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  • सपा के प्रदर्शन पर सियासी संग्राम डिंपल यादव समेत कई सांसदों को पुलिस ने रोका यूपी से दिल्ली तक हंगामा

    सपा के प्रदर्शन पर सियासी संग्राम डिंपल यादव समेत कई सांसदों को पुलिस ने रोका यूपी से दिल्ली तक हंगामा


    उत्तर प्रदेश । दिल्ली और उत्तर प्रदेश में सोमवार को समाजवादी पार्टी के विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया। पार्टी ने दावा किया कि सांसद डिंपल यादव इकरा हसन प्रिया सरोज और रुचि वीरा समेत कई सांसदों को संसद से जंतर मंतर तक निकाले जा रहे पैदल मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने रोककर कुछ समय के लिए हिरासत में रखा। बाद में सभी सांसदों को छोड़ दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद सपा ने केंद्र सरकार और पुलिस प्रशासन पर लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन का आरोप लगाया।

    समाजवादी पार्टी के अनुसार सांसद छात्रों से जुड़े मुद्दों और विरोध प्रदर्शन के समर्थन में संसद से जंतर मंतर तक मार्च निकाल रहे थे। पार्टी का कहना है कि पुलिस ने बीच रास्ते में सभी को रोक लिया और करीब दो घंटे तक पार्लियामेंट थाना परिसर में बैठाए रखा। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने दावा किया कि सभी सांसदों को बाद में बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया गया।

    इस पूरे घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच के माध्यम से कड़ी प्रतिक्रिया दी। पार्टी ने आरोप लगाया कि छात्रों की आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों को रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और छात्रों की आवाज दबाना उचित नहीं है।

    उधर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए। राजधानी लखनऊ में विधानसभा की ओर बढ़ रहे सपा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया। विरोध स्वरूप कई कार्यकर्ता सड़क पर बैठ गए और नारेबाजी करने लगे। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हटाकर वाहनों के माध्यम से निर्धारित स्थान पर पहुंचाया। वाराणसी में भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सपा कार्यकर्ताओं के बीच धक्का मुक्की और तीखी बहस देखने को मिली।

    बीएचयू और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में भी कुछ छात्र समूहों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर नारे लगाए और अपनी मांगों के समर्थन में पोस्टर लेकर मार्च निकाला। कुछ विदेशी छात्र भी प्रदर्शन में शामिल दिखाई दिए।

    इस बीच डिंपल यादव ने मीडिया से बातचीत में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने और निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था के तहत आवश्यक कदम उठाए गए।

    फिलहाल पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्ष जहां इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश बता रहा है वहीं प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।

  • सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में हंगामा और मुख्य न्यायाधीश से अभद्रता करने वाले लॉ के दो छात्र गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की प्राथमिकी

    सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट रूम में हंगामा और मुख्य न्यायाधीश से अभद्रता करने वाले लॉ के दो छात्र गिरफ्तार, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की प्राथमिकी

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत के भीतर एक बेहद चौंकाने वाली घटना में न्यायिक कार्यवाही को बाधित करने, फाइलों को हवा में उछालने और देश के मुख्य न्यायाधीश के प्रति अत्यंत अभद्र व असंसदीय भाषा का प्रयोग करने वाले कानून के दो छात्रों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। सुरक्षाकर्मियों के साथ हाथापाई और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में इन छात्रों के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी के तिलक मार्ग थाने में एक आपराधिक प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों आरोपियों को हिरासत में लेकर आगे की वैधानिक कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है।

    सुरक्षा अधिकारियों द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों की पहचान लखनऊ विश्वविद्यालय में विधि संकाय के छात्रों के रूप में की गई है। इनमें से एक आरोपी का नाम प्रबल प्रताप सिंह है, जो कानून के तीसरे वर्ष का छात्र है और मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा का निवासी है। वहीं, दूसरे आरोपी की पहचान चंद्र भान के रूप में हुई है, जो इसी विश्वविद्यालय में विधि द्वितीय वर्ष का छात्र है। दिल्ली पुलिस ने बताया कि यह पूरी कानूनी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट परिसर की सुरक्षा में तैनात सुरक्षा स्टाफ के लिखित बयान और शिकायत के आधार पर अमल में लाई गई है।

    यह अभूतपूर्व घटना सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर 13 के भीतर घटित हुई, जब अदालत में एक विशेष अनुमति याचिका पर नियमित सुनवाई चल रही थी। अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस याचिका का शीर्षक ‘प्रबल प्रताप व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ था। इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी प्रबल प्रताप सिंह किसी अधिवक्ता के माध्यम से पेश होने के बजाय खुद ही याचिकाकर्ता-इन-पर्सन के रूप में न्यायाधीशों के समक्ष उपस्थित होकर अपनी दलीलें रख रहा था।

    दर्ज की गई प्राथमिकी के विवरण के मुताबिक, न्यायिक कार्यवाही के दौरान दलीलें खारिज होने या किसी अन्य कारण से आरोपी प्रबल प्रताप सिंह अचानक उग्र हो गया और उसने पूरी तरह से सोची-समझी रणनीति के तहत अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाना शुरू कर दिया। उसने जजों के सामने बेहद अमर्यादित, अपमानजनक और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। अपना आपा खोते हुए उसने कोर्ट रूम के भीतर मौजूद महत्वपूर्ण अदालती कागजात और कानूनी फाइलों को हवा में उछाल दिया, जिससे वे पूरे कोर्ट रूम में बिखर गईं। इस हिंसक आचरण से अदालत कक्ष के भीतर पूरी तरह से अव्यवस्था और अशांति का माहौल पैदा हो गया।

    घटना के वक्त कोर्ट रूम में मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों और सुरक्षाकर्मियों के अनुसार, आरोपी छात्र यहीं नहीं रुका, बल्कि उसने देश के मुख्य न्यायाधीश के प्रति भी सीधे तौर पर अमर्यादित शब्दों और गालियों का प्रयोग किया। जब कोर्ट रूम की सुरक्षा में तैनात ऑन-ड्यूटी सुरक्षाकर्मियों और प्रशासनिक स्टाफ ने कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसे पकड़ने तथा शांत करने का प्रयास किया, तो दोनों आरोपी छात्र और अधिक हिंसक हो गए। उन्होंने सुरक्षा स्टाफ के साथ धक्का-मुक्की और हाथापाई शुरू कर दी, जिससे ऑन-ड्यूटी कर्मचारियों को अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में गंभीर बाधा का सामना करना पड़ा।

    न्यायालय परिसर के भीतर इस प्रकार के अप्रत्याशित हंगामे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल को तुरंत मौके पर बुलाया गया, जिन्होंने कड़ी मशक्कत के बाद दोनों उपद्रवी छात्रों को काबू में किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की लिखित शिकायत पर तिलक मार्ग थाना पुलिस ने विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर दोनों को विधिवत गिरफ्तार कर लिया। इस घटना ने देश की सबसे बड़ी अदालत की सुरक्षा व्यवस्था और कोर्ट रूम के भीतर वकीलों व याचिकाकर्ताओं के आचरण को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिस पर आने वाले दिनों में और सख्त रुख अपनाए जाने की संभावना है।

  • दिल्ली में बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़, चार आरोपी हथियारों समेत गिरफ्तार

    दिल्ली में बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़, चार आरोपी हथियारों समेत गिरफ्तार


    नई दिल्ली।
    राजधानी दिल्ली में संभावित आतंकी साजिश को समय रहते विफल करते हुए पुलिस ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़े बताए जा रहे एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। इस कार्रवाई में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन पंजाब और एक दिल्ली से पकड़ा गया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में हिंसक वारदात को अंजाम देने की तैयारी में थे। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से विदेशी हथियार, जिंदा कारतूस और कई मोबाइल फोन बरामद किए हैं, जिनकी फोरेंसिक जांच कराई जा रही है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए संदिग्ध एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा थे, जो सीमा पार बैठे संचालकों के संपर्क में रहकर गतिविधियों को अंजाम देने की तैयारी कर रहा था। पुलिस का दावा है कि आरोपियों को राजधानी में संवेदनशील स्थानों की निगरानी करने और हमले की योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इस नेटवर्क की गतिविधियों पर लंबे समय से नजर रखी जा रही थी और पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद समन्वित कार्रवाई की गई।

    पूछताछ के दौरान सामने आया कि नेटवर्क का एक प्रमुख सदस्य पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए भेजी जाने वाली हथियारों और मादक पदार्थों की खेप प्राप्त करने में सक्रिय भूमिका निभाता था। जांच में यह भी पता चला कि विदेशी नंबरों के माध्यम से सीमा पार मौजूद संचालकों से लगातार संपर्क बनाए रखा जाता था। पुलिस अब इन संचार माध्यमों, डिजिटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल का विश्लेषण कर नेटवर्क की पूरी श्रृंखला तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

    जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार किए गए कुछ आरोपी पहले भी मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में कानून के शिकंजे में आ चुके हैं। पुलिस का मानना है कि संगठित अपराध, हथियारों की तस्करी और आतंकी गतिविधियों के बीच संभावित संबंधों की भी जांच की जाएगी। इसी आधार पर विभिन्न राज्यों की एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया गया है ताकि नेटवर्क के अन्य सदस्यों की पहचान की जा सके।

    दिल्ली से गिरफ्तार आरोपी के मोबाइल फोन की जांच में कई महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य मिलने का दावा किया गया है। प्रारंभिक जांच के अनुसार, उसे राजधानी के धार्मिक स्थलों, पुलिस थानों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों की रेकी करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा उसे दिल्ली में फायरिंग जैसी वारदात को अंजाम देने के निर्देश मिलने के संकेत भी मिले हैं। पुलिस इन डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच कर यह पता लगाने में जुटी है कि साजिश कितनी व्यापक थी और इसमें अन्य कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

    पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आतंक से संबंधित प्रावधानों, हथियार रखने और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियों का कहना है कि बरामद हथियारों की उत्पत्ति, वित्तीय लेनदेन, सीमा पार संपर्क और डिजिटल नेटवर्क की विस्तृत पड़ताल की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला मानते हुए सभी पहलुओं की गहन जांच कर रही हैं, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते निष्प्रभावी बनाया जा सके।

  • किराये के बहाने जुटाई संपत्ति की जानकारी, फर्जी पहचान से 18 करोड़ का लोन; दिल्ली का चौंकाने वाला बैंक फ्रॉड उजागर

    किराये के बहाने जुटाई संपत्ति की जानकारी, फर्जी पहचान से 18 करोड़ का लोन; दिल्ली का चौंकाने वाला बैंक फ्रॉड उजागर

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय राजधानी के विवेक विहार इलाके से सामने आए कथित बैंक ऋण घोटाले ने संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों की सुरक्षा और किरायेदारी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में आरोप है कि किराए पर रहने आए दो व्यक्तियों ने मकान मालकिन की संपत्ति और पहचान से जुड़े दस्तावेजों का दुरुपयोग कर करीब 18 करोड़ रुपये का ऋण हासिल कर लिया। वर्षों बाद जब बैंक से जुड़े कानूनी नोटिस पहुंचे, तब पूरे मामले का खुलासा हुआ और जांच एजेंसियों ने व्यापक स्तर पर पड़ताल शुरू की।

    पुलिस के अनुसार यह मामला वर्ष 2012 से जुड़ा है। विवेक विहार निवासी ऊषा रानी ने अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से अपने दो फ्लैट किराए पर दिए थे। किराएदारों ने स्वयं को कारोबारी बताकर विधिवत किरायेदारी समझौता किया और कुछ समय तक सामान्य रूप से वहां रहे। इसके बाद दोनों फ्लैट खाली कर चले गए। मकान मालकिन ने भी इसे सामान्य घटना मानते हुए आगे कोई संदेह नहीं जताया।

    करीब एक वर्ष बाद स्थिति तब बदली जब बैंक ऋण से जुड़े मामले में कानूनी प्रतिनिधि उनके घर पहुंचे और बकाया ऋण के संबंध में जानकारी मांगी। इस सूचना से हैरान मकान मालकिन ने पुलिस से संपर्क किया। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि उनके नाम पर केवल एक नहीं, बल्कि लगभग 18 करोड़ रुपये के कई ऋण दर्ज हैं, जिनके लिए उनकी संपत्तियों को आधार बनाया गया था। जांच के दौरान यह भी पता चला कि ऋण प्राप्त करने के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेज और जाली हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया।

    पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि कथित रूप से संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर उन्हें बैंक में प्रस्तुत किया गया। जांच एजेंसियों के अनुसार मकान मालकिन के परिवार से संबंधित पहचान दस्तावेजों की प्रतियां इस्तेमाल की गईं, जबकि हस्ताक्षर वास्तविक नहीं थे। इसके अलावा एक महिला द्वारा स्वयं को संपत्ति की वास्तविक मालिक बताकर उप-पंजीयक कार्यालय में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने की भी जानकारी सामने आई, जिससे फर्जीवाड़े की आशंका और गहरी हो गई।

    जांच में यह भी आरोप सामने आया कि ऋण के माध्यम से प्राप्त धनराशि को कई अलग-अलग शेल कंपनियों के जरिए स्थानांतरित किया गया, ताकि लेनदेन की वास्तविक श्रृंखला को छिपाया जा सके। वित्तीय रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद विभिन्न एजेंसियों ने इस पूरे नेटवर्क की भूमिका की पड़ताल शुरू की। मामले में पुलिस के साथ अन्य जांच एजेंसियां भी शामिल हुईं और वित्तीय लेनदेन के कई पहलुओं की जांच की गई।

    जांच के दौरान एक आरोपी की गिरफ्तारी भी की गई। पुलिस का कहना है कि वह लंबे समय तक गिरफ्तारी से बचता रहा और उसके खिलाफ पहले भी धोखाधड़ी से जुड़े मामले दर्ज रहे हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस कथित फर्जीवाड़े में और किन लोगों की भूमिका रही तथा बैंकिंग और दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया में कहां-कहां चूक हुई।

    यह मामला संपत्ति मालिकों के लिए भी महत्वपूर्ण सीख माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि किरायेदारी के दौरान पहचान और संपत्ति संबंधी दस्तावेज साझा करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतना आवश्यक है। किसी भी प्रकार के दस्तावेज देने से पहले उनकी आवश्यकता, उपयोग और सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही समय-समय पर संपत्ति के रिकॉर्ड, बैंकिंग गतिविधियों और आधिकारिक दस्तावेजों की निगरानी करते रहना ऐसे मामलों से बचाव का महत्वपूर्ण उपाय माना

  • दिल्ली में बड़ा खुलासा बच्चे खरीद-बिक्री रैकेट का पर्दाफाश, 5 नवजात बरामद, अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े तार

    दिल्ली में बड़ा खुलासा बच्चे खरीद-बिक्री रैकेट का पर्दाफाश, 5 नवजात बरामद, अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े तार

    नई द‍िल्‍ली । देश की राजधानी दिल्ली में एक सनसनीखेज मामले का खुलासा हुआ है, जहां पुलिस ने नवजात बच्चों की तस्करी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया है। इस कार्रवाई में अस्पताल की संचालिका सहित कुल 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि पुलिस ने पांच नवजात शिशुओं को सुरक्षित बरामद कर आश्रय गृह भेज दिया है। यह गिरोह पिछले लंबे समय से कई राज्यों में सक्रिय था और अब तक करीब 30 बच्चों की खरीद-फरोख्त कर चुका है।

    पुलिस जांच में सामने आया है कि यह गिरोह बेहद संगठित तरीके से काम करता था। आरोपी राजस्थान और गुजरात के गरीब परिवारों को लालच देकर उनसे नवजात बच्चों को मात्र 10 से 15 हजार रुपये में खरीद लेते थे। इसके बाद इन्हीं बच्चों को बेऔलाद दंपतियों को 5 से 10 लाख रुपये तक में बेच दिया जाता था। इस पूरे रैकेट में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात तक के नेटवर्क जुड़े हुए थे।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब जून के पहले सप्ताह में दिल्ली के पहाड़गंज इलाके से पुलिस को सूचना मिली कि एक महिला अलग-अलग बच्चों के साथ संदिग्ध रूप से घूम रही है। पुलिस ने एक नकली ग्राहक बनाकर महिला से संपर्क किया। सौदा तय होने और 20 हजार रुपये की टोकन मनी दिए जाने के बाद जब आरोपियों ने नवजात को सौंपा, तभी पुलिस ने कार्रवाई करते हुए ज्योति उर्फ कमलेश को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उसी दिन उसकी साथी शालू और ललित को भी हिरासत में ले लिया गया।

    पूछताछ के दौरान इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलती गईं और जांच बेगमपुर स्थित एक निजी अस्पताल तक पहुंची। पुलिस ने छापा मारकर अस्पताल की संचालिका डॉ. विवेकी को भी गिरफ्तार किया, जो इस गिरोह की कथित मास्टरमाइंड बताई जा रही है। जांच में यह भी सामने आया कि इस रैकेट में लैब टेक्निशियन और वाहन चालक की भूमिका भी अहम थी, जो बच्चों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और दस्तावेज तैयार करने में मदद करते थे।

    गिरोह का संचालन कई स्तरों पर किया जाता था। राजस्थान और गुजरात से बच्चों की व्यवस्था साएबा भाई घमर उर्फ कालिया करता था, जिन्हें कार चालक विपिन दिल्ली तक पहुंचाता था। इसके बाद अस्पताल में ही फर्जी जन्म प्रमाण पत्र और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे ताकि बच्चों को कानूनी रूप से गोद लेने जैसा दिखाया जा सके। इस नेटवर्क में लड़कियों की कीमत 4 से 5 लाख रुपये और लड़कों की कीमत 8 से 10 लाख रुपये तक तय थी।

    पुलिस ने आगे की कार्रवाई में ग्वालियर और पानीपत से भी कई खरीदारों को गिरफ्तार किया है, जिन्होंने लाखों रुपये देकर नवजात खरीदे थे। जांच में यह भी सामने आया है कि बरामद पांच बच्चों में से चार आदिवासी समुदाय से हैं, जबकि एक बच्चा दिल्ली का बताया जा रहा है। सभी बच्चों की उम्र 27 दिन से लेकर चार महीने के बीच है।

    फिलहाल पुलिस बच्चों के जैविक माता-पिता की पहचान में जुटी है और पुष्टि के बाद उन्हें उनके असली परिवारों को सौंपा जाएगा। इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि कैसे संगठित अपराध गरीब और असहाय वर्ग को निशाना बनाकर मानव तस्करी जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देते हैं।