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  • ‘सड़क पर संसद’ कार्यक्रम को लेकर भाजपा का इंडिया गठबंधन पर हमला, गुरु प्रकाश ने बताया लोकतंत्र का मजाक

    ‘सड़क पर संसद’ कार्यक्रम को लेकर भाजपा का इंडिया गठबंधन पर हमला, गुरु प्रकाश ने बताया लोकतंत्र का मजाक


    नई दिल्ली ।बिहार में इंडिया गठबंधन के प्रस्तावित ‘सड़क पर संसद’ कार्यक्रम और रैली को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश ने विपक्षी गठबंधन के इस आयोजन पर सवाल उठाते हुए इसे निराधार और तर्कहीन आंदोलन बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष लोकतंत्र के नाम पर ऐसा कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, जिसका कोई औचित्य नहीं है। वहीं, जनता दल यूनाइटेड के एमएलसी नीरज कुमार ने भी विपक्षी गठबंधन की एकजुटता और उसकी राजनीतिक भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।

    गुरु प्रकाश ने कहा कि इंडिया गठबंधन का प्रस्तावित ‘सड़क पर संसद’ कार्यक्रम कोई मॉक पार्लियामेंट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र का मजाक है। उनके मुताबिक, विपक्ष झूठ और निराधार दावों के आधार पर आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कई बार अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुका है और संविधान पीठ भी संबंधित विषय को संवैधानिक बता चुकी है। ऐसे में इस मुद्दे पर आंदोलन करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं बनता।

    भाजपा प्रवक्ता ने विपक्षी गठबंधन के भीतर आपसी तालमेल की कमी का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन में न तो समन्वय दिखाई देता है और न ही सहयोग की भावना है। उनके अनुसार, प्रस्तावित रैली राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन की हठधर्मिता का परिणाम है। उन्होंने विपक्ष की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि गठबंधन के नेताओं के बीच एकराय का अभाव नजर आता है।

    रैली की प्रस्तावित तारीख एक नवंबर को लेकर भी गुरु प्रकाश ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह तारीख सिख समुदाय के इतिहास से जुड़ी संवेदनशील घटनाओं की याद दिलाती है। उनके मुताबिक, वर्ष 1984 में दिल्ली में सिख समुदाय की महिलाओं और अन्य लोगों के साथ हुई घटनाओं को ध्यान में रखना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी ऐतिहासिक संवेदनशीलता के बावजूद इसी दिन कार्यक्रम आयोजित करने पर जोर देना विपक्ष की असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

    इंडिया गठबंधन की रैली को यूट्यूबर ध्रुव राठी का समर्थन मिलने के सवाल पर भी गुरु प्रकाश ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ध्रुव राठी, नेहा बोरा और अन्य लोगों की विचारधारा को लेकर सवाल उठाए। गुरु प्रकाश ने कहा कि जनता को यह समझना चाहिए कि इन लोगों की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है। उन्होंने नेहा बोरा के बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि वह विपक्षी गठबंधन की रैली के मंच पर दिखाई देती हैं, तो इससे गठबंधन की संवैधानिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठेंगे।

    गुरु प्रकाश ने शरजील इमाम का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि वह भारतीय संविधान को फासीवादी दस्तावेज बताते रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के समर्थन को लेकर इंडिया गठबंधन को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। भाजपा प्रवक्ता के अनुसार, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान के प्रति विपक्षी गठबंधन की निष्ठा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    दूसरी ओर, जेडीयू एमएलसी नीरज कुमार ने भी इंडिया गठबंधन की राजनीतिक सक्रियता पर सवाल उठाए। उन्होंने पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावों का उल्लेख करते हुए पूछा कि वहां विपक्षी गठबंधन की एकजुटता कहां दिखाई दी। उन्होंने कहा कि गठबंधन की वास्तविक राजनीतिक स्थिति उसके अलग-अलग राज्यों में प्रदर्शन और आपसी तालमेल से स्पष्ट होती है।

    नीरज कुमार ने संसद के स्थान पर मॉक पार्लियामेंट आयोजित करने के फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जनता अपने प्रतिनिधियों को संसद में बैठकर काम करने के लिए चुनती है। ऐसे में विपक्ष को संसद के बाहर समानांतर आयोजन करने के बजाय अपनी मांगों को सदन में उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री विपक्ष की सहमति से संसद का विशेष सत्र बुलाने की बात कह रहे हैं। ऐसे में विपक्ष को स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी वास्तविक मांग क्या है।

    नीरज कुमार ने आरोप लगाया कि विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाकर देश में राजनीतिक अराजकता का माहौल तैयार करना चाहता है। इस दौरान उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के योगदान को भी याद किया। उन्होंने बताया कि जेडीयू के कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ की ओर से सरदार पटेल के सम्मान में प्रतियोगिता आयोजित की गई है। उन्होंने देशी रियासतों के एकीकरण, प्रशासनिक ढांचे के निर्माण और सामाजिक सद्भाव स्थापित करने में पटेल की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

  • नसीरुद्दीन शाह के ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर भड़के केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, बोले- अभिनेता का यह रूप नहीं जानते थे…

    नसीरुद्दीन शाह के ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर भड़के केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, बोले- अभिनेता का यह रूप नहीं जानते थे…

    नई दिल्ली । अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के एक वीडियो में खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहने और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अभिनेता के बयान पर हैरानी जताते हुए उनकी सोच को लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह बताया। वहीं, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नीतीश राणे ने भी शाह पर निशाना साधा और उन पर पाकिस्तान के पक्ष में बात करने का आरोप लगाया। यह विवाद शिक्षा संस्थानों में छात्रों के साथ कथित कार्रवाई और सरकार की भूमिका को लेकर शाह की टिप्पणियों के बाद सामने आया है।

    किरेन रिजिजू ने नसीरुद्दीन शाह का वीडियो साझा करते हुए कहा कि वह अभिनेता का सम्मान करते थे और उन्हें पसंद भी करते थे, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि उनकी सोच इस तरह की हो सकती है। रिजिजू ने अपनी प्रतिक्रिया में शाह को ‘खतरनाक दिमागी नक्सल’ बताया और कहा कि ऐसी सोच भारत के लोकतंत्र के लिए अत्यंत हानिकारक है। जिस वीडियो पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी, उसमें शाह कहते सुनाई देते हैं कि वह गर्व के साथ खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहते हैं।

    महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नीतीश राणे ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि नसीरुद्दीन शाह पाकिस्तान की स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं और इसके लिए उन्हें भुगतान किया जाता है। राणे ने अभिनेता की आलोचना करते हुए उनकी बातों को गंभीरता से लेने पर भी सवाल उठाए। ये आरोप राणे की ओर से लगाए गए हैं; इनके समर्थन में कोई स्वतंत्र प्रमाण खबर में नहीं दिया गया है।

    नसीरुद्दीन शाह ने अपने वीडियो में सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्हें राष्ट्रविरोधी और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे नामों से पुकारा जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में लोकतंत्र और शिक्षा संस्थानों को खतरे में डाला जा रहा है। शाह ने सरकार से सवाल किया कि युवाओं का हौसला तोड़ने और शैक्षणिक संस्थानों को प्रभावित करने के लिए और क्या किया जाएगा। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन घटनाओं को याद रखा जाएगा।

    शाह ने 24 अक्टूबर को जारी एक अन्य वीडियो में सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एसआरएफटीआई) के छात्रों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल चुनाव में जीत के बाद भाजपा उन लोगों से बदला लेने की कोशिश कर रही है, जो उसकी विचारधारा और नीतियों से सहमत नहीं हैं। उनके मुताबिक, संस्थान के छात्रों और भविष्य के फिल्म निर्माताओं को प्रशासन से जवाबदेही मांगने के बदले कारण बताओ नोटिस दिए गए, निगरानी में रखा गया, धमकियां दी गईं और छात्रावास खाली करने को कहा गया।

    अभिनेता ने यह भी कहा कि सरकार छात्रों को डराने या उनका विचार बदलने की कोशिश कर सकती है, लेकिन ऐसा सफल नहीं होगा। उन्होंने विद्यार्थियों को देश और समाज की वास्तविक स्थिति सामने लाने वाले भावी फिल्मकार बताया। शाह का कहना था कि युवा भविष्य में अपने काम के जरिए देश के बारे में सच्चाई सामने रखेंगे।

    एसआरएफटीआई से जुड़े मामले को लेकर पहले भी राजनीतिक और सार्वजनिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। शाह ने संस्थान के छात्रों के साथ कथित व्यवहार पर सवाल उठाए हैं, जबकि केंद्र सरकार के मंत्री ने उनके बयान की आलोचना की है। इस तरह मामला अब शिक्षा संस्थानों में छात्रों के अधिकार, सरकार की नीतियों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चल रही बहस से भी जुड़ गया है।

  • निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला, बोले- लगातार चुनावी हार के कारण अभद्र भाषा का सहारा ले रही पार्टी

    निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला, बोले- लगातार चुनावी हार के कारण अभद्र भाषा का सहारा ले रही पार्टी


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि लगातार चुनावी हार के कारण कांग्रेस अब तक राजनीतिक झटकों से उबर नहीं पाई है। उन्होंने कहा कि पार्टी के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दिवंगत माता-पिता को लेकर अभद्र टिप्पणियां कर रहे हैं, जो राजनीतिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं हैं। दुबे ने राजनीतिक विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि देश के प्रधानमंत्री के पद का सम्मान किया जाना चाहिए।

    पत्रकारों से बातचीत में दुबे ने कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार चुनावी पराजयों के बावजूद पार्टी अपनी स्थिति सुधारने में सफल नहीं हो रही है। उनके मुताबिक, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे नेताओं की भूमिका के बावजूद कांग्रेस राजनीतिक चुनौतियों से बाहर नहीं निकल पा रही है। दुबे ने इसी संदर्भ में पार्टी पर अभद्र भाषा का सहारा लेने का आरोप लगाया।

    भाजपा सांसद ने अपने बयान में वर्ष 1971-72 के दौर का भी उल्लेख किया। उन्होंने बांग्लादेश युद्ध के बाद तत्कालीन अमेरिकी नेताओं हेनरी किसिंजर और रिचर्ड निक्सन की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणियों का जिक्र किया। दुबे के अनुसार, उस समय भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद होने के बावजूद विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री के सम्मान से जुड़े मुद्दे पर उनका समर्थन किया था।

    उन्होंने कहा कि उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे विपक्षी नेताओं ने संसद में इंदिरा गांधी का बचाव किया था। दुबे ने इस उदाहरण के जरिए अपनी बात रखी कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के पद के प्रति सम्मान बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौरान राष्ट्रीय नेतृत्व और संवैधानिक पदों की गरिमा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    दुबे ने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही भाषा पर आपत्ति जताई। उन्होंने विशेष रूप से प्रधानमंत्री के दिवंगत माता-पिता को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों को अनुचित बताया। भाजपा सांसद ने कहा कि राजनीतिक बहस में किसी नेता के परिवार के सदस्यों को निशाना बनाना उचित नहीं है। उनके अनुसार, विरोधियों को नीतियों और राजनीतिक फैसलों पर सवाल उठाने चाहिए, न कि व्यक्तिगत या पारिवारिक टिप्पणियों के जरिए विवाद बढ़ाना चाहिए।

    भाजपा सांसद ने राहुल गांधी से जुड़े मानहानि मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने राहुल गांधी के बरी होने के संदर्भ में सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित मामला गृह मंत्री के खिलाफ की गई टिप्पणी से जुड़ा था। दुबे ने यह भी पूछा कि क्या एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से दूसरे दल के नेता के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक आचरण माना जा सकता है। इस मुद्दे पर उन्होंने राजनीतिक संवाद की मर्यादा को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की।

    दुबे ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सरकार की आलोचना करने और अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। हालांकि, उनके अनुसार, विरोध दर्ज कराने के लिए भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब राजनीतिक विरोधी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने में असमर्थ होते हैं, तो वे अभद्र भाषा का सहारा लेते हैं। उनके बयान का मुख्य जोर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक संवाद में सम्मान और संयम बनाए रखने पर रहा।

  • चुनाव आयोग के समर्थन में 27 देशों के 400 से अधिक भारतवंशी, विपक्षी प्रदर्शनों पर जताई चिंता

    चुनाव आयोग के समर्थन में 27 देशों के 400 से अधिक भारतवंशी, विपक्षी प्रदर्शनों पर जताई चिंता

    नई दिल्ली । चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी दलों की ओर से किए जा रहे प्रदर्शनों के बीच दुनिया के 27 देशों में रहने वाले 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं और पूर्व विद्यार्थियों ने आयोग के समर्थन में संयुक्त बयान जारी किया है। ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ शीर्षक वाले इस बयान में प्रदर्शन के तरीकों पर चिंता जताते हुए कहा गया है कि ऐसे कदम संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं। बयान पर हस्ताक्षर करने वालों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं का सम्मान करने की आवश्यकता बताई है।

    संयुक्त बयान में बाबासाहब आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि लोकतंत्र में मतभेदों का समाधान संवैधानिक तरीकों से किया जाना चाहिए। हस्ताक्षरकर्ताओं ने सड़कों पर होने वाले अराजकतापूर्ण प्रदर्शनों की आलोचना की और कहा कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर ऐसी गतिविधियां नहीं होनी चाहिए, जिनसे संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़े। उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखना देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

    बयान में आरोप लगाया गया है कि भारतीय लोकतंत्र को लेकर संदेह पैदा करने की अनुचित कोशिश की जा रही है। इसमें अदालतों में विचाराधीन मामलों को इस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाने और फिर प्रदर्शनों के माध्यम से इस मुद्दे को आगे बढ़ाने पर आपत्ति जताई गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा का दावा करने वालों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके तरीके संवैधानिक शासन को नुकसान न पहुंचाएं। हालांकि, ये बातें बयान जारी करने वाले समूह के आरोप और विचार हैं।

    यह बयान ऐसे समय आया है, जब विपक्षी दल चुनाव आयोग के कामकाज और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी नेताओं ने चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाते हुए आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किए हैं। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी ने भी आयोग के विरोध में कई प्रदर्शन किए हैं। इन आंदोलनों की अगुवाई अभिजीत दीपके कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस सिलसिले में उन्हें दो बार हिरासत में भी लिया गया है।

    संयुक्त बयान में हस्ताक्षरकर्ताओं ने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर दुख और हैरानी जताई है। उनका कहना है कि कुछ हलकों में चुनाव परिणामों को स्वीकार नहीं करने, संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाने और संसद के बजाय सड़कों पर आंदोलन को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। बयान में कहा गया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के रूप में वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

    हस्ताक्षर करने वाले लोग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, जापान और सिंगापुर समेत 27 देशों के विश्वविद्यालयों से जुड़े हैं। इनमें मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), हार्वर्ड विश्वविद्यालय, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे संस्थानों से जुड़े छात्र, शोधकर्ता और पूर्व विद्यार्थी शामिल हैं।

    बयान में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया गया है कि हस्ताक्षरकर्ताओं का इन विश्वविद्यालयों से जुड़ा होना संबंधित संस्थानों की आधिकारिक सहमति या समर्थन का प्रमाण नहीं है। यानी यह बयान इसमें हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों का सामूहिक रुख है, न कि इन विश्वविद्यालयों की ओर से जारी आधिकारिक वक्तव्य। इस तरह चुनाव आयोग के समर्थन में सामने आए इस बयान ने चुनाव प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और विरोध प्रदर्शनों के तरीकों को लेकर जारी बहस में एक नया पक्ष सामने रखा है।

  • महुआ मोइत्रा ने उठाई सत्ता परिवर्तन की मांग, कपिल सिब्बल के बयान पर भाजपा और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव

    महुआ मोइत्रा ने उठाई सत्ता परिवर्तन की मांग, कपिल सिब्बल के बयान पर भाजपा और विपक्ष के बीच बढ़ा टकराव

    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार पर निशाना साधते हुए सत्ता परिवर्तन की मांग की है। इससे पहले राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल भी इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार की आलोचना कर चुके हैं। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करने के आरोप लगाए हैं।

    महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने बयान में कहा कि विपक्ष सत्ता परिवर्तन चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जो सरकार अपने ही निहत्थे नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए कथित रूप से अवैध तरीके से हिरासत में लेती है और उन्हें जेल भेजने के लिए पुलिस तंत्र का इस्तेमाल करती है, उसे सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है। उन्होंने हिरासत की कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। उनका यह बयान चुनावी अनियमितताओं के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच आया है।

    इससे पहले कपिल सिब्बल ने भी सत्ता परिवर्तन की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा था। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया था कि वे बांग्लादेश की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि विपक्षी दल अराजकता फैलाने के लिए युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    राजनाथ सिंह ने लखनऊ में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि लोकतंत्र किसी को भी अराजकता फैलाने या संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर करने की अनुमति नहीं देता। उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में कथित चुनावी अनियमितताओं के विरोध में हुए प्रदर्शनों को लेकर विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

    रक्षा मंत्री के आरोपों का जवाब देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि सत्ता परिवर्तन की मांग कांग्रेस या विपक्षी दलों की ओर से नहीं, बल्कि देश की जनता की ओर से उठ रही है। उन्होंने अपने बयान में मौजूदा सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। सिब्बल ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के नारों के साथ सत्ता में आई सरकार ने बाद में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया, संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित किया और मतदाता सूची में हेरफेर किया। उन्होंने कहा कि अब सरकार के जाने का समय आ गया है। ये आरोप विपक्ष की ओर से लगाए गए हैं।

    इस राजनीतिक विवाद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के सत्ता परिवर्तन संबंधी बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि विपक्ष की टिप्पणियां देश को अस्थिर करने के कथित एजेंडे की ओर संकेत करती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष चुनाव सुधारों, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर या युवाओं के भविष्य के लिए नहीं, बल्कि किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करने के लिए प्रयास कर रहा है।

    नितिन नवीन ने सोशल मीडिया पर अपने बयान में सत्ता परिवर्तन जैसे शब्दों के इस्तेमाल को विपक्ष की मंशा से जोड़ते हुए विदेशी ताकतों के साथ मिलकर देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया। उन्होंने विपक्ष की राजनीति को कथित तौर पर अर्बन नक्सल एजेंडे से भी जोड़ा। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने का रास्ता जनता के जनादेश से होकर गुजरता है, न कि अराजकता के माध्यम से। उन्होंने दावा किया कि भाजपा और देश की जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने के किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देंगी।

    सत्ता परिवर्तन को लेकर यह बयानबाजी ऐसे समय में हो रही है, जब चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और कथित अनियमितताओं को लेकर राजनीतिक दलों के बीच विवाद जारी है। विपक्ष सरकार की कार्यशैली और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, जबकि भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश बता रही है। दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप से केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का मुद्दा और प्रमुख हो गया है।

  • योगी आदित्यनाथ का विपक्ष पर निशाना, बोले सत्ता परिवर्तन का रास्ता जनादेश से निकलता है, अराजकता से नहीं

    योगी आदित्यनाथ का विपक्ष पर निशाना, बोले सत्ता परिवर्तन का रास्ता जनादेश से निकलता है, अराजकता से नहीं

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारत में बांग्लादेश की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन का सपना देखने वाली शक्तियों पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने का रास्ता जनता के जनादेश से होकर गुजरता है, न कि अराजकता के जरिए। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि कुछ शक्तियां चुनाव सुधार, न्याय और लोकतंत्र जैसे मुद्दों की आड़ लेकर देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रही हैं।

    योगी आदित्यनाथ ने अपने सोशल मीडिया संदेश में कहा कि बांग्लादेश की तर्ज पर भारत में सत्ता परिवर्तन का सपना देखने वाली ताकतें युवाओं की ऊर्जा का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण के बजाय अराजकता फैलाने के लिए करना चाहती हैं। उन्होंने युवाओं को देश के भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि उनकी शक्ति का उपयोग राष्ट्रीय विकास के लिए होना चाहिए, न कि किसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए।

    मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में लोकतंत्र, चुनाव सुधार और न्याय से जुड़े नारों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन मुद्दों का सहारा लेकर देश में अस्थिरता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती जनता के विश्वास पर निर्भर करती है और इसे राजनीतिक षड्यंत्रों के जरिए कमजोर नहीं किया जा सकता।

    योगी आदित्यनाथ ने भारत के लोकतंत्र की तुलना एक विशाल वटवृक्ष से करते हुए कहा कि इसकी जड़ें जनविश्वास में हैं। उन्होंने कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी मजबूत है कि उसे षड्यंत्रों और अस्थिरता पैदा करने वाली कोशिशों से हिलाया नहीं जा सकता। उनके बयान में जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सत्ता परिवर्तन का प्रमुख आधार बताया गया।

    मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में राजनीतिक विरोधियों पर यह आरोप भी लगाया कि वे सत्ता से दूर रहने के बाद अब अराजकता के माध्यम से राजनीतिक परिस्थितियों को बदलना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे प्रयासों को सियासी साजिश करार देते हुए कहा कि देश को अस्थिरता की ओर धकेलकर सत्ता हासिल करने की कोशिश सफल नहीं होनी चाहिए।

    अपने बयान में योगी आदित्यनाथ ने कुछ राजनीतिक शक्तियों के लिए मारीच और कालनेमि जैसे पौराणिक पात्रों का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि जनता ने राजनीतिक दलों और नेताओं को पहचानकर ही उन्हें सत्ता से दूर रखा है। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है और किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता हासिल करने के लिए जनादेश के अलावा दूसरे रास्ते नहीं अपनाने चाहिए।

    योगी आदित्यनाथ की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब देश में चुनाव सुधार और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर राजनीतिक बयानबाजी जारी है। उनके संदेश में इन मुद्दों को लेकर सक्रिय शक्तियों पर देश में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाया गया है। हालांकि, उनके बयान में किसी विशेष घटना या कथित साजिश के समर्थन में अलग से कोई विस्तृत प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

    मुख्यमंत्री ने अपने संदेश के अंत में कहा कि भारत की जनता देश को अराजकता की आग में झोंककर सत्ता हासिल करने की कोशिशों को सफल नहीं होने देगी। उन्होंने युवाओं की भूमिका को राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में राजनीतिक बदलाव का आधार जनता का विश्वास और उसका जनादेश होना चाहिए।

  • रिजीम चेंज के बयान पर सियासी घमासान, राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर लगाए सत्ता परिवर्तन की साजिश के आरोप

    रिजीम चेंज के बयान पर सियासी घमासान, राजनाथ सिंह ने विपक्ष पर लगाए सत्ता परिवर्तन की साजिश के आरोप

    नई दिल्ली ।देश में एसआईआर और चुनाव सुधारों को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन के बयान पर नया विवाद खड़ा हो गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के नेताओं के बयानों पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार बदलने के लिए अराजकता का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि विपक्ष का उद्देश्य चुनाव के जरिए सरकार बदलना है।

    लखनऊ में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा कि विपक्ष की लड़ाई चुनाव सुधार, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, ‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल विपक्ष की मंशा को स्पष्ट करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में अराजकता पैदा करके सत्ता हासिल करने की कोशिश की जा रही है।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि देश के युवाओं को अराजकता की राजनीति का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग उसी तरह भारत में भी सत्ता बदलने की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर सरकार बदलने और दूसरे देशों से प्रेरणा लेने संबंधी बयान दिए जा रहे हैं।

    भाजपा सांसद संबित पात्रा ने भी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के बयान पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सत्ता परिवर्तन को मौजूदा संघर्ष का उद्देश्य बताने से विपक्ष की मंशा सामने आती है। एसआईआर के मुद्दे पर दिए गए बयानों को लेकर भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या यह आंदोलन केवल चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए है या इसके पीछे सरकार बदलने का व्यापक राजनीतिक उद्देश्य भी है।

    विवाद की शुरुआत 15 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए बयानों के बाद हुई। इसमें प्रशांत भूषण के साथ सीजेपी नेता अभिजीत दीपके और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा भी शामिल हुई थीं। प्रशांत भूषण ने कहा था कि यदि सरकार की कथित बर्बरता जारी रहती है, तो सरकार बदलनी होगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई नागरिक समाज और युवाओं के नेतृत्व में लड़ी जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि वे ‘रिजीम चेंज’ चाहते हैं।

    इससे पहले 14 अक्टूबर को नेहा बोरा ने बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर एक संदेश दिया था। इसमें उन्होंने बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा मिलने की बात कही। उन्होंने कहा कि वहां धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ चल रही लड़ाई और भारत में युवाओं की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ किए जा रहे संघर्ष के बीच समानता है। उनके इस बयान को भी मौजूदा राजनीतिक विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।

    राजनाथ सिंह के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि विपक्ष चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने की बात करता है। उन्होंने 1977 में हुए सत्ता परिवर्तन का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि उस समय भी सरकार नहीं बदली थी क्या। खेड़ा के अनुसार, विपक्ष का उद्देश्य आंदोलन और चुनावों के जरिए सत्ता परिवर्तन करना होता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना विपक्ष की राजनीतिक भूमिका का हिस्सा है। उन्होंने भाजपा नेताओं के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष को सरकार बदलने के लिए चुनावी प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है।

    केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने मौजूदा राजनीतिक संघर्ष को ‘दिमागी नक्सलियों’ और देशभक्त भारतीयों के बीच की लड़ाई बताया। साथ ही उन्होंने इसे संविधान में विश्वास रखने वालों और अराजकतावादियों के बीच का संघर्ष करार दिया।

    ‘रिजीम चेंज’ शब्द के इस्तेमाल, बांग्लादेश के आंदोलन के संदर्भ और सरकार बदलने की मांग को लेकर भाजपा तथा विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एक ओर भाजपा नेता इन बयानों को अराजकता और सत्ता परिवर्तन की साजिश से जोड़ रहे हैं, वहीं कांग्रेस का कहना है कि चुनाव के जरिए सरकार बदलना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।

  • गुरुग्राम में हिरासत से रिहाई के बाद ध्रुव राठी का आरोप, मां को धक्का देकर बेडरूम से उठाया और 23 घंटे रखा

    गुरुग्राम में हिरासत से रिहाई के बाद ध्रुव राठी का आरोप, मां को धक्का देकर बेडरूम से उठाया और 23 घंटे रखा


    नई दिल्ली । यूट्यूबर और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर ध्रुव राठी ने गुरुग्राम स्थित अपने आवास से हिरासत में लिए जाने और रिहाई के बाद पुलिस कार्रवाई पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने एक वीडियो जारी कर दावा किया कि शनिवार सुबह सिविल कपड़ों में पहुंचे करीब 20 लोग उनके घर में दाखिल हुए और उन्हें सोते समय बेडरूम से उठाकर अपने साथ ले गए। राठी के अनुसार, इस दौरान उनकी मां को भी रास्ते से हटाने के लिए धक्का दिया गया। उन्होंने पूरी कार्रवाई को कानूनी गिरफ्तारी के बजाय अपहरण करार दिया है।

    राठी ने वीडियो में बताया कि उन्हें करीब 22 से 23 घंटे तक हिरासत में रखा गया। उनका आरोप है कि इस दौरान उन्हें अपने कानूनी सलाहकार से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें जबरन ले जाने के दौरान उनके शरीर और हाथों पर अंदरूनी चोटें आईं। रिहाई के बाद सामने आए वीडियो में उन्होंने अपनी आपबीती साझा करते हुए संबंधित कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाए। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में स्वतंत्र पुष्टि या पुलिस का पक्ष उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है।

    वीडियो में ध्रुव राठी ने अपनी नागरिकता को लेकर उठाए जाने वाले सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने भारतीय पासपोर्ट कैमरे के सामने दिखाते हुए कहा कि वह भारतीय नागरिक थे, हैं और आगे भी रहेंगे। उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पहचान पर सवाल उठाने वालों को संबोधित करते हुए कहा कि उनका जुड़ाव भारत से है और उन्हें सच बोलने से रोका नहीं जा सकता। विदेश में निवास को लेकर उनकी नागरिकता पर होने वाली चर्चाओं के संदर्भ में उन्होंने अपने पासपोर्ट को अपनी पहचान का प्रमाण बताया।

    राठी ने देश के मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक हालात पर भी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बन रही है और सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों तथा स्वतंत्र आवाजों को डराने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों की तुलना उत्तर कोरिया जैसे देशों से करते हुए दावा किया कि असहमति की आवाजों को दबाने की कोशिश हो रही है। ये टिप्पणियां उनके वीडियो में व्यक्त विचार और आरोप हैं।

    उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, ध्रुव राठी को गुरुग्राम के केंद्रीय विहार स्थित आवास से ले जाकर सेक्टर-39 के क्राइम ब्रांच थाने में रखा गया था। इससे एक दिन पहले, शुक्रवार को उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया था, जिसमें नागरिकों से ‘सीजेपी प्रोटेस्ट’ में शामिल होने का आह्वान किया गया था। हालांकि, इस आह्वान और हिरासत की कार्रवाई के बीच संबंध को लेकर पुलिस का आधिकारिक बयान उपलब्ध विवरण में नहीं दिया गया है।

    अपने वीडियो के अंतिम हिस्से में राठी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेते हुए देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और निष्पक्ष मीडिया जैसे प्रमुख संस्थानों पर सत्ता का प्रभाव बढ़ रहा है। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने अपनी हिरासत की कार्रवाई को लेकर भी असहमति जताई और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों के संदर्भ में रखा। मामले में पुलिस का पक्ष और हिरासत से संबंधित आधिकारिक विवरण सामने आने के बाद ही घटनाक्रम की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

  • ममता बनर्जी ने ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ के अंदाज में BJP और मुख्य चुनाव आयुक्त पर साधा निशाना, सुप्रिया सुले ने साझा किया वीडियो

    ममता बनर्जी ने ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ के अंदाज में BJP और मुख्य चुनाव आयुक्त पर साधा निशाना, सुप्रिया सुले ने साझा किया वीडियो

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इसमें वह बच्चों की लोकप्रिय कविता ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ की तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधती नजर आ रही हैं। वीडियो में ममता ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), चुनाव आयोग की भूमिका और लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों को उठाया है। उनके इस अंदाज को चुनावी प्रक्रिया के खिलाफ विपक्ष के विरोध से जोड़कर देखा जा रहा है।

    वीडियो में ममता बनर्जी कविता की शैली में कहती हैं, “जॉनी-जॉनी यस पापा, एसआईआर नो पापा, ज्ञानेश कुमार यस पापा, रेजिग्नेश यस पापा, रिमूव यस पापा, अरेस्ट एस पापा, सेव डेमोक्रेसी यस पापा, सेव इंडिया यस पापा।” इस रचनात्मक प्रस्तुति के जरिए उन्होंने SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर अपनी आपत्ति जाहिर की। कविता के परिचित अंदाज का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अपने राजनीतिक संदेश को सामने रखा। वीडियो में भाजपा सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर भी टिप्पणी की गई है।

    राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने यह वीडियो सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किया। उन्होंने ममता बनर्जी की तारीफ करते हुए लिखा कि ममता दीदी हमेशा की तरह कमाल हैं। सुले ने वीडियो के संदेश को हास्य के साथ लोकतंत्र बचाने की गंभीर अपील बताया। उन्होंने ‘लोकतंत्र बचाओ, भारत बचाओ’ के संदेश का उल्लेख किया। वीडियो साझा किए जाने के बाद SIR और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे फिर चर्चा में आ गए।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्षी नेताओं की प्रमुख आपत्तियों में मतदाता सूची से संबंधित कथित अनियमितताएं और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता शामिल हैं। ममता बनर्जी ने भी अपने वीडियो के माध्यम से इन मुद्दों पर विरोध जताया है। हालांकि, वीडियो में लगाए गए राजनीतिक आरोप अपने आप में किसी अनियमितता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करते।

    इससे पहले 9 अक्टूबर को विपक्षी गठबंधन INDIA के 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की थी। प्रतिनिधिमंडल ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा था। इस प्रतिनिधिमंडल में ममता बनर्जी भी शामिल थीं। मुलाकात का उद्देश्य विपक्ष की ओर से उठाई जा रही चिंताओं को राष्ट्रपति के सामने रखना था।

    मुलाकात के बाद लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दावा किया था कि राष्ट्रपति ने विपक्ष की चिंताओं को सुना। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप भी लगाए थे। ये आरोप विपक्ष की ओर से लगाए गए थे और उनकी स्वतंत्र पुष्टि की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

    विपक्ष लगातार SIR और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर सवाल उठा रहा है। ममता बनर्जी का वायरल वीडियो इसी राजनीतिक विरोध की कड़ी के रूप में सामने आया है। बच्चों की कविता के अंदाज में दिए गए संदेश के जरिए उन्होंने चुनाव आयोग और भाजपा के खिलाफ अपनी आपत्तियां जाहिर कीं। सुप्रिया सुले द्वारा वीडियो साझा किए जाने से यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा में और प्रमुखता से आया है। फिलहाल, चुनावी प्रक्रिया में कथित धांधली और अनियमितताओं से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

  • राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए INDIA गठबंधन ने दो बार भेजा पत्र, 7 से 9 अक्टूबर का समय मांगा, अब तक जवाब नहीं

    राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए INDIA गठबंधन ने दो बार भेजा पत्र, 7 से 9 अक्टूबर का समय मांगा, अब तक जवाब नहीं

    नई दिल्ली । INDIA गठबंधन के नेताओं ने भारत के राष्ट्रपति से मुलाकात करने का अनुरोध किया है। कांग्रेस के मुताबिक, इस संबंध में पहला अनुरोध पत्र 2 अक्टूबर को भेजा गया था। इसके बाद राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से मुलाकात में शामिल होने वाले नेताओं के नाम मांगे गए थे। कांग्रेस का कहना है कि उसने 5 अक्टूबर को नेताओं के नाम के साथ दोबारा अनुरोध भेजा और 7, 8 या 9 अक्टूबर को मुलाकात के लिए समय मांगा, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि विपक्षी नेता राष्ट्रपति से मुलाकात करना चाहते हैं और इस संबंध में आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। पार्टी के अनुसार, पहले पत्र के बाद राष्ट्रपति कार्यालय ने मुलाकात में शामिल होने वाले नेताओं की जानकारी मांगी थी। इसके बाद कांग्रेस ने 5 अक्टूबर को दोबारा पत्र भेजकर संबंधित नेताओं के नाम दिए और मुलाकात के लिए तीन तारीखों का विकल्प भी रखा।

    कांग्रेस का कहना है कि 7, 8 या 9 अक्टूबर में से किसी दिन मुलाकात का समय देने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, 8 अक्टूबर तक राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिलने की बात कांग्रेस ने कही है। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया है कि वह अगले दिन तक जवाब का इंतजार करेगी। ऐसे में INDIA गठबंधन के नेताओं की राष्ट्रपति से मुलाकात कब होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

    इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की दूसरी लंच बैठक बुलाई। यह बैठक कनॉट प्लेस में दोपहर करीब पौने दो बजे आयोजित हुई। बैठक में विपक्षी सांसदों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद सभी नेताओं के बस से राजघाट पहुंचने की संभावना भी जताई गई।

    बैठक के दौरान कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने केंद्र की बीजेपी सरकार, केंद्रीय मंत्री और चुनाव आयोग पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अराजकता कौन फैला रहा है, यह सवाल है। वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भाजपा, अमित शाह, नरेंद्र मोदी और ज्ञानेश कुमार लोकतंत्र में अराजकता फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष यहां लोकतंत्र की रक्षा के लिए है और वही काम कर रहा है।

    केसी वेणुगोपाल ने इस लड़ाई को विपक्ष के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि उनका सीधा मकसद देश के आम लोगों और मतदाताओं की रक्षा करना है। उनके मुताबिक, विपक्ष इसी उद्देश्य के साथ काम कर रहा है और उसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी कोशिश जारी रखनी है।

    इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम के बीच नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता जनपथ पर जमा हुए। वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की दूसरी लंच बैठक आयोजित की। विपक्षी नेताओं की गतिविधियों के बीच राष्ट्रपति से मुलाकात का मुद्दा भी सामने है। INDIA गठबंधन के नेताओं ने मुलाकात के लिए दो बार अनुरोध भेजा है, लेकिन कांग्रेस के मुताबिक अभी तक जवाब नहीं आया है।

    कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए 7, 8 और 9 अक्टूबर की तारीखों में समय मांगा गया था। 8 अक्टूबर को भी जवाब नहीं मिलने के बाद अब विपक्षी नेता अगले दिन तक इंतजार करने की बात कह रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से मुलाकात के लिए कब समय दिया जाता है और INDIA गठबंधन के नेताओं की राष्ट्रपति से मुलाकात कब होती है, इस पर अब नजर बनी हुई है।