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  • काला हिरण फिल्म पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी सलमान खान के पक्ष में आया बड़ा फैसला मेकर्स को मिली कड़ी फटकार

    काला हिरण फिल्म पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी सलमान खान के पक्ष में आया बड़ा फैसला मेकर्स को मिली कड़ी फटकार


    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने विवादों में घिरी फिल्म काला हिरण द बैटल फॉर लेगेसी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए फिल्म से जुड़े सभी प्रचार सामग्री और सोशल मीडिया लिंक तत्काल हटाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट के इस फैसले को सलमान खान के पक्ष में एक महत्वपूर्ण जीत माना जा रहा है क्योंकि अभिनेता ने फिल्म पर उनके व्यक्तित्व अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी।

    सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म के निर्माता अमित जानी के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे निर्माता स्वयं को कानून से ऊपर समझ रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि पिछली सुनवाई में किसी प्रकार का कठोर आदेश नहीं दिया गया था जिसका गलत संदेश लिया गया और अब उनका व्यवहार लगातार अस्वीकार्य होता जा रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि किसी भी नागरिक के साथ इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    सलमान खान की ओर से पेश वकील ने अदालत में दलील दी कि काले हिरण शिकार मामले से जुड़े चार मामलों में से तीन में अभिनेता को पहले ही बरी किया जा चुका है जबकि चौथे मामले में सजा पर रोक लगी हुई है। ऐसे में इस फिल्म के जरिए पुराने विवाद को दोबारा उछालकर अभिनेता की छवि को नुकसान पहुंचाने और एक पूरे समुदाय को उनके खिलाफ प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। वकील ने इसे सलमान खान के व्यक्तित्व अधिकारों का सीधा उल्लंघन बताया।

    वहीं फिल्म निर्माता की ओर से अदालत में कहा गया कि फिल्म के टीजर में कहीं भी सलमान खान का प्रत्यक्ष रूप से नाम नहीं लिया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रचार सामग्री तैयार करने में किसी प्रकार की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया गया है और फिल्म सार्वजनिक रूप से उपलब्ध घटनाओं पर आधारित है।

    दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया कि फिल्म से जुड़े सभी संबंधित लिंक और प्रचार सामग्री हटाई जाए ताकि किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी का प्रसार रोका जा सके। अदालत का मानना था कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक ऐसे कंटेंट का सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहना उचित नहीं है।

    गौरतलब है कि काला हिरण द बैटल फॉर लेगेसी की घोषणा के बाद से ही यह फिल्म लगातार विवादों में रही है। सलमान खान ने अदालत में कहा था कि फिल्म की कहानी और उसके प्रचार का तरीका लोगों की धारणा को प्रभावित कर सकता है और इससे उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंच सकता है। इसी आधार पर उन्होंने फिल्म के प्रदर्शन और प्रचार पर रोक लगाने की मांग की थी।

    दिल्ली हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश के बाद फिल्म की रिलीज और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यह मामला केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है बल्कि कलाकारों के व्यक्तित्व अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण भी माना जा रहा है। आने वाले दिनों में अदालत की अगली सुनवाई इस विवाद की दिशा तय करेगी।

  • अभिषेक शर्मा के पर्सनैलिटी राइट्स केस पर 9 जुलाई को होगी अगली सुनवाई, दिल्ली हाई कोर्ट ने मांगे अतिरिक्त सबूत

    अभिषेक शर्मा के पर्सनैलिटी राइट्स केस पर 9 जुलाई को होगी अगली सुनवाई, दिल्ली हाई कोर्ट ने मांगे अतिरिक्त सबूत


    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेटर अभिषेक शर्मा की पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा से जुड़ी याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई तय करते हुए याचिकाकर्ता को विवादित ऑनलाइन सामग्री से जुड़े आवश्यक दस्तावेज और स्क्रीनशॉट पेश करने के निर्देश दिए हैं। अदालत का कहना है कि संबंधित सामग्री की जांच किए बिना कोई आदेश पारित करना उचित नहीं होगा।

    मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने कहा कि मानहानि और पर्सनैलिटी राइट्स के बीच बहुत बारीक अंतर होता है। कई मामलों में मानहानि से जुड़े विवादों में व्यक्तित्व अधिकारों का पहलू भी शामिल हो सकता है। इसलिए अदालत को किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों और रिकॉर्ड का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना आवश्यक है।

    सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में आया कि याचिका के साथ उन यूआरएल के स्क्रीनशॉट संलग्न नहीं किए गए थे जिनके माध्यम से कथित आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित होने का दावा किया गया है। इस पर अदालत ने अभिषेक शर्मा की ओर से पेश अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करें जिसमें सभी विवादित पोस्ट और यूआरएल से संबंधित स्क्रीनशॉट शामिल हों तथा वे याचिका में दी गई सूची से मेल खाते हों।

    सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिका में दिए गए आठ यूआरएल में से दो उपलब्ध नहीं थे और उन तक पहुंच संभव नहीं हो सकी। उन्होंने यह भी कहा कि एक यूआरएल पर मौजूद सामग्री पैपराजी द्वारा अपलोड की गई प्रतीत होती है और प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि वह पर्सनैलिटी राइट्स के दायरे में आती है या नहीं। इस पर अभिषेक शर्मा की ओर से दलील दी गई कि संबंधित सामग्री कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के माध्यम से तैयार की गई थी। साथ ही यह भी कहा गया कि एक पोस्ट में उनकी मैनेजर को उनकी गर्लफ्रेंड के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो गलत और भ्रामक है।

    याचिका में अभिषेक शर्मा ने अदालत से अनुरोध किया है कि उनके व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा की जाए और सोशल मीडिया तथा अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कथित रूप से भ्रामक, मानहानिकारक और एआई से तैयार सामग्री को हटाने के निर्देश दिए जाएं। उनका कहना है कि ऐसी सामग्री उनकी प्रतिष्ठा और सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।

    फिलहाल अभिषेक शर्मा भारतीय क्रिकेट टीम के साथ इंग्लैंड दौरे पर हैं और पांच मैचों की टी20 श्रृंखला का हिस्सा हैं। अब इस मामले में सभी की नजर 9 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेगी, जब अदालत अतिरिक्त दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्यवाही करेगी।

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने WFI से मांगा जवाब, विनेश फोगाट केस में बढ़ी हलचल

    दिल्ली हाईकोर्ट ने WFI से मांगा जवाब, विनेश फोगाट केस में बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली। भारतीय महिला कुश्ती की स्टार पहलवान Vinesh Phogat को अयोग्य घोषित किए जाने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए Wrestling Federation of India को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि भारत जैसे देश में मातृत्व का सम्मान सर्वोपरि माना जाता है और ऐसे समय में किसी खिलाड़ी के साथ संवेदनशीलता और न्यायपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब विनेश फोगाट ने मातृत्व अवकाश के बाद वापसी करते हुए एशियन गेम्स ट्रायल में शामिल होने की अनुमति मांगी थी, लेकिन डब्ल्यूएफआई ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि विनेश फोगाट के मामले की निष्पक्ष समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए। साथ ही अदालत ने कहा कि आगामी एशियन गेम्स चयन ट्रायल में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए ताकि उन्हें खुद को साबित करने का निष्पक्ष अवसर मिल सके। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि डब्ल्यूएफआई द्वारा पुराने चयन मानदंडों के आधार पर फैसला लेना कई सवाल खड़े करता है।

    दरअसल, डब्ल्यूएफआई ने विनेश फोगाट को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए उन पर अनुशासनहीनता और डोपिंग रोधी नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए थे। इसके साथ ही फेडरेशन ने उन्हें 26 जून 2026 तक किसी भी घरेलू प्रतियोगिता में भाग लेने से रोक दिया था। यही कारण रहा कि वह नेशनल ओपन रैंकिंग टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकीं। विनेश ने ट्रायल में खेलने की अनुमति के लिए कई बार फेडरेशन से संपर्क किया, लेकिन उनकी अपील को नजरअंदाज कर दिया गया।

    डब्ल्यूएफआई ने अपने फैसले के पीछे वाडा के नियम 5.6.1 का हवाला दिया था। फेडरेशन का कहना था कि संन्यास या लंबे ब्रेक के बाद वापसी करने वाले खिलाड़ियों को किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले छह महीने का नोटिस पीरियड पूरा करना जरूरी होता है। हालांकि, विनेश की ओर से यह दलील दी गई कि वह मातृत्व अवकाश के बाद वापसी कर रही हैं और इस स्थिति को सामान्य नियमों से अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

    जब फेडरेशन ने उनकी मांग नहीं मानी, तब विनेश फोगाट ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि उन्हें 30 और 31 मई को होने वाले एशियन गेम्स ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दी जाए। शुरुआती सुनवाई में अदालत ने तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए कहा था कि बिना डब्ल्यूएफआई का पक्ष सुने कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता। लेकिन बाद की सुनवाई में कोर्ट ने फेडरेशन के रवैये पर सवाल उठाए और स्पष्ट किया कि खिलाड़ियों के अधिकारों और सम्मान की अनदेखी नहीं की जा सकती।

    इस मामले ने भारतीय खेल जगत में खिलाड़ी अधिकार, मातृत्व और खेल संस्थाओं की संवेदनशीलता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और आगे की सुनवाई में क्या फैसला सामने आता है।

  • अदालत सख्त रुख में: गोपाल राय को नोटिस, सोशल मीडिया सामग्री पर न्यायिक कार्यवाही तेज

    अदालत सख्त रुख में: गोपाल राय को नोटिस, सोशल मीडिया सामग्री पर न्यायिक कार्यवाही तेज


    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल राय और एक खोजी पत्रकार को अवमानना नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई एक आपराधिक अवमानना याचिका के आधार पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया पर न्यायपालिका से संबंधित आपत्तिजनक और अवमाननापूर्ण सामग्री प्रसारित की गई, जो न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ थी।

    मामला कथित आबकारी नीति से जुड़े भ्रष्टाचार केस से संबंधित बताया जा रहा है, जिसने राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस को जन्म दिया है। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक टिप्पणियों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने और न्यायालय की गरिमा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया।

    यह याचिका अशोक चैतन्य की ओर से दायर की गई थी, जिसमें आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ भी अवमानना कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इन दोनों नेताओं को पहले ही एक स्वतः संज्ञान मामले में नोटिस जारी किया जा चुका है, जो पहले से ही न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

    न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि सभी संबंधित मामलों को एक साथ सुना जाएगा। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 4 अगस्त की तारीख तय की है और नए पक्षकारों को अपना जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। साथ ही, सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई संबंधित सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश भी जारी किए गए हैं ताकि जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा न आए।

    अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहुरा को अमीकस क्यूरी नियुक्त किया है, जिन्हें मामले में सहायता प्रदान करने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। यह नियुक्ति अदालत को मामले की निष्पक्ष और विस्तृत समीक्षा में सहायता करने के उद्देश्य से की गई है।

    याचिका में आगे आरोप लगाया गया है कि जब आबकारी नीति केस में कुछ आरोपियों को ट्रायल कोर्ट से राहत मिली थी, तब केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। यह मामला न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में सूचीबद्ध हुआ, जिसके बाद उन पर कथित रूप से पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप सोशल मीडिया पर लगाए गए।

    अदालत ने पूर्व में दिए गए अपने आदेशों में यह भी टिप्पणी की थी कि न्यायपालिका के खिलाफ समन्वित अभियान चलाना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जा सकता है, हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रचनात्मक और सीमित आलोचना की अनुमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में बनी रहती है।

    बाद में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया, जिसके बाद केस को दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है।

  • संजय कपूर की प्रॉपर्टी विवाद में नया मोड़, कोर्ट पहुंचीं प्रिया कपूर लगाई ये अर्जी…

    संजय कपूर की प्रॉपर्टी विवाद में नया मोड़, कोर्ट पहुंचीं प्रिया कपूर लगाई ये अर्जी…


    नई दिल्ली(New Delhi)।
    दिवंगत बिजनेसमैन संजय कपूर की संपत्ति को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में अब नया मोड़ तब आया जब उनकी पत्नी प्रिया कपूर ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    प्रिया कपूर ने कोर्ट से पहले दिए गए अंतरिम आदेश में स्पष्टता (clarification) की मांग की है। साथ ही उन्होंने अनुरोध किया है कि उन्हें कुछ बैंक खातों से पैसे निकालने की अनुमति दी जाए, ताकि बच्चों समायरा कपूर और कियान कपूर की पढ़ाई और अन्य जरूरी खर्च पूरे किए जा सकें। इसके अलावा उन्होंने कुछ विदेशी जॉइंट बैंक खातों को ऑपरेट करने की भी अनुमति मांगी है।

    यह मामला तब शुरू हुआ था जब करिश्मा कपूर और संजय कपूर के बच्चों समायरा और कियान ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने पिता की संपत्ति को सुरक्षित रखने की मांग की थी। बच्चों की ओर से यह दावा किया गया कि संजय कपूर की कथित वसीयत संदिग्ध है और उसकी गहन जांच होनी चाहिए।

    इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने संपत्तियों को लेकर अंतरिम आदेश जारी करते हुए सभी संपत्तियों पर रोक लगा दी थी, ताकि मामले के अंतिम फैसले तक संपत्ति सुरक्षित रहे। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि बच्चों की शिक्षा और जरूरी खर्चों के लिए धन का उपयोग किया जा सकता है।

    अब प्रिया कपूर की नई अर्जी के बाद इस हाई-प्रोफाइल प्रॉपर्टी विवाद में एक और कानूनी मोड़ जुड़ गया है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

  • दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा संदेश, जेपी नड्डा केस में आरोपी को राहत नहीं, प्रदर्शन बनाम हिंसा पर साफ टिप्पणी

    दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा संदेश, जेपी नड्डा केस में आरोपी को राहत नहीं, प्रदर्शन बनाम हिंसा पर साफ टिप्पणी


    नई दिल्ली ।
    राजनीतिक विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक अहम टिप्पणी में Delhi High Court ने स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार हिंसा या कानून-व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने की सीमा तक नहीं जा सकता। यह मामला Jagat Prakash Nadda के आवास के बाहर हुए पुतला दहन से जुड़ा है, जिसमें आरोपी की ओर से राहत की मांग की गई थी।

    मामले के अनुसार, कुछ लोगों ने दिल्ली में जेपी नड्डा के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था, जिसके दौरान पुतला जलाने की घटना सामने आई। पुलिस का कहना है कि इस दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया और सुरक्षा व्यवस्था पर असर पड़ा। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। बाद में आरोपी ने अदालत का रुख करते हुए अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को कम करने या हटाने की मांग की।

    सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार केवल शांतिपूर्ण और नियमों के भीतर ही सीमित है। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान आगजनी, हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति और सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है, तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं रखा जा सकता।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि असहमति व्यक्त करने के लिए कई कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके मौजूद हैं, जिनका उपयोग किया जाना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर हंगामा करना या ऐसी गतिविधियां करना जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो, लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत माना जाएगा। कोर्ट ने अपने रुख में यह संदेश दिया कि विरोध और हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर समझना आवश्यक है।

    इस टिप्पणी के बाद यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर जहां कुछ लोग इसे न्यायालय का संतुलित दृष्टिकोण बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह बहस भी शुरू हो गई है कि विरोध की सीमाएं कहां तक होनी चाहिए और क्या उन्हें और स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में अदालतें अक्सर यह संदेश देती हैं कि लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यह किसी भी तरह की हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने का अधिकार नहीं देती।

    फिलहाल, दिल्ली हाई कोर्ट की यह टिप्पणी एक बार फिर इस बात को रेखांकित करती है कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ कर्तव्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, और दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना ही संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना है।

  • नई दिल्ली में एलपीजी व्यवस्था को लेकर न्यायिक टिप्पणी, नीति निर्धारण को कार्यपालिका का विषय बताया गया

    नई दिल्ली में एलपीजी व्यवस्था को लेकर न्यायिक टिप्पणी, नीति निर्धारण को कार्यपालिका का विषय बताया गया


    नई दिल्ली :में एलपीजी सिलेंडर की कमी और कथित कालाबाजारी से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों का समाधान न्यायपालिका के बजाय कार्यपालिका के स्तर पर किया जाना चाहिए। इस फैसले के बाद एलपीजी आपूर्ति और उससे जुड़े मुद्दों को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।
    याचिका में यह दावा किया गया था कि राजधानी में एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में कमी के कारण आम लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और कई स्थानों पर कालाबाजारी के चलते उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। याचिकाकर्ता ने सरकार पर पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी।
    सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि एलपीजी जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, वितरण और मूल्य निर्धारण से जुड़े निर्णय सरकार और प्रशासनिक तंत्र के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि नीति निर्धारण और संसाधन प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर न्यायिक आदेश देना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह कार्यपालिका की जिम्मेदारी है।
    न्यायालय ने यह टिप्पणी भी की कि सामाजिक और आर्थिक समस्याओं जैसे गरीबी, शिक्षा और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता से जुड़े विषयों का समाधान सरकार की नीतियों और योजनाओं के माध्यम से किया जाता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह ऐसे मामलों में प्रशासनिक निर्णयों की जगह नहीं ले सकती, चाहे परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों।
    एलपीजी आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर हाल के समय में कुछ क्षेत्रों में अस्थायी बाधाएं और वितरण संबंधी शिकायतें सामने आई थीं, जिससे उपभोक्ताओं में असंतोष देखा गया। कुछ स्थानों पर कीमतों में अनियमितता और जमाखोरी की शिकायतें भी दर्ज की गई थीं, जिसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की गई थी। संबंधित एजेंसियों ने ऐसे मामलों में जांच और छापेमारी की प्रक्रिया भी अपनाई थी।
    अदालत के इस निर्णय के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि एलपीजी आपूर्ति और वितरण से जुड़े सभी मुद्दों का समाधान सरकार और संबंधित विभागों द्वारा ही किया जाएगा। न्यायालय ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में नीति सुधार और प्रशासनिक दक्षता ही मुख्य समाधान का आधार हैं।
    यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति जैसे विषयों में संतुलन बनाए रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। इससे यह संदेश भी जाता है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से अलग हैं और दोनों अपने अपने दायरे में कार्य करते हैं।
  • अदालत की रिकॉर्डिंग साझा करने के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई की मांग, कई नाम शामिल..

    अदालत की रिकॉर्डिंग साझा करने के आरोपों पर कानूनी कार्रवाई की मांग, कई नाम शामिल..

    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर होने के बाद न्यायिक प्रक्रिया की गोपनीयता और डिजिटल युग में उसकी सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालत की एक सुनवाई के दौरान हुई कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया पर साझा किया गया, जिससे न्यायिक मर्यादा प्रभावित हुई है। मामले में कई राजनीतिक नेताओं और एक पत्रकार सहित कुछ अन्य व्यक्तियों के नाम भी शामिल किए गए हैं, जिन पर इस सामग्री के प्रसार में भूमिका निभाने का आरोप है।

    याचिका के अनुसार यह घटना उस सुनवाई से जुड़ी है, जिसमें एक महत्वपूर्ण मामले में न्यायाधीश से स्वयं को अलग करने की मांग की गई थी। आरोप है कि उस दौरान अदालत में हुई बहस और टिप्पणियों को रिकॉर्ड कर सार्वजनिक मंचों पर प्रसारित किया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह कार्य न केवल अदालत की गोपनीयता का उल्लंघन है, बल्कि इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ सकते हैं।

    मामले में यह भी दावा किया गया है कि संबंधित सामग्री को कुछ लोगों द्वारा साझा किया गया और बाद में यह व्यापक रूप से विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैल गई। याचिका में इसे एक संगठित प्रयास बताया गया है, जिसका उद्देश्य अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करना या उसकी छवि को नुकसान पहुंचाना हो सकता है। इस आधार पर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है।

    याचिका में यह अनुरोध भी किया गया है कि संबंधित वीडियो और ऑडियो सामग्री को सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने के निर्देश दिए जाएं। साथ ही, जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि इस तरह की घटनाओं पर रोक नहीं लगाई गई तो भविष्य में न्यायिक प्रक्रिया की गोपनीयता को गंभीर खतरा हो सकता है।

    कानूनी दृष्टि से ऐसे मामलों में अदालत यह देखती है कि क्या वास्तव में किसी ने जानबूझकर न्यायिक कार्यवाही की गोपनीयता भंग की है और क्या इससे न्यायालय की गरिमा या निष्पक्षता पर प्रभाव पड़ा है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो अदालत अवमानना के तहत कार्रवाई कर सकती है, जिसमें दंडात्मक प्रावधान भी शामिल होते हैं।

    इस मामले को लेकर कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग के साथ न्यायिक कार्यवाही की सुरक्षा एक नई चुनौती बन गई है। अदालतों में पारदर्शिता और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाए रखना अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

    फिलहाल यह याचिका न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है और आने वाली सुनवाई में इस पर प्रारंभिक विचार होने की संभावना है। इस दौरान अदालत यह तय कर सकती है कि मामले में आगे क्या कार्रवाई की जाए और किन बिंदुओं पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है।

  • सुपरहिट दौड़ के बीच कानूनी संकट में धुरंधर 2 पुराने गाने के विवाद ने बढ़ाई टेंशन

    सुपरहिट दौड़ के बीच कानूनी संकट में धुरंधर 2 पुराने गाने के विवाद ने बढ़ाई टेंशन


    नई दिल्ली । बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता हासिल कर रही फिल्म धुरंधर 2 अब कानूनी विवादों में फंस गई है और इस मामले ने फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है। दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म के निर्माताओं को सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि वे अपनी पूरी कमाई का विस्तृत रिकॉर्ड सुरक्षित रखें क्योंकि यह मामला आर्थिक दावों से जुड़ा हुआ है और भविष्य में यही आंकड़े फैसले की दिशा तय कर सकते हैं।

    यह विवाद 1989 की चर्चित फिल्म त्रिदेव से जुड़ा है जिसके निर्माता त्रिमूर्ति फिल्म्स ने आरोप लगाया है कि धुरंधर 2 के गाने रंग दे लाल ओए ओए में उनके सुपरहिट गीत तिरछी टोपी वाले का बिना अनुमति उपयोग किया गया है। इस कथित कॉपीराइट उल्लंघन को लेकर उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसके बाद गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई हुई।

    दिल्ली हाई कोर्ट ने फिलहाल इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों को आपसी समझौते का मौका दिया है और केस को मेडिएशन के लिए भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालने को तैयार हैं इसलिए पहले सुलह की कोशिश की जानी चाहिए। हालांकि इसके साथ ही कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि फिल्म के रिलीज होने की तारीख 19 मार्च से अब तक की पूरी कमाई का हिसाब किताब सुरक्षित रखा जाए ताकि जरूरत पड़ने पर उसे पेश किया जा सके।

    कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आपसी सहमति से मामला हल नहीं होता है तो यही वित्तीय रिकॉर्ड आगे चलकर मुआवजे या किसी अन्य कानूनी निर्णय में अहम भूमिका निभाएगा। इस तरह फिल्म की कमाई अब सीधे तौर पर इस विवाद से जुड़ गई है और मेकर्स के लिए यह मामला केवल रचनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती भी बन गया है।

    फिलहाल राहत की बात यह है कि कोर्ट ने फिल्म या उसके विवादित गाने पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई है। मेकर्स ने कोर्ट को बताया कि फिल्म को अभी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने की कोई योजना नहीं है और इसी आधार पर कोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन को जारी रखने की अनुमति दी है। हालांकि आगे चलकर यदि समझौता नहीं होता है तो मेकर्स को मुआवजा देना पड़ सकता है या अन्य कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।

    अब इस मामले की अगली महत्वपूर्ण तारीख 22 अप्रैल तय की गई है जब दोनों पक्ष मेडिएशन सेंटर में पेश होंगे और समझौते की दिशा में बातचीत करेंगे। इसके बाद कोर्ट में अगली सुनवाई 6 मई को होगी जहां इस पूरे विवाद की प्रगति पर नजर डाली जाएगी।

    इस बीच फिल्म का बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन लगातार मजबूत बना हुआ है। रिलीज के 23 दिनों में फिल्म ने भारत में ग्रॉस 1255.23 करोड़ रुपये और नेट 1048.42 करोड़ रुपये की कमाई की है जबकि विदेशों में यह आंकड़ा 410 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इस तरह फिल्म का कुल वर्ल्डवाइड कलेक्शन 1665.23 करोड़ रुपये हो गया है जो इसे साल की सबसे बड़ी फिल्मों में शामिल करता है।

    स्पाई थ्रिलर शैली की इस फिल्म में रणवीर सिंह संजय दत्त आर माधवन अर्जुन रामपाल और सारा अर्जुन जैसे कलाकार नजर आ रहे हैं और दर्शकों के बीच इसकी लोकप्रियता बनी हुई है।अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मामला बातचीत से सुलझ जाता है या फिर यह विवाद आगे बढ़कर फिल्म की कमाई और भविष्य दोनों को प्रभावित करता है।

  • दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: प्राइवेट स्कूल 2026-27 में वसूलेंगे पिछले साल वाली फीस

    दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: प्राइवेट स्कूल 2026-27 में वसूलेंगे पिछले साल वाली फीस


    नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों में स्कूल स्तरीय फीस विनियमन समिति गठन के दिल्ली सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए प्राइवेट स्कूल वही फीस वसूलेंगे जो उन्होंने पिछले वर्ष 2025-26 में वसूली थी। हाईकोर्ट के इस आदेश से फिलहाल स्कूलों को SLFRC गठित करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 12 मार्च को निर्धारित की है।

    28 फरवरी को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा कि सरकार द्वारा SLFRC गठन संबंधी अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान कमेटी का गठन स्थगित रहेगा। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की अत्यधिक फीस कानून के अनुसार विनियमित की जाएगी।

    यह आदेश कई स्कूल संघों की याचिकाओं पर पारित किया गया जिन्होंने दिल्ली सरकार की 1 फरवरी 2026 की अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग की थी। उस अधिसूचना में स्कूलों को 10 दिन के भीतर SLFRC गठित करने का निर्देश दिया गया था।

    इस मामले पर आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि प्राइवेट स्कूल मालिकों और बीजेपी की दिल्ली सरकार के बीच सांठगांठ हाईकोर्ट में फिर उजागर हुई। उन्होंने बताया कि इससे पहले बीजेपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया था कि प्राइवेट फीस एक्ट 2025-26 के लिए बढ़ाई गई फीस पर लागू नहीं होगा जबकि अब हाईकोर्ट ने इसे 2026-27 के सत्र के लिए भी लागू कर दिया।

    कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 में दिल्ली के प्राइवेट स्कूल वही फीस वसूलेंगे जो उन्होंने पिछले साल वसूली थी और SLFRC गठन पर फिलहाल रोक रहेगी। इससे स्कूलों के लिए शुल्क निर्धारण में अस्थिरता टली है और कानूनी प्रक्रिया के तहत अत्यधिक फीस पर निगरानी बनी रहेगी।