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  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसेवा के 25 साल पूरे होने पर अपने राजनीतिक सफर और सुशासन की सोच साझा की।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसेवा के 25 साल पूरे होने पर अपने राजनीतिक सफर और सुशासन की सोच साझा की।

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार 7 अक्टूबर को सरकार के प्रमुख के रूप में लोकसेवा के 25 साल पूरे होने के मौके पर जनता से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक सफर को याद करते हुए कहा कि जब उन्होंने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, तब उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह इस मुकाम तक पहुंचेंगे। उन्होंने इस पूरे सफर के लिए देश के लोकतंत्र और संविधान के प्रति आभार व्यक्त किया।

    दिल्ली में आयोजित ‘सेवा ज्योति’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 25 वर्षों तक सरकार का हिस्सा बने रहना उनके लिए केवल एक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह जनता की सेवा से जुड़ी एक लंबी यात्रा है। उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक दिनों से लेकर सरकार के प्रमुख के रूप में जिम्मेदारियां संभालने तक के सफर का उल्लेख किया। इस दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी बड़े पद को लक्ष्य बनाकर राजनीति में कदम नहीं रखा था।

    प्रधानमंत्री ने अच्छे शासन की अपनी सोच पर बात करते हुए ‘सबका साथ, सबका विकास’ को इसका आधार बताया। उन्होंने कहा कि समाज को राजनीति के लिए वोट-बैंक के आधार पर बांटने से कई समस्याएं पैदा हुईं। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी खेत तक पानी नहीं पहुंचता है तो उसका नुकसान केवल किसी एक जाति के किसान को नहीं होता। इसी तरह बिजली की कमी से पैदा होने वाला अंधेरा किसी एक समुदाय के घर तक सीमित नहीं रहता।

    उन्होंने कहा कि जब किसी समस्या का असर समाज के सभी वर्गों पर पड़ता है तो उसके समाधान का लाभ भी सभी को मिलना चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने अच्छे शासन को ‘सैचुरेशन’ से जोड़ने की बात कही। उनके अनुसार सैचुरेशन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार की योजनाओं और सुविधाओं के लिए पात्र प्रत्येक लाभार्थी तक उनका लाभ पहुंचे। कोई पात्र व्यक्ति छूटे नहीं और किसी हकदार को उसके अधिकार से वंचित न होना पड़े, यही इस व्यवस्था का लक्ष्य है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने राजनीति में आने से पहले के अनुभवों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने आदिवासी इलाकों में काम किया और पहाड़ों में भी समय बिताया। इन अनुभवों के बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में संगठन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने अपने शुरुआती दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय उन्होंने खुद चुनाव लड़ने या किसी बड़े पद पर पहुंचने की योजना नहीं बनाई थी।

    उन्होंने कहा कि जीवन को निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि किसी उद्देश्य के लिए जीना चाहिए। इसी विचार को उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की दिशा से जोड़ा। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद शुरू हुआ उनका सरकार से जुड़ा सफर अब 25 वर्ष पूरे कर चुका है। इस अवसर पर उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता तथा जनता के प्रति जिम्मेदारी को भी रेखांकित किया।

    ‘सेवा ज्योति’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के संबोधन का प्रमुख केंद्र सुशासन, समान रूप से विकास का लाभ पहुंचाने और सार्वजनिक जीवन में सेवा की भावना रहा। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर के विभिन्न पड़ावों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने कभी इस मुकाम तक पहुंचने की कल्पना नहीं की थी। उनके अनुसार, सार्वजनिक जीवन में उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ से ऊपर होना चाहिए और शासन का लक्ष्य सभी तक सुविधाओं और योजनाओं का लाभ पहुंचाना होना चाहिए।

  • मल्लिकार्जुन खड़गे ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- लोकतंत्र को कमजोर कर रही चुनाव प्रक्रिया

    मल्लिकार्जुन खड़गे ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- लोकतंत्र को कमजोर कर रही चुनाव प्रक्रिया

    नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मंगलवार को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र की मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। दिल्ली के इंदिरा भवन में हुई बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग को लेकर चर्चा की गई। खड़गे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मोदी सरकार की कठपुतली बन गए हैं और मतदाता सूची से नाम हटाकर लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया।

    खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने देश के पूर्वजों द्वारा बनाई गई मजबूत लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया है। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में उन्होंने कहा कि पूरा देश अब जानता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का उद्देश्य भाजपा को लाभ पहुंचाना है। खड़गे ने ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि जिनके दबाव में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर ऐसा किया, प्रधानमंत्री मोदी को भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी की चिंताओं को बैठक में रखा।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर भी अपनी मांग सामने रखी। उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन्हें इसकी पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने और अपील करने का अवसर भी मिलना चाहिए। खड़गे ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा और फैसलों में पारदर्शिता की मांग की। उनका कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव से जुड़े निर्णयों के संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता बनी रहे।

    खड़गे ने कहा कि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी एक बार फिर कांग्रेस के कंधों पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों के दौरान देश की मजबूत लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया है। उनके अनुसार, चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर चर्चा की गई।

    मंगलवार की बैठक में खड़गे के बयानों के केंद्र में चुनाव आयोग की भूमिका, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनावी फैसलों में पारदर्शिता के मुद्दे रहे। खड़गे ने अपने आरोपों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई और प्रधानमंत्री मोदी से भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है।

  • राहुल गांधी ने चुनावी व्यवस्था पर उठाए सवाल, कहा लोकतंत्र कमजोर होने पर एंटी-इन्कंबेंसी का असर भी खत्म होता है

    राहुल गांधी ने चुनावी व्यवस्था पर उठाए सवाल, कहा लोकतंत्र कमजोर होने पर एंटी-इन्कंबेंसी का असर भी खत्म होता है

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एंटी-इन्कंबेंसी, लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग पर कई सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में चुनावी प्रक्रिया के दौरान गड़बड़ियां हो रही हैं और मतदाताओं के वोट की सुरक्षा को लेकर गंभीर स्थिति पैदा हुई है। राहुल गांधी ने कहा कि वोट की ताकत कमजोर होने का असर संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है।

    राहुल गांधी ने एंटी-इन्कंबेंसी को भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता बताते हुए कहा कि आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार के खिलाफ समय के साथ विरोध की भावना विकसित होती है। उन्होंने पूर्व की सरकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि लोकप्रियता के चरम पर पहुंचने के बाद भी कुछ वर्षों में सत्ता विरोधी माहौल बना। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के मामले में ऐसा प्रभाव दिखाई क्यों नहीं देता।

    उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में सत्ता विरोधी भावना कमजोर होने को समझने के लिए चुनावी प्रक्रिया पर भी नजर डालनी होगी। राहुल गांधी ने कुछ देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं होती, वहां सत्ता विरोधी भावना का प्रभाव भी दिखाई नहीं देता। उन्होंने इसी संदर्भ में भारत में वोट के अधिकार और उसकी सुरक्षा को बेहद महत्वपूर्ण बताया।

    राहुल गांधी ने दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनाव सहित विभिन्न विधानसभा चुनावों में चुनावी गड़बड़ियां हुई हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी गंभीर आरोप लगाए और उनके इस्तीफे की मांग की। राहुल ने कहा कि चुनाव आयोग की मूल जिम्मेदारी नागरिकों के वोट की सुरक्षा करना है और इस जिम्मेदारी में किसी भी तरह की चूक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है।

    उन्होंने अपने पहले के आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कथित वोट चोरी का असर केवल मतदान तक सीमित नहीं रहता। उनके अनुसार, यदि मताधिकार प्रभावित होता है तो उसके बाद कानून बनाने वाली व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। राहुल गांधी ने कहा कि वह इस मुद्दे को केवल चुनावी गड़बड़ी के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे नागरिकों के प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से जुड़ा विषय मानते हैं।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया। इन आपत्तियों में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने से जुड़े आदेशों तथा मतदाता डेटा की सुरक्षा जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।

    फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी आपत्ति सामने आने की बात कही गई। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म में SIR से जुड़ा सवाल जोड़े जाने पर नियमों में संशोधन की आवश्यकता को लेकर सवाल उठाया गया था। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से इस विषय पर आपत्ति दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।

    वहीं, चुनाव आयोग ने अपने भीतर होने वाली लिखित टिप्पणियों, सुझावों, तकनीकी राय और आंतरिक विचार-विमर्श को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। आयोग का कहना है कि वह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसकी कार्रवाई संविधान, कानून तथा निर्धारित निर्देशों के तहत होती है।

    राहुल गांधी ने कहा कि मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए जरूरी है। उन्होंने चुनावी गड़बड़ियों के आरोपों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग दोहराई।

  • अभिजीत दीपके अचानक दिल्ली रवाना, ज्ञानेश कुमार का लिया नाम; चुनाव आयोग पर नए विरोध के संकेत

    अभिजीत दीपके अचानक दिल्ली रवाना, ज्ञानेश कुमार का लिया नाम; चुनाव आयोग पर नए विरोध के संकेत

    नई दिल्ली ।कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके समेत संगठन के प्रमुख नेता अपने तय कार्यक्रम रद्द कर तत्काल दिल्ली रवाना हुए हैं। संगठन ने गुरुवार को राजधानी में एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की घोषणा की है। इस घटनाक्रम के बाद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर संगठन की ओर से नए कदम या विरोध कार्यक्रम की घोषणा किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

    अभिजीत दीपके के साथ आशुतोष रांका और सौरभ दास भी दिल्ली पहुंचने की तैयारी में जुटे हैं। नेताओं ने अपने पहले से तय कार्यक्रमों को रद्द करने की जानकारी दी है। दीपके ने एक पोस्ट में कहा कि वह महाराष्ट्र और गुजरात सीमा क्षेत्र में थे, लेकिन अब दिल्ली की उड़ान पकड़ने के लिए लौट रहे हैं। इसी संदेश में उन्होंने ज्ञानेश कुमार का भी उल्लेख किया।

    इससे पहले दीपके ने चुनाव आयोग में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली में जरूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस की जानकारी दी थी। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के नाम का उल्लेख करते हुए संकेत दिया था कि संगठन अब चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े मुद्दों को अपने अभियान का हिस्सा बना सकता है।

    आशुतोष रांका ने भी कहा था कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से जुड़ी हालिया घटनाओं को देखते हुए उन्होंने अपने पहले से तय कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। उनके मुताबिक, संगठन के प्रमुख नेता तत्काल दिल्ली के लिए रवाना हो रहे हैं और वहां अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी बात रखेंगे।

    पहले इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का समय दोपहर 12 बजे बताया गया था, लेकिन बाद में इसे दोपहर 2 बजे करने की जानकारी दी गई। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास के शामिल होने की बात कही गई है। संगठन ने इसके लिए लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखा है।

    यह घटनाक्रम चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच सामने आया है। चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची की समीक्षा को लेकर कई राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ भी अलग-अलग आपत्तियां और मांगें सामने आई हैं। इन मुद्दों को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित अन्य मांगों की चर्चा भी जारी है।

    वहीं, चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि एसआईआर समेत उसके फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए जाते हैं। आयोग के अनुसार, मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा कोई नई प्रक्रिया नहीं है और पहले भी अलग-अलग समय पर ऐसी कवायद की जाती रही है। इस बार तकनीक के इस्तेमाल से प्रक्रिया को अधिक व्यापक और व्यवस्थित बनाने की बात कही गई है।

    चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि निर्णय प्रक्रिया में अधिकारियों के बीच मतभेद या अलग-अलग विचार होना अपने आप में संस्थागत टकराव का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। आयोग के अनुसार अंतिम निर्णय सभी संबंधित अधिकारियों की सहमति से लिए जा रहे हैं।

    ऐसे में अब दिल्ली में होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर नजर बनी हुई है। अभिजीत दीपके और संगठन के अन्य नेताओं के दिल्ली पहुंचने तथा ज्ञानेश कुमार का लगातार उल्लेख किए जाने से यह स्पष्ट है कि चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दे उनके अगले सार्वजनिक अभियान में प्रमुखता से उठ सकते हैं। हालांकि प्रेस कॉन्फ्रेंस में संगठन की ओर से कौन से ठोस कदम या नए कार्यक्रम घोषित किए जाएंगे, इसकी जानकारी आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • मंत्री विश्वास सारंग का राहुल गांधी पर हमला, सोनिया गांधी के वोट को लेकर उठाए सवाल

    मंत्री विश्वास सारंग का राहुल गांधी पर हमला, सोनिया गांधी के वोट को लेकर उठाए सवाल


    मध्य प्रदेश:
    सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कांग्रेस के शासनकाल में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने सोनिया गांधी से जुड़े मतदाता सूची के मामले का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप लगाए।

    सारंग ने कहा कि कांग्रेस के समय लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का किस तरह मजाक बनाया जाता था, इसका उदाहरण सोनिया गांधी से जुड़ा मामला है। उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि उस दौर में लोकतंत्र की व्यवस्था को लेकर कई ऐसे सवाल सामने आए, जिनका जवाब दिया जाना चाहिए।

    मंत्री ने सोनिया गांधी के मतदाता सूची में नाम और उनके मतदान को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान में मतदान के अधिकार से संबंधित स्पष्ट प्रावधान हैं और केवल पात्र नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्राप्त है। इसी आधार पर उन्होंने पूछा कि सोनिया गांधी किस हैसियत से वोट दे रही थीं।

    विश्वास सारंग ने राहुल गांधी के संविधान के पालन से जुड़े बयानों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी बार-बार संविधान की बात करते हैं, लेकिन मतदान के अधिकार से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

    उन्होंने कांग्रेस पर देश में लंबे समय से कथित वोट चोरी करने का आरोप लगाया। सारंग ने कहा कि यदि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज है, जो भारत का नागरिक नहीं है और उसने मतदान भी किया है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है।

    मंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची और मतदान व्यवस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता तथा नियमों का पालन जरूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए।

    सारंग ने अपने बयान में कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास का भी उल्लेख किया। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के सत्ता में आने के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तरह से उनके अनुसार पीछे के दरवाजे से सत्ता हासिल की गई थी, उसी राजनीतिक सोच के प्रभाव आज भी कांग्रेस में दिखाई देते हैं।

    उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा संविधान और लोकतंत्र को लेकर उठाए जा रहे मुद्दों पर भी सवाल खड़े किए। सारंग का कहना था कि कांग्रेस को पहले अपने शासनकाल और उससे जुड़े विवादों पर जवाब देना चाहिए, उसके बाद लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाने चाहिए।

    मंत्री ने कहा कि देश की चुनावी व्यवस्था में मतदाता सूची का विशेष महत्व है। किसी योग्य नागरिक का नाम छूटना या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल होना चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है। इसलिए ऐसे मामलों की जांच और तथ्यों की स्पष्टता जरूरी है।

    सोनिया गांधी के मतदाता सूची से जुड़े मामले का उल्लेख करते हुए सारंग ने कांग्रेस पर राजनीतिक हमला तेज किया। उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस के लोकतंत्र तथा संविधान से जुड़े दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को अपने अतीत और वर्तमान में उठ रहे सवालों का भी सामना करना चाहिए।

    विश्वास सारंग के बयान के बाद मतदाता सूची, मतदान के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दे एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। उनके आरोपों के केंद्र में कांग्रेस का शासनकाल, सोनिया गांधी से जुड़ा मतदाता सूची का मुद्दा और राहुल गांधी के संविधान संबंधी बयान रहे।

  • SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    नई दिल्ली । मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों ने राजनीतिक विवाद को तेज कर दिया है। सामने आई जानकारी के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति दर्ज की। इनमें Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR से जुड़े फैसलों सहित कई मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

