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  • देश में तेजी से बढ़ रहीं डायबिटीज और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं…. हर 10 में से 4 इससे पीड़ित

    देश में तेजी से बढ़ रहीं डायबिटीज और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं…. हर 10 में से 4 इससे पीड़ित


    नई दिल्ली।
    देश में डायबिटीज (Diabetes) और मानसिक तनाव (Mental stress) जैसी स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़़ रही हैं, इसका अंदाजा हाल के हेल्थ डेटा (Health data) से लगाया जा सकता है. डाटा के मुताबिक, देश में बड़ी संख्या में लोगों की ब्लड शुगर (Blood sugar) सामान्य से अधिक पाई गई है. वहीं करीब 40 फीसदी लोगों ने अपने शरीर में मानसिक तनाव का लेवल काफी ज्यादा बताया. आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि स्वास्थ्य जांच कराने के मामले में लोगों की आर्थिक स्थिति का बड़ा असर पड़ता है.

    Workforce Health Index 2026 के डाटा के मुताबिक, 10 में से लगभग 4 रिपोर्ट में बढ़ी शुगर आई है. कुल 7,088 लोगों के HbA1c टेस्ट रिपोर्ट में 38.7 फीसदी रिपोर्ट ऐसी थीं, जिनमें ब्लड शुगर का लेवल प्री-डायबिटीज या डायबिटीज पर था. HbA1c एक तरह का ब्लड टेस्ट है, जिससे पिछले करीब 2-3 महीनों के दौरान शरीर में ब्लड शुगर के औसत स्तर का अंदाजा लगाया जाता है. इसलिए इस टेस्ट की रिपोर्ट व्यक्ति के लंबे समय के ब्लड शुगर कंट्रोल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देती है।


    10 में 4 लोगों ने बताया ज्यादा मानसिक तनाव

    ब्लड शुगर के साथ मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक और आंकड़ा सामने आया. कुल 7,346 लोगों में से 40.4 फीसदी लोगों ने पिछले एक सप्ताह में अपने शरीर में मानसिक तनाव लेवल बहुत ज्यादा बताया है. यानी बड़ी संख्या में लोगों ने खुद को काफी ज्यादा मानसिक तनाव महसूस किया है।

    आंकड़ों में यह भी सामने आया कि हेल्थ इंश्योरेंस से जुड़े दावों में कर्मचारियों की तुलना में उनके परिवार की हिस्सेदारी ज्यादा रही. कुल दावों में 66.5 फीसदी परिवार के सदस्यों से जुड़े थे, जबकि कर्मचारियों से जुड़े दावों की हिस्सेदारी 33.5 फीसदी रही. यह आंकड़ा बताता है कि स्वास्थ्य बीमा का इस्तेमाल केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उनके परिवार के सदस्य भी बड़ी संख्या में कर रहे हैं.


    आय बढ़ी तो फुल-बॉडी हेल्थ टेस्ट भी बढ़ा

    स्वास्थ्य जांच को लेकर आर्थिक स्थिति का बड़ा अंतर भी देखने को मिला. सालाना 3 लाख रुपये से कम आय वाले लोगों में केवल 15.6 फीसदी ने फुल-बॉडी डायग्नोस्टिक टेस्ट कराने की जानकारी दी. इसग्वालियर हाईकोर्ट का फैसला, OBC क्रीमी लेयर तय करने में सिर्फ वेतन नहीं, अन्य पहलू भी जरूरीके मुकाबले 40 लाख रुपये या उससे अधिक सालाना आय वाले लोगों में यह आंकड़ा बढ़कर 54.3 फीसदी हो गया है।

  • 8 घंटे की नींद के बाद भी सुबह थकान रहती है तो इन स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज न करें, जानें प्रमुख कारण

    8 घंटे की नींद के बाद भी सुबह थकान रहती है तो इन स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज न करें, जानें प्रमुख कारण

    नई दिल्ली ।सुबह आंख खुलने के बाद शरीर भारी महसूस होना, बिस्तर से उठने का मन न करना और रातभर सोने के बावजूद तरोताजा महसूस न होना कई लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। आमतौर पर पर्याप्त नींद के बाद शरीर को आराम और ऊर्जा महसूस होनी चाहिए, लेकिन अगर हर दिन सुबह उठने के बाद थकान बनी रहती है तो इसके कारणों पर ध्यान देना जरूरी है।

    कभी-कभार देर रात तक जागने, पर्याप्त नींद न लेने या तनाव के कारण सुबह कमजोरी और सुस्ती महसूस हो सकती है। खान-पान में गड़बड़ी और नियमित व्यायाम की कमी भी शरीर की ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है। लेकिन पर्याप्त समय सोने के बाद भी लगातार थकान रहना केवल नींद की कमी का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।

    शरीर में आयरन की कमी या एनीमिया सुबह की थकान का एक कारण हो सकता है। एनीमिया की स्थिति में शरीर की ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसके कारण व्यक्ति को कमजोरी और लगातार थकान के साथ सांस फूलने या दिल की धड़कन तेज महसूस होने जैसी परेशानियां हो सकती हैं। यदि सामान्य काम करने पर भी जल्दी थकान होने लगे तो इस समस्या पर ध्यान देना जरूरी है।

    थायरॉइड से जुड़ी समस्या भी लगातार थकान और ऊर्जा की कमी का कारण बन सकती है। हाइपोथायरॉइडिज्म में थायरॉइड हार्मोन का स्तर कम होने से शरीर की कई सामान्य प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसके साथ वजन बढ़ना, सामान्य से अधिक ठंड लगना, कब्ज और ध्यान लगाने में परेशानी जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।

    डायबिटीज में भी लंबे समय तक थकान बनी रह सकती है। इसलिए अगर सुबह की कमजोरी लगातार बनी हुई है और इसके साथ अन्य असामान्य बदलाव भी महसूस हो रहे हैं तो इसे केवल उम्र, ज्यादा काम या नींद की कमी से जोड़कर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    नींद की गुणवत्ता भी सुबह की थकान का महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। कुछ लोगों को पर्याप्त घंटे बिस्तर पर रहने के बावजूद गहरी और लगातार नींद नहीं मिल पाती। स्लीप एपनिया जैसी स्थिति में सोते समय सांस लेने में रुकावट आ सकती है। इसके कारण नींद बार-बार टूट सकती है और व्यक्ति को सुबह उठने के बाद भी ऐसा लग सकता है कि रातभर पर्याप्त आराम नहीं मिला।

    तनाव और मानसिक दबाव भी नींद और ऊर्जा के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह असंतुलित खान-पान और शारीरिक गतिविधि की कमी से भी दिनभर सुस्ती और थकान महसूस हो सकती है। इसलिए लगातार बनी रहने वाली थकान के पीछे केवल एक कारण मान लेना उचित नहीं है।

    अगर सुबह उठने के बाद नियमित रूप से थकान रहती है तो इसके साथ दिखाई देने वाले दूसरे लक्षणों पर भी ध्यान देना चाहिए। बार-बार पेशाब आना, वजन में बदलाव, अत्यधिक ठंड लगना, सांस फूलना, कमजोरी या नींद के दौरान घुटन और हांफने जैसी समस्या किसी अंतर्निहित स्वास्थ्य स्थिति की ओर संकेत कर सकती है।

    कभी-कभार होने वाली थकान सामान्य हो सकती है, लेकिन अगर यह समस्या लगातार बनी हुई है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगे हैं तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। डॉक्टर लक्षणों और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर आवश्यक जांच की सलाह दे सकते हैं। एनीमिया, थायरॉइड और अन्य संभावित कारणों की पहचान होने पर समस्या के अनुसार उपचार और जीवनशैली में बदलाव किए जा सकते हैं।

    सुबह की थकान को लंबे समय तक नजरअंदाज करने के बजाय नींद की गुणवत्ता, खान-पान, तनाव और शारीरिक गतिविधि पर ध्यान देना भी जरूरी है। पर्याप्त नींद लेने के बावजूद लगातार ऊर्जा की कमी बनी रहे तो इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य कारणों की जांच कराना समस्या को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • फैटी लिवर सिर्फ मोटे लोगों की बीमारी नहीं, दुबले-पतले लोगों में भी बढ़ सकता है खतरा; जानें किन कारणों से लिवर में जमा होती है चर्बी

    फैटी लिवर सिर्फ मोटे लोगों की बीमारी नहीं, दुबले-पतले लोगों में भी बढ़ सकता है खतरा; जानें किन कारणों से लिवर में जमा होती है चर्बी

    नई दिल्ली । फैटी लिवर की समस्या दुनियाभर में तेजी से बढ़ती हुई देखी जा रही है। शराब का सेवन न करने वाले लोगों में होने वाली नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज का नाम बदलकर अब मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज किया गया है। यह लिवर की सबसे आम क्रोनिक बीमारियों में शामिल है और बड़ी संख्या में वयस्कों को प्रभावित करती है।

    भारत में भी फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आमतौर पर इसे अधिक वजन और मोटापे से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि जिन लोगों का वजन ज्यादा होता है, उनमें लिवर में चर्बी जमा होने का खतरा अधिक रहता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुबले-पतले या सामान्य वजन वाले लोग इससे पूरी तरह सुरक्षित हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर का वजन सामान्य होने के बावजूद लिवर में अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। मेडिकल क्षेत्र में ऐसे मामलों को लंबे समय से लीन फैटी लिवर के रूप में जाना जाता रहा है। फैटी लिवर वाले कुछ लोगों का शरीर दुबला हो सकता है, इसलिए केवल शरीर का आकार देखकर लिवर को स्वस्थ मान लेना सही नहीं है।

    दुबले-पतले लोगों में फैटी लिवर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस, पेट के अंदर जमा आंतरिक चर्बी, डायबिटीज, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल जैसी मेटाबोलिक समस्याएं इसका जोखिम बढ़ा सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभा सकते हैं।

    इसके अलावा शराब का सेवन, कुछ दवाएं और लिवर से जुड़ी अन्य बीमारियां भी लिवर में चर्बी जमा होने का कारण बन सकती हैं। इसलिए यह मानना सही नहीं है कि दुबला शरीर होने की वजह से फैटी लिवर का खतरा नहीं हो सकता।

    सामान्य बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि शरीर में चर्बी का वितरण भी स्वस्थ है। कुछ लोगों का शरीर बाहर से दुबला दिखाई दे सकता है, लेकिन पेट के आसपास या शरीर के अंदर अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। ऐसी स्थिति में मेटाबोलिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है और फैटी लिवर का खतरा बढ़ सकता है।

    डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड जैसी समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुबले-पतले लोगों में यदि इनमें से कोई जोखिम मौजूद है तो डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है।

    फैटी लिवर की शुरुआत अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के होती है। कई लोगों को बीमारी के शुरुआती चरण में कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। यदि जांच के दौरान लिवर एंजाइम बार-बार बढ़े हुए मिल रहे हैं या डायबिटीज जैसी मेटाबोलिक समस्या मौजूद है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर लिवर के स्वास्थ्य और फैटी लिवर के जोखिम का मूल्यांकन कराया जा सकता है।

    फैटी लिवर से बचाव के लिए सिर्फ वजन कम करना ही पर्याप्त नहीं है। दुबले-पतले लोगों के लिए भी नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान और अत्यधिक चीनी तथा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से दूरी बनाए रखना जरूरी है। डायबिटीज, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना भी लिवर के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

    अगर जांच में फैटी लिवर की पुष्टि हो चुकी है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार लिवर की स्थिति और फाइब्रोसिस के जोखिम का मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। समय रहते खानपान और जीवनशैली में जरूरी बदलाव करने तथा जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार लेने से बीमारी के बढ़ने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

  • वजन सामान्य और शरीर फिट दिखने के बावजूद 30 के बाद क्यों जरूरी है नियमित हेल्थ चेकअप, जानें किन बीमारियों का खतरा

    वजन सामान्य और शरीर फिट दिखने के बावजूद 30 के बाद क्यों जरूरी है नियमित हेल्थ चेकअप, जानें किन बीमारियों का खतरा

    नई दिल्ली । क्या आपकी उम्र 30 साल या उससे ज्यादा है? अगर हां, तो अब अपनी सेहत को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने का समय है। कई ऐसी बीमारियां हैं जो पहले अधिक उम्र के लोगों में आम मानी जाती थीं, लेकिन अब कम उम्र में भी सामने आ रही हैं। खास बात यह है कि शुरुआती दौर में इन बीमारियों के स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में व्यक्ति खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझता रहता है, जबकि शरीर के भीतर बीमारी धीरे-धीरे बढ़ रही होती है।

    सिर्फ सामान्य वजन होना या रोजमर्रा के काम आसानी से कर पाना हमेशा अच्छी सेहत की गारंटी नहीं है। हाई ब्लड प्रेशर और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक बिना किसी खास संकेत के रह सकते हैं। इसी तरह प्रीडायबिटीज और डायबिटीज भी शुरुआती चरण में कई लोगों में बिना स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकती है। इसलिए केवल बाहरी फिटनेस के आधार पर अपनी सेहत का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जाता।

    भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की गाइडलाइन के अनुसार, बिना लक्षण वाले लोगों में भी 30 वर्ष की उम्र के बाद डायबिटीज और लिपिड प्रोफाइल की जांच पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति को कितनी बार और कौन-कौन से टेस्ट कराने चाहिए, यह उसकी उम्र, पारिवारिक इतिहास और स्वास्थ्य जोखिमों के आधार पर अलग हो सकता है।

    भारतीयों में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा महत्वपूर्ण है। ब्लड शुगर बढ़ने के बावजूद कई लोगों को लंबे समय तक प्यास अधिक लगना, बार-बार पेशाब आना या अत्यधिक थकान जैसे स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। ऐसे में नियमित स्क्रीनिंग से ब्लड शुगर में होने वाले बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

    परिवार में अगर किसी सदस्य को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अधिक वजन की समस्या रही है तो 30 वर्ष के बाद स्वास्थ्य को लेकर अधिक सतर्क रहना जरूरी हो जाता है। पारिवारिक इतिहास के साथ कम शारीरिक गतिविधि, असंतुलित खानपान और अधिक वजन जैसे कारक भी मेटाबोलिक बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर साइलेंट बीमारी कहा जाता है, क्योंकि बहुत से लोगों में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। सिरदर्द या चक्कर नहीं आ रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि ब्लड प्रेशर सामान्य है। इसी तरह बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल भी आमतौर पर कोई खास लक्षण नहीं देता और इसका पता रक्त जांच के जरिए लगाया जाता है।

    सामान्य वजन वाले लोगों को भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उन्हें मेटाबोलिक समस्याओं का खतरा नहीं है। शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खानपान, धूम्रपान और पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास जैसे कारण सामान्य वजन के बावजूद जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    30 वर्ष के बाद नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है। डायबिटीज की स्क्रीनिंग और जोखिम के अनुसार लिपिड प्रोफाइल भी कराया जा सकता है। डॉक्टर आपकी उम्र, पारिवारिक इतिहास, वजन, खानपान और ब्लड प्रेशर जैसे कारकों को देखकर तय कर सकते हैं कि आपके लिए कौन-कौन से परीक्षण जरूरी हैं।

    अगर लगातार थकान, वजन में असामान्य बदलाव या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या महसूस हो रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच से संभावित स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान शुरुआती चरण में की जा सकती है।

  • राजेश शर्मा की तबीयत बिगड़ने पर बड़ा खुलासा, एक्टर ने जहरीले कीड़े के काटने की खबर को बताया झूठ, डायबिटीज को बताया असली वजह

    राजेश शर्मा की तबीयत बिगड़ने पर बड़ा खुलासा, एक्टर ने जहरीले कीड़े के काटने की खबर को बताया झूठ, डायबिटीज को बताया असली वजह


    नई दिल्ली ।
    अभिनेता राजेश शर्मा ने अपनी सेहत को लेकर चल रही खबरों पर सफाई दी है। कुछ समय पहले ऐसी खबरें सामने आई थीं कि शूटिंग के दौरान उन्हें किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अब अभिनेता ने खुद इन खबरों को गलत बताया है और अपनी तबीयत खराब होने की असली वजह बताई है।

    राजेश शर्मा ने बताया कि उनके सीधे पैर में लंबे समय से त्वचा से जुड़ी समस्या चल रही थी। बाद में वहां संक्रमण हो गया, जिसके कारण उन्हें इलाज कराना पड़ा। अभिनेता के मुताबिक उनका इलाज अब पूरा हो चुका है और वह धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि वह एक-दो सप्ताह में दोबारा काम पर लौट सकेंगे।

    कीड़े के काटने की खबर पर सफाई देते हुए राजेश शर्मा ने कहा कि यह गलत खबर थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभास की फिल्म के सेट पर उनके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि इस घटना के लिए न तो प्रभास जिम्मेदार थे और न ही फिल्म की यूनिट। अभिनेता के मुताबिक हैदराबाद में शूटिंग के दौरान उनके साथ ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी।

    राजेश शर्मा ने बताया कि हैदराबाद से कोलकाता लौटने के बाद उनकी स्थिति ज्यादा बिगड़ गई। उन्होंने इसके पीछे अपनी डायबिटीज का स्तर काफी बढ़ जाना भी एक बड़ी वजह बताया। अभिनेता ने स्वीकार किया कि शुरुआत में उन्होंने अपनी स्वास्थ्य स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया था। इसके बाद समस्या बढ़ती गई और उन्हें उपचार की जरूरत पड़ी।

    इससे पहले अभिनेत्री सुदीपा चटर्जी ने राजेश शर्मा की तबीयत को लेकर जानकारी साझा की थी। उन्होंने बताया था कि अभिनेता को कीड़े ने काट लिया है और उनकी हालत खराब होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अब राजेश शर्मा ने इस दावे को गलत बताया है।

    अभिनेता ने कहा कि सुदीपा उनकी दोस्त हैं और वह उनकी सेहत को लेकर चिंतित थीं। हालांकि, उस समय उन्हें भी पूरी और सही जानकारी नहीं थी। इसी वजह से कीड़े के काटने की बात सामने आई।

    जुलाई में सुदीपा चटर्जी ने सोशल मीडिया पर राजेश शर्मा की तबीयत को लेकर एक पोस्ट साझा किया था। उस पोस्ट के मुताबिक रामोजी फिल्म सिटी में फिल्म की शूटिंग के दौरान अभिनेता वहां के एक तकनीशियन से बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें एक जहरीले कीड़े के काटने की बात कही गई थी। पोस्ट में बताया गया था कि इसके बाद उनकी हालत खराब हुई और वह हैदराबाद से कोलकाता के लिए फ्लाइट से रवाना हुए।

    यात्रा के दौरान उन्हें बुखार और बेचैनी जैसी परेशानी हुई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि, अब अभिनेता की ओर से सामने आई जानकारी ने उस समय बताई गई वजह को गलत साबित किया है। राजेश शर्मा ने अपनी बीमारी के पीछे पैर के संक्रमण और बढ़ी हुई डायबिटीज को प्रमुख कारण बताया है।

    अभिनेता फिलहाल उपचार के बाद रिकवरी कर रहे हैं और जल्द ही काम पर लौटने की उम्मीद जता रहे हैं। उनकी सफाई के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी तबीयत बिगड़ने की वजह जहरीले कीड़े का काटना नहीं थी, जैसा कि पहले बताया गया था।

  • भोजन के बाद लगातार थकान और असामान्य भूख को न करें नजरअंदाज, डायबिटीज से जुड़े संकेत पहचानना जरूरी

    भोजन के बाद लगातार थकान और असामान्य भूख को न करें नजरअंदाज, डायबिटीज से जुड़े संकेत पहचानना जरूरी

    नई दिल्ली ।खाना खाने के बाद शरीर में कुछ बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। भोजन पचने के साथ शरीर को ऊर्जा मिलती है और कुछ लोगों को थोड़ी देर के लिए सुस्ती या नींद भी महसूस हो सकती है। हालांकि, यदि भोजन के बाद बार बार अत्यधिक प्यास, पेशाब, कमजोरी, थकान या असामान्य भूख जैसी समस्याएं महसूस होती हैं, तो इन्हें केवल सामान्य प्रतिक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में ऐसे संकेत ब्लड शुगर के असंतुलन से जुड़े हो सकते हैं।

    डायबिटीज ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उपलब्ध इंसुलिन का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन की भूमिका शरीर में ग्लूकोज के इस्तेमाल और रक्त में उसके स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण होती है। जब यह प्रक्रिया प्रभावित होती है तो ब्लड शुगर बढ़ सकता है और लंबे समय तक इसका स्तर ज्यादा रहने पर शरीर के विभिन्न अंगों पर असर पड़ सकता है।

    खाने के बाद हल्की नींद या सुस्ती कई कारणों से हो सकती है। बहुत अधिक या भारी भोजन करने, पर्याप्त नींद नहीं लेने या शरीर में पानी की कमी जैसी वजहें भी इसके पीछे हो सकती हैं। लेकिन यदि लगभग हर भोजन के बाद अत्यधिक सुस्ती, कमजोरी या थकान महसूस होती है और इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई देते हैं, तो ब्लड शुगर की जांच पर विचार करना उचित हो सकता है।

    अत्यधिक प्यास भी ऐसा संकेत है जिस पर ध्यान देना चाहिए। डायबिटीज में रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने पर शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को बाहर निकालने की कोशिश करता है। इससे पेशाब की मात्रा या आवृत्ति बढ़ सकती है और शरीर में पानी की कमी होने के कारण प्यास अधिक लग सकती है। यदि बार बार पेशाब आने और ज्यादा प्यास लगने की समस्या साथ दिखाई दे रही है, तो इसकी वजह जानने के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    कुछ लोगों को भोजन करने के बाद दोबारा भूख लगने या कमजोरी महसूस होने की शिकायत भी हो सकती है। हालांकि इसके पीछे कई अलग कारण हो सकते हैं और केवल इन लक्षणों के आधार पर डायबिटीज का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लगातार बने रहने वाले लक्षणों को अन्य स्वास्थ्य संकेतों के साथ देखकर ही स्थिति का आकलन किया जाता है।

    डायबिटीज से जुड़े सामान्य संकेतों में अत्यधिक प्यास, बार बार पेशाब आना, ज्यादा भूख लगना, लगातार थकान, धुंधला दिखाई देना और घावों का देर से भरना शामिल हो सकते हैं। जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति में सभी लक्षण एक साथ दिखाई दें। कई बार शुरुआती अवस्था में संकेत बेहद हल्के होते हैं और व्यक्ति उन्हें सामान्य परेशानी समझकर छोड़ देता है।

    खाने के बाद ब्लड शुगर का कुछ समय के लिए बढ़ना शरीर की सामान्य प्रतिक्रिया है, क्योंकि भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट पचकर ग्लूकोज में बदलते हैं। समस्या तब हो सकती है जब शुगर का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़े या लंबे समय तक सामान्य स्तर पर वापस न आए। ऐसी स्थिति का पता केवल शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों से नहीं, बल्कि उचित रक्त जांच और चिकित्सकीय मूल्यांकन से लगाया जाता है।

    यदि भोजन के बाद अत्यधिक प्यास, बार बार पेशाब, लगातार थकान, कमजोरी या असामान्य भूख कई दिनों या हफ्तों तक बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। समय पर जांच से स्थिति की पहचान और आवश्यक प्रबंधन शुरू करने में मदद मिल सकती है। खासतौर पर लगातार दोहराए जाने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय उनकी वजह समझना स्वास्थ्य के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

  • पानी पीने के बाद भी बार-बार लगती है प्यास तो इन स्वास्थ्य समस्याओं का हो सकता है संकेत, जानें कब सावधान हों

    पानी पीने के बाद भी बार-बार लगती है प्यास तो इन स्वास्थ्य समस्याओं का हो सकता है संकेत, जानें कब सावधान हों

    नई दिल्ली । गर्मी, ज्यादा पसीना आने, शारीरिक मेहनत करने या पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीने पर बार-बार प्यास लगना सामान्य स्थिति हो सकती है। हालांकि, अगर पानी पीने के बाद भी प्यास जल्दी बुझती नहीं है और यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो इसे केवल सामान्य प्यास मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार और असामान्य प्यास शरीर में पानी या इलेक्ट्रोलाइट संतुलन से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकती है।

    बार-बार प्यास लगने की सबसे आम वजह डिहाइड्रेशन हो सकती है। तेज गर्मी में रहने, व्यायाम करने या अधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है। अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थ खाने से भी प्यास बढ़ सकती है। कैफीन युक्त पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन कुछ लोगों में पेशाब बढ़ाकर शरीर के तरल संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

    लगातार अत्यधिक प्यास डायबिटीज से जुड़ा एक महत्वपूर्ण लक्षण भी हो सकती है। जब रक्त में ग्लूकोज का स्तर अधिक बढ़ जाता है, तो शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को पेशाब के रास्ते बाहर निकालने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में शरीर से अधिक मात्रा में पानी निकल सकता है और व्यक्ति को बार-बार पेशाब आने के साथ ज्यादा प्यास महसूस हो सकती है। इसके साथ थकान, वजन में बदलाव या धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।

    किडनी शरीर में पानी, नमक और दूसरे इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किडनी के कामकाज में समस्या होने पर शरीर के तरल संतुलन में बदलाव आ सकता है। हालांकि केवल ज्यादा प्यास लगने के आधार पर किडनी की बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यदि इसके साथ पैरों या चेहरे पर सूजन, पेशाब में बदलाव या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

    बार-बार प्यास लगने की एक अपेक्षाकृत कम सामान्य वजह डायबिटीज इन्सिपिडस भी हो सकती है। यह डायबिटीज मेलिटस से अलग स्थिति है और इसमें शरीर के पानी के संतुलन को नियंत्रित करने वाली हार्मोनल व्यवस्था प्रभावित होती है। इसके कारण बहुत अधिक मात्रा में पतला पेशाब आ सकता है और उसके बाद अत्यधिक प्यास महसूस हो सकती है।

    कई बार व्यक्ति को वास्तविक रूप से शरीर में पानी की कमी न होने के बावजूद मुंह सूखने के कारण प्यास जैसा महसूस होता है। इसे ड्राई माउथ कहा जाता है। इसमें मुंह और जीभ में सूखापन, चिपचिपापन या होंठों के सूखने जैसी शिकायत हो सकती है। कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव, तनाव और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी मुंह सूखने की वजह बन सकती हैं।

    इसलिए केवल प्यास लगने के आधार पर किसी बीमारी की पहचान करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। समस्या लगातार बनी रहे, बहुत ज्यादा पेशाब आए, रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़े, असामान्य कमजोरी महसूस हो या वजन में बिना वजह बदलाव आए तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। आवश्यकता के अनुसार डॉक्टर रक्त शर्करा, किडनी की कार्यक्षमता, इलेक्ट्रोलाइट्स और अन्य जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।

    बच्चों और बुजुर्गों में शरीर में पानी की कमी तेजी से गंभीर हो सकती है। अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, भ्रम, बेहोशी या पानी न पी पाने जैसी स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय सहायता जरूरी हो सकती है। लगातार प्यास को समझने का सबसे सही तरीका इसके साथ मौजूद दूसरे लक्षणों और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति को देखना है।

  • अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    नई दिल्ली ।उत्तम स्वास्थ्य और बेहतर जीवन शैली बनाए रखने के लिए सही खानपान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि किन चीजों के सेवन से बचा जाना चाहिए। जिन खाद्य पदार्थों को सेहत के लिए सबसे अधिक हानिकारक माना जाता है, उनमें अतिरिक्त चीनी प्रमुख है। अत्यधिक मात्रा में चीनी का सेवन मोटापे, मधुमेह और शरीर में अंदरूनी सूजन जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है।

    आमतौर पर लोग चीनी छोड़ने का अर्थ केवल चाय, कॉफी या मिठाइयों का त्याग करना समझते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इन चीजों को बंद कर देना ही पर्याप्त नहीं है। रसोई में उपयोग होने वाली और बाजार में मिलने वाली कई अन्य सामान्य चीजों में भी चीनी की भारी मात्रा छिपी हो सकती है। सॉस, टोमैटो केचप, डिब्बाबंद ड्रिंक्स और फ्लेवर्ड दही जैसे पदार्थों में शर्करा की अदृश्य मौजूदगी होती है, जो रोजमर्रा के खानपान में मिठास बढ़ा देती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हर मीठी वस्तु का स्वाद मिठाई जैसा तेज होना आवश्यक नहीं है। कई ऐसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ हैं जिनका स्वाद नमकीन या सामान्य लगता है, लेकिन उनमें एडेड शुगर मिलाई जाती है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से चीनी का सेवन बंद भी कर देता है, तब भी इन प्रसंस्कृत पदार्थों के माध्यम से चीनी शरीर में पहुंचती रहती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि दैनिक कुल कैलोरी में एडेड शुगर का हिस्सा 10 प्रतिशत से कम होना चाहिए।

    आहार विशेषज्ञों के मुताबिक एक सामान्य वयस्क के लिए प्रतिदिन 2,000 कैलोरी की डाइट में चीनी की मात्रा लगभग 50 ग्राम यानी 6 से 9 चम्मच से अधिक नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, महज एक टेबलस्पून टोमैटो केचप में लगभग 4 ग्राम एडेड शुगर हो सकती है। सैंडविच, बर्गर या नाश्ते के साथ नियमित रूप से सॉस का उपयोग करने की आदत कुल चीनी की खपत को चुपचाप बढ़ा देती है। इसी तरह, पैकेज्ड फ्रूट जूस को भी पूरी तरह से स्वास्थ्यवर्धक मानना एक भूल हो सकती है।

    पैकेज्ड जूस में प्राकृतिक फाइबर की कमी होती है और उन्हें संरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त चीनी मिलाई जाती है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि बाजार से कोई भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय केवल कैलोरी ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद एडेड शुगर की मात्रा की जांच अवश्य करनी चाहिए। स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बजाय प्राकृतिक और ताजा आहार को प्राथमिकता देना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

  • पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    नई दिल्ली ।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पेट की गहराई में जमा होने वाली आंतरिक चर्बी यानी विसरल फैट को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। चिकित्सीय अध्ययनों के अनुसार यह चर्बी त्वचा के ठीक नीचे जमा होने वाले सामान्य फैट से पूरी तरह भिन्न होती है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लिवर, आंत और अग्न्याशय के आसपास जमा होती है।

    चिकित्सकों के मुताबिक देखने में सामान्य या पतले नजर आने वाले व्यक्तियों में भी विसरल फैट की समस्या हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को थिन आउटसाइड-फैट इनसाइड कहा जाता है। कमर का घेरा बढ़ना और पेट का बाहर निकलना इस समस्या का प्रमुख प्राथमिक संकेत हो सकता है।

    शोधकर्ताओं ने पाया है कि शरीर में विसरल फैट की अत्यधिक मात्रा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। इससे शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित होने लगता है और व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज का शिकार हो सकता है।

    इसके अतिरिक्त यह आंतरिक चर्बी शरीर में पुरानी सूजन और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का कारण बनती है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है जो आगे चलकर गंभीर हृदय रोगों में बदल सकता है।

    असंतुलित खानपान, बहुत ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन, मीठे पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन और शारीरिक गतिविधि की कमी को विसरल फैट बढ़ने का मुख्य कारण माना गया है। घंटों बैठकर काम करने की आधुनिक जीवनशैली के कारण दिल्ली और मध्य प्रदेश सहित देश भर के शहरी इलाकों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस समस्या से निपटने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम जैसे वॉक, साइकिलिंग और एरोबिक्स बेहद जरूरी हैं। साथ ही आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों, हरी सब्जियों और साबुत अनाज को शामिल कर तथा मीठे पेय पदार्थों से परहेज रखकर इस जोखिम से बचा जा सकता है।

  • कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत

    कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत


    नई दिल्ली । अगर आपकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा ऑफिस की कुर्सी या घर के सोफे पर बैठकर गुजरता है और दिनभर शरीर को पर्याप्त मेहनत नहीं मिलती तो अब सावधान होने का समय है। लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना सिर्फ वजन बढ़ने की वजह नहीं बनता बल्कि धीरे-धीरे शरीर की कई जरूरी प्रणालियों पर असर डाल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर के करीब 31 प्रतिशत वयस्क पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे थे। विशेषज्ञों के मुताबिक पर्याप्त सक्रिय न रहने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम सक्रिय लोगों की तुलना में करीब 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है। ऐसे में रोजाना कुछ समय शरीर को सक्रिय रखना स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा बन जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए हर किसी के लिए जिम जाना जरूरी नहीं है। रोजाना तेज कदमों से चलना, साइकिल चलाना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और घर के सामान्य कामों में सक्रिय रहना भी शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट तक मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देता है। इसका मतलब है कि दिनभर लगातार बैठे रहने के बजाय काम के बीच छोटे ब्रेक लेकर कुछ देर चलना भी आपकी दिनचर्या को बेहतर बना सकता है।

    शारीरिक गतिविधि की कमी का असर सबसे पहले हृदय और मेटाबॉलिज्म पर दिखाई दे सकता है। नियमित व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने के साथ हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करता है। वहीं लगातार बैठे रहने और शरीर को पर्याप्त गतिविधि न मिलने से लंबे समय में कई गैर-संचारी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए अगर काम की वजह से घंटों कुर्सी पर बैठना मजबूरी है तो बीच बीच में उठकर कुछ कदम चलना और शरीर को स्ट्रेच करना उपयोगी आदत हो सकती है।

    निष्क्रिय जीवनशैली का एक बड़ा खतरा टाइप-2 डायबिटीज से भी जुड़ा है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को ग्लूकोज का बेहतर इस्तेमाल करने और वजन नियंत्रित रखने में मदद करती है। इसके विपरीत लंबे समय तक बैठे रहने वाली दिनचर्या वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं की संभावना को बढ़ा सकती है। इसलिए डायबिटीज से बचाव के लिए केवल खानपान पर ध्यान देना ही पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि रोजाना की शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    दिनभर कम चलने फिरने का सीधा असर वजन पर भी पड़ सकता है। जब शरीर कम ऊर्जा खर्च करता है और खानपान से मिलने वाली कैलोरी अधिक रहती है तो धीरे धीरे वजन बढ़ने लगता है। बढ़ता वजन आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर में गड़बड़ी और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में संतुलित आहार के साथ रोजमर्रा की गतिविधियों को बढ़ाना जरूरी है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि शारीरिक सक्रियता को किसी एक कठिन व्यायाम तक सीमित न समझें। छोटी दूरी के लिए पैदल जाना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लेना, काम के बीच कुछ मिनट चलना और रोजाना वॉक की आदत बनाना शुरुआत के आसान तरीके हो सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को पहले से कोई बीमारी है या व्यायाम शुरू करने में परेशानी महसूस होती है तो डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। शरीर को सक्रिय रखना केवल फिट दिखने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ और बेहतर जीवन जीने के लिए भी जरूरी है।