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  • अमेरिका की नई रणनीति में भारत अहम केंद्र, चीन के सूचना अभियान का मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया डिप्लोमेसी पर बढ़ेगा जोर

    अमेरिका की नई रणनीति में भारत अहम केंद्र, चीन के सूचना अभियान का मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया डिप्लोमेसी पर बढ़ेगा जोर

    नई दिल्ली । अमेरिका ने चीन के बढ़ते सूचना प्रभाव और डिजिटल अभियानों का मुकाबला करने के लिए अपनी पब्लिक डिप्लोमेसी रणनीति में बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। इस नई रणनीति में भारत को एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, वाशिंगटन अब पारंपरिक मीडिया माध्यमों के साथ-साथ सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए विदेशी नागरिकों तक अपनी पहुंच मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

    अमेरिकी एजेंसी फॉर ग्लोबल मीडिया (यूएसएजीएम) का नेतृत्व करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से नामित सारा रोजर्स ने सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी के सामने अपनी रणनीति को लेकर जानकारी दी। उन्होंने कहा कि एशिया अमेरिका की प्राथमिकताओं में प्रमुख क्षेत्र होगा, क्योंकि चीन समेत कई देशों द्वारा चलाए जा रहे सूचना अभियानों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

    रोजर्स ने कहा कि अमेरिका को बदलते मीडिया इस्तेमाल के तरीकों के अनुसार अपनी अंतरराष्ट्रीय संचार नीति को आधुनिक बनाना होगा। उन्होंने संकेत दिया कि अब केवल रेडियो और टेलीविजन प्रसारण पर निर्भर रहने के बजाय सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, पॉडकास्ट और डिजिटल कम्युनिटी के माध्यम से लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने की जरूरत है।

    उन्होंने भारत और जापान जैसे देशों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों के बीच संवाद का एक बड़ा माध्यम बन चुके हैं। इसी वजह से अमेरिका अपनी डिजिटल रणनीति के तहत इन क्षेत्रों में अधिक सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की योजना बना रहा है।

    अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि सूचना का क्षेत्र अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। चीन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि मजबूत करने और अपने विचारों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करता रहा है। ऐसे में अमेरिका भी अपनी पहुंच और प्रभाव को बढ़ाने के लिए नई तकनीकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लेना चाहता है।

    रोजर्स ने कहा कि यूएसएजीएम की प्राथमिकताओं में एजेंसी को अधिक प्रभावी बनाना, नेतृत्व को मजबूत करना और उसकी कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाना शामिल होगा। इसके अलावा उन्होंने रिसर्च क्षमता को बेहतर करने पर भी जोर दिया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अमेरिकी संदेश कितने लोगों तक पहुंच रहे हैं और उनका प्रभाव कितना है।

    नई रणनीति के तहत अमेरिका उन देशों और क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहता है जहां स्वतंत्र जानकारी तक लोगों की पहुंच सीमित है। एशिया के अलावा मध्य पूर्व, ईरान, अफगानिस्तान और क्यूबा जैसे क्षेत्रों को भी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय प्रसारण रणनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत का महत्व अमेरिका के लिए केवल आर्थिक और रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब सूचना और डिजिटल प्रभाव के क्षेत्र में भी बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत होने के साथ ही डिजिटल संवाद और सार्वजनिक कूटनीति के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

    यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा व्यापार, तकनीक और सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक सूचना व्यवस्था के क्षेत्र में भी बढ़ रही है। अमेरिका की नई रणनीति का उद्देश्य डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी पहुंच को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रभाव को बनाए रखना है।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों पर संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता

    होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों पर संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता


    नई दिल्ली ।
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हालिया हमलों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। भारत ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में भारतीय नागरिकों और नाविकों की सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नौवहन को बिना किसी बाधा के बहाल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। भारत ने कहा कि क्षेत्र में जारी अस्थिरता न केवल वैश्विक व्यापार बल्कि लाखों लोगों की सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकती है।

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बहस के दौरान भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि पश्चिम एशिया भारत के लिए रणनीतिक, आर्थिक और मानवीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में एक करोड़ से अधिक भारतीय रहते और काम करते हैं, इसलिए वहां की सुरक्षा स्थिति भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने और तनाव कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आग्रह किया।

    भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य में हाल के दिनों में कई वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की। भारतीय प्रतिनिधि ने विशेष रूप से उन जहाजों का उल्लेख किया जिन पर भारतीय नाविक सवार थे और जो हमलों से प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि इन घटनाओं में कई भारतीय नागरिक घायल हुए हैं, जिनमें कुछ गंभीर रूप से घायल बताए गए हैं। इसके अलावा एक भारतीय नागरिक की मृत्यु और एक अन्य के लापता होने की जानकारी भी सामने आई है, जिसे भारत ने अत्यंत गंभीर विषय बताया।

    राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इन मार्गों पर किसी भी प्रकार का हमला पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने सभी संबंधित पक्षों से अपील की कि समुद्री मार्गों पर सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम तत्काल उठाए जाएं, ताकि व्यापारिक गतिविधियां सामान्य रूप से जारी रह सकें।

    भारत ने यह भी कहा कि हाल के समय में संघर्ष में अस्थायी विराम के संकेत मिले थे, लेकिन उसके बाद दोबारा हिंसक घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली है। इस स्थिति को चिंताजनक बताते हुए भारत ने कूटनीतिक संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया। भारतीय पक्ष का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी देशों को जिम्मेदारी के साथ सहयोग करना होगा।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत ने दोहराया कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों, सुरक्षित समुद्री परिवहन और वैश्विक शांति के पक्ष में है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्दोष नागरिकों और समुद्री कर्मियों पर होने वाले हमले किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किए जा सकते। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि समुद्री सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक चिंता का विषय है और इसके लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

    भारत ने अपने वक्तव्य में यह संदेश भी दिया कि पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता बनाए रखना पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में है। भारत ने उम्मीद जताई कि संबंधित पक्ष संयम और संवाद का रास्ता अपनाएंगे, जिससे तनाव कम होगा, समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित बनेंगे और क्षेत्र में सामान्य स्थिति जल्द बहाल हो सकेगी। भारत ने स्पष्ट किया कि विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वह हर आवश्यक कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है।

  • भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के उद्देश्य से विदेश सचिव विक्रम मिस्री इन दिनों चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल (नेशनल एकेडमी ऑफ गवर्नेंस) के उपाध्यक्ष ली वेनतांग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों से महत्वपूर्ण मुलाकातें कीं। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, शैक्षणिक आदान-प्रदान, राजनीतिक संवाद, आर्थिक संबंधों और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    भारतीय दूतावास की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मंगलवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष ली वेनतांग से मुलाकात की। इस दौरान उन्हें संस्थान के ऐतिहासिक महत्व, बौद्धिक योगदान और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। दोनों पक्षों ने भविष्य में अकादमिक सहयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संस्थागत आदान-प्रदान की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया। इस बैठक को दोनों देशों के बीच ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इससे पहले विदेश सचिव ने चीन की विदेश उप मंत्री हुआ चुनयिंग के साथ भी विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों ने भारत-चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। बैठक में दोनों देशों के नेताओं की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत भारत और चीन को एक-दूसरे के विकास में सहयोगी और साझेदार के रूप में देखा गया है।

    वार्ता के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया गया। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया जा सकता है। साथ ही संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए नियमित संपर्क बनाए रखने की आवश्यकता पर भी सहमति व्यक्त की गई।

    सोमवार को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने चीन की 14वीं राष्ट्रीय जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन (सीपीपीसीसी) की समिति के उप महासचिव होंग लियांग से भी मुलाकात की। इस बैठक में राजनीतिक स्तर पर संवाद को मजबूत करने और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के विभिन्न उपायों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि जनसंपर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से आपसी समझ और विश्वास को और बेहतर बनाया जा सकता है।

    चीन यात्रा के पहले दिन विदेश सचिव ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सन हैयान से भी मुलाकात की। इस बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने, राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों पर विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों के बीच हुई इन लगातार बैठकों को भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के समय में दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिशें क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। विदेश सचिव विक्रम मिस्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बनाए रखने, मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।

  • ईरान पर अमेरिका ने रोके रात के हवाई हमले, उपराष्ट्रपति वेंस और जनरल कैन ने युद्ध के विस्तार पर जताई गंभीर चिंता

    ईरान पर अमेरिका ने रोके रात के हवाई हमले, उपराष्ट्रपति वेंस और जनरल कैन ने युद्ध के विस्तार पर जताई गंभीर चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका ने ईरान के खिलाफ पिछले कई दिनों से जारी रात के हवाई हमलों को फिलहाल रोक दिया है। इस फैसले के साथ ही वाशिंगटन में युद्ध के संभावित विस्तार, सैन्य संसाधनों की उपलब्धता और कूटनीतिक विकल्पों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी प्रशासन के भीतर हुई उच्चस्तरीय बैठकों में सुरक्षा, रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया, जिसके बाद अभियान को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय सामने आया।

    जानकारी के अनुसार, व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक के दौरान ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई के प्रभाव, संभावित जोखिम और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी क्रम में अभियान को कुछ समय के लिए रोकने का फैसला किया गया।

    बताया गया कि अमेरिकी सेना ने लगभग दो सप्ताह तक लगातार रात के समय सैन्य अभियान चलाया था। इसके बाद रक्षा प्रतिष्ठान की ओर से संकेत मिला कि फिलहाल सभी अभियान ‘होल्ड’ पर रखे गए हैं। हालांकि प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह निर्णय स्थायी है या परिस्थितियों के अनुसार भविष्य में इसमें बदलाव किया जा सकता है।

    बैठक के दौरान जनरल डैन केन ने विशेष रूप से सैन्य हथियारों के भंडार और लंबे समय तक अभियान जारी रहने के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने उपलब्ध सैन्य विकल्पों की प्रभावशीलता पर विश्वास जताते हुए यह भी कहा कि किसी भी आगे की कार्रवाई से पहले उसके व्यापक परिणामों का गंभीरता से आकलन किया जाना आवश्यक है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा के बाद ही सैन्य अभियान को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया गया।

    सूत्रों के अनुसार, हथियारों के भंडार की स्थिति बैठक में उठाए गए कई महत्वपूर्ण विषयों में से एक थी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यही कारण अंतिम निर्णय का आधार बना या फिर क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका और अन्य रणनीतिक कारकों ने भी इसमें भूमिका निभाई। अमेरिकी प्रशासन ने इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

    व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अमेरिका अब भी कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है। प्रशासन का कहना है कि यदि ईरान क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियां जारी रखता है या अपने सहयोगियों के माध्यम से सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न करता है, तो अमेरिका के पास सभी विकल्प उपलब्ध रहेंगे। साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के बाद ईरान के लिए बातचीत का रास्ता अपनाना अधिक व्यावहारिक होगा।

    बैठक के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिकी अधिकारी ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए हैं और विभिन्न स्तरों पर संवाद जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की रणनीति परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि आवश्यक हुआ तो सैन्य अभियान दोबारा शुरू किया जा सकता है या उसकी तीव्रता भी बढ़ाई जा सकती है। उनके अनुसार, मौजूदा बातचीत में ईरान पहले की तुलना में अधिक गंभीर रुख अपनाता दिखाई दे रहा है।

    अमेरिका के इस कदम को पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि कूटनीतिक प्रयास कितने सफल होते हैं और आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है या सैन्य गतिविधियां फिर से तेज होती हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर इस घटनाक्रम का प्रभाव लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की तीन यूरोपीय देशों की राजकीय यात्रा संपन्न, भारत के कूटनीतिक रिश्तों को मिला नया विस्तार

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की तीन यूरोपीय देशों की राजकीय यात्रा संपन्न, भारत के कूटनीतिक रिश्तों को मिला नया विस्तार

    नई दिल्ली । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु मोल्दोवा, उत्तरी मैसेडोनिया और रोमानिया की अपनी तीन देशों की राजकीय यात्रा सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद रविवार को नई दिल्ली लौट आईं। यह यात्रा भारत और यूरोप के उभरते साझेदार देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विभिन्न स्तरों पर हुई बैठकों और समझौतों ने यह संकेत दिया कि भारत शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को और व्यापक बनाने की दिशा में सक्रिय है।

    यात्रा का अंतिम पड़ाव रोमानिया रहा, जहां राष्ट्रपति मुर्मु का राजधानी बुखारेस्ट में पूरे राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया गया। उन्हें औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया और इसके बाद रोमानिया के राष्ट्रपति निकुसोर डैन के साथ द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विचार साझा किए गए।

    रोमानिया प्रवास के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, खेल सहयोग और उच्च शिक्षा से जुड़े तीन महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन की चेयर स्थापित करने का निर्णय भी शामिल रहा। इसे दोनों देशों के बीच शैक्षणिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। लगभग तीन दशक बाद किसी भारतीय राष्ट्रपति की यह पहली राजकीय यात्रा भी रही, जिससे इस दौरे का महत्व और बढ़ गया।

    रोमानिया से पहले राष्ट्रपति मुर्मु ने उत्तरी मैसेडोनिया का दौरा किया। राजधानी स्कोप्जे में उनका औपचारिक स्वागत किया गया, जहां उन्होंने राष्ट्रपति गोर्दाना सिलजानोव्स्का-दावकोवा और प्रधानमंत्री ह्रिस्टिजान मिकोस्की से अलग-अलग मुलाकात की। दोनों देशों के नेताओं ने आर्थिक सहयोग, शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। दोनों पक्षों ने आपसी विश्वास और साझा हितों के आधार पर दीर्घकालिक सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।

    इस राजकीय यात्रा की शुरुआत मोल्दोवा से हुई, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु इस देश का दौरा करने वाली पहली भारतीय राष्ट्रपति बनीं। राजधानी चिसीनाउ में उन्होंने संसद का दौरा किया और संसदीय मैत्री समूह के सदस्यों के साथ बैठक की। इस दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय सहयोग, आर्थिक साझेदारी और जन-से-जन संपर्क को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया। दोनों देशों ने भविष्य में सहयोग के नए अवसर तलाशने और पारस्परिक हितों पर आधारित संबंधों को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की।

    पूरी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति के साथ भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहा, जिसने विभिन्न बैठकों और आधिकारिक कार्यक्रमों में भाग लिया। प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा, कृषि, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार और सांस्कृतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में संवाद को आगे बढ़ाने के प्रयास किए। इससे भारत और इन तीनों देशों के बीच संस्थागत सहयोग के नए अवसर विकसित होने की संभावना बढ़ी है।

    यह यात्रा ऐसे समय में संपन्न हुई है जब भारत यूरोप के विभिन्न देशों के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को लगातार विस्तार दे रहा है। मोल्दोवा, उत्तरी मैसेडोनिया और रोमानिया के साथ हुए संवाद तथा समझौते भविष्य में शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति, व्यापार और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग को नई गति देने में सहायक माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह राजकीय यात्रा भारत की संतुलित और सक्रिय विदेश नीति को और मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ यूरोप में उसकी कूटनीतिक उपस्थिति को भी नया आयाम देगी।

  • नेपाल के पीएम बालेन शाह ने बदला रुख, भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात कर कूटनीतिक संतुलन का दिया संकेत

    नेपाल के पीएम बालेन शाह ने बदला रुख, भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात कर कूटनीतिक संतुलन का दिया संकेत

    नई दिल्ली । नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह, जिन्हें बालेन शाह के नाम से जाना जाता है, अपने कार्यकाल के शुरुआती महीनों में अपनाई गई एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक नीति में बदलाव करने जा रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने यह स्पष्ट किया था कि वह किसी भी विदेशी राजदूत से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात नहीं करेंगे और सभी आधिकारिक संपर्क विदेश मंत्रालय की निर्धारित प्रक्रिया या समूह बैठकों के माध्यम से ही होंगे। अब पहली बार वह इस नीति से हटते हुए भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने की तैयारी में हैं। इसे नेपाल की संतुलित विदेश नीति और बदलती कूटनीतिक आवश्यकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीन के राजदूत झांग माओमिंग से प्रधानमंत्री की अलग-अलग बैठकें एक ही दिन आयोजित की जाएंगी। दोनों बैठकों का उद्देश्य यह संदेश देना है कि नेपाल अपने दोनों प्रमुख पड़ोसी देशों के साथ समान महत्व और संतुलित संबंध बनाए रखना चाहता है। सरकार की ओर से इन बैठकों की पुष्टि की गई है, हालांकि उनकी अंतिम तिथि सार्वजनिक नहीं की गई है। विदेश मंत्रालय इन मुलाकातों की तैयारियों में जुटा हुआ है।

    प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव करते हुए एक नया कूटनीतिक प्रोटोकॉल लागू किया था। इसके तहत उन्होंने तय किया कि वह केवल किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री स्तर के प्रतिनिधियों से ही व्यक्तिगत बैठक करेंगे। राजदूतों, उप-मंत्रियों या अन्य अधिकारियों से मुलाकात विदेश मंत्रालय की मौजूदगी में या समूह स्तर पर ही होगी। उनका मानना था कि विदेश नीति व्यक्तिगत संपर्कों के बजाय संस्थागत व्यवस्था के तहत संचालित होनी चाहिए और इससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी।

    नेपाल में लंबे समय से यह परंपरा रही थी कि प्रभावशाली देशों के राजदूत सीधे प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत मुलाकात करते थे। कई बार इन बैठकों का कोई औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था। विशेषज्ञों का मानना था कि ऐसी व्यवस्था से विदेश नीति पर अनौपचारिक प्रभाव बढ़ सकता है और राष्ट्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं। इसी सोच के आधार पर बालेन शाह ने नई व्यवस्था लागू की थी, जिसके चलते कई विदेशी प्रतिनिधियों के साथ प्रस्तावित व्यक्तिगत मुलाकातें नहीं हो सकीं।

    बताया जाता है कि उन्होंने भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री, अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों तथा चीन के कुछ उच्च प्रतिनिधियों से भी व्यक्तिगत मुलाकात नहीं की थी। हालांकि एशियाई विकास बैंक के अध्यक्ष मसातो कांडा के साथ उनकी एकल बैठक को विशेष परिस्थिति में अपवाद माना गया था। इन घटनाओं ने उनकी नई कार्यशैली को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा पैदा की थी।

    अब प्रधानमंत्री के रूप में कुछ महीनों के अनुभव के बाद बालेन शाह का रुख अधिक व्यावहारिक दिखाई दे रहा है। नेपाल की भौगोलिक, आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को देखते हुए भारत और चीन दोनों के साथ नियमित एवं प्रत्यक्ष संवाद बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता बन गया है। ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर संवाद को पूरी तरह सीमित रखने की नीति व्यवहारिक चुनौतियां पैदा कर रही थी। यही कारण माना जा रहा है कि उन्होंने पहली बार अपने पुराने निर्णय में बदलाव करने का फैसला लिया है।

    नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच खुली सीमा, सांस्कृतिक संबंध तथा लोगों के बीच गहरे सामाजिक जुड़ाव हैं। दूसरी ओर चीन ने हाल के वर्षों में नेपाल के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और परिवहन परियोजनाओं में बड़े निवेश किए हैं। ऐसे में दोनों देशों के साथ समान दूरी और समान निकटता बनाए रखना काठमांडू की कूटनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। बालेन शाह का यह नया कदम भी इसी संतुलन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

  • मनीला में जयशंकर की कूटनीतिक सक्रियता, श्रीलंका-बांग्लादेश समेत कई देशों के नेताओं से अहम मुलाकातें

    मनीला में जयशंकर की कूटनीतिक सक्रियता, श्रीलंका-बांग्लादेश समेत कई देशों के नेताओं से अहम मुलाकातें

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने फिलीपींस की राजधानी मनीला में आयोजित आसियान से जुड़ी उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान कई देशों के विदेश मंत्रियों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ व्यापक कूटनीतिक संवाद किया। इस दौरान उन्होंने श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान तथा यूरोपीय संघ की वरिष्ठ प्रतिनिधि काजा कैलास से अलग-अलग मुलाकात कर द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की। इन बैठकों को भारत की सक्रिय विदेश नीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक भागीदारी के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    दो दिवसीय मनीला दौरे के दौरान विदेश मंत्री ने आसियान-इंडिया, ईस्ट एशिया समिट और आसियान रीजनल फोरम की विदेश मंत्री स्तरीय बैठकों में हिस्सा लिया। इन बैठकों का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना, सुरक्षा चुनौतियों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करना तथा आर्थिक और समुद्री साझेदारी को नई दिशा देना रहा। भारत ने इन मंचों पर अपने सहयोगी देशों के साथ बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    श्रीलंका और बांग्लादेश के विदेश मंत्रियों के साथ मुलाकात के दौरान आपसी संबंधों, क्षेत्रीय विकास और सहयोग के विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई। भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ पारस्परिक विश्वास और सहयोग को आगे बढ़ाने की नीति पर जोर दिया। इसके साथ ही यूरोपीय संघ की वरिष्ठ प्रतिनिधि काजा कैलास के साथ हुई बैठक में भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी, वैश्विक चुनौतियों तथा साझा हितों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

    मनीला प्रवास के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने कई अन्य प्रमुख देशों के विदेश मंत्रियों से भी द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। इनमें फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, चीन, अमेरिका, रूस, सिंगापुर, कनाडा, थाईलैंड और न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री शामिल रहे। इसके अलावा उन्होंने आसियान के महासचिव से भी मुलाकात कर क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की। इन बैठकों का उद्देश्य विभिन्न देशों के साथ भारत के रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को नई गति देना था।

    विदेश मंत्री ने क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी भाग लिया। इस दौरान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वर्तमान स्थिति, क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री सहयोग और हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में नई दिल्ली में पहले हुई क्वाड वार्ता के निर्णयों की समीक्षा की गई और स्वतंत्र, समावेशी तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई गई। साथ ही आसियान की केंद्रीय भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

    भारत सरकार का मानना है कि यह दौरा एक्ट ईस्ट नीति के तहत आसियान देशों के साथ बढ़ते सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारत और आसियान के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से दोनों पक्ष व्यापार, संपर्क, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को लगातार विस्तार दे रहे हैं। वर्ष 2026 को आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, जिससे समुद्री संपर्क, ब्लू इकोनॉमी और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच सहयोग को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। मनीला में हुई ये बैठकें भारत की सक्रिय कूटनीति और बहुपक्षीय मंचों पर उसकी बढ़ती भूमिका को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं।

  • भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश, सीमा पर स्थायी शांति के बिना सामान्य रिश्तों की नहीं बन सकती मजबूत नींव

    भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश, सीमा पर स्थायी शांति के बिना सामान्य रिश्तों की नहीं बन सकती मजबूत नींव

    नई दिल्ली । भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में जारी प्रयासों के बीच विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के रिश्तों में स्थायी सुधार तभी संभव है, जब सीमा क्षेत्रों में पूरी तरह शांति और स्थिरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांतिपूर्ण माहौल दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली और सामान्य संबंधों की सबसे पहली तथा अनिवार्य शर्त है। यह संदेश उन्होंने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान दिया, जिसमें दोनों देशों के संबंधों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

    बैठक के दौरान भारत ने यह भी दोहराया कि दोनों देशों के बीच संबंध आपसी सम्मान, समान हितों और संवेदनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और चीन जैसे बड़े तथा प्रभावशाली पड़ोसी देशों के बीच स्थिर और संतुलित संबंध केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एशिया और वैश्विक स्तर पर भी उनका व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को मजबूत करने के लिए संवेदनशील मुद्दों का समाधान जिम्मेदारी और संवाद के माध्यम से किया जाना आवश्यक है।

    विदेश मंत्री ने सीमा क्षेत्रों में हालात सुधारने के लिए पिछले कुछ समय में उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने विभिन्न स्तरों पर संवाद और समन्वय के जरिए कई सकारात्मक पहल की हैं। इसके बावजूद सीमा क्षेत्रों में स्थायी शांति बनाए रखने के लिए सैन्य और राजनयिक तंत्र के बीच निरंतर संपर्क तथा सक्रिय सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है। उन्होंने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के तनाव की संभावना कम हो सके।

    भारत ने बैठक के दौरान आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया। विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय कंपनियों को चीन के बाजार में निष्पक्ष और पारदर्शी अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार असंतुलन पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे संतुलित करने की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने भरोसेमंद और स्थिर सप्लाई चेन की अहमियत पर बल देते हुए कहा कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक सहयोग को अधिक पारदर्शी और संतुलित बनाना समय की मांग है।

    बैठक में दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने की आवश्यकता पर भी सहमति जताई गई। विदेश मंत्री ने कहा कि नियमित संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, यात्रा सुविधाओं में सुधार और विभिन्न द्विपक्षीय तंत्रों की सक्रिय बैठकों से आपसी विश्वास को और मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर संवाद बनाए रखना भविष्य के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें विवाद या टकराव में बदलने से रोकना दोनों पक्षों की साझा जिम्मेदारी है। विदेश मंत्री ने कहा कि संवाद और कूटनीति ही ऐसे मुद्दों का सबसे प्रभावी समाधान है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत रचनात्मक सहयोग और सकारात्मक संबंधों का पक्षधर है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा की स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    हाल के समय में दोनों देशों के बीच कई क्षेत्रों में संवाद और सहयोग बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक पहल देखने को मिली है। हालांकि भारत का स्पष्ट मानना है कि सीमा पर स्थायी शांति और विश्वास का वातावरण ही भविष्य में मजबूत, संतुलित और दीर्घकालिक भारत-चीन संबंधों की वास्तविक आधारशिला बन सकता है।

  • क्वाड मंत्रीस्तरीय बैठक से पहले अमेरिका का बड़ा संदेश, हिंद-प्रशांत में भारत समेत साझेदार देशों की भूमिका को बताया रणनीतिक रूप से अहम

    क्वाड मंत्रीस्तरीय बैठक से पहले अमेरिका का बड़ा संदेश, हिंद-प्रशांत में भारत समेत साझेदार देशों की भूमिका को बताया रणनीतिक रूप से अहम

    नई दिल्ली । फिलीपींस में आयोजित होने वाली क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले अमेरिका ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत सहित अपने रणनीतिक साझेदार देशों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि अमेरिका एक स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति में क्वाड देशों की साझेदारी निर्णायक महत्व रखती है। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री स्थिरता से जुड़े मुद्दे वैश्विक स्तर पर लगातार चर्चा का विषय बने हुए हैं।

    अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो फिलीपींस में आयोजित आसियान से जुड़ी विभिन्न बैठकों और क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए रवाना हो चुके हैं। उनके दौरे के दौरान आसियान पोस्ट-मिनिस्ट्रियल कॉन्फ्रेंस, ईस्ट एशिया समिट विदेश मंत्रियों की बैठक और आसियान रीजनल फोरम की बैठकों में भी हिस्सा लेने का कार्यक्रम है। इस दौरान उनकी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ताएं भी प्रस्तावित हैं।

    अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत करना, रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देना तथा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़े साझा प्रयासों को आगे बढ़ाना है। अमेरिका ने दोहराया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था, समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और सभी देशों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना उसकी प्रमुख विदेश नीति प्राथमिकताओं में शामिल है।

    क्वाड समूह भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मंच है। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता, आर्थिक सहयोग, आपदा प्रबंधन, समुद्री सुरक्षा, उभरती प्रौद्योगिकियों और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर मिलकर काम करता है। पिछले कुछ वर्षों में क्वाड की गतिविधियों का दायरा लगातार बढ़ा है और इसे क्षेत्रीय सहयोग के महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है।

    इससे पहले आयोजित क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में चारों देशों ने स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। साथ ही सदस्य देशों ने क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत करने तथा ऐसी साझा पहलों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई थी, जिनका लाभ हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों को सीधे तौर पर मिल सके। बैठक में समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर विशेष जोर दिया गया था।

    पिछली बैठक के संयुक्त वक्तव्य में पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की गई थी। सदस्य देशों ने किसी भी ऐसे एकतरफा कदम का विरोध दोहराया था, जो बल प्रयोग, दबाव या सैन्य गतिविधियों के माध्यम से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को प्रभावित करता हो। साथ ही नौवहन की स्वतंत्रता, हवाई आवाजाही की सुरक्षा और समुद्री क्षेत्रों में बढ़ती सैन्य गतिविधियों को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

    फिलीपींस में होने वाली इस बैठक पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, सामरिक सहयोग, समुद्री चुनौतियों और आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होगी। भारत सहित सभी सदस्य देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, संतुलन और सहयोग को मजबूत करने की दिशा में साझा रणनीति पर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे।

  • भारत-मोल्दोवा संबंधों में ऐतिहासिक अध्याय, राष्ट्रपति मुर्मु और माइया सैंडू की मुलाकात में व्यापार, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा सहयोग पर बनी सहमति

    भारत-मोल्दोवा संबंधों में ऐतिहासिक अध्याय, राष्ट्रपति मुर्मु और माइया सैंडू की मुलाकात में व्यापार, कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा सहयोग पर बनी सहमति

    नई दिल्ली ।भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने तीन देशों के राजकीय दौरे के पहले चरण में मोल्दोवा की राजधानी चिसीनाउ पहुंचकर वहां की राष्ट्रपति माइया सैंडू से शिखर वार्ता की। दोनों नेताओं के बीच हुई बैठक में भारत और मोल्दोवा के द्विपक्षीय संबंधों की व्यापक समीक्षा की गई तथा विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत बनाने के लिए नए अवसरों पर विस्तार से चर्चा हुई। इस यात्रा को दोनों देशों के संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पड़ाव माना जा रहा है।

    चिसीनाउ स्थित राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति मुर्मु का औपचारिक स्वागत किया गया। उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया और दोनों देशों के राष्ट्रीय सम्मान के अनुरूप राजकीय समारोह आयोजित किया गया। राष्ट्रपति माइया सैंडू ने उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हुए दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग और विश्वास को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने भारत और मोल्दोवा के बीच राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों पर व्यापक चर्चा की। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि मौजूदा सहयोग को और अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ नई साझेदारियों की संभावनाओं को भी आगे बढ़ाया जाएगा। वार्ता में आपसी हितों से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए साझा प्रयासों पर भी जोर दिया गया।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि किसी भारतीय राष्ट्रपति का मोल्दोवा का यह पहला राजकीय दौरा दोनों देशों के संबंधों में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह यात्रा भारत और मोल्दोवा के बीच बढ़ते विश्वास, मित्रता और दीर्घकालिक सहयोग को नई मजबूती प्रदान करेगी। उन्होंने दोनों देशों के बीच पारस्परिक सम्मान और साझा विकास की भावना को भविष्य की साझेदारी का मजबूत आधार बताया।

    इस दौरे के दौरान राष्ट्रपति मुर्मु की मोल्दोवा की संसद के अध्यक्ष इगोर ग्रोसु से भी मुलाकात प्रस्तावित है। इसके अलावा वह मोल्दोवा-भारत संसदीय मैत्री समूह के सदस्यों के साथ संवाद करेंगी। यात्रा कार्यक्रम में व्यापारिक समुदाय के साथ बिजनेस फोरम को संबोधित करने और मोल्दोवा में रह रहे भारतीय समुदाय के सदस्यों से मुलाकात भी शामिल है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक और सामाजिक संबंधों को और मजबूत बनाना है।

    भारत और मोल्दोवा के बीच कृषि, स्वास्थ्य सेवाओं, औषधि उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। दोनों देशों ने इन क्षेत्रों में निवेश, तकनीकी आदान-प्रदान और संस्थागत सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ने से दोनों देशों को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

    राष्ट्रपति मुर्मु की यह यात्रा केवल कूटनीतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत यूरोप के देशों के साथ अपने संबंधों को लगातार विस्तार दे रहा है और मोल्दोवा के साथ यह संवाद उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    अपने तीन देशों के दौरे के पहले चरण में मोल्दोवा पहुंचीं राष्ट्रपति मुर्मु की यह यात्रा दोनों देशों के बीच विश्वास, सहयोग और साझेदारी को नई गति देने वाली पहल के रूप में देखी जा रही है। आने वाले समय में इस दौरे के परिणाम व्यापार, निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में दिखाई देने की उम्मीद जताई जा रही है।