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  • भोजन के बाद लगातार थकान और असामान्य भूख को न करें नजरअंदाज, डायबिटीज से जुड़े संकेत पहचानना जरूरी

    भोजन के बाद लगातार थकान और असामान्य भूख को न करें नजरअंदाज, डायबिटीज से जुड़े संकेत पहचानना जरूरी

    नई दिल्ली ।खाना खाने के बाद शरीर में कुछ बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। भोजन पचने के साथ शरीर को ऊर्जा मिलती है और कुछ लोगों को थोड़ी देर के लिए सुस्ती या नींद भी महसूस हो सकती है। हालांकि, यदि भोजन के बाद बार बार अत्यधिक प्यास, पेशाब, कमजोरी, थकान या असामान्य भूख जैसी समस्याएं महसूस होती हैं, तो इन्हें केवल सामान्य प्रतिक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में ऐसे संकेत ब्लड शुगर के असंतुलन से जुड़े हो सकते हैं।

    डायबिटीज ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उपलब्ध इंसुलिन का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन की भूमिका शरीर में ग्लूकोज के इस्तेमाल और रक्त में उसके स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण होती है। जब यह प्रक्रिया प्रभावित होती है तो ब्लड शुगर बढ़ सकता है और लंबे समय तक इसका स्तर ज्यादा रहने पर शरीर के विभिन्न अंगों पर असर पड़ सकता है।

    खाने के बाद हल्की नींद या सुस्ती कई कारणों से हो सकती है। बहुत अधिक या भारी भोजन करने, पर्याप्त नींद नहीं लेने या शरीर में पानी की कमी जैसी वजहें भी इसके पीछे हो सकती हैं। लेकिन यदि लगभग हर भोजन के बाद अत्यधिक सुस्ती, कमजोरी या थकान महसूस होती है और इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई देते हैं, तो ब्लड शुगर की जांच पर विचार करना उचित हो सकता है।

    अत्यधिक प्यास भी ऐसा संकेत है जिस पर ध्यान देना चाहिए। डायबिटीज में रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने पर शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को बाहर निकालने की कोशिश करता है। इससे पेशाब की मात्रा या आवृत्ति बढ़ सकती है और शरीर में पानी की कमी होने के कारण प्यास अधिक लग सकती है। यदि बार बार पेशाब आने और ज्यादा प्यास लगने की समस्या साथ दिखाई दे रही है, तो इसकी वजह जानने के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    कुछ लोगों को भोजन करने के बाद दोबारा भूख लगने या कमजोरी महसूस होने की शिकायत भी हो सकती है। हालांकि इसके पीछे कई अलग कारण हो सकते हैं और केवल इन लक्षणों के आधार पर डायबिटीज का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लगातार बने रहने वाले लक्षणों को अन्य स्वास्थ्य संकेतों के साथ देखकर ही स्थिति का आकलन किया जाता है।

    डायबिटीज से जुड़े सामान्य संकेतों में अत्यधिक प्यास, बार बार पेशाब आना, ज्यादा भूख लगना, लगातार थकान, धुंधला दिखाई देना और घावों का देर से भरना शामिल हो सकते हैं। जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति में सभी लक्षण एक साथ दिखाई दें। कई बार शुरुआती अवस्था में संकेत बेहद हल्के होते हैं और व्यक्ति उन्हें सामान्य परेशानी समझकर छोड़ देता है।

    खाने के बाद ब्लड शुगर का कुछ समय के लिए बढ़ना शरीर की सामान्य प्रतिक्रिया है, क्योंकि भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट पचकर ग्लूकोज में बदलते हैं। समस्या तब हो सकती है जब शुगर का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़े या लंबे समय तक सामान्य स्तर पर वापस न आए। ऐसी स्थिति का पता केवल शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों से नहीं, बल्कि उचित रक्त जांच और चिकित्सकीय मूल्यांकन से लगाया जाता है।

    यदि भोजन के बाद अत्यधिक प्यास, बार बार पेशाब, लगातार थकान, कमजोरी या असामान्य भूख कई दिनों या हफ्तों तक बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। समय पर जांच से स्थिति की पहचान और आवश्यक प्रबंधन शुरू करने में मदद मिल सकती है। खासतौर पर लगातार दोहराए जाने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय उनकी वजह समझना स्वास्थ्य के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

  • पानी पीने के बाद भी बार-बार लगती है प्यास तो इन स्वास्थ्य समस्याओं का हो सकता है संकेत, जानें कब सावधान हों

    पानी पीने के बाद भी बार-बार लगती है प्यास तो इन स्वास्थ्य समस्याओं का हो सकता है संकेत, जानें कब सावधान हों

    नई दिल्ली । गर्मी, ज्यादा पसीना आने, शारीरिक मेहनत करने या पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीने पर बार-बार प्यास लगना सामान्य स्थिति हो सकती है। हालांकि, अगर पानी पीने के बाद भी प्यास जल्दी बुझती नहीं है और यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो इसे केवल सामान्य प्यास मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार और असामान्य प्यास शरीर में पानी या इलेक्ट्रोलाइट संतुलन से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकती है।

    बार-बार प्यास लगने की सबसे आम वजह डिहाइड्रेशन हो सकती है। तेज गर्मी में रहने, व्यायाम करने या अधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है। अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थ खाने से भी प्यास बढ़ सकती है। कैफीन युक्त पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन कुछ लोगों में पेशाब बढ़ाकर शरीर के तरल संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

    लगातार अत्यधिक प्यास डायबिटीज से जुड़ा एक महत्वपूर्ण लक्षण भी हो सकती है। जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर अधिक बढ़ जाता है, तो शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को पेशाब के रास्ते बाहर निकालने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में शरीर से अधिक मात्रा में पानी निकल सकता है और व्यक्ति को बार-बार पेशाब आने के साथ ज्यादा प्यास महसूस हो सकती है। इसके साथ थकान, वजन में बदलाव या धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।

    किडनी शरीर में पानी, नमक और दूसरे इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किडनी के कामकाज में समस्या होने पर शरीर के तरल संतुलन में बदलाव आ सकता है। हालांकि केवल ज्यादा प्यास लगने के आधार पर किडनी की बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यदि इसके साथ पैरों या चेहरे पर सूजन, पेशाब में बदलाव या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

    बार-बार प्यास लगने की एक अपेक्षाकृत कम सामान्य वजह डायबिटीज इन्सिपिडस भी हो सकती है। यह डायबिटीज मेलिटस से अलग स्थिति है और इसमें शरीर के पानी के संतुलन को नियंत्रित करने वाली हार्मोनल व्यवस्था प्रभावित होती है। इसके कारण बहुत अधिक मात्रा में पतला पेशाब आ सकता है और उसके बाद अत्यधिक प्यास महसूस हो सकती है।

    कई बार व्यक्ति को वास्तविक रूप से शरीर में पानी की कमी न होने के बावजूद मुंह सूखने के कारण प्यास जैसा महसूस होता है। इसे ड्राई माउथ कहा जाता है। इसमें मुंह और जीभ में सूखापन, चिपचिपापन या होंठों के सूखने जैसी शिकायत हो सकती है। कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव, तनाव और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी मुंह सूखने की वजह बन सकती हैं।

    इसलिए केवल प्यास लगने के आधार पर किसी बीमारी की पहचान करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। समस्या लगातार बनी रहे, बहुत ज्यादा पेशाब आए, रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़े, असामान्य कमजोरी महसूस हो या वजन में बिना वजह बदलाव आए तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। आवश्यकता के अनुसार डॉक्टर रक्त शर्करा, किडनी की कार्यक्षमता, इलेक्ट्रोलाइट्स और अन्य जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।

    बच्चों और बुजुर्गों में शरीर में पानी की कमी तेजी से गंभीर हो सकती है। अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, भ्रम, बेहोशी या पानी न पी पाने जैसी स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय सहायता जरूरी हो सकती है। लगातार प्यास को समझने का सबसे सही तरीका इसके साथ मौजूद दूसरे लक्षणों और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति को देखना है।

  • अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    नई दिल्ली ।उत्तम स्वास्थ्य और बेहतर जीवन शैली बनाए रखने के लिए सही खानपान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि किन चीजों के सेवन से बचा जाना चाहिए। जिन खाद्य पदार्थों को सेहत के लिए सबसे अधिक हानिकारक माना जाता है, उनमें अतिरिक्त चीनी प्रमुख है। अत्यधिक मात्रा में चीनी का सेवन मोटापे, मधुमेह और शरीर में अंदरूनी सूजन जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है।

    आमतौर पर लोग चीनी छोड़ने का अर्थ केवल चाय, कॉफी या मिठाइयों का त्याग करना समझते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इन चीजों को बंद कर देना ही पर्याप्त नहीं है। रसोई में उपयोग होने वाली और बाजार में मिलने वाली कई अन्य सामान्य चीजों में भी चीनी की भारी मात्रा छिपी हो सकती है। सॉस, टोमैटो केचप, डिब्बाबंद ड्रिंक्स और फ्लेवर्ड दही जैसे पदार्थों में शर्करा की अदृश्य मौजूदगी होती है, जो रोजमर्रा के खानपान में मिठास बढ़ा देती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हर मीठी वस्तु का स्वाद मिठाई जैसा तेज होना आवश्यक नहीं है। कई ऐसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ हैं जिनका स्वाद नमकीन या सामान्य लगता है, लेकिन उनमें एडेड शुगर मिलाई जाती है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से चीनी का सेवन बंद भी कर देता है, तब भी इन प्रसंस्कृत पदार्थों के माध्यम से चीनी शरीर में पहुंचती रहती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि दैनिक कुल कैलोरी में एडेड शुगर का हिस्सा 10 प्रतिशत से कम होना चाहिए।

    आहार विशेषज्ञों के मुताबिक एक सामान्य वयस्क के लिए प्रतिदिन 2,000 कैलोरी की डाइट में चीनी की मात्रा लगभग 50 ग्राम यानी 6 से 9 चम्मच से अधिक नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, महज एक टेबलस्पून टोमैटो केचप में लगभग 4 ग्राम एडेड शुगर हो सकती है। सैंडविच, बर्गर या नाश्ते के साथ नियमित रूप से सॉस का उपयोग करने की आदत कुल चीनी की खपत को चुपचाप बढ़ा देती है। इसी तरह, पैकेज्ड फ्रूट जूस को भी पूरी तरह से स्वास्थ्यवर्धक मानना एक भूल हो सकती है।

    पैकेज्ड जूस में प्राकृतिक फाइबर की कमी होती है और उन्हें संरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त चीनी मिलाई जाती है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि बाजार से कोई भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय केवल कैलोरी ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद एडेड शुगर की मात्रा की जांच अवश्य करनी चाहिए। स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बजाय प्राकृतिक और ताजा आहार को प्राथमिकता देना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

  • पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    नई दिल्ली ।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पेट की गहराई में जमा होने वाली आंतरिक चर्बी यानी विसरल फैट को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। चिकित्सीय अध्ययनों के अनुसार यह चर्बी त्वचा के ठीक नीचे जमा होने वाले सामान्य फैट से पूरी तरह भिन्न होती है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लिवर, आंत और अग्न्याशय के आसपास जमा होती है।

    चिकित्सकों के मुताबिक देखने में सामान्य या पतले नजर आने वाले व्यक्तियों में भी विसरल फैट की समस्या हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को थिन आउटसाइड-फैट इनसाइड कहा जाता है। कमर का घेरा बढ़ना और पेट का बाहर निकलना इस समस्या का प्रमुख प्राथमिक संकेत हो सकता है।

    शोधकर्ताओं ने पाया है कि शरीर में विसरल फैट की अत्यधिक मात्रा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। इससे शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित होने लगता है और व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज का शिकार हो सकता है।

    इसके अतिरिक्त यह आंतरिक चर्बी शरीर में पुरानी सूजन और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का कारण बनती है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है जो आगे चलकर गंभीर हृदय रोगों में बदल सकता है।

    असंतुलित खानपान, बहुत ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन, मीठे पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन और शारीरिक गतिविधि की कमी को विसरल फैट बढ़ने का मुख्य कारण माना गया है। घंटों बैठकर काम करने की आधुनिक जीवनशैली के कारण दिल्ली और मध्य प्रदेश सहित देश भर के शहरी इलाकों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस समस्या से निपटने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम जैसे वॉक, साइकिलिंग और एरोबिक्स बेहद जरूरी हैं। साथ ही आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों, हरी सब्जियों और साबुत अनाज को शामिल कर तथा मीठे पेय पदार्थों से परहेज रखकर इस जोखिम से बचा जा सकता है।

  • कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत

    कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत


    नई दिल्ली । अगर आपकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा ऑफिस की कुर्सी या घर के सोफे पर बैठकर गुजरता है और दिनभर शरीर को पर्याप्त मेहनत नहीं मिलती तो अब सावधान होने का समय है। लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना सिर्फ वजन बढ़ने की वजह नहीं बनता बल्कि धीरे-धीरे शरीर की कई जरूरी प्रणालियों पर असर डाल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर के करीब 31 प्रतिशत वयस्क पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे थे। विशेषज्ञों के मुताबिक पर्याप्त सक्रिय न रहने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम सक्रिय लोगों की तुलना में करीब 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है। ऐसे में रोजाना कुछ समय शरीर को सक्रिय रखना स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा बन जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए हर किसी के लिए जिम जाना जरूरी नहीं है। रोजाना तेज कदमों से चलना, साइकिल चलाना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और घर के सामान्य कामों में सक्रिय रहना भी शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट तक मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देता है। इसका मतलब है कि दिनभर लगातार बैठे रहने के बजाय काम के बीच छोटे ब्रेक लेकर कुछ देर चलना भी आपकी दिनचर्या को बेहतर बना सकता है।

    शारीरिक गतिविधि की कमी का असर सबसे पहले हृदय और मेटाबॉलिज्म पर दिखाई दे सकता है। नियमित व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने के साथ हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करता है। वहीं लगातार बैठे रहने और शरीर को पर्याप्त गतिविधि न मिलने से लंबे समय में कई गैर-संचारी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए अगर काम की वजह से घंटों कुर्सी पर बैठना मजबूरी है तो बीच बीच में उठकर कुछ कदम चलना और शरीर को स्ट्रेच करना उपयोगी आदत हो सकती है।

    निष्क्रिय जीवनशैली का एक बड़ा खतरा टाइप-2 डायबिटीज से भी जुड़ा है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को ग्लूकोज का बेहतर इस्तेमाल करने और वजन नियंत्रित रखने में मदद करती है। इसके विपरीत लंबे समय तक बैठे रहने वाली दिनचर्या वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं की संभावना को बढ़ा सकती है। इसलिए डायबिटीज से बचाव के लिए केवल खानपान पर ध्यान देना ही पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि रोजाना की शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    दिनभर कम चलने फिरने का सीधा असर वजन पर भी पड़ सकता है। जब शरीर कम ऊर्जा खर्च करता है और खानपान से मिलने वाली कैलोरी अधिक रहती है तो धीरे धीरे वजन बढ़ने लगता है। बढ़ता वजन आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर में गड़बड़ी और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में संतुलित आहार के साथ रोजमर्रा की गतिविधियों को बढ़ाना जरूरी है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि शारीरिक सक्रियता को किसी एक कठिन व्यायाम तक सीमित न समझें। छोटी दूरी के लिए पैदल जाना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लेना, काम के बीच कुछ मिनट चलना और रोजाना वॉक की आदत बनाना शुरुआत के आसान तरीके हो सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को पहले से कोई बीमारी है या व्यायाम शुरू करने में परेशानी महसूस होती है तो डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। शरीर को सक्रिय रखना केवल फिट दिखने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ और बेहतर जीवन जीने के लिए भी जरूरी है।

  • वजन घटाने का शॉर्टकट पड़ सकता है भारी सस्ता हुआ सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन बिना डॉक्टर सलाह इस्तेमाल से बढ़ीं स्वास्थ्य समस्याएं

    वजन घटाने का शॉर्टकट पड़ सकता है भारी सस्ता हुआ सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन बिना डॉक्टर सलाह इस्तेमाल से बढ़ीं स्वास्थ्य समस्याएं


    नई दिल्ली । वजन कम करने की बढ़ती होड़ और सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे फिटनेस ट्रेंड के बीच डायबिटीज और मोटापे के इलाज में इस्तेमाल होने वाला सेमाग्लूटाइड आधारित इंजेक्शन अब नई चिंता का कारण बन गया है। पहले यह इंजेक्शन केवल विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में गंभीर मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों को दिया जाता था लेकिन इसकी कीमत कम होने के बाद अब बड़ी संख्या में लोग केवल पतला दिखने की चाह में बिना चिकित्सकीय सलाह इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रवृत्ति भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकती है।

    मार्च 2026 में सेमाग्लूटाइड का पेटेंट समाप्त होने के बाद इसके जेनेरिक संस्करण बाजार में उपलब्ध होने लगे। पहले जहां इसका प्री फिल्ड पेन लगभग 20 हजार रुपए में मिलता था वहीं अब इसकी कीमत घटकर करीब 1500 रुपए रह गई है। कीमत में आई इस बड़ी गिरावट के बाद इसकी मांग में अचानक कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन के अनुसार पहले जहां हर महीने लगभग 4 हजार इंजेक्शन की मांग रहती थी वहीं अब यह संख्या बढ़कर करीब 19 हजार प्रति माह तक पहुंच गई है।

    चिकित्सकों का कहना है कि सेमाग्लूटाइड मोटापा और टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में प्रभावी दवा है लेकिन इसका उपयोग केवल विशेषज्ञ की सलाह और नियमित चिकित्सकीय निगरानी में ही किया जाना चाहिए। एंडोक्राइन विशेषज्ञ डॉ. मनुज शर्मा के अनुसार यह दवा मरीज की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए धीरे धीरे निर्धारित खुराक में शुरू की जाती है। बिना जांच और सही डोज के इसका उपयोग गंभीर दुष्प्रभाव पैदा कर सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस इंजेक्शन के शुरुआती दुष्प्रभावों में मतली उल्टी पेट भरा भरा महसूस होना कब्ज दस्त और कमजोरी जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं। कुछ मामलों में शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन पित्ताशय में पथरी पित्ताशय की सूजन और अग्न्याशय में सूजन जैसी गंभीर जटिलताएं भी सामने आ सकती हैं। यही कारण है कि डॉक्टर लगातार लोगों से बिना चिकित्सकीय सलाह इस दवा का उपयोग नहीं करने की अपील कर रहे हैं।

    भोपाल के अस्पतालों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां लोग केवल जल्दी वजन कम करने की इच्छा से यह इंजेक्शन लेने लगे। एक 27 वर्षीय युवती ने शादी से पहले तेजी से वजन घटाने के लिए इसका उपयोग शुरू किया लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद तेज पेट दर्द उल्टी और गंभीर डिहाइड्रेशन के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। जांच में पित्ताशय में पथरी और शरीर में पानी की गंभीर कमी पाई गई जिसके बाद लंबे इलाज से उसकी स्थिति सामान्य हो सकी।

    इसी तरह 34 वर्षीय एक महिला ने सोशल मीडिया से प्रभावित होकर बिना डॉक्टर की सलाह तीन महीने तक यह इंजेक्शन लिया। इस दौरान उसका वजन लगभग 14 किलो कम हो गया लेकिन लगातार कमजोरी और उल्टी की शिकायत शुरू हो गई। चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टरों ने तुरंत इंजेक्शन बंद कराया और उपचार शुरू किया।

    सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. प्रणव रघुवंशी का कहना है कि सेमाग्लूटाइड हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त दवा नहीं है। इसे शुरू करने से पहले मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री मोटापे की गंभीरता अन्य बीमारियों और संभावित जोखिमों का विस्तृत मूल्यांकन आवश्यक होता है। केवल वजन घटाने या आकर्षक दिखने के उद्देश्य से इसका उपयोग करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ जीवनशैली संतुलित आहार नियमित व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह के साथ किया गया उपचार ही सुरक्षित और स्थायी तरीके से वजन नियंत्रित करने का सबसे बेहतर विकल्प है। किसी भी दवा को सोशल मीडिया के ट्रेंड या दूसरों की सलाह पर लेने के बजाय हमेशा योग्य चिकित्सक से परामर्श करना जरूरी है।

  • डायबिटीज चुपचाप छीन सकती है आंखों की रोशनी जानिए किन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से मिलना है जरूरी

    डायबिटीज चुपचाप छीन सकती है आंखों की रोशनी जानिए किन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से मिलना है जरूरी


    नई दिल्ली । डायबिटीज आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली गंभीर बीमारियों में शामिल है। अधिकांश लोग इसे केवल ब्लड शुगर बढ़ने तक सीमित मानते हैं लेकिन इसका असर शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ता है। इनमें आंखें सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं। लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित रहने पर आंखों की बेहद महीन रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं जिससे धीरे धीरे नजर कमजोर होने लगती है और समय पर इलाज न मिलने पर अंधेपन तक का खतरा पैदा हो सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटीज के कारण होने वाली आंखों की बीमारी को डायबिटिक रेटिनोपैथी कहा जाता है। यह स्थिति तब विकसित होती है जब लगातार बढ़ा हुआ ब्लड शुगर रेटिना की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है। शुरुआत में इस बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते इसलिए अधिकांश मरीज तब तक अनजान रहते हैं जब तक आंखों की रोशनी प्रभावित नहीं होने लगती। यही वजह है कि डायबिटीज के मरीजों के लिए नियमित आंखों की जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।

    यदि आपको धुंधला दिखाई देने लगा है आंखों के सामने काले धब्बे या फ्लोटर्स नजर आते हैं रात में देखने में परेशानी होती है या रंगों की पहचान करने में दिक्कत महसूस होती है तो इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण डायबिटिक रेटिनोपैथी या आंखों से जुड़ी किसी अन्य गंभीर बीमारी का संकेत हो सकते हैं। समय रहते नेत्र विशेषज्ञ से जांच कराने पर इन समस्याओं का उपचार संभव है और आंखों की रोशनी को बचाया जा सकता है।

    डॉक्टरों का कहना है कि डायबिटीज केवल रेटिना तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि इससे मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी आंखों की बीमारियों का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए केवल ब्लड शुगर की दवा लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है। ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना आंखों की रक्त वाहिकाओं पर अतिरिक्त दबाव को कम करता है और जटिलताओं का जोखिम घटाता है।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि टाइप टू डायबिटीज से पीड़ित हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार आंखों की विस्तृत जांच जरूर करानी चाहिए। साथ ही नियमित रूप से HbA1c जांच कराकर ब्लड शुगर की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए। संतुलित आहार नियमित व्यायाम पर्याप्त नींद और तनाव से दूरी भी आंखों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    धूम्रपान करने वाले लोगों में डायबिटीज के कारण आंखों की जटिलताओं का खतरा और अधिक बढ़ जाता है इसलिए धूम्रपान छोड़ना भी बेहद जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाओं का नियमित सेवन करना और किसी भी तरह की दृष्टि संबंधी समस्या होने पर तुरंत जांच कराना भविष्य में गंभीर नुकसान से बचा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डायबिटिक रेटिनोपैथी का समय रहते पता चल जाए और सही उपचार शुरू कर दिया जाए तो अधिकांश मामलों में आंखों की रोशनी को सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए डायबिटीज के मरीजों को अपनी आंखों की नियमित जांच को उतनी ही प्राथमिकता देनी चाहिए जितनी वे ब्लड शुगर की जांच को देते हैं।

  • नौतपा का प्रचंड असर शुरू: इन बीमारियों से जूझ रहे लोग रहें अलर्ट, लापरवाही पड़ सकती है भारी

    नौतपा का प्रचंड असर शुरू: इन बीमारियों से जूझ रहे लोग रहें अलर्ट, लापरवाही पड़ सकती है भारी


    नई दिल्ली।
    देश के कई हिस्सों में नौतपा की शुरुआत के साथ भीषण गर्मी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। तापमान लगातार बढ़ रहा है और तेज धूप लोगों की सेहत पर भारी पड़ने लगी है। डॉक्टरों का कहना है कि सामान्य लोगों की तुलना में पहले से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को इस दौरान अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। बढ़ती गर्मी शरीर के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती है, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। ऐसे में लापरवाही कई बार बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा के दौरान शरीर पर हीट स्ट्रेस तेजी से बढ़ता है। अत्यधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स की कमी होने लगती है। इसका सीधा असर शरीर की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। खासतौर पर डायबिटीज, हार्ट, किडनी, अस्थमा और मोटापे से पीड़ित लोगों में जोखिम ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि डॉक्टर इन मरीजों को समय रहते सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं।

    डायबिटीज के मरीजों में गर्मी का असर कई तरह से दिखाई देता है। शरीर में पानी की कमी होने पर ब्लड शुगर का स्तर प्रभावित हो सकता है। कई बार डिहाइड्रेशन के कारण शुगर अचानक बढ़ या घट सकती है, जिससे मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है। इसके अलावा इंसुलिन की कार्यक्षमता पर भी अधिक तापमान असर डाल सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों को समय-समय पर पानी पीने और शुगर की नियमित जांच करते रहने की सलाह दी जा रही है।

    किडनी रोगियों के लिए भी नौतपा का समय चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। अधिक पसीना निकलने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है। इससे किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पहले से मौजूद समस्या गंभीर हो सकती है। डॉक्टरों का मानना है कि पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना ऐसे मरीजों के लिए बेहद जरूरी है।

    हार्ट मरीजों के लिए भी बढ़ती गर्मी चिंता का विषय है। अत्यधिक तापमान शरीर के तापमान नियंत्रण तंत्र पर दबाव डालता है। कई मामलों में हीट स्ट्रोक या हीट एग्जॉशन की स्थिति बन सकती है, जिससे दिल पर अतिरिक्त भार पड़ता है। इसी तरह अस्थमा और सांस संबंधी मरीजों में गर्म हवा और वातावरणीय बदलाव सांस लेने में परेशानी बढ़ा सकते हैं।

    डॉक्टरों की सलाह है कि नौतपा के दौरान दोपहर में अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचना चाहिए। हल्के और सूती कपड़े पहनने, पर्याप्त पानी पीने, तला-भुना भोजन कम खाने और शरीर को ठंडा रखने जैसे छोटे उपाय बड़ी समस्याओं से बचा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही सावधानी और संतुलित दिनचर्या अपनाकर भीषण गर्मी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • गर्मियों में खरबूजा खाने से पहले बरतें ये जरूरी सावधानियां, नहीं तो सेहत पर पड़ सकता है भारी असर

    गर्मियों में खरबूजा खाने से पहले बरतें ये जरूरी सावधानियां, नहीं तो सेहत पर पड़ सकता है भारी असर

    नई दिल्ली । गर्मियों के मौसम में जैसे ही तापमान बढ़ता है, बाजारों में रसीले और ठंडक देने वाले फलों की मांग भी तेजी से बढ़ जाती है। इन्हीं में खरबूजा एक ऐसा फल है जो अपनी मिठास, पानी की अधिक मात्रा और ठंडक देने वाले गुणों के कारण लोगों की पहली पसंद बन जाता है। यह फल शरीर को हाइड्रेट रखने, थकान दूर करने और गर्मी के प्रभाव को कम करने में मदद करता है, लेकिन इसके सेवन को लेकर सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि खरबूजा जितना फायदेमंद है, उतना ही कुछ परिस्थितियों में यह नुकसान भी पहुंचा सकता है। खासकर उन लोगों के लिए जो पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं, उनके लिए इसका सेवन सोच-समझकर करना आवश्यक है। शरीर की प्रकृति और पाचन क्षमता के अनुसार ही इस फल को आहार में शामिल करना उचित माना जाता है।

    डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए खरबूजा विशेष सावधानी की मांग करता है। इसमें प्राकृतिक शर्करा मौजूद होती है, जो रक्त में शुगर के स्तर को प्रभावित कर सकती है। इसलिए ऐसे मरीजों को इसे सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए और अपने चिकित्सक की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसी तरह जिन लोगों का पाचन तंत्र कमजोर होता है, उन्हें भी खरबूजे के सेवन के बाद गैस, पेट फूलने और अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खाली पेट या अधिक मात्रा में इसका सेवन इन समस्याओं को और बढ़ा सकता है।

    इसके अलावा कुछ लोगों में खरबूजे से एलर्जी की समस्या भी देखी जाती है। ऐसे मामलों में इसे खाने के बाद गले में खुजली, त्वचा पर चकत्ते या होंठों में सूजन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत इसका सेवन बंद करना आवश्यक होता है। किडनी या लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी यह फल सीमित मात्रा में ही उपयुक्त माना जाता है क्योंकि इसमें मौजूद पानी और पोटैशियम की अधिक मात्रा शरीर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

    आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार खरबूजा एक शीतल और पौष्टिक फल है, जो गर्मियों में शरीर को ऊर्जा और ठंडक दोनों प्रदान करता है। लेकिन इसके सेवन का सही समय भी महत्वपूर्ण होता है। भोजन के तुरंत बाद खरबूजा खाना पाचन क्रिया को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इसे खाने के बीच में या उचित अंतराल के बाद ही लेना बेहतर माना जाता है।

    विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सर्दी-खांसी जैसी स्थितियों में यदि किसी व्यक्ति को खरबूजा खाने के बाद असुविधा महसूस होती है, तो उसे अस्थायी रूप से इससे परहेज करना चाहिए। हालांकि सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्तियों के लिए यह फल बेहद लाभकारी और ताजगी देने वाला माना जाता है, बशर्ते इसका सेवन संतुलित मात्रा में किया जाए।

    गर्मी के मौसम में खरबूजा निश्चित रूप से एक बेहतरीन विकल्प है, लेकिन इसका सही उपयोग ही इसे स्वास्थ्य के लिए वरदान बनाता है, वरना यह लापरवाही में परेशानी का कारण भी बन सकता है।

  • मीठी तुलसी के चमत्कारी फायदे ,गर्मियों में शरीर को देगी ठंडक और सेहत

    मीठी तुलसी के चमत्कारी फायदे ,गर्मियों में शरीर को देगी ठंडक और सेहत


    नई दिल्ली । भारतीय परंपरा में तुलसी का विशेष महत्व रहा है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि मीठी तुलसी भी गुणों से भरपूर एक औषधीय पौधा है। आयुर्वेद में इसे बेहद उपयोगी माना गया है और खासकर गर्मियों में इसका सेवन कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।

    मीठी तुलसी को स्टीविया के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राकृतिक रूप से मीठी होती है और इसकी मिठास सामान्य चीनी से कई गुना अधिक होती है। खास बात यह है कि इसमें ग्लूकोज या सुक्रोज नहीं होता, इसलिए यह रक्त शर्करा को नहीं बढ़ाती। यही कारण है कि डायबिटीज के मरीज सीमित मात्रा में इसका सेवन कर सकते हैं।

    आयुर्वेद के अनुसार, मीठी तुलसी पित्त को शांत करने में मदद करती है। गर्मियों में जब शरीर में गर्मी और एसिडिटी बढ़ जाती है, तब इसके पत्तों से बना शरबत या काढ़ा पेट को ठंडक देता है और जलन को कम करता है। यह शरीर के तापमान को संतुलित रखने में भी सहायक होती है।

    मीठा खाने की इच्छा को नियंत्रित करने में भी स्टीविया काफी कारगर है। इसमें कैलोरी बहुत कम होती है, जिससे यह वजन नियंत्रित रखने में मदद करती है। जो लोग डाइटिंग कर रहे हैं या वजन घटाना चाहते हैं, उनके लिए यह एक बेहतर विकल्प बन सकती है।

    इसके अलावा, मीठी तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जो दांतों को कैविटी और सड़न से बचाने में मदद करते हैं। जहां रिफाइंड शुगर दांतों के लिए नुकसानदायक होती है, वहीं स्टीविया एक सुरक्षित विकल्प के रूप में सामने आती है।

    ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में भी यह उपयोगी मानी जाती है। खासकर गर्मियों में लो ब्लड प्रेशर की समस्या होने पर इसका सेवन लाभकारी हो सकता है। साथ ही यह पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत देती है।

    त्वचा के लिए भी मीठी तुलसी फायदेमंद है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को साफ और स्वस्थ रखने में मदद करते हैं, जिससे त्वचा संबंधी समस्याएं कम होती हैं।

    कुल मिलाकर, मीठी तुलसी केवल स्वाद में ही नहीं बल्कि गुणों में भी बेहद समृद्ध है। इसे अपनी डाइट में शामिल कर आप गर्मियों में सेहतमंद और संतुलित जीवन की ओर एक आसान कदम बढ़ा सकते हैं।