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  • बाबा श्याम के भक्तों की भीड़ से रींगस रेलवे स्टेशन की रिकॉर्ड कमाई, तीन दिनों में ₹1.25 करोड़ का राजस्व

    बाबा श्याम के भक्तों की भीड़ से रींगस रेलवे स्टेशन की रिकॉर्ड कमाई, तीन दिनों में ₹1.25 करोड़ का राजस्व


    नई दिल्ली। खाटूश्यामजी के विश्वप्रसिद्ध मंदिर में बाबा श्याम के दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने उत्तर पश्चिम रेलवे की कमाई में जबरदस्त इजाफा कर दिया है। निर्जला एकादशी और द्वादशी के मेले के साथ-साथ वीकेंड की छुट्टियों के चलते रींगस रेलवे स्टेशन जंक्शन पर यात्रियों का अभूतपूर्व दबाव देखने को मिला। इसी अवधि में रेलवे को रिकॉर्ड राजस्व की प्राप्ति हुई है।

    रेलवे के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन दिनों में करीब 1.50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने ट्रेन से यात्रा की, जिससे रींगस स्टेशन को ₹1.25 करोड़ से अधिक की आय हुई है।

    ट्रेनों में भारी भीड़, यात्रियों की बढ़ी संख्या

    रींगस स्टेशन अधीक्षक बाबूलाल बाजिया के अनुसार, बाबा श्याम के दर्शन के लिए आने-जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या इतनी अधिक रही कि कई ट्रेनों में पैर रखने तक की जगह नहीं बची। रविवार को वीकेंड की वजह से भीड़ और बढ़ गई, जिससे आने वाले दिनों में राजस्व में और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।

    सुरक्षा के लिए 160 जवान तैनात

    भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए रेलवे प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। जीआरपी चौकी प्रभारी एएसआई मुकेश कुमार सैनी ने बताया कि स्टेशन परिसर में 100 आरपीएफ और 60 जीआरपी जवानों की तैनाती की गई है। इनमें महिला कर्मियों को भी शामिल किया गया है ताकि महिला यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

    इसके अलावा स्वयंसेवक भी व्यवस्था संभालने में सहयोग कर रहे हैं। जयपुर मंडल से सीनियर डीसीएम जगदीश कुमार के नेतृत्व में एक विशेष टीम लगातार स्टेशन पर निगरानी बनाए हुए है।

    भीषण गर्मी को देखते हुए यात्रियों के लिए अस्थायी शेल्टर और विश्राम स्थल भी बनाए गए हैं, जहां श्रद्धालु धूप और लू से राहत पा रहे हैं।

    भीड़ नियंत्रण के लिए खास इंतजाम

    स्टेशन पर भीड़ प्रबंधन के लिए प्रवेश और निकास के अलग-अलग रूट तय किए गए हैं ताकि अव्यवस्था या भगदड़ जैसी स्थिति न बने। यात्रियों की सुविधा के लिए कुल 21 टिकट काउंटर संचालित किए जा रहे हैं, जिनमें 12 मैनुअल और 9 ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) शामिल हैं।

    रेलवे अधिकारियों के अनुसार, ये विशेष व्यवस्थाएं रविवार देर रात तक जारी रहेंगी ताकि वीकेंड की भीड़ को सुचारु रूप से संभाला जा सके।

    रींगस: खाटूधाम का मुख्य प्रवेश द्वार

    गौरतलब है कि खाटूश्यामजी कस्बे में फिलहाल कोई रेलवे स्टेशन नहीं है, इसलिए देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रींगस जंक्शन ही प्रमुख पड़ाव है। यहां से खाटूधाम की दूरी लगभग 17 किलोमीटर है, जिसे यात्री सड़क मार्ग, निजी वाहनों, ई-रिक्शा या पैदल यात्रा के जरिए पूरा करते हैं।

    श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में खाटूश्यामजी से करीब 11 किलोमीटर दूर सुंदपुरा गांव में नया रेलवे स्टेशन बनाने की घोषणा की है। इसके बाद भविष्य में भक्तों को खाटूधाम पहुंचने के लिए एक और नजदीकी विकल्प मिलेगा, जिससे रींगस स्टेशन पर दबाव भी कम होने की उम्मीद है।

  • राजस्थान का अनूठा ग्यारस माता मंदिर बना श्रद्धा का केंद्र, निर्जला एकादशी पर दूर-दूर से पहुंचे भक्त, दिनभर चले धार्मिक अनुष्ठान

    राजस्थान का अनूठा ग्यारस माता मंदिर बना श्रद्धा का केंद्र, निर्जला एकादशी पर दूर-दूर से पहुंचे भक्त, दिनभर चले धार्मिक अनुष्ठान

    नई दिल्ली । निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर राजस्थान के भीलवाड़ा स्थित प्राचीन ग्यारस माता मंदिर में श्रद्धा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं। विशेष रूप से महिलाओं ने बड़ी संख्या में पहुंचकर निर्जल व्रत, पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। मंदिर परिसर दिनभर भक्ति, मंत्रोच्चार और धार्मिक गतिविधियों से गूंजता रहा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने से पूरे वर्ष की एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी विश्वास के चलते प्रदेश के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु ग्यारस माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचे। मंदिर में महिलाओं ने फल, नारियल, जल से भरे मिट्टी के कलश, छाते और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा शांति की कामना की।

    मंदिर प्रशासन के अनुसार यह स्थल क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक धरोहरों में शामिल है और इसकी विशेष पहचान ग्यारस माता के एकमात्र प्रमुख मंदिर के रूप में है। निर्जला एकादशी के अवसर पर यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी जयपुर, अजमेर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, किशनगढ़, बारां और अन्य क्षेत्रों से आए भक्तों ने माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

    मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। कलश स्थापना, भजन-कीर्तन, कथा श्रवण और दान-पुण्य की गतिविधियां पूरे दिन जारी रहीं। श्रद्धालुओं के लिए ठंडाई और शीतल पेय पदार्थों का वितरण किया गया, जबकि जरूरतमंदों को विभिन्न उपयोगी वस्तुओं का दान भी किया गया। धार्मिक परंपरा के अनुसार निर्जला एकादशी पर जलदान और सेवा कार्यों को अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

    मंदिर की एक विशेष पहचान यहां स्थित प्राचीन अग्निकुंड भी है, जहां अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस अग्निकुंड की परिक्रमा करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी विश्वास के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं दिनभर परिक्रमा करती हुई दिखाई दीं। मंदिर परिसर में भक्ति और श्रद्धा का वातावरण पूरे दिन बना रहा।

    श्रद्धालुओं का कहना है कि निर्जला एकादशी केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा और आध्यात्मिक साधना का भी प्रतीक है। महिलाएं दिनभर निर्जल रहकर माता की आराधना करती हैं और धार्मिक कथाओं का श्रवण करती हैं। उनका विश्वास है कि इस व्रत के प्रभाव से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

    धार्मिक ग्रंथों में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि महाभारत काल में भीमसेन सभी एकादशी व्रतों का पालन नहीं कर पाते थे। तब उन्हें केवल ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी गई थी। इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

    गर्मी के मौसम में आयोजित होने वाले इस पर्व पर जलदान, छाता, मटका, पंखा और शीतल पेय पदार्थों का दान विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु इसे सेवा और परोपकार का अवसर मानते हैं। भीलवाड़ा का ग्यारस माता मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है, बल्कि यह राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का भी जीवंत प्रतीक माना जाता है, जहां हर वर्ष निर्जला एकादशी पर हजारों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुंचते हैं।

  • काशी की दिव्यता से अभिभूत हुए अमित सियाल: गंगा आरती में शामिल होकर बोले- मां गंगा के सान्निध्य में मिली अद्भुत आत्मिक शांति

    काशी की दिव्यता से अभिभूत हुए अमित सियाल: गंगा आरती में शामिल होकर बोले- मां गंगा के सान्निध्य में मिली अद्भुत आत्मिक शांति


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज जगत के चर्चित अभिनेता अमित सियाल का हालिया वाराणसी दौरा चर्चा का विषय बना हुआ है। अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता ने इस बार आध्यात्मिक अनुभवों की तलाश में काशी का रुख किया, जहां उन्होंने विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग लेकर मां गंगा का पूजन-अर्चन किया। इस दौरान उन्होंने काशी की आध्यात्मिक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक वातावरण को करीब से महसूस किया।

    वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन आयोजित होने वाली गंगा आरती देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र मानी जाती है। इसी दिव्य आयोजन में अभिनेता अमित सियाल अपने सहयोगी पुनीत सिंह के साथ शामिल हुए। घाट पर पहुंचकर उन्होंने मां गंगा के समक्ष श्रद्धा भाव से नमन किया और वैदिक परंपराओं के अनुसार पूजन-अर्चन में भाग लिया।

    गंगा आरती के दौरान वातावरण पूरी तरह भक्तिमय दिखाई दिया। घाट पर गूंजते शंखनाद, वैदिक मंत्रोच्चार, दीपों की जगमगाहट और श्रद्धालुओं की आस्था ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इस भव्य दृश्य को देखकर अभिनेता भी गहराई से प्रभावित नजर आए। उन्होंने आरती के प्रत्येक चरण को श्रद्धा और एकाग्रता के साथ देखा तथा इस अनुभव को अपने जीवन के विशेष क्षणों में से एक बताया।

    अभिनेता ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। यहां का वातावरण मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि मां गंगा के तट पर बैठकर और आरती का दर्शन करके उन्हें एक अलग तरह की आत्मिक संतुष्टि का अनुभव हुआ, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना आसान नहीं है।

    अपने प्रवास के दौरान अमित सियाल ने आयोजन से जुड़े लोगों के प्रति भी आभार व्यक्त किया। उन्होंने आगंतुक पुस्तिका में अपने अनुभव दर्ज करते हुए लिखा कि काशी की यात्रा उनके लिए अत्यंत यादगार रही। उन्होंने उल्लेख किया कि मां गंगा की आरती का दिव्य स्वरूप मन को भीतर तक स्पर्श करता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाता है। साथ ही उन्होंने आयोजन से जुड़े सभी लोगों के प्रयासों की सराहना की।

    घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच भी अभिनेता की उपस्थिति को लेकर उत्साह देखा गया। हालांकि उन्होंने अपने दौरे को पूरी तरह धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभव तक सीमित रखा तथा श्रद्धालुओं की तरह ही आरती में भाग लिया। इस दौरान उनका सम्मान भी किया गया और उन्हें पारंपरिक स्मृति चिह्न भेंट किए गए।

    अमित सियाल लंबे समय से फिल्मों और डिजिटल मंचों पर अपने प्रभावशाली अभिनय के लिए जाने जाते हैं। कई चर्चित वेब सीरीज और फिल्मों में अपने दमदार किरदारों के माध्यम से उन्होंने दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बनाई है। अभिनय के व्यस्त कार्यक्रमों के बीच उनका यह आध्यात्मिक प्रवास दर्शाता है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच भी लोग मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन की तलाश में धार्मिक स्थलों का रुख करते हैं।

    काशी की इस यात्रा ने अभिनेता को न केवल आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं से उनके जुड़ाव को भी उजागर किया। गंगा आरती में उनकी सहभागिता और उससे जुड़ी भावनाएं अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

  • गायत्री जयंती 2026: सुख-समृद्धि और पुण्य फल के लिए 25 जून को जरूर करें ये 5 विशेष धार्मिक उपाय

    गायत्री जयंती 2026: सुख-समृद्धि और पुण्य फल के लिए 25 जून को जरूर करें ये 5 विशेष धार्मिक उपाय


    नई दिल्ली।
    सनातन धर्म में देवमाता, वेदमाता और विश्वमाता के रूप में पूजनीय मां गायत्री का अवतरण दिवस यानी गायत्री जयंती इस वर्ष 25 जून 2026, दिन गुरुवार को बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। हिंदू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को ही ममतामयी मां गायत्री का प्राकट्य हुआ था। ज्योतिषविदों और आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि इस पावन तिथि पर यदि कुछ विशेष और बेहद सरल धार्मिक उपाय व नियम अपनाए जाएं, तो जातक के जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मकता का संचार होता है और उसे अक्षय पुण्य फलों की प्राप्ति होती है।

    मध्य प्रदेश और देश के तमाम हिस्सों में इस दिन मां गायत्री की विशेष आराधना की जाती है, क्योंकि उन्हें बुद्धि, विवेक और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। गायत्री जयंती के शुभ अवसर पर सबसे पहला और प्रभावी उपाय तय संख्या में गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ जाप करना है। शांत और स्वच्छ वातावरण में बैठकर कमल गट्टे या तुलसी की माला से 108 या 1008 बार गायत्री मंत्र का जाप करने से न केवल मानसिक तनाव दूर होता है, बल्कि व्यक्ति की एकाग्रता और बौद्धिक क्षमता में भी अभूतपूर्व विकास होता है।

    इस पावन दिवस पर घर या देवस्थान में गायत्री यज्ञ अथवा हवन का आयोजन करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इसके लिए शुद्ध देसी घी, जौ, काले तिल, कपूर और गुड़ जैसी मांगलिक सामग्रियों को मिलाकर हवन कुंड तैयार किया जाता है। यज्ञ की प्रत्येक आहुति के साथ गायत्री मंत्र का सामूहिक या व्यक्तिगत उच्चारण करने से घर-परिवार और आसपास के संपूर्ण वातावरण का शुद्धिकरण होता है। डॉक्टरों और पर्यावरणविदों का भी मानना है कि इस प्रकार के वैदिक हवन से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक तरंगों का प्रवाह बढ़ता है।

    चूंकि मां गायत्री को ज्ञान की सर्वोच्च देवी माना गया है, इसलिए इस दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। ज्योतिषीय परामर्श के अनुसार, गायत्री जयंती पर जरूरतमंद, निर्धन और अनाथ विद्यार्थियों को शिक्षा से संबंधित सामग्रियां जैसे पुस्तकें, कॉपियां और पेन दान करने से विद्या और करियर में अपार सफलता मिलती है। इसके साथ ही योग्य ब्राह्मणों को आदरपूर्वक अन्न, वस्त्र और जलपात्र का दान करने से पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है और समाज में यश व कीर्ति की प्राप्ति होती है।

    आध्यात्मिक चेतना और आत्मिक शुद्धि के लिए इस दिन व्रत रखने और पूर्णतः सात्त्विक दिनचर्या का पालन करने की सलाह दी जाती है। यदि स्वास्थ्य कारणों से निराहार या फलाहार व्रत रखना संभव न हो, तो व्यक्ति को लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बनाकर केवल सात्त्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, शाम के समय मां गायत्री की कपूर से आरती करने के बाद गायत्री चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं और घर के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम, तालमेल और विश्वास की भावना सुदृढ़ होती है।

  • MP: मुरैना में भक्ति की अनोखी मिसाल… खड़ियाहार गांव की रेखा ने भगवान ठाकुर जी से रचाया विवाह

    MP: मुरैना में भक्ति की अनोखी मिसाल… खड़ियाहार गांव की रेखा ने भगवान ठाकुर जी से रचाया विवाह


    मुरैना।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के मुरैना (Morena) जिले के खड़ियाहार गांव (Khadiyahar village) में भक्ति की अनोखी मिसाल देखने को मिली. 42 साल की रेखा तोमर (Rekha Tomar) ने भगवान ठाकुर जी (Bhagwan Thakur ji) को अपना दूल्हा मानकर वैदिक रीति से विवाह रचा लिया. पूरे गांव में भजन-कीर्तन और राधे-राधे के जयकारे गूंजे. इस आयोजन को ग्रामीणों ने आस्था और समर्पण का दुर्लभ उदाहरण बताया।

    मुरैना जिले के एक छोटे से गांव खड़ियाहार में 42 वर्षीय रेखा तोमर ने भगवान श्री ठाकुर जी को अपना जीवनसाथी मानते हुए पूरे विधि-विधान और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह रचा लिया. यह घटना सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस आस्था की अभिव्यक्ति है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को पूरी तरह ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है. गांव में हुए इस आयोजन ने हर किसी को चौंकाया भी और भावुक भी किया.

    इस अनोखे विवाह की चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है. ग्रामीणों के मुताबिक, यह आयोजन पूरी तरह पारंपरिक हिंदू रीति से किया गया, जिसमें विवाह की हर रस्म को विधिवत निभाया गया. रेखा तोमर लंबे समय से ठाकुर जी की भक्ति में लीन थीं और उन्होंने पहले ही यह संकल्प लिया था कि वह अपना जीवन प्रभु को समर्पित करेंगी. यही संकल्प इस विवाह का आधार बना. भक्ति के इस रूप ने एक बार फिर यह साबित किया कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और यह व्यक्ति को अलग पहचान देती है.

    वैदिक रीति से संपन्न हुआ विवाह

    ग्राम खड़ियाहार के प्राचीन देवालय में यह विवाह संपन्न हुआ. मंदिर के पुजारी रामदुलारे बाबा ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी धार्मिक रस्में पूरी कराईं. लग्न पत्रिका का वाचन हुआ. पूजन और पैर पूजाई जैसी परंपराएं निभाई गईं. पूरा आयोजन एक पारंपरिक शादी की तरह ही आयोजित किया गया, जिसमें हर विधि का पालन किया गया.


    भाई ने किया कन्यादान, भावुक हुआ माहौल

    इस विवाह का सबसे भावुक पल तब आया, जब रेखा तोमर के भाई सुरेंद्र ने उनका कन्यादान किया. परिवार के लिए यह क्षण आस्था और भावना का संगम था. ग्रामीणों ने भी इस दृश्य को श्रद्धा के साथ देखा. यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी एक अलग अनुभव लेकर आया.


    भजन-कीर्तन से गूंजा पूरा गांव

    विवाह के दौरान पूरे गांव में भक्ति का माहौल रहा. भजन-कीर्तन और राधे-राधे के जयकारों से वातावरण गूंज उठा. बड़ी संख्या में ग्रामीण इस आयोजन में शामिल हुए. लोगों ने इसे आस्था और समर्पण की अनोखी मिसाल बताया. गांव के कई प्रमुख लोग भी कार्यक्रम में मौजूद रहे और उन्होंने इसे दुर्लभ आयोजन माना.


    कौन हैं रेखा तोमर

    रेखा तोमर, पिता लाखन सिंह, लंबे समय से धार्मिक प्रवृत्ति की रही हैं. ग्रामीणों के अनुसार, वह अधिकतर समय पूजा-पाठ और भजन में व्यतीत करती थीं. उनका यह निर्णय अचानक नहीं था, बल्कि वर्षों की भक्ति और साधना का परिणाम था. उन्होंने सामाजिक जीवन से अलग हटकर आध्यात्मिक जीवन को प्राथमिकता दी.


    ईश्वर को जीवनसाथी मानने की परंपरा नई नहीं

    धार्मिक मान्यताओं में ईश्वर को जीवनसाथी मानने की परंपरा नई नहीं है. इतिहास और भक्ति परंपरा में कई उदाहरण मिलते हैं, जहां भक्त ने ईश्वर को अपना सर्वस्व मान लिया. ऐसे आयोजन समाज में आस्था और विश्वास को मजबूत करते हैं. हालांकि, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय होता है और हर व्यक्ति इसे अपने तरीके से समझता है।

  • रामनवमी उत्सव में अनोखी भेंट, जग्गा रेड्डी ने श्रीराम-सीता को अर्पित किए सोने-चांदी के गहने

    रामनवमी उत्सव में अनोखी भेंट, जग्गा रेड्डी ने श्रीराम-सीता को अर्पित किए सोने-चांदी के गहने


    नई दिल्ली:देशभर में रामनवमी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है और इस पावन अवसर पर भक्ति के कई अद्भुत दृश्य सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के अयोध्या से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों तक भगवान भगवान राम के जन्मोत्सव की धूम देखने को मिल रही है। इसी कड़ी में तेलंगाना के सांगारेड्डी से आस्था और समर्पण का एक विशेष उदाहरण सामने आया है जहां वरिष्ठ कांग्रेस नेता टी जग्गा रेड्डी ने भगवान राम और माता माता सीता को करोड़ों रुपये के आभूषण भेंट कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।

    इस अवसर पर जग्गा रेड्डी ने भक्तों के साथ मिलकर भव्य आयोजन किया जिसमें भगवान राम और माता सीता को लगभग ढाई करोड़ रुपये मूल्य के सोने और चांदी से बने आभूषण अर्पित किए गए। इन आभूषणों का कुल वजन करीब ढाई किलो बताया गया है जिसमें लगभग 2.25 किलो सोने का उपयोग किया गया। इन विशेष गहनों में मुकुट हार कमरबंद धनुष बाण शंख चक्र सहित कई पारंपरिक और धार्मिक महत्व के प्रतीक शामिल हैं।

    माता सीता के लिए विशेष रूप से मंगलसूत्र और कमल के आकार के आभूषण तैयार किए गए जबकि भगवान राम के लिए प्रतीकात्मक बाण धारण करने वाला विशेष आभूषण भी बनाया गया। इसके अलावा चांदी का उपयोग कर आदिशेष और एक औपचारिक कल्याण पीठ भी तैयार की गई जो इस आयोजन को और अधिक भव्य बनाती है।

    इन आभूषणों को सीधे मंदिर में चढ़ाने से पहले विधि विधान के साथ विशेष पूजा और अनुष्ठान किया गया। यह अनुष्ठान राम नगर स्थित जग्गा रेड्डी के आवास पर आयोजित किया गया जहां पहले इन गहनों की विधिवत प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद एक भव्य जुलूस निकाला गया जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

    जुलूस के पश्चात मंदिर में हवन और आहुति का आयोजन हुआ और फिर भगवान राम और माता सीता को ये सभी आभूषण समर्पित किए गए। इस पूरे आयोजन ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि व्यापक स्तर पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया और यह दर्शाया कि भगवान राम के प्रति लोगों की आस्था कितनी गहरी और अटूट है।

    इस प्रकार रामनवमी के इस पावन अवसर पर तेलंगाना में देखने को मिला यह आयोजन भक्ति श्रद्धा और परंपरा का अनूठा संगम बन गया जिसने यह संदेश दिया कि भगवान राम आज भी जन जन के हृदय में बसते हैं और उनके प्रति श्रद्धा समय के साथ और भी प्रगाढ़ होती जा रही है।

  • नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री

    नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री


    नई दिल्ली । नवरात्रि के पावन अवसर पर माता दुर्गा की आराधना केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि समर्पण और भाव का उत्सव भी है। शास्त्रों के अनुसार जब भक्त मां के दरबार में जाता है, तो वह केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि अपनी आस्था और कृतज्ञता भी अर्पित करता है। इसलिए मंदिर में खाली हाथ जाना उचित नहीं माना जाता। पूजा के दौरान स्वच्छ वस्त्र पहनना, पुरुषों का तिलक और महिलाओं का सिर ढकना भी अनिवार्य माना जाता है।

    माता के सोलह श्रृंगार का महत्व

    देवी पुराण के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। इन श्रृंगारों में शामिल हैं:

    लाल चुनरी

    चूड़ी

    इत्र

    सिंदूर

    बिछिया

    महावर

    मेहंदी

    काजल

    गजरा

    कुमकुम

    बिंदी

    माला या मंगलसूत्र

    पायल

    नथ

    कान की बाली

    फूलों की वेणी

    यह श्रृंगार सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

    अर्पित वस्तुओं का महत्व

    अक्षत (चावल): अखंडता और समृद्धि का प्रतीक

    लाल पुष्प: शक्ति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार

    चुनरी: श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक, जीवन में सुरक्षा और सौभाग्य लाती है

    सिक्का: दान और त्याग का संकेत, आर्थिक स्थिरता की कामना

    ऋतु फल: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश

    इन अर्पणों का वास्तविक महत्व उनके पीछे छिपे भाव में होता है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। नवरात्रि में माता को समर्पण और भक्ति भाव के साथ श्रृंगार और अर्पण करने से मनोबल बढ़ता है, घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और भक्त का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध बनता है।

  • सलकनपुर में चैत्र नवरात्रि की धूम, मां विजयासन देवी मंदिर सज-धज कर स्वागत को तैयार

    सलकनपुर में चैत्र नवरात्रि की धूम, मां विजयासन देवी मंदिर सज-धज कर स्वागत को तैयार

    बुधनी । मध्यप्रदेश के मशहूर शक्तिपीठ मां विजयासन देवी मंदिर में श्रद्धा और भक्ति का उत्सव फिर से देखने को मिलेगा। 19 मार्च 2026 से शुरू होने वाले चैत्र नवरात्रि के लिए मंदिर समिति ने तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है। बुधनी विधानसभा क्षेत्र में स्थित यह दिव्य धाम हर साल लाखों श्रद्धालुओं का आकर्षण केंद्र बनता है और इस बार भी भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है।

    गुरुवार सुबह 10:47 बजे शुभ मुहूर्त में घट स्थापना और ज्योति स्थापना के साथ नौ दिवसीय नवरात्रि का शुभारंभ होगा। यह पर्व 27 मार्च को राम नवमी के दिन समाप्त होगा। भक्तों की आस्था उत्साह और भक्ति का संगम इस दौरान मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में साफ दिखाई देगा।

    मंदिर समिति ने गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पानी छांव और परिक्रमा मार्ग में कारपेट बिछाने जैसी व्यवस्थाओं का खास इंतजाम किया है। श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो इसके लिए समिति हर संभव प्रयास कर रही है। मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्त लगभग 1400 सीढ़ियों का रास्ता तय कर सकते हैं। इसके अलावा रोपवे और सड़क मार्ग की सुविधा भी उपलब्ध है जिससे बुजुर्ग और छोटे बच्चों वाले परिवार भी आसानी से दर्शन कर सकते हैं।

    सुरक्षा के दृष्टिकोण से पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क हैं। नवरात्रि के दौरान सैकड़ों पुलिस जवान और प्रशासनिक अधिकारी तैनात रहेंगे ताकि भक्तों के लिए व्यवस्था सुचारू बनी रहे और किसी भी तरह की असुविधा न हो। मंदिर परिसर में सुरक्षा व्यवस्था के साथ साथ भीड़ नियंत्रण और आपातकालीन सेवाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा।

    मंदिर का वातावरण नवरात्रि की शुरुआत से ही भक्तिमय हो जाएगा। श्रद्धालु सुबह शाम पूजन हवन और आरती में भाग लेंगे। इस दौरान देवी मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा और भजन कीर्तन का आयोजन भी होगा। मंदिर के आसपास स्थानीय बाजार भी सज धज कर उत्सव का रंग बिखेरेंगे जहां भक्त पूजा सामग्री और नवरात्रि से जुड़े अन्य सामान खरीद सकते हैं।

    भक्ति श्रद्धा और उत्साह के इस महापर्व में सलकनपुर एक बार फिर आस्था के रंग में रंगने को तैयार है। हर उम्र के भक्त इस अवसर पर माता के दर्शन के लिए दूर दूर से यहां पहुंचते हैं। नौ दिन तक चलने वाले इस पर्व में भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी की उपासना करेंगे और मंदिर परिसर में चारों ओर भक्तों की भीड़ भजन और आरती का अद्भुत दृश्य देखने को मिलेगा।

    सलकनपुर और मां विजयासन देवी मंदिर इस बार भी श्रद्धालुओं को यादगार अनुभव देने के लिए पूरी तरह सज धज कर तैयार हैं। नवरात्रि के इस महापर्व में हर कोई आस्था उल्लास और भक्तिभाव में डूबकर माता के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करेगा।

  • उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में होली के दूसरे दिन फाग उत्सव बड़े भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं और युवतियों ने भजन-कीर्तन के बीच फूलों और गुलाल से होली खेली। भगवान श्रीकृष्ण-बलराम की शिक्षा स्थली पर श्रद्धालुओं ने नाचते-गाते हुए उत्सव का आनंद लिया।

    आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन की मधुर धुनें गूंजती रहीं। “रंग मत डाले रे कान्हा”, “जुल्म कर डारयो सितम कर डारयो” और “आज ब्रज में होली रे रसिया” जैसे भजनों पर महिलाएं झूमती और नाचती नजर आईं। भक्ति संगीत के बीच पूरा आश्रम परिसर उत्सवमय हो गया और श्रद्धालु भगवान की भक्ति में सराबोर दिखाई दिए।

    उज्जैन को महाकाल की नगरी और भक्ति भाव की नगरी कहा जाता है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक परंपराएं हैं, जिनमें होली का पर्व भी विशेष तरीके से मनाया जाता है। सांदीपनि आश्रम में आयोजित यह फाग उत्सव इन्हीं प्राचीन परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    कीर्ति व्यास ने बताया कि होली का पर्व रंगपंचमी तक पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसी परंपरा के तहत दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के साथ फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस अवसर पर देश-विदेश से श्रद्धालु भी आश्रम पहुंचते हैं और भजन-कीर्तन के बीच फाग उत्सव का आनंद लेते हैं।

    कमला देवी व्यास ने आगे कहा कि सांदीपनि आश्रम में हर साल फाग उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु भक्ति के रंग में रंगकर इस आयोजन में शामिल होते हैं। यह उत्सव प्रतिवर्ष बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

  • 19 फरवरी महाकाल भस्म आरती: त्रिपुंड-त्रिनेत्र और ॐ के साथ बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार

    19 फरवरी महाकाल भस्म आरती: त्रिपुंड-त्रिनेत्र और ॐ के साथ बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार


    उज्जैन । विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि गुरुवार को सुबह 4 बजे कपाट खोले गए और भस्म आरती का आयोजन धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अवसर पर बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार विशेष विधि-विधान के साथ किया गया। मंदिर के गर्भगृह में पुजारियों ने सभी देवी-देवताओं का पूजन और जलाभिषेक के बाद पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से भगवान का अभिषेक किया।

    भगवान महाकाल का भांग और चंदन से राजा स्वरूप में श्रृंगार किया गया। भस्म अर्पण से पहले प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया गया और मंत्रोच्चार के साथ भगवान का ध्यान किया गया। कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढांककर भस्म रमाई गई। इसके साथ ही शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुण्डमाल, रुद्राक्ष की माला और पुष्पों की माला अर्पित की गई, जिससे बाबा महाकाल का अलंकरण और भी भव्य और मनोहारी दिखाई दिया।

    सुबह-सुबह सैकड़ों श्रद्धालु भस्म आरती में शामिल हुए। उन्होंने नंदी महाराज के दर्शन किए और उनके कान के समीप अपनी मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद मांगा। श्रद्धालु बाबा महाकाल की जयकारे लगाते रहे, जिससे पूरा मंदिर जयकारों की गूंज से गुंजायमान हो उठा।

    मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ सुबह से ही रही और हर कोई भक्ति और श्रद्धा भाव से बाबा महाकाल के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त कर रहा था। भस्म आरती के दौरान मंदिर में शांतिपूर्ण वातावरण, मंत्रोच्चार और दिव्य गंध ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया।