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  • अमिताभ बच्चन के मंच से शुरू हुई तकरार? Rajpal Yadav लोन केस में वकील का बड़ा दावा

    अमिताभ बच्चन के मंच से शुरू हुई तकरार? Rajpal Yadav लोन केस में वकील का बड़ा दावा


    नई दिल्ली । कॉमेडियन-अभिनेता राजपाल यादव का लोन और चेक बाउंस मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर आए राजपाल का केस अभी अदालत में लंबित है लेकिन अब उनके वकील भास्कर उपाध्याय ने इस विवाद को लेकर नया पक्ष सामने रखा है। वकील का दावा है कि शिकायतकर्ता माधव गोपाल अग्रवाल की नाराजगी की असली वजह एक पुरानी मंचीय घटना थी जो महानायक अमिताभ बच्चन से जुड़ी बताई जा रही है।

    भास्कर उपाध्याय ने मीडिया को बताया कि सितंबर 2012 में एक फिल्म लॉन्च कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। आरोप है कि माधव अग्रवाल उस कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन के साथ मंच साझा करना चाहते थे लेकिन राजपाल की टीम ने इसकी अनुमति नहीं दी। वकील के अनुसार चूंकि अमिताभ बच्चन ने कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया था इसलिए मंच प्रबंधन सीमित रखा गया। इसी बात से शिकायतकर्ता नाराज हो गए और इसके बाद कानूनी कार्रवाई तेज कर दी गई।

    वकील के मुताबिक सितंबर 2012 में मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचा जहां बकाया भुगतान तक फिल्म पर रोक लगाने की मांग की गई। दिसंबर 2012 में 60,60,350 रुपये का पहला चेक जमा हुआ और बैंक से राशि रिलीज हुई। इसके बाद 2013 में दोनों पक्षों के बीच सहमति समझौता हुआ जिसमें पहले के सभी समझौतों को अमान्य माना जाना था।

    भास्कर का कहना है कि 2016 में एक नया समझौता तैयार हुआ जिसके तहत 10.40 करोड़ रुपये बकाया बताए गए। इसमें यह भी तय हुआ कि भुगतान होने पर पुराने एग्रीमेंट दोबारा लागू नहीं किए जाएंगे। वकील के अनुसार 2016 में वसूली याचिका दायर की गई और शिकायतकर्ता को 1.90 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया। शेष राशि के लिए एक अन्य गारंटर अनंत दत्ताराम सामने आए।

    बचाव पक्ष का दावा है कि राजपाल यादव ने 15 करोड़ रुपये की अपनी संपत्ति जमानत के रूप में रखने की पेशकश की और बाकी रकम चुकाने के लिए समय मांगा लेकिन शिकायतकर्ता ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। मामला तब और उलझ गया जब वकील के मुताबिक तीसरे सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट के तहत दिए गए चेक दोबारा सक्रिय कर दिए गए जबकि सहमति समझौते के बाद उन्हें निरस्त माना गया था।

    मार्च 2018 में ट्रायल कोर्ट ने पुराने समझौते के आधार पर राजपाल यादव को दोषी ठहराते हुए 11.5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। नवंबर 2018 में एक्जीक्यूशन कोर्ट ने उसी आधार पर तीन महीने की सजा सुनाई। बचाव पक्ष का तर्क है कि एक ही मामले में समानांतर कानूनी प्रक्रियाएं नहीं चलनी चाहिए थीं।

    2019 में राजपाल की टीम ने इस आदेश को रिवीजन कोर्ट में चुनौती दी। हालांकि वकील के अनुसार उस दौरान नए अधिवक्ता की ओर से अदालत में मध्यस्थता के जरिये भुगतान की बात स्वीकार किए जाने से मामला और पेचीदा हो गया। फिलहाल राजपाल यादव की ओर से अदालत से अनुरोध किया गया है कि उनकी दलीलों को विस्तार से सुना जाए और मामले का निपटारा मेरिट के आधार पर किया जाए। अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।

  • सत्य की जीत हुई है, हाईकोर्ट के आदेश के बाद विपक्ष पर बरसे भाजपा नेता दुष्यंत गौतम

    सत्य की जीत हुई है, हाईकोर्ट के आदेश के बाद विपक्ष पर बरसे भाजपा नेता दुष्यंत गौतम


    नई दिल्ली । अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिलने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम ने कांग्रेसआम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला है। हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद दुष्यंत गौतम ने इसे सत्य की जीत बताते हुए कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर हमेशा से पूरा भरोसा रहा है और अदालत के फैसले ने यह साबित कर दिया है कि झूठ कितनी भी जोर से फैलाया जाएअंततः टिक नहीं पाता।

    दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत करते हुए दुष्यंत गौतम ने कहा कि वे हमेशा संविधान और कानून के दायरे में रहकर काम करते आए हैं। उन्होंने कहा“सत्यमेव जयते। अंत में सच की ही जीत होती है। आज अदालत के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि झूठ और दुष्प्रचार की एक सीमा होती है।उन्होंने अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। दुष्यंत गौतम ने कहा कि एक बेटी की निर्मम हत्या को कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हर छह महीने बाद एक नया नैरेटिव गढ़ा जाता हैकभी उनका नाम जोड़ा जाता हैतो कभी किसी और का। इससे न तो सच्चाई सामने आती है और न ही पीड़ित बेटी को न्याय मिलता है।

    भाजपा नेता ने कहा कि कांग्रेसआम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल मिलकर उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे थे।मेरी मानहानि की गईमेरी छवि को नुकसान पहुंचाया गया और उस बेटी का बार-बार अपमान किया गया। सोशल मीडिया पर जो वीडियो और पोस्ट डाली गईंवे पूरी तरह झूठी थीं और उन्हें तुरंत हटाया जाना चाहिए, उन्होंने कहदुष्यंत गौतम ने स्पष्ट किया कि घटना के समय वे उत्तराखंड गए ही नहीं थे। उन्होंने कहा कि उनकी लोकेशनकार्यक्रम और आधिकारिक रिकॉर्ड यह साफ दिखाते हैं कि उनके खिलाफ फैलाया गया प्रचार पूरी तरह झूठा और द्वेषपूर्ण था। इसके बावजूद उन्होंने लंबे समय तक चुप रहना उचित समझाक्योंकि वे सत्य के साथ खड़े थे।

    उन्होंने यह भी बताया कि लगातार आरोपों और सोशल मीडिया ट्रायल के कारण उन्हें मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी।मैं विचलित भी हुआदुखी भी। मेरी छवि को नुकसान पहुंचा। लेकिन जब झूठ पूरे देश में फैलाया जाने लगा और पानी सिर के ऊपर चला गयातब मुझे मानहानि का मुकदमा दर्ज कराना पड़ा, उन्होंने कहा।इस बीचदिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्यंत कुमार गौतम की मानहानि याचिका पर सुनवाई करते हुए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को निर्देश दिया कि वे 24 घंटे के भीतर सभी सोशल मीडिया पोस्ट हटाएंजिनमें उन्हें अंकिता भंडारी हत्याकांड से जोड़ा गया है। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने अंतरिम आदेश में दोनों दलों को भविष्य में भी ऐसी कोई सामग्री पोस्ट करने से रोक दिया है।

  • CBI की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को अस्थायी रूप से स्थगित किया

    CBI की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप, दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को अस्थायी रूप से स्थगित किया


    नई दिल्ली।उन्नाव रेप केस में दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दीजिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित किया गया था। केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले से जुड़े अहम कानूनी सवालों पर अंतिम निर्णय होने तक हाईकोर्ट के आदेश को लागू नहीं किया जाएगा।इस फैसले की घोषणा चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कीजिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे। अदालत ने कहा कि यह मामला साधारण नहीं है और इसमें पीड़िता की उम्रअपराध की गंभीरता और आरोपी की स्थिति जैसे पहलुओं पर गंभीर विचार आवश्यक हैं।

    दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर को सेंगर की उम्रकैद सजा निलंबित कर दी थी। अदालत ने कहा कि सेंगर पहले ही करीब सात साल पांच महीने की सजा काट चुका है। हालांकिहाईकोर्ट के आदेश के बावजूद सेंगर जेल से बाहर नहीं आ सका क्योंकि वह पीड़िता के पिता की हत्या के मामले में अलग से उम्रकैद की सजा भुगत रहा है।

    CBI की चुनौती

    CBI ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि अपराध के समय सेंगर लोक सेवक थे। एजेंसी का कहना है कि 2017 में घटना के समय सेंगर भारतीय जनता पार्टी के विधायक थे और उन्हें लोक सेवक की श्रेणी से बाहर मानना कानून की गलत व्याख्या होगी।सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान जोर देकर कहा कि यह मामला नाबालिग पीड़िता से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र मात्र 15 साल 10 महीने थी। इस आधार पर यह अपराध भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और पॉक्सो अधिनियम के तहत आता हैजिसमें सख्त सजा का प्रावधान है।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

    शीर्ष अदालत ने कहा कि लोक सेवक की परिभाषा सहित कई कानूनी सवाल हैंजिन पर विस्तार से विचार किया जाएगा। हालांकिमौजूदा परिस्थितियों में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाना जरूरी था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य तौर पर अदालतें किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप से बचती हैंलेकिन इस मामले की गंभीरता अलग है।

    विरोध और जन प्रतिक्रिया

    दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद से ही पीड़िताउसके परिवार और कई सामाजिक संगठनों ने विरोध दर्ज कराया। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर प्रदर्शन हुएजिसमें सजा निलंबन को पीड़िता के साथ अन्याय बताया गया। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप अब पीड़िता के पक्ष में एक अहम कदम माना जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल कानून की गंभीरता को दर्शाता हैबल्कि नाबालिग पीड़िताओं के मामले में न्याय सुनिश्चित करने का संदेश भी देता है। इस फैसले के बाद अब दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सेंगर की सजा निलंबन पर निर्णय स्थगित रहेगाऔर अंतिम फैसला आने तक वह पहले की तरह जेल में रहेंगे।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय में वरिष्ठ वकील के टेप लगाकर आने पर न्यायाधीश नाराज़, अगली सुनवाई जनवरी 2026 तक टली

    दिल्ली उच्च न्यायालय में वरिष्ठ वकील के टेप लगाकर आने पर न्यायाधीश नाराज़, अगली सुनवाई जनवरी 2026 तक टली


    दिल्ली। उच्च न्यायालय में एक अनोखी घटना सामने आई, जब एक वरिष्ठ वकील सुनवाई के दौरान अपने मुँह पर लाल रंग की टेप लगाकर अदालत कक्ष में पहुँचे। इस असामान्य घटना को देखकर न्यायाधीशों ने कड़ी नाराज़गी जताई और मामले की अगली सुनवाई को जनवरी 2026 तक के लिए टाल दिया। वकील का कहना था कि वह अपने साथ हुई पिछली सुनवाई की घटना के विरोध में ऐसा कर रहे थे, जहाँ उन्हें बीच में ही बोलने से रोक दिया गया था।

    यह घटना 1 दिसंबर की है। अदालत उस समय अवमानना से जुड़े एक मामले और उससे संबंधित एक याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसे नंद किशोर नामक व्यक्ति ने दायर किया था। लगभग 25 वर्ष से अधिक समय तक कानूनी सेवा में रहे अधिवक्ता आर. के. सैनी टेप लगाकर अदालत में उपस्थित हुए। उन्हें इस रूप में देखकर न्यायाधीशों को पहले तो यह लगा कि शायद उन्हें किसी प्रकार की चोट लगी है, जिसके कारण उन्होंने यह कदम उठाया है।

    सुनवाई कर रही पीठ में न्यायमूर्ति नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति अनीश दयाल शामिल थे। दोनों न्यायाधीशों ने सैनी से टेप लगाने का कारण पूछा। इस पर सैनी ने कहा कि यह उनका प्रतीकात्मक विरोध है। उन्होंने बताया कि पिछली सुनवाई के दौरान उन्हें अपनी दलीलें पूरी करने का अवसर नहीं दिया गया था और उन्हें बीच में ही रोक दिया गया था। इसी कारण वह अपने विरोध को दर्ज कराने के लिए इस तरह उपस्थित हुए हैं।

    वकील का यह जवाब सुनकर अदालत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा कि सैनी का यह आचरण अत्यंत अनुचित है और एक अनुभवी वकील से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि पिछली सुनवाई में उन्हें इसलिए रोका गया था क्योंकि उनकी दलीलें बहुत लंबी और दोहराव वाली थीं, और न्यायालय को दूसरे पक्ष की बात भी सुननी थी। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी भी पक्ष को चुप कराना नहीं था, बल्कि सुनवाई को संतुलित और न्यायसंगत बनाए रखना था।

    न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा कि इस तरह का व्यवहार अदालत की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक वरिष्ठ वकील, जिनके पास 25 वर्ष से अधिक का अनुभव है, उनसे अधिक संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि वह चाहती तो सैनी के खिलाफ कड़े आदेश जारी कर सकती थी, परंतु उसने ऐसा न करने का निर्णय लिया है। अदालत ने इस घटना को अदालत की कार्यवाही के रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया, ताकि भविष्य में इस प्रकार के व्यवहार पर अंकुश लगाया जा सके।

    घटना के बाद अदालत ने मुख्य मामले को आगे बढ़ाने के बजाय अगली सुनवाई की तारीख 21 जनवरी 2026 निर्धारित कर दी। न्यायालय का मानना था कि इस प्रकार के हस्तक्षेप से सुनवाई के वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और मुख्य मुद्दों से ध्यान भटक जाता है।

    इस पूरे प्रकरण ने न्यायालय कक्ष में बैठे अन्य लोगों को भी आश्चर्य में डाल दिया। वकील द्वारा अपनाई गई इस शैली को कुछ लोगों ने अनुचित बताया, जबकि कुछ ने इसे अभिव्यक्ति का तरीका कहा। हालांकि, न्यायालय ने अपने स्पष्ट रुख से यह संदेश दिया कि अदालत अनुशासनहीनता को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करेगी।

    यह घटना न्यायालय की गरिमा, वकीलों के आचरण और न्यायिक प्रक्रिया में मर्यादा के महत्व को एक बार फिर उजागर करती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी प्रकार का असंवेदनशील या अनुचित प्रदर्शन अदालत की पवित्रता को प्रभावित करता है और इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकता।