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  • ट्रंप के अचानक बदलते रवैये से सतर्क था भारतीय प्रतिनिधिमंडल, मीडिया सवालों को लेकर अमेरिका के दावे पर भारत ने दी सफाई

    ट्रंप के अचानक बदलते रवैये से सतर्क था भारतीय प्रतिनिधिमंडल, मीडिया सवालों को लेकर अमेरिका के दावे पर भारत ने दी सफाई

    नई दिल्ली । जी-7 बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद मीडिया बातचीत को लेकर नया विवाद सामने आया है। अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने दावा किया कि बैठक के बाद पत्रकारों को सवाल पूछने से रोकने का अनुरोध भारत की तरफ से किया गया था। इस दावे के बाद भारत की ओर से भी अपना पक्ष सामने रखा गया है।

    सर्जियो गोर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात के बाद भारत की ओर से मीडिया को लेकर विशेष अनुरोध किया गया था। उनका दावा है कि विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया था कि पत्रकारों को बैठक के बाद बुलाया जा सकता है, लेकिन पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होनी चाहिए। साथ ही पत्रकारों को सवाल पूछने की अनुमति नहीं देने की बात भी कही गई थी।

    गोर के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस व्यवस्था पर सहमति जताई थी। हालांकि, बैठक समाप्त होने के बाद ट्रंप ने कैमरे की ओर देखकर पत्रकारों से सवाल करने की बात कह दी। इसके बाद मीडिया बातचीत का स्वरूप पहले तय किए गए तरीके से अलग हो गया।

    भारत की ओर से सामने आए सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रतिनिधिमंडल ने किसी असामान्य स्थिति से बचने के लिए पहले से तैयारी की थी। सूत्रों का कहना है कि ट्रंप के साथ बैठकों के दौरान सावधानी बरतना जरूरी माना जाता है, क्योंकि वह बातचीत के दौरान अचानक कोई नया मुद्दा उठा सकते हैं या चर्चा का रुख बदल सकता है।

    भारतीय पक्ष के अनुसार, ट्रंप के साथ पहले हुई कुछ बैठकों में भी बातचीत के दौरान अप्रत्याशित मुद्दे सामने आए हैं। दक्षिण अफ्रीका और यूक्रेन के नेताओं के साथ उनकी बातचीत के दौरान भी ऐसी स्थिति देखने को मिलने का हवाला दिया गया है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकात के दौरान मीडिया बातचीत को लेकर भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने पहले से तैयारी की थी।

    जी-7 बैठक के दौरान मोदी और ट्रंप के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, वहां मौजूद भारतीय नाविकों की सुरक्षा और भारत-अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े विषय प्रमुख रहे। होर्मुज क्षेत्र में जारी परिस्थितियों को देखते हुए वहां काम कर रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा रही।

    प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और उनकी सुरक्षित स्थिति सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया। बातचीत के दौरान ट्रंप की ओर से भी भारत के साथ खड़े रहने का भरोसा दिए जाने की बात सामने आई है। इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग के महत्व को भी रेखांकित किया गया।

    भारत और अमेरिका के बीच व्यापार का मुद्दा भी दोनों नेताओं की बातचीत में शामिल रहा। दोनों देशों के संबंधों में व्यापार और आर्थिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं। ऐसे में जी-7 बैठक के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात को कई स्तरों पर अहम माना गया।

    सर्जियो गोर के बयान के बाद अब प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भारत और अमेरिका के पक्षों में अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राजदूत ने मीडिया सवालों को लेकर भारत के अनुरोध का जिक्र किया, जबकि भारतीय पक्ष ने इसे प्रतिनिधिमंडल की पूर्व तैयारी और ट्रंप के अप्रत्याशित रवैये को ध्यान में रखकर बरती गई सावधानी से जोड़ा है। इस घटनाक्रम ने मोदी-ट्रंप मुलाकात से जुड़े राजनीतिक और कूटनीतिक पहलुओं को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

  • सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा

    सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा


    नई दिल्ली । 
    भारत में अमेरिका के राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर के जम्मू कश्मीर और लद्दाख दौरे के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर की समस्याओं का समाधान वॉशिंगटन से नहीं आएगा, बल्कि इनका समाधान भारत को ही करना है। उमर अब्दुल्ला का यह बयान सर्जियो गोर के श्रीनगर पहुंचने से पहले आया है।

    सर्जियो गोर दो दिवसीय दौरे पर जम्मू कश्मीर और लद्दाख पहुंचे हैं। उनके कार्यक्रम में श्रीनगर में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के साथ अलग अलग संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत भी शामिल है। अमेरिकी राजदूत के लंबे अंतराल के बाद जम्मू कश्मीर दौरे को क्षेत्रीय और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वह सर्जियो गोर की बात सुनना अधिक पसंद करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अमेरिकी राजदूत के सामने जम्मू कश्मीर के आंतरिक मामलों को शिकायत के रूप में नहीं उठाएंगे। मुख्यमंत्री के मुताबिक किसी दूसरे देश के राजदूत के सामने अपने ही देश की शिकायत करना उनकी आदत नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर के हालात और क्षेत्र से जुड़े विषयों पर सर्जियो गोर से बातचीत जरूर होगी। हालांकि, वह इन मुद्दों का समाधान किसी दूसरे देश से हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे। उमर अब्दुल्ला का यह रुख जम्मू कश्मीर के आंतरिक विषयों पर विदेशी हस्तक्षेप की मांग से दूरी बनाए रखने वाला माना जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान देश के भीतर ही तलाशना होगा। उनके बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि के साथ बातचीत से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई, बल्कि बातचीत का दायरा क्षेत्र की स्थिति और संबंधित विषयों तक रखने की बात कही है।

    इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे को लेकर अलग मुद्दा उठाया है। उन्होंने कश्मीर यात्रा के संबंध में जारी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर उसे वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि कश्मीर में बड़ी संख्या में परिवार पर्यटन पर निर्भर हैं और ऐसी सलाह क्षेत्र को बाहरी दुनिया से जोड़ने में बाधा पैदा करती है।

    महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि ट्रैवल एडवाइजरी को हटाना कश्मीर के लोगों के लिए विश्वास बढ़ाने वाला कदम हो सकता है। पर्यटन जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।

    सर्जियो गोर के दौरे के दौरान क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर स्थानीय प्रतिनिधियों से बातचीत होने की संभावना है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला का बयान इस बात को रेखांकित करता है कि जम्मू कश्मीर से जुड़े आंतरिक मामलों पर स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व समाधान के लिए देश के संस्थानों और सरकारों को प्राथमिक पक्ष मानता है।

    कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी राजदूत का जम्मू कश्मीर दौरा स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ बातचीत को शिकायत या बाहरी हस्तक्षेप की मांग का माध्यम नहीं बनाएंगे।

    सर्जियो गोर की यात्रा के दौरान होने वाली बैठकों से क्षेत्र की स्थिति, स्थानीय अपेक्षाओं और भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा का अवसर मिलेगा। फिलहाल उमर अब्दुल्ला का संदेश स्पष्ट है कि जम्मू कश्मीर की आंतरिक समस्याओं पर संवाद हो सकता है, लेकिन उनके समाधान की जिम्मेदारी भारत की ही है।

  • दक्षिण एशियाई देशों में भारत की वैश्विक छवि पर प्यू रिसर्च सर्वे, श्रीलंका में भारत के प्रति सर्वाधिक सकारात्मक दृष्टिकोण

    दक्षिण एशियाई देशों में भारत की वैश्विक छवि पर प्यू रिसर्च सर्वे, श्रीलंका में भारत के प्रति सर्वाधिक सकारात्मक दृष्टिकोण

    नई दिल्ली ।अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा दक्षिण एशिया के चार प्रमुख देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में किए गए एक ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े सामने आए हैं। इस सर्वेक्षण में अंतरराष्ट्रीय संबंधों, पड़ोसी देशों की धारणाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर वयस्कों की राय ली गई। रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका दक्षिण एशिया का एकमात्र ऐसा मुल्क उभरकर सामने आया है, जहां के नागरिक भारत के प्रति अत्यधिक सकारात्मक रुख रखते हैं।

    सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, श्रीलंका में 79 प्रतिशत लोगों ने भारत के पक्ष में अपनी राय दी है, जबकि 63 प्रतिशत श्रीलंकाई नागरिकों ने भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी देश माना है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में केवल सात प्रतिशत लोगों ने ही भारत के प्रति सकारात्मक भावना व्यक्त की। बांग्लादेश में 42 प्रतिशत लोगों का रुख भारत के प्रति सकारात्मक पाया गया, हालांकि वहां भारत को खतरा मानने वालों की संख्या भी उल्लेखनीय रही।

    रिपोर्ट में बांग्लादेश और भारत के बीच द्विपक्षीय धारणाओं में आई गिरावट को भी रेखांकित किया गया है। वर्तमान में केवल 25 प्रतिशत भारतीय बांग्लादेश के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर धारणा में कमी दर्ज की गई है। ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, वर्ष 2024 में जहां 57 प्रतिशत बांग्लादेशी भारत के पक्ष में थे, वहीं भारत में यह आंकड़ा 35 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

    भारत और पाकिस्तान के बीच पारस्परिक संबंधों पर सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि दोनों देशों की बहुसंख्यक आबादी एक-दूसरे को अपने लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा मानती है। वहीं वैश्विक सहयोगियों के प्रश्न पर 36 प्रतिशत भारतीयों ने रूस को अपना सबसे प्रमुख और भरोसेमंद सहयोगी बताया, जबकि 16 प्रतिशत ने अमेरिका का नाम लिया। मध्य प्रदेश सहित देश भर के विदेश नीति विशेषज्ञों की नजरें इस रणनीतिक रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।

    वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को लेकर अमेरिका में किए गए अध्ययन में 54 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि वैश्विक मंच पर भारत का प्रभाव स्थिर बना हुआ है। वहीं 30 प्रतिशत अमेरिकियों ने माना कि भारत का प्रभाव वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ा है। राजनीतिक आधार पर अमेरिकी डेमोक्रेट्स के बीच भारत के प्रति समर्थन अधिक देखने को मिला। यह सर्वेक्षण दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक और क्षेत्रीय समीकरणों की एक स्पष्ट झलक पेश करता है।

  • अमेरिका ईरान तनाव के बीच पेजेशकियान की भारत यात्रा अहम, BRICS बैठक में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर होगी चर्चा

    अमेरिका ईरान तनाव के बीच पेजेशकियान की भारत यात्रा अहम, BRICS बैठक में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर होगी चर्चा

    नई दिल्ली । ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान सितंबर में भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। वह नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। भारत वर्ष 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी के तहत राजधानी में इस महत्वपूर्ण बहुपक्षीय बैठक का आयोजन किया जा रहा है।

    पेजेशकियान की प्रस्तावित भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में ईरानी राष्ट्रपति का नई दिल्ली पहुंचना भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच पारंपरिक रूप से ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर संबंध रहे हैं।

    भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS सम्मेलन की थीम ‘बिल्डिंग फॉर रिजीलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनिबिलिटी’ रखी गई है। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग, वैश्विक शासन व्यवस्था, विकास, तकनीक और साझा चुनौतियों से जुड़े विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ईरान की भागीदारी से पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियां भी बैठक के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हो सकती हैं।

    ईरान वर्ष 2024 में BRICS का पूर्ण सदस्य बना था। उसके साथ मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात भी संगठन के पूर्ण सदस्य बने थे। ईरान के शामिल होने के बाद BRICS का दायरा पश्चिम एशिया तक भी व्यापक हुआ है। भारत और ईरान दोनों के लिए संगठन के मंच पर आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर बढ़े हैं।

    मसूद पेजेशकियान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली महत्वपूर्ण मुलाकात अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान हुई थी। उस समय दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक भी हुई थी। बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों के साथ क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी।

    पेजेशकियान की आगामी भारत यात्रा के दौरान भी द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बातचीत की संभावना बनी हुई है। दोनों देशों के बीच व्यापार, चाबहार बंदरगाह, संपर्क परियोजनाओं और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत के लिए ईरान के साथ संपर्क बनाए रखना पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुंच के दृष्टिकोण से भी उपयोगी माना जाता है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की संभावित कूटनीतिक भूमिका भी चर्चा का विषय बन सकती है। जून में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने के लिए भारत आए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा था कि नई दिल्ली क्षेत्रीय संकट को कम करने में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।

    ईरानी पक्ष का रुख रहा है कि संघर्ष का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से होना चाहिए। ऐसे में पेजेशकियान की नई दिल्ली यात्रा BRICS के बहुपक्षीय मंच के साथ-साथ भारत और ईरान के बीच उच्चस्तरीय संवाद का अवसर भी प्रदान कर सकती है।

    भारत की BRICS अध्यक्षता में होने वाला यह सम्मेलन ऐसे दौर में आयोजित हो रहा है, जब वैश्विक राजनीति में पश्चिम एशिया का संकट, व्यापारिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। ईरानी राष्ट्रपति की भागीदारी से सम्मेलन में इन विषयों पर चर्चा को अतिरिक्त महत्व मिलने की संभावना है।

  • भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को मिले दो द्विपक्षीय निमंत्रणों पर बांग्लादेश सरकार ने व्यस्तता का हवाला दिया।

    भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को मिले दो द्विपक्षीय निमंत्रणों पर बांग्लादेश सरकार ने व्यस्तता का हवाला दिया।


    नई दिल्ली । 
    भारत की ओर से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को दिए गए दो अलग-अलग आधिकारिक निमंत्रणों पर पड़ोसी देश की ओर से अभी तक कोई अंतिम प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ढाका की ओर से संकेत दिए गए हैं कि प्रस्तावित भारत यात्रा का अंतिम ढांचा प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम और दोनों देशों के बीच जारी द्विपक्षीय बातचीत की प्रगति पर निर्भर करेगा।

    भारत ने सितंबर महीने में आयोजित होने जा रहे आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के विशेष सत्र के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया है। इसके अतिरिक्त एक पृथक द्विपक्षीय वार्ता के लिए भी नई दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा गया है। हालांकि, बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अभी पर्याप्त समय शेष है और सरकार इस दौरान कई महत्वपूर्ण घरेलू व संवैधानिक प्राथमिकताओं में व्यस्त है।

    विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, बिम्सटेक संगठन के वर्तमान अध्यक्ष के नाते भारत ने बांग्लादेश को ब्रिक्स सम्मेलन के संपर्क सत्र में शामिल होने का विशेष अवसर प्रदान किया है। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से बने तनावपूर्ण माहौल को सामान्य बनाना और द्विपक्षीय वार्ता के जरिए आपसी संबंधों को नई दिशा देना है।

    ढाका में अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सरकार सभी देशों के साथ सकारात्मक संबंधों की पक्षधर है। यदि आगामी दिनों में स्थितियां अनुकूल रहती हैं और बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है, तो निश्चित रूप से भारत यात्रा को अंतिम रूप दिया जाएगा। दोनों पड़ोसी मुल्कों के शीर्ष नेतृत्व के बीच प्रत्यक्ष संवाद से कई लंबित क्षेत्रीय व व्यापारिक मुद्दों के हल होने की उम्मीद जताई जा रही है।

    बांग्लादेश में बीते समय में हुए राजनीतिक बदलावों के बाद से ही नई दिल्ली और ढाका के बीच रणनीतिक व कूटनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे समय में शीर्ष स्तर की यह प्रस्तावित बैठक बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। द्विपक्षीय कूटनीति के जानकारों का मानना है कि व्यापार, सुरक्षा और ऊर्जा संकट जैसे संवेदनशील विषयों पर दोनों देशों का मिलकर काम करना बेहद आवश्यक है।

    अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की इस हलचल का सीधा असर भारत के विभिन्न राज्यों और व्यापारिक साझेदारियों पर भी देखा जा सकता है। मध्य प्रदेश जैसे औद्योगिक और कृषि प्रधान राज्य, जो वस्त्र और हस्तशिल्प निर्यात से जुड़े हैं, वे भी पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक स्थिरता की उम्मीद रखते हैं। मध्य प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक घरानों और नीति निर्माताओं की नजरें भी इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर बनी रहती हैं।

    दक्षिण एशियाई कूटनीति में बिम्सटेक और ब्रिक्स जैसे मंचों की भूमिका आने वाले समय में और अधिक निर्णायक होने की संभावना है। यदि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री इस सम्मेलन में भाग लेते हैं, तो यह क्षेत्र में आर्थिक सहयोग और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम सिद्ध हो सकता है।

    हाल के समय में पैदा हुए गतिरोध को दूर करने के लिए दोनों देशों के राजनयिक लगातार संपर्क में हैं। अब सभी की नजरें ढाका के अंतिम आधिकारिक निर्णय पर टिकी हुई हैं कि क्या ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता संभव हो पाती है या नहीं।

  • नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत

    नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत


    नई दिल्ली । 
    नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन मुलाकात नहीं करने की अपनी पुरानी नीति में बड़ा बदलाव किया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार उन्होंने किसी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात की। सोमवार को उन्होंने भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से अलग बैठक की। इस दौरान दोनों के बीच भारत और नेपाल के संबंधों, विकास सहयोग और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    मुलाकात के दौरान नवीन श्रीवास्तव ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी। उन्होंने भारत की ओर से नेपाल के साथ बेहतर संबंधों और सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कही। बालेन शाह ने भी दोनों देशों के बीच पुराने और भरोसेमंद रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया।

    नेपाल और भारत के बीच व्यापार, ऊर्जा, सड़क और विकास परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारतीय राजदूत के साथ बालेन शाह की पहली व्यक्तिगत बैठक को दोनों देशों के बीच सीधे संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    बालेन शाह इससे पहले विदेशी अधिकारियों और राजदूतों से अकेले मुलाकात करने से परहेज करते रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में उन्होंने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों के साथ वन-टू-वन बैठक नहीं करने की नीति अपनाई थी। विदेशी राजदूतों के साथ भी वह सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते थे।

    इसी नीति के तहत भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की मई में नेपाल यात्रा के दौरान भी बालेन शाह ने उनसे अलग मुलाकात नहीं की थी। इसके अलावा अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित कुछ व्यक्तिगत बैठकों को भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। इसके बजाय उन्होंने काठमांडू में तैनात कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं।

    बालेन शाह की इस नीति के पीछे उनका यह तर्क बताया जाता रहा है कि बड़े और प्रभावशाली देशों के प्रतिनिधि नेपाल की सरकारी व्यवस्था को दरकिनार कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं। सामूहिक बैठकों के जरिए वह सभी देशों के साथ समान व्यवहार और नेपाल की संप्रभुता का संदेश देना चाहते थे।

    हालांकि, सरकार गठन के करीब 100 दिन पूरे होने के बाद उनकी कार्यशैली में बदलाव दिखाई देने लगा। सलाहकारों की ओर से घरेलू और विदेशी स्तर पर अलग-अलग लोगों के साथ सीधे संवाद बढ़ाने की सलाह के बाद शाह ने नेताओं, कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें शुरू कीं। अब विदेशी राजदूतों के साथ सीधी मुलाकात भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    भारतीय राजदूत से मुलाकात के बाद बालेन शाह चीनी राजदूत झांग माओमिंग से भी अलग बैठक करने वाले हैं। भारत और चीन दोनों नेपाल के प्रमुख पड़ोसी और महत्वपूर्ण साझेदार हैं। एक ही दिन दोनों देशों के राजदूतों के साथ व्यक्तिगत संवाद का कार्यक्रम नेपाल की संतुलित विदेश नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    नेपाल में लंबे समय से प्रधानमंत्री और बड़े देशों के राजदूतों के बीच सीधे संवाद की परंपरा रही है। कई बार ऐसी बैठकें प्रधानमंत्री के निजी आवास पर भी होती रही हैं। इन बैठकों में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी नहीं होती थी और कुछ मुलाकातों का औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था।

    बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस व्यवस्था में बदलाव आया था, लेकिन अब उनकी नीति फिर बदलती नजर आ रही है। भारत और चीन के राजदूतों के साथ सीधे संवाद से यह संकेत मिलता है कि नेपाल सरकार महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मामलों पर सामूहिक बैठकों के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संपर्क को भी जगह दे रही है।

  • ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा

    ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत की प्रक्रिया जारी है और इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने बयान में पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलें शुरू हो गई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान की ओर से बातचीत की पहल हुई है और कई क्षेत्रीय देशों के सहयोग से संवाद आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब, यूएई और कतर इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ट्रंप के बयान में पाकिस्तान का नाम शामिल नहीं होने को कई विश्लेषक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    पिछले कुछ समय से पाकिस्तान स्वयं को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। इस दौरान उसने दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की रणनीति अपनाई। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका सीमित या नगण्य मानी जा रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं रहे हैं। ईरान पहले भी पाकिस्तान की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके संबंधों को लेकर सवाल उठाता रहा है। वहीं अमेरिका के कुछ नेताओं ने भी समय-समय पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर चिंता जताई है। ऐसे माहौल में ट्रंप का बयान क्षेत्रीय कूटनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पाकिस्तान को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और दावों ने भी चर्चा को प्रभावित किया है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान, चीन और ईरान के बीच रक्षा सहयोग तथा हथियारों की आपूर्ति से जुड़े दावे किए गए थे। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। इन घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर भी बहस जारी है।

    इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान समझौते का अवसर नहीं अपनाता है तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप के अनुसार मौजूदा समय किसी सकारात्मक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर है और सभी पक्षों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

    हालांकि दूसरी ओर ईरान ने अमेरिका के साथ किसी औपचारिक वार्ता की बात से इनकार किया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि ऐसी किसी प्रत्यक्ष बातचीत की पुष्टि नहीं की जा सकती। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच संवाद को लेकर अभी भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं और स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या किसी नए समझौते का रास्ता निकलता है, इस पर वैश्विक समुदाय की नजर बनी रहेगी। साथ ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर भी आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत के संकेत? सितंबर में BRICS समिट के लिए शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा पर टिकी दुनिया की नजर

    भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत के संकेत? सितंबर में BRICS समिट के लिए शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा पर टिकी दुनिया की नजर

    नई दिल्ली । सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन को लेकर भारत और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह दौरा तय होता है तो वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य संघर्ष के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। इस संभावित दौरे को दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शी जिनपिंग की मौजूदगी की संभावना है। उनकी यात्रा ऐसे समय में प्रस्तावित है जब भारत और चीन पिछले कुछ वर्षों से सीमा पर बने तनाव को कम करने और संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंधों में आई तल्खी के कारण कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताएं हुईं, जिसके बाद अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति बहाल करने की कोशिशें जारी हैं।

    शी जिनपिंग की पिछली भारत यात्रा अक्टूबर 2019 में हुई थी, जब दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच अनौपचारिक शिखर वार्ता आयोजित की गई थी। इसके कुछ महीनों बाद जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को दशकों के सबसे कठिन दौर में पहुंचा दिया। इसके बाद सीमा पर लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा और दोनों देशों ने कई स्तरों पर बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया।

    प्रस्तावित यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय राजनयिक संपर्क बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के चीन दौरे की चर्चा है, जहां सीमा विवाद और द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हो सकती है। हालांकि उनकी यात्रा की आधिकारिक तारीखों की पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसके अलावा भारत-चीन सीमा मामलों पर परामर्श एवं समन्वय के लिए गठित कार्य तंत्र (WMCC) की बैठक भी आने वाले समय में आयोजित होने की उम्मीद है। इसके बाद दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा विवाद पर आगे की वार्ता हो सकती है।

    यदि शी जिनपिंग भारत आते हैं तो ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बीच द्विपक्षीय बैठक होने की संभावना पर भी नजर रहेगी। ऐसी बैठक में सीमा प्रबंधन, क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार, निवेश, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास बहाली जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत बने हुए हैं, लेकिन सीमा विवाद के कारण राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।

    यह संभावित यात्रा ऐसे समय में सामने आ रही है जब वैश्विक स्तर पर कई भू-राजनीतिक चुनौतियां उभर रही हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, वैश्विक व्यापार पर दबाव और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच बदलते समीकरणों के बीच भारत और चीन जैसे बड़े देशों के बीच संवाद को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नई दिल्ली में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं होगा, बल्कि यह वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच रणनीतिक समन्वय को भी नई दिशा देने का अवसर बन सकता है।

  • भारत में जुट सकते हैं दुनिया के बड़े नेता, BRICS समिट में शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की संभावित मौजूदगी पर टिकी नजर

    भारत में जुट सकते हैं दुनिया के बड़े नेता, BRICS समिट में शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की संभावित मौजूदगी पर टिकी नजर

    नई दिल्ली । भारत सितंबर 2026 में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी की तैयारी में जुटा है। इस सम्मेलन को लेकर सबसे अधिक चर्चा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा को लेकर हो रही है। यदि उनका दौरा तय होता है, तो यह कोविड-19 महामारी और वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुए सीमा विवाद के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है, यह सम्मेलन भारत की कूटनीतिक भूमिका को और मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भी शामिल होने की संभावना है। रूस की ओर से पहले ही संकेत दिए जा चुके हैं कि राष्ट्रपति पुतिन भारत यात्रा कर सकते हैं। वहीं ब्रिक्स के नए सदस्य देशों में शामिल ईरान भी सम्मेलन में भाग लेने की तैयारी कर रहा है। हालांकि ईरान की ओर से किस स्तर का प्रतिनिधिमंडल भेजा जाएगा, इस पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। यदि सभी प्रमुख नेता सम्मेलन में शामिल होते हैं तो यह हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय बैठकों में से एक होगी।

    ब्रिक्स सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले महीने किर्गिस्तान में आयोजित होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने की संभावना भी जताई जा रही है। इस दौरान उनकी रूस, चीन और ईरान सहित कई सदस्य देशों के शीर्ष नेताओं से द्विपक्षीय मुलाकात हो सकती है। यह बैठक अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बाद एससीओ देशों की पहली शीर्ष स्तरीय बैठक मानी जा रही है, इसलिए क्षेत्रीय सुरक्षा, पश्चिम एशिया की स्थिति, ऊर्जा सहयोग, व्यापार और बहुपक्षीय साझेदारी जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शी जिनपिंग नई दिल्ली आते हैं तो यह भारत और चीन के संबंधों में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत होगा। पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद और तनाव के कारण दोनों देशों के रिश्तों में दूरी आई थी, लेकिन हाल के महीनों में संवाद बढ़ाने के प्रयास भी तेज हुए हैं। ऐसे में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की संभावित मुलाकात द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने की दृष्टि से अहम मानी जा रही है। सीमा प्रबंधन, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर भी चर्चा की संभावना जताई जा रही है।

    इस बीच पाकिस्तान की ओर से भी संकेत मिले हैं कि वर्ष 2027 में इस्लामाबाद में आयोजित होने वाले एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए भारत सहित सभी सदस्य देशों को औपचारिक निमंत्रण भेजा जाएगा। पाकिस्तान सितंबर 2026 से एससीओ की अध्यक्षता संभालेगा और मेजबान देश होने के नाते सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों को आमंत्रित करना उसकी जिम्मेदारी होगी। इस घटनाक्रम को भी क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    नई दिल्ली में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर अब दुनिया की नजरें टिकी हैं। यदि चीन, रूस, भारत और अन्य सदस्य देशों के शीर्ष नेता एक मंच पर आते हैं, तो वैश्विक आर्थिक सहयोग, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, व्यापार, निवेश, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है। ऐसे में यह सम्मेलन केवल सदस्य देशों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीतिक परिदृश्य के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

  • SCO शिखर सम्मेलन में PM मोदी के पाकिस्तान दौरे पर सस्पेंस, इस्लामाबाद ने सभी सदस्य देशों को आमंत्रित करने की तैयारी शुरू की

    SCO शिखर सम्मेलन में PM मोदी के पाकिस्तान दौरे पर सस्पेंस, इस्लामाबाद ने सभी सदस्य देशों को आमंत्रित करने की तैयारी शुरू की

    नई दिल्ली । शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के आगामी शिखर सम्मेलन को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक गतिविधियां चर्चा में हैं। साल 2027 में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित होने वाले SCO सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शामिल होने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन पाकिस्तान की ओर से सभी सदस्य देशों को आमंत्रित करने की बात कही गई है।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने संकेत दिए हैं कि SCO के नियमों और प्रोटोकॉल के तहत सम्मेलन में सभी सदस्य देशों को निमंत्रण भेजा जाएगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि संगठन के सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों को सम्मेलन में आमंत्रित करना मेजबान देश की जिम्मेदारी है।

    इस बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान जाएंगे। हालांकि, भारत की ओर से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। प्रधानमंत्री की किसी भी विदेश यात्रा का फैसला समय, परिस्थितियों और कूटनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर लिया जाता है।

    SCO एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन है, जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान सहित कई अन्य देश सदस्य हैं। इस संगठन का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग, सुरक्षा, आर्थिक विकास और आपसी संबंधों को मजबूत करना है। हर साल सदस्य देशों के बीच अध्यक्षता बदलती रहती है और जिस देश के पास अध्यक्षता होती है, वही शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है।

    2027 में SCO की अध्यक्षता पाकिस्तान के पास रहने की संभावना है, जिसके तहत इस्लामाबाद में राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों की बैठक आयोजित की जाएगी। ऐसे सम्मेलनों में सदस्य देशों के शीर्ष नेता क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं।

    भारत और पाकिस्तान के रिश्ते लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद हैं, जिनमें सीमा सुरक्षा और आतंकवाद जैसे विषय प्रमुख हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के पाकिस्तान दौरे का फैसला केवल SCO की बैठक तक सीमित नहीं होगा, बल्कि व्यापक कूटनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

    इस बीच पाकिस्तान ने भारत और अन्य सदस्य देशों के साथ SCO प्रक्रिया के तहत सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल का पालन करने की बात कही है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच संभावित बैठक को लेकर भी सवाल किया गया था, जिस पर उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी प्रस्तावित मुलाकात की जानकारी नहीं है।

    SCO की स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी। संगठन का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। समय के साथ इसका दायरा बढ़ा है और यह एशिया के प्रमुख बहुपक्षीय मंचों में शामिल हो गया है।

    अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि भारत इस सम्मेलन को लेकर क्या रुख अपनाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित भागीदारी को लेकर अंतिम फैसला आने वाले समय में भारत सरकार की कूटनीतिक रणनीति और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।