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  • भारत की कूटनीति में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह बड़ा बदलाव, अमेरिका से यूरोप तक कई अहम मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल|

    भारत की कूटनीति में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह बड़ा बदलाव, अमेरिका से यूरोप तक कई अहम मुलाकातों ने बढ़ाई हलचल|

    नई दिल्ली ।अक्टूबर 2026 का आखिरी सप्ताह भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहा। 25 से 31 अक्टूबर के बीच भारत ने यूरोप, पश्चिम एशिया, उत्तरी अमेरिका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क तेज किए। इस दौरान उच्चस्तरीय यात्राओं, द्विपक्षीय बैठकों और बहुपक्षीय सम्मेलनों के जरिए व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। सप्ताह के दौरान भारत ने पुराने साझेदारों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने के साथ नए सहयोग की संभावनाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया।

    इस सप्ताह की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि 30 और 31 अक्टूबर को अमेरिका के अटलांटा में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक रही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने वैश्विक संघर्षों, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भारत का पक्ष रखा।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और बातचीत के माध्यम से तलाशा जाना चाहिए। उन्होंने युद्धों के व्यापक आर्थिक प्रभावों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, किसी क्षेत्र में होने वाला संघर्ष केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित करता है। इसका असर विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों पर पड़ता है।

    अटलांटा में ही क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक भी हुई। इसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक समन्वय से जुड़े विषयों पर चर्चा की। इस बैठक को आगामी क्वाड नेताओं के शिखर सम्मेलन की तैयारियों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना गया।

    जी-20 बैठक के दौरान जयशंकर ने कई देशों के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। 30 अक्टूबर को उन्होंने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास से बातचीत की। इस दौरान यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

    कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के साथ हुई मुलाकात में दोनों देशों के बीच सहयोग की प्रगति की समीक्षा की गई। वहीं, ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग के साथ भी बातचीत हुई। इन संपर्कों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और भारत के बीच प्रौद्योगिकी एवं नवाचार साझेदारी को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

    जयशंकर ने अर्जेंटीना, ब्राजील, मैक्सिको और जर्मनी के विदेश मंत्रियों से भी मुलाकात की। अर्जेंटीना के साथ व्यापार, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा और परमाणु सहयोग जैसे विषय चर्चा में रहे। मैक्सिको के साथ बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों को और गति देने पर जोर दिया गया। इन बैठकों के जरिए भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के अवसर तलाशे।

    इससे पहले 25 से 28 अक्टूबर तक लिकटेंस्टीन के वंशानुगत राजकुमार एलोइस अपनी पत्नी राजकुमारी सोफी के साथ भारत की राजकीय यात्रा पर आए थे। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद हाउस में उनसे मुलाकात की। बातचीत में व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई। भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के बीच हुए समझौते के तहत आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाना भी प्रमुख विषय रहा।

    यूरोप के साथ संबंधों को लेकर ऑस्ट्रिया की विदेश मंत्री बीट माइनल-राइजिंगर की भारत यात्रा भी महत्वपूर्ण रही। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उनकी बातचीत में व्यापार, प्रौद्योगिकी और यूरोपीय देशों के साथ सहयोग बढ़ाने से जुड़े मुद्दे शामिल रहे। इसके साथ ही खाड़ी देशों के साथ भारत के बढ़ते संपर्क भी व्यापक कूटनीतिक गतिविधियों का हिस्सा रहे।

    पूरे सप्ताह की गतिविधियों से भारत की विदेश नीति की तीन प्रमुख प्राथमिकताएं सामने आईं। पहली, अमेरिका, यूरोप और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख साझेदारों के साथ रणनीतिक संवाद बनाए रखना। दूसरी, व्यापार, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते तलाशना। तीसरी, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों के बीच बातचीत तथा कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना।

    इस तरह अक्टूबर का अंतिम सप्ताह भारत के लिए केवल बैठकों और यात्राओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक मंचों पर अपनी प्राथमिकताएं रखने और विभिन्न देशों के साथ साझेदारी को आगे बढ़ाने का अवसर भी बना।

  • भारत-स्पेन संबंधों को नई ऊंचाई देने स्पेन जाएंगे पबित्रा मार्गेरिटा, मैड्रिड में कई अहम बैठकों पर रहेंगी नजरें

    भारत-स्पेन संबंधों को नई ऊंचाई देने स्पेन जाएंगे पबित्रा मार्गेरिटा, मैड्रिड में कई अहम बैठकों पर रहेंगी नजरें

    नई दिल्ली ।विदेश एवं कपड़ा राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा 3 नवंबर से तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर स्पेन जाएंगे। इस दौरान वह 30वें इबेरो-अमेरिकन कॉन्फ्रेंस शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। भारत इस सम्मेलन में एसोसिएट ऑब्जर्वर यानी सहयोगी पर्यवेक्षक के रूप में भाग ले रहा है। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच राजनयिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    स्पेन में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में लैटिन अमेरिका और यूरोप के कई देश हिस्सा लेते हैं। वर्तमान में इसके सदस्य देशों की संख्या 22 है। इनमें लैटिन अमेरिका के 19 देश और यूरोप के तीन देश स्पेन, पुर्तगाल तथा अंडोरा शामिल हैं। इसके अलावा सम्मेलन में 12 एसोसिएट ऑब्जर्वर और 20 कंसल्टेटिव ऑब्जर्वर भी जुड़े हुए हैं। भारत सहयोगी पर्यवेक्षक के रूप में इस मंच की गतिविधियों में भागीदारी कर रहा है।

    पबित्रा मार्गेरिटा की यात्रा के दौरान सम्मेलन के इतर विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के साथ द्विपक्षीय बैठकों का कार्यक्रम भी प्रस्तावित है। इन मुलाकातों में आपसी सहयोग और साझा हितों से जुड़े विषयों पर चर्चा होगी। इसके अलावा राज्य मंत्री स्पेन की राजधानी मैड्रिड में रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों से भी मुलाकात करेंगे। इससे स्पेन में बसे भारतीय नागरिकों के साथ संपर्क और संवाद को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    यह यात्रा भारत और स्पेन के बीच वर्ष 2026 के लिए घोषित संयुक्त पहल के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों ने 2026 को संस्कृति, पर्यटन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संयुक्त वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस पहल के तहत दोनों देशों में विभिन्न कार्यक्रम और गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। राज्य मंत्री की यात्रा इन्हीं आयोजनों की कड़ी का हिस्सा होगी।

    भारत और स्पेन के बीच राजनयिक संबंध वर्ष 1956 में स्थापित हुए थे। वर्ष 2026 में दोनों देशों के संबंधों के 70 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर दोनों देशों ने सहयोग के नए क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है। इसी वर्ष आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में स्पेन के राष्ट्रपति पेड्रो सांचेज भी नई दिल्ली पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी।

    दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत में रक्षा, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के उपायों पर चर्चा हुई थी। भारत और स्पेन के बीच रक्षा आधुनिकीकरण, एयरोस्पेस, नौसैनिक तकनीक और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी विकसित हो रही है।

    व्यापारिक मोर्चे पर स्पेन यूरोप में भारत का छठा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वर्ष 2023 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 9.9 अरब डॉलर दर्ज किया गया था। भारत में 250 से अधिक स्पेनिश कंपनियां सक्रिय रूप से कारोबार कर रही हैं। इन कंपनियों की मौजूदगी दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के विस्तार को दर्शाती है।

    स्पेन में भारतीय समुदाय की संख्या लगभग 75 हजार बताई जाती है। दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने के लिए भी कई प्रयास किए गए हैं। अगस्त 2024 में बार्सिलोना में भारत का नया महावाणिज्य दूतावास खोला गया था। इससे स्पेन में भारतीय नागरिकों को राजनयिक और अन्य आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिल रही है।

    शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग जारी है। स्पेन के वलाडोलिड विश्वविद्यालय में हिंदी और भारतीय अध्ययन से जुड़ी पीठ स्थापित है। इसके अलावा स्पेन के कई शहरों में हर साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पबित्रा मार्गेरिटा की आगामी यात्रा के दौरान होने वाली बैठकों और सम्मेलन में भागीदारी से इन सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यापारिक और तकनीकी संबंधों को आगे बढ़ाने के अवसर मिलेंगे।

  • पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने की पीएम मोदी की तारीफ, भारत को बताया दुनिया के लिए उम्मीद की किरण

    पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने की पीएम मोदी की तारीफ, भारत को बताया दुनिया के लिए उम्मीद की किरण


    नई दिल्ली ।
    पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें अनिश्चितता और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में दुनिया के लिए उम्मीद की किरण बताया। भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर आए टस्क ने द्विपक्षीय बातचीत के बाद संयुक्त बयान में कहा कि उन्हें मोदी को अपना मित्र कहने पर गर्व है। उन्होंने भारत और पोलैंड के बीच मजबूत होते संबंधों, साझा मूल्यों और आर्थिक विकास की भी सराहना की।

    डोनाल्ड टस्क ने कहा कि भारत जैसे शक्तिशाली देश का नेतृत्व नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति के हाथों में होना हम सभी के लिए उम्मीद की किरण है। उन्होंने दोहराया कि उन्हें वास्तव में गर्व है कि वह खुद को प्रधानमंत्री मोदी का मित्र कह सकते हैं। टस्क के मुताबिक, दोनों देशों के बीच बातचीत बेहद सफल रही है। इसकी वजह केवल भारत और पोलैंड के बीच समानताएं नहीं, बल्कि यह भी है कि भौगोलिक दूरी को छोड़कर दोनों देशों के संबंधों में कोई बड़ा अंतर या बाधा नहीं है।

    पोलैंड के प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत और पोलैंड के बीच तालमेल स्वाभाविक है और दोनों देशों के हितों में कोई टकराव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कोई ऐतिहासिक मुद्दा नहीं है जो दोनों देशों को एक-दूसरे से अलग करता हो। दोनों देश भरोसे, साझा मूल्यों और विचारों के आधार पर अपनी मित्रता को आगे बढ़ा रहे हैं। टस्क ने विशेष रूप से अहिंसा के विचार का उल्लेख करते हुए इसे दोनों देशों के साझा मूल्यों में शामिल बताया।

    टस्क ने भारत और पोलैंड की आर्थिक प्रगति की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि पिछले 35 वर्षों में दोनों देशों ने असाधारण आर्थिक सफलता और तेज विकास देखा है। उनके अनुसार, दुनिया भारत और पोलैंड की विकास यात्रा को ईर्ष्या की नजर से देखती है। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब वैश्विक स्तर पर राजनीतिक अनिश्चितता और विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्षों के बीच देशों के बीच सहयोग और संवाद को अहम माना जा रहा है।

    बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत और पोलैंड रक्षा, अंतरिक्ष तथा परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों ने अपनी रणनीतिक साझेदारी का विस्तार करने और आपसी सहयोग को व्यापक बनाने के लिए कई कदम उठाने का फैसला किया है। मोदी के मुताबिक, भारत और पोलैंड द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने तथा विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन और पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के लिए किए जा रहे सार्थक प्रयासों को भारत का समर्थन जारी रहने की बात भी कही। टस्क की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब यूक्रेन में जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच बातचीत में द्विपक्षीय सहयोग के साथ वैश्विक शांति से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहे।

    मोदी ने अपनी वर्ष 2024 की पोलैंड यात्रा को याद करते हुए कहा कि उस दौरान डोनाल्ड टस्क ने उनका और उनके प्रतिनिधिमंडल का गर्मजोशी से स्वागत किया था। उन्होंने टस्क का भारत में स्वागत करने पर खुशी जताई। दोनों नेताओं के बयानों से भारत और पोलैंड के बीच राजनीतिक संवाद, आपसी विश्वास और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने की साझा इच्छा सामने आई। रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा में सहयोग बढ़ाने पर सहमति इस साझेदारी के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के लिए अमेरिका जिम्मेदार, ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने कूटनीति पर दिया जोर

    होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के लिए अमेरिका जिम्मेदार, ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने कूटनीति पर दिया जोर

    नई दिल्ली । होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका को क्षेत्रीय असुरक्षा के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीति और राजनीतिक बातचीत के माध्यम से किया जाना चाहिए। तेहरान में सोमवार को रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अराघची ने पड़ोसी देशों से क्षेत्र की सुरक्षा के लिए साझा व्यवस्था विकसित करने की अपील भी की।

    अराघची के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के क्षेत्र में असुरक्षा की प्रमुख वजह अमेरिका की नीतियां और ईरान के खिलाफ जारी सैन्य तथा आर्थिक दबाव हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई ने क्षेत्रीय परिस्थितियों को और तनावपूर्ण बनाया है। ईरान का कहना है कि मौजूदा संकट को केवल सैन्य शक्ति के इस्तेमाल से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित देशों के बीच संवाद और राजनीतिक प्रयास आवश्यक हैं।

    ईरानी विदेश मंत्री ने क्षेत्रीय देशों के नेतृत्व में सुरक्षा व्यवस्था बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए, जिसके तहत विदेशी सेनाओं की मौजूदगी के बिना क्षेत्र के देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करें। उनके अनुसार, क्षेत्र की स्थिरता के लिए स्थानीय देशों की भागीदारी और आपसी सहयोग महत्वपूर्ण है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बना हुआ है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला रणनीतिक समुद्री मार्ग है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इसका विशेष महत्व है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के कुल तेल और अन्य हाइड्रोकार्बन परिवहन का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। इस कारण यहां जहाजों की आवाजाही में बाधा आने या सुरक्षा संकट बढ़ने से ऊर्जा बाजारों और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

    ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव का प्रभाव इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा पर भी दिखाई दे रहा है। ईरान इस जलमार्ग पर अपने नियंत्रण का दावा करता रहा है, जबकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक नाकेबंदी बनाए रखी है। दोनों देशों के बीच तनाव और समुद्री गतिविधियों को लेकर मतभेदों ने क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे माहौल में अराघची ने कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देने की बात कही है।

    रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी ईरान के साथ बातचीत के दौरान क्षेत्रीय संकट का समाधान खोजने के लिए राजनीतिक प्रयासों का समर्थन किया। तेहरान की यात्रा के दौरान उन्होंने अराघची और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से मुलाकात की। रूस ने ईरान के साथ अपने राजनीतिक और आर्थिक संबंध जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है। लावरोव ने कहा कि मॉस्को दोनों देशों के बीच सहयोग और विभिन्न परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

    रूस और ईरान का कहना है कि क्षेत्रीय विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने के प्रयास जारी रहने चाहिए। दोनों देशों के बीच चर्चा में ऊर्जा, परिवहन और आर्थिक सहयोग से जुड़े विषय भी शामिल रहे। रूस ने क्षेत्रीय संकट को कम करने और राजनीतिक समाधान की संभावनाओं पर काम करने की इच्छा जताई है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध बने रहने के कारण तनाव कम करने की राह चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

    अराघची के बयान से स्पष्ट है कि ईरान क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर विदेशी सैन्य मौजूदगी के बजाय पड़ोसी देशों की भागीदारी वाली व्यवस्था का समर्थन कर रहा है। वहीं, रूस भी कूटनीति और बातचीत के जरिए तनाव कम करने की बात कर रहा है। आने वाले समय में होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित देश आपसी मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के लिए किस तरह आगे बढ़ते हैं।

  • मार्को रुबियो के मुंबई दौरे पर राहुल गांधी का पीएम मोदी से सवाल, विदेश मंत्रालय की भूमिका पर उठाए सवाल

    मार्को रुबियो के मुंबई दौरे पर राहुल गांधी का पीएम मोदी से सवाल, विदेश मंत्रालय की भूमिका पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के प्रस्तावित भारत दौरे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रुबियो की मुंबई यात्रा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष किया है। उन्होंने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बीच कथित भ्रम का मुद्दा उठाते हुए प्रधानमंत्री से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। रुबियो इसी महीने भारत आने वाले हैं और उनके मुंबई के साथ गुजरात के जामनगर जाने का भी कार्यक्रम बताया गया है।

    राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणी में कहा कि रुबियो ने अपने कर्मचारी को मुंबई बुलाया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को संबोधित करते हुए कहा कि विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस बात को लेकर उलझन में हैं कि आखिर क्या हो रहा है। राहुल ने तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री चाहें तो अधिकारियों को स्थिति समझा सकते हैं, या फिर वह स्वयं इस बारे में समझाने के लिए तैयार हैं।

    राहुल गांधी की यह टिप्पणी भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के उस बयान के बाद आई, जिसमें उन्होंने कहा था कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर के भी मुंबई में मार्को रुबियो से मिलने की उम्मीद है। इसी बयान को लेकर कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि भारतीय विदेश मंत्री की संभावित मुलाकात के बारे में आधिकारिक जानकारी विदेश मंत्रालय की ओर से सामने क्यों नहीं आई।

    विपक्ष का सवाल मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि भारत के विदेश मंत्री की देश के भीतर होने वाली बैठक से जुड़ी जानकारी किस माध्यम से सार्वजनिक की जा रही है। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए प्रधानमंत्री से विदेश मंत्रालय में स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि रुबियो और जयशंकर की मुलाकात का अंतिम कार्यक्रम क्या होगा।

    कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस मामले में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राजदूत की ओर से मार्को रुबियो की आगामी मुंबई यात्रा के बारे में अतिरिक्त जानकारी दिया जाना आश्चर्यजनक नहीं है। हालांकि, उन्होंने इस बात को असाधारण बताया कि अमेरिकी राजदूत ने यह भी कहा कि डॉ. एस. जयशंकर के अन्य लोगों के साथ वहां शामिल होने की उम्मीद है।

    जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि भारत के विदेश मंत्री की देश के भीतर होने वाली बैठकों की जानकारी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता के बजाय किसी दूसरे पक्ष की ओर से कब से दी जाने लगी। उनके बयान का केंद्र यह था कि ऐसी महत्वपूर्ण राजनयिक गतिविधियों के बारे में जानकारी देने की जिम्मेदारी भारतीय विदेश मंत्रालय की होनी चाहिए।
    इस विवाद के बीच जयराम रमेश ने ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि भारत को 10 मई 2025 की शाम अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के माध्यम से पहली बार जानकारी मिली थी कि ऑपरेशन सिंदूर रोक दिया गया है। इस संदर्भ को उठाते हुए उन्होंने भारत-अमेरिका के बीच संवेदनशील कूटनीतिक मामलों में संवाद और आधिकारिक जानकारी के तरीके पर सवाल खड़े किए।

    मार्को रुबियो का प्रस्तावित दौरा ऐसे समय चर्चा में आया है, जब उनकी मुंबई यात्रा और जामनगर जाने की योजना को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। फिलहाल राहुल गांधी और जयराम रमेश की टिप्पणियों में विदेश मंत्रालय की संचार प्रक्रिया और संभावित उच्चस्तरीय बैठक की जानकारी सार्वजनिक किए जाने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं। रुबियो और जयशंकर की मुलाकात को लेकर अंतिम आधिकारिक कार्यक्रम सामने आने के बाद ही इस संबंध में स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

  • शी जिनपिंग ने पांच साल में एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने का किया बड़ा एलान

    शी जिनपिंग ने पांच साल में एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने का किया बड़ा एलान


    नई दिल्ली ।
    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अगले पांच वर्षों में एक लाख युवा अमेरिकियों को चीन आने का निमंत्रण दिया है। इन युवाओं के लिए पढ़ाई और विभिन्न आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अवसर उपलब्ध कराने की बात कही गई है। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब चीन और अमेरिका के बीच संबंधों में व्यापार, तकनीक और अन्य रणनीतिक मुद्दों को लेकर लगातार चर्चा बनी हुई है। शी जिनपिंग ने युवाओं को दोनों देशों के भविष्य के संबंधों से जोड़ते हुए लोगों के बीच संपर्क और आपसी समझ बढ़ाने पर जोर दिया।

    शी जिनपिंग ने कहा कि चीन और अमेरिका के रिश्तों की उम्मीद दोनों देशों के लोगों से जुड़ी है और इन संबंधों का भविष्य युवाओं के हाथ में है। इसी सोच के तहत उन्होंने अगले पांच वर्षों में एक लाख युवा अमेरिकियों को चीन आने का न्योता देने की घोषणा की। इन यात्राओं में शिक्षा के साथ सांस्कृतिक और अन्य आदान-प्रदान कार्यक्रमों को भी शामिल किया जाएगा।

    यह पहली बार नहीं है जब चीन की ओर से अमेरिकी युवाओं को इस तरह आमंत्रित किया गया है। नवंबर 2023 में भी पांच वर्षों के भीतर 50 हजार युवा अमेरिकियों को चीन बुलाने की पहल की गई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह लक्ष्य तय समय से करीब ढाई साल पहले ही पूरा हो गया। इसके बाद अब प्रस्तावित संख्या को बढ़ाकर एक लाख कर दिया गया है।

    इस पहल के तहत अमेरिकी युवाओं ने चीन के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया है। कई युवाओं ने वहां शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया, स्थानीय लोगों से मुलाकात की और चीन के इतिहास तथा आधुनिक विकास को करीब से समझने का अवसर पाया। चीन में आयोजित कार्यक्रमों में विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच संवाद और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां भी शामिल रही हैं।

    अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने चीन और अमेरिका के पुराने संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दोनों देशों के सहयोग को याद किया और कहा कि उस समय दोनों पक्षों ने फासीवादी ताकतों के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। उनका कहना था कि इस साझा इतिहास को दोनों देशों के लोगों ने याद रखा है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन और अमेरिका के सहयोग का उल्लेख किया। उन्होंने चीन की मदद करने वाले अमेरिकी पायलटों के समूह ‘फ्लाइंग टाइगर्स’ की भूमिका को याद किया। इसके साथ ही उन्होंने दोनों देशों के बीच पुराने संपर्कों से जुड़े ‘गंग हो’ शब्द का भी जिक्र किया और इसे मिलकर काम करने के अर्थ से जोड़ा।

    शी जिनपिंग ने यह भी कहा कि चीन के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का लक्ष्य और अमेरिका को फिर से महान बनाने की कोशिश एक-दूसरे के साथ आगे बढ़ सकती हैं। उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती और संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।

    एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने की नई पहल को शिक्षा, सांस्कृतिक संपर्क और लोगों के बीच संवाद बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। पिछले कार्यक्रम में 50 हजार युवाओं का लक्ष्य समय से पहले पूरा होने के बाद अब इसकी संख्या दोगुनी की गई है। आने वाले पांच वर्षों में इस पहल के तहत कितने युवा चीन पहुंचते हैं और इससे दोनों देशों के बीच शैक्षणिक एवं सामाजिक संपर्क किस स्तर तक बढ़ता है, यह आगे स्पष्ट होगा।

  • नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन, पुतिन-मोदी मुलाकात में भारत-रूस सहयोग और वैश्विक हालात पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन, पुतिन-मोदी मुलाकात में भारत-रूस सहयोग और वैश्विक हालात पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली । रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत आएंगे। नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को आयोजित होने वाले इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के दौरान भारत और रूस के बीच उच्चस्तरीय संपर्क भी देखने को मिलेगा। पुतिन 11 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। इस मुलाकात में दोनों देशों के आपसी संबंधों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

    रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा की पुष्टि क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने मंगलवार को की। उन्होंने कहा कि पुतिन कुछ ही दिनों में भारत की यात्रा शुरू करेंगे। पेसकोव के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच लंबे समय से करीबी और व्यावहारिक संबंध रहे हैं। दोनों नेता द्विपक्षीय एजेंडे से जुड़े संवेदनशील विषयों पर भी खुले और रचनात्मक तरीके से बातचीत करने में सक्षम हैं।

    रूस की ओर से पुतिन की इस यात्रा को भारत के साथ सहयोग को आगे बढ़ाने के महत्वपूर्ण अवसर के तौर पर देखा जा रहा है। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, व्यापार, रक्षा, तकनीक और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं की बैठक में द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने के उपायों पर विचार किया जा सकता है।

    18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होगा। भारत इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसने समूह के लिए लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता पर आधारित व्यापक प्राथमिकताएं तय की हैं। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर रहेगा।

    ब्रिक्स सहयोग को रूस मुख्य रूप से तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित मानता है। इनमें राजनीति और सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वित्त तथा सांस्कृतिक और मानवीय सहयोग शामिल हैं। रूस समूह के विस्तार और अलग-अलग प्रारूपों में नए देशों की भागीदारी को भी समर्थन देता रहा है। ऐसे में सम्मेलन में ब्रिक्स के भविष्य और वैश्विक स्तर पर इसकी भूमिका से जुड़े मुद्दे भी अहम रह सकते हैं।

    पुतिन और मोदी की इससे पहले 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में मुलाकात हुई थी। दोनों नेता शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन से इतर मिले थे। उस बातचीत के दौरान रूस और भारत के संबंधों को लगातार मजबूत बताते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई थी।

    बिश्केक बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत का रुख भी स्पष्ट किया था। उन्होंने शत्रुता समाप्त करने और शांति की दिशा में प्रयासों को समर्थन देने की बात कही थी। भारत लगातार यह रुख दोहराता रहा है कि संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए।

    इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि 2026 में संगठन की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। भारत की अध्यक्षता के दौरान व्यापार, कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, शहरी विकास, स्टार्टअप और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पुतिन की मौजूदगी से सम्मेलन में भारत-रूस संबंधों के साथ-साथ ब्रिक्स के व्यापक एजेंडे को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

  • रूसी तेल खरीद पर जयशंकर का स्पष्ट रुख, बोले युद्ध ऊर्जा कारोबार से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से खत्म होगा

    रूसी तेल खरीद पर जयशंकर का स्पष्ट रुख, बोले युद्ध ऊर्जा कारोबार से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से खत्म होगा

    नई दिल्ली ।विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा है कि यूक्रेन युद्ध का समाधान किसी देश के तेल खरीदने या नहीं खरीदने से नहीं निकलेगा। उन्होंने कहा कि करीब पांचवें वर्ष में पहुंच चुका यह संघर्ष संवाद, कूटनीति और गंभीर बातचीत के जरिए ही समाप्त हो सकता है।

    कीव में गुरुवार को जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है। करीब 1.4 अरब आबादी वाले देश के लिए पर्याप्त और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन का अपना दृष्टिकोण है और भारत उसका सम्मान करता है, लेकिन युद्ध खत्म करने का रास्ता केवल तेल खरीदने या रोकने से नहीं निकल सकता।

    अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित प्रतिबंध या अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने के सवाल पर भी विदेश मंत्री ने भारत की स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि संघर्ष को समाप्त करने के लिए उन उपायों पर ध्यान देना जरूरी है, जो सीधे शांति और बातचीत की दिशा में आगे बढ़ते हों।

    जयशंकर ने कहा कि रूस से तेल, खनिज, धातु, एल्यूमिना या उर्वरक खरीदना अथवा नहीं खरीदना युद्ध का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक वास्तविक समाधान बातचीत के जरिए ही संभव है और भारत दोनों पक्षों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने की अपनी नीति पर कायम है।

    रूस और यूक्रेन के बीच 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से सवाल उठाए जाते रहे हैं। भारत ने लगातार कहा है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और उचित कीमत सुनिश्चित करना है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव के बीच रूसी तेल भारत के लिए एक व्यावहारिक ऊर्जा विकल्प भी बना है।

    जयशंकर इन दिनों तीन दिवसीय यूक्रेन और पोलैंड यात्रा पर हैं। कीव में उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा से मुलाकात की। यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करना है।

    उन्होंने भारत की उस नीति को भी दोहराया कि यह युद्ध का युग नहीं है और किसी संघर्ष का स्थायी समाधान युद्ध के मैदान में नहीं खोजा जा सकता। भारत दोनों पक्षों के साथ संपर्क बनाए हुए है। जयशंकर ने हाल में मॉस्को में हुई उच्चस्तरीय बातचीत के बाद अब कीव में भी सीधे संवाद किया है।

    विदेश मंत्री ने हाल में कीव पर हुए हमले का उल्लेख करते हुए वहां हुई भारतीय नागरिक की मौत पर भी शोक जताया। उन्होंने कहा कि संघर्ष में जान गंवाने वाले सभी लोगों के परिवारों के प्रति भारत की संवेदनाएं हैं। इस घटना ने यूक्रेन में मौजूद भारतीय नागरिकों और वहां काम करने वाले लोगों की सुरक्षा के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

    जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री के साथ बातचीत में काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हो रहे हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय नाविक विभिन्न देशों के जहाजों पर काम करते हैं और ऐसे हमलों से उनकी सुरक्षा प्रभावित होती है।

    भारत ने काला सागर में नागरिक और व्यावसायिक जहाजों पर किसी भी पक्ष की ओर से किए जाने वाले हमलों को अस्वीकार्य बताया है। समुद्री मार्ग बाधित होने से ईंधन, उर्वरक और खाद्य सामग्री की आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। भारत का जोर इसलिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीतिक समाधान के साथ नागरिकों तथा वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर भी बना हुआ है।

  • ट्रंप के अचानक बदलते रवैये से सतर्क था भारतीय प्रतिनिधिमंडल, मीडिया सवालों को लेकर अमेरिका के दावे पर भारत ने दी सफाई

    ट्रंप के अचानक बदलते रवैये से सतर्क था भारतीय प्रतिनिधिमंडल, मीडिया सवालों को लेकर अमेरिका के दावे पर भारत ने दी सफाई

    नई दिल्ली । जी-7 बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद मीडिया बातचीत को लेकर नया विवाद सामने आया है। अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने दावा किया कि बैठक के बाद पत्रकारों को सवाल पूछने से रोकने का अनुरोध भारत की तरफ से किया गया था। इस दावे के बाद भारत की ओर से भी अपना पक्ष सामने रखा गया है।

    सर्जियो गोर के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात के बाद भारत की ओर से मीडिया को लेकर विशेष अनुरोध किया गया था। उनका दावा है कि विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया था कि पत्रकारों को बैठक के बाद बुलाया जा सकता है, लेकिन पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होनी चाहिए। साथ ही पत्रकारों को सवाल पूछने की अनुमति नहीं देने की बात भी कही गई थी।

    गोर के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने इस व्यवस्था पर सहमति जताई थी। हालांकि, बैठक समाप्त होने के बाद ट्रंप ने कैमरे की ओर देखकर पत्रकारों से सवाल करने की बात कह दी। इसके बाद मीडिया बातचीत का स्वरूप पहले तय किए गए तरीके से अलग हो गया।

    भारत की ओर से सामने आए सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रतिनिधिमंडल ने किसी असामान्य स्थिति से बचने के लिए पहले से तैयारी की थी। सूत्रों का कहना है कि ट्रंप के साथ बैठकों के दौरान सावधानी बरतना जरूरी माना जाता है, क्योंकि वह बातचीत के दौरान अचानक कोई नया मुद्दा उठा सकते हैं या चर्चा का रुख बदल सकता है।

    भारतीय पक्ष के अनुसार, ट्रंप के साथ पहले हुई कुछ बैठकों में भी बातचीत के दौरान अप्रत्याशित मुद्दे सामने आए हैं। दक्षिण अफ्रीका और यूक्रेन के नेताओं के साथ उनकी बातचीत के दौरान भी ऐसी स्थिति देखने को मिलने का हवाला दिया गया है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की मुलाकात के दौरान मीडिया बातचीत को लेकर भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने पहले से तैयारी की थी।

    जी-7 बैठक के दौरान मोदी और ट्रंप के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, वहां मौजूद भारतीय नाविकों की सुरक्षा और भारत-अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े विषय प्रमुख रहे। होर्मुज क्षेत्र में जारी परिस्थितियों को देखते हुए वहां काम कर रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भारत के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा रही।

    प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और उनकी सुरक्षित स्थिति सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया। बातचीत के दौरान ट्रंप की ओर से भी भारत के साथ खड़े रहने का भरोसा दिए जाने की बात सामने आई है। इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग के महत्व को भी रेखांकित किया गया।

    भारत और अमेरिका के बीच व्यापार का मुद्दा भी दोनों नेताओं की बातचीत में शामिल रहा। दोनों देशों के संबंधों में व्यापार और आर्थिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं। ऐसे में जी-7 बैठक के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात को कई स्तरों पर अहम माना गया।

    सर्जियो गोर के बयान के बाद अब प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भारत और अमेरिका के पक्षों में अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राजदूत ने मीडिया सवालों को लेकर भारत के अनुरोध का जिक्र किया, जबकि भारतीय पक्ष ने इसे प्रतिनिधिमंडल की पूर्व तैयारी और ट्रंप के अप्रत्याशित रवैये को ध्यान में रखकर बरती गई सावधानी से जोड़ा है। इस घटनाक्रम ने मोदी-ट्रंप मुलाकात से जुड़े राजनीतिक और कूटनीतिक पहलुओं को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

  • सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा

    सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा


    नई दिल्ली । 
    भारत में अमेरिका के राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर के जम्मू कश्मीर और लद्दाख दौरे के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर की समस्याओं का समाधान वॉशिंगटन से नहीं आएगा, बल्कि इनका समाधान भारत को ही करना है। उमर अब्दुल्ला का यह बयान सर्जियो गोर के श्रीनगर पहुंचने से पहले आया है।

    सर्जियो गोर दो दिवसीय दौरे पर जम्मू कश्मीर और लद्दाख पहुंचे हैं। उनके कार्यक्रम में श्रीनगर में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के साथ अलग अलग संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत भी शामिल है। अमेरिकी राजदूत के लंबे अंतराल के बाद जम्मू कश्मीर दौरे को क्षेत्रीय और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वह सर्जियो गोर की बात सुनना अधिक पसंद करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अमेरिकी राजदूत के सामने जम्मू कश्मीर के आंतरिक मामलों को शिकायत के रूप में नहीं उठाएंगे। मुख्यमंत्री के मुताबिक किसी दूसरे देश के राजदूत के सामने अपने ही देश की शिकायत करना उनकी आदत नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर के हालात और क्षेत्र से जुड़े विषयों पर सर्जियो गोर से बातचीत जरूर होगी। हालांकि, वह इन मुद्दों का समाधान किसी दूसरे देश से हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे। उमर अब्दुल्ला का यह रुख जम्मू कश्मीर के आंतरिक विषयों पर विदेशी हस्तक्षेप की मांग से दूरी बनाए रखने वाला माना जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान देश के भीतर ही तलाशना होगा। उनके बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि के साथ बातचीत से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई, बल्कि बातचीत का दायरा क्षेत्र की स्थिति और संबंधित विषयों तक रखने की बात कही है।

    इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे को लेकर अलग मुद्दा उठाया है। उन्होंने कश्मीर यात्रा के संबंध में जारी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर उसे वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि कश्मीर में बड़ी संख्या में परिवार पर्यटन पर निर्भर हैं और ऐसी सलाह क्षेत्र को बाहरी दुनिया से जोड़ने में बाधा पैदा करती है।

    महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि ट्रैवल एडवाइजरी को हटाना कश्मीर के लोगों के लिए विश्वास बढ़ाने वाला कदम हो सकता है। पर्यटन जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।

    सर्जियो गोर के दौरे के दौरान क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर स्थानीय प्रतिनिधियों से बातचीत होने की संभावना है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला का बयान इस बात को रेखांकित करता है कि जम्मू कश्मीर से जुड़े आंतरिक मामलों पर स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व समाधान के लिए देश के संस्थानों और सरकारों को प्राथमिक पक्ष मानता है।

    कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी राजदूत का जम्मू कश्मीर दौरा स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ बातचीत को शिकायत या बाहरी हस्तक्षेप की मांग का माध्यम नहीं बनाएंगे।

    सर्जियो गोर की यात्रा के दौरान होने वाली बैठकों से क्षेत्र की स्थिति, स्थानीय अपेक्षाओं और भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा का अवसर मिलेगा। फिलहाल उमर अब्दुल्ला का संदेश स्पष्ट है कि जम्मू कश्मीर की आंतरिक समस्याओं पर संवाद हो सकता है, लेकिन उनके समाधान की जिम्मेदारी भारत की ही है।