    विपक्षी दलों ने इन जानकारियों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने SIR और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वोट चोरी भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला है। उन्होंने इस मामले में न्याय मिलने की बात भी कही।

    तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव लाने की मांग की। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के फैसले अकेले कैसे लिए जा सकते हैं। वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पर गंभीरता से विचार करने की मांग की।

    विवाद का एक प्रमुख मुद्दा Form-6 में किया गया बदलाव है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें SIR से संबंधित एक अतिरिक्त सवाल शामिल किया गया था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव करने के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

    मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस और उसके सॉफ्टवेयर के नियंत्रण को लेकर भी चिंता सामने आई है। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी है, जिनके बारे में कहा गया कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पूरी जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाया गया।

    SIR से जुड़ी अपील प्रक्रिया और कुछ राज्यों में मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इन घटनाक्रमों के बीच चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर सामने आए मतभेद के दावों को अलग तरीके से स्पष्ट किया है। आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं।

    चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला किए जाने का प्रावधान है। ऐसे में SIR को लेकर सामने आई आपत्तियों और आयोग के स्पष्टीकरण के बीच विवाद का केंद्र चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता बन गया है।

  • संसद में हंगामे पर किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी को घेरा, कहा बहस छोड़कर राजनीतिक दबाव की रणनीति नहीं चलेगी

    संसद में हंगामे पर किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी को घेरा, कहा बहस छोड़कर राजनीतिक दबाव की रणनीति नहीं चलेगी

    नई दिल्ली ।केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद के मॉनसून सत्र में लगातार हुए हंगामे और सदन की कार्यवाही बाधित होने को लेकर विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि संसद किसी एक दल की नहीं, बल्कि देश की जनता की संस्था है और इसका इस्तेमाल राजनीतिक दबाव या ब्लैकमेल के लिए नहीं किया जाना चाहिए। रिजिजू ने विपक्ष से सदन में सार्थक बहस और संवाद के जरिए मुद्दे उठाने की अपील की।

    रिजिजू ने संसद की कार्यवाही बाधित किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रश्नकाल को रोकना, मंत्रियों की बात नहीं सुनना और चर्चा के प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है। उनका कहना था कि एक तरफ विपक्ष सदन में चर्चा नहीं होने की शिकायत करता है और दूसरी तरफ जब विस्तृत बहस का अवसर दिया जाता है तो उसे स्वीकार नहीं करता।

    संसदीय कार्य मंत्री ने मॉनसून सत्र की कार्यवाही के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक लोकसभा निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत और राज्यसभा लगभग 33 प्रतिशत ही चल सकी। बार-बार होने वाले व्यवधानों के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। रिजिजू ने कहा कि संसद में जनता से जुड़े विषयों पर चर्चा होना जरूरी है और लगातार हंगामे से लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है।

    रिजिजू ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन से जुड़े मुद्दे को लेकर भी राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय देने और सवालों के जवाब देने का प्रस्ताव रखा था। रिजिजू के अनुसार, राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि जब चर्चा का अवसर उपलब्ध कराया जा रहा हो तो उसे अस्वीकार करने के बाद संसद में पर्याप्त चर्चा नहीं होने की शिकायत करना उचित नहीं है।

    केंद्रीय मंत्री ने राहुल गांधी की संसदीय उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि 17वीं लोकसभा में राहुल गांधी की उपस्थिति 51 प्रतिशत रही। रिजिजू ने कहा कि संसद में लंबी बहस के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करने वाले नेता को सदन में पर्याप्त समय नहीं मिलने की शिकायत नहीं करनी चाहिए।

    उन्होंने राहुल गांधी के विदेश दौरों का उल्लेख करते हुए भी उन पर निशाना साधा। रिजिजू ने आरोप लगाया कि विदेशों में भारतीय लोकतंत्र को लेकर सवाल उठाने के बजाय संसद के भीतर जवाबदेही और चर्चा की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता हंगामा नहीं, बल्कि संवाद और तथ्य आधारित बहस है।

    रिजिजू ने राहुल गांधी के हालिया पितृसत्ता संबंधी बयान को लेकर भी सवाल उठाए। राहुल गांधी ने पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान महिलाओं की स्वतंत्रता और पितृसत्तात्मक सोच पर बात की थी। उन्होंने मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए महिलाओं को पिता, पति और बच्चों की संपत्ति मानने वाली सोच की आलोचना की थी।

    इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए रिजिजू ने पूछा कि कांग्रेस और राहुल गांधी हिंदू परंपराओं को ही निशाना क्यों बनाते हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक महिलाओं की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि समाज को बांटने के बजाय बेटियों को समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। दोनों नेताओं के बयानों से संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस तेज होने के संकेत हैं।

  • कॉल्विन तालुकदार्स कॉलेज पहुंचे मुख्य निर्वाचन आयुक्त, पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को समझाई जिम्मेदारी

    कॉल्विन तालुकदार्स कॉलेज पहुंचे मुख्य निर्वाचन आयुक्त, पहली बार मतदान करने वाले युवाओं को समझाई जिम्मेदारी

    नई दिल्ली ।भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार सोमवार को लखनऊ स्थित अपने पुराने विद्यालय कॉल्विन तालुकदार्स कॉलेज पहुंचे। कभी जिस संस्थान में उन्होंने विद्यार्थी के रूप में शिक्षा हासिल की थी, वहीं लौटकर उन्होंने कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों से संवाद किया। इस दौरान उनका अंदाज शिक्षक जैसा रहा और उन्होंने छात्रों को लोकतंत्र, चुनाव, मताधिकार तथा जिम्मेदार नागरिकता से जुड़े विषयों की जानकारी दी।

    अपने छात्र जीवन को याद करते हुए ज्ञानेश कुमार ने कहा कि विद्यालय केवल किताबी ज्ञान हासिल करने की जगह नहीं होता, बल्कि यह व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। उनके अनुसार, अच्छे शिक्षक, अनुशासन और विद्यालय का वातावरण विद्यार्थियों के सोचने और आगे बढ़ने के तरीके को प्रभावित करते हैं। उन्होंने अपने जीवन में विद्यालय से मिली सीख को भी याद किया।

    उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि स्कूल और कॉलेज का समय जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दौर में शामिल होता है। इसी दौरान व्यक्ति के विचार, व्यवहार और भविष्य की दिशा तय होने लगती है। उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे अपने शिक्षकों की बातों और विद्यालय में मिलने वाले अनुभवों को गंभीरता से लें और उनसे सीखने की प्रवृत्ति बनाए रखें।

    विद्यार्थियों के साथ बातचीत में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में युवाओं की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मतदान केवल संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि देश के भविष्य के निर्माण में नागरिकों की भागीदारी का माध्यम भी है। जागरूक और जिम्मेदार मतदाता लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    ज्ञानेश कुमार ने विद्यार्थियों को मताधिकार से जुड़ी जिम्मेदारियों को समझने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि कक्षा 11वीं और 12वीं में पढ़ने वाले कई विद्यार्थी आने वाले वर्षों में पहली बार मतदान करने की उम्र में पहुंचेंगे। ऐसे में उनके लिए अभी से चुनाव प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों की समझ विकसित करना उपयोगी होगा।

    संवाद के दौरान विद्यार्थियों ने चुनाव प्रक्रिया, मतदाता बनने की पात्रता, मतदान और निष्पक्ष चुनाव से जुड़े सवाल पूछे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने उनकी जिज्ञासाओं का जवाब देते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं में युवाओं की सक्रिय भागीदारी के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए नागरिकों का जागरूक होना आवश्यक है।

    कॉल्विन तालुकदार्स कॉलेज पहुंचने पर ज्ञानेश कुमार ने अपने पुराने दिनों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि लखनऊ से उनका पुराना और गहरा संबंध रहा है। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया और अब लंबे अंतराल के बाद उसी विद्यालय में विद्यार्थियों के बीच लौटना उनके लिए विशेष अनुभव रहा।

    उन्होंने विद्यार्थियों को समझाया कि जीवन के अलग-अलग चरण व्यक्ति को अलग-अलग अनुभव देते हैं। वर्तमान समय उनके लिए सीखने और अपने भविष्य की नींव मजबूत करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि विद्यालय से मिलने वाली शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए अनुशासन, चुनौतियों का सामना करने का साहस और सही विचारों को अपनाने की क्षमता भी विकसित करती है।

    इस मुलाकात को ज्ञानेश कुमार ने अतीत और वर्तमान के बीच संवाद जैसा अनुभव बताया। एक समय वह स्वयं इसी विद्यालय के विद्यार्थी थे और अब उसी परिसर में विद्यार्थियों को लोकतंत्र और नागरिक जिम्मेदारियों के बारे में बता रहे थे। कार्यक्रम में चुनावी साक्षरता और जागरूक मतदाता बनने का संदेश प्रमुख रहा। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को देखते हुए युवा विद्यार्थियों के बीच लोकतांत्रिक जागरूकता बढ़ाने की यह पहल विशेष महत्व रखती है।

  • राजीव गांधी की जयंती पर वीर भूमि पहुंचे सोनिया, राहुल और प्रियंका, पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

    राजीव गांधी की जयंती पर वीर भूमि पहुंचे सोनिया, राहुल और प्रियंका, पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

    नई दिल्ली ।भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती पर गुरुवार को देशभर में उन्हें याद किया गया। 20 अगस्त को मनाए जाने वाले इस अवसर को सद्भावना दिवस के रूप में भी जाना जाता है। दिल्ली स्थित वीर भूमि पर राजीव गांधी की समाधि पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

    कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने वीर भूमि पहुंचकर राजीव गांधी की समाधि पर पुष्प अर्पित किए। इस दौरान कांग्रेस नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री के राजनीतिक जीवन, विचारों और देश के विकास में उनके योगदान को याद किया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजीव गांधी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश के जरिए पूर्व प्रधानमंत्री को याद करते हुए उनके योगदान को नमन किया। इसके अलावा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित अन्य नेताओं ने भी राजीव गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की।

    राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को हुआ था। वह देश के ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जिन्होंने अपेक्षाकृत कम उम्र में यह जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने देश की बागडोर संभाली और 40 वर्ष की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। वह 1984 से 1989 तक इस पद पर रहे।

    राजीव गांधी के कार्यकाल को भारत में तकनीक, संचार, शिक्षा और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए भी याद किया जाता है। उनके समर्थक उन्हें युवा भारत की बदलती जरूरतों और तकनीकी विकास के साथ देश को आगे बढ़ाने वाले नेताओं में शामिल करते हैं। उनके राजनीतिक विचारों में युवाओं की भागीदारी और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर विशेष जोर रहा।

    कांग्रेस नेताओं ने जयंती के अवसर पर राजीव गांधी की उस विरासत को भी रेखांकित किया, जिसमें युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने और देश में आधुनिक तकनीकी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया था। मतदान की न्यूनतम उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष करने का संवैधानिक बदलाव भी उनके प्रधानमंत्रित्व काल की महत्वपूर्ण पहलों में गिना जाता है। इससे बड़ी संख्या में युवाओं को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिला।

    राजीव गांधी का राजनीतिक जीवन हालांकि उपलब्धियों के साथ-साथ कई विवादों और चुनौतियों से भी जुड़ा रहा। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी वह राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनावी सभा के दौरान आत्मघाती हमले में उनकी हत्या कर दी गई थी।

    राजीव गांधी की जयंती पर होने वाले कार्यक्रम हर वर्ष उनकी सार्वजनिक और राजनीतिक विरासत को याद करने का अवसर बनते हैं। वीर भूमि पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे नेताओं ने उनके योगदान को स्मरण करते हुए देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, तकनीकी प्रगति और युवाओं की भूमिका से जुड़े उनके विचारों को रेखांकित किया। इस अवसर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं का एक साथ पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देना उनके राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन की व्यापक पहचान को भी दर्शाता है।

