Tag: Devotion

  • भारत के अति प्राचीन रहस्यमयी मंदिर, जिनकी अनसुलझी पहेलियों और अकल्पनीय चमत्कारों के सामने विज्ञान भी हुआ नतमस्तक

    भारत के अति प्राचीन रहस्यमयी मंदिर, जिनकी अनसुलझी पहेलियों और अकल्पनीय चमत्कारों के सामने विज्ञान भी हुआ नतमस्तक


    नई दिल्ली ।
    भारत की पहचान सदियों से उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य कला के बेजोड़ उदाहरण माने जाने वाले प्राचीन मंदिरों से रही है। देश के विभिन्न भूभागों में स्थित कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहां की परंपराएं और अनोखी विशेषताएं आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी कौतूहल का विषय बनी हुई हैं। इन मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं न केवल श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का प्रतीक हैं, बल्कि इनके निर्माण और चमत्कारों के पीछे छिपे रहस्यों को समझ पाना आज भी शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

    उत्तरी भारत के राजस्थान राज्य में स्थित कई प्रमुख मंदिर अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए जाने जाते हैं। बीकानेर के प्रसिद्ध देवी मंदिर में हजारों की संख्या में रहने वाले चूहों की मौजूदगी और उन्हें दिए जाने वाले प्रसाद की परंपरा अद्भुत मानी जाती है। इसी प्रकार धौलपुर क्षेत्र में चंबल नदी के निकट स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के दिन में तीन बार रंग बदलने की मान्यता भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। दौसा जिले में स्थित हनुमान मंदिर में भी नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति और आध्यात्मिक शांति के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

    दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर की अपनी अलग भव्यता और धार्मिक महत्ता है। इस मंदिर परिसर से जुड़ी अनेक धार्मिक कल्पनाएं और प्राकृतिक ध्वनियों की अनुभूति श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित करती है। असम के गुवाहाटी में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या देवी का स्थल भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है, जहां प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    तटीय राज्यों की बात करें तो गुजरात के अरब सागर तट पर स्थित शिव मंदिर ज्वार-भाटे की प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण दिन में दो बार समुद्र के पानी में पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और पानी उतरने पर पुनः स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। भावनगर तट के समीप स्थित एक अन्य शिव मंदिर में भी समुद्र की लहरें प्राकृतिक रूप से शिवलिंग का जलाभिषेक करती हैं, जहां भक्त केवल पानी का स्तर घटने पर ही पैदल पहुंचकर पूजा-अर्चना कर पाते हैं।

    मध्य प्रदेश के तटीय और सीमावर्ती जिलों में स्थित अनेक प्राचीन मंदिरों की महत्ता भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाती है। भिंड जिले में स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर से जुड़ी जनश्रुतियों के अनुसार श्रद्धालु असाध्य रोगों से राहत पाने की आस में यहां माथा टेकने आते हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी ऐसे मंदिर मौजूद हैं, जहां शिवलिंग पर प्राकृतिक बिजली गिरने के बाद उसका पुनः जुड़ जाना, एक लाख छिद्रों वाले शिवलिंग का अस्तित्व होना अथवा कोणार्क के रथ रूपी सूर्य मंदिर के पहियों से सटीक समय का अनुमान लगाना जैसी अद्भुत विशेषताएं देखने को मिलती हैं।

    इन सभी स्थलों की ऐतिहासिकता, वास्तुकला और धार्मिक अनुष्ठान भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने कई बार इन घटनाओं के पीछे के भौतिक और वैज्ञानिक कारणों को समझने का प्रयास किया है, परंतु अनेक प्रश्नों के उत्तर आज भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सके हैं। यही कारण है कि यह सभी स्थान न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • कोटेश्वर महादेव मंदिर में सावन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़, लेटे शिवलिंग की अनूठी मान्यता बनी आकर्षण

    कोटेश्वर महादेव मंदिर में सावन पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़, लेटे शिवलिंग की अनूठी मान्यता बनी आकर्षण

    नई दिल्ली । देवभूमि उत्तराखंड में स्थित कोटेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और अलौकिक वातावरण के कारण देशभर के शिव भक्तों के लिए अगाध श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सावन के पवित्र महीने के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का विशाल जनसैलाब उमड़ रहा है। दूर-दूर से पहुंचने वाले श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ का जल से अभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष अनुष्ठान संपन्न कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की प्रार्थना कर रहे हैं। पूरे सावन मास में यह पावन क्षेत्र भक्तिमय भजनों और धार्मिक उल्लास से पूरी तरह से सराबोर दिखाई दे रहा है।

    इस प्राचीन मंदिर की सबसे मुख्य विशेषता यहां विराजित शिवलिंग का स्वरूप है। प्रचलित पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां भगवान शिव विश्राम की स्थिति में यानी लेटी हुई मुद्रा में स्थापित हैं। यह दुर्लभ स्वरूप इसे देश के अन्य तमाम पारंपरिक शिव धामों से बिल्कुल अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। श्रद्धालुओं के बीच यह अटूट विश्वास है कि भगवान आशुतोष का यह लेटा हुआ स्वरूप अत्यंत चमत्कारिक और फलदायी है, जहां केवल दर्शन मात्र से ही भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

    मंदिर से जुड़ी एक और बेहद चर्चित और गहरी मान्यता यह है कि यहां मौजूद शिवलिंग प्रतिवर्ष जौ के एक दाने के बराबर स्वयं बढ़ता जाता है। स्थानीय निवासियों और मंदिर के पुजारियों का मानना है कि यह वृद्धि भगवान शिव की प्रत्यक्ष दिव्य शक्ति का ही एक रूप है। यद्यपि यह पूर्ण रूप से जनआस्था और धार्मिक विश्वास का विषय है, लेकिन इसी कौतूहल और श्रद्धा के कारण सावन के अलावा वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला अनवरत जारी रहता है।

    मंदिर परंपरा के अनुसार कोटेश्वर शब्द का शाब्दिक अर्थ एक करोड़ देवी-देवताओं के निवास स्थल से जोड़ा जाता है। मंदिर प्रांगण में शिव कुंड, पार्वती कुंड और सूर्य कुंड भी निर्मित हैं, जिन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है। ऐसी लोकमान्यता है कि इन कुंडों के सान्निध्य में सच्चे भाव से रुद्राभिषेक, जलार्पण और रुद्री पाठ करने से शिव जी प्रसन्न होते हैं। संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपतियों के लिए भी यह स्थान विशेष रूप से मंगलकारी माना गया है।

    सावन के दौरान मंदिर में रोजाना विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य संचालन किया जा रहा है। श्रद्धालु कतारों में लगकर भगवान शिव को प्रिय बेलपत्र, गंगाजल, कच्चा दूध, धतूरा और अन्य पूजन सामग्री समर्पित कर रहे हैं। तड़के मंगला आरती से लेकर देर शाम तक संपूर्ण परिसर हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से गुंजायमान रहता है। श्रद्धालुओं की सहूलियत और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन तथा मंदिर प्रबंधन समिति ने कड़े और सुचारू इंतजाम किए हैं।

    आध्यात्मिक महत्व के अलावा कोटेश्वर महादेव मंदिर अपने अद्भुत प्राकृतिक परिवेश के लिए भी जाना जाता है। भागीरथी नदी के पावन तट पर स्थित यह धाम प्राकृतिक सुंदरता और आत्मिक शांति का एक दुर्लभ समन्वय प्रस्तुत करता है। सावन के महीने में यहां आने वाले भक्त न केवल धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं, बल्कि आसपास के मनोरम प्राकृतिक वातावरण से भी अभिभूत होते हैं। यही कारण है कि यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन के दृष्टिकोण से भी बेहद खास पहचान रखता है।

  • सावन के पहले सोमवार काशी शिवमय: बाबा विश्वनाथ धाम में चार लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन

    सावन के पहले सोमवार काशी शिवमय: बाबा विश्वनाथ धाम में चार लाख श्रद्धालुओं ने किए दर्शन


    वाराणसी। सावन के पहले सोमवार पर काशी पूरी तरह शिवमय नजर आई। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम सहित जिले के सभी प्रमुख शिवालयों में तड़के से ही श्रद्धालुओं और कांवड़ियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक और दर्शन के लिए श्रद्धालु रविवार रात से ही कतारों में डटे रहे। सोमवार दोपहर तक करीब चार लाख श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर नया रिकॉर्ड बनाया।

    भोर चार बजे से शुरू हुआ जलाभिषेक
    विश्वनाथ धाम में सुबह चार बजे मंगला आरती के बाद जलाभिषेक शुरू हुआ। मंदिर प्रशासन ने कांवड़ियों का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। पूरी काशी में “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के जयघोष गूंजते रहे। श्रद्धालु रातभर बैरिकेडिंग में अपनी बारी का इंतजार करते हुए भजन-कीर्तन और शिव आराधना में लीन रहे।

    प्रमुख शिवालयों में भी उमड़ी आस्था
    काशी विश्वनाथ धाम के अलावा मार्कंडेय महादेव, महामृत्युंजय महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, शूलटंकेश्वर और रामेश्वर महादेव सहित अन्य शिवालयों में भी सुबह से जलाभिषेक के लिए लंबी कतारें लगी रहीं। पूर्वांचल के कई जिलों से पहुंचे कांवड़ियों ने गंगा और गोमती संगम में स्नान कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया।

    40 हजार यादव बंधुओं की ऐतिहासिक जलाभिषेक यात्रा
    चंद्रवंशी गोप सेवा समिति के बैनर तले करीब 40 हजार यादव बंधुओं ने अपनी पारंपरिक जलाभिषेक यात्रा निकाली। 94वें वर्ष आयोजित इस यात्रा की शुरुआत गौरी केदारेश्वर महादेव मंदिर से हुई। श्रद्धालुओं ने लगभग 17 किलोमीटर की यात्रा के दौरान श्रीकाशी विश्वनाथ समेत नौ प्रमुख शिवालयों में जलाभिषेक किया। परंपरा के अनुसार इस बार भी केवल 21 यादव बंधुओं को गर्भगृह में जलाभिषेक की अनुमति मिली।

    कांवड़ शिविरों में गूंजे भजन-कीर्तन
    शहर के चितरंजन पार्क, लक्सा, मंडुवाडीह, मैदागिन समेत विभिन्न स्थानों पर बने कांवड़ शिविरों में रविवार रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु रुके। यहां भजन-कीर्तन, शिव आराधना और विश्राम का सिलसिला चलता रहा। सोमवार सुबह गंगा स्नान के बाद श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए विभिन्न मंदिरों की ओर रवाना हुए। सावन के पहले सोमवार पर काशी में उमड़ी यह आस्था और श्रद्धा एक बार फिर भगवान शिव के प्रति भक्तों की अटूट आस्था का सजीव प्रमाण बनी।

  • सावन सोमवार पर मनोकामना अनुसार करें शिवलिंग का अभिषेक, शास्त्रों में बताए गए हैं विशेष धार्मिक उपाय

    सावन सोमवार पर मनोकामना अनुसार करें शिवलिंग का अभिषेक, शास्त्रों में बताए गए हैं विशेष धार्मिक उपाय

    नई दिल्ली । श्रावण मास के पवित्र सोमवार के अवसर पर देश भर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। सनातन धर्म और धार्मिक मान्यताओं में सावन सोमवार का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस पावन अवधि में शिवलिंग का अलग-अलग पवित्र द्रव्यों से अभिषेक करने पर साधक को उसकी विशिष्ट मनोकामनाओं के अनुसार फलों की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

    शिवपुराण के अनुसार, मनोकामना पूर्ति के लिए अभिषेक की सामग्री का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि कोई भक्त मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखता है, तो उसे शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करना चाहिए। वहीं, मानसिक शांति और विचारों की शुद्धता प्राप्त करने के लिए साधारण जल से अभिषेक करने का विधान बताया गया है। उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और गंभीर रोगों से मुक्ति पाने के लिए कच्चे दूध से जलाभिषेक करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    पारिवारिक सुख, शांति और समृद्धि की इच्छा रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए दूध में शक्कर मिलाकर अर्पित करने का सुझाव दिया गया है। इसके अतिरिक्त, वंश वृद्धि, उत्तम संतान की प्राप्ति तथा शारीरिक शक्ति और ऊर्जा में वृद्धि के लिए देसी गाय के शुद्ध घी से अभिषेक करने का महत्व है। कर्ज की समस्या से निजात पाने, वैवाहिक जीवन में मधुरता लाने और कुंडली में शुक्र ग्रह को मजबूत करने के लिए शहद से अभिषेक करना शुभ माना जाता है।

    आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों के लिए शास्त्रों में गन्ने के रस से अभिषेक करने का विधान है। मान्यता है कि गन्ने के रस से जलाभिषेक करने पर घर में धन-धान्य, संपत्ति और यश की वृद्धि होती है। वहीं, जिन युवाओं के विवाह में बाधाएं आ रही हों, वे दूध या जल में थोड़ा केसर मिलाकर शिवलिंग पर अर्पित कर सकते हैं। इसके साथ ही बेलपत्र अर्पित करने से तीनों जन्मों के पापों का नाश होता है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

    मध्य प्रदेश सहित देश के सभी प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और शिवालयों में सावन सोमवार के दिन तड़के से ही पंचामृत और विभिन्न पवित्र नदियों के जल से रुद्रभिषेक का आयोजन किया जा रहा है। श्रद्धालु अपनी-अपनी आस्था और इच्छाओं के अनुसार पूजन सामग्री लेकर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने मंदिरों में पहुंच रहे हैं। संपूर्ण वातावरण हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से गुंजायमान हो रहा है।

  • जामनगर के बाल हनुमान मंदिर में 60 वर्षों से अविरल जारी है राम नाम का अखंड जाप, गिनीज बुक में दर्ज हुआ नाम

    जामनगर के बाल हनुमान मंदिर में 60 वर्षों से अविरल जारी है राम नाम का अखंड जाप, गिनीज बुक में दर्ज हुआ नाम

    नई दिल्ली । भारतीय अध्यात्म और सांस्कृतिक धरोहर की दुनिया में गुजरात का जामनगर शहर एक अनूठी आस्था का केंद्र बना हुआ है। शहर की प्रसिद्ध लखोटा झील के समीप स्थित श्री बाल हनुमान संकीर्तन मंदिर अपने आप में एक अद्भुत और ऐतिहासिक रिकॉर्ड समेटे हुए है। इस पावन धाम में पिछले छह दशकों से बिना एक सेकंड रुके भगवान श्री राम का संकीर्तन निरंतर जारी है, जिसे देखने और सुनने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु खींचे चले आते हैं।

    मंदिर में अखंड जाप की यह पावन परंपरा 1 अगस्त 1964 को शुरू की गई थी। तब से लेकर आज तक, दिन हो या रात, श्री राम, जय राम, जय जय राम की रामधुन निरंतर गूंज रही है। इस संकीर्तन को निर्बाध रूप से चलाने के लिए साधक, पुजारी और श्रद्धालु बारी-बारी से बैठते हैं, जिससे जाप की गति एक क्षण के लिए भी धीमी या बंद नहीं होती। चौबीसों घंटे चलने वाले इस सबसे लंबे अखंड कीर्तन के कारण मंदिर का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया जा चुका है।

    इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान की नींव महान संत श्री प्रेमभिक्षुजी महाराज ने रखी थी। उन्होंने समाज में आध्यात्मिक चेतना और ईश्वर भक्ति के विस्तार के लिए इस निरंतर संकीर्तन की शुरुआत की थी। स्थानीय निवासियों का यह अटूट विश्वास है कि इस मंदिर में गूंजने वाले राम नाम के महामंत्र और दिव्य वातावरण के प्रभाव से ही जामनगर शहर हमेशा बड़ी प्राकृतिक आपदाओं और संकटों से सुरक्षित रहता है।

    संत प्रेमभिक्षुजी महाराज द्वारा शुरू की गई यह पावन परंपरा केवल जामनगर तक ही सीमित नहीं रही। उनकी प्रेरणा से गुजरात के द्वारका, राजकोट, पोरबंदर, जूनागढ़ और महुवा के साथ-साथ बिहार के मुजफ्फरपुर में भी इसी तरह के मंदिरों की स्थापना की गई, जहां 24 घंटे अखंड रामधुन का गायन होता है। देश के 40 से अधिक छोटे-बड़े शहरों में रोजाना विशेष संकीर्तन सभाओं का आयोजन किया जाता है।

    मध्य प्रदेश और देश के विभिन्न प्रांतों से आने वाले श्रद्धालु इस मंदिर में पहुंचकर अद्भुत मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं। मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए दिन-रात खुले रहते हैं, जिससे दूर-दराज से आने वाले भक्त किसी भी समय रात्रि में रुककर संकीर्तन का हिस्सा बन सकते हैं। रामनवमी, हनुमान जयंती और विजयदशमी जैसे बड़े पर्वों पर यहां आस्था का भारी सैलाब उमड़ता है।

  • मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे से जुड़ी है मधुबाला की अनकही कहानी, जानिए हर साल उनके नाम पर क्यों होती है विशेष अरदास

    मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे से जुड़ी है मधुबाला की अनकही कहानी, जानिए हर साल उनके नाम पर क्यों होती है विशेष अरदास

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा जगत की सबसे खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार दिवंगत मधुबाला का जीवन आज भी कई अनसुने किस्सों से भरा हुआ है। अपने अभिनय से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली इस अदाकारा की व्यक्तिगत जिंदगी भले ही तमाम उतार-चढ़ावों से भरी रही, लेकिन उनकी आध्यात्मिक आस्था से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प पहलू सामने आया है जो बहुत कम लोग जानते हैं। मुंबई के अंधेरी स्थित एक प्रसिद्ध गुरुद्वारे में आज भी हर साल गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव पर मधुबाला के नाम से विशेष अरदास की जाती है।

    एक मुस्लिम परिवार में जन्मी मुमताज जहां देहलवी यानी मधुबाला की गुरु नानक देव जी के प्रति अटूट और अगाध श्रद्धा थी। यह आस्था उनके जीवन के उस दौर में शुरू हुई जब वे व्यक्तिगत जीवन की परेशानियों से काफी विचलित थीं। एक परिचित के सुझाव पर जब वे अंधेरी गुरुद्वारे पहुंचीं, तो वहां के ग्रंथि ने उन्हें नियमित रूप से जपजी साहिब का पाठ करने की सलाह दी। गुरमुखी लिपि न आने के कारण उन्होंने फारसी भाषा में छपी जपजी साहिब की प्रति मंगवाई और जीवन के अंतिम समय तक उसका नित्य पाठ करती रहीं।

    संगीत जगत के पुराने दिग्गजों के अनुसार, मधुबाला शूटिंग के दौरान भी खाली समय मिलते ही अपना सिर ढककर इस पवित्र पाठ का अध्ययन किया करती थीं। उनका मानना था कि इस पाठ को करने से उन्हें आंतरिक शांति और संबल मिलता है। गुरु नानक देव जी के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह था कि वे किसी भी फिल्म को साइन करने से पहले निर्माताओं के साथ होने वाले अनुबंध में यह शर्त स्पष्ट रूप से शामिल करवाती थीं कि गुरुपर्व के दिन वे मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे में उपस्थित रहेंगी।

    वर्ष 1969 में अपने निधन से कुछ वर्ष पूर्व मधुबाला ने गुरु पर्व पर लंगर सेवा का संपूर्ण खर्च उठाने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने गुरुद्वारा समिति को इसके लिए आवश्यक सहयोग राशि प्रदान की थी। उनके निधन के बाद भी कई वर्षों तक उनके परिवार ने इस परंपरा को जारी रखा। बाद में गुरुद्वारा प्रबंध समिति और श्रद्धालुओं ने फैसला किया कि भले ही अभिनेत्री अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अटूट श्रद्धा का सम्मान करते हुए हर साल गुरुपर्व पर लंगर सेवा के दौरान उनके नाम की अरदास की जाएगी।

    मध्य प्रदेश और देश भर के सिनेमा प्रेमी मधुबाला को न केवल उनकी अमर फिल्मों और अभिनय के लिए याद करते हैं, बल्कि उनकी इस अनूठी भक्ति भावना की भी सराहना करते हैं। अंधेरी गुरुद्वारे में आज भी हर गुरुपर्व पर अरदास के दौरान यह पंक्तियां दोहराई जाती हैं कि ईश्वर अपनी इस समर्पित बेटी की ओर से लंगर-प्रसाद की सेवा स्वीकार करे और उसे अपने चरणों में स्थान दे।

  • पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    नई दिल्ली। सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को नैवेद्य यानी भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना भोग लगाए कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। ईश्वर को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार मिठाई, खीर और विभिन्न प्रकार के ताजे फलों का अर्पण करते हैं। हालांकि, पूजा में फलों के चुनाव और उन्हें अर्पित करने के सही तरीकों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है। विशेषकर बीज वाले फलों को भगवान के समक्ष चढ़ाने के नियमों को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

    धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार पूजा-पाठ में फलों का अर्पण अत्यंत सात्विक और उत्तम माना जाता है। मौसम के अनुसार उपलब्ध ताजे फलों का भोग लगाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। जहां तक बीज वाले फलों का प्रश्न है, तो ऐसे फलों को भगवान को अर्पित किया जा सकता है, परंतु इसके लिए एक निश्चित विधि का पालन करना आवश्यक है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वयं भोजन ग्रहण करते समय या बच्चों को फल देते समय बीज अलग करता है, उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ भगवान को भी बीज निकालकर ही फल अर्पित करने चाहिए।

    भोग लगाने की विधि में शुद्धता और भाव का सबसे अधिक महत्व होता है। बड़े या अधिक बीज वाले फल जैसे आम, तरबूज या अन्य मौसमी फलों का भोग लगाते समय पहले उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ जल से धोना चाहिए। इसके बाद पूजा के समय ही उन्हें काटकर उनके बीजों को अलग कर देना चाहिए। पहले से काटकर रखे गए बासी या दूषित फलों को पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान विष्णु या उनके अवतारों को भोग अर्पित करते समय उसमें तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।

    पूजा-पाठ में नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त के मन का भाव पूरी तरह से निष्काम और अहंकार रहित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि भोग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए सही नियमों का पालन करते हुए, स्वच्छता और मर्यादा के साथ अर्पित किया गया साधारण सा भोग भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं और साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

  • बाबा श्याम के भक्तों की भीड़ से रींगस रेलवे स्टेशन की रिकॉर्ड कमाई, तीन दिनों में ₹1.25 करोड़ का राजस्व

    बाबा श्याम के भक्तों की भीड़ से रींगस रेलवे स्टेशन की रिकॉर्ड कमाई, तीन दिनों में ₹1.25 करोड़ का राजस्व


    नई दिल्ली। खाटूश्यामजी के विश्वप्रसिद्ध मंदिर में बाबा श्याम के दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने उत्तर पश्चिम रेलवे की कमाई में जबरदस्त इजाफा कर दिया है। निर्जला एकादशी और द्वादशी के मेले के साथ-साथ वीकेंड की छुट्टियों के चलते रींगस रेलवे स्टेशन जंक्शन पर यात्रियों का अभूतपूर्व दबाव देखने को मिला। इसी अवधि में रेलवे को रिकॉर्ड राजस्व की प्राप्ति हुई है।

    रेलवे के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन दिनों में करीब 1.50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने ट्रेन से यात्रा की, जिससे रींगस स्टेशन को ₹1.25 करोड़ से अधिक की आय हुई है।

    ट्रेनों में भारी भीड़, यात्रियों की बढ़ी संख्या

    रींगस स्टेशन अधीक्षक बाबूलाल बाजिया के अनुसार, बाबा श्याम के दर्शन के लिए आने-जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या इतनी अधिक रही कि कई ट्रेनों में पैर रखने तक की जगह नहीं बची। रविवार को वीकेंड की वजह से भीड़ और बढ़ गई, जिससे आने वाले दिनों में राजस्व में और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।

    सुरक्षा के लिए 160 जवान तैनात

    भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए रेलवे प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। जीआरपी चौकी प्रभारी एएसआई मुकेश कुमार सैनी ने बताया कि स्टेशन परिसर में 100 आरपीएफ और 60 जीआरपी जवानों की तैनाती की गई है। इनमें महिला कर्मियों को भी शामिल किया गया है ताकि महिला यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

    इसके अलावा स्वयंसेवक भी व्यवस्था संभालने में सहयोग कर रहे हैं। जयपुर मंडल से सीनियर डीसीएम जगदीश कुमार के नेतृत्व में एक विशेष टीम लगातार स्टेशन पर निगरानी बनाए हुए है।

    भीषण गर्मी को देखते हुए यात्रियों के लिए अस्थायी शेल्टर और विश्राम स्थल भी बनाए गए हैं, जहां श्रद्धालु धूप और लू से राहत पा रहे हैं।

    भीड़ नियंत्रण के लिए खास इंतजाम

    स्टेशन पर भीड़ प्रबंधन के लिए प्रवेश और निकास के अलग-अलग रूट तय किए गए हैं ताकि अव्यवस्था या भगदड़ जैसी स्थिति न बने। यात्रियों की सुविधा के लिए कुल 21 टिकट काउंटर संचालित किए जा रहे हैं, जिनमें 12 मैनुअल और 9 ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) शामिल हैं।

    रेलवे अधिकारियों के अनुसार, ये विशेष व्यवस्थाएं रविवार देर रात तक जारी रहेंगी ताकि वीकेंड की भीड़ को सुचारु रूप से संभाला जा सके।

    रींगस: खाटूधाम का मुख्य प्रवेश द्वार

    गौरतलब है कि खाटूश्यामजी कस्बे में फिलहाल कोई रेलवे स्टेशन नहीं है, इसलिए देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रींगस जंक्शन ही प्रमुख पड़ाव है। यहां से खाटूधाम की दूरी लगभग 17 किलोमीटर है, जिसे यात्री सड़क मार्ग, निजी वाहनों, ई-रिक्शा या पैदल यात्रा के जरिए पूरा करते हैं।

    श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में खाटूश्यामजी से करीब 11 किलोमीटर दूर सुंदपुरा गांव में नया रेलवे स्टेशन बनाने की घोषणा की है। इसके बाद भविष्य में भक्तों को खाटूधाम पहुंचने के लिए एक और नजदीकी विकल्प मिलेगा, जिससे रींगस स्टेशन पर दबाव भी कम होने की उम्मीद है।

  • राजस्थान का अनूठा ग्यारस माता मंदिर बना श्रद्धा का केंद्र, निर्जला एकादशी पर दूर-दूर से पहुंचे भक्त, दिनभर चले धार्मिक अनुष्ठान

    राजस्थान का अनूठा ग्यारस माता मंदिर बना श्रद्धा का केंद्र, निर्जला एकादशी पर दूर-दूर से पहुंचे भक्त, दिनभर चले धार्मिक अनुष्ठान

    नई दिल्ली । निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर राजस्थान के भीलवाड़ा स्थित प्राचीन ग्यारस माता मंदिर में श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। विशेष रूप से महिलाओं ने बड़ी संख्या में पहुंचकर निर्जल व्रत, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। मंदिर परिसर दिनभर भक्ति, मंत्रोच्चार और धार्मिक गतिविधियों से गूंजता रहा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने से पूरे वर्ष की एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी विश्वास के चलते प्रदेश के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु ग्यारस माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचे। मंदिर में महिलाओं ने फल, नारियल, जल से भरे मिट्टी के कलश, छाते और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा शांति की कामना की।

    मंदिर प्रशासन के अनुसार यह स्थल क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक धरोहरों में शामिल है और इसकी विशेष पहचान ग्यारस माता के एकमात्र प्रमुख मंदिर के रूप में है। निर्जला एकादशी के अवसर पर यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी जयपुर, अजमेर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, किशनगढ़, बारां और अन्य क्षेत्रों से आए भक्तों ने माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

    मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। कलश स्थापना, भजन-कीर्तन, कथा श्रवण और दान-पुण्य की गतिविधियां पूरे दिन जारी रहीं। श्रद्धालुओं के लिए ठंडाई और शीतल पेय पदार्थों का वितरण किया गया, जबकि जरूरतमंदों को विभिन्न उपयोगी वस्तुओं का दान भी किया गया। धार्मिक परंपरा के अनुसार निर्जला एकादशी पर जलदान और सेवा कार्यों को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

    मंदिर की एक विशेष पहचान यहां स्थित प्राचीन अग्निकुंड भी है, जहां अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस अग्निकुंड की परिक्रमा करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी विश्वास के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं दिनभर परिक्रमा करती हुई दिखाई दीं। मंदिर परिसर में भक्ति और श्रद्धा का वातावरण पूरे दिन बना रहा।

    श्रद्धालुओं का कहना है कि निर्जला एकादशी केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा और आध्यात्मिक साधना का भी प्रतीक है। महिलाएं दिनभर निर्जल रहकर माता की आराधना करती हैं और धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं। उनका विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

    धार्मिक ग्रंथों में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि महाभारत काल में भीमसेन सभी एकादशी व्रतों का पालन नहीं कर पाते थे। तब उन्हें केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी गई थी। इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

    गर्मी के मौसम में आयोजित होने वाले इस पर्व पर जलदान, छाता, मटका, पंखा और शीतल पेय पदार्थों का दान विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु इसे सेवा और परोपकार का अवसर मानते हैं। भीलवाड़ा का ग्यारस माता मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है, बल्कि यह राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का भी जीवंत प्रतीक माना जाता है, जहां हर वर्ष निर्जला एकादशी पर हजारों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुंचते हैं।

  • काशी की दिव्यता से अभिभूत हुए अमित सियाल: गंगा आरती में शामिल होकर बोले- मां गंगा के सान्निध्य में मिली अद्भुत आत्मिक शांति

    काशी की दिव्यता से अभिभूत हुए अमित सियाल: गंगा आरती में शामिल होकर बोले- मां गंगा के सान्निध्य में मिली अद्भुत आत्मिक शांति


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज जगत के चर्चित अभिनेता अमित सियाल का हालिया वाराणसी दौरा चर्चा का विषय बना हुआ है। अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता ने इस बार आध्यात्मिक अनुभवों की तलाश में काशी का रुख किया, जहां उन्होंने विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग लेकर मां गंगा का पूजन-अर्चन किया। इस दौरान उन्होंने काशी की आध्यात्मिक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक वातावरण को करीब से महसूस किया।

    वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन आयोजित होने वाली गंगा आरती देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र मानी जाती है। इसी दिव्य आयोजन में अभिनेता अमित सियाल अपने सहयोगी पुनीत सिंह के साथ शामिल हुए। घाट पर पहुंचकर उन्होंने मां गंगा के समक्ष श्रद्धा भाव से नमन किया और वैदिक परंपराओं के अनुसार पूजन-अर्चन में भाग लिया।

    गंगा आरती के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय दिखाई दिया। घाट पर गूंजते शंखनाद, वैदिक मंत्रोच्चार, दीपों की जगमगाहट और श्रद्धालुओं की आस्था ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इस भव्य दृश्य को देखकर अभिनेता भी गहराई से प्रभावित नजर आए। उन्होंने आरती के प्रत्येक चरण को श्रद्धा और एकाग्रता के साथ देखा तथा इस अनुभव को अपने जीवन के विशेष क्षणों में से एक बताया।

    अभिनेता ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। यहां का वातावरण मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि मां गंगा के तट पर बैठकर और आरती का दर्शन करके उन्हें एक अलग तरह की आत्मिक संतुष्टि का अनुभव हुआ, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना आसान नहीं है।

    अपने प्रवास के दौरान अमित सियाल ने आयोजन से जुड़े लोगों के प्रति भी आभार व्यक्त किया। उन्होंने आगंतुक पुस्तिका में अपने अनुभव दर्ज करते हुए लिखा कि काशी की यात्रा उनके लिए अत्यंत यादगार रही। उन्होंने उल्लेख किया कि मां गंगा की आरती का दिव्य स्वरूप मन को भीतर तक स्पर्श करता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाता है। साथ ही उन्होंने आयोजन से जुड़े सभी लोगों के प्रयासों की सराहना की।

    घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच भी अभिनेता की उपस्थिति को लेकर उत्साह देखा गया। हालांकि उन्होंने अपने दौरे को पूरी तरह धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभव तक सीमित रखा तथा श्रद्धालुओं की तरह ही आरती में भाग लिया। इस दौरान उनका सम्मान भी किया गया और उन्हें पारंपरिक स्मृति चिह्न भेंट किए गए।

    अमित सियाल लंबे समय से फिल्मों और डिजिटल मंचों पर अपने प्रभावशाली अभिनय के लिए जाने जाते हैं। कई चर्चित वेब सीरीज और फिल्मों में अपने दमदार किरदारों के माध्यम से उन्होंने दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बनाई है। अभिनय के व्यस्त कार्यक्रमों के बीच उनका यह आध्यात्मिक प्रवास दर्शाता है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच भी लोग मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन की तलाश में धार्मिक स्थलों का रुख करते हैं।

    काशी की इस यात्रा ने अभिनेता को न केवल आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं से उनके जुड़ाव को भी उजागर किया। गंगा आरती में उनकी सहभागिता और उससे जुड़ी भावनाएं अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं।