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  • गायत्री जयंती 2026: सुख-समृद्धि और पुण्य फल के लिए 25 जून को जरूर करें ये 5 विशेष धार्मिक उपाय

    गायत्री जयंती 2026: सुख-समृद्धि और पुण्य फल के लिए 25 जून को जरूर करें ये 5 विशेष धार्मिक उपाय


    नई दिल्ली।
    सनातन धर्म में देवमाता, वेदमाता और विश्वमाता के रूप में पूजनीय मां गायत्री का अवतरण दिवस यानी गायत्री जयंती इस वर्ष 25 जून 2026, दिन गुरुवार को बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। हिंदू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को ही ममतामयी मां गायत्री का प्राकट्य हुआ था। ज्योतिषविदों और आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि इस पावन तिथि पर यदि कुछ विशेष और बेहद सरल धार्मिक उपाय व नियम अपनाए जाएं, तो जातक के जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मकता का संचार होता है और उसे अक्षय पुण्य फलों की प्राप्ति होती है।

    मध्य प्रदेश और देश के तमाम हिस्सों में इस दिन मां गायत्री की विशेष आराधना की जाती है, क्योंकि उन्हें बुद्धि, विवेक और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। गायत्री जयंती के शुभ अवसर पर सबसे पहला और प्रभावी उपाय तय संख्या में गायत्री मंत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ जाप करना है। शांत और स्वच्छ वातावरण में बैठकर कमल गट्टे या तुलसी की माला से 108 या 1008 बार गायत्री मंत्र का जाप करने से न केवल मानसिक तनाव दूर होता है, बल्कि व्यक्ति की एकाग्रता और बौद्धिक क्षमता में भी अभूतपूर्व विकास होता है।

    इस पावन दिवस पर घर या देवस्थान में गायत्री यज्ञ अथवा हवन का आयोजन करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इसके लिए शुद्ध देसी घी, जौ, काले तिल, कपूर और गुड़ जैसी मांगलिक सामग्रियों को मिलाकर हवन कुंड तैयार किया जाता है। यज्ञ की प्रत्येक आहुति के साथ गायत्री मंत्र का सामूहिक या व्यक्तिगत उच्चारण करने से घर-परिवार और आसपास के संपूर्ण वातावरण का शुद्धिकरण होता है। डॉक्टरों और पर्यावरणविदों का भी मानना है कि इस प्रकार के वैदिक हवन से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक तरंगों का प्रवाह बढ़ता है।

    चूंकि मां गायत्री को ज्ञान की सर्वोच्च देवी माना गया है, इसलिए इस दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। ज्योतिषीय परामर्श के अनुसार, गायत्री जयंती पर जरूरतमंद, निर्धन और अनाथ विद्यार्थियों को शिक्षा से संबंधित सामग्रियां जैसे पुस्तकें, कॉपियां और पेन दान करने से विद्या और करियर में अपार सफलता मिलती है। इसके साथ ही योग्य ब्राह्मणों को आदरपूर्वक अन्न, वस्त्र और जलपात्र का दान करने से पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है और समाज में यश व कीर्ति की प्राप्ति होती है।

    आध्यात्मिक चेतना और आत्मिक शुद्धि के लिए इस दिन व्रत रखने और पूर्णतः सात्त्विक दिनचर्या का पालन करने की सलाह दी जाती है। यदि स्वास्थ्य कारणों से निराहार या फलाहार व्रत रखना संभव न हो, तो व्यक्ति को लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बनाकर केवल सात्त्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, शाम के समय मां गायत्री की कपूर से आरती करने के बाद गायत्री चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से पारिवारिक कलह समाप्त होते हैं और घर के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम, तालमेल और विश्वास की भावना सुदृढ़ होती है।

  • MP: मुरैना में भक्ति की अनोखी मिसाल… खड़ियाहार गांव की रेखा ने भगवान ठाकुर जी से रचाया विवाह

    MP: मुरैना में भक्ति की अनोखी मिसाल… खड़ियाहार गांव की रेखा ने भगवान ठाकुर जी से रचाया विवाह


    मुरैना।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के मुरैना (Morena) जिले के खड़ियाहार गांव (Khadiyahar village) में भक्ति की अनोखी मिसाल देखने को मिली. 42 साल की रेखा तोमर (Rekha Tomar) ने भगवान ठाकुर जी (Bhagwan Thakur ji) को अपना दूल्हा मानकर वैदिक रीति से विवाह रचा लिया. पूरे गांव में भजन-कीर्तन और राधे-राधे के जयकारे गूंजे. इस आयोजन को ग्रामीणों ने आस्था और समर्पण का दुर्लभ उदाहरण बताया।

    मुरैना जिले के एक छोटे से गांव खड़ियाहार में 42 वर्षीय रेखा तोमर ने भगवान श्री ठाकुर जी को अपना जीवनसाथी मानते हुए पूरे विधि-विधान और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह रचा लिया. यह घटना सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उस आस्था की अभिव्यक्ति है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को पूरी तरह ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है. गांव में हुए इस आयोजन ने हर किसी को चौंकाया भी और भावुक भी किया.

    इस अनोखे विवाह की चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है. ग्रामीणों के मुताबिक, यह आयोजन पूरी तरह पारंपरिक हिंदू रीति से किया गया, जिसमें विवाह की हर रस्म को विधिवत निभाया गया. रेखा तोमर लंबे समय से ठाकुर जी की भक्ति में लीन थीं और उन्होंने पहले ही यह संकल्प लिया था कि वह अपना जीवन प्रभु को समर्पित करेंगी. यही संकल्प इस विवाह का आधार बना. भक्ति के इस रूप ने एक बार फिर यह साबित किया कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और यह व्यक्ति को अलग पहचान देती है.

    वैदिक रीति से संपन्न हुआ विवाह

    ग्राम खड़ियाहार के प्राचीन देवालय में यह विवाह संपन्न हुआ. मंदिर के पुजारी रामदुलारे बाबा ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सभी धार्मिक रस्में पूरी कराईं. लग्न पत्रिका का वाचन हुआ. पूजन और पैर पूजाई जैसी परंपराएं निभाई गईं. पूरा आयोजन एक पारंपरिक शादी की तरह ही आयोजित किया गया, जिसमें हर विधि का पालन किया गया.


    भाई ने किया कन्यादान, भावुक हुआ माहौल

    इस विवाह का सबसे भावुक पल तब आया, जब रेखा तोमर के भाई सुरेंद्र ने उनका कन्यादान किया. परिवार के लिए यह क्षण आस्था और भावना का संगम था. ग्रामीणों ने भी इस दृश्य को श्रद्धा के साथ देखा. यह आयोजन सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी एक अलग अनुभव लेकर आया.


    भजन-कीर्तन से गूंजा पूरा गांव

    विवाह के दौरान पूरे गांव में भक्ति का माहौल रहा. भजन-कीर्तन और राधे-राधे के जयकारों से वातावरण गूंज उठा. बड़ी संख्या में ग्रामीण इस आयोजन में शामिल हुए. लोगों ने इसे आस्था और समर्पण की अनोखी मिसाल बताया. गांव के कई प्रमुख लोग भी कार्यक्रम में मौजूद रहे और उन्होंने इसे दुर्लभ आयोजन माना.


    कौन हैं रेखा तोमर

    रेखा तोमर, पिता लाखन सिंह, लंबे समय से धार्मिक प्रवृत्ति की रही हैं. ग्रामीणों के अनुसार, वह अधिकतर समय पूजा-पाठ और भजन में व्यतीत करती थीं. उनका यह निर्णय अचानक नहीं था, बल्कि वर्षों की भक्ति और साधना का परिणाम था. उन्होंने सामाजिक जीवन से अलग हटकर आध्यात्मिक जीवन को प्राथमिकता दी.


    ईश्वर को जीवनसाथी मानने की परंपरा नई नहीं

    धार्मिक मान्यताओं में ईश्वर को जीवनसाथी मानने की परंपरा नई नहीं है. इतिहास और भक्ति परंपरा में कई उदाहरण मिलते हैं, जहां भक्त ने ईश्वर को अपना सर्वस्व मान लिया. ऐसे आयोजन समाज में आस्था और विश्वास को मजबूत करते हैं. हालांकि, यह व्यक्तिगत आस्था का विषय होता है और हर व्यक्ति इसे अपने तरीके से समझता है।

  • रामनवमी उत्सव में अनोखी भेंट, जग्गा रेड्डी ने श्रीराम-सीता को अर्पित किए सोने-चांदी के गहने

    रामनवमी उत्सव में अनोखी भेंट, जग्गा रेड्डी ने श्रीराम-सीता को अर्पित किए सोने-चांदी के गहने


    नई दिल्ली:देशभर में रामनवमी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है और इस पावन अवसर पर भक्ति के कई अद्भुत दृश्य सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के अयोध्या से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों तक भगवान भगवान राम के जन्मोत्सव की धूम देखने को मिल रही है। इसी कड़ी में तेलंगाना के सांगारेड्डी से आस्था और समर्पण का एक विशेष उदाहरण सामने आया है जहां वरिष्ठ कांग्रेस नेता टी जग्गा रेड्डी ने भगवान राम और माता माता सीता को करोड़ों रुपये के आभूषण भेंट कर अपनी श्रद्धा व्यक्त की।

    इस अवसर पर जग्गा रेड्डी ने भक्तों के साथ मिलकर भव्य आयोजन किया जिसमें भगवान राम और माता सीता को लगभग ढाई करोड़ रुपये मूल्य के सोने और चांदी से बने आभूषण अर्पित किए गए। इन आभूषणों का कुल वजन करीब ढाई किलो बताया गया है जिसमें लगभग 2.25 किलो सोने का उपयोग किया गया। इन विशेष गहनों में मुकुट हार कमरबंद धनुष बाण शंख चक्र सहित कई पारंपरिक और धार्मिक महत्व के प्रतीक शामिल हैं।

    माता सीता के लिए विशेष रूप से मंगलसूत्र और कमल के आकार के आभूषण तैयार किए गए जबकि भगवान राम के लिए प्रतीकात्मक बाण धारण करने वाला विशेष आभूषण भी बनाया गया। इसके अलावा चांदी का उपयोग कर आदिशेष और एक औपचारिक कल्याण पीठ भी तैयार की गई जो इस आयोजन को और अधिक भव्य बनाती है।

    इन आभूषणों को सीधे मंदिर में चढ़ाने से पहले विधि विधान के साथ विशेष पूजा और अनुष्ठान किया गया। यह अनुष्ठान राम नगर स्थित जग्गा रेड्डी के आवास पर आयोजित किया गया जहां पहले इन गहनों की विधिवत प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद एक भव्य जुलूस निकाला गया जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

    जुलूस के पश्चात मंदिर में हवन और आहुति का आयोजन हुआ और फिर भगवान राम और माता सीता को ये सभी आभूषण समर्पित किए गए। इस पूरे आयोजन ने न केवल स्थानीय लोगों बल्कि व्यापक स्तर पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया और यह दर्शाया कि भगवान राम के प्रति लोगों की आस्था कितनी गहरी और अटूट है।

    इस प्रकार रामनवमी के इस पावन अवसर पर तेलंगाना में देखने को मिला यह आयोजन भक्ति श्रद्धा और परंपरा का अनूठा संगम बन गया जिसने यह संदेश दिया कि भगवान राम आज भी जन जन के हृदय में बसते हैं और उनके प्रति श्रद्धा समय के साथ और भी प्रगाढ़ होती जा रही है।

  • नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री

    नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री


    नई दिल्ली । नवरात्रि के पावन अवसर पर माता दुर्गा की आराधना केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि समर्पण और भाव का उत्सव भी है। शास्त्रों के अनुसार जब भक्त मां के दरबार में जाता है, तो वह केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि अपनी आस्था और कृतज्ञता भी अर्पित करता है। इसलिए मंदिर में खाली हाथ जाना उचित नहीं माना जाता। पूजा के दौरान स्वच्छ वस्त्र पहनना, पुरुषों का तिलक और महिलाओं का सिर ढकना भी अनिवार्य माना जाता है।

    माता के सोलह श्रृंगार का महत्व

    देवी पुराण के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। इन श्रृंगारों में शामिल हैं:

    लाल चुनरी

    चूड़ी

    इत्र

    सिंदूर

    बिछिया

    महावर

    मेहंदी

    काजल

    गजरा

    कुमकुम

    बिंदी

    माला या मंगलसूत्र

    पायल

    नथ

    कान की बाली

    फूलों की वेणी

    यह श्रृंगार सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

    अर्पित वस्तुओं का महत्व

    अक्षत (चावल): अखंडता और समृद्धि का प्रतीक

    लाल पुष्प: शक्ति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार

    चुनरी: श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक, जीवन में सुरक्षा और सौभाग्य लाती है

    सिक्का: दान और त्याग का संकेत, आर्थिक स्थिरता की कामना

    ऋतु फल: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश

    इन अर्पणों का वास्तविक महत्व उनके पीछे छिपे भाव में होता है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। नवरात्रि में माता को समर्पण और भक्ति भाव के साथ श्रृंगार और अर्पण करने से मनोबल बढ़ता है, घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और भक्त का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध बनता है।

  • सलकनपुर में चैत्र नवरात्रि की धूम, मां विजयासन देवी मंदिर सज-धज कर स्वागत को तैयार

    सलकनपुर में चैत्र नवरात्रि की धूम, मां विजयासन देवी मंदिर सज-धज कर स्वागत को तैयार

    बुधनी । मध्यप्रदेश के मशहूर शक्तिपीठ मां विजयासन देवी मंदिर में श्रद्धा और भक्ति का उत्सव फिर से देखने को मिलेगा। 19 मार्च 2026 से शुरू होने वाले चैत्र नवरात्रि के लिए मंदिर समिति ने तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया है। बुधनी विधानसभा क्षेत्र में स्थित यह दिव्य धाम हर साल लाखों श्रद्धालुओं का आकर्षण केंद्र बनता है और इस बार भी भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है।

    गुरुवार सुबह 10:47 बजे शुभ मुहूर्त में घट स्थापना और ज्योति स्थापना के साथ नौ दिवसीय नवरात्रि का शुभारंभ होगा। यह पर्व 27 मार्च को राम नवमी के दिन समाप्त होगा। भक्तों की आस्था उत्साह और भक्ति का संगम इस दौरान मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में साफ दिखाई देगा।

    मंदिर समिति ने गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पानी छांव और परिक्रमा मार्ग में कारपेट बिछाने जैसी व्यवस्थाओं का खास इंतजाम किया है। श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो इसके लिए समिति हर संभव प्रयास कर रही है। मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्त लगभग 1400 सीढ़ियों का रास्ता तय कर सकते हैं। इसके अलावा रोपवे और सड़क मार्ग की सुविधा भी उपलब्ध है जिससे बुजुर्ग और छोटे बच्चों वाले परिवार भी आसानी से दर्शन कर सकते हैं।

    सुरक्षा के दृष्टिकोण से पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क हैं। नवरात्रि के दौरान सैकड़ों पुलिस जवान और प्रशासनिक अधिकारी तैनात रहेंगे ताकि भक्तों के लिए व्यवस्था सुचारू बनी रहे और किसी भी तरह की असुविधा न हो। मंदिर परिसर में सुरक्षा व्यवस्था के साथ साथ भीड़ नियंत्रण और आपातकालीन सेवाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा।

    मंदिर का वातावरण नवरात्रि की शुरुआत से ही भक्तिमय हो जाएगा। श्रद्धालु सुबह शाम पूजन हवन और आरती में भाग लेंगे। इस दौरान देवी मां के विभिन्न स्वरूपों की पूजा और भजन कीर्तन का आयोजन भी होगा। मंदिर के आसपास स्थानीय बाजार भी सज धज कर उत्सव का रंग बिखेरेंगे जहां भक्त पूजा सामग्री और नवरात्रि से जुड़े अन्य सामान खरीद सकते हैं।

    भक्ति श्रद्धा और उत्साह के इस महापर्व में सलकनपुर एक बार फिर आस्था के रंग में रंगने को तैयार है। हर उम्र के भक्त इस अवसर पर माता के दर्शन के लिए दूर दूर से यहां पहुंचते हैं। नौ दिन तक चलने वाले इस पर्व में भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवी की उपासना करेंगे और मंदिर परिसर में चारों ओर भक्तों की भीड़ भजन और आरती का अद्भुत दृश्य देखने को मिलेगा।

    सलकनपुर और मां विजयासन देवी मंदिर इस बार भी श्रद्धालुओं को यादगार अनुभव देने के लिए पूरी तरह सज धज कर तैयार हैं। नवरात्रि के इस महापर्व में हर कोई आस्था उल्लास और भक्तिभाव में डूबकर माता के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करेगा।

  • उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में होली के दूसरे दिन फाग उत्सव बड़े भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं और युवतियों ने भजन-कीर्तन के बीच फूलों और गुलाल से होली खेली। भगवान श्रीकृष्ण-बलराम की शिक्षा स्थली पर श्रद्धालुओं ने नाचते-गाते हुए उत्सव का आनंद लिया।

    आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन की मधुर धुनें गूंजती रहीं। “रंग मत डाले रे कान्हा”, “जुल्म कर डारयो सितम कर डारयो” और “आज ब्रज में होली रे रसिया” जैसे भजनों पर महिलाएं झूमती और नाचती नजर आईं। भक्ति संगीत के बीच पूरा आश्रम परिसर उत्सवमय हो गया और श्रद्धालु भगवान की भक्ति में सराबोर दिखाई दिए।

    उज्जैन को महाकाल की नगरी और भक्ति भाव की नगरी कहा जाता है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक परंपराएं हैं, जिनमें होली का पर्व भी विशेष तरीके से मनाया जाता है। सांदीपनि आश्रम में आयोजित यह फाग उत्सव इन्हीं प्राचीन परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    कीर्ति व्यास ने बताया कि होली का पर्व रंगपंचमी तक पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसी परंपरा के तहत दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के साथ फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस अवसर पर देश-विदेश से श्रद्धालु भी आश्रम पहुंचते हैं और भजन-कीर्तन के बीच फाग उत्सव का आनंद लेते हैं।

    कमला देवी व्यास ने आगे कहा कि सांदीपनि आश्रम में हर साल फाग उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु भक्ति के रंग में रंगकर इस आयोजन में शामिल होते हैं। यह उत्सव प्रतिवर्ष बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

  • 19 फरवरी महाकाल भस्म आरती: त्रिपुंड-त्रिनेत्र और ॐ के साथ बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार

    19 फरवरी महाकाल भस्म आरती: त्रिपुंड-त्रिनेत्र और ॐ के साथ बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार


    उज्जैन । विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि गुरुवार को सुबह 4 बजे कपाट खोले गए और भस्म आरती का आयोजन धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अवसर पर बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार विशेष विधि-विधान के साथ किया गया। मंदिर के गर्भगृह में पुजारियों ने सभी देवी-देवताओं का पूजन और जलाभिषेक के बाद पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से भगवान का अभिषेक किया।

    भगवान महाकाल का भांग और चंदन से राजा स्वरूप में श्रृंगार किया गया। भस्म अर्पण से पहले प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया गया और मंत्रोच्चार के साथ भगवान का ध्यान किया गया। कपूर आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढांककर भस्म रमाई गई। इसके साथ ही शेषनाग का रजत मुकुट, रजत मुण्डमाल, रुद्राक्ष की माला और पुष्पों की माला अर्पित की गई, जिससे बाबा महाकाल का अलंकरण और भी भव्य और मनोहारी दिखाई दिया।

    सुबह-सुबह सैकड़ों श्रद्धालु भस्म आरती में शामिल हुए। उन्होंने नंदी महाराज के दर्शन किए और उनके कान के समीप अपनी मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद मांगा। श्रद्धालु बाबा महाकाल की जयकारे लगाते रहे, जिससे पूरा मंदिर जयकारों की गूंज से गुंजायमान हो उठा।

    मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ सुबह से ही रही और हर कोई भक्ति और श्रद्धा भाव से बाबा महाकाल के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त कर रहा था। भस्म आरती के दौरान मंदिर में शांतिपूर्ण वातावरण, मंत्रोच्चार और दिव्य गंध ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया।

  • Aamlaki Ekadashi 2026 : फरवरी में आमलकी एकादशी कब? ये हर पाप से मुक्ति का दिन, काशी के पंडित से जानें तरीका

    Aamlaki Ekadashi 2026 : फरवरी में आमलकी एकादशी कब? ये हर पाप से मुक्ति का दिन, काशी के पंडित से जानें तरीका


    नई दिल्ली । इस एकादशी पर व्रत से सभी पापों का नाश होता है. आंवले के पेड़ की पूजा का विधान है. आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. लोकल 18 ने इस बारे में काशी के पंडित संजय उपाध्याय से बात की. वे बताते हैं कि भगवान विष्णु की पूजा के दौरान उन्हें आंवले का फल भी जरूर अर्पण करना चाहिए. इससे मनोवांछित मुराद पूरी होती है. आमलकी एकादशी व्रत विधि वाराणसी. सनातन धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्त्व है. हर महीने में दो एकादशी का व्रत होता है पहला कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत रखा जाता है. फरवरी महीने में भी दो एकादशी के व्रत हैं

    . इसी महीने में आमलकी एकादशी भी पड़ रही है. इस एकादशी के व्रत से सभी पापों का नाश होता है. फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जानते हैं. आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास होता है. इसलिए इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा से भगवान विष्णु के पूजन का फल मिलता है. आमलकी एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं. लोकल 18 से बात करते हुए काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि 26 फरवरी को आमलकी एकादशी का व्रत रखा जाएगा.


    क्या है पूजा का शुभ समय
    आमलकी एकादशी पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार, इस दिन पूजा के लिए सुबह 6 बजकर 15 मिनट से लेकर 9 बजकर 40 मिनट तक का समय बेहद शुभ है. इस समय में भगवान विष्णु की पूजा के दौरान उन्हें आंवले का फल भी जरूर अर्पण करना चाहिए. इससे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
    बाघ को मनुष्य योनी
    पंडित संजय उपाध्याय बताते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से दैवत्य की प्राप्ति होती है. कथाओं के मुताबिक, इस व्रत के प्रभाव से ही व्याघ्र (बाघ) को मनुष्य की योनि प्राप्त हुई थी. इस व्रत से मनुष्य की आर्थिक समस्याएं भी दूर होती हैं और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद उन्हें मिलता है. रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गवना कराते हैं. इस दौरान बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ जमकर होली खेलते हैं. काशी में इस दिन से शुरू हुआ रंगोत्सव होली तक चलता है. सदियों से यह परम्परा चली आ रही है.
  • शिवनवरात्रि उत्सव: महाकाल का दिव्य श्रृंगार, 15 फरवरी तक अलग-अलग स्वरूपों में होंगे दर्शन

    शिवनवरात्रि उत्सव: महाकाल का दिव्य श्रृंगार, 15 फरवरी तक अलग-अलग स्वरूपों में होंगे दर्शन


    उज्जैन । उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शिवनवरात्रि उत्सव धूमधाम और श्रद्धा-उल्लास के साथ जारी है। शनिवार को शिवनवरात्रि के दूसरे दिन मंदिर प्रांगण में कोटितीर्थ के तट पर सुबह 8 बजे से ही भक्तों का तांता लगा रहा। इस अवसर पर सुबह श्री गणेश पूजन के साथ ही श्री कोटेश्वर महादेव का विशेष पूजन, अभिषेक और आरती संपन्न हुई।

    श्री महाकालेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी घनश्याम शर्मा के आचार्यत्व में 11 ब्राह्मणों द्वारा भगवान महाकाल का अभिषेक एकादश-एकादशनी रुद्रपाठ के साथ विधिवत रूप से किया गया। अभिषेक में भक्तों की आस्था के अनुसार विशेष विधियों का पालन किया गया और मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान की पवित्रता बनी रही।

    दोपहर तीन बजे के बाद संध्या पूजन के पश्चात भगवान श्री महाकालेश्वर का विशेष श्रृंगार किया गया। इस दौरान भगवान को नवीन वस्त्रों से सजा कर मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुंड-माला, छत्र आदि से अलंकृत किया गया। इसके साथ ही भांग, चंदन और सूखे मेवों से दिव्य श्रृंगार कर भगवान को नारंगी माला और मुंड-माला अर्पित की गई। भगवान महाकाल का यह श्रृंगार भक्तों के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र बना।

    शिवनवरात्रि के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही है। हर समय भक्तों का उत्साह देखने लायक है और लोग भगवान के दर्शन के लिए कतार में लगे रहते हैं। मंदिर में विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं ताकि भक्तों को बिना किसी असुविधा के दर्शन-पूजन का अवसर मिल सके।

    विशेष रूप से यह बताया गया है कि भगवान श्री महाकालेश्वर 15 फरवरी तक प्रतिदिन सायंकाल अलग-अलग स्वरूपों में भक्तों को दर्शन देंगे। शिवनवरात्रि के इन दिनों में महाकालेश्वर का श्रृंगार और विशेष पूजा-आराधना का क्रम जारी रहेगा, जिससे भक्तों को भक्ति और आध्यात्मिक अनुभव का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा।

    शिवनवरात्रि उत्सव का यह दूसरा दिन भक्तों के लिए विशेष रूप से यादगार रहा। मंदिर के पवित्र वातावरण में सुबह से शाम तक चलने वाले अनुष्ठान और श्रृंगार ने भक्तों के मन में एक अलग ही ऊर्जा और श्रद्धा का संचार किया।

  • शबरी जयंती पर CM डॉ. मोहन यादव ने दी शुभकामनाएं, मां शबरी को भक्ति की मिसाल बताया

    शबरी जयंती पर CM डॉ. मोहन यादव ने दी शुभकामनाएं, मां शबरी को भक्ति की मिसाल बताया


    भोपाल । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मां शबरी जयंती के अवसर पर देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम की परम भक्त मां शबरी ने आस्था, श्रद्धा और भक्ति को जीवन का सर्वोच्च मार्ग बताया। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि मां शबरी का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा है और उनके आदर्शों को आत्मसात करना चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि मां शबरी ने अपनी साधना और भक्ति के माध्यम से यह सिखाया कि सच्ची भक्ति में जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति का कोई महत्व नहीं होता। उन्होंने कहा कि मां शबरी का जीवन संदेश है कि श्रद्धा और समर्पण से हर मुश्किल आसान हो जाती है। मुख्यमंत्री ने मां से प्रार्थना की कि उनकी कृपा सभी पर बनी रहे और देश-समाज में शांति, समृद्धि और सुख-शांति बनी रहे।

    मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि शबरी जयंती का पर्व हमें प्रेम, धैर्य और सेवा की भावना से प्रेरित करता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस पावन दिन पर भगवान श्रीराम और मां शबरी की भक्ति में लीन होकर अपने जीवन को सकारात्मक बनाएं और समाज में भाईचारे का संदेश फैलाएं।