  • सीजेपी समर्थकों ने संगठन में लोकतंत्र की मांग उठाई, कोर टीम से नहीं मिलने पर अभिजीत दीपके पर लगाए आरोप

    सीजेपी समर्थकों ने संगठन में लोकतंत्र की मांग उठाई, कोर टीम से नहीं मिलने पर अभिजीत दीपके पर लगाए आरोप

    नई दिल्ली । कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी में संगठनात्मक स्तर पर असंतोष के स्वर सामने आए हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले महीने हुए छात्र आंदोलन में शामिल होने का दावा करने वाले दो युवकों ने शुक्रवार को सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के आवास के बाहर धरना दिया। प्रदर्शनकारियों ने संगठन के कामकाज और आंदोलन की आगे की रणनीति को लेकर गंभीर सवाल उठाए।

    अहमदाबाद से आए मनीष ब्रह्मभट्ट और राहुल पांड्या ने दीपके के आवास के बाहर पहुंचकर सड़क पर बैठकर विरोध जताया। दोनों युवकों ने दावा किया कि उन्होंने सीजेपी से जुड़े आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था, लेकिन इसके बाद उन्हें संगठन की कोर टीम से मिलने का अवसर नहीं दिया गया। इसी मुद्दे को लेकर उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू किया।

    प्रदर्शनकारियों का कहना था कि आंदोलन किसी एक व्यक्ति या सीमित समूह तक केंद्रित नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, यह आंदोलन देशभर के युवाओं से जुड़ा हुआ है और इसकी आगे की रणनीति तय करने में आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    मनीष ब्रह्मभट्ट ने आरोप लगाया कि आंदोलन शुरू होने के समय इसका कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था और उन्होंने तथा कई अन्य स्वयंसेवकों ने जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में योगदान दिया था। उनका कहना था कि इसके बाद उन्होंने सीजेपी की टीम से संपर्क कर बैठक में शामिल होने की कोशिश की, लेकिन उन्हें संगठन की बैठक में बुलाया नहीं गया।

    ब्रह्मभट्ट ने संगठन के निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आंदोलन की आगे की रणनीति केवल कुछ रिश्तेदारों और मित्रों के बीच बैठकर तय नहीं की जानी चाहिए। उनके अनुसार, आंदोलन से जुड़े लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना और उनके सुझाव सुनना जरूरी है।

    प्रदर्शनकारियों ने सीजेपी में लोकतांत्रिक तरीके से कामकाज की मांग रखी। उनका कहना था कि यदि संगठन युवाओं के नेतृत्व और भागीदारी की बात करता है तो आंदोलन से जुड़े युवाओं को भी अपनी राय रखने और संगठन की दिशा तय करने में योगदान देने का अवसर मिलना चाहिए।

    प्रदर्शन के दौरान युवकों ने अभिजीत दीपके के खिलाफ नाराजगी जताते हुए कहा कि वे संगठन में ऐसी व्यवस्था नहीं चाहते, जिसमें निर्णय सीमित लोगों के स्तर पर लिए जाएं। प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध को आगे भी जारी रखने की बात कही और आवास के बाहर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया।

    मनीष ब्रह्मभट्ट ने यह भी कहा कि युवाओं के नेतृत्व में चलने वाले किसी भी संगठन के लिए पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। उन्होंने आंदोलन से जुड़े अन्य लोगों को भी सुझाव देने और रणनीति पर चर्चा के लिए आमंत्रित किए जाने की मांग की।

    सीजेपी समर्थकों के इस विरोध से संगठन के भीतर नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया और कार्यकर्ताओं की भागीदारी को लेकर बहस शुरू होने के संकेत मिले हैं। फिलहाल प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग यही है कि आंदोलन से जुड़े लोगों को संगठन की बैठकों और रणनीतिक फैसलों में अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए। अभिजीत दीपके की ओर से लगाए गए आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया सामने आती है, यह घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण पहलू होगा।