरावट रही। निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज 1.63 प्रतिशत, सर्विसेज 1.53 प्रतिशत, प्राइवेट बैंक 1.49 प्रतिशत, इंफ्रा 1.26 प्रतिशत और एनर्जी 0.88 प्रतिशत कमजोर रहे।

    अब अगले सप्ताह बाजार की नजर वैश्विक तनाव, कच्चे तेल और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। इन घटनाक्रमों के साथ चार कारोबारी सत्रों में होने वाली गतिविधियां शेयर बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी।

  • कच्चे तेल और बॉन्ड यील्ड बढ़ने से शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स 1,247 अंक टूटा

    कच्चे तेल और बॉन्ड यील्ड बढ़ने से शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स 1,247 अंक टूटा

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार, 24 सितंबर को भारी बिकवाली देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतों में मजबूती, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति बढ़ने के कारण प्रमुख सूचकांक बड़ी गिरावट के साथ बंद हुए। सेंसेक्स 1,247.71 अंक यानी 1.67 प्रतिशत टूटकर 73,580.54 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 50 में 383.70 अंक यानी 1.64 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 23,063.10 के स्तर पर बंद हुआ।

    कारोबार की शुरुआत भी कमजोर रही। सेंसेक्स पिछले सत्र के 74,828.25 के बंद स्तर से 555.85 अंक यानी 0.74 प्रतिशत नीचे 74,272.40 पर खुला। दिन के कारोबार में गिरावट और बढ़ी तथा सूचकांक 1,264.33 अंक यानी 1.68 प्रतिशत फिसलकर 73,563.92 के निचले स्तर तक पहुंच गया।

    निफ्टी 50 भी पिछले बंद स्तर 23,446.80 से 225 अंक यानी 0.95 प्रतिशत नीचे 23,221.80 पर खुला। कारोबार के दौरान यह 400.65 अंक यानी 1.70 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,046.15 के निचले स्तर तक चला गया।

    व्यापक बाजार में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप में 2.25 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप में 1.53 प्रतिशत की गिरावट रही। सेक्टरवार कारोबार में सभी प्रमुख सेक्टर लाल निशान में बंद हुए। निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज और निफ्टी प्राइवेट बैंक में 2 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।

    इसके अलावा निफ्टी मेटल 1.96 प्रतिशत, निफ्टी ऑटो 1.57 प्रतिशत, निफ्टी पीएसयू बैंक 1.13 प्रतिशत, निफ्टी रियल्टी 1.10 प्रतिशत और निफ्टी एफएमसीजी 1.08 प्रतिशत गिरकर बंद हुए। निफ्टी 50 में केवल सिप्ला, ओएनजीसी और एनटीपीसी के शेयरों में तेजी रही, जबकि बाकी अधिकतर शेयरों पर बिकवाली का दबाव रहा। एचडीएफसी लाइफ, बजाज फाइनेंस, एक्सिस बैंक और बजाज फिनसर्व में अपेक्षाकृत अधिक गिरावट दर्ज हुई।

    बाजार में व्यापक बिकवाली का असर निवेशकों की संपत्ति पर भी पड़ा। एक ही कारोबारी सत्र में करीब 5 लाख करोड़ रुपये की बाजार पूंजी घट गई। बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण पिछले सत्र के लगभग 485 लाख करोड़ रुपये से घटकर 480.95 लाख करोड़ रुपये रह गया।

    गुरुवार के कारोबार में कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी आई, लेकिन वे 102 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर बनी रहीं। इसके साथ वैश्विक बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी हुई। इससे इक्विटी निवेशकों के बीच जोखिम को लेकर चिंता बढ़ी और जोखिम वाली परिसंपत्तियों का आकर्षण प्रभावित हुआ।

    इसी दिन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के शेयरों की लिस्टिंग भी हुई। शेयर 1.79 प्रतिशत की बढ़त के साथ 1,817 रुपये पर बंद हुए, जो इसके 1,785 रुपये के आईपीओ प्राइस बैंड से ऊपर था।

    बाजार में कमजोरी के बीच महंगाई और आर्थिक विकास को लेकर बनी अनिश्चितताओं ने ब्याज दरों की दिशा पर भी चिंता बढ़ाई। घरेलू स्तर पर इंश्योरेंस और बैंकिंग क्षेत्र में कमीशन स्ट्रक्चर की नियामकीय समीक्षा तथा मुनाफे पर संभावित असर को लेकर भी दबाव बना रहा।

    आने वाले समय में बाजार की दिशा पर निवेशकों की नजर वैश्विक परिस्थितियों, कच्चे तेल की कीमतों और कंपनियों की कमाई पर बनी रह सकती है।

  • Crude Oil Price Rise: कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5 प्रतिशत पार होने का अनुमान, एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ाने को कहा

    Crude Oil Price Rise: कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5 प्रतिशत पार होने का अनुमान, एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ाने को कहा

    नई दिल्ली ।वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में तेजी के बीच भारत में महंगाई को लेकर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है। एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत या उससे भी ऊपर जा सकती है। ऐसे में रिपोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक से मौद्रिक नीति के स्तर पर दरों में बढ़ोतरी करने की सलाह दी है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक को अक्टूबर में रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी करनी चाहिए। इसके बाद दिसंबर में भी 25 आधार अंक की अतिरिक्त वृद्धि का सुझाव दिया गया है। इस तरह कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी की जरूरत बताई गई है। इसके पीछे मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर पड़ने वाला संभावित असर है।

    एसबीआई रिसर्च के अनुमान के मुताबिक अगस्त में महंगाई दर करीब 4.8 से 4.9 प्रतिशत के बीच रह सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहने पर आने वाले महीनों में स्थिति बदल सकती है। रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक रहने की संभावना बन सकती है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल का बेंचमार्क 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। अगले 15 दिनों में इसके 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की उम्मीद भी जताई गई है। कच्चे तेल की कीमतों में इस तरह की तेजी का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में लागत के रूप में दिखाई देने लगा है।

    रिपोर्ट के मुताबिक खुदरा महंगाई बढ़ने के शुरुआती संकेत पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बेवरेज, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं। इन क्षेत्रों में लागत का बढ़ता बोझ अब ग्राहकों तक पहुंचने की स्थिति बन रही है। रिपोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों को ब्याज दरों में कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी के लिए अनुकूल आधार माना है।

    लिक्विडिटी के मोर्चे पर रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल में जुटाए गए फंड काफी हद तक बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग जरूरतों को पूरा करते हैं। इसके साथ ही क्रेडिट की मजबूत मांग और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ के मजबूत आंकड़ों को देखते हुए मौजूदा तेजी में धीरे-धीरे कमी आने की उम्मीद जताई गई है।

    रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि क्रेडिट की मांग अपेक्षा के अनुरूप पूरी होती है तो वित्त वर्ष 2027 के अंत तक सिस्टम में लिक्विडिटी सामान्य स्तर पर लौट सकती है। रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2027 के बाकी समय में लिक्विडिटी धीरे-धीरे कम होने की संभावना है और मार्च 2027 तक इसका स्तर आदर्श रूप से 6 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए।

    बॉन्ड बाजार को लेकर भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण अनुमान दिया गया है। कई संकेतों के आधार पर 10 साल की भारतीय बेंचमार्क यील्ड के 7.15 प्रतिशत या उससे ऊपर जाने की संभावना जताई गई है।

    वैश्विक स्तर पर भी यील्ड में तेजी का रुझान बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक कई प्रमुख यील्ड पिछले दस वर्षों के उच्चतम स्तर से ऊपर जा रहे हैं। अमेरिकी यील्ड में भी तेजी देखने को मिल रही है और 10 साल की यील्ड करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि 30 साल की यील्ड घटकर 5.40 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है।