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  • वाल्मीकि जयंती 2026 कब है? जानें तारीख, धार्मिक महत्व और रामायण के रचयिता से जुड़ी खास बातें

    वाल्मीकि जयंती 2026 कब है? जानें तारीख, धार्मिक महत्व और रामायण के रचयिता से जुड़ी खास बातें

    नई दिल्ली । महर्षि वाल्मीकि जयंती हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक अवसरों में शामिल है। यह दिन रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के जीवन, साहित्यिक योगदान और आध्यात्मिक विचारों को याद करने के लिए मनाया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, उनकी जयंती आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में वाल्मीकि जयंती सोमवार, 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन देश के विभिन्न हिस्सों में पूजा-अर्चना, रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

    महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का आदि कवि कहा जाता है। उन्हें रामायण जैसे महाकाव्य की रचना का श्रेय दिया जाता है। रामायण में भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों, माता सीता के संघर्ष, लक्ष्मण की निष्ठा और हनुमान की भक्ति का वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान रखता है। इसकी कथाओं और पात्रों ने पीढ़ियों से लोगों के जीवन, विचारों और सामाजिक मूल्यों को प्रभावित किया है।

    वाल्मीकि जयंती की तारीख निर्धारित करने में पूर्णिमा तिथि और उदया तिथि का महत्व माना जाता है। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह समाप्त होगी। उदया तिथि की परंपरा के आधार पर कई पंचांगों में 26 अक्टूबर को जयंती मनाने की तारीख बताई गई है। धार्मिक आयोजन करने वाले लोग स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा और कार्यक्रमों का समय निर्धारित कर सकते हैं।

    महर्षि वाल्मीकि का धार्मिक महत्व केवल रामायण की रचना तक सीमित नहीं है। उन्हें ज्ञान, साधना, चिंतन और साहित्यिक प्रतिभा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। उनकी रचना में सत्य, कर्तव्य, धैर्य, करुणा और मर्यादा जैसे मूल्यों को प्रमुखता दी गई है। भगवान श्रीराम का जीवन कठिन परिस्थितियों में भी आदर्शों पर बने रहने की प्रेरणा देता है, जबकि रामायण के अन्य पात्र त्याग, निष्ठा और जिम्मेदारी के अलग-अलग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसी कारण यह महाकाव्य धार्मिक पाठ के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का भी महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

    वाल्मीकि जयंती के अवसर पर अनेक स्थानों पर महर्षि वाल्मीकि के मंदिरों और धार्मिक स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु उनकी प्रतिमा के सामने दीप प्रज्वलित करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। कई जगहों पर शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। रामायण का पाठ, भजन-कीर्तन और सामुदायिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि के योगदान और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।

    महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी प्रचलित कथाएं आत्मचिंतन और सकारात्मक बदलाव के महत्व पर जोर देती हैं। उनसे संबंधित परंपरागत जीवनगाथा यह संदेश देती है कि व्यक्ति अपने विचारों और कर्मों में परिवर्तन लाकर बेहतर मार्ग अपना सकता है। हालांकि, उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं पर आधारित हैं, इसलिए उन्हें उसी संदर्भ में समझा जाता है।

    वाल्मीकि जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि साहित्य, ज्ञान और मानवीय मूल्यों को याद करने का अवसर भी है। इस दिन रामायण का अध्ययन करना, बच्चों को इसकी प्रेरक कथाओं से परिचित कराना और सत्य, करुणा तथा अच्छे आचरण को अपनाने का संकल्प लेना उपयोगी माना जाता है। महर्षि वाल्मीकि की रचनात्मक विरासत आज भी भारतीय संस्कृति और साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

  • शिवपुरी में आशुतोष ओज के कहानी संग्रह ‘प्रेमपाश’ का विमोचन, वक्ताओं ने कहानियों को संस्कार और सामाजिक बदलाव का माध्यम बताया

    शिवपुरी में आशुतोष ओज के कहानी संग्रह ‘प्रेमपाश’ का विमोचन, वक्ताओं ने कहानियों को संस्कार और सामाजिक बदलाव का माध्यम बताया

    मध्य प्रदेश: के शिवपुरी शहर में 22 अक्टूबर 2026 को कहानीकार आशुतोष ओज के कहानी संग्रह ‘प्रेमपाश’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर साहित्य, सामाजिक जीवन और संस्कारों में कहानियों की भूमिका पर विचार रखे गए। कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि कहानी केवल घटनाओं का वर्णन नहीं होती, बल्कि समाज को दिशा देने, जीवन मूल्यों को मजबूत करने और लोगों को अपने आसपास की समस्याओं के प्रति जागरूक बनाने का माध्यम भी है।

    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराड़कर ने कहा कि कहानियों के माध्यम से समाज को दिशा और संस्कार मिलते हैं। हर व्यक्ति के जीवन की अपनी कहानी होती है और उसे शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करने वाला कहानीकार कहलाता है। उन्होंने कहा कि गीता और रामचरितमानस में निहित जीवन मूल्यों को अलग-अलग समय में परिवार के बुजुर्गों ने कहानियों के जरिए बच्चों तक पहुंचाया। दादा-दादी और नाना-नानी द्वारा सुनाई जाने वाली कहानियां बचपन से ही संस्कार देने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।

    श्रीधर पराड़कर ने कहा कि आशुतोष ओज की कहानियां रोजमर्रा के जीवन में घटने वाली घटनाओं और अनुभवों से जुड़ी हैं। उनके अनुसार, भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कहानी एक सशक्त माध्यम है। इसके जरिए सामान्य जीवन की परिस्थितियों और सामाजिक अनुभवों को प्रभावी ढंग से सामने रखा जा सकता है। उन्होंने कहानी लेखन की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह विधा जीवन और समाज को समझने में मदद करती है।

    विद्या भारती के अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री और वरिष्ठ प्रचारक राम अरावकर ने संग्रह के विमोचन को व्यक्तिगत प्रसन्नता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि आशुतोष को बचपन से देखते आए हैं और अब उनका कहानी लेखन के क्षेत्र में प्रवेश करना खुशी की बात है। उन्होंने बताया कि ‘प्रेमपाश’ में राष्ट्रीयता के भावों से जुड़ी कहानियां शामिल हैं। उनके अनुसार, कहानी केवल घटनाओं को दर्ज करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में आदर्श स्थापित करने और लोगों को लोभ-लालच से दूर रहने की प्रेरणा देने का काम भी करती है।

    राम अरावकर ने परिवारों में कहानी सुनाने की पुरानी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले घरों में बुजुर्ग बच्चों को कहानियां सुनाकर जीवन मूल्यों और संस्कारों से परिचित कराते थे। समय के साथ परिवारों के बिखराव, कुटुंब व्यवस्था में बदलाव और तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने इस परंपरा को प्रभावित किया है। ऐसे में साहित्य और कहानी लेखन के माध्यम से संस्कारों तथा सामाजिक मूल्यों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

    कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल के उप महानिरीक्षक राजीव लोचन शुक्ला ने कहा कि सामाजिक समस्याओं के बढ़ने का एक कारण लोगों का चुपचाप तमाशा देखते रहना भी है। उन्होंने कहा कि जिन समस्याओं को समाज अपने आसपास देखता है, उनके बारे में मुखर होकर बोलना और लिखना समय की मांग है। प्रत्येक नागरिक को इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए, ताकि समस्याओं को बढ़ने से रोका जा सके।

    राजीव लोचन शुक्ला ने आशुतोष ओज के लेखन की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अपने आसपास मौजूद समस्याओं को कहानी संग्रह के माध्यम से प्रस्तुत किया है। सरल भाषा में आम लोगों के जीवन से जुड़ी कहानियों को सामने लाना महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने इसके लिए कहानीकार को बधाई दी।

    इस अवसर पर सौम्या उपाध्याय और डॉ. आकांक्षा गौड़ ने कहानी संग्रह की समीक्षा प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन हेमलता चौधरी ने किया। समारोह में विद्यापीठ के पूर्व छात्र और भोपाल के अपर सत्र न्यायाधीश संजय अग्रवाल का अभिनंदन भी किया गया। मंच पर डॉ. कुमार संजीव, पुरुषोत्तम गौतम और प्रमोद भार्गव सहित अन्य अतिथि उपस्थित रहे। समारोह में विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों ने अतिथियों का स्वागत किया। अंत में आशुतोष शर्मा ओज ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

  • मुंबई के मॉल में गरबा देखकर भावुक हुईं रोमानिया की मारिया एलेक्जेंड्रा, बोलीं- भारत छोड़ने पर इन खूबसूरत पलों को बहुत याद करूंगी

    मुंबई के मॉल में गरबा देखकर भावुक हुईं रोमानिया की मारिया एलेक्जेंड्रा, बोलीं- भारत छोड़ने पर इन खूबसूरत पलों को बहुत याद करूंगी

    नई दिल्ली । नवरात्रि के दौरान मुंबई के एक मॉल में गरबा कर रहे लोगों को देखकर रोमानिया की मारिया एलेक्जेंड्रा भावुक हो गईं। पारंपरिक कपड़ों में सजे लोगों, ढोल की थाप पर थिरकते कदमों और मां दुर्गा की भक्ति से भरे माहौल ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इस अनुभव के दौरान उनकी आंखें भर आईं और उन्हें एहसास हुआ कि जब वह भारत से जाएंगी, तो यहां की संस्कृति और त्योहारों से जुड़े ऐसे यादगार पलों को बहुत याद करेंगी। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहा है।

    मारिया नवरात्रि के दौरान मुंबई के एक मॉल में आयोजित गरबा कार्यक्रम देख रही थीं। वहां बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक परिधानों में एक साथ नृत्य कर रहे थे। कोई गोल घेरे में घूमकर गरबा कर रहा था, तो कोई संगीत की लय के साथ अपने कदम मिला रहा था। चारों ओर उत्सव का माहौल था। मारिया ने इस दृश्य का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर साझा किया। वीडियो में वह सफेद कुर्ते और झुमकों में दिखाई दे रही हैं। हालांकि, लोगों का ध्यान उनके पहनावे से ज्यादा उस भावुक प्रतिक्रिया पर गया, जो गरबा देखते समय उनके चेहरे पर नजर आई।

    मारिया ने बताया कि उस समय उन्हें खुद भी पूरी तरह समझ नहीं आ रहा था कि वह इतनी भावुक क्यों हो गईं। भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव, भारत छोड़ने का विचार या फिर बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ खुशी मनाते देखना, इनमें से कोई भी वजह उनकी भावनाओं से जुड़ी हो सकती थी। उनके लिए यह केवल किसी उत्सव को देखने का अनुभव नहीं था, बल्कि भारत के साथ बने उनके भावनात्मक जुड़ाव को महसूस करने का एक खास अवसर था।

    उन्होंने कहा कि इस पल ने उन्हें एहसास कराया कि भारत छोड़ने के बाद वह ऐसे नजारों को बहुत याद करेंगी। त्योहार के दौरान लोगों की खुशी, एक-दूसरे के साथ उनका जुड़ाव और पूरे वातावरण में दिखाई देने वाली उमंग उनके लिए खास बन गई। किसी दूसरे देश में रहकर वहां की संस्कृति को करीब से देखना और उसके भावनात्मक पक्ष को महसूस करना उनके लिए यादगार अनुभव रहा।

    मारिया ने गरबा के धार्मिक महत्व पर भी बात की। उनके अनुसार, गरबा केवल संगीत पर किया जाने वाला नृत्य नहीं है, बल्कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के प्रति आस्था व्यक्त करने का माध्यम भी है। इस आयोजन में लोगों की खुशी और उनकी धार्मिक श्रद्धा एक साथ दिखाई देती है। नृत्य करते हुए लोग अपनी परंपराओं से जुड़े रहते हैं और सामूहिक रूप से त्योहार मनाते हैं। मारिया को यही मेल विशेष रूप से प्रभावित कर गया कि यहां उत्सव और भक्ति को एक साथ अनुभव किया जा सकता है।

    वीडियो के साथ उन्होंने यह भी लिखा कि इस अनुभव ने उन्हें याद दिलाया कि उन्हें भारत से प्यार क्यों हुआ था। उन्होंने नवरात्रि मनाने वाले लोगों से पूछा कि उनके लिए इस त्योहार का क्या अर्थ है। उनकी इस बात से पता चलता है कि वह केवल उत्सव का दृश्य देखने तक सीमित नहीं रहना चाहती थीं, बल्कि उसके पीछे की आस्था और परंपरा को भी समझना चाहती थीं।

    मारिया के वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स ने भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने उनकी भावनाओं की सराहना की और कहा कि किसी संस्कृति को समझने का अर्थ उसके रीति-रिवाजों के साथ-साथ उनसे जुड़ी भावनाओं को जानना भी है। कुछ लोगों ने उनके अनुभव को प्रेरणादायक बताया, जबकि अन्य ने उन्हें भारत के दूसरे त्योहारों को देखने की सलाह दी। इनमें दुर्गा पूजा और दिवाली का अनुभव लेने के सुझाव भी शामिल थे।

    भारत के अलग-अलग हिस्सों में त्योहारों को विविध परंपराओं और तरीकों से मनाया जाता है। मारिया के लिए मुंबई के मॉल में गरबा देखना ऐसा ही एक अनुभव बना, जिसने उन्हें भारतीय संस्कृति से अपने जुड़ाव का एहसास कराया। उनकी भावुक प्रतिक्रिया ने यह दिखाया कि कभी-कभी किसी जगह के लोगों को खुशी मनाते देखना भी ऐसी याद बना सकता है, जिसे वहां से दूर जाने के बाद लंबे समय तक याद किया जाए।

  • रक्षाबंधन ऐड की ट्रोलिंग पर कृति सेनन का जवाब, बोलीं संस्कृति और परंपरा कपड़ों की नेकलाइन से तय नहीं होती

    रक्षाबंधन ऐड की ट्रोलिंग पर कृति सेनन का जवाब, बोलीं संस्कृति और परंपरा कपड़ों की नेकलाइन से तय नहीं होती


    नई दिल्ली । 
    अभिनेत्री कृति सेनन इन दिनों रक्षाबंधन से जुड़े एक विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही बहस के बीच चर्चा में हैं। एक ज्वेलरी ब्रांड के रक्षाबंधन कैंपेन में उनके पहनावे को लेकर कुछ लोगों ने सवाल उठाए। आलोचकों ने विज्ञापन में उनके आधुनिक आउटफिट को पारंपरिक त्योहार के संदर्भ में अनुपयुक्त बताया। अब कृति सेनन ने इस पूरे विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।

    कृति ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने संदेश में कहा कि त्योहारों की वास्तविक भावना किसी व्यक्ति के कपड़ों से नहीं, बल्कि परंपराओं के प्रति उसकी भावनाओं और उनके महत्व से जुड़ी होती है। उन्होंने रक्षाबंधन को सुरक्षा, स्नेह और आपसी जिम्मेदारी का प्रतीक बताते हुए अपने और अपनी बहन के रिश्ते का भी जिक्र किया।

    अभिनेत्री ने बताया कि वह और उनकी बहन एक-दूसरे को राखी बांधती हैं और एक-दूसरे की सेहत, खुशी तथा लंबी उम्र की कामना करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए यह भावना उनके पालतू कुत्तों तक भी जुड़ी हुई है, क्योंकि वे भी परिवार का हिस्सा हैं। इस तरह उन्होंने रक्षाबंधन के रिश्ते को केवल भाई-बहन तक सीमित न मानने की बात रखी।

    कृति ने महिलाओं के पहनावे को लेकर होने वाली टिप्पणियों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को यह बताना बंद होना चाहिए कि उन्हें क्या पहनना चाहिए। उनके मुताबिक समय के साथ पारंपरिक और एथनिक फैशन में काफी बदलाव आया है, लेकिन आज भी किसी महिला के संस्कृति के प्रति सम्मान को उसके कपड़ों के आधार पर आंकने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृति और परंपरा व्यक्ति की भावनाओं और मूल्यों में होती है, केवल कपड़ों की नेकलाइन में नहीं। कृति की इस प्रतिक्रिया को उनके विज्ञापन को लेकर चल रही सोशल मीडिया बहस का सीधा जवाब माना जा रहा है।

    विवाद की शुरुआत उस रक्षाबंधन कैंपेन के सामने आने के बाद हुई, जिसमें कृति ऑफ-व्हाइट ब्रालेट-स्टाइल ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट वाले आधुनिक-परंपरागत लुक में दिखाई दी थीं। विज्ञापन में रक्षाबंधन के उत्सव को पालतू जानवरों के साथ भी जोड़ा गया है। कैंपेन में कृति पहले अपने भाई के साथ त्योहार मनाती हैं और बाद में अपने पालतू कुत्ते को राखी बांधती नजर आती हैं।

    विज्ञापन जारी होने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कृति के पहनावे को लेकर आपत्ति जताई। कुछ टिप्पणियों में उनके ब्लाउज की तुलना ब्रा या बिकिनी से की गई और रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार के लिए इस तरह के परिधान को लेकर सवाल उठाए गए। इसके बाद विज्ञापन के उद्देश्य के साथ-साथ अभिनेत्री के लुक को लेकर भी चर्चा तेज हो गई।

    इस मामले में अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत की प्रतिक्रिया भी सामने आई थी। उन्होंने महिलाओं के पास उपलब्ध अलग-अलग तरह के परिधानों का उल्लेख करते हुए कृति के विज्ञापन में इस्तेमाल किए गए लुक पर सवाल उठाया था। हालांकि कृति सेनन ने कंगना की प्रतिक्रिया का नाम लेकर कोई जवाब नहीं दिया है।

    पूरे विवाद के बीच कृति ने अपनी बात महिलाओं की पसंद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्योहार की भावना पर केंद्रित रखी है। उनका कहना है कि किसी महिला के पहनावे को उसकी संस्कृति के प्रति सम्मान का अंतिम पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। विज्ञापन को लेकर उठी बहस ने रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहारों की आधुनिक प्रस्तुति और बदलते फैशन को लेकर चर्चा को भी सामने ला दिया है।

  • 'वंदे मातरम' पर शर्मिला टैगोर के बयान पर भड़कीं कंगना रनौत, कहा- कला और कविता पर विचार सीमित न रखें

    'वंदे मातरम' पर शर्मिला टैगोर के बयान पर भड़कीं कंगना रनौत, कहा- कला और कविता पर विचार सीमित न रखें


    नई दिल्ली । 
    राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के गायन और उसके छंदों को लेकर शुरू हुई बहस में अब मनोरंजन जगत की दो प्रमुख हस्तियों के अलग-अलग विचार सामने आए हैं। वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर द्वारा ‘वंदे मातरम’ के छंदों को लेकर दिए गए बयान के बाद अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत ने उस पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस विषय को लेकर दोनों कलाकारों की अलग-अलग सोच के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर नई चर्चा छिड़ गई है।

    पूरे विवाद की शुरुआत शर्मिला टैगोर के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों को पर्याप्त और सर्वसमावेशी बताया था। उन्होंने कहा था कि शुरुआती दो छंदों के बाद के हिस्सों में जिन प्रतीकों और अभिव्यक्तियों का प्रयोग किया गया है, वे केवल एक ही ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों या विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए कहना थोड़ा असहज या मुश्किल हो सकता है। उनके अनुसार, देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए प्रथम दो छंदों को गाना अधिक व्यावहारिक है।

    शर्मिला टैगोर की इस टिप्पणी पर असहमति जताते हुए कंगना रनौत ने अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने कहा कि एक कलाकार के रूप में कला और कविता को देखने का नजरिया इतना सीमित नहीं होना चाहिए। किसी भी रचना या कविता में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द और प्रतीक रूपक की तरह होते हैं, जिनका उद्देश्य मनचाही भावना का संचार करना होता है। ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना और देशवासियों को प्रेरित करने वाली भावना है।

    कंगना रनौत ने अपनी बात रखते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह राष्ट्रगीत देश की आंतरिक शक्ति को जगाने का संदेश देता है। उन्होंने संकीर्ण सोच से बाहर निकलने का सुझाव देते हुए कहा कि किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति को हिंदू या मुस्लिम दृष्टिकोण से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यदि कोई विचारधारा या धर्म किसी एक ही स्वरूप या अभिव्यक्ति तक सीमित है, तो यह उसका व्यक्तिगत या सीमित विषय हो सकता है, लेकिन इसे व्यापक राष्ट्रीय भावना पर लागू नहीं किया जा सकता।

    विभिन्न हिस्सों में इस विषय पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक ओर जहां कुछ लोग शर्मिला टैगोर के सुझाव को सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाला विचार मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई लोग कंगना रनौत के इस पक्ष का समर्थन कर रहे हैं कि राष्ट्रीय गीत की मूल आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक संदर्भ के साथ कोई समझौता या उसका सीमित आंकलन नहीं होना चाहिए।

    सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर अक्सर इस प्रकार के अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं। ‘वंदे मातरम’ के छंदों को लेकर शुरू हुआ यह संवाद अब कलात्मक स्वतंत्रता, धार्मिक मान्यताओं और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़ी व्यापक बहस का रूप ले चुका है, जिस पर विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपनी राय दे रहे हैं।

  • ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन से पहले सजा भोपाल, विदेशी मेहमानों के स्वागत में VIP रोड और भोज सेतु संवारने की तैयारी

    ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन से पहले सजा भोपाल, विदेशी मेहमानों के स्वागत में VIP रोड और भोज सेतु संवारने की तैयारी

    मध्य प्रदेश । की राजधानी भोपाल 5 अगस्त से शुरू होने वाले ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन-2026 की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रही है। चार दिनों तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के लिए शहर में व्यापक स्तर पर सौंदर्यीकरण और व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सम्मेलन 8 अगस्त तक चलेगा, जिसमें ब्रिक्स देशों के साथ कई अन्य मित्र देशों के संस्कृति मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, प्रतिनिधिमंडल और कलाकार भाग लेंगे। विदेशी मेहमानों के स्वागत के लिए शहर को विशेष रूप से सजाया जा रहा है, जिससे राजधानी का स्वरूप एक बार फिर बड़े वैश्विक आयोजन जैसा दिखाई दे रहा है।

    सम्मेलन के मद्देनजर एयरपोर्ट से लेकर आयोजन स्थल तक प्रमुख मार्गों को आकर्षक बनाया जा रहा है। एयरपोर्ट रोड, गांधी नगर, वीआईपी रोड, भोज सेतु, पॉलीटेक्निक चौराहा और पंडित कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर तक डिवाइडरों पर रंगरोगन किया जा रहा है। सड़क किनारे सफाई, पौधों की देखरेख और सौंदर्यीकरण के साथ शहर की समग्र छवि को बेहतर बनाने का कार्य तेजी से जारी है।

    भोज सेतु इस तैयारी का प्रमुख आकर्षण बना हुआ है। यहां दोनों ओर मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को दर्शाने वाली आकर्षक पेंटिंग बनाई जा रही हैं। इन कलाकृतियों के माध्यम से प्रदेश की लोक परंपराओं, सांस्कृतिक विविधता और पर्यटन स्थलों की झलक प्रस्तुत की जा रही है, ताकि विदेशी प्रतिनिधियों को मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान से परिचित कराया जा सके।

    इस सम्मेलन का मुख्य विषय भारतीय दर्शन की भावना ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित है, जिसमें वैश्विक समरसता, सांस्कृतिक संवाद और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने पर विशेष जोर रहेगा। आयोजन में ब्राजील, इथियोपिया, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, क्यूबा, थाईलैंड, बेलारूस सहित कई देशों के संस्कृति मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिनिधिमंडल भाग लेंगे। इनके अलावा विभिन्न देशों के दूतावासों से जुड़े अधिकारी और सांस्कृतिक विशेषज्ञ भी सम्मेलन में शामिल होंगे।

    सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों के कलाकार अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी देंगे। मिस्र का राष्ट्रीय लोक नृत्य दल, इंडोनेशिया के गायन और नृत्य कलाकार, रूस के लोक वाद्ययंत्र ऑर्केस्ट्रा, दक्षिण अफ्रीका का संगीत समूह तथा ब्राजील के कलाकार संगीत, मार्शल आर्ट, एक्रोबेटिक्स और लोक संस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियां देंगे। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न देशों की सांस्कृतिक विरासत और कलात्मक परंपराओं का परिचय मिलेगा।

    प्रशासन ने सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सुरक्षा, यातायात, आतिथ्य और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को भी अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। आयोजन स्थल के आसपास विशेष निगरानी, साफ-सफाई और सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि विदेशी मेहमानों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। शहर के प्रमुख मार्गों और सार्वजनिक स्थलों पर भी आवश्यक सुधार कार्य तेज गति से पूरे किए जा रहे हैं।

    ब्रिक्स सांस्कृतिक सम्मेलन-2026 केवल एक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश और भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण अवसर भी माना जा रहा है। राजधानी भोपाल इस आयोजन के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक समृद्धि, आतिथ्य परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं का परिचय दुनिया के सामने रखेगा। सम्मेलन से प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत होने के साथ-साथ सांस्कृतिक सहयोग और पर्यटन को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

  • पद्म पुरस्कार 2026 में कला, सिनेमा और संस्कृति जगत के दिग्गजों को मिलेगा सर्वोच्च सम्मान

    पद्म पुरस्कार 2026 में कला, सिनेमा और संस्कृति जगत के दिग्गजों को मिलेगा सर्वोच्च सम्मान


    नई दिल्ली।
    देश के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्म पुरस्कार समारोह आज राजधानी में पूरे गरिमामय वातावरण के बीच आयोजित होने जा रहा है। यह आयोजन केवल पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम नहीं बल्कि उन महान हस्तियों के योगदान को सम्मान देने का अवसर भी माना जाता है, जिन्होंने अपने कार्यों से देश और समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हर वर्ष की तरह इस बार भी विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित किया जाएगा, जिनके कार्यों ने समाज पर गहरी और सकारात्मक छाप छोड़ी है।

    राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाला यह विशेष समारोह देश के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व का एक अहम हिस्सा माना जाता है। इस अवसर पर कला, साहित्य, संगीत, सिनेमा, खेल, समाज सेवा और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी कई प्रतिष्ठित हस्तियों को सम्मानित किया जाएगा। समारोह को लेकर पूरे देश में उत्साह का माहौल है क्योंकि यह मंच उन लोगों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देता है जिन्होंने वर्षों की मेहनत और समर्पण से अपनी अलग पहचान बनाई है।

    इस वर्ष पुरस्कारों की सूची में कई ऐसे नाम शामिल हैं, जिन्होंने लंबे समय तक अपने क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया है। खासतौर पर मनोरंजन और कला जगत से जुड़े कई दिग्गजों के नामों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। कुछ महान हस्तियों को मरणोपरांत सम्मान दिए जाने की घोषणा ने इस समारोह को और भावुक बना दिया है। यह सम्मान केवल पुरस्कार नहीं बल्कि उनके जीवनभर के योगदान और विरासत को याद करने का एक माध्यम भी माना जा रहा है।

    देश के फिल्म और संगीत जगत से जुड़े कई लोकप्रिय चेहरों को भी इस बार सम्मान सूची में स्थान मिला है। दशकों तक लोगों के दिलों पर राज करने वाले कलाकारों से लेकर अपनी कला के माध्यम से नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाले व्यक्तित्वों तक, इस बार कई बड़े नाम सम्मान प्राप्त करने जा रहे हैं। इन हस्तियों ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर देश को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई है।

    पद्म पुरस्कारों को भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में गिना जाता है और यह सम्मान उन व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपने क्षेत्र में विशेष उपलब्धियां हासिल की हों। इस सम्मान का उद्देश्य केवल उपलब्धियों का जश्न मनाना नहीं बल्कि समाज में प्रेरणा और उत्कृष्टता की भावना को बढ़ावा देना भी है। यही कारण है कि हर वर्ष देशभर के लोग इस समारोह का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

    आज होने वाला यह आयोजन केवल पुरस्कार वितरण तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह देश की उन प्रेरणादायक कहानियों का उत्सव भी बनेगा, जिन्होंने मेहनत, संघर्ष और समर्पण से नई ऊंचाइयों को छुआ है। सम्मानित होने वाली हस्तियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेंगी और उनके कार्य समाज को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।

  • यूसीसी पर अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- वनवासियों की परंपराओं से नहीं होगी छेड़छाड़, धर्मांतरण पर भी दी सख्त चेतावनी

    यूसीसी पर अमित शाह का बड़ा बयान, बोले- वनवासियों की परंपराओं से नहीं होगी छेड़छाड़, धर्मांतरण पर भी दी सख्त चेतावनी

    नई दिल्ली ।यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनजातीय समाज को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा बयान देते हुए वनवासी समाज को आश्वस्त करने की कोशिश की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जो आशंकाएं फैलाई जा रही हैं, उनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है और जनजातीय समुदाय की परंपराओं, अधिकारों तथा सांस्कृतिक पहचान पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ेगा। उनके इस बयान के बाद यूसीसी को लेकर चल रही बहस को नया आयाम मिल गया है।

    एक बड़े जनजातीय सांस्कृतिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि समाज में एक भ्रम फैलाया जा रहा है कि यूसीसी लागू होने के बाद जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति और पारंपरिक जीवनशैली से वंचित हो जाएगा। उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा कि वनवासी समाज के अधिकारों और परंपराओं की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है और किसी भी स्थिति में उनके सांस्कृतिक मूल्यों के साथ हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि जहां-जहां यूसीसी लागू किया गया है, वहां जनजातीय समाज को विशेष प्रावधानों के तहत अलग रखा गया है। उनके अनुसार इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय परंपराएं, सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित बनी रहे। उन्होंने वनवासी समाज से अपील करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी प्रकार की आशंका या भ्रम में आने की आवश्यकता नहीं है।

    इस दौरान गृह मंत्री ने धर्मांतरण के विषय पर भी स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म और परंपरा के अनुसार सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन लालच, दबाव या किसी अन्य माध्यम से धर्म परिवर्तन कराना स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने लोगों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल पहचान की रक्षा करने का संदेश भी दिया।

    अपने संबोधन के दौरान उन्होंने भारतीय परंपराओं और धार्मिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए वनवासी समाज और सनातन संस्कृति के ऐतिहासिक संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता में जनजातीय समाज की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है और सामाजिक एकता की भावना को मजबूत करने में उनका योगदान विशेष रहा है।

    इसके अलावा उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों में विकास और बदलाव को लेकर भी कई बातें रखीं। उन्होंने कहा कि अब दूरस्थ और वन क्षेत्रों में विकास के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और सरकार इन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के जरिए जनजातीय समाज को आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

    यूसीसी और जनजातीय अधिकारों को लेकर दिया गया यह बयान राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है, क्योंकि इससे कानून, संस्कृति और सामाजिक संरचना जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।

  • पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा बदलाव, प्रतीकों की लड़ाई में भाजपा की बढ़त..

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य में इस बार मुकाबला केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लड़ाई सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और जनभावनाओं के गहरे स्तर तक पहुंच गई। चुनावी रुझानों और माहौल से यह साफ संकेत मिला कि मतदाताओं ने केवल विकास या योजनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव और प्रतीकों की ताकत को भी महत्व दिया।

    चुनाव प्रचार के दौरान एक ओर जहां भाजपा ने अपने अभियान में पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक भावनाओं को केंद्र में रखा, वहीं दूसरी ओर टीएमसी ने अपने सामाजिक कल्याण और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े संदेशों को आगे बढ़ाया। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा, बहस का केंद्र मुद्दों से हटकर प्रतीकों और नैरेटिव की दिशा में शिफ्ट होता चला गया।

    भाजपा ने ‘जय मां काली’ जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों को अपने प्रचार का हिस्सा बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि बंगाल की जड़ें उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई से जुड़ी हैं। पार्टी का फोकस इस बात पर रहा कि जनता अपने पारंपरिक मूल्यों के साथ जुड़ाव महसूस करे और उसी आधार पर राजनीतिक निर्णय ले।

    दूसरी ओर टीएमसी ने अपने प्रचार में विकास योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा और क्षेत्रीय अस्मिता को प्रमुखता दी। लेकिन चुनावी माहौल में सांस्कृतिक प्रतीकों की चर्चा इतनी हावी हो गई कि अन्य मुद्दे पीछे छूटते नजर आए। इस बदलाव ने चुनावी समीकरणों को काफी हद तक प्रभावित किया।

    महिला मतदाताओं को साधने के लिए भी दोनों पक्षों ने व्यापक रणनीति अपनाई। विभिन्न योजनाओं, आर्थिक सहायता और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े वादों के जरिए महिलाओं को केंद्र में रखा गया। इससे चुनावी प्रतिस्पर्धा और भी तेज हो गई और हर वर्ग के मतदाताओं पर विशेष ध्यान दिया गया।

    इसके साथ ही राज्य में मतदाता सूची, प्रशासनिक प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था को लेकर भी बहस देखने को मिली। इन सभी कारकों ने मिलकर चुनावी माहौल को बेहद जटिल और बहुस्तरीय बना दिया, जहां हर चरण में नई राजनीतिक रणनीतियां उभरती रहीं।

    जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों ने अपने संगठन को मजबूत करने के लिए व्यापक अभियान चलाया। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जनसंपर्क और स्थानीय मुद्दों पर फोकस ने चुनावी परिणामों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल का यह चुनाव एक साधारण राजनीतिक मुकाबला नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसा चुनाव बन गया जिसमें संस्कृति, परंपरा और विचारधारा की गहरी टक्कर देखने को मिली। रुझानों से यह संकेत मिलता है कि इस बार मतदाताओं ने उन संदेशों को अधिक महत्व दिया जो उनकी सांस्कृतिक पहचान से सीधे जुड़े हुए थे, जिससे पूरे राज्य का राजनीतिक परिदृश्य एक नए मोड़ पर पहुंच गया।

  • सदीभर का सिनेमाई सफर कैसे रामायण ने हर दौर में जीता दर्शकों का दिल

    सदीभर का सिनेमाई सफर कैसे रामायण ने हर दौर में जीता दर्शकों का दिल


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में रामायण केवल एक कहानी नहीं बल्कि भावनाओं आस्था और सांस्कृतिक पहचान का आधार रही है यही कारण है कि सिनेमा की शुरुआत से लेकर आज के आधुनिक दौर तक यह महाकाव्य लगातार नए रूपों में दर्शकों के सामने आता रहा है और हर बार उतनी ही गहराई से लोगों के दिलों को छूता है

    इस सफर की शुरुआत साल 1917 में हुई जब दादासाहेब फाल्के ने मूक फिल्म लंका दहन बनाई उस दौर में तकनीक सीमित थी लेकिन आस्था असीम थी इस फिल्म में अण्णा सालुंके ने राम और सीता दोनों की भूमिका निभाई जो अपने आप में अनोखा प्रयोग था यह फिल्म भारतीय सिनेमा की शुरुआती सफलताओं में शामिल हुई और इसने पौराणिक कथाओं को परदे पर लाने की परंपरा शुरू की

    इसके बाद दशकों तक इस महागाथा पर फिल्में बनती रहीं राम राज्य जैसी फिल्में अपने समय की बड़ी हिट साबित हुईं जबकि संपूर्ण रामायण ने पूरी कथा को विस्तार से दिखाने की कोशिश की आगे चलकर रामायण द लीजेंड ऑफ प्रिंस रामा जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की एनीमेशन फिल्म ने इस कहानी को वैश्विक पहचान दिलाई वहीं हनुमान बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हुई

    अगर कुल आंकड़ों की बात करें तो मुख्य कथा पर लगभग पचास फिल्में बन चुकी हैं जबकि अलग अलग पात्रों और घटनाओं को जोड़कर यह संख्या साठ से ज्यादा हो जाती है एनीमेशन और लघु फिल्मों को मिलाकर यह आंकड़ा करीब दो सौ तक पहुंचता है जो इस बात का प्रमाण है कि हर दौर इस कथा को अपने तरीके से जीना चाहता है

    टीवी की दुनिया में रामानंद सागर की रामायण ने इतिहास रच दिया अरुण गोविल दीपिका चिखलिया और सुनील लहरी द्वारा निभाए गए किरदार इतने लोकप्रिय हुए कि दर्शकों ने उन्हें पूजनीय मान लिया 1987 से 1988 के बीच प्रसारित इस शो के दौरान सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था और 2020 में दोबारा प्रसारण के समय भी इसने रिकॉर्ड तोड़ दिए

    इसके बाद भी कई टीवी शोज आए जैसे सीता के राम और श्रीमद रामायण कुल मिलाकर हिंदी में कई बड़े और छोटे संस्करण बनाए जा चुके हैं जो इस कथा की निरंतर लोकप्रियता को दर्शाते हैं

    अब एक बार फिर यह महाकाव्य बड़े स्तर पर लौट रहा है निर्देशक नितेश तिवारी की नई फिल्म रामायण में रणबीर कपूर साई पल्लवी यश सनी देओल जैसे बड़े कलाकार नजर आएंगे इसे वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की तैयारी है और इसका पहला भाग दिवाली 2026 में रिलीज होगा

    असल में रामायण की शक्ति इसकी कालातीतता में है इसमें त्याग कर्तव्य प्रेम और धर्म जैसे जीवन के मूल मूल्य समाहित हैं यही वजह है कि तकनीक बदलती है माध्यम बदलते हैं लेकिन यह कथा हर पीढ़ी के लिए नई बनी रहती है और आगे भी यूं ही प्रेरणा देती रहेगी