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  • दिल्ली हाईकोर्ट ने WFI से मांगा जवाब, विनेश फोगाट केस में बढ़ी हलचल

    दिल्ली हाईकोर्ट ने WFI से मांगा जवाब, विनेश फोगाट केस में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। भारतीय महिला कुश्ती की स्टार पहलवान Vinesh Phogat को अयोग्य घोषित किए जाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए Wrestling Federation of India को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि भारत जैसे देश में मातृत्व का सम्मान सर्वोपरि माना जाता है और ऐसे समय में किसी खिलाड़ी के साथ संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब विनेश फोगाट ने मातृत्व अवकाश के बाद वापसी करते हुए एशियन गेम्स ट्रायल में शामिल होने की अनुमति मांगी थी, लेकिन डब्ल्यूएफआई ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि विनेश फोगाट के मामले की निष्पक्ष समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए। साथ ही अदालत ने कहा कि आगामी एशियन गेम्स चयन ट्रायल में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए ताकि उन्हें खुद को साबित करने का निष्पक्ष अवसर मिल सके। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि डब्ल्यूएफआई द्वारा पुराने चयन मानदंडों के आधार पर फैसला लेना कई सवाल खड़े करता है।

    दरअसल, डब्ल्यूएफआई ने विनेश फोगाट को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए उन पर अनुशासनहीनता और डोपिंग रोधी नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए थे। इसके साथ ही फेडरेशन ने उन्हें 26 जून 2026 तक किसी भी घरेलू प्रतियोगिता में भाग लेने से रोक दिया था। यही कारण रहा कि वह नेशनल ओपन रैंकिंग टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकीं। विनेश ने ट्रायल में खेलने की अनुमति के लिए कई बार फेडरेशन से संपर्क किया, लेकिन उनकी अपील को नजरअंदाज कर दिया गया।

    डब्ल्यूएफआई ने अपने फैसले के पीछे वाडा के नियम 5.6.1 का हवाला दिया था। फेडरेशन का कहना था कि संन्यास या लंबे ब्रेक के बाद वापसी करने वाले खिलाड़ियों को किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले छह महीने का नोटिस पीरियड पूरा करना जरूरी होता है। हालांकि, विनेश की ओर से यह दलील दी गई कि वह मातृत्व अवकाश के बाद वापसी कर रही हैं और इस स्थिति को सामान्य नियमों से अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

    जब फेडरेशन ने उनकी मांग नहीं मानी, तब विनेश फोगाट ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि उन्हें 30 और 31 मई को होने वाले एशियन गेम्स ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाए। शुरुआती सुनवाई में अदालत ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए कहा था कि बिना डब्ल्यूएफआई का पक्ष सुने कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता। लेकिन बाद की सुनवाई में कोर्ट ने फेडरेशन के रवैये पर सवाल उठाए और स्पष्ट किया कि खिलाड़ियों के अधिकारों और सम्मान की अनदेखी नहीं की जा सकती।

    इस मामले ने भारतीय खेल जगत में खिलाड़ी अधिकार, मातृत्व और खेल संस्थाओं की संवेदनशीलता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और आगे की सुनवाई में क्या फैसला सामने आता है।

  • अदालत सख्त रुख में: गोपाल राय को नोटिस, सोशल मीडिया सामग्री पर न्यायिक कार्यवाही तेज

    अदालत सख्त रुख में: गोपाल राय को नोटिस, सोशल मीडिया सामग्री पर न्यायिक कार्यवाही तेज


    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल राय और एक खोजी पत्रकार को अवमानना नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई एक आपराधिक अवमानना याचिका के आधार पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया पर न्यायपालिका से संबंधित आपत्तिजनक और अवमाननापूर्ण सामग्री प्रसारित की गई, जो न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ थी।

    मामला कथित आबकारी नीति से जुड़े भ्रष्टाचार केस से संबंधित बताया जा रहा है, जिसने राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस को जन्म दिया है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक टिप्पणियों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और न्यायालय की गरिमा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया।

    यह याचिका अशोक चैतन्य की ओर से दायर की गई थी, जिसमें आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ भी अवमानना कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इन दोनों नेताओं को पहले ही एक स्वतः संज्ञान मामले में नोटिस जारी किया जा चुका है, जो पहले से ही न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

    न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि सभी संबंधित मामलों को एक साथ सुना जाएगा। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 4 अगस्त की तारीख तय की है और नए पक्षकारों को अपना जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही, सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई संबंधित सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश भी जारी किए गए हैं ताकि जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा न आए।

    अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहुरा को अमीकस क्यूरी नियुक्त किया है, जिन्हें मामले में सहायता प्रदान करने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। यह नियुक्ति अदालत को मामले की निष्पक्ष और विस्तृत समीक्षा में सहायता करने के उद्देश्य से की गई है।

    याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि जब आबकारी नीति केस में कुछ आरोपियों को ट्रायल कोर्ट से राहत मिली थी, तब केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। यह मामला न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में सूचीबद्ध हुआ, जिसके बाद उन पर कथित रूप से पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप सोशल मीडिया पर लगाए गए।

    अदालत ने पूर्व में दिए गए अपने आदेशों में यह भी टिप्पणी की थी कि न्यायपालिका के खिलाफ समन्वित अभियान चलाना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जा सकता है, हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रचनात्मक और सीमित आलोचना की अनुमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में बनी रहती है।

    बाद में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया, जिसके बाद केस को दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है।

  • संजय कपूर की प्रॉपर्टी विवाद में नया मोड़, कोर्ट पहुंचीं प्रिया कपूर लगाई ये अर्जी…

    संजय कपूर की प्रॉपर्टी विवाद में नया मोड़, कोर्ट पहुंचीं प्रिया कपूर लगाई ये अर्जी…


    नई दिल्ली(New Delhi)।
    दिवंगत बिजनेसमैन संजय कपूर की संपत्ति को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में अब नया मोड़ तब आया जब उनकी पत्नी प्रिया कपूर ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    प्रिया कपूर ने कोर्ट से पहले दिए गए अंतरिम आदेश में स्पष्टता (clarification) की मांग की है। साथ ही उन्होंने अनुरोध किया है कि उन्हें कुछ बैंक खातों से पैसे निकालने की अनुमति दी जाए, ताकि बच्चों समायरा कपूर और कियान कपूर की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्च पूरे किए जा सकें। इसके अलावा उन्होंने कुछ विदेशी जॉइंट बैंक खातों को ऑपरेट करने की भी अनुमति मांगी है।

    यह मामला तब शुरू हुआ था जब करिश्मा कपूर और संजय कपूर के बच्चों समायरा और कियान ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने पिता की संपत्ति को सुरक्षित रखने की मांग की थी। बच्चों की ओर से यह दावा किया गया कि संजय कपूर की कथित वसीयत संदिग्ध है और उसकी गहन जांच होनी चाहिए।

    इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने संपत्तियों को लेकर अंतरिम आदेश जारी करते हुए सभी संपत्तियों पर रोक लगा दी थी, ताकि मामले के अंतिम फैसले तक संपत्ति सुरक्षित रहे। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि बच्चों की शिक्षा और जरूरी खर्चों के लिए धन का उपयोग किया जा सकता है।

    अब प्रिया कपूर की नई अर्जी के बाद इस हाई-प्रोफाइल प्रॉपर्टी विवाद में एक और कानूनी मोड़ जुड़ गया है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

  • दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा संदेश, जेपी नड्डा केस में आरोपी को राहत नहीं, प्रदर्शन बनाम हिंसा पर साफ टिप्पणी

    दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा संदेश, जेपी नड्डा केस में आरोपी को राहत नहीं, प्रदर्शन बनाम हिंसा पर साफ टिप्पणी


    नई दिल्ली ।
    राजनीतिक विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक अहम टिप्पणी में Delhi High Court ने स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार हिंसा या कानून-व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की सीमा तक नहीं जा सकता। यह मामला Jagat Prakash Nadda के आवास के बाहर हुए पुतला दहन से जुड़ा है, जिसमें आरोपी की ओर से राहत की मांग की गई थी।

    मामले के अनुसार, कुछ लोगों ने दिल्ली में जेपी नड्डा के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था, जिसके दौरान पुतला जलाने की घटना सामने आई। पुलिस का कहना है कि इस दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया और सुरक्षा व्यवस्था पर असर पड़ा। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। बाद में आरोपी ने अदालत का रुख करते हुए अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को कम करने या हटाने की मांग की।

    सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार केवल शांतिपूर्ण और नियमों के भीतर ही सीमित है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान आगजनी, हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति और सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है, तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं रखा जा सकता।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि असहमति व्यक्त करने के लिए कई कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके मौजूद हैं, जिनका उपयोग किया जाना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर हंगामा करना या ऐसी गतिविधियां करना जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो, लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत माना जाएगा। कोर्ट ने अपने रुख में यह संदेश दिया कि विरोध और हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर समझना आवश्यक है।

    इस टिप्पणी के बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर जहां कुछ लोग इसे न्यायालय का संतुलित दृष्टिकोण बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह बहस भी शुरू हो गई है कि विरोध की सीमाएं कहां तक होनी चाहिए और क्या उन्हें और स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अदालतें अक्सर यह संदेश देती हैं कि लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यह किसी भी तरह की हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने का अधिकार नहीं देती।

    फिलहाल, दिल्ली हाई कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, और दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना ही संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना है।

  • नई दिल्ली में एलपीजी व्यवस्था को लेकर न्यायिक टिप्पणी, नीति निर्धारण को कार्यपालिका का विषय बताया गया

    नई दिल्ली में एलपीजी व्यवस्था को लेकर न्यायिक टिप्पणी, नीति निर्धारण को कार्यपालिका का विषय बताया गया


    नई दिल्ली :में एलपीजी सिलेंडर की कमी और कथित कालाबाजारी से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों का समाधान न्यायपालिका के बजाय कार्यपालिका के स्तर पर किया जाना चाहिए। इस फैसले के बाद एलपीजी आपूर्ति और उससे जुड़े मुद्दों को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।
    याचिका में यह दावा किया गया था कि राजधानी में एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में कमी के कारण आम लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और कई स्थानों पर कालाबाजारी के चलते उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। याचिकाकर्ता ने सरकार पर पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी।
    सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि एलपीजी जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, वितरण और मूल्य निर्धारण से जुड़े निर्णय सरकार और प्रशासनिक तंत्र के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि नीति निर्धारण और संसाधन प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर न्यायिक आदेश देना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह कार्यपालिका की जिम्मेदारी है।
    न्यायालय ने यह टिप्पणी भी की कि सामाजिक और आर्थिक समस्याओं जैसे गरीबी, शिक्षा और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता से जुड़े विषयों का समाधान सरकार की नीतियों और योजनाओं के माध्यम से किया जाता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह ऐसे मामलों में प्रशासनिक निर्णयों की जगह नहीं ले सकती, चाहे परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों।
    एलपीजी आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर हाल के समय में कुछ क्षेत्रों में अस्थायी बाधाएं और वितरण संबंधी शिकायतें सामने आई थीं, जिससे उपभोक्ताओं में असंतोष देखा गया। कुछ स्थानों पर कीमतों में अनियमितता और जमाखोरी की शिकायतें भी दर्ज की गई थीं, जिसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की गई थी। संबंधित एजेंसियों ने ऐसे मामलों में जांच और छापेमारी की प्रक्रिया भी अपनाई थी।
    अदालत के इस निर्णय के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि एलपीजी आपूर्ति और वितरण से जुड़े सभी मुद्दों का समाधान सरकार और संबंधित विभागों द्वारा ही किया जाएगा। न्यायालय ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में नीति सुधार और प्रशासनिक दक्षता ही मुख्य समाधान का आधार हैं।
    यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति जैसे विषयों में संतुलन बनाए रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। इससे यह संदेश भी जाता है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से अलग हैं और दोनों अपने अपने दायरे में कार्य करते हैं।
  • अदालत की रिकॉर्डिंग साझा करने के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई की मांग, कई नाम शामिल..

    अदालत की रिकॉर्डिंग साझा करने के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई की मांग, कई नाम शामिल..

    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर होने के बाद न्यायिक प्रक्रिया की गोपनीयता और डिजिटल युग में उसकी सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालत की एक सुनवाई के दौरान हुई कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया पर साझा किया गया, जिससे न्यायिक मर्यादा प्रभावित हुई है। मामले में कई राजनीतिक नेताओं और एक पत्रकार सहित कुछ अन्य व्यक्तियों के नाम भी शामिल किए गए हैं, जिन पर इस सामग्री के प्रसार में भूमिका निभाने का आरोप है।

    याचिका के अनुसार यह घटना उस सुनवाई से जुड़ी है, जिसमें एक महत्वपूर्ण मामले में न्यायाधीश से स्वयं को अलग करने की मांग की गई थी। आरोप है कि उस दौरान अदालत में हुई बहस और टिप्पणियों को रिकॉर्ड कर सार्वजनिक मंचों पर प्रसारित किया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कार्य न केवल अदालत की गोपनीयता का उल्लंघन है, बल्कि इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

    मामले में यह भी दावा किया गया है कि संबंधित सामग्री को कुछ लोगों द्वारा साझा किया गया और बाद में यह व्यापक रूप से विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैल गई। याचिका में इसे एक संगठित प्रयास बताया गया है, जिसका उद्देश्य अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करना या उसकी छवि को नुकसान पहुंचाना हो सकता है। इस आधार पर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है।

    याचिका में यह अनुरोध भी किया गया है कि संबंधित वीडियो और ऑडियो सामग्री को सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने के निर्देश दिए जाएं। साथ ही, जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि इस तरह की घटनाओं पर रोक नहीं लगाई गई तो भविष्य में न्यायिक प्रक्रिया की गोपनीयता को गंभीर खतरा हो सकता है।

    कानूनी दृष्टि से ऐसे मामलों में अदालत यह देखती है कि क्या वास्तव में किसी ने जानबूझकर न्यायिक कार्यवाही की गोपनीयता भंग की है और क्या इससे न्यायालय की गरिमा या निष्पक्षता पर प्रभाव पड़ा है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो अदालत अवमानना के तहत कार्रवाई कर सकती है, जिसमें दंडात्मक प्रावधान भी शामिल होते हैं।

    इस मामले को लेकर कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग के साथ न्यायिक कार्यवाही की सुरक्षा एक नई चुनौती बन गई है। अदालतों में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाए रखना अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

    फिलहाल यह याचिका न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है और आने वाली सुनवाई में इस पर प्रारंभिक विचार होने की संभावना है। इस दौरान अदालत यह तय कर सकती है कि मामले में आगे क्या कार्रवाई की जाए और किन बिंदुओं पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है।

  • सुपरहिट दौड़ के बीच कानूनी संकट में धुरंधर 2 पुराने गाने के विवाद ने बढ़ाई टेंशन

    सुपरहिट दौड़ के बीच कानूनी संकट में धुरंधर 2 पुराने गाने के विवाद ने बढ़ाई टेंशन


    नई दिल्ली । बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल कर रही फिल्म धुरंधर 2 अब कानूनी विवादों में फंस गई है और इस मामले ने फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म के निर्माताओं को सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि वे अपनी पूरी कमाई का विस्तृत रिकॉर्ड सुरक्षित रखें क्योंकि यह मामला आर्थिक दावों से जुड़ा हुआ है और भविष्य में यही आंकड़े फैसले की दिशा तय कर सकते हैं।

    यह विवाद 1989 की चर्चित फिल्म त्रिदेव से जुड़ा है जिसके निर्माता त्रिमूर्ति फिल्म्स ने आरोप लगाया है कि धुरंधर 2 के गाने रंग दे लाल ओए ओए में उनके सुपरहिट गीत तिरछी टोपी वाले का बिना अनुमति उपयोग किया गया है। इस कथित कॉपीराइट उल्लंघन को लेकर उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसके बाद गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई हुई।

    दिल्ली हाई कोर्ट ने फिलहाल इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों को आपसी समझौते का मौका दिया है और केस को मेडिएशन के लिए भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालने को तैयार हैं इसलिए पहले सुलह की कोशिश की जानी चाहिए। हालांकि इसके साथ ही कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि फिल्म के रिलीज होने की तारीख 19 मार्च से अब तक की पूरी कमाई का हिसाब किताब सुरक्षित रखा जाए ताकि जरूरत पड़ने पर उसे पेश किया जा सके।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आपसी सहमति से मामला हल नहीं होता है तो यही वित्तीय रिकॉर्ड आगे चलकर मुआवजे या किसी अन्य कानूनी निर्णय में अहम भूमिका निभाएगा। इस तरह फिल्म की कमाई अब सीधे तौर पर इस विवाद से जुड़ गई है और मेकर्स के लिए यह मामला केवल रचनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती भी बन गया है।

    फिलहाल राहत की बात यह है कि कोर्ट ने फिल्म या उसके विवादित गाने पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई है। मेकर्स ने कोर्ट को बताया कि फिल्म को अभी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने की कोई योजना नहीं है और इसी आधार पर कोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन को जारी रखने की अनुमति दी है। हालांकि आगे चलकर यदि समझौता नहीं होता है तो मेकर्स को मुआवजा देना पड़ सकता है या अन्य कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

    अब इस मामले की अगली महत्वपूर्ण तारीख 22 अप्रैल तय की गई है जब दोनों पक्ष मेडिएशन सेंटर में पेश होंगे और समझौते की दिशा में बातचीत करेंगे। इसके बाद कोर्ट में अगली सुनवाई 6 मई को होगी जहां इस पूरे विवाद की प्रगति पर नजर डाली जाएगी।

    इस बीच फिल्म का बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन लगातार मजबूत बना हुआ है। रिलीज के 23 दिनों में फिल्म ने भारत में ग्रॉस 1255.23 करोड़ रुपये और नेट 1048.42 करोड़ रुपये की कमाई की है जबकि विदेशों में यह आंकड़ा 410 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इस तरह फिल्म का कुल वर्ल्डवाइड कलेक्शन 1665.23 करोड़ रुपये हो गया है जो इसे साल की सबसे बड़ी फिल्मों में शामिल करता है।

    स्पाई थ्रिलर शैली की इस फिल्म में रणवीर सिंह संजय दत्त आर माधवन अर्जुन रामपाल और सारा अर्जुन जैसे कलाकार नजर आ रहे हैं और दर्शकों के बीच इसकी लोकप्रियता बनी हुई है।अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मामला बातचीत से सुलझ जाता है या फिर यह विवाद आगे बढ़कर फिल्म की कमाई और भविष्य दोनों को प्रभावित करता है।

  • दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: प्राइवेट स्कूल 2026-27 में वसूलेंगे पिछले साल वाली फीस

    दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: प्राइवेट स्कूल 2026-27 में वसूलेंगे पिछले साल वाली फीस


    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों में स्कूल स्तरीय फीस विनियमन समिति गठन के दिल्ली सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए प्राइवेट स्कूल वही फीस वसूलेंगे जो उन्होंने पिछले वर्ष 2025-26 में वसूली थी। हाईकोर्ट के इस आदेश से फिलहाल स्कूलों को SLFRC गठित करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 12 मार्च को निर्धारित की है।

    28 फरवरी को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि सरकार द्वारा SLFRC गठन संबंधी अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान कमेटी का गठन स्थगित रहेगा। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की अत्यधिक फीस कानून के अनुसार विनियमित की जाएगी।

    यह आदेश कई स्कूल संघों की याचिकाओं पर पारित किया गया जिन्होंने दिल्ली सरकार की 1 फरवरी 2026 की अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग की थी। उस अधिसूचना में स्कूलों को 10 दिन के भीतर SLFRC गठित करने का निर्देश दिया गया था।

    इस मामले पर आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि प्राइवेट स्कूल मालिकों और बीजेपी की दिल्ली सरकार के बीच सांठगांठ हाईकोर्ट में फिर उजागर हुई। उन्होंने बताया कि इससे पहले बीजेपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया था कि प्राइवेट फीस एक्ट 2025-26 के लिए बढ़ाई गई फीस पर लागू नहीं होगा जबकि अब हाईकोर्ट ने इसे 2026-27 के सत्र के लिए भी लागू कर दिया।

    कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 में दिल्ली के प्राइवेट स्कूल वही फीस वसूलेंगे जो उन्होंने पिछले साल वसूली थी और SLFRC गठन पर फिलहाल रोक रहेगी। इससे स्कूलों के लिए शुल्क निर्धारण में अस्थिरता टली है और कानूनी प्रक्रिया के तहत अत्यधिक फीस पर निगरानी बनी रहेगी।

  • अमिताभ बच्चन के मंच से शुरू हुई तकरार? Rajpal Yadav लोन केस में वकील का बड़ा दावा

    अमिताभ बच्चन के मंच से शुरू हुई तकरार? Rajpal Yadav लोन केस में वकील का बड़ा दावा


    नई दिल्ली । कॉमेडियन-अभिनेता राजपाल यादव का लोन और चेक बाउंस मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर आए राजपाल का केस अभी अदालत में लंबित है लेकिन अब उनके वकील भास्कर उपाध्याय ने इस विवाद को लेकर नया पक्ष सामने रखा है। वकील का दावा है कि शिकायतकर्ता माधव गोपाल अग्रवाल की नाराजगी की असली वजह एक पुरानी मंचीय घटना थी जो महानायक अमिताभ बच्चन से जुड़ी बताई जा रही है।

    भास्कर उपाध्याय ने मीडिया को बताया कि सितंबर 2012 में एक फिल्म लॉन्च कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। आरोप है कि माधव अग्रवाल उस कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन के साथ मंच साझा करना चाहते थे लेकिन राजपाल की टीम ने इसकी अनुमति नहीं दी। वकील के अनुसार चूंकि अमिताभ बच्चन ने कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था इसलिए मंच प्रबंधन सीमित रखा गया। इसी बात से शिकायतकर्ता नाराज हो गए और इसके बाद कानूनी कार्रवाई तेज कर दी गई।

    वकील के मुताबिक सितंबर 2012 में मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचा जहां बकाया भुगतान तक फिल्म पर रोक लगाने की मांग की गई। दिसंबर 2012 में 60,60,350 रुपये का पहला चेक जमा हुआ और बैंक से राशि रिलीज हुई। इसके बाद 2013 में दोनों पक्षों के बीच सहमति समझौता हुआ जिसमें पहले के सभी समझौतों को अमान्य माना जाना था।

    भास्कर का कहना है कि 2016 में एक नया समझौता तैयार हुआ जिसके तहत 10.40 करोड़ रुपये बकाया बताए गए। इसमें यह भी तय हुआ कि भुगतान होने पर पुराने एग्रीमेंट दोबारा लागू नहीं किए जाएंगे। वकील के अनुसार 2016 में वसूली याचिका दायर की गई और शिकायतकर्ता को 1.90 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया। शेष राशि के लिए एक अन्य गारंटर अनंत दत्ताराम सामने आए।

    बचाव पक्ष का दावा है कि राजपाल यादव ने 15 करोड़ रुपये की अपनी संपत्ति जमानत के रूप में रखने की पेशकश की और बाकी रकम चुकाने के लिए समय मांगा लेकिन शिकायतकर्ता ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। मामला तब और उलझ गया जब वकील के मुताबिक तीसरे सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट के तहत दिए गए चेक दोबारा सक्रिय कर दिए गए जबकि सहमति समझौते के बाद उन्हें निरस्त माना गया था।

    मार्च 2018 में ट्रायल कोर्ट ने पुराने समझौते के आधार पर राजपाल यादव को दोषी ठहराते हुए 11.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। नवंबर 2018 में एक्जीक्यूशन कोर्ट ने उसी आधार पर तीन महीने की सजा सुनाई। बचाव पक्ष का तर्क है कि एक ही मामले में समानांतर कानूनी प्रक्रियाएं नहीं चलनी चाहिए थीं।

    2019 में राजपाल की टीम ने इस आदेश को रिवीजन कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि वकील के अनुसार उस दौरान नए अधिवक्ता की ओर से अदालत में मध्यस्थता के जरिये भुगतान की बात स्वीकार किए जाने से मामला और पेचीदा हो गया। फिलहाल राजपाल यादव की ओर से अदालत से अनुरोध किया गया है कि उनकी दलीलों को विस्तार से सुना जाए और मामले का निपटारा मेरिट के आधार पर किया जाए। अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।

  • सत्य की जीत हुई है, हाईकोर्ट के आदेश के बाद विपक्ष पर बरसे भाजपा नेता दुष्यंत गौतम

    सत्य की जीत हुई है, हाईकोर्ट के आदेश के बाद विपक्ष पर बरसे भाजपा नेता दुष्यंत गौतम


    नई दिल्ली । अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिलने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम ने कांग्रेसआम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला है। हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद दुष्यंत गौतम ने इसे सत्य की जीत बताते हुए कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर हमेशा से पूरा भरोसा रहा है और अदालत के फैसले ने यह साबित कर दिया है कि झूठ कितनी भी जोर से फैलाया जाएअंततः टिक नहीं पाता।

    दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत करते हुए दुष्यंत गौतम ने कहा कि वे हमेशा संविधान और कानून के दायरे में रहकर काम करते आए हैं। उन्होंने कहा“सत्यमेव जयते। अंत में सच की ही जीत होती है। आज अदालत के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि झूठ और दुष्प्रचार की एक सीमा होती है।उन्होंने अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। दुष्यंत गौतम ने कहा कि एक बेटी की निर्मम हत्या को कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हर छह महीने बाद एक नया नैरेटिव गढ़ा जाता हैकभी उनका नाम जोड़ा जाता हैतो कभी किसी और का। इससे न तो सच्चाई सामने आती है और न ही पीड़ित बेटी को न्याय मिलता है।

    भाजपा नेता ने कहा कि कांग्रेसआम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल मिलकर उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे थे।मेरी मानहानि की गईमेरी छवि को नुकसान पहुंचाया गया और उस बेटी का बार-बार अपमान किया गया। सोशल मीडिया पर जो वीडियो और पोस्ट डाली गईंवे पूरी तरह झूठी थीं और उन्हें तुरंत हटाया जाना चाहिए, उन्होंने कहदुष्यंत गौतम ने स्पष्ट किया कि घटना के समय वे उत्तराखंड गए ही नहीं थे। उन्होंने कहा कि उनकी लोकेशनकार्यक्रम और आधिकारिक रिकॉर्ड यह साफ दिखाते हैं कि उनके खिलाफ फैलाया गया प्रचार पूरी तरह झूठा और द्वेषपूर्ण था। इसके बावजूद उन्होंने लंबे समय तक चुप रहना उचित समझाक्योंकि वे सत्य के साथ खड़े थे।

    उन्होंने यह भी बताया कि लगातार आरोपों और सोशल मीडिया ट्रायल के कारण उन्हें मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी।मैं विचलित भी हुआदुखी भी। मेरी छवि को नुकसान पहुंचा। लेकिन जब झूठ पूरे देश में फैलाया जाने लगा और पानी सिर के ऊपर चला गयातब मुझे मानहानि का मुकदमा दर्ज कराना पड़ा, उन्होंने कहा।इस बीचदिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्यंत कुमार गौतम की मानहानि याचिका पर सुनवाई करते हुए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को निर्देश दिया कि वे 24 घंटे के भीतर सभी सोशल मीडिया पोस्ट हटाएंजिनमें उन्हें अंकिता भंडारी हत्याकांड से जोड़ा गया है। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने अंतरिम आदेश में दोनों दलों को भविष्य में भी ऐसी कोई सामग्री पोस्ट करने से रोक दिया